Unit – 3

Judiciary :Structure, Functions, Independence, Judicial Review, Judicial Activism.

न्यायपालिका : संरचना, कार्य, स्वतंत्रता, न्यायिक पुनर्विलोकन तथा न्यायिक सक्रियता

आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य की संरचना में न्यायपालिका का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट है। राज्य के तीन प्रमुख अंगों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—में न्यायपालिका को कानून की संरक्षक, संविधान की व्याख्याकार तथा नागरिक अधिकारों की रक्षक संस्था माना जाता है। यदि विधायिका कानून बनाती है और कार्यपालिका उन्हें लागू करती है, तो न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि कानून और प्रशासन दोनों संविधान तथा न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप कार्य करें। इसी कारण न्यायपालिका को लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की आत्मा तथा विधि के शासन का आधार स्तंभ कहा जाता है।

मानव सभ्यता के विकास के साथ न्याय की आवश्यकता भी निरंतर बढ़ती गई। प्रारंभिक समाजों में विवादों का समाधान प्रथाओं, परंपराओं अथवा शासक की इच्छा के आधार पर किया जाता था। किंतु जैसे-जैसे राज्य और कानून की संस्थाएँ विकसित हुईं, एक स्वतंत्र न्यायिक व्यवस्था की आवश्यकता अनुभव की गई जो निष्पक्ष रूप से विवादों का निपटारा कर सके। आधुनिक युग में न्यायपालिका इसी आवश्यकता का संस्थागत रूप है। इसका मूल उद्देश्य केवल अपराधियों को दंड देना नहीं, बल्कि समाज में न्याय, समानता और विधिक व्यवस्था को बनाए रखना है।

न्यायपालिका की संरचना विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं के अनुसार भिन्न हो सकती है, किंतु सामान्यतः इसमें उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय तथा अधीनस्थ न्यायालयों का क्रमबद्ध ढाँचा पाया जाता है। भारत में न्यायपालिका एकीकृत स्वरूप की है, जिसके शीर्ष पर उच्चतम न्यायालय स्थित है। उसके नीचे विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालय तथा उनके अधीन जिला और अन्य अधीनस्थ न्यायालय कार्य करते हैं। यह संरचना न्यायिक प्रशासन में एकरूपता तथा विधिक व्यवस्था की निरंतरता बनाए रखने में सहायता करती है। न्यायालयों का यह क्रम केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि न्याय की उपलब्धता को सुनिश्चित करने का माध्यम भी है।

न्यायपालिका का सबसे महत्वपूर्ण कार्य न्याय प्रदान करना है। जब व्यक्तियों, संस्थाओं अथवा राज्य और नागरिकों के बीच विवाद उत्पन्न होते हैं, तब न्यायपालिका उनका निष्पक्ष समाधान करती है। न्यायालय कानूनों की व्याख्या करते हैं और तथ्यों के आधार पर निर्णय देते हैं। इस प्रक्रिया के माध्यम से नागरिकों के अधिकारों की रक्षा होती है तथा समाज में विधिक व्यवस्था बनी रहती है। यदि न्यायपालिका निष्पक्ष और प्रभावी न हो, तो कानून केवल कागजी दस्तावेज बनकर रह जाएंगे और नागरिकों का शासन व्यवस्था पर विश्वास कमजोर पड़ जाएगा।

न्यायपालिका का दूसरा महत्वपूर्ण कार्य संविधान की रक्षा करना है। आधुनिक संवैधानिक लोकतंत्रों में संविधान राज्य की सर्वोच्च विधि होता है। सरकार की सभी संस्थाएँ संविधान के अधीन कार्य करती हैं। यदि विधायिका कोई ऐसा कानून बनाती है या कार्यपालिका कोई ऐसा कार्य करती है जो संविधान के प्रावधानों के विपरीत हो, तो न्यायपालिका उसे असंवैधानिक घोषित कर सकती है। इस प्रकार न्यायपालिका संविधान की सर्वोच्चता को बनाए रखने का कार्य करती है।

मौलिक अधिकारों की सुरक्षा न्यायपालिका की एक अन्य महत्वपूर्ण भूमिका है। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में नागरिकों को विभिन्न प्रकार के अधिकार प्रदान किए जाते हैं। इन अधिकारों का वास्तविक महत्व तभी है जब उनकी रक्षा के लिए प्रभावी न्यायिक व्यवस्था उपलब्ध हो। न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि राज्य या कोई अन्य संस्था नागरिकों के अधिकारों का अनुचित हनन न करे। यदि किसी व्यक्ति के अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो वह न्यायालय की शरण ले सकता है और न्याय प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार न्यायपालिका व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानव गरिमा की संरक्षक बन जाती है।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता आधुनिक लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकताओं में से एक है। न्याय तभी संभव है जब न्यायाधीश किसी प्रकार के राजनीतिक, आर्थिक अथवा प्रशासनिक दबाव से मुक्त होकर निर्णय दे सकें। यदि न्यायपालिका कार्यपालिका या विधायिका के नियंत्रण में आ जाए, तो निष्पक्ष न्याय की संभावना समाप्त हो सकती है। इसलिए लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए अनेक संवैधानिक प्रावधान किए जाते हैं। न्यायाधीशों की नियुक्ति, कार्यकाल, वेतन तथा पद से हटाने की प्रक्रिया को इस प्रकार निर्धारित किया जाता है कि वे बाहरी दबावों से मुक्त रहकर कार्य कर सकें।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता केवल न्यायाधीशों के व्यक्तिगत अधिकार का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह नागरिक स्वतंत्रता और लोकतंत्र की सुरक्षा का आधार है। एक स्वतंत्र न्यायपालिका सरकार की शक्तियों पर नियंत्रण रखती है और यह सुनिश्चित करती है कि राज्य की कोई भी संस्था अपने अधिकारों का दुरुपयोग न करे। इसी कारण स्वतंत्र न्यायपालिका को लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की अनिवार्य शर्त माना जाता है।

न्यायिक पुनर्विलोकन या न्यायिक समीक्षा न्यायपालिका की सबसे महत्वपूर्ण शक्तियों में से एक है। इसका अर्थ है कि न्यायालय विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों तथा कार्यपालिका के कार्यों की संवैधानिक वैधता की जाँच कर सकते हैं। यदि कोई कानून संविधान के मूल सिद्धांतों या प्रावधानों के विपरीत पाया जाता है, तो न्यायालय उसे असंवैधानिक घोषित कर सकता है। यह शक्ति संविधान की सर्वोच्चता तथा नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। न्यायिक पुनर्विलोकन के माध्यम से न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि शासन की सभी संस्थाएँ संवैधानिक सीमाओं के भीतर कार्य करें।

भारतीय संदर्भ में न्यायिक पुनर्विलोकन का विशेष महत्व है। संविधान ने न्यायपालिका को यह अधिकार प्रदान किया है कि वह संविधान के अनुरूप शासन की गतिविधियों की समीक्षा कर सके। इस शक्ति ने लोकतंत्र की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अनेक अवसरों पर न्यायालयों ने ऐसे कानूनों और प्रशासनिक निर्णयों को निरस्त किया है जो संविधान की भावना के विरुद्ध थे। इस प्रकार न्यायिक पुनर्विलोकन संविधान और लोकतंत्र के बीच एक सुरक्षात्मक कवच के रूप में कार्य करता है।

न्यायिक सक्रियता आधुनिक न्यायिक चिंतन का एक महत्वपूर्ण आयाम है। इसका आशय ऐसी स्थिति से है जब न्यायपालिका केवल विवादों के निष्क्रिय निपटारे तक सीमित न रहकर सामाजिक न्याय, मानवाधिकारों की सुरक्षा और सार्वजनिक हितों की रक्षा के लिए सक्रिय भूमिका निभाती है। न्यायिक सक्रियता विशेष रूप से उन परिस्थितियों में महत्वपूर्ण बन जाती है जब विधायिका और कार्यपालिका अपने दायित्वों का प्रभावी निर्वहन करने में असफल रहती हैं। ऐसे समय में न्यायालय संविधान की भावना और जनहित की रक्षा के लिए हस्तक्षेप कर सकते हैं।

भारत में न्यायिक सक्रियता ने जनहित याचिका की अवधारणा के माध्यम से विशेष महत्व प्राप्त किया। इसके परिणामस्वरूप समाज के कमजोर, निर्धन और वंचित वर्गों को न्याय प्राप्त करने का अवसर मिला। पर्यावरण संरक्षण, मानवाधिकार, कारागार सुधार, बाल श्रम, महिला अधिकार और प्रशासनिक पारदर्शिता जैसे अनेक क्षेत्रों में न्यायपालिका ने सक्रिय भूमिका निभाई है। इससे न्याय को अधिक सुलभ और जनोन्मुखी बनाने में सहायता मिली है।

हालाँकि न्यायिक सक्रियता के संबंध में विभिन्न मत भी पाए जाते हैं। इसके समर्थकों का मत है कि यह सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का प्रभावी माध्यम है। दूसरी ओर आलोचक यह तर्क देते हैं कि अत्यधिक न्यायिक सक्रियता शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत को प्रभावित कर सकती है और न्यायपालिका को विधायिका तथा कार्यपालिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप करने की प्रवृत्ति की ओर ले जा सकती है। इसलिए न्यायिक सक्रियता और न्यायिक संयम के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक माना जाता है।

समकालीन लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में न्यायपालिका की भूमिका निरंतर विस्तृत होती जा रही है। वैश्वीकरण, तकनीकी विकास, मानवाधिकार संबंधी नए प्रश्न, पर्यावरणीय चुनौतियाँ और जटिल प्रशासनिक व्यवस्थाएँ न्यायपालिका के सामने नई जिम्मेदारियाँ प्रस्तुत कर रही हैं। अब न्यायालय केवल पारंपरिक विवादों का समाधान करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक परिवर्तन और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के महत्वपूर्ण साधन भी बन चुके हैं।

समग्र रूप से कहा जा सकता है कि न्यायपालिका आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य की एक केंद्रीय और अनिवार्य संस्था है। उसकी संरचना न्याय की सुलभता और प्रभावशीलता को सुनिश्चित करती है, उसके कार्य विधिक व्यवस्था और नागरिक अधिकारों की रक्षा करते हैं, उसकी स्वतंत्रता निष्पक्ष न्याय का आधार है, न्यायिक पुनर्विलोकन संविधान की सर्वोच्चता को बनाए रखता है तथा न्यायिक सक्रियता सामाजिक न्याय और जनहित की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस प्रकार न्यायपालिका केवल विवादों का समाधान करने वाली संस्था नहीं है, बल्कि लोकतंत्र, संविधान, स्वतंत्रता, समानता और न्याय की संरक्षक शक्ति है, जिसके बिना किसी भी लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की कल्पना अधूरी मानी जाएगी।

Judiciary :Structure, Functions, Independence, Judicial Review, Judicial Activism.

न्यायपालिका : संरचना, कार्य, स्वतंत्रता, न्यायिक पुनर्विलोकन तथा न्यायिक सक्रियता

भाग – A : अति लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)
  1. न्यायपालिका क्या है?
  2. न्यायपालिका का सबसे प्रमुख कार्य क्या है?
  3. न्यायिक पुनर्विलोकन से क्या अभिप्राय है?
  4. न्यायिक सक्रियता क्या है?
  5. जनहित याचिका (PIL) क्या है?
  6. न्यायपालिका की स्वतंत्रता क्यों आवश्यक है?
  7. भारत की न्यायपालिका का स्वरूप कैसा है?
  8. संविधान का संरक्षक किसे माना जाता है?
  9. मौलिक अधिकारों की रक्षा कौन करता है?
  10. विधि के शासन (Rule of Law) से क्या अभिप्राय है?
  11. न्यायिक संयम (Judicial Restraint) क्या है?
  12. न्यायपालिका को लोकतंत्र की आत्मा क्यों कहा जाता है?
  13. उच्चतम न्यायालय का प्रमुख कार्य क्या है?
  14. न्यायपालिका और कार्यपालिका में एक अंतर लिखिए।
  15. न्यायिक सक्रियता की एक विशेषता बताइए।

भाग – B : लघु उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)
  1. न्यायपालिका की संरचना का वर्णन कीजिए।
  2. न्यायपालिका के प्रमुख कार्यों की व्याख्या कीजिए।
  3. न्यायपालिका की स्वतंत्रता का महत्व स्पष्ट कीजिए।
  4. न्यायिक पुनर्विलोकन की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
  5. भारतीय लोकतंत्र में न्यायिक पुनर्विलोकन का महत्व बताइए।
  6. न्यायिक सक्रियता से क्या अभिप्राय है? इसकी विशेषताएँ लिखिए।
  7. जनहित याचिका (PIL) की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
  8. मौलिक अधिकारों की रक्षा में न्यायपालिका की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
  9. न्यायपालिका और संविधान के संबंध का वर्णन कीजिए।
  10. न्यायिक सक्रियता एवं न्यायिक संयम में अंतर स्पष्ट कीजिए।

भाग –  C: दीर्घ उत्तरीय / निबंधात्मक प्रश्न (10–15 अंक)
  1. न्यायपालिका की संरचना, कार्य एवं भूमिका का विस्तृत विवेचन कीजिए।
  2. न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ, आवश्यकता एवं महत्व स्पष्ट कीजिए।
  3. न्यायिक पुनर्विलोकन (Judicial Review) की अवधारणा तथा भारतीय लोकतंत्र में उसके महत्व का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
  4. न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) की अवधारणा, विशेषताओं तथा महत्व का विश्लेषण कीजिए।
  5. न्यायिक सक्रियता के पक्ष एवं विपक्ष में तर्क प्रस्तुत करते हुए उसका समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
  6. भारतीय लोकतंत्र में मौलिक अधिकारों की रक्षा में न्यायपालिका की भूमिका का विस्तार से वर्णन कीजिए।
  7. न्यायपालिका को संविधान का संरक्षक क्यों कहा जाता है? स्पष्ट कीजिए।
  8. लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में न्यायपालिका के महत्व का मूल्यांकन कीजिए।
  9. न्यायपालिका, विधायिका एवं कार्यपालिका के पारस्परिक संबंधों का विश्लेषण कीजिए।
  10. समकालीन भारत में न्यायपालिका के समक्ष प्रमुख चुनौतियों एवं उनके समाधान पर चर्चा कीजिए।
  11. भाग – D : वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Questions / MCQ)

    1. लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में न्यायपालिका को क्या माना जाता है?
    (A) प्रशासनिक संस्था
    (B) कानून की संरक्षक संस्था
    (C) वित्तीय संस्था
    (D) निर्वाचन संस्था
    उत्तर – (B)

    2. राज्य का कौन-सा अंग कानूनों की व्याख्या करता है?
    (A) विधायिका
    (B) कार्यपालिका
    (C) न्यायपालिका
    (D) निर्वाचन आयोग
    उत्तर – (C)

    3. भारत की न्यायपालिका का स्वरूप कैसा है?
    (A) संघीय
    (B) एकीकृत
    (C) द्वैध
    (D) विकेन्द्रित
    उत्तर – (B)

    4. भारत की न्यायपालिका के शीर्ष पर कौन-सा न्यायालय स्थित है?
    (A) जिला न्यायालय
    (B) उच्च न्यायालय
    (C) उच्चतम न्यायालय
    (D) लोक अदालत
    उत्तर – (C)

    5. न्यायपालिका का प्रमुख कार्य क्या है?
    (A) कानून बनाना
    (B) प्रशासन चलाना
    (C) न्याय प्रदान करना
    (D) कर वसूलना
    उत्तर – (C)

    6. संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखने का कार्य कौन करता है?
    (A) विधायिका
    (B) कार्यपालिका
    (C) न्यायपालिका
    (D) चुनाव आयोग
    उत्तर – (C)

    7. मौलिक अधिकारों का संरक्षक कौन है?
    (A) संसद
    (B) मंत्रिपरिषद
    (C) न्यायपालिका
    (D) राष्ट्रपति
    उत्तर – (C)

    8. न्यायपालिका की स्वतंत्रता का मुख्य उद्देश्य क्या है?
    (A) सरकार को मजबूत करना
    (B) निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करना
    (C) चुनाव कराना
    (D) कानून बनाना
    उत्तर – (B)

    9. न्यायिक पुनर्विलोकन (Judicial Review) का अर्थ है—
    (A) कानून बनाना
    (B) कानूनों एवं कार्यपालिका के कार्यों की संवैधानिक समीक्षा करना
    (C) बजट बनाना
    (D) चुनाव कराना
    उत्तर – (B)

    10. यदि कोई कानून संविधान के विरुद्ध हो तो न्यायालय उसे क्या घोषित कर सकता है?
    (A) वैध
    (B) असंवैधानिक
    (C) प्रशासनिक
    (D) अस्थायी
    उत्तर – (B)

    11. भारत में न्यायिक पुनर्विलोकन का आधार क्या है?
    (A) संसद का नियम
    (B) संविधान
    (C) प्रधानमंत्री का आदेश
    (D) राष्ट्रपति की इच्छा
    उत्तर – (B)

    12. न्यायिक सक्रियता का प्रमुख उद्देश्य क्या है?
    (A) केवल मुकदमों का निपटारा
    (B) सामाजिक न्याय एवं जनहित की रक्षा
    (C) चुनाव कराना
    (D) कर निर्धारण
    उत्तर – (B)

    13. जनहित याचिका (PIL) किससे संबंधित है?
    (A) न्यायिक सक्रियता
    (B) निर्वाचन प्रक्रिया
    (C) बजट निर्माण
    (D) विदेश नीति
    उत्तर – (A)

    14. निम्नलिखित में से किस क्षेत्र में न्यायिक सक्रियता महत्वपूर्ण रही है?
    (A) पर्यावरण संरक्षण
    (B) मानवाधिकार
    (C) बाल श्रम उन्मूलन
    (D) उपर्युक्त सभी
    उत्तर – (D)

    15. न्यायिक सक्रियता की प्रमुख आलोचना क्या है?
    (A) न्यायालय बहुत धीमे हैं
    (B) शक्ति पृथक्करण प्रभावित हो सकता है
    (C) न्यायालय कमजोर हैं
    (D) न्यायालय कानून नहीं जानते
    उत्तर – (B)

    16. न्यायपालिका किस सिद्धांत का आधार स्तंभ मानी जाती है?
    (A) विधि का शासन (Rule of Law)
    (B) सैन्यवाद
    (C) पूँजीवाद
    (D) सामंतवाद
    उत्तर – (A)

    17. न्यायपालिका नागरिकों के अधिकारों की रक्षा किसके माध्यम से करती है?
    (A) न्यायिक निर्णयों द्वारा
    (B) कर लगाकर
    (C) कानून बनाकर
    (D) चुनाव कराकर
    उत्तर – (A)

    18. न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने हेतु कौन-सा तत्व महत्वपूर्ण है?
    (A) न्यायाधीशों का सुरक्षित कार्यकाल
    (B) स्वतंत्र वेतन व्यवस्था
    (C) हटाने की विशेष प्रक्रिया
    (D) उपर्युक्त सभी
    उत्तर – (D)

    19. न्यायपालिका का कौन-सा कार्य संविधान की रक्षा से संबंधित है?
    (A) न्यायिक पुनर्विलोकन
    (B) बजट पारित करना
    (C) प्रशासन चलाना
    (D) कर लगाना
    उत्तर – (A)

    20. आधुनिक लोकतंत्र में न्यायपालिका को क्यों आवश्यक माना जाता है?
    (A) केवल अपराधियों को दंड देने के लिए
    (B) लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए
    (C) केवल न्यायालय चलाने के लिए
    (D) केवल चुनाव कराने के लिए
    उत्तर – (B)

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