Unit – 3

Constitution and Constitutionalism, Rule of Law

संविधान एवं संवैधानिकतावाद तथा विधि के शासन की अवधारणा

मानव समाज के विकास के साथ-साथ शासन व्यवस्था का भी विकास हुआ है। प्रारंभिक काल में शासन का आधार मुख्य रूप से राजा की इच्छा और शक्ति हुआ करता था। शासक जो चाहता था वही कानून बन जाता था और प्रजा को उसका पालन करना पड़ता था। ऐसी व्यवस्था में नागरिकों के अधिकार सुरक्षित नहीं होते थे तथा शासन में मनमानी की संभावना बनी रहती थी। समय के साथ लोगों में स्वतंत्रता, समानता और न्याय की चेतना विकसित हुई। लोगों ने यह महसूस किया कि राज्य की शक्ति को नियंत्रित करने और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए कुछ निश्चित नियमों और सिद्धांतों की आवश्यकता है। इसी आवश्यकता ने संविधान, संवैधानिकतावाद और विधि के शासन जैसी महत्वपूर्ण अवधारणाओं को जन्म दिया।

आज के आधुनिक लोकतांत्रिक राज्यों में संविधान शासन व्यवस्था का आधार है, संवैधानिकतावाद उस संविधान के अनुरूप शासन की भावना को व्यक्त करता है और विधि का शासन यह सुनिश्चित करता है कि राज्य में किसी व्यक्ति की नहीं बल्कि कानून की सर्वोच्चता हो। ये तीनों अवधारणाएँ आधुनिक लोकतंत्र की आधारशिला मानी जाती हैं।


संविधान की अवधारणा

संविधान किसी राज्य का मूल, सर्वोच्च और आधारभूत कानून होता है। यह राज्य की राजनीतिक व्यवस्था का स्वरूप निर्धारित करता है और यह बताता है कि शासन कैसे संचालित होगा। संविधान में सरकार के विभिन्न अंगों की शक्तियाँ, अधिकार, कर्तव्य और सीमाएँ निर्धारित की जाती हैं। साथ ही नागरिकों के अधिकारों और स्वतंत्रताओं की भी सुरक्षा की जाती है।

सरल शब्दों में संविधान राज्य के संचालन का नियम-पुस्तक (Rule Book) है। जिस प्रकार किसी विद्यालय में उसके संचालन के लिए नियम होते हैं, किसी संस्था में उसके कार्य संचालन के लिए नियम होते हैं, उसी प्रकार किसी राष्ट्र के संचालन के लिए संविधान होता है।

संविधान केवल कानूनी दस्तावेज नहीं होता बल्कि वह किसी राष्ट्र की आकांक्षाओं, आदर्शों, मूल्यों और लक्ष्यों का भी प्रतीक होता है। उसमें यह निर्धारित किया जाता है कि राज्य किस दिशा में आगे बढ़ेगा और नागरिकों तथा सरकार के बीच संबंध किस प्रकार होंगे।


संविधान की आवश्यकता

किसी भी राज्य में संविधान का होना अत्यंत आवश्यक है। इसके अनेक कारण हैं।

सबसे पहले संविधान शासन को व्यवस्थित और संगठित बनाता है। यदि संविधान न हो तो सरकार के विभिन्न अंगों के बीच अधिकारों का टकराव उत्पन्न हो सकता है।

दूसरे, संविधान नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है। यह सुनिश्चित करता है कि सरकार नागरिकों की स्वतंत्रता का अनुचित हनन न कर सके।

तीसरे, संविधान राज्य की शक्ति को सीमित करता है। इससे शासन निरंकुश नहीं बन पाता।

चौथे, संविधान शासन में स्थिरता और निरंतरता बनाए रखता है। सरकारें बदल सकती हैं लेकिन संविधान राज्य की मूल व्यवस्था को बनाए रखता है।

पाँचवें, संविधान नागरिकों में सुरक्षा और विश्वास की भावना उत्पन्न करता है क्योंकि उन्हें पता होता है कि उनके अधिकार कानून द्वारा संरक्षित हैं।


संविधान की प्रमुख विशेषताएँ

संविधान शासन की संरचना निर्धारित करता है।

यह सरकार के विभिन्न अंगों के बीच शक्तियों का विभाजन करता है।

यह नागरिकों के अधिकारों और स्वतंत्रताओं की रक्षा करता है।

यह राज्य के उद्देश्यों और आदर्शों को स्पष्ट करता है।

यह सरकार को उत्तरदायी और नियंत्रित बनाता है।

यह राजनीतिक स्थिरता और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देता है।


विभिन्न देशों के संविधान

विश्व के विभिन्न देशों में संविधान का स्वरूप अलग-अलग है।

India का संविधान विश्व का सबसे विस्तृत लिखित संविधान माना जाता है। इसमें शासन, अधिकारों, न्याय, प्रशासन और लोकतंत्र के लगभग सभी महत्वपूर्ण पक्षों का विस्तार से वर्णन किया गया है।

United States का संविधान विश्व का सबसे पुराना लिखित संविधान है। यद्यपि इसका आकार छोटा है, फिर भी यह अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है।

United Kingdom का संविधान मुख्य रूप से अलिखित है और परंपराओं, कानूनों तथा न्यायिक निर्णयों पर आधारित है।

France में संविधान गणतांत्रिक शासन व्यवस्था का आधार है और वहाँ राष्ट्रपति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि संविधान का स्वरूप अलग हो सकता है, लेकिन उसका उद्देश्य राज्य को व्यवस्थित रूप से संचालित करना ही होता है।


संवैधानिकतावाद की अवधारणा

संविधान और संवैधानिकतावाद में अंतर समझना अत्यंत आवश्यक है। संविधान एक दस्तावेज है, जबकि संवैधानिकतावाद एक विचारधारा और शासन का सिद्धांत है।

संवैधानिकतावाद का अर्थ है कि राज्य की सारी शक्तियाँ संविधान द्वारा नियंत्रित और सीमित हों। शासन मनमाने ढंग से नहीं बल्कि संविधान द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार संचालित हो।

दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि संविधान शरीर है और संवैधानिकतावाद उसकी आत्मा है।

किसी देश में संविधान का होना पर्याप्त नहीं है। महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार वास्तव में संविधान का सम्मान करे और उसके अनुसार कार्य करे। यही संवैधानिकतावाद का सार है।


संवैधानिकतावाद का ऐतिहासिक विकास

संवैधानिकतावाद का विकास निरंकुश शासन के विरोध में हुआ।

मध्यकालीन यूरोप में राजा स्वयं को सर्वोच्च मानते थे और उनकी शक्ति पर कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं था। धीरे-धीरे जनता ने शासकों की निरंकुशता का विरोध किया।

इंग्लैंड में 1215 ई. का मैग्नाकार्टा संवैधानिक शासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। इसने राजा की शक्तियों पर कुछ सीमाएँ लगाईं।

इसके बाद इंग्लैंड की गौरवपूर्ण क्रांति (1688), अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम (1776) और फ्रांसीसी क्रांति (1789) ने संवैधानिक शासन के विचार को मजबूत किया।

इन घटनाओं ने यह सिद्ध किया कि सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी होनी चाहिए और उसकी शक्तियाँ कानून द्वारा नियंत्रित होनी चाहिए।


संवैधानिकतावाद के प्रमुख तत्व

सीमित सरकार

सरकार की शक्तियाँ असीमित नहीं होनी चाहिए।

कानून की सर्वोच्चता

शासन कानून के अनुसार चलना चाहिए।

नागरिक अधिकारों की सुरक्षा

व्यक्ति की स्वतंत्रता और अधिकारों का संरक्षण होना चाहिए।

स्वतंत्र न्यायपालिका

न्यायालय संविधान की रक्षा करें और सरकार की मनमानी को रोकें।

शक्तियों का विभाजन

विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन बना रहे।

उत्तरदायी शासन

सरकार जनता के प्रति जवाबदेह हो।


संवैधानिकतावाद का महत्व

संवैधानिकतावाद लोकतंत्र की रक्षा करता है।

यह नागरिक स्वतंत्रता को सुरक्षित बनाता है।

यह सत्ता के दुरुपयोग को रोकता है।

यह राजनीतिक स्थिरता को बढ़ावा देता है।

यह शासन को पारदर्शी और उत्तरदायी बनाता है।


विधि के शासन (Rule of Law) की अवधारणा

विधि का शासन आधुनिक लोकतंत्र की आत्मा माना जाता है।

इसका अर्थ है कि राज्य में कानून सर्वोच्च होगा और कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं होगा।

विधि के शासन का मूल संदेश है कि शासन व्यक्तियों का नहीं बल्कि कानून का होना चाहिए।

यदि किसी देश में शासक की इच्छा ही कानून बन जाए, तो वहाँ विधि का शासन नहीं बल्कि व्यक्ति का शासन होगा। लोकतंत्र में यह स्थिति स्वीकार नहीं की जा सकती।


ए. वी. डाइसी का योगदान

ब्रिटिश विद्वान A. V. Dicey ने विधि के शासन के सिद्धांत को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया।

उन्होंने विधि के शासन के तीन प्रमुख आधार बताए—

1. कानून की सर्वोच्चता

किसी भी व्यक्ति को बिना कानूनी प्रक्रिया के दंडित नहीं किया जा सकता।

2. कानून के समक्ष समानता

राजा, मंत्री, अधिकारी और सामान्य नागरिक सभी कानून के सामने समान हैं।

3. अधिकारों की न्यायिक सुरक्षा

नागरिकों के अधिकारों की रक्षा न्यायालयों द्वारा की जाती है।


विभिन्न देशों में विधि का शासन

India में संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता का सिद्धांत स्थापित करता है।

United Kingdom में विधि का शासन लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल आधार माना जाता है।

United States में सर्वोच्च न्यायालय सरकार के निर्णयों की समीक्षा कर सकता है यदि वे संविधान के विरुद्ध हों।

Germany में भी संविधान और कानून की सर्वोच्चता को अत्यधिक महत्व दिया जाता है।


संविधान, संवैधानिकतावाद और विधि के शासन का पारस्परिक संबंध

इन तीनों अवधारणाओं को अलग-अलग नहीं समझा जा सकता।

संविधान शासन की रूपरेखा देता है।

संवैधानिकतावाद यह सुनिश्चित करता है कि शासन उसी रूपरेखा के अनुसार चले।

विधि का शासन यह सुनिश्चित करता है कि संविधान और कानून सभी पर समान रूप से लागू हों।

यदि संविधान है लेकिन उसका पालन नहीं हो रहा, तो संवैधानिकतावाद नहीं होगा।

यदि संवैधानिकतावाद है लेकिन कानून सभी पर समान रूप से लागू नहीं होता, तो विधि का शासन अधूरा रहेगा।

इस प्रकार ये तीनों मिलकर लोकतांत्रिक शासन की मजबूत नींव तैयार करते हैं।

आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य की सफलता संविधान, संवैधानिकतावाद और विधि के शासन पर निर्भर करती है। संविधान शासन का आधार प्रदान करता है, संवैधानिकतावाद उस आधार को व्यवहार में लागू करने की भावना को व्यक्त करता है और विधि का शासन यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर न हो। भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों के अनुभव यह सिद्ध करते हैं कि जहाँ संविधान का सम्मान, संवैधानिक मूल्यों का पालन और विधि की सर्वोच्चता बनी रहती है, वहाँ लोकतंत्र अधिक मजबूत, स्थिर और सफल होता है। इसलिए राजनीति विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए इन तीनों अवधारणाओं का गहन अध्ययन अत्यंत आवश्यक है।

संविधान, संवैधानिकतावाद एवं विधि का शासन
(Constitution, Constitutionalism and Rule of Law)
(A) वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Questions)

एक शब्द / एक वाक्य में उत्तर दीजिए
  1. संविधान क्या है?
  2. संविधान का मुख्य उद्देश्य क्या है?
  3. संविधान किस प्रकार का कानून होता है?
  4. संविधान सरकार के किन अंगों की शक्तियों का निर्धारण करता है?
  5. संविधान नागरिकों की किसकी रक्षा करता है?
  6. संवैधानिकतावाद क्या है?
  7. संविधान और संवैधानिकतावाद में क्या अंतर है?
  8. संवैधानिकतावाद का मुख्य उद्देश्य क्या है?
  9. संवैधानिक शासन की दिशा में 1215 ई. की कौन-सी घटना महत्वपूर्ण थी?
  10. गौरवपूर्ण क्रांति किस वर्ष हुई?
  11. अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम कब हुआ?
  12. फ्रांसीसी क्रांति कब हुई?
  13. विधि के शासन (Rule of Law) का प्रतिपादन किसने किया?
  14. A. V. Dicey किस देश के विद्वान थे?
  15. विधि के शासन का पहला सिद्धांत क्या है?
  16. कानून के समक्ष समानता का क्या अर्थ है?
  17. भारत के संविधान का कौन-सा अनुच्छेद कानून के समक्ष समानता प्रदान करता है?
  18. विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान किस देश का है?
  19. विश्व का सबसे पुराना लिखित संविधान किस देश का है?
  20. किस देश का संविधान मुख्यतः अलिखित है?
  21. संविधान को किसकी "रूल बुक" कहा जाता है?
  22. संवैधानिकतावाद की आत्मा क्या है?
  23. विधि का शासन किसकी सर्वोच्चता स्थापित करता है?
  24. स्वतंत्र न्यायपालिका का क्या महत्व है?
  25. उत्तरदायी शासन किसका प्रमुख तत्व है?

(B) बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

1. संविधान होता है—

(A) सामान्य कानून

(B) सर्वोच्च कानून ✅

(C) धार्मिक कानून

(D) अंतरराष्ट्रीय कानून

2. संवैधानिकतावाद का अर्थ है—

(A) संविधान लिखना

(B) संविधान का पालन करते हुए शासन चलाना ✅

(C) चुनाव कराना

(D) संसद बनाना

3. संवैधानिक शासन की दिशा में पहला महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है—

(A) मानवाधिकार घोषणा

(B) मैग्नाकार्टा ✅

(C) बिल ऑफ राइट्स

(D) अमेरिकी संविधान

4. मैग्नाकार्टा कब जारी हुआ?

(A) 1066

(B) 1215 ✅

(C) 1688

(D) 1789

5. विधि के शासन के सिद्धांत का प्रतिपादन किसने किया?

(A) गैब्रियल आलमंड

(B) ए. वी. डाइसी ✅

(C) डेविड ईस्टन

(D) अरस्तू

6. भारत में कानून के समक्ष समानता किस अनुच्छेद में दी गई है?

(A) अनुच्छेद 12

(B) अनुच्छेद 14 ✅

(C) अनुच्छेद 19

(D) अनुच्छेद 21

7. विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है—

(A) अमेरिका

(B) ब्रिटेन

(C) भारत ✅

(D) फ्रांस

8. विश्व का सबसे पुराना लिखित संविधान है—

(A) भारत

(B) अमेरिका ✅

(C) फ्रांस

(D) जर्मनी

9. निम्न में किस देश का संविधान मुख्यतः अलिखित है?

(A) भारत

(B) अमेरिका

(C) ब्रिटेन ✅

(D) फ्रांस

10. Rule of Law का अर्थ है—

(A) राजा का शासन

(B) व्यक्ति का शासन

(C) कानून का शासन ✅

(D) सेना का शासन

(C) अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer)
  1. संविधान की परिभाषा दीजिए।
  2. संविधान की आवश्यकता क्यों होती है?
  3. संविधान की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
  4. संवैधानिकतावाद क्या है?
  5. संविधान और संवैधानिकतावाद में अंतर लिखिए।
  6. मैग्नाकार्टा का महत्व बताइए।
  7. विधि का शासन क्या है?
  8. A. V. Dicey का योगदान लिखिए।
  9. कानून की सर्वोच्चता से क्या आशय है?
  10. कानून के समक्ष समानता का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
  11. स्वतंत्र न्यायपालिका का महत्व लिखिए।
  12. उत्तरदायी शासन क्या है?

(D) लघु उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)
  1. संविधान की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
  2. संविधान की आवश्यकता का वर्णन कीजिए।
  3. संविधान की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
  4. विभिन्न देशों के संविधानों की प्रमुख विशेषताओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
  5. संवैधानिकतावाद का अर्थ एवं स्वरूप स्पष्ट कीजिए।
  6. संवैधानिकतावाद के प्रमुख तत्वों का वर्णन कीजिए।
  7. संवैधानिकतावाद के महत्व को स्पष्ट कीजिए।
  8. विधि के शासन की अवधारणा का वर्णन कीजिए।
  9. A. V. Dicey के विधि के शासन के सिद्धांत की व्याख्या कीजिए।
  10. भारत में विधि के शासन की स्थिति स्पष्ट कीजिए।

(E) दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (10/15 अंक)
  1. संविधान की अवधारणा, आवश्यकता एवं प्रमुख विशेषताओं का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
  2. संविधान एवं संवैधानिकतावाद में अंतर स्पष्ट करते हुए संवैधानिकतावाद के महत्व का विवेचन कीजिए।
  3. संवैधानिकतावाद के ऐतिहासिक विकास का विस्तार से वर्णन कीजिए।
  4. संवैधानिकतावाद के प्रमुख तत्वों का आलोचनात्मक विवेचन कीजिए।
  5. विधि के शासन (Rule of Law) की अवधारणा की व्याख्या करते हुए A. V. Dicey के सिद्धांत का मूल्यांकन कीजिए।
  6. संविधान, संवैधानिकतावाद एवं विधि के शासन के पारस्परिक संबंधों की विवेचना कीजिए।
  7. विभिन्न देशों के संविधान का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।
  8. लोकतांत्रिक शासन में संविधान एवं विधि के शासन की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
  9. आधुनिक लोकतंत्र में संवैधानिकतावाद का महत्व स्पष्ट कीजिए।
  10. संविधान, संवैधानिकतावाद एवं विधि के शासन को लोकतंत्र की आधारशिला क्यों कहा जाता है? स्पष्ट कीजिए।

(F) तुलनात्मक/विश्लेषणात्मक प्रश्न (M.A. स्तर)
  1. संविधान और संवैधानिकतावाद में अंतर स्पष्ट कीजिए।
  2. संविधान एवं विधि के शासन के मध्य संबंध स्पष्ट कीजिए।
  3. संवैधानिकतावाद एवं विधि के शासन का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।
  4. क्या केवल संविधान का होना लोकतांत्रिक शासन के लिए पर्याप्त है? स्पष्ट कीजिए।
  5. "संविधान शरीर है और संवैधानिकतावाद उसकी आत्मा है।" इस कथन की विवेचना कीजिए।
  6. A. V. Dicey के विधि के शासन के सिद्धांत की समकालीन प्रासंगिकता का मूल्यांकन कीजिए।
  7. भारत, ब्रिटेन, अमेरिका एवं फ्रांस के संविधानों की तुलनात्मक समीक्षा कीजिए।
  8. लोकतंत्र की सफलता में संविधान, संवैधानिकतावाद एवं विधि के शासन की भूमिका का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
  9. क्या विधि का शासन नागरिक स्वतंत्रता की सर्वोत्तम गारंटी है? विवेचना कीजिए।
  10. आधुनिक लोकतांत्रिक शासन में संविधान, संवैधानिकतावाद एवं विधि के शासन की उपयोगिता एवं चुनौतियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
(G) संभावित परीक्षा के अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न (Most Expected Questions)
  1. संविधान की अवधारणा, आवश्यकता एवं विशेषताओं की विस्तार से व्याख्या कीजिए।
  2. संवैधानिकतावाद का अर्थ, विकास एवं प्रमुख तत्वों का वर्णन कीजिए।
  3. A. V. Dicey द्वारा प्रतिपादित विधि के शासन के सिद्धांत का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
  4. संविधान, संवैधानिकतावाद एवं विधि के शासन के पारस्परिक संबंधों की विवेचना कीजिए।
  5. भारत, अमेरिका और ब्रिटेन के संवैधानिक ढाँचों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत कीजिए।

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