Unit – 2

Idealist School: Hegel, Green, Bosanquet.

आदर्शवादी विचारधारा: हेगेल, टी. एच. ग्रीन एवं बर्नार्ड बोसांकेट।

आदर्शवादी विचारधारा आधुनिक पाश्चात्य राजनीतिक दर्शन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली विचारधारा है, जिसने राज्य, व्यक्ति, समाज, नैतिकता तथा स्वतंत्रता की अवधारणाओं को गहराई से प्रभावित किया। इस विचारधारा का मूल आधार यह है कि मानव जीवन का उद्देश्य केवल भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं है, बल्कि नैतिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास भी उतना ही आवश्यक है। आदर्शवाद यह मानता है कि मनुष्य एक नैतिक सत्ता है और उसकी वास्तविक उन्नति समाज तथा राज्य के साथ समन्वित संबंध स्थापित करके ही संभव है। इस विचारधारा के अनुसार राज्य केवल कानून और प्रशासन की व्यवस्था नहीं है, बल्कि वह नैतिक जीवन का सर्वोच्च संगठित रूप है, जिसके माध्यम से व्यक्ति अपनी वास्तविक स्वतंत्रता और पूर्ण व्यक्तित्व का विकास करता है। आदर्शवादी चिंतन का विकास प्राचीन यूनानी दर्शन से प्रारंभ होकर आधुनिक यूरोप में नई ऊँचाइयों तक पहुँचा, किंतु आधुनिक राजनीतिक आदर्शवाद को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान करने का श्रेय मुख्यतः जॉर्ज विल्हेम फ्रेडरिक हेगेल, थॉमस हिल ग्रीन तथा बर्नार्ड बोसांकेट को दिया जाता है। इन तीनों विचारकों ने अलग-अलग परिस्थितियों में आदर्शवाद का विकास किया, परंतु उनका साझा उद्देश्य राजनीति को केवल शक्ति और स्वार्थ का साधन न मानकर नैतिक एवं सामाजिक कल्याण का माध्यम बनाना था।

आदर्शवादी विचारधारा का आधार यह विश्वास है कि वास्तविकता का मूल स्वरूप केवल भौतिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और बौद्धिक है। समाज और राज्य मानव चेतना के विकास की क्रमिक अवस्थाएँ हैं। व्यक्ति अकेले पूर्ण नहीं हो सकता, क्योंकि उसका व्यक्तित्व सामाजिक संबंधों, सांस्कृतिक मूल्यों और नैतिक दायित्वों के माध्यम से विकसित होता है। इसलिए आदर्शवाद व्यक्ति और राज्य के बीच संघर्ष की अपेक्षा सहयोग, समन्वय और परस्पर पूरकता पर बल देता है। यह विचारधारा स्वतंत्रता को मनमानी अथवा निरंकुशता के रूप में नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण और नैतिक आचरण के रूप में समझती है। इसी कारण आदर्शवादी चिंतन में अधिकारों की अपेक्षा कर्तव्यों और नैतिक उत्तरदायित्व को अधिक महत्व दिया गया है।

जॉर्ज विल्हेम फ्रेडरिक हेगेल का जन्म 1770 में जर्मनी के स्टुटगार्ट नगर में हुआ। वे जर्मन आदर्शवाद के सबसे प्रभावशाली दार्शनिक माने जाते हैं। उन्होंने इतिहास, राजनीति, दर्शन, धर्म और समाज के गहन अध्ययन के आधार पर एक व्यापक दार्शनिक प्रणाली विकसित की। उनके अनुसार संसार में जो कुछ भी घटित होता है, वह बुद्धि अथवा विश्व-आत्मा के क्रमिक विकास की प्रक्रिया का भाग है। इतिहास कोई आकस्मिक घटनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण विकास की निरंतर यात्रा है। इस प्रक्रिया में विभिन्न विचारों, संस्थाओं और सामाजिक व्यवस्थाओं के बीच संघर्ष होता है, जिसके परिणामस्वरूप एक उच्चतर अवस्था का निर्माण होता है। इसी प्रक्रिया को उन्होंने द्वंद्वात्मक विकास की संकल्पना के माध्यम से समझाया, जिसमें किसी विचार के सामने उसका विरोध उत्पन्न होता है और अंततः दोनों के समन्वय से एक नई एवं अधिक विकसित स्थिति सामने आती है।

हेगेल के अनुसार राज्य मानव सभ्यता की सर्वोच्च उपलब्धि है। उन्होंने राज्य को नैतिक जीवन की सर्वोच्च अभिव्यक्ति माना। उनका विश्वास था कि परिवार, नागरिक समाज और राज्य मानव संगठन के क्रमिक विकास की अवस्थाएँ हैं। परिवार प्रेम और भावनात्मक संबंधों पर आधारित होता है, नागरिक समाज आर्थिक हितों तथा व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पूर्ति का क्षेत्र है, जबकि राज्य इन दोनों से ऊपर उठकर सार्वभौमिक नैतिक हितों का प्रतिनिधित्व करता है। इस दृष्टि से राज्य केवल व्यक्तियों का समूह नहीं, बल्कि सामूहिक नैतिक चेतना का साकार रूप है।

हेगेल की स्वतंत्रता की अवधारणा भी अत्यंत विशिष्ट है। उन्होंने स्वतंत्रता को केवल बाहरी बंधनों से मुक्ति नहीं माना। उनके अनुसार वास्तविक स्वतंत्रता वह है जिसमें व्यक्ति विवेकपूर्ण कानूनों का पालन करते हुए समाज और राज्य के व्यापक हितों के अनुरूप जीवन व्यतीत करे। यदि व्यक्ति केवल अपनी इच्छाओं का अनुसरण करता है, तो वह वास्तविक अर्थों में स्वतंत्र नहीं होता। सच्ची स्वतंत्रता नैतिक अनुशासन, सामाजिक उत्तरदायित्व और राज्य की विधिसम्मत व्यवस्था के भीतर ही संभव है। इस प्रकार उन्होंने स्वतंत्रता और कानून के बीच विरोध नहीं, बल्कि परस्पर पूरक संबंध स्थापित किया।

हेगेल राष्ट्रीय राज्य के समर्थक थे। उनका मत था कि प्रत्येक राष्ट्र की अपनी ऐतिहासिक चेतना, सांस्कृतिक पहचान और नैतिक आत्मा होती है। राज्य उसी राष्ट्रीय आत्मा का संगठित रूप है। उन्होंने यह भी माना कि इतिहास में महान राष्ट्र विश्व-इतिहास के विकास में विशेष भूमिका निभाते हैं। उनके इस विचार ने आधुनिक राष्ट्रवाद को दार्शनिक आधार प्रदान किया, यद्यपि बाद के समय में कुछ राजनीतिक शक्तियों ने उनके विचारों का उपयोग अत्यधिक राज्य-प्रधान और अधिनायकवादी नीतियों के समर्थन में भी किया। अनेक विद्वानों का मत है कि हेगेल का मूल उद्देश्य निरंकुश राज्य का समर्थन नहीं था, बल्कि विवेकपूर्ण एवं नैतिक राज्य की स्थापना का सिद्धांत प्रस्तुत करना था।

हेगेल के राजनीतिक दर्शन की आलोचना भी व्यापक रूप से हुई। आलोचकों ने कहा कि उन्होंने राज्य को अत्यधिक महत्व देकर व्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों की उपेक्षा की। कुछ विद्वानों का यह भी मत है कि यदि राज्य को नैतिकता का सर्वोच्च प्रतिनिधि मान लिया जाए, तो उसके निर्णयों की आलोचना करना कठिन हो सकता है। फिर भी यह निर्विवाद है कि इतिहास, राज्य, राष्ट्रवाद और राजनीतिक संस्थाओं की दार्शनिक व्याख्या में हेगेल का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।

थॉमस हिल ग्रीन का जन्म 1836 में इंग्लैंड में हुआ। उन्होंने ब्रिटिश आदर्शवाद को एक नया स्वरूप प्रदान किया। ग्रीन ने हेगेल के विचारों से प्रेरणा तो ली, किंतु उन्हें ब्रिटिश उदारवादी परंपरा तथा लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप विकसित किया। उनका मुख्य उद्देश्य यह सिद्ध करना था कि राज्य और व्यक्ति परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सहयोगी हैं। उन्होंने आदर्शवाद को अधिक मानवीय, उदार और लोकतांत्रिक स्वरूप प्रदान किया।

ग्रीन की सबसे महत्वपूर्ण देन सकारात्मक स्वतंत्रता की अवधारणा है। उनके अनुसार स्वतंत्रता का अर्थ केवल बाहरी नियंत्रणों का अभाव नहीं है। यदि कोई व्यक्ति अशिक्षा, गरीबी, बीमारी, नशे अथवा सामाजिक असमानता के कारण अपनी क्षमताओं का विकास नहीं कर सकता, तो वह वास्तविक अर्थों में स्वतंत्र नहीं है। इसलिए राज्य का दायित्व केवल हस्तक्षेप न करना नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित करना भी है जिनसे प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रतिभा और व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कर सके। इस दृष्टिकोण ने आधुनिक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को गहरा दार्शनिक आधार प्रदान किया।

ग्रीन ने अधिकारों की भी नई व्याख्या प्रस्तुत की। उनके अनुसार अधिकार जन्मजात या प्राकृतिक नहीं होते, बल्कि समाज द्वारा मान्यता प्राप्त ऐसी परिस्थितियाँ हैं जिनके माध्यम से व्यक्ति अपने नैतिक विकास को प्राप्त कर सकता है। अधिकार और कर्तव्य एक-दूसरे से अविभाज्य हैं। प्रत्येक अधिकार के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व भी जुड़ा हुआ है। यदि अधिकारों का उपयोग केवल व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए किया जाए, तो उनका वास्तविक उद्देश्य नष्ट हो जाता है।

ग्रीन राज्य को आवश्यक नैतिक संस्था मानते थे, किंतु वे राज्य की निरंकुशता के समर्थक नहीं थे। उनका विश्वास था कि राज्य का उद्देश्य व्यक्ति के जीवन पर अनावश्यक नियंत्रण स्थापित करना नहीं, बल्कि उसके नैतिक और सामाजिक विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना है। उन्होंने शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, श्रमिक सुरक्षा तथा सामाजिक सुधार के क्षेत्रों में राज्य की सक्रिय भूमिका का समर्थन किया। इस प्रकार उनका आदर्शवाद उदारवाद और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन स्थापित करता है।

ग्रीन के विचारों ने आधुनिक सामाजिक उदारवाद, कल्याणकारी राज्य और लोकतांत्रिक शासन के विकास को अत्यधिक प्रभावित किया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि नागरिकों को ऐसे अवसर प्रदान करना भी आवश्यक है जिनसे वे अपनी क्षमताओं का विकास कर सकें। इस प्रकार स्वतंत्रता और समान अवसर को उन्होंने एक-दूसरे का पूरक माना।

बर्नार्ड बोसांकेट का जन्म 1848 में इंग्लैंड में हुआ। वे ब्रिटिश आदर्शवाद के प्रमुख दार्शनिकों में से एक थे। उन्होंने ग्रीन तथा हेगेल के विचारों का समन्वय करते हुए राज्य और समाज की व्यापक व्याख्या प्रस्तुत की। बोसांकेट के अनुसार समाज अनेक संस्थाओं का संगठित रूप है और राज्य इन सभी संस्थाओं का समन्वय करने वाली सर्वोच्च संस्था है। परिवार, विद्यालय, धार्मिक संगठन, आर्थिक संस्थाएँ तथा अन्य सामाजिक संगठन अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं, किंतु राज्य इनके बीच संतुलन स्थापित करता है और सार्वजनिक हित की रक्षा करता है।

बोसांकेट ने सामान्य इच्छा की अवधारणा को विशेष महत्व दिया। उनके अनुसार समाज के प्रत्येक व्यक्ति की निजी इच्छाएँ अलग-अलग हो सकती हैं, किंतु जब नागरिक अपने संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठकर सार्वजनिक हित को स्वीकार करते हैं, तब सामान्य इच्छा का निर्माण होता है। राज्य उसी सामान्य इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए राज्य का उद्देश्य किसी विशेष वर्ग अथवा व्यक्ति के हितों की रक्षा करना नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज के कल्याण को सुनिश्चित करना है।

बोसांकेट ने भी स्वतंत्रता को नैतिक आत्म-विकास से जोड़ा। उनके अनुसार वास्तविक स्वतंत्रता वह नहीं है जिसमें व्यक्ति बिना किसी सीमा के अपनी इच्छाओं का पालन करे, बल्कि वह है जिसमें व्यक्ति विवेक, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व के आधार पर अपने जीवन का निर्माण करे। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि व्यक्ति का वास्तविक व्यक्तित्व समाज के भीतर ही विकसित होता है। इसलिए समाज और राज्य के बिना स्वतंत्रता की कल्पना अधूरी है।

बोसांकेट ने राज्य को नैतिक संगठन माना, किंतु वे इस बात पर भी बल देते थे कि राज्य का उद्देश्य नागरिकों के जीवन को अनावश्यक रूप से नियंत्रित करना नहीं होना चाहिए। राज्य तभी सफल माना जाएगा जब वह समाज की विभिन्न संस्थाओं के बीच संतुलन बनाए रखे और प्रत्येक नागरिक के विकास के लिए समान अवसर उपलब्ध कराए। उन्होंने सामाजिक सहयोग, नैतिक अनुशासन तथा सार्वजनिक उत्तरदायित्व को आदर्श राज्य की आवश्यक शर्तें माना।

हेगेल, ग्रीन और बोसांकेट के विचारों में अनेक समानताएँ हैं। तीनों का विश्वास था कि व्यक्ति का विकास समाज और राज्य के माध्यम से ही संभव है। तीनों ने स्वतंत्रता को नैतिक उत्तरदायित्व के साथ जोड़ा तथा राज्य को केवल शक्ति का संगठन न मानकर नैतिक संस्था के रूप में देखा। तीनों के अनुसार अधिकारों का प्रयोग सामाजिक हितों के अनुरूप होना चाहिए और राज्य का उद्देश्य सार्वजनिक कल्याण सुनिश्चित करना है।

इसके साथ ही उनके विचारों में महत्वपूर्ण अंतर भी हैं। हेगेल ने राज्य को नैतिक जीवन की सर्वोच्च अभिव्यक्ति माना और उसके अधिकारों पर विशेष बल दिया। ग्रीन ने राज्य की भूमिका को स्वीकार करते हुए व्यक्ति की स्वतंत्रता और कल्याण को अधिक महत्व दिया तथा सकारात्मक स्वतंत्रता की अवधारणा विकसित की। बोसांकेट ने राज्य को सामाजिक संस्थाओं का समन्वयक माना और सामान्य इच्छा के आधार पर सार्वजनिक हित की व्याख्या प्रस्तुत की। इस प्रकार हेगेल का आदर्शवाद अपेक्षाकृत दार्शनिक और राज्य-केंद्रित है, जबकि ग्रीन और बोसांकेट का आदर्शवाद अधिक उदार, सामाजिक और लोकतांत्रिक स्वरूप ग्रहण कर लेता है।

आदर्शवादी विचारधारा का आधुनिक राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा है। कल्याणकारी राज्य, सामाजिक न्याय, सार्वजनिक शिक्षा, नागरिक उत्तरदायित्व, नैतिक प्रशासन, लोकतांत्रिक भागीदारी तथा सकारात्मक स्वतंत्रता जैसी अनेक अवधारणाएँ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आदर्शवादी चिंतन से प्रभावित हैं। इस विचारधारा ने यह स्थापित किया कि राज्य का उद्देश्य केवल शांति और सुरक्षा बनाए रखना नहीं, बल्कि नागरिकों के नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक विकास को भी प्रोत्साहित करना है। आधुनिक संवैधानिक लोकतंत्रों में जब सरकारें शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, श्रमिक संरक्षण तथा समान अवसरों की नीतियाँ अपनाती हैं, तब उनमें आदर्शवादी चिंतन की स्पष्ट झलक दिखाई देती है।

यद्यपि आदर्शवादी विचारधारा की व्यापक प्रशंसा हुई है, फिर भी इसकी आलोचनाएँ भी कम नहीं हैं। व्यक्तिवादी और उदारवादी विचारकों ने यह तर्क दिया कि राज्य को अत्यधिक नैतिक महत्व देने से व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। बहुलवादी विचारकों का मत है कि समाज केवल राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि अनेक स्वतंत्र संस्थाएँ भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। मार्क्सवादी चिंतकों ने आदर्शवाद की आलोचना करते हुए कहा कि यह सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के वास्तविक कारणों की अपेक्षा नैतिक आदर्शों पर अधिक बल देता है। इसके अतिरिक्त कुछ विद्वानों ने यह भी कहा कि यदि राज्य को नैतिकता का अंतिम निर्णायक मान लिया जाए, तो अधिनायकवाद की संभावना बढ़ सकती है। इन आलोचनाओं के बावजूद आदर्शवादी विचारधारा ने राजनीति को नैतिकता, सामाजिक उत्तरदायित्व और मानव विकास के साथ जोड़कर राजनीतिक दर्शन को नई दिशा प्रदान की।

समग्र रूप से आदर्शवादी विचारधारा यह प्रतिपादित करती है कि राज्य, समाज और व्यक्ति परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। हेगेल ने राज्य को नैतिक जीवन की सर्वोच्च अभिव्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया और इतिहास तथा राष्ट्रवाद को दार्शनिक आधार प्रदान किया। टी. एच. ग्रीन ने स्वतंत्रता को सकारात्मक अर्थ देकर कल्याणकारी राज्य और सामाजिक उदारवाद की नींव को मजबूत किया। बर्नार्ड बोसांकेट ने सामान्य इच्छा, सामाजिक समन्वय और नैतिक राज्य की अवधारणाओं को विकसित करते हुए आदर्शवाद को अधिक व्यावहारिक स्वरूप प्रदान किया। इन तीनों विचारकों के योगदान से आदर्शवादी विचारधारा आधुनिक राजनीतिक दर्शन की एक ऐसी परंपरा के रूप में स्थापित हुई जिसने शक्ति की राजनीति की अपेक्षा नैतिकता, सार्वजनिक कल्याण, सामाजिक सहयोग और मानव व्यक्तित्व के समग्र विकास को राजनीति का सर्वोच्च उद्देश्य माना। आज भी जब लोकतांत्रिक शासन, सामाजिक न्याय, उत्तरदायी नागरिकता और मानव विकास की चर्चा होती है, तब आदर्शवादी चिंतन की प्रासंगिकता स्पष्ट रूप से अनुभव की जाती है।

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