Unit – 2
Theories: Idealist Theory, Marxist Theory, Pluralist theory and World State theory, Realist
Theory, Decision-making theory Systems Analysis.
सिद्धांत: आदर्शवादी सिद्धांत, मार्क्सवादी सिद्धांत, बहुलवादी सिद्धांत एवं विश्व-राज्य सिद्धांत, यथार्थवादी सिद्धांत, निर्णय-निर्माण सिद्धांत तथा व्यवस्था (प्रणाली) विश्लेषण।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन में विभिन्न सिद्धांतों का विशेष महत्व है क्योंकि इनके माध्यम से राज्यों के व्यवहार, शक्ति-संतुलन, युद्ध, शांति, सहयोग, संघर्ष, विदेश नीति तथा वैश्विक व्यवस्था की प्रकृति को समझने का प्रयास किया जाता है। प्रत्येक सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय राजनीति की व्याख्या अलग दृष्टिकोण से करता है और यह बताने का प्रयास करता है कि विश्व राजनीति किन शक्तियों, मूल्यों, हितों और प्रक्रियाओं से संचालित होती है। कोई भी एक सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सभी पक्षों की पूर्ण व्याख्या नहीं कर सकता, इसलिए विभिन्न सिद्धांत एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं। आदर्शवादी सिद्धांत जहाँ नैतिकता, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और विश्व शांति पर बल देता है, वहीं यथार्थवादी सिद्धांत शक्ति और राष्ट्रीय हित को सबसे महत्वपूर्ण मानता है। मार्क्सवादी सिद्धांत आर्थिक संरचना और वर्गीय हितों को अंतरराष्ट्रीय संबंधों का आधार मानता है, जबकि बहुलवादी सिद्धांत और विश्व-राज्य सिद्धांत राज्य के अतिरिक्त अन्य वैश्विक अभिकर्ताओं तथा विश्वव्यापी राजनीतिक व्यवस्था की संभावनाओं पर बल देते हैं। निर्णय-निर्माण सिद्धांत विदेश नीति के निर्माण की वास्तविक प्रक्रिया को समझने का प्रयास करता है और व्यवस्था अथवा प्रणाली विश्लेषण अंतरराष्ट्रीय राजनीति को एक व्यापक वैश्विक व्यवस्था के रूप में व्याख्यायित करता है। इन सभी सिद्धांतों का संयुक्त अध्ययन अंतरराष्ट्रीय राजनीति की जटिल प्रकृति को समझने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
आदर्शवादी सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सबसे प्राचीन और प्रभावशाली विचारधाराओं में से एक है। इसका मूल आधार यह विश्वास है कि मानव स्वभाव मूलतः सहयोगी, नैतिक और विवेकशील है तथा युद्ध मानव समाज की अपरिहार्य नियति नहीं है। इस सिद्धांत के अनुसार यदि अंतरराष्ट्रीय संबंधों को न्याय, नैतिकता, अंतरराष्ट्रीय कानून, सहयोग और लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर संगठित किया जाए तो स्थायी शांति स्थापित की जा सकती है। आदर्शवादी विचारकों का विश्वास था कि युद्ध का मुख्य कारण अविश्वास, गुप्त कूटनीति, शक्ति की राजनीति और साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा है। यदि इन तत्वों को समाप्त कर दिया जाए और राष्ट्रों के बीच पारदर्शिता, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं तथा सामूहिक सुरक्षा की व्यवस्था विकसित की जाए तो युद्धों की संभावना कम की जा सकती है।
आदर्शवादी सिद्धांत का विशेष विकास प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात हुआ। युद्ध की व्यापक विनाशलीला ने अनेक विचारकों को यह विश्वास दिलाया कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति को केवल शक्ति-संघर्ष के आधार पर नहीं छोड़ा जा सकता। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कानून, मध्यस्थता, पंचाट, निरस्त्रीकरण तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों की स्थापना का समर्थन किया। इस दृष्टिकोण में विश्व शांति को सर्वोच्च राजनीतिक उद्देश्य माना गया। लोकतंत्र को भी शांति का महत्वपूर्ण आधार माना गया क्योंकि यह विश्वास किया गया कि लोकतांत्रिक राज्य परस्पर विवादों का समाधान संवाद और समझौते के माध्यम से अधिक प्रभावी ढंग से कर सकते हैं। आदर्शवादी सिद्धांत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति को नैतिक मूल्यों से जोड़ता है और मानवता के साझा हितों को राष्ट्रीय स्वार्थ से ऊपर रखने का प्रयास करता है।
आदर्शवादी सिद्धांत की आलोचना भी की गई। आलोचकों का मत है कि यह सिद्धांत मानव स्वभाव के आदर्श पक्ष पर अत्यधिक विश्वास करता है और शक्ति, प्रतिस्पर्धा तथा राष्ट्रीय हित की वास्तविक भूमिका को कम महत्व देता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के आरंभ ने भी यह संकेत दिया कि केवल नैतिक आदर्शों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के आधार पर विश्व शांति सुनिश्चित नहीं की जा सकती। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय कानून, मानवाधिकार, सामूहिक सुरक्षा तथा वैश्विक सहयोग की आधुनिक अवधारणाओं पर आदर्शवादी सिद्धांत का गहरा प्रभाव बना हुआ है।
मार्क्सवादी सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय राजनीति की व्याख्या आर्थिक संरचना और वर्गीय संबंधों के आधार पर करता है। इसके अनुसार विश्व राजनीति का वास्तविक आधार आर्थिक शक्तियाँ और उत्पादन संबंध हैं। मार्क्सवादी दृष्टिकोण यह मानता है कि पूँजीवादी व्यवस्था स्वभावतः विस्तारवादी होती है और नए बाजारों, कच्चे माल तथा निवेश के अवसरों की खोज में साम्राज्यवाद को जन्म देती है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय संघर्षों का प्रमुख कारण केवल राष्ट्रवाद या शक्ति-संतुलन नहीं, बल्कि पूँजीवादी आर्थिक हित होते हैं। इस दृष्टिकोण में राज्य को आर्थिक रूप से प्रभुत्वशाली वर्ग के हितों की रक्षा करने वाली संस्था माना जाता है।
मार्क्सवादी विचारकों के अनुसार विकसित पूँजीवादी राष्ट्र और विकासशील देशों के बीच आर्थिक असमानता वैश्विक शोषण की प्रक्रिया का परिणाम है। विकसित देश व्यापार, वित्त, प्रौद्योगिकी तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से अपने आर्थिक प्रभाव को बनाए रखते हैं। इसलिए वास्तविक अंतरराष्ट्रीय न्याय तभी संभव है जब आर्थिक शोषण समाप्त हो और संसाधनों का अधिक न्यायपूर्ण वितरण सुनिश्चित किया जाए। बाद के नव-मार्क्सवादी विचारकों ने आश्रयता सिद्धांत तथा विश्व-प्रणाली विश्लेषण के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में केंद्र और परिधि के बीच असमान संबंध आज भी अनेक विकासशील देशों की आर्थिक प्रगति को प्रभावित करते हैं।
मार्क्सवादी सिद्धांत का सबसे बड़ा योगदान यह है कि इसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आर्थिक शक्तियों की भूमिका को केंद्र में स्थापित किया। इसने यह स्पष्ट किया कि राजनीतिक निर्णयों के पीछे अनेक बार आर्थिक हित कार्य करते हैं। तथापि इसकी आलोचना इस आधार पर की जाती है कि यह राष्ट्रीय संस्कृति, धर्म, पहचान, नेतृत्व, कूटनीति तथा सुरक्षा जैसे अन्य महत्वपूर्ण तत्वों को अपेक्षाकृत कम महत्व देता है।
बहुलवादी सिद्धांत आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में राज्य की पारंपरिक सर्वोच्चता को चुनौती देता है। इस सिद्धांत के अनुसार विश्व राजनीति केवल राज्यों के बीच संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, अंतरराष्ट्रीय संगठन, गैर-सरकारी संगठन, वैश्विक मीडिया, वैज्ञानिक समुदाय, वित्तीय संस्थाएँ, नागरिक समाज तथा अन्य गैर-राज्य अभिकर्ता भी अंतरराष्ट्रीय निर्णयों को प्रभावित करते हैं। वैश्वीकरण, सूचना प्रौद्योगिकी और आर्थिक परस्पर निर्भरता के कारण शक्ति का वितरण अनेक स्तरों पर हो गया है। इसलिए किसी भी अंतरराष्ट्रीय समस्या का समाधान केवल राज्यों द्वारा संभव नहीं है।
बहुलवादी दृष्टिकोण यह मानता है कि विभिन्न देशों के बीच व्यापार, शिक्षा, विज्ञान, संस्कृति, पर्यटन तथा प्रौद्योगिकी के माध्यम से व्यापक सहयोग विकसित हो चुका है। इन बहुआयामी संबंधों के कारण युद्ध की संभावना अपेक्षाकृत कम होती है और सहयोग की संभावनाएँ बढ़ती हैं। इस सिद्धांत में अंतरराष्ट्रीय संगठनों और वैश्विक शासन की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। जलवायु परिवर्तन, महामारी नियंत्रण, समुद्री सुरक्षा तथा साइबर अपराध जैसी समस्याओं का समाधान बहुपक्षीय सहयोग के बिना संभव नहीं माना जाता।
विश्व-राज्य सिद्धांत बहुलवादी चिंतन का एक उन्नत स्वरूप है। इसका मूल विचार यह है कि यदि विश्व स्तर पर एक प्रभावी राजनीतिक व्यवस्था अथवा विश्व सरकार की स्थापना हो जाए तो अंतरराष्ट्रीय युद्धों और संघर्षों को स्थायी रूप से समाप्त किया जा सकता है। इस सिद्धांत के अनुसार वर्तमान विश्व व्यवस्था में संप्रभु राज्यों की पूर्ण स्वतंत्रता अनेक बार संघर्ष और प्रतिस्पर्धा को जन्म देती है। यदि वैश्विक स्तर पर ऐसी सर्वोच्च संस्था स्थापित हो जो सभी राज्यों के लिए समान रूप से बाध्यकारी कानून बना सके, न्याय प्रदान कर सके तथा सामूहिक सुरक्षा सुनिश्चित कर सके, तो विश्व शांति की संभावनाएँ बढ़ सकती हैं। यद्यपि वर्तमान परिस्थितियों में पूर्ण विश्व-राज्य की स्थापना व्यावहारिक रूप से कठिन मानी जाती है, फिर भी अंतरराष्ट्रीय कानून, वैश्विक संस्थाओं तथा बहुपक्षीय सहयोग के विकास में इस सिद्धांत की प्रेरणा स्पष्ट दिखाई देती है।
यथार्थवादी सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सबसे प्रभावशाली और व्यापक रूप से स्वीकृत सिद्धांत माना जाता है। इसके अनुसार अंतरराष्ट्रीय राजनीति का मूल आधार शक्ति और राष्ट्रीय हित है। यथार्थवादी विचारकों का मत है कि विश्व व्यवस्था में कोई सर्वोच्च वैश्विक सरकार नहीं होती, इसलिए प्रत्येक राज्य अपनी सुरक्षा और अस्तित्व की रक्षा के लिए स्वयं उत्तरदायी होता है। ऐसी स्थिति में शक्ति का अर्जन और राष्ट्रीय हितों की रक्षा प्रत्येक राज्य का प्राथमिक उद्देश्य बन जाता है। इस दृष्टिकोण में नैतिकता और आदर्शों की अपेक्षा व्यावहारिकता तथा शक्ति-संतुलन को अधिक महत्व दिया जाता है।
यथार्थवादी सिद्धांत यह मानता है कि मानव स्वभाव में प्रतिस्पर्धा और स्वार्थ की प्रवृत्ति विद्यमान है, जिसका प्रतिबिंब राज्यों के व्यवहार में भी दिखाई देता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संघर्ष एक स्वाभाविक संभावना है। राज्यों के बीच सहयोग तभी तक संभव है जब तक वह उनके राष्ट्रीय हितों के अनुकूल हो। शक्ति-संतुलन, सैन्य तैयारी, सामरिक गठबंधन तथा निरोध की नीति यथार्थवादी दृष्टिकोण के प्रमुख उपकरण हैं। इस सिद्धांत का विशेष महत्व शीत युद्ध के दौरान दिखाई दिया जब महाशक्तियों के बीच शक्ति-संतुलन और परमाणु प्रतिरोध की नीति अंतरराष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख आधार बनी।
यथार्थवादी सिद्धांत की आलोचना इस आधार पर की जाती है कि यह सहयोग, अंतरराष्ट्रीय कानून, वैश्विक संस्थाओं तथा आर्थिक परस्पर निर्भरता के महत्व को कम करके आँकता है। फिर भी राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति, रक्षा रणनीति तथा सामरिक अध्ययन के क्षेत्र में इसका महत्व आज भी अत्यंत व्यापक है।
निर्णय-निर्माण सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन में एक विशिष्ट व्यवहारवादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह सिद्धांत इस प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास करता है कि राज्य वास्तव में विदेश नीति संबंधी निर्णय कैसे लेते हैं। इसके अनुसार केवल राष्ट्रीय हित या शक्ति की अवधारणा पर्याप्त नहीं है; निर्णय लेने वाले व्यक्तियों, संस्थाओं, प्रशासनिक प्रक्रियाओं, सूचनाओं, मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों तथा राजनीतिक परिस्थितियों का भी गहरा प्रभाव होता है। इस सिद्धांत में यह माना जाता है कि विदेश नीति का निर्माण अनेक स्तरों पर विचार-विमर्श, सूचना-संग्रह, विकल्पों के मूल्यांकन तथा राजनीतिक दबावों के बीच किया जाता है।
निर्णय-निर्माण सिद्धांत नेतृत्व की भूमिका को विशेष महत्व देता है। किसी संकट की स्थिति में राज्याध्यक्ष, मंत्रिपरिषद, नौकरशाही, सैन्य नेतृत्व, विशेषज्ञ समूह तथा जनमत सभी किसी न किसी रूप में निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। निर्णय लेने वालों की वैचारिक मान्यताएँ, अनुभव, व्यक्तित्व, जोखिम उठाने की प्रवृत्ति तथा उपलब्ध सूचनाएँ भी अंतिम निर्णय को प्रभावित करती हैं। इस प्रकार यह सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय राजनीति को मानवीय व्यवहार और संस्थागत प्रक्रियाओं के संदर्भ में समझने का प्रयास करता है।
इस सिद्धांत का सबसे बड़ा योगदान यह है कि इसने विदेश नीति के अध्ययन को अधिक व्यावहारिक और वैज्ञानिक बनाया। इसके माध्यम से यह समझा जा सकता है कि समान परिस्थितियों में विभिन्न राज्य अलग-अलग निर्णय क्यों लेते हैं। इसकी आलोचना इस आधार पर की जाती है कि यह कभी-कभी व्यापक अंतरराष्ट्रीय संरचनाओं की अपेक्षा व्यक्तिगत और प्रशासनिक तत्वों पर अधिक बल देता है।
व्यवस्था अथवा प्रणाली विश्लेषण सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय राजनीति को एक व्यापक वैश्विक व्यवस्था के रूप में देखता है। इस दृष्टिकोण के अनुसार विश्व राजनीति अनेक परस्पर संबद्ध इकाइयों से मिलकर बनी एक गतिशील प्रणाली है, जिसमें प्रत्येक राज्य तथा अन्य वैश्विक अभिकर्ता एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। किसी एक क्षेत्र में होने वाला परिवर्तन पूरी व्यवस्था पर प्रभाव डाल सकता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अध्ययन अलग-अलग घटनाओं के स्थान पर संपूर्ण व्यवस्था के संदर्भ में किया जाना चाहिए।
प्रणाली विश्लेषण यह मानता है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था विभिन्न प्रकार की हो सकती है, जैसे एकध्रुवीय, द्विध्रुवीय अथवा बहुध्रुवीय व्यवस्था। प्रत्येक व्यवस्था में शक्ति का वितरण अलग होता है और उसी के अनुसार राज्यों का व्यवहार भी बदलता है। उदाहरण के लिए शीत युद्ध के समय द्विध्रुवीय व्यवस्था में दो महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा प्रमुख थी, जबकि वर्तमान समय में बहुध्रुवीय व्यवस्था में अनेक शक्तिशाली देशों तथा क्षेत्रीय संगठनों की भूमिका बढ़ गई है।
प्रणाली विश्लेषण का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि यह व्यवस्था में आने वाले निवेश, निर्णय प्रक्रिया तथा परिणामों के बीच संबंधों का अध्ययन करता है। बाहरी परिस्थितियाँ, वैश्विक संकट, आर्थिक परिवर्तन तथा तकनीकी विकास अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में नए निवेश के रूप में कार्य करते हैं। राज्यों और संस्थाओं द्वारा लिए गए निर्णय व्यवस्था के परिणाम उत्पन्न करते हैं, जो पुनः नई परिस्थितियों को जन्म देते हैं। इस प्रकार अंतरराष्ट्रीय राजनीति एक निरंतर गतिशील प्रक्रिया के रूप में विकसित होती रहती है।
इस सिद्धांत की विशेषता यह है कि यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति को व्यापक दृष्टिकोण से समझने का अवसर प्रदान करता है। इसकी सहायता से शक्ति-संतुलन, वैश्विक परिवर्तन, क्षेत्रीय सहयोग, आर्थिक परस्पर निर्भरता तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका का समग्र विश्लेषण किया जा सकता है। आलोचक यह तर्क देते हैं कि कभी-कभी यह सिद्धांत अत्यधिक संरचनात्मक हो जाता है और व्यक्तिगत नेतृत्व अथवा विशिष्ट ऐतिहासिक घटनाओं के महत्व को अपेक्षाकृत कम कर देता है।
इन सभी सिद्धांतों की तुलनात्मक दृष्टि से समीक्षा करने पर स्पष्ट होता है कि प्रत्येक सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय राजनीति के किसी विशेष पक्ष को अधिक महत्व देता है। आदर्शवादी सिद्धांत नैतिकता और सहयोग पर बल देता है। मार्क्सवादी सिद्धांत आर्थिक संरचना और वर्गीय हितों को प्रमुख मानता है। बहुलवादी सिद्धांत वैश्विक अभिकर्ताओं की विविधता तथा परस्पर निर्भरता को रेखांकित करता है। विश्व-राज्य सिद्धांत वैश्विक शासन और स्थायी शांति की संभावना प्रस्तुत करता है। यथार्थवादी सिद्धांत शक्ति और राष्ट्रीय हित को केंद्र में रखता है। निर्णय-निर्माण सिद्धांत वास्तविक नीति-निर्माण प्रक्रिया का विश्लेषण करता है, जबकि प्रणाली विश्लेषण संपूर्ण वैश्विक व्यवस्था के स्वरूप और उसके कार्य-व्यवहार को समझने का प्रयास करता है।
समकालीन विश्व में इन सभी सिद्धांतों की प्रासंगिकता बनी हुई है। जलवायु परिवर्तन, साइबर सुरक्षा, वैश्विक महामारी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आर्थिक प्रतिस्पर्धा, क्षेत्रीय संघर्ष, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद तथा वैश्विक शासन जैसी चुनौतियों को समझने के लिए केवल एक सिद्धांत पर्याप्त नहीं है। शक्ति और राष्ट्रीय हित के साथ-साथ सहयोग, आर्थिक संरचना, वैश्विक संस्थाओं, नेतृत्व, निर्णय प्रक्रिया तथा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के समग्र स्वरूप का अध्ययन समान रूप से आवश्यक है। इसलिए आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अध्ययन बहुआयामी और अंतःविषयक दृष्टिकोण की अपेक्षा करता है।
समग्र रूप से अंतरराष्ट्रीय राजनीति के आदर्शवादी, मार्क्सवादी, बहुलवादी, विश्व-राज्य, यथार्थवादी, निर्णय-निर्माण तथा व्यवस्था विश्लेषण संबंधी सिद्धांत विश्व राजनीति की विविध वास्तविकताओं को समझने के लिए अलग-अलग वैचारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। इन सिद्धांतों का संयुक्त अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल शक्ति-संघर्ष या केवल नैतिक आदर्शों का क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय हित, आर्थिक संरचना, वैश्विक सहयोग, संस्थागत विकास, निर्णय प्रक्रिया तथा निरंतर परिवर्तित होती अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का जटिल और बहुआयामी अध्ययन है। इसी कारण इन सिद्धांतों का समन्वित अध्ययन अंतरराष्ट्रीय राजनीति के गहन एवं वैज्ञानिक विश्लेषण के लिए अनिवार्य माना जाता है।
