Unit – 5
Party System, Pressure Groups, Public Opinion, Electoral System, Election
Commission, Electoral Reforms, Voting Behavior.
दल प्रणाली, दबाव समूह, जनमत, निर्वाचन प्रणाली, निर्वाचन आयोग, निर्वाचन सुधार तथा मतदान व्यवहार।
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का मूल आधार जनता की संप्रभुता, राजनीतिक सहभागिता, उत्तरदायी शासन तथा जनप्रतिनिधित्व पर आधारित होता है। लोकतंत्र तभी सफल माना जाता है जब नागरिक केवल मतदान तक सीमित न रहें, बल्कि राजनीतिक प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से भाग लें। इस व्यापक राजनीतिक प्रक्रिया को संचालित करने में दल प्रणाली, दबाव समूह, जनमत, निर्वाचन प्रणाली, निर्वाचन आयोग, निर्वाचन सुधार तथा मतदान व्यवहार की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ये सभी संस्थाएँ और प्रक्रियाएँ मिलकर लोकतंत्र को जीवंत, उत्तरदायी और गतिशील बनाती हैं। आधुनिक राजनीतिक विज्ञान में इनका अध्ययन केवल संस्थागत दृष्टि से नहीं किया जाता, बल्कि सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक तथा व्यवहारवादी दृष्टिकोण से भी किया जाता है, क्योंकि लोकतंत्र की सफलता इन सभी तत्वों के संतुलित संचालन पर निर्भर करती है।
दल प्रणाली किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का संगठनात्मक आधार होती है। राजनीतिक दल ऐसे संगठित समूह होते हैं जो समान राजनीतिक विचारधारा, नीतियों और कार्यक्रमों के आधार पर जनता का समर्थन प्राप्त कर शासन की शक्ति हासिल करने तथा सार्वजनिक नीतियों को लागू करने का प्रयास करते हैं। लोकतांत्रिक शासन में राजनीतिक दल जनता और सरकार के बीच एक सशक्त सेतु का कार्य करते हैं। वे नागरिकों की आकांक्षाओं, समस्याओं और अपेक्षाओं को राजनीतिक कार्यक्रमों में परिवर्तित करते हैं तथा शासन की नीतियों को जनता तक पहुँचाते हैं। राजनीतिक दलों के बिना प्रतिनिधिक लोकतंत्र की कल्पना लगभग असंभव मानी जाती है क्योंकि चुनाव, सरकार का गठन, विपक्ष की भूमिका तथा सार्वजनिक नीति का निर्माण मुख्यतः राजनीतिक दलों के माध्यम से ही संपन्न होता है।
राजनीतिक दलों का विकास आधुनिक लोकतंत्र के विकास के साथ हुआ। प्रारंभिक काल में राजनीतिक दल सीमित अभिजात वर्ग का प्रतिनिधित्व करते थे, किंतु सार्वभौमिक मताधिकार, औद्योगिकीकरण, शिक्षा के विस्तार तथा राजनीतिक जागरूकता के कारण उनका स्वरूप व्यापक जनसंगठनों में परिवर्तित हो गया। आज राजनीतिक दल केवल चुनाव लड़ने वाली संस्थाएँ नहीं हैं, बल्कि वे राजनीतिक समाजीकरण, नेतृत्व निर्माण, नीति-निर्माण, जनमत निर्माण तथा लोकतांत्रिक संस्कृति के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
दल प्रणाली के अनेक प्रकार विकसित हुए हैं। एकदलीय व्यवस्था में केवल एक प्रमुख दल सत्ता का संचालन करता है और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा सीमित होती है। द्विदलीय व्यवस्था में दो प्रमुख दलों के बीच सत्ता का मुख्य संघर्ष होता है तथा शासन सामान्यतः इन्हीं दोनों दलों में से किसी एक द्वारा संचालित किया जाता है। बहुदलीय व्यवस्था में अनेक राजनीतिक दल सक्रिय रहते हैं और गठबंधन सरकारों की संभावना अधिक होती है। भारत बहुदलीय लोकतंत्र का प्रमुख उदाहरण है, जहाँ राष्ट्रीय, राज्य स्तरीय तथा क्षेत्रीय दल समान रूप से लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। भारतीय दल प्रणाली की विशेषता इसकी विविधता, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, सामाजिक समावेशन तथा गठबंधन राजनीति है।
भारतीय दल प्रणाली ने लोकतंत्र को व्यापक सामाजिक आधार प्रदान किया है। विभिन्न जातीय, भाषाई, धार्मिक, क्षेत्रीय तथा आर्थिक समूहों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रदान करने में राजनीतिक दलों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। साथ ही समय के साथ राजनीतिक दलों के समक्ष अनेक चुनौतियाँ भी उत्पन्न हुई हैं, जैसे आंतरिक लोकतंत्र का अभाव, व्यक्तिवादी नेतृत्व, परिवारवाद, वैचारिक अस्पष्टता, धनबल और बाहुबल का प्रभाव, चुनावी व्यय में वृद्धि, अवसरवादी गठबंधन तथा राजनीतिक भ्रष्टाचार। इन समस्याओं के कारण लोकतंत्र की गुणवत्ता प्रभावित होती है और राजनीतिक सुधारों की आवश्यकता महसूस की जाती है।
लोकतंत्र में केवल राजनीतिक दल ही नीति-निर्माण को प्रभावित नहीं करते, बल्कि अनेक सामाजिक, आर्थिक तथा व्यावसायिक संगठन भी सरकार के निर्णयों पर प्रभाव डालते हैं। ऐसे संगठनों को दबाव समूह कहा जाता है। दबाव समूह वे संगठित संगठन होते हैं जो स्वयं चुनाव लड़कर सत्ता प्राप्त करने का प्रयास नहीं करते, बल्कि सरकार की नीतियों, कानूनों तथा प्रशासनिक निर्णयों को अपने हितों अथवा व्यापक सामाजिक उद्देश्यों के अनुरूप प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। वे लोकतंत्र में नागरिक समाज की सक्रिय भूमिका का प्रतिनिधित्व करते हैं।
दबाव समूहों का उद्भव आधुनिक औद्योगिक समाज, आर्थिक विकास, सामाजिक विविधता तथा नागरिक स्वतंत्रताओं के विस्तार के साथ हुआ। श्रमिक संगठन, किसान संगठन, व्यापारिक संघ, उद्योग मंडल, शिक्षक संगठन, कर्मचारी संघ, महिला संगठन, पर्यावरण संरक्षण संगठन, उपभोक्ता संगठन, मानवाधिकार संस्थाएँ तथा विभिन्न व्यावसायिक संघ दबाव समूहों के प्रमुख उदाहरण हैं। इनका उद्देश्य किसी विशेष वर्ग अथवा व्यापक सामाजिक हितों की रक्षा करना होता है।
दबाव समूह अनेक संवैधानिक माध्यमों से सरकार को प्रभावित करते हैं। वे ज्ञापन प्रस्तुत करते हैं, जन-जागरूकता अभियान चलाते हैं, मीडिया के माध्यम से प्रचार करते हैं, विशेषज्ञ रिपोर्ट प्रस्तुत करते हैं, न्यायालयों का सहारा लेते हैं, शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते हैं तथा नीति-निर्माताओं के साथ संवाद स्थापित करते हैं। लोकतांत्रिक समाज में दबाव समूह शासन और समाज के बीच संवाद की प्रक्रिया को मजबूत बनाते हैं तथा सरकार को विभिन्न सामाजिक वर्गों की वास्तविक समस्याओं से परिचित कराते हैं।
दबाव समूह लोकतंत्र को अधिक सहभागी और उत्तरदायी बनाते हैं। वे नीति-निर्माण में विशेषज्ञता प्रदान करते हैं, नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाते हैं तथा शासन को जनहित के प्रति अधिक संवेदनशील बनाते हैं। अनेक सामाजिक सुधार, पर्यावरण संरक्षण संबंधी कानून, श्रमिक अधिकार, महिला सशक्तिकरण तथा उपभोक्ता संरक्षण संबंधी नीतियाँ दबाव समूहों की सक्रिय भूमिका के परिणामस्वरूप विकसित हुई हैं। किंतु यदि दबाव समूह केवल संकीर्ण स्वार्थों को प्राथमिकता दें अथवा आर्थिक शक्ति के बल पर नीति-निर्माण को प्रभावित करें, तो लोकतांत्रिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। इसलिए उनके कार्यों में पारदर्शिता और संवैधानिक मर्यादा का पालन आवश्यक माना जाता है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनमत को जनता की सामूहिक राजनीतिक चेतना का प्रतिबिंब माना जाता है। जनमत से आशय किसी सार्वजनिक प्रश्न, नीति अथवा राजनीतिक विषय पर समाज के बहुसंख्यक नागरिकों की विचारपूर्ण, तर्कसंगत और अपेक्षाकृत स्थायी सामूहिक राय से है। यह केवल व्यक्तिगत मतों का योग नहीं होता, बल्कि सामाजिक संवाद, राजनीतिक बहस, मीडिया, शिक्षा, अनुभव तथा सार्वजनिक विमर्श की प्रक्रिया के माध्यम से विकसित होने वाला सामूहिक दृष्टिकोण होता है।
जनमत का निर्माण अनेक कारकों से प्रभावित होता है। परिवार, शिक्षा, सामाजिक परिवेश, आर्थिक स्थिति, राजनीतिक दल, समाचार माध्यम, डिजिटल मीडिया, सामाजिक संगठन, धार्मिक संस्थाएँ तथा व्यक्तिगत अनुभव सभी जनमत के निर्माण में योगदान देते हैं। आधुनिक युग में इंटरनेट, सामाजिक मीडिया तथा डिजिटल संचार ने जनमत निर्माण की प्रक्रिया को अत्यधिक तीव्र और व्यापक बना दिया है। अब सूचना का प्रवाह अत्यंत तीव्र है, जिससे जनमत का निर्माण और परिवर्तन दोनों पहले की अपेक्षा अधिक तेज़ी से होने लगे हैं।
लोकतंत्र में जनमत का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि सरकार की वैधता अंततः जनता के विश्वास पर आधारित होती है। चुनावों में मतदाता अपने जनमत के आधार पर प्रतिनिधियों का चयन करते हैं। सरकारें नीतियों का निर्माण करते समय जनमत का ध्यान रखती हैं। यदि किसी नीति के प्रति व्यापक विरोध उत्पन्न हो जाए, तो सरकार को अपने निर्णयों में परिवर्तन करना पड़ सकता है। इस प्रकार जनमत लोकतांत्रिक नियंत्रण का प्रभावी माध्यम है और सरकार को जनता के प्रति उत्तरदायी बनाए रखता है।
स्वस्थ जनमत के निर्माण के लिए स्वतंत्र प्रेस, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, निष्पक्ष पत्रकारिता, राजनीतिक शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा तथ्यपरक सूचना आवश्यक है। यदि जनमत झूठी सूचनाओं, दुष्प्रचार, घृणा अभियान अथवा सांप्रदायिक प्रचार से प्रभावित हो जाए, तो लोकतांत्रिक निर्णय-निर्माण की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इसलिए सूचना की विश्वसनीयता और नागरिकों की राजनीतिक जागरूकता लोकतंत्र की सफलता के लिए अनिवार्य मानी जाती है।
लोकतंत्र में जनता की इच्छा को शासन में परिवर्तित करने का प्रमुख साधन निर्वाचन प्रणाली होती है। निर्वाचन प्रणाली से आशय उन संवैधानिक, विधिक तथा प्रशासनिक व्यवस्थाओं से है जिनके माध्यम से प्रतिनिधियों का चुनाव किया जाता है। निर्वाचन प्रणाली यह निर्धारित करती है कि मतदान कैसे होगा, मतों की गणना किस प्रकार होगी, प्रतिनिधियों का चयन किन सिद्धांतों के आधार पर किया जाएगा तथा चुनावी प्रक्रिया किस प्रकार संचालित होगी।
विश्व में अनेक प्रकार की निर्वाचन प्रणालियाँ प्रचलित हैं। बहुलता आधारित प्रणाली में सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाला उम्मीदवार निर्वाचित घोषित होता है। आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली में राजनीतिक दलों को प्राप्त मतों के अनुपात में प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाता है। कुछ देशों में मिश्रित प्रणाली अपनाई जाती है, जिसमें दोनों प्रणालियों के तत्व सम्मिलित होते हैं। प्रत्येक प्रणाली के अपने लाभ और सीमाएँ हैं तथा किसी देश की सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियाँ यह निर्धारित करती हैं कि कौन-सी प्रणाली उसके लिए अधिक उपयुक्त होगी।
भारत में लोकसभा और अधिकांश विधानसभाओं के चुनावों के लिए बहुलता आधारित निर्वाचन प्रणाली अपनाई गई है। इसमें जिस उम्मीदवार को किसी निर्वाचन क्षेत्र में सर्वाधिक वैध मत प्राप्त होते हैं, वही निर्वाचित घोषित होता है। यह प्रणाली सरल, कम खर्चीली तथा शीघ्र परिणाम देने वाली मानी जाती है, किंतु इसकी आलोचना इस आधार पर की जाती है कि कई बार निर्वाचित प्रतिनिधि को कुल मतों का आधे से भी कम समर्थन प्राप्त होता है।
भारतीय लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण विशेषता सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार है। प्रत्येक वयस्क भारतीय नागरिक को बिना किसी जातीय, धार्मिक, भाषाई, लैंगिक, शैक्षिक अथवा आर्थिक भेदभाव के मतदान का अधिकार प्राप्त है। यह व्यवस्था राजनीतिक समानता तथा लोकतांत्रिक सहभागिता का आधार है और भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक मानी जाती है।
भारतीय निर्वाचन प्रक्रिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने का दायित्व निर्वाचन आयोग पर है। निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है जिसका गठन संविधान के प्रावधानों के अनुसार किया गया है। इसका प्रमुख उद्देश्य स्वतंत्र, निष्पक्ष, पारदर्शी तथा विश्वसनीय चुनावों का संचालन करना है। लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि चुनाव निष्पक्ष हों और मतदाता बिना किसी भय, दबाव अथवा प्रलोभन के अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें।
निर्वाचन आयोग के प्रमुख कार्यों में मतदाता सूची तैयार करना और उसका समय-समय पर पुनरीक्षण करना, चुनाव कार्यक्रम की घोषणा करना, राजनीतिक दलों को मान्यता देना, चुनाव चिह्न आवंटित करना, आदर्श आचार संहिता का पालन सुनिश्चित करना, चुनावी व्यय की निगरानी करना, मतदान की व्यवस्था करना तथा मतगणना और परिणामों की घोषणा करना शामिल है। आयोग चुनाव प्रक्रिया में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों, सुरक्षा बलों तथा विभिन्न सरकारी एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित करता है।
समय के साथ लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचन सुधारों की आवश्यकता अनुभव की गई। लोकतंत्र की गुणवत्ता केवल नियमित चुनाव कराने से सुनिश्चित नहीं होती, बल्कि चुनाव प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी तथा निष्पक्ष बनाना भी आवश्यक होता है। निर्वाचन सुधारों का उद्देश्य चुनावों को धनबल, बाहुबल, अपराधीकरण, भ्रष्टाचार तथा अनुचित प्रभावों से मुक्त करना है।
भारत में अनेक महत्वपूर्ण निर्वाचन सुधार किए गए हैं। मतदाता पहचान पत्र की व्यवस्था, इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनों का उपयोग, मतदाता सत्यापन प्रणाली, चुनावी व्यय की सीमा, उम्मीदवारों के आपराधिक मामलों और संपत्ति का अनिवार्य प्रकटीकरण, आदर्श आचार संहिता का सख्त पालन, मतदाता जागरूकता अभियान तथा चुनावी प्रक्रिया का डिजिटलीकरण लोकतंत्र को अधिक पारदर्शी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। भविष्य में राजनीतिक दलों के वित्तपोषण में पारदर्शिता, आंतरिक लोकतंत्र, चुनावी व्यय के प्रभावी नियंत्रण तथा मतदाता शिक्षा को और अधिक सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता बनी हुई है।
मतदान व्यवहार राजनीतिक विज्ञान का एक महत्वपूर्ण अध्ययन क्षेत्र है। मतदान व्यवहार से आशय उन कारकों और परिस्थितियों के अध्ययन से है जो मतदाताओं के मतदान संबंधी निर्णयों को प्रभावित करते हैं। यह अध्ययन केवल इस बात तक सीमित नहीं होता कि मतदाता किसे वोट देता है, बल्कि यह भी समझने का प्रयास करता है कि वह किसी विशेष दल या उम्मीदवार को क्यों चुनता है।
मतदान व्यवहार अनेक कारकों से प्रभावित होता है। सामाजिक संरचना, जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्रीय पहचान, आर्थिक स्थिति, शिक्षा, आयु, लिंग, राजनीतिक विचारधारा, नेतृत्व का व्यक्तित्व, चुनावी घोषणापत्र, उम्मीदवार की छवि, सरकार का प्रदर्शन, मीडिया, सामाजिक मीडिया, स्थानीय समस्याएँ तथा राष्ट्रीय मुद्दे सभी मतदान व्यवहार को प्रभावित करते हैं। आधुनिक लोकतंत्र में मतदाता पहले की अपेक्षा अधिक जागरूक और विवेकपूर्ण होते जा रहे हैं, जिससे मतदान व्यवहार भी अधिक जटिल और बहुआयामी बन गया है।
भारत में मतदान व्यवहार का अध्ययन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ सामाजिक, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विविधता अत्यधिक व्यापक है। प्रारंभिक दशकों में जाति, धर्म तथा स्थानीय नेतृत्व का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक था, किंतु समय के साथ विकास, सुशासन, आर्थिक अवसर, शिक्षा, रोजगार, राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक कल्याण योजनाएँ तथा नेतृत्व की विश्वसनीयता जैसे कारकों का महत्व बढ़ा है। शहरीकरण, शिक्षा, सूचना प्रौद्योगिकी तथा डिजिटल संचार ने भी मतदान व्यवहार में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए हैं।
समकालीन लोकतांत्रिक राजनीति में सामाजिक मीडिया, डिजिटल प्रचार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा विश्लेषण तथा ऑनलाइन चुनाव अभियान ने दल प्रणाली, जनमत निर्माण और मतदान व्यवहार को नए आयाम प्रदान किए हैं। राजनीतिक दल अब मतदाताओं तक सीधे पहुँचने के लिए डिजिटल मंचों का उपयोग करते हैं। नागरिक भी विभिन्न डिजिटल माध्यमों से राजनीतिक जानकारी प्राप्त करते हैं। इसके साथ ही भ्रामक सूचनाओं, दुष्प्रचार, साइबर हस्तक्षेप तथा सूचना की विश्वसनीयता जैसी नई चुनौतियाँ भी सामने आई हैं, जिनसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
इन सभी अवधारणाओं का परस्पर घनिष्ठ संबंध है। राजनीतिक दल जनमत को संगठित करते हैं, दबाव समूह विशेष हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जनमत शासन को दिशा प्रदान करता है, निर्वाचन प्रणाली जनता की इच्छा को प्रतिनिधित्व में परिवर्तित करती है, निर्वाचन आयोग इस प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करता है, निर्वाचन सुधार लोकतंत्र को अधिक उत्तरदायी बनाते हैं तथा मतदान व्यवहार लोकतांत्रिक राजनीति की वास्तविक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों को प्रकट करता है। यदि इन सभी संस्थाओं का संचालन संवैधानिक मूल्यों, पारदर्शिता, नैतिकता और जनहित के अनुरूप हो, तो लोकतंत्र अधिक सशक्त, उत्तरदायी और स्थिर बनता है।
समग्र रूप से दल प्रणाली, दबाव समूह, जनमत, निर्वाचन प्रणाली, निर्वाचन आयोग, निर्वाचन सुधार तथा मतदान व्यवहार आधुनिक लोकतांत्रिक शासन के ऐसे परस्पर पूरक आयाम हैं जो लोकतंत्र को केवल शासन की व्यवस्था न बनाकर एक सतत सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक प्रक्रिया में परिवर्तित करते हैं। ये नागरिकों को शासन में सक्रिय भागीदारी का अवसर प्रदान करते हैं, सरकार को उत्तरदायी बनाए रखते हैं, सार्वजनिक नीतियों को जनोन्मुख बनाते हैं तथा संविधान में निहित लोकतंत्र, समानता, स्वतंत्रता और न्याय के आदर्शों को व्यवहारिक रूप प्रदान करते हैं। इसी कारण इन अवधारणाओं का गहन अध्ययन केवल राजनीतिक विज्ञान की शैक्षणिक आवश्यकता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक समाज की कार्यप्रणाली, राजनीतिक संस्कृति और सुशासन की व्यापक समझ का आधार भी है।
