Unit – 3
Balance of Power, Collective Security.
शक्ति-संतुलन तथा सामूहिक सुरक्षा।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति-संतुलन और सामूहिक सुरक्षा दो ऐसी मूलभूत अवधारणाएँ हैं जिन्होंने विश्व व्यवस्था, युद्ध, शांति, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विकास को गहराई से प्रभावित किया है। दोनों का प्रमुख उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति और स्थिरता बनाए रखना है, किंतु इनकी कार्यप्रणाली, वैचारिक आधार और व्यावहारिक दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण अंतर पाया जाता है। शक्ति-संतुलन का आधार राज्यों के बीच शक्ति के वितरण पर आधारित है, जबकि सामूहिक सुरक्षा का आधार अंतरराष्ट्रीय समुदाय की सामूहिक जिम्मेदारी, सहयोग और विधि-आधारित व्यवस्था पर टिका हुआ है। आधुनिक विश्व में इन दोनों अवधारणाओं का महत्व इसलिए और अधिक बढ़ गया है क्योंकि परमाणु हथियारों, वैश्विक आतंकवाद, साइबर युद्ध, क्षेत्रीय संघर्ष, आर्थिक प्रतिस्पर्धा तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों की बढ़ती भूमिका ने विश्व राजनीति को अत्यंत जटिल बना दिया है। इन परिस्थितियों में शक्ति-संतुलन और सामूहिक सुरक्षा दोनों को अंतरराष्ट्रीय शांति की पूरक व्यवस्थाओं के रूप में देखा जाता है।
शक्ति-संतुलन की अवधारणा अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सबसे प्राचीन अवधारणाओं में से एक है। इसका मूल विचार यह है कि यदि किसी एक राज्य या राज्यों के समूह को अत्यधिक शक्ति प्राप्त हो जाए तो वह अन्य राज्यों की स्वतंत्रता और सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है। इसलिए विश्व व्यवस्था में शक्ति का ऐसा संतुलित वितरण आवश्यक है जिससे कोई भी राज्य इतना शक्तिशाली न बन सके कि वह अन्य राज्यों पर प्रभुत्व स्थापित कर सके। इस प्रकार शक्ति-संतुलन का उद्देश्य युद्ध को प्रोत्साहित करना नहीं, बल्कि शक्ति के संतुलित वितरण के माध्यम से संभावित आक्रमण को रोकना और अंतरराष्ट्रीय स्थिरता बनाए रखना है।
इतिहास में शक्ति-संतुलन की अवधारणा का विकास यूरोप की राजनीतिक व्यवस्था के साथ हुआ। मध्यकालीन यूरोप में अनेक स्वतंत्र राज्यों के उदय तथा बाद में राष्ट्रीय राज्यों के निर्माण के साथ यह आवश्यकता अनुभव की गई कि यदि किसी एक राज्य का अत्यधिक विस्तार हो गया तो अन्य राज्यों का अस्तित्व संकट में पड़ सकता है। इसलिए विभिन्न राज्यों ने समय-समय पर ऐसे गठबंधन बनाए जिनका उद्देश्य किसी एक महाशक्ति को अत्यधिक प्रभावशाली बनने से रोकना था। इस प्रकार शक्ति-संतुलन यूरोपीय कूटनीति का प्रमुख आधार बन गया। उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोप की सामरिक और कूटनीतिक व्यवस्था काफी हद तक इसी सिद्धांत पर आधारित थी।
शक्ति-संतुलन का मूल आधार राष्ट्रीय हित और सुरक्षा है। प्रत्येक राज्य अपनी स्वतंत्रता, संप्रभुता और सुरक्षा की रक्षा करना चाहता है। यदि कोई राज्य अपनी सैन्य, आर्थिक अथवा राजनीतिक शक्ति का अत्यधिक विस्तार करता है, तो अन्य राज्य उसकी शक्ति को संतुलित करने के लिए अपने संसाधनों का विकास करते हैं, नए गठबंधन बनाते हैं या अपनी रक्षा क्षमता को मजबूत करते हैं। इस प्रकार शक्ति-संतुलन किसी पूर्वनिर्धारित कानूनी व्यवस्था के बजाय राज्यों की व्यावहारिक राजनीतिक रणनीतियों का परिणाम होता है।
शक्ति-संतुलन बनाए रखने के लिए राज्यों द्वारा अनेक उपाय अपनाए जाते हैं। पहला उपाय सैन्य शक्ति का विकास है। प्रत्येक राज्य अपनी सेना, रक्षा तकनीक, हथियारों तथा सामरिक क्षमताओं को इस प्रकार विकसित करता है कि संभावित शत्रु आक्रमण करने से पहले गंभीर परिणामों पर विचार करने के लिए विवश हो। दूसरा उपाय कूटनीतिक गठबंधन है। यदि कोई राज्य अत्यधिक शक्तिशाली बनता है तो अन्य राज्य उसके विरुद्ध सामूहिक गठबंधन बना लेते हैं। तीसरा उपाय शस्त्र संतुलन और प्रतिरोध की नीति है, जिसके माध्यम से विरोधी पक्ष को यह विश्वास दिलाया जाता है कि आक्रमण की स्थिति में उसे भी गंभीर क्षति उठानी पड़ेगी। चौथा उपाय क्षेत्रीय और वैश्विक शक्ति समीकरणों के अनुसार विदेश नीति का निर्माण करना है।
बीसवीं शताब्दी में शक्ति-संतुलन की अवधारणा का स्वरूप बदल गया। प्रथम विश्वयुद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल पारंपरिक शक्ति-संतुलन युद्धों को रोकने में हमेशा सफल नहीं हो सकता। इसके बाद शीत युद्ध के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के बीच द्विध्रुवीय शक्ति-संतुलन विकसित हुआ। दोनों महाशक्तियों के पास विशाल परमाणु हथियारों का भंडार था। इस स्थिति में प्रत्यक्ष युद्ध की संभावना इसलिए कम रही क्योंकि दोनों पक्ष जानते थे कि परमाणु युद्ध में किसी की वास्तविक विजय संभव नहीं होगी। इस स्थिति को परमाणु प्रतिरोध अथवा संतुलित भय की स्थिति भी कहा गया। इस प्रकार शक्ति-संतुलन ने युद्ध को रोकने में एक विशेष प्रकार की भूमिका निभाई।
आधुनिक समय में शक्ति-संतुलन केवल सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं रह गया है। आर्थिक शक्ति, तकनीकी विकास, ऊर्जा संसाधन, साइबर क्षमता, अंतरिक्ष तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, समुद्री नियंत्रण, वैश्विक व्यापार तथा कूटनीतिक प्रभाव भी शक्ति के महत्वपूर्ण स्रोत बन चुके हैं। इसलिए आज शक्ति-संतुलन बहुआयामी स्वरूप ग्रहण कर चुका है।
शक्ति-संतुलन की अनेक विशेषताएँ हैं। यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी एक राज्य के प्रभुत्व को रोकने का प्रयास करता है। यह राज्यों को अपनी सुरक्षा के प्रति सतर्क रहने के लिए प्रेरित करता है। यह कूटनीतिक लचीलापन प्रदान करता है क्योंकि परिस्थितियों के अनुसार गठबंधन बदले जा सकते हैं। यह राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाता है और किसी भी राज्य को अत्यधिक प्रभावशाली बनने से रोकने का प्रयास करता है।
इसके साथ ही शक्ति-संतुलन की अनेक सीमाएँ भी हैं। सबसे बड़ी सीमा यह है कि यह हथियारों की होड़ को प्रोत्साहित कर सकता है। जब प्रत्येक राज्य अपनी शक्ति बढ़ाने का प्रयास करता है तो सैन्य व्यय बढ़ता है और अंतरराष्ट्रीय तनाव भी बढ़ सकता है। दूसरी सीमा यह है कि गठबंधनों की राजनीति कई बार बड़े युद्धों का कारण बन जाती है। प्रथम विश्वयुद्ध इसका प्रमुख उदाहरण माना जाता है। तीसरी सीमा यह है कि शक्ति-संतुलन स्थायी शांति की गारंटी नहीं देता, बल्कि कई बार केवल अस्थायी स्थिरता प्रदान करता है। चौथी सीमा यह है कि आधुनिक वैश्विक समस्याएँ जैसे जलवायु परिवर्तन, महामारी, साइबर अपराध और अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद केवल शक्ति-संतुलन के माध्यम से हल नहीं की जा सकतीं।
सामूहिक सुरक्षा की अवधारणा शक्ति-संतुलन की सीमाओं के उत्तर के रूप में विकसित हुई। इसका मूल विचार यह है कि किसी एक राज्य पर किया गया आक्रमण समस्त अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर आक्रमण माना जाएगा और सभी राज्य मिलकर आक्रमणकारी के विरुद्ध कार्यवाही करेंगे। इस प्रकार सामूहिक सुरक्षा का आधार शक्ति का संतुलन नहीं, बल्कि सामूहिक उत्तरदायित्व, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और विधि-आधारित व्यवस्था है।
सामूहिक सुरक्षा का विकास विशेष रूप से प्रथम विश्वयुद्ध के बाद हुआ। युद्ध की व्यापक विनाशलीला ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल शक्ति-संतुलन पर्याप्त नहीं है। इसलिए ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की आवश्यकता अनुभव की गई जिसमें सभी राज्य मिलकर शांति की रक्षा करें। इसी विचार के आधार पर अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भूमिका को महत्व दिया गया। बाद में द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के साथ सामूहिक सुरक्षा की अवधारणा को अधिक संगठित और संस्थागत स्वरूप प्राप्त हुआ।
सामूहिक सुरक्षा का मूल सिद्धांत यह है कि विश्व शांति सभी राज्यों की साझा जिम्मेदारी है। यदि कोई राज्य आक्रमण करता है या अंतरराष्ट्रीय शांति को भंग करता है, तो अन्य राज्यों को तटस्थ नहीं रहना चाहिए। उन्हें सामूहिक रूप से राजनीतिक, आर्थिक, कूटनीतिक और आवश्यकता पड़ने पर सैन्य उपायों के माध्यम से आक्रमणकारी को रोकना चाहिए। इस प्रकार सामूहिक सुरक्षा अंतरराष्ट्रीय सहयोग और साझा उत्तरदायित्व पर आधारित व्यवस्था है।
सामूहिक सुरक्षा के प्रभावी संचालन के लिए कुछ आवश्यक शर्तें होती हैं। पहली शर्त यह है कि सभी सदस्य राज्यों का विश्वास इस व्यवस्था में होना चाहिए। दूसरी शर्त यह है कि आक्रमणकारी की पहचान निष्पक्ष और शीघ्रता से की जा सके। तीसरी शर्त यह है कि सदस्य राष्ट्र सामूहिक निर्णयों का ईमानदारी से पालन करें। चौथी शर्त यह है कि अंतरराष्ट्रीय संगठन के पास पर्याप्त वैधानिक और व्यावहारिक क्षमता हो जिससे वह सामूहिक कार्यवाही का समन्वय कर सके। यदि इन शर्तों का पालन न हो तो सामूहिक सुरक्षा की प्रभावशीलता कम हो जाती है।
संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत आधार मानी जाती है। सुरक्षा परिषद अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए प्रतिबंध लगा सकती है, शांति सेना भेज सकती है, आर्थिक प्रतिबंध लागू कर सकती है तथा आवश्यकता पड़ने पर सामूहिक सैन्य कार्यवाही की अनुमति भी दे सकती है। अनेक अवसरों पर संयुक्त राष्ट्र ने संघर्षविराम, शांति स्थापना तथा मानवीय सहायता के माध्यम से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सामूहिक सुरक्षा की प्रमुख विशेषता यह है कि यह सभी राज्यों को समान रूप से सुरक्षा प्रदान करने का प्रयास करती है। इसमें आक्रमण और प्रतिरक्षा के बीच स्पष्ट अंतर किया जाता है। इसका उद्देश्य किसी विशेष शक्ति समूह के हितों की रक्षा करना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून और विश्व शांति की रक्षा करना है। यह बहुपक्षीय सहयोग, सामूहिक निर्णय और साझा उत्तरदायित्व पर आधारित होती है। इसमें छोटे और बड़े सभी राज्यों की समान सुरक्षा की अवधारणा निहित रहती है।
सामूहिक सुरक्षा की भी अनेक सीमाएँ हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि सभी राज्यों के राजनीतिक हित हमेशा समान नहीं होते। कई बार महाशक्तियों के बीच मतभेद के कारण सामूहिक निर्णय लेना कठिन हो जाता है। सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों की वीटो शक्ति भी अनेक बार प्रभावी कार्यवाही में बाधा बनती है। दूसरी समस्या यह है कि सभी सदस्य राज्य हमेशा सामूहिक कार्यवाही में समान रूप से भाग लेने के लिए तैयार नहीं होते। तीसरी समस्या यह है कि किसी संघर्ष में वास्तविक आक्रमणकारी की पहचान करना कई बार जटिल हो जाता है। चौथी समस्या यह है कि सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है; यदि सदस्य राष्ट्र सक्रिय सहयोग न करें तो यह व्यवस्था कमजोर पड़ जाती है।
शक्ति-संतुलन और सामूहिक सुरक्षा के बीच अनेक महत्वपूर्ण अंतर हैं। शक्ति-संतुलन का आधार प्रतिस्पर्धा और शक्ति का वितरण है, जबकि सामूहिक सुरक्षा का आधार सहयोग और सामूहिक उत्तरदायित्व है। शक्ति-संतुलन में राज्य अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार गठबंधन बनाते और बदलते रहते हैं, जबकि सामूहिक सुरक्षा में सभी राज्यों से अपेक्षा की जाती है कि वे किसी भी आक्रमणकारी के विरुद्ध एकजुट होकर कार्य करें। शक्ति-संतुलन मुख्यतः व्यावहारिक राजनीति और राष्ट्रीय हित पर आधारित है, जबकि सामूहिक सुरक्षा अंतरराष्ट्रीय कानून, नैतिकता और संस्थागत सहयोग पर अधिक बल देती है। शक्ति-संतुलन में सुरक्षा का दायित्व मुख्यतः प्रत्येक राज्य पर होता है, जबकि सामूहिक सुरक्षा में सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की होती है।
यद्यपि इन दोनों अवधारणाओं में अंतर है, फिर भी आधुनिक विश्व में ये पूर्णतः विरोधी नहीं हैं। अनेक अवसरों पर दोनों एक-दूसरे के पूरक रूप में कार्य करती हैं। उदाहरण के लिए क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्थाएँ, रक्षा सहयोग, संयुक्त सैन्य अभ्यास तथा अंतरराष्ट्रीय शांति अभियानों में शक्ति-संतुलन और सामूहिक सुरक्षा दोनों के तत्व दिखाई देते हैं। वर्तमान बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में राज्य अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए शक्ति-संतुलन बनाए रखते हैं, साथ ही संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों के माध्यम से सामूहिक सुरक्षा की व्यवस्था को भी मजबूत करने का प्रयास करते हैं।
समकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इन दोनों अवधारणाओं की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। परमाणु हथियारों का प्रसार, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, साइबर हमले, समुद्री सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सैन्य उपयोग, ऊर्जा संकट, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक महामारियाँ ऐसी चुनौतियाँ हैं जिनका सामना केवल सैन्य शक्ति अथवा केवल अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से नहीं किया जा सकता। इन समस्याओं के समाधान के लिए एक ओर प्रभावी प्रतिरोध क्षमता और शक्ति-संतुलन आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर सामूहिक सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय कानून, बहुपक्षीय सहयोग और वैश्विक संस्थाओं की सक्रिय भूमिका भी अनिवार्य है।
समग्र रूप से शक्ति-संतुलन और सामूहिक सुरक्षा अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दो आधारभूत अवधारणाएँ हैं जिन्होंने विश्व व्यवस्था के निर्माण और संरक्षण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। शक्ति-संतुलन ने किसी एक शक्ति के प्रभुत्व को रोकने, राष्ट्रीय सुरक्षा बनाए रखने और सामरिक स्थिरता स्थापित करने में योगदान दिया है, जबकि सामूहिक सुरक्षा ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग, विधि-आधारित विश्व व्यवस्था, शांति स्थापना और वैश्विक उत्तरदायित्व की भावना को सुदृढ़ किया है। बदलती वैश्विक परिस्थितियों में इन दोनों अवधारणाओं का महत्व कम होने के बजाय और अधिक बढ़ गया है, क्योंकि आधुनिक विश्व की जटिल चुनौतियों का समाधान शक्ति और सहयोग, राष्ट्रीय हित और वैश्विक उत्तरदायित्व, प्रतिरोध और सामूहिक कार्यवाही—इन सभी के संतुलित समन्वय से ही संभव है। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन में शक्ति-संतुलन और सामूहिक सुरक्षा को न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से बल्कि समकालीन वैश्विक शासन और विश्व शांति की आधारशिला के रूप में भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
