Unit – 4
Ideology, National Interest, Third World: Concept and Problems.
विचारधारा, राष्ट्रीय हित तथा तृतीय विश्व: अवधारणा एवं समस्याएँ।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अध्ययन केवल राज्यों के पारस्परिक संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन वैचारिक, राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक आधारों का भी अध्ययन करता है जो राज्यों के व्यवहार, विदेश नीति, वैश्विक सहयोग तथा संघर्ष को प्रभावित करते हैं। विचारधारा, राष्ट्रीय हित और तृतीय विश्व की अवधारणा ऐसे ही तीन महत्वपूर्ण तत्व हैं, जिन्होंने आधुनिक विश्व राजनीति की दिशा और स्वरूप को गहराई से प्रभावित किया है। विचारधारा राज्यों की नीतियों और राजनीतिक दृष्टिकोण को दिशा प्रदान करती है, राष्ट्रीय हित विदेश नीति का मूल आधार होता है, जबकि तृतीय विश्व की अवधारणा उपनिवेशवाद से मुक्त हुए विकासशील देशों की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों को समझने का माध्यम बनती है। इन तीनों अवधारणाओं का परस्पर गहरा संबंध है क्योंकि किसी भी राज्य की विदेश नीति, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, क्षेत्रीय संबंध और वैश्विक भूमिका पर उसकी विचारधारा, उसके राष्ट्रीय हित और उसके विकास के स्तर का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।
विचारधारा का सामान्य अर्थ उन सिद्धांतों, मूल्यों, आदर्शों और विश्वासों के संगठित समूह से है जो किसी समाज, राज्य, राजनीतिक दल या समूह के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण को निर्धारित करते हैं। विचारधारा केवल विचारों का संग्रह नहीं होती, बल्कि वह समाज और राज्य के संगठन, सत्ता के प्रयोग, आर्थिक व्यवस्था, नागरिक अधिकारों तथा अंतरराष्ट्रीय संबंधों के संबंध में एक व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। प्रत्येक विचारधारा यह स्पष्ट करने का प्रयास करती है कि आदर्श समाज कैसा होना चाहिए, राज्य की भूमिका क्या होनी चाहिए और मानव जीवन का सर्वोत्तम संगठन किस प्रकार संभव है। इसी कारण विचारधारा राजनीति को दिशा, उद्देश्य और वैचारिक आधार प्रदान करती है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में विचारधारा का महत्व अत्यंत व्यापक है। किसी भी राज्य की विदेश नीति, उसके अंतरराष्ट्रीय संबंध तथा उसके सहयोग और संघर्ष के स्वरूप पर उसकी वैचारिक मान्यताओं का प्रभाव पड़ता है। उदार लोकतांत्रिक विचारधारा वाले राज्य सामान्यतः लोकतंत्र, मानवाधिकार, मुक्त व्यापार और बहुपक्षीय सहयोग पर बल देते हैं, जबकि समाजवादी या साम्यवादी विचारधारा वाले राज्य आर्थिक समानता, सामाजिक न्याय और राज्य की सक्रिय भूमिका को अधिक महत्व देते रहे हैं। राष्ट्रवादी विचारधारा राष्ट्रीय एकता, संप्रभुता और राष्ट्रीय गौरव को प्राथमिकता देती है। इस प्रकार विचारधारा केवल आंतरिक राजनीति को ही नहीं, बल्कि वैश्विक संबंधों को भी प्रभावित करती है।
बीसवीं शताब्दी में विचारधारात्मक संघर्ष अंतरराष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख आधार बन गया। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विश्व मुख्यतः दो वैचारिक गुटों में विभाजित हो गया। एक ओर उदार लोकतांत्रिक और पूँजीवादी व्यवस्था का समर्थन करने वाले देश थे, जबकि दूसरी ओर समाजवादी और साम्यवादी विचारधारा को अपनाने वाले देश थे। इस वैचारिक प्रतिस्पर्धा ने शीत युद्ध की राजनीति को जन्म दिया। अनेक क्षेत्रीय संघर्ष, सैन्य गठबंधन, आर्थिक सहायता कार्यक्रम तथा कूटनीतिक नीतियाँ इसी वैचारिक प्रतिस्पर्धा से प्रभावित थीं। यद्यपि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद वैचारिक संघर्ष का स्वरूप बदला, फिर भी लोकतंत्र, मानवाधिकार, राष्ट्रवाद, धार्मिक पहचान, वैश्वीकरण और सांस्कृतिक मूल्यों से संबंधित विचारधाराएँ आज भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करती हैं।
विचारधारा का सकारात्मक पक्ष यह है कि वह समाज को दिशा, प्रेरणा और संगठन प्रदान करती है। वह नागरिकों में राजनीतिक चेतना उत्पन्न करती है तथा शासन की नीतियों को वैचारिक आधार देती है। किंतु विचारधारा का नकारात्मक पक्ष तब सामने आता है जब वह कट्टरता, असहिष्णुता और वैचारिक संघर्ष का रूप धारण कर लेती है। जब कोई राज्य अपनी विचारधारा को अन्य देशों पर थोपने का प्रयास करता है या किसी विचारधारा को सर्वोच्च और अंतिम सत्य मान लिया जाता है, तब अंतरराष्ट्रीय तनाव और संघर्ष उत्पन्न होने की संभावना बढ़ जाती है।
राष्ट्रीय हित अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणाओं में से एक है। सामान्य अर्थ में राष्ट्रीय हित उन उद्देश्यों, आवश्यकताओं और मूल्यों का समूह है जिनकी रक्षा और उन्नति के लिए कोई राज्य अपनी विदेश नीति का निर्माण करता है। प्रत्येक राज्य अपनी संप्रभुता, सुरक्षा, आर्थिक विकास, राजनीतिक स्थिरता, सांस्कृतिक पहचान तथा अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को सुरक्षित रखने का प्रयास करता है। यही तत्व मिलकर उसके राष्ट्रीय हित का निर्माण करते हैं। राष्ट्रीय हित स्थिर भी हो सकते हैं और समय तथा परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित भी हो सकते हैं।
राष्ट्रीय हित का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष राष्ट्रीय सुरक्षा है। किसी भी राज्य का पहला कर्तव्य अपने क्षेत्र, जनसंख्या और राजनीतिक स्वतंत्रता की रक्षा करना होता है। इसलिए रक्षा नीति, सैन्य तैयारी, सीमाओं की सुरक्षा, आतंकवाद से मुकाबला तथा सामरिक साझेदारी राष्ट्रीय हित के प्रमुख आयाम हैं। आधुनिक समय में सुरक्षा की अवधारणा केवल सैन्य सुरक्षा तक सीमित नहीं रही है। आर्थिक सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, जल सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, पर्यावरणीय सुरक्षा तथा स्वास्थ्य सुरक्षा भी राष्ट्रीय हित के महत्वपूर्ण अंग बन चुके हैं।
राष्ट्रीय हित का दूसरा प्रमुख आयाम आर्थिक विकास है। प्रत्येक राज्य अपने नागरिकों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाने, व्यापार का विस्तार करने, निवेश आकर्षित करने, तकनीकी प्रगति प्राप्त करने तथा प्राकृतिक संसाधनों का प्रभावी उपयोग करने का प्रयास करता है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग, मुक्त व्यापार समझौते तथा वैश्विक निवेश नीतियाँ इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपनाई जाती हैं। आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था में आर्थिक शक्ति किसी भी राज्य के राष्ट्रीय हित का केंद्रीय आधार बन चुकी है।
राष्ट्रीय हित का तीसरा आयाम राजनीतिक और कूटनीतिक प्रभाव है। प्रत्येक राज्य चाहता है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी प्रतिष्ठा बढ़े और उसकी विदेश नीति को सम्मान मिले। इसके लिए राज्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों में सक्रिय भागीदारी करते हैं, क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देते हैं तथा सांस्कृतिक और सार्वजनिक कूटनीति का उपयोग करते हैं। विज्ञान, शिक्षा, संस्कृति, खेल, तकनीक और मानवीय सहायता भी आज राष्ट्रीय प्रभाव बढ़ाने के महत्वपूर्ण साधन बन चुके हैं।
राष्ट्रीय हित का स्वरूप परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता है। कुछ हित स्थायी होते हैं, जैसे राष्ट्रीय स्वतंत्रता, क्षेत्रीय अखंडता और सुरक्षा। कुछ हित अस्थायी होते हैं, जैसे किसी विशेष व्यापारिक समझौते, क्षेत्रीय विवाद या सामरिक गठबंधन से जुड़े उद्देश्य। विदेश नीति का निर्माण करते समय सरकारें इन दोनों प्रकार के हितों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती हैं।
राष्ट्रीय हित की अवधारणा की आलोचना भी की गई है। अनेक विद्वानों का मत है कि राष्ट्रीय हित की कोई सार्वभौमिक और निश्चित परिभाषा नहीं है क्योंकि विभिन्न सरकारें अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं के अनुसार इसकी अलग-अलग व्याख्या कर सकती हैं। कई बार राष्ट्रीय हित के नाम पर विस्तारवाद, सैन्य हस्तक्षेप या आक्रामक नीतियों को भी उचित ठहराया जाता है। इसलिए आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह आवश्यक माना जाता है कि राष्ट्रीय हित का निर्धारण केवल शासन की इच्छा के आधार पर नहीं, बल्कि संविधान, लोकतांत्रिक मूल्यों, अंतरराष्ट्रीय कानून और जनहित के अनुरूप किया जाए।
तृतीय विश्व की अवधारणा आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति और विकास अध्ययन का एक महत्वपूर्ण विषय है। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अनेक देशों ने उपनिवेशवादी शासन से स्वतंत्रता प्राप्त की। इन देशों का अधिकांश भाग आर्थिक रूप से अविकसित, औद्योगिक दृष्टि से कमजोर तथा सामाजिक दृष्टि से अनेक चुनौतियों से घिरा हुआ था। शीत युद्ध के दौरान विश्व को सामान्यतः तीन भागों में विभाजित किया गया। पहला विश्व उन विकसित पूँजीवादी देशों का समूह था जो पश्चिमी गुट से जुड़े थे। दूसरा विश्व समाजवादी देशों का समूह था। इन दोनों से अलग जो नवस्वतंत्र, विकासशील और अपेक्षाकृत निर्धन देश थे, उन्हें तृतीय विश्व कहा गया। यद्यपि आज शीत युद्ध समाप्त हो चुका है और यह वर्गीकरण पहले जैसा प्रचलित नहीं है, फिर भी विकासशील देशों की समस्याओं को समझाने के लिए तृतीय विश्व की अवधारणा का ऐतिहासिक महत्व बना हुआ है।
तृतीय विश्व के देशों की कुछ सामान्य विशेषताएँ रही हैं। इनमें औपनिवेशिक शोषण की ऐतिहासिक विरासत, आर्थिक अविकास, कृषि पर अत्यधिक निर्भरता, सीमित औद्योगिकीकरण, गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, जनसंख्या वृद्धि, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ तथा आधारभूत संरचना की कमी प्रमुख थीं। इन देशों में लोकतांत्रिक संस्थाएँ भी कई बार अपेक्षाकृत कमजोर थीं और राजनीतिक अस्थिरता, सैन्य हस्तक्षेप तथा प्रशासनिक चुनौतियाँ भी देखने को मिलीं।
तृतीय विश्व की सबसे महत्वपूर्ण समस्या आर्थिक अविकास रही है। अनेक देशों की अर्थव्यवस्था लंबे समय तक प्राथमिक उत्पादों के निर्यात पर निर्भर रही, जबकि औद्योगिक वस्तुओं और आधुनिक तकनीक के लिए उन्हें विकसित देशों पर निर्भर रहना पड़ा। इससे व्यापार असंतुलन, विदेशी ऋण तथा आर्थिक निर्भरता जैसी समस्याएँ उत्पन्न हुईं। वैश्वीकरण के दौर में भी अनेक विकासशील देशों को असमान व्यापारिक शर्तों, निवेश की कमी और तकनीकी पिछड़ेपन का सामना करना पड़ता है।
गरीबी और आय की असमानता तृतीय विश्व की दूसरी बड़ी चुनौती रही है। आर्थिक विकास की धीमी गति के कारण बड़ी संख्या में लोग शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ जल, आवास और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहे। अनेक देशों में आर्थिक विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुँच सका, जिसके कारण सामाजिक असमानताएँ बनी रहीं।
जनसंख्या वृद्धि भी अनेक विकासशील देशों के लिए गंभीर चुनौती रही है। तीव्र जनसंख्या वृद्धि के कारण शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, खाद्य सुरक्षा तथा प्राकृतिक संसाधनों पर अत्यधिक दबाव पड़ा। शहरीकरण की तेज गति ने झुग्गी बस्तियों, प्रदूषण, यातायात और आधारभूत सुविधाओं की कमी जैसी नई समस्याओं को जन्म दिया।
राजनीतिक अस्थिरता तृतीय विश्व की एक अन्य महत्वपूर्ण समस्या रही है। कई देशों में लोकतांत्रिक संस्थाओं का विकास धीमा रहा, जिसके कारण सैन्य शासन, तख्तापलट, गृहयुद्ध, जातीय संघर्ष तथा राजनीतिक हिंसा जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं। प्रशासनिक भ्रष्टाचार, कमजोर न्याय व्यवस्था तथा सुशासन की कमी ने भी विकास की गति को प्रभावित किया।
शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ भी तृतीय विश्व की प्रमुख समस्याओं में शामिल रही हैं। सीमित संसाधनों के कारण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ सभी नागरिकों तक समान रूप से उपलब्ध नहीं हो सकीं। अशिक्षा और कुपोषण ने मानव संसाधन विकास को प्रभावित किया तथा आर्थिक प्रगति की संभावनाओं को सीमित किया।
पर्यावरणीय समस्याएँ भी विकासशील देशों के लिए गंभीर चुनौती बन गई हैं। जलवायु परिवर्तन, जल संकट, वनों की कटाई, प्रदूषण, भूमि क्षरण तथा प्राकृतिक आपदाओं का प्रभाव इन देशों पर अपेक्षाकृत अधिक पड़ता है क्योंकि इनके पास अनुकूलन के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होते। इसलिए सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण आज तृतीय विश्व के देशों की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तृतीय विश्व के देशों ने अपने साझा हितों की रक्षा के लिए अनेक प्रयास किए। गुटनिरपेक्ष आंदोलन, दक्षिण-दक्षिण सहयोग, समूह-77 तथा अन्य क्षेत्रीय संगठनों के माध्यम से इन देशों ने आर्थिक न्याय, नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था, तकनीकी सहयोग तथा वैश्विक संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व की माँग की। इन प्रयासों का उद्देश्य वैश्विक असमानताओं को कम करना और विकासशील देशों की सामूहिक आवाज़ को मजबूत बनाना था।
इक्कीसवीं शताब्दी में तृतीय विश्व की अवधारणा का स्वरूप भी परिवर्तित हुआ है। अनेक विकासशील देशों ने तीव्र आर्थिक विकास, औद्योगिकीकरण, तकनीकी प्रगति तथा वैश्विक व्यापार में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। कुछ देश उभरती हुई आर्थिक शक्तियों के रूप में स्थापित हुए हैं। फिर भी गरीबी, असमानता, जलवायु परिवर्तन, ऋण संकट, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासन तथा तकनीकी विषमता जैसी समस्याएँ अभी भी अनेक विकासशील देशों के सामने मौजूद हैं। इसलिए आज तृतीय विश्व की अवधारणा को केवल आर्थिक पिछड़ेपन के बजाय विकास की विविध अवस्थाओं और वैश्विक असमानताओं के संदर्भ में समझा जाता है।
विचारधारा, राष्ट्रीय हित और तृतीय विश्व की अवधारणाएँ एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। किसी भी विकासशील देश की विदेश नीति उसकी वैचारिक प्रतिबद्धताओं, राष्ट्रीय हितों और विकास संबंधी आवश्यकताओं के आधार पर निर्मित होती है। राष्ट्रीय हित की रक्षा करते हुए भी अनेक देश अंतरराष्ट्रीय सहयोग, दक्षिण-दक्षिण साझेदारी, क्षेत्रीय एकीकरण तथा वैश्विक संस्थाओं में सुधार की दिशा में कार्य करते हैं। इसी प्रकार विचारधारा भी यह निर्धारित करती है कि कोई राज्य वैश्विक आर्थिक व्यवस्था, मानवाधिकार, लोकतंत्र, पर्यावरण तथा सुरक्षा संबंधी प्रश्नों पर किस प्रकार की नीति अपनाएगा।
समग्र रूप से विचारधारा, राष्ट्रीय हित तथा तृतीय विश्व की अवधारणा आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन के तीन अत्यंत महत्वपूर्ण आधार हैं। विचारधारा राज्यों को वैचारिक दिशा प्रदान करती है, राष्ट्रीय हित विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय व्यवहार का मूल प्रेरक तत्व होता है तथा तृतीय विश्व की अवधारणा वैश्विक असमानताओं, विकास की चुनौतियों और नवस्वतंत्र देशों की समस्याओं को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम है। समकालीन विश्व में वैश्वीकरण, तकनीकी क्रांति, जलवायु परिवर्तन, आर्थिक परस्पर निर्भरता और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के उदय के बावजूद इन तीनों अवधारणाओं की प्रासंगिकता बनी हुई है। इनके समन्वित अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल शक्ति और संघर्ष का क्षेत्र नहीं है, बल्कि विचारों, हितों, विकास, सहयोग और वैश्विक न्याय की निरंतर विकसित होती प्रक्रिया भी है।
