Unit – 2
Humanist and Sarvodayist : Mahatma Gandhi, Jai Prakash Narayan.
मानवतावादी एवं सर्वोदयवादी: महात्मा गांधी और जयप्रकाश नारायण।
मानवतावादी एवं सर्वोदयवादी राजनीतिक चिंतन आधुनिक भारतीय राजनीतिक दर्शन की ऐसी विशिष्ट धारा है जिसमें मनुष्य को सामाजिक, नैतिक, आध्यात्मिक और राजनीतिक जीवन का केंद्र माना गया है। इस विचारधारा का मूल उद्देश्य केवल राज्य की शक्ति का विस्तार या आर्थिक समृद्धि प्राप्त करना नहीं है, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के सर्वांगीण विकास, समाज में न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना, नैतिक मूल्यों की रक्षा, शोषण और हिंसा का अंत तथा समस्त मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करना है। मानवतावादी और सर्वोदयवादी चिंतन का सबसे सशक्त प्रतिपादन महात्मा गांधी और जयप्रकाश नारायण ने किया। दोनों विचारकों ने अपने-अपने समय की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों का विश्लेषण करते हुए ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था की कल्पना प्रस्तुत की जिसमें सत्ता का केंद्रीकरण न्यूनतम हो, व्यक्ति की गरिमा सर्वोपरि हो, समाज नैतिक मूल्यों पर आधारित हो तथा लोकतंत्र केवल राजनीतिक व्यवस्था न रहकर जीवन-पद्धति के रूप में विकसित हो। यद्यपि दोनों विचारकों की कार्यशैली और ऐतिहासिक परिस्थितियाँ अलग थीं, फिर भी उनके चिंतन में मानव-मर्यादा, सत्य, अहिंसा, सामाजिक न्याय, ग्राम स्वराज, विकेंद्रीकरण, नैतिक राजनीति तथा जनसहभागिता के मूल तत्व समान रूप से विद्यमान हैं।
महात्मा गांधी का मानवतावादी और सर्वोदयवादी चिंतन भारतीय संस्कृति, वैदिक दर्शन, उपनिषदों, भगवद्गीता, जैन और बौद्ध परंपराओं, ईसाई नैतिकता तथा आधुनिक उदार और नैतिक विचारों के समन्वय से विकसित हुआ। गांधीजी का विश्वास था कि प्रत्येक मनुष्य में दिव्यता विद्यमान है और इसलिए सभी मनुष्य समान सम्मान, समान अवसर और समान गरिमा के अधिकारी हैं। उनके लिए राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं थी, बल्कि सत्य, नैतिकता और लोककल्याण की स्थापना का साधन थी। उन्होंने कहा कि यदि राजनीति नैतिकता से अलग हो जाए तो वह समाज के लिए विनाशकारी सिद्ध होती है। इसलिए उन्होंने सार्वजनिक जीवन में सत्य, अहिंसा, आत्मसंयम, सेवा, करुणा और उत्तरदायित्व जैसे मूल्यों को अनिवार्य माना।
गांधीजी के मानवतावाद का आधार व्यक्ति की गरिमा और आत्मनिर्भरता था। उनका मानना था कि मनुष्य केवल आर्थिक प्राणी नहीं है, बल्कि वह नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक चेतना से युक्त एक संपूर्ण व्यक्तित्व है। इसलिए किसी भी राजनीतिक या आर्थिक व्यवस्था का मूल्यांकन इस आधार पर किया जाना चाहिए कि वह व्यक्ति के नैतिक विकास, स्वतंत्रता और आत्मसम्मान को कितना प्रोत्साहित करती है। उन्होंने ऐसे समाज की कल्पना की जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार कार्य करने तथा सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर प्राप्त हो।
गांधीजी के चिंतन में सर्वोदय की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है। सर्वोदय का शाब्दिक अर्थ है “सभी का उदय” अथवा “सभी का कल्याण”। गांधीजी ने इस विचार को केवल आर्थिक समृद्धि तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे सामाजिक, नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विकास से जोड़ा। उनके अनुसार समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब सबसे कमजोर, सबसे गरीब और सबसे उपेक्षित व्यक्ति का जीवन बेहतर बने। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि विकास का मूल्यांकन समाज के सबसे संपन्न वर्ग की प्रगति से नहीं, बल्कि अंतिम व्यक्ति के कल्याण से किया जाना चाहिए। यही विचार आगे चलकर अंत्योदय तथा समावेशी विकास जैसी अवधारणाओं के लिए प्रेरणास्रोत बना।
सत्य और अहिंसा गांधीजी के संपूर्ण राजनीतिक दर्शन के आधार हैं। उनके अनुसार सत्य केवल बौद्धिक अवधारणा नहीं, बल्कि जीवन का सर्वोच्च नैतिक आदर्श है। अहिंसा सत्य की प्राप्ति का सबसे प्रभावी साधन है। गांधीजी का विश्वास था कि स्थायी सामाजिक परिवर्तन हिंसा के माध्यम से नहीं, बल्कि नैतिक शक्ति, आत्मबल, संवाद और जनजागरण के माध्यम से ही संभव है। उन्होंने सत्याग्रह की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसके माध्यम से अन्यायपूर्ण व्यवस्थाओं का शांतिपूर्ण और नैतिक प्रतिरोध किया जा सकता है। सत्याग्रह का उद्देश्य विरोधी का विनाश नहीं, बल्कि उसके हृदय परिवर्तन द्वारा न्यायपूर्ण समाधान प्राप्त करना है।
गांधीजी ने राज्य की शक्ति के अत्यधिक केंद्रीकरण का विरोध किया। उनका मत था कि यदि राज्य अत्यधिक शक्तिशाली हो जाए तो वह व्यक्ति की स्वतंत्रता और समाज की रचनात्मक शक्ति को सीमित कर सकता है। इसलिए उन्होंने विकेंद्रीकृत लोकतंत्र और ग्राम स्वराज की अवधारणा प्रस्तुत की। उनके अनुसार प्रत्येक गाँव एक स्वायत्त इकाई होना चाहिए जो अपने स्थानीय संसाधनों, प्रशासन और विकास का संचालन स्वयं करे। ग्राम पंचायतें लोकतंत्र की वास्तविक आधारशिला हों और निर्णय प्रक्रिया में जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी सुनिश्चित हो। इस प्रकार गांधीजी का लोकतंत्र नीचे से ऊपर की ओर विकसित होने वाली व्यवस्था थी।
गांधीजी ने आर्थिक क्षेत्र में ट्रस्टीशिप का सिद्धांत प्रस्तुत किया। उनका मत था कि संपत्ति का अधिकार पूर्णतः निरंकुश नहीं होना चाहिए। जिन व्यक्तियों के पास अधिक धन और संसाधन हैं, उन्हें उन्हें समाज की धरोहर मानते हुए लोककल्याण के लिए उपयोग करना चाहिए। उन्होंने वर्ग-संघर्ष और हिंसक क्रांति के स्थान पर नैतिक उत्तरदायित्व, सामाजिक सहयोग और स्वैच्छिक समानता का समर्थन किया। यद्यपि इस सिद्धांत की व्यवहारिकता पर बहस हुई है, फिर भी इसने कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व तथा नैतिक अर्थव्यवस्था जैसे विचारों को महत्वपूर्ण प्रेरणा प्रदान की।
गांधीजी ने औद्योगीकरण की भी आलोचनात्मक समीक्षा की। वे मशीनों के पूर्ण विरोधी नहीं थे, किंतु उनका मत था कि ऐसी तकनीक और उद्योग जो बेरोजगारी, असमानता, पर्यावरणीय विनाश तथा मानवीय मूल्यों के ह्रास का कारण बनें, उन्हें प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कुटीर उद्योगों, स्वदेशी, स्थानीय उत्पादन तथा श्रम की गरिमा को विशेष महत्व दिया। उनका उद्देश्य ऐसी अर्थव्यवस्था का निर्माण करना था जो आत्मनिर्भर, न्यायपूर्ण और मानव-केंद्रित हो।
जयप्रकाश नारायण का राजनीतिक चिंतन प्रारंभ में समाजवाद से प्रभावित था, किंतु समय के साथ उन्होंने गांधीजी के सर्वोदय दर्शन को अपनाते हुए मानवतावादी लोकतंत्र की व्यापक अवधारणा विकसित की। उन्होंने यह अनुभव किया कि केवल राज्य-नियंत्रित समाजवाद या संसदीय लोकतंत्र समाज की सभी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता। इसलिए उन्होंने ऐसी व्यवस्था की कल्पना की जिसमें सत्ता का विकेंद्रीकरण, नैतिक नेतृत्व, जनसहभागिता और सामाजिक उत्तरदायित्व प्रमुख आधार हों।
जयप्रकाश नारायण ने लोकतंत्र को केवल चुनावों तक सीमित नहीं माना। उनका विश्वास था कि वास्तविक लोकतंत्र तब स्थापित होगा जब नागरिक निरंतर शासन प्रक्रिया में भाग लें, स्थानीय संस्थाएँ सशक्त हों और राजनीतिक सत्ता जनता के प्रति उत्तरदायी हो। उन्होंने दलविहीन लोकतंत्र की अवधारणा प्रस्तुत की। उनके अनुसार राजनीतिक दल अनेक बार समाज को विभाजित करते हैं, सत्ता संघर्ष को बढ़ावा देते हैं और जनहित के स्थान पर दलगत हितों को प्राथमिकता देते हैं। इसलिए उन्होंने ऐसे लोकतंत्र की कल्पना की जिसमें स्थानीय स्तर पर जनता प्रत्यक्ष रूप से निर्णय प्रक्रिया में भाग ले सके।
जयप्रकाश नारायण का सबसे प्रसिद्ध योगदान संपूर्ण क्रांति की अवधारणा है। उनका मत था कि केवल सरकार बदलने से समाज में वास्तविक परिवर्तन नहीं आता। यदि भ्रष्टाचार, असमानता, अन्याय, नैतिक पतन और प्रशासनिक अक्षमता बनी रहे तो राजनीतिक परिवर्तन अधूरा रहेगा। इसलिए उन्होंने सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक सभी क्षेत्रों में व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया। संपूर्ण क्रांति का उद्देश्य समाज की समग्र चेतना का विकास करना था ताकि नागरिक स्वयं परिवर्तन के सक्रिय भागीदार बन सकें।
जयप्रकाश नारायण ने सत्ता के विकेंद्रीकरण को लोकतंत्र की आत्मा माना। उनका विश्वास था कि जितनी अधिक शक्ति स्थानीय समुदायों, पंचायतों और जनसंस्थाओं के पास होगी, लोकतंत्र उतना ही प्रभावी और उत्तरदायी बनेगा। उन्होंने ग्राम स्वराज की गांधीवादी अवधारणा को आधुनिक लोकतांत्रिक संदर्भ में पुनर्व्याख्यायित किया और स्थानीय स्वशासन को राष्ट्रीय लोकतंत्र का आधार माना।
मानवतावाद के संदर्भ में जयप्रकाश नारायण का चिंतन व्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक समानता और नैतिक उत्तरदायित्व पर आधारित था। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि आर्थिक विकास तभी सार्थक है जब उसके साथ सामाजिक न्याय, मानवाधिकार और लोकतांत्रिक भागीदारी सुनिश्चित हो। उन्होंने युवाओं, छात्रों और नागरिक समाज की सक्रिय भूमिका पर विशेष बल दिया तथा लोकतंत्र को केवल सरकार का नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व माना।
गांधीजी और जयप्रकाश नारायण दोनों ने अहिंसक सामाजिक परिवर्तन का समर्थन किया। उनका विश्वास था कि हिंसा के माध्यम से प्राप्त परिवर्तन स्थायी नहीं होते और वे अंततः नए प्रकार के दमन को जन्म देते हैं। इसलिए उन्होंने संवाद, जनजागरण, नैतिक नेतृत्व, शिक्षा तथा जनसंगठन को परिवर्तन के प्रभावी साधन माना। दोनों विचारकों ने यह भी माना कि लोकतंत्र की सफलता केवल संवैधानिक संस्थाओं पर निर्भर नहीं करती, बल्कि नागरिकों के नैतिक चरित्र, सामाजिक उत्तरदायित्व और सक्रिय सहभागिता पर भी निर्भर करती है।
दोनों विचारकों के चिंतन में सामाजिक न्याय का विशेष महत्व है। उन्होंने जाति, अस्पृश्यता, आर्थिक असमानता, शोषण तथा सामाजिक भेदभाव का विरोध किया और समान अवसर, श्रम की गरिमा तथा कमजोर वर्गों के उत्थान को आवश्यक माना। गांधीजी ने हरिजन सेवा, ग्राम विकास और रचनात्मक कार्यक्रमों के माध्यम से सामाजिक समरसता स्थापित करने का प्रयास किया, जबकि जयप्रकाश नारायण ने सामाजिक आंदोलनों और लोकतांत्रिक जनसंगठनों के माध्यम से परिवर्तन का मार्ग अपनाया।
यद्यपि गांधीजी और जयप्रकाश नारायण के विचारों की व्यापक प्रशंसा हुई, फिर भी उनकी आलोचना भी की गई। कुछ विद्वानों का मत है कि गांधीजी की ग्राम स्वराज तथा ट्रस्टीशिप की अवधारणाएँ आधुनिक औद्योगिक और वैश्विक अर्थव्यवस्था में पूर्णतः व्यवहारिक नहीं हैं। इसी प्रकार दलविहीन लोकतंत्र की अवधारणा को भी कुछ राजनीतिक वैज्ञानिक आधुनिक प्रतिनिधिक लोकतंत्र की जटिलताओं के संदर्भ में कठिन मानते हैं। कुछ आलोचक यह भी कहते हैं कि नैतिक परिवर्तन पर अत्यधिक बल देने से संरचनात्मक आर्थिक समस्याओं का समाधान पर्याप्त रूप से नहीं हो पाता। दूसरी ओर उनके समर्थकों का तर्क है कि इन विचारकों ने राजनीति को नैतिक आधार प्रदान किया, लोकतंत्र को अधिक मानवीय बनाया और सत्ता के केंद्रीकरण के विरुद्ध नागरिक समाज की भूमिका को सशक्त किया।
समकालीन संदर्भ में गांधीजी और जयप्रकाश नारायण का चिंतन अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है। आज जब विश्व भ्रष्टाचार, राजनीतिक ध्रुवीकरण, आर्थिक असमानता, पर्यावरणीय संकट, उपभोक्तावाद, हिंसा तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास जैसी समस्याओं का सामना कर रहा है, तब सत्य, अहिंसा, नैतिक राजनीति, विकेंद्रीकरण, जनसहभागिता, सामाजिक न्याय और सर्वहित जैसे उनके विचार नई प्रेरणा प्रदान करते हैं। स्थानीय स्वशासन, सतत विकास, सहभागी लोकतंत्र, नागरिक समाज, पारदर्शिता और उत्तरदायी शासन की आधुनिक अवधारणाओं में उनके चिंतन की स्पष्ट प्रतिध्वनि दिखाई देती है।
समग्र रूप से कहा जा सकता है कि मानवतावादी एवं सर्वोदयवादी चिंतन भारतीय राजनीतिक दर्शन की एक ऐसी विशिष्ट धारा है जिसने राजनीति को केवल सत्ता और शासन की प्रक्रिया न मानकर मानव कल्याण, नैतिक उत्थान और सामाजिक न्याय का माध्यम माना। महात्मा गांधी ने सत्य, अहिंसा, सर्वोदय, ग्राम स्वराज, ट्रस्टीशिप और नैतिक राजनीति के माध्यम से एक ऐसे समाज की परिकल्पना की जिसमें प्रत्येक व्यक्ति सम्मान, स्वतंत्रता और समान अवसर के साथ जीवन व्यतीत कर सके। जयप्रकाश नारायण ने इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए संपूर्ण क्रांति, दलविहीन लोकतंत्र, विकेंद्रीकरण और जनशक्ति के माध्यम से लोकतंत्र को अधिक सहभागी, उत्तरदायी और मानवीय बनाने का प्रयास किया। दोनों विचारकों का चिंतन आज भी भारतीय लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, नागरिक समाज, सुशासन तथा मानवीय विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण वैचारिक आधार प्रदान करता है और आधुनिक राजनीतिक चिंतन में उसका स्थायी स्थान बना हुआ है।
