Unit – 3
Socialist School: Marx, Lenin, Mao.
समाजवादी विचारधारा: कार्ल मार्क्स, व्लादिमीर लेनिन एवं माओ त्से-तुंग।
समाजवादी विचारधारा आधुनिक राजनीतिक चिंतन की सबसे प्रभावशाली और व्यापक विचारधाराओं में से एक है। इसका मूल उद्देश्य समाज में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक असमानताओं को समाप्त करके ऐसी व्यवस्था स्थापित करना है जिसमें उत्पादन के साधनों का उपयोग निजी लाभ के स्थान पर सामूहिक कल्याण के लिए किया जाए। समाजवाद का केंद्रीय विश्वास यह है कि समाज की संपत्ति और संसाधनों पर कुछ व्यक्तियों का एकाधिकार सामाजिक अन्याय, शोषण और असमानता को जन्म देता है। इसलिए ऐसी व्यवस्था आवश्यक है जिसमें श्रम को सम्मान मिले, उत्पादन का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुँचे और प्रत्येक व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन जीने के समान अवसर प्राप्त हों। समाजवादी विचारधारा का विकास अनेक विचारकों के योगदान से हुआ, किंतु वैज्ञानिक समाजवाद को व्यवस्थित दार्शनिक आधार प्रदान करने का श्रेय कार्ल मार्क्स को दिया जाता है। व्लादिमीर लेनिन ने मार्क्सवाद को व्यावहारिक राजनीतिक क्रांति का स्वरूप दिया, जबकि माओ त्से-तुंग ने उसे एशियाई, विशेषकर कृषि-प्रधान समाजों की परिस्थितियों के अनुरूप विकसित किया। इन तीनों विचारकों के योगदान से समाजवादी चिंतन केवल एक दार्शनिक सिद्धांत न रहकर विश्व राजनीति की एक प्रमुख शक्ति के रूप में स्थापित हुआ।
समाजवाद का उदय औद्योगिक क्रांति के बाद यूरोप में उत्पन्न सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ। औद्योगीकरण के कारण उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई, परंतु इसका लाभ मुख्यतः पूँजीपति वर्ग को प्राप्त हुआ जबकि श्रमिक वर्ग अत्यधिक कठिन परिस्थितियों में जीवन व्यतीत करने के लिए विवश था। लंबे कार्य घंटे, कम मजदूरी, असुरक्षित कार्यस्थल, बाल श्रम तथा सामाजिक असमानताओं ने व्यापक असंतोष उत्पन्न किया। इसी पृष्ठभूमि में समाजवादी विचारकों ने यह तर्क दिया कि आर्थिक व्यवस्था का उद्देश्य केवल लाभ कमाना नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा की रक्षा करना होना चाहिए। प्रारंभिक समाजवादी विचारकों ने आदर्श समाज की कल्पना प्रस्तुत की, किंतु कार्ल मार्क्स ने समाजवाद को ऐतिहासिक, आर्थिक और वैज्ञानिक आधार प्रदान करने का प्रयास किया।
कार्ल मार्क्स का जन्म 1818 में जर्मनी के ट्रायर नगर में हुआ। उन्होंने दर्शन, इतिहास, अर्थशास्त्र और राजनीति का गहन अध्ययन किया। उनके चिंतन पर जर्मन दर्शन, विशेषकर हेगेल की द्वंद्वात्मक पद्धति, ब्रिटिश राजनीतिक अर्थशास्त्र तथा फ्रांसीसी समाजवादी विचारों का गहरा प्रभाव था। उन्होंने अपने सहयोगी फ्रेडरिक एंगेल्स के साथ मिलकर आधुनिक समाजवादी दर्शन का विकास किया। मार्क्स का उद्देश्य केवल समाज की व्याख्या करना नहीं था, बल्कि उसे बदलने का मार्ग भी प्रस्तुत करना था। उनका मानना था कि सामाजिक परिवर्तन का वास्तविक आधार आर्थिक संरचना होती है और इतिहास का विकास आर्थिक शक्तियों तथा वर्गों के संघर्ष से निर्धारित होता है।
मार्क्स का ऐतिहासिक भौतिकवाद समाजवादी विचारधारा का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है। इसके अनुसार मानव समाज का इतिहास विचारों से अधिक भौतिक उत्पादन संबंधों के विकास का इतिहास है। किसी भी समाज की आर्थिक संरचना उसकी राजनीतिक, कानूनी, धार्मिक तथा सांस्कृतिक संस्थाओं को प्रभावित करती है। उत्पादन के साधनों में परिवर्तन होने पर सामाजिक संबंध भी बदलते हैं और नई राजनीतिक तथा आर्थिक व्यवस्थाओं का जन्म होता है। इस प्रकार इतिहास निरंतर परिवर्तनशील है और उसका मूल कारण उत्पादन संबंधों में परिवर्तन है।
मार्क्स ने वर्ग-संघर्ष को इतिहास की प्रेरक शक्ति माना। उनके अनुसार प्रत्येक ऐतिहासिक युग में समाज दो प्रमुख वर्गों में विभाजित रहा है—एक वह वर्ग जो उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण रखता है और दूसरा वह वर्ग जो अपने श्रम के बल पर जीवनयापन करता है। प्राचीन समाज में स्वामी और दास, सामंती व्यवस्था में सामंत और कृषक तथा पूँजीवादी व्यवस्था में पूँजीपति और श्रमिक इसी संघर्ष के विभिन्न रूप हैं। पूँजीवादी व्यवस्था में पूँजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों का स्वामी होता है, जबकि श्रमिक अपनी श्रम-शक्ति बेचने के लिए विवश होता है। इस संबंध में शोषण निहित रहता है क्योंकि श्रमिक द्वारा उत्पन्न मूल्य का एक बड़ा भाग पूँजीपति लाभ के रूप में अपने पास रख लेता है।
मार्क्स ने अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत प्रस्तुत करते हुए बताया कि पूँजीवादी लाभ का वास्तविक स्रोत श्रमिक का अवैतनिक श्रम है। श्रमिक जितना मूल्य उत्पन्न करता है, उसे उसके बराबर मजदूरी नहीं मिलती। मजदूरी और उत्पादित मूल्य के बीच का अंतर अतिरिक्त मूल्य कहलाता है, जिसे पूँजीपति अपने लाभ के रूप में प्राप्त करता है। इसी कारण पूँजीवादी व्यवस्था स्वभावतः शोषणकारी है और उसमें आर्थिक असमानता लगातार बढ़ती रहती है।
मार्क्स के अनुसार पूँजीवाद अपने भीतर ही ऐसे अंतर्विरोध उत्पन्न करता है जो अंततः उसके पतन का कारण बनते हैं। उत्पादन का सामाजिक स्वरूप और संपत्ति का निजी स्वामित्व परस्पर विरोधी हैं। पूँजी का केंद्रीकरण, आर्थिक संकट, बेरोजगारी तथा श्रमिकों की बढ़ती हुई कठिनाइयाँ अंततः वर्ग-संघर्ष को तीव्र करती हैं। परिणामस्वरूप श्रमिक वर्ग संगठित होकर क्रांति करता है और पूँजीवादी व्यवस्था का अंत कर देता है। क्रांति के पश्चात सर्वहारा वर्ग की राजनीतिक सत्ता स्थापित होती है, जिसका उद्देश्य शोषणकारी वर्गों का प्रभाव समाप्त करना और समाजवादी व्यवस्था की स्थापना करना होता है। अंतिम अवस्था में वर्गहीन तथा राज्यविहीन साम्यवादी समाज की स्थापना होती है जहाँ उत्पादन के साधनों पर सामूहिक स्वामित्व होगा और प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार कार्य करेगा तथा अपनी आवश्यकताओं के अनुसार प्राप्त करेगा।
राज्य के संबंध में मार्क्स का दृष्टिकोण भी विशिष्ट है। उनके अनुसार राज्य कोई तटस्थ संस्था नहीं है, बल्कि वह आर्थिक रूप से प्रभुत्वशाली वर्ग के हितों की रक्षा करने वाला राजनीतिक साधन है। पूँजीवादी राज्य का वास्तविक कार्य पूँजीपति वर्ग के आर्थिक हितों की सुरक्षा करना होता है। इसलिए केवल राजनीतिक सुधारों से सामाजिक न्याय स्थापित नहीं किया जा सकता; इसके लिए आर्थिक संरचना में मूलभूत परिवर्तन आवश्यक है।
व्लादिमीर इलिच लेनिन का जन्म 1870 में रूस में हुआ। उन्होंने मार्क्सवादी सिद्धांतों का अध्ययन करते हुए उन्हें रूस जैसी कृषि-प्रधान और अपेक्षाकृत पिछड़ी अर्थव्यवस्था की परिस्थितियों के अनुरूप विकसित किया। लेनिन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह था कि उन्होंने मार्क्सवाद को सफल क्रांतिकारी रणनीति और संगठित राजनीतिक आंदोलन का स्वरूप प्रदान किया। उनके नेतृत्व में 1917 की रूसी क्रांति सफल हुई और विश्व का पहला समाजवादी राज्य स्थापित हुआ।
लेनिन का मानना था कि श्रमिक वर्ग स्वतः केवल आर्थिक संघर्ष तक सीमित रहेगा। उसे राजनीतिक चेतना प्रदान करने तथा क्रांति का नेतृत्व करने के लिए एक अनुशासित, वैचारिक और संगठित क्रांतिकारी दल की आवश्यकता होती है। इसी विचार के आधार पर उन्होंने अग्रदूत दल अर्थात वैनगार्ड पार्टी की अवधारणा प्रस्तुत की। उनके अनुसार यह दल समाज के सबसे जागरूक और समर्पित कार्यकर्ताओं का संगठन होगा जो श्रमिक वर्ग का नेतृत्व करेगा और क्रांति को सफल बनाएगा।
लेनिन ने साम्राज्यवाद की भी नई व्याख्या प्रस्तुत की। उनके अनुसार साम्राज्यवाद पूँजीवाद का अंतिम चरण है। जब पूँजीवादी देशों में पूँजी का अत्यधिक संचय हो जाता है, तब वे नए बाजारों, कच्चे माल के स्रोतों तथा निवेश के अवसरों की खोज में उपनिवेशों पर अधिकार स्थापित करते हैं। इस प्रकार साम्राज्यवाद केवल राजनीतिक विस्तार नहीं, बल्कि पूँजीवादी आर्थिक व्यवस्था का स्वाभाविक परिणाम है। इस विश्लेषण ने उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों को वैचारिक आधार प्रदान किया।
लेनिन ने समाजवादी राज्य की स्थापना के बाद योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था, प्रमुख उद्योगों के राष्ट्रीयकरण, भूमि सुधार तथा उत्पादन के साधनों पर सार्वजनिक नियंत्रण का समर्थन किया। उन्होंने संक्रमणकालीन राज्य की आवश्यकता पर बल दिया और माना कि समाजवादी व्यवस्था को स्थिर करने के लिए प्रारंभिक चरण में राज्य की सक्रिय भूमिका आवश्यक है। उनका विश्वास था कि समय के साथ वर्गीय भेद समाप्त होने पर राज्य का महत्व स्वतः कम हो जाएगा।
माओ त्से-तुंग का जन्म 1893 में चीन में हुआ। उन्होंने मार्क्स और लेनिन के विचारों को चीन की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार विकसित किया। चीन उस समय मुख्यतः कृषि-प्रधान देश था जहाँ औद्योगिक श्रमिकों की संख्या बहुत कम थी। इसलिए माओ ने यह प्रतिपादित किया कि केवल औद्योगिक श्रमिक ही नहीं, बल्कि किसान भी क्रांतिकारी परिवर्तन की प्रमुख शक्ति बन सकते हैं। यही उनका सबसे मौलिक योगदान माना जाता है।
माओ ने ग्रामीण क्षेत्रों को क्रांति का आधार बनाया। उनका विश्वास था कि किसान वर्ग लंबे समय से आर्थिक शोषण और सामंती उत्पीड़न का शिकार रहा है, इसलिए वह सामाजिक परिवर्तन का प्रभावी माध्यम बन सकता है। उन्होंने दीर्घकालीन जनयुद्ध की रणनीति अपनाई, जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में संगठन निर्माण, जनसमर्थन तथा क्रमिक संघर्ष के माध्यम से राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने का प्रयास किया गया। यह रणनीति पारंपरिक शहरी क्रांति की अवधारणा से भिन्न थी।
माओ ने जनरेखा अर्थात मास लाइन की अवधारणा प्रस्तुत की। उनके अनुसार राजनीतिक नेतृत्व को जनता से सीखना चाहिए, जनता की आवश्यकताओं और अनुभवों को समझना चाहिए तथा उन्हीं के आधार पर नीतियों का निर्माण करना चाहिए। इस दृष्टिकोण में जनता केवल शासन का विषय नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रक्रिया की सक्रिय सहभागी मानी जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि समाजवादी समाज में भी वैचारिक संघर्ष समाप्त नहीं होता। इसलिए निरंतर आत्मालोचन, वैचारिक जागरूकता और जनभागीदारी आवश्यक है।
माओ ने कृषि सुधार, भूमि के पुनर्वितरण तथा सामूहिक कृषि व्यवस्था को विशेष महत्व दिया। उनका उद्देश्य ग्रामीण असमानताओं को समाप्त करना और उत्पादन में वृद्धि करना था। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य तथा स्थानीय स्वावलंबन पर भी बल दिया। उनके विचारों में राष्ट्रवाद, समाजवाद तथा जनसहभागिता का विशिष्ट समन्वय दिखाई देता है। यद्यपि उनके शासनकाल में अनेक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम प्रारंभ किए गए, किंतु कुछ नीतियों के परिणामस्वरूप गंभीर आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयाँ भी उत्पन्न हुईं। इसलिए माओ के योगदान का मूल्यांकन करते समय उनकी उपलब्धियों और सीमाओं दोनों का संतुलित अध्ययन आवश्यक माना जाता है।
मार्क्स, लेनिन और माओ के विचारों में अनेक समानताएँ हैं। तीनों ने पूँजीवादी व्यवस्था की आलोचना की, आर्थिक समानता को महत्व दिया, उत्पादन के साधनों पर सामूहिक नियंत्रण का समर्थन किया तथा सामाजिक शोषण के उन्मूलन को राजनीति का प्रमुख उद्देश्य माना। तीनों का विश्वास था कि समाज का संगठन ऐसे आधार पर होना चाहिए जिसमें श्रम को सम्मान मिले और उत्पादन का लाभ व्यापक समाज तक पहुँचे।
इसके साथ ही उनके विचारों में महत्वपूर्ण अंतर भी हैं। मार्क्स का चिंतन मुख्यतः औद्योगिक यूरोप की परिस्थितियों पर आधारित था और उन्होंने औद्योगिक श्रमिक वर्ग को क्रांति की मुख्य शक्ति माना। लेनिन ने इस सिद्धांत को रूस की परिस्थितियों के अनुसार संशोधित करते हुए अग्रदूत दल की आवश्यकता पर बल दिया तथा साम्राज्यवाद का विश्लेषण प्रस्तुत किया। माओ ने चीन जैसे कृषि-प्रधान समाज में किसान वर्ग को क्रांति की मुख्य शक्ति मानते हुए ग्रामीण आधार वाली क्रांतिकारी रणनीति विकसित की। इस प्रकार तीनों विचारकों ने समान वैचारिक परंपरा के भीतर रहते हुए भिन्न-भिन्न सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार समाजवादी सिद्धांतों का विकास किया।
समाजवादी विचारधारा का आधुनिक विश्व पर गहरा प्रभाव पड़ा है। श्रमिक अधिकारों की रक्षा, न्यूनतम मजदूरी, आठ घंटे कार्य-दिवस, सामाजिक सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, निःशुल्क शिक्षा, भूमि सुधार, कल्याणकारी राज्य, आर्थिक नियोजन तथा सामाजिक न्याय जैसी अनेक नीतियाँ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समाजवादी चिंतन से प्रभावित रही हैं। यहाँ तक कि अनेक पूँजीवादी लोकतंत्रों ने भी सामाजिक सुरक्षा और श्रमिक संरक्षण की नीतियाँ अपनाईं, क्योंकि समाजवादी विचारधारा ने आर्थिक असमानताओं के प्रश्न को विश्व राजनीति के केंद्र में ला दिया।
समाजवादी विचारधारा की आलोचना भी व्यापक रूप से हुई है। उदारवादी विचारकों का मत है कि अत्यधिक राज्य नियंत्रण व्यक्तिगत स्वतंत्रता, नवाचार और आर्थिक दक्षता को सीमित कर सकता है। कुछ अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि केंद्रीकृत नियोजन संसाधनों के कुशल उपयोग में हमेशा सफल नहीं होता। अनेक समाजवादी राज्यों के अनुभवों के आधार पर यह भी कहा गया कि राजनीतिक केंद्रीकरण और एकदलीय व्यवस्था से लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। दूसरी ओर समाजवादी विचारकों का तर्क है कि आर्थिक समानता, सामाजिक सुरक्षा और सार्वजनिक कल्याण के बिना स्वतंत्रता अधूरी रहती है। इसलिए सामाजिक न्याय और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करना आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था की प्रमुख चुनौती है।
समग्र रूप से समाजवादी विचारधारा ने आधुनिक राजनीतिक दर्शन को एक नई दिशा प्रदान की। कार्ल मार्क्स ने इतिहास, अर्थव्यवस्था और वर्ग-संघर्ष के वैज्ञानिक विश्लेषण के माध्यम से समाजवाद का सैद्धांतिक आधार निर्मित किया। व्लादिमीर लेनिन ने इन सिद्धांतों को संगठित क्रांतिकारी राजनीति तथा समाजवादी राज्य-निर्माण की प्रक्रिया से जोड़ा। माओ त्से-तुंग ने समाजवादी चिंतन को कृषि-प्रधान समाजों की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करते हुए किसान-आधारित क्रांति, जनसहभागिता और राष्ट्रीय परिस्थितियों के महत्व को रेखांकित किया। इन तीनों विचारकों के योगदान ने समाजवादी विचारधारा को विश्व राजनीति की एक ऐसी प्रभावशाली परंपरा बना दिया जिसने आर्थिक न्याय, श्रमिक अधिकार, सामाजिक समानता, सार्वजनिक कल्याण और मानवीय गरिमा के प्रश्नों को राजनीतिक चिंतन के केंद्र में स्थापित किया। आज भी वैश्विक स्तर पर जब सामाजिक असमानता, श्रमिक अधिकार, आर्थिक न्याय, सार्वजनिक संसाधनों के वितरण तथा कल्याणकारी राज्य की भूमिका पर चर्चा होती है, तब मार्क्स, लेनिन और माओ के विचार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से विमर्श का महत्वपूर्ण आधार बने रहते हैं।
