Unit – 4
Value Pluralism and Open Society, I. Berlin and Karl Popper.
मूल्य बहुलतावाद एवं खुला समाज: आइज़ाया बर्लिन और कार्ल पॉपर।
मूल्य बहुलतावाद एवं खुला समाज समकालीन राजनीतिक दर्शन की दो अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं, जिन्होंने उदार लोकतंत्र, मानव स्वतंत्रता, सहिष्णुता, नागरिक अधिकारों तथा लोकतांत्रिक शासन की आधुनिक व्याख्या को गहराई से प्रभावित किया है। इन अवधारणाओं के प्रमुख प्रवर्तकों में आइज़ाया बर्लिन और कार्ल पॉपर का विशेष स्थान है। दोनों विचारकों ने बीसवीं शताब्दी के उन ऐतिहासिक अनुभवों का गहन विश्लेषण किया जिनमें फासीवाद, नाज़ीवाद, साम्यवाद की अधिनायकवादी प्रवृत्तियाँ, विश्वयुद्ध, राजनीतिक दमन तथा वैचारिक कट्टरता ने मानव स्वतंत्रता को गंभीर चुनौती दी। इन परिस्थितियों में उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि कोई भी समाज तभी न्यायपूर्ण, मानवीय और लोकतांत्रिक बन सकता है जब वह विचारों की विविधता, मानवीय स्वतंत्रता, असहमति के अधिकार तथा विवेकपूर्ण आलोचना को स्वीकार करे। उनके अनुसार किसी एक विचारधारा, धर्म, संस्कृति या राजनीतिक सिद्धांत को अंतिम सत्य मान लेना मानव स्वतंत्रता और लोकतंत्र दोनों के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। इसलिए उन्होंने बहुलता, सहिष्णुता, तर्कशीलता और खुले समाज की स्थापना को आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था का अनिवार्य आधार माना।
आइज़ाया बर्लिन का राजनीतिक दर्शन मुख्यतः स्वतंत्रता, मूल्य बहुलतावाद तथा उदार लोकतंत्र की रक्षा पर आधारित है। उनका मत था कि मानव जीवन अत्यंत जटिल है और मनुष्य अनेक प्रकार के मूल्यों, आदर्शों और लक्ष्यों के अनुसार अपना जीवन जीता है। सभी व्यक्तियों की आवश्यकताएँ, आकांक्षाएँ, सांस्कृतिक पृष्ठभूमियाँ तथा नैतिक प्राथमिकताएँ समान नहीं होतीं। इसलिए यह मान लेना कि संपूर्ण मानव समाज के लिए केवल एक ही सर्वोच्च मूल्य या एक ही आदर्श जीवन-पद्धति हो सकती है, वास्तविकता के विपरीत है। बर्लिन ने इसीलिए मूल्य बहुलतावाद की अवधारणा प्रस्तुत की।
मूल्य बहुलतावाद का अर्थ है कि मानव जीवन में अनेक मूल्य समान रूप से महत्वपूर्ण हो सकते हैं। स्वतंत्रता, समानता, न्याय, सुरक्षा, शांति, करुणा, परंपरा, रचनात्मकता, सामाजिक उत्तरदायित्व तथा व्यक्तिगत स्वायत्तता जैसे अनेक मूल्य मानव जीवन को दिशा प्रदान करते हैं। इनमें से प्रत्येक मूल्य अपने स्थान पर महत्वपूर्ण है, किंतु अनेक बार इनके बीच टकराव भी उत्पन्न हो सकता है। उदाहरण के लिए, पूर्ण स्वतंत्रता और पूर्ण समानता को एक साथ समान स्तर पर लागू करना हमेशा संभव नहीं होता। इसी प्रकार राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत गोपनीयता, सामाजिक व्यवस्था और व्यक्तिगत स्वतंत्रता या आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच भी संतुलन स्थापित करने की चुनौती रहती है। बर्लिन के अनुसार राजनीति का कार्य किसी एक मूल्य को सर्वोच्च घोषित करना नहीं, बल्कि इन विभिन्न मूल्यों के बीच विवेकपूर्ण संतुलन स्थापित करना है।
बर्लिन का मत था कि यदि कोई राज्य या विचारधारा यह दावा करे कि वही अंतिम सत्य की प्रतिनिधि है और उसी के आधार पर सम्पूर्ण समाज को संचालित किया जाना चाहिए, तो वह अनिवार्य रूप से अधिनायकवाद की ओर बढ़ेगी। इतिहास में अनेक तानाशाही व्यवस्थाओं ने इसी प्रकार अपने विचारों को पूर्ण सत्य घोषित कर नागरिक स्वतंत्रताओं का दमन किया। इसलिए उन्होंने वैचारिक विनम्रता, सहिष्णुता और विविधता को लोकतंत्र की आत्मा माना।
आइज़ाया बर्लिन का सबसे प्रसिद्ध योगदान सकारात्मक और नकारात्मक स्वतंत्रता का विश्लेषण है। नकारात्मक स्वतंत्रता से उनका आशय उस स्थिति से है जिसमें व्यक्ति पर अनावश्यक बाहरी नियंत्रण न हो और वह अपने जीवन के संबंध में स्वतंत्र निर्णय ले सके। सकारात्मक स्वतंत्रता का अर्थ है कि व्यक्ति अपनी वास्तविक क्षमता का विकास करने और अपने जीवन पर स्वयं नियंत्रण स्थापित करने में सक्षम हो। बर्लिन ने दोनों प्रकार की स्वतंत्रता को महत्वपूर्ण माना, किंतु उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि सकारात्मक स्वतंत्रता की अवधारणा का दुरुपयोग करके अनेक सरकारों ने नागरिकों पर यह कहकर नियंत्रण स्थापित किया कि वे जनता के वास्तविक हितों की रक्षा कर रही हैं। इस प्रकार उन्होंने व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा को लोकतांत्रिक समाज की प्राथमिक शर्त माना।
बर्लिन का उदारवाद व्यक्ति की गरिमा, नैतिक स्वायत्तता तथा विविध जीवन-पद्धतियों के सम्मान पर आधारित है। उनके अनुसार राज्य का कार्य नागरिकों को किसी विशेष जीवन-दर्शन को अपनाने के लिए बाध्य करना नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण उपलब्ध कराना है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपनी मान्यताओं के अनुसार जीवन व्यतीत कर सके, बशर्ते वह दूसरों की स्वतंत्रता का उल्लंघन न करे। इस प्रकार उनका राजनीतिक दर्शन आधुनिक उदार लोकतंत्र, बहुलवादी समाज तथा मानवाधिकारों के लिए मजबूत वैचारिक आधार प्रस्तुत करता है।
कार्ल पॉपर ने आधुनिक राजनीतिक दर्शन में खुला समाज की अवधारणा के माध्यम से अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका मानना था कि मानव समाज का विकास तभी संभव है जब उसमें विचारों की स्वतंत्रता, आलोचनात्मक चिंतन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा सत्ता की निरंतर समीक्षा की व्यवस्था हो। उन्होंने बंद समाज और खुले समाज के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित किया। बंद समाज वह है जहाँ परंपरा, धर्म, जाति, विचारधारा या सत्ता को प्रश्नों से ऊपर माना जाता है, जहाँ आलोचना को दमन किया जाता है और जहाँ नागरिकों की स्वतंत्रता सीमित होती है। इसके विपरीत खुला समाज वह है जहाँ प्रत्येक विचार की आलोचना की जा सकती है, सत्ता जनता के प्रति उत्तरदायी होती है और नागरिक स्वतंत्र रूप से अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं।
पॉपर का विश्वास था कि कोई भी व्यक्ति, संस्था या विचारधारा पूर्ण सत्य का दावा नहीं कर सकती। मानव ज्ञान सदैव अपूर्ण और संशोधन योग्य होता है। इसलिए वैज्ञानिक पद्धति की तरह राजनीति में भी आलोचना, परीक्षण और सुधार की प्रक्रिया निरंतर चलती रहनी चाहिए। यदि कोई शासन व्यवस्था स्वयं को त्रुटिहीन मान ले और आलोचना को अस्वीकार कर दे, तो वह शीघ्र ही अधिनायकवादी बन जाती है।
कार्ल पॉपर ने इतिहासवाद की भी आलोचना की। उनका मत था कि कुछ विचारधाराएँ यह दावा करती हैं कि इतिहास निश्चित नियमों के अनुसार चलता है और भविष्य पहले से निर्धारित है। ऐसी धारणाएँ राजनीतिक तानाशाही को वैधता प्रदान कर सकती हैं क्योंकि शासक यह कह सकते हैं कि वे इतिहास की अनिवार्य दिशा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। पॉपर ने इस दृष्टिकोण का विरोध करते हुए कहा कि मानव समाज का भविष्य खुला है और उसे मानव निर्णय, नैतिकता, वैज्ञानिक प्रगति तथा लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ निरंतर प्रभावित करती हैं। इसलिए भविष्य को किसी पूर्वनिर्धारित ऐतिहासिक नियम के आधार पर निश्चित नहीं माना जा सकता।
पॉपर ने लोकतंत्र की एक व्यावहारिक व्याख्या प्रस्तुत की। उनके अनुसार लोकतंत्र की श्रेष्ठता इस बात में नहीं है कि उसमें हमेशा सर्वश्रेष्ठ शासक चुने जाते हैं, बल्कि इस बात में है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता बिना हिंसा के अयोग्य या अलोकप्रिय सरकार को बदल सकती है। इस प्रकार लोकतंत्र का वास्तविक उद्देश्य सत्ता का शांतिपूर्ण परिवर्तन, नागरिक अधिकारों की रक्षा तथा सरकार की उत्तरदायित्वपूर्ण कार्यप्रणाली सुनिश्चित करना है।
पॉपर ने क्रमिक सामाजिक परिवर्तन का समर्थन किया। उनका मत था कि समाज में व्यापक क्रांतिकारी परिवर्तन अनेक बार अनपेक्षित दुष्परिणाम उत्पन्न करते हैं। इसलिए उन्होंने सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए छोटे-छोटे, परीक्षण योग्य और सुधारात्मक उपायों का समर्थन किया। इसे उन्होंने क्रमिक सामाजिक अभियांत्रिकी की संकल्पना के रूप में प्रस्तुत किया। उनके अनुसार लोकतांत्रिक समाज में नीतियों का निरंतर मूल्यांकन, आलोचना और संशोधन संभव होना चाहिए।
आइज़ाया बर्लिन और कार्ल पॉपर के विचारों में अनेक समानताएँ दिखाई देती हैं। दोनों विचारकों ने व्यक्ति की स्वतंत्रता को सर्वोच्च महत्व दिया। दोनों ने वैचारिक कट्टरता, सर्वसत्तावाद तथा किसी एक विचारधारा के प्रभुत्व का विरोध किया। दोनों का विश्वास था कि विविधता, सहिष्णुता और आलोचनात्मक विवेक के बिना लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता। दोनों ने इस बात पर बल दिया कि समाज में विभिन्न मतों, जीवन-पद्धतियों तथा मूल्यों का सम्मान किया जाना चाहिए और राज्य को नागरिकों पर किसी एक आदर्श जीवन-पद्धति को बलपूर्वक नहीं थोपना चाहिए।
इसके साथ ही दोनों विचारकों के दृष्टिकोण में कुछ महत्वपूर्ण अंतर भी हैं। बर्लिन का प्रमुख ध्यान नैतिक दर्शन, स्वतंत्रता तथा मूल्यों की बहुलता पर केंद्रित था, जबकि पॉपर का चिंतन विज्ञान-दर्शन, ज्ञानमीमांसा, लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा राजनीतिक व्यवस्था के आलोचनात्मक विश्लेषण पर अधिक आधारित था। बर्लिन यह स्पष्ट करते हैं कि मानव जीवन में अनेक मूल्य समान रूप से महत्वपूर्ण हैं और उनके बीच संतुलन आवश्यक है, जबकि पॉपर यह बताते हैं कि समाज को ऐसा खुला ढाँचा प्रदान किया जाना चाहिए जिसमें इन मूल्यों पर स्वतंत्र बहस और आलोचना संभव हो सके।
समकालीन विश्व में मूल्य बहुलतावाद और खुला समाज की अवधारणाएँ अत्यंत प्रासंगिक हो गई हैं। वैश्वीकरण, सांस्कृतिक विविधता, धार्मिक बहुलता, डिजिटल संचार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सोशल मीडिया, प्रवासन, पहचान की राजनीति तथा मानवाधिकारों से जुड़े नए प्रश्नों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक समाज केवल एकरूपता के आधार पर संचालित नहीं हो सकता। विभिन्न संस्कृतियों, भाषाओं, धर्मों, विचारधाराओं तथा जीवन-शैलियों वाले समाजों में लोकतांत्रिक स्थिरता तभी संभव है जब सभी को सम्मान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा समान नागरिक अधिकार प्राप्त हों। इस संदर्भ में बर्लिन का मूल्य बहुलतावाद और पॉपर का खुला समाज आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत वैचारिक आधार प्रदान करते हैं।
इन विचारों की आलोचना भी की गई है। कुछ विद्वानों का मत है कि अत्यधिक बहुलतावाद से समाज में साझा नैतिक आधार कमजोर पड़ सकता है और निर्णय-निर्माण कठिन हो सकता है। कुछ आलोचक यह भी कहते हैं कि खुला समाज अनेक बार ऐसी शक्तियों को भी स्वतंत्रता प्रदान कर देता है जो स्वयं लोकतांत्रिक मूल्यों का विरोध करती हैं। दूसरी ओर इनके समर्थकों का तर्क है कि लोकतंत्र का वास्तविक बल इसी में है कि वह असहमति, आलोचना और विविधता को स्वीकार करता है तथा कानून और संवैधानिक व्यवस्था के माध्यम से स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व के बीच संतुलन बनाए रखता है।
समग्र रूप से कहा जा सकता है कि आइज़ाया बर्लिन और कार्ल पॉपर ने आधुनिक राजनीतिक दर्शन को नई बौद्धिक दिशा प्रदान की। बर्लिन ने यह स्थापित किया कि मानव जीवन अनेक वैध मूल्यों से निर्मित होता है और किसी एक मूल्य को पूर्ण सत्य मानना स्वतंत्रता तथा लोकतंत्र के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता है। पॉपर ने यह प्रतिपादित किया कि खुला समाज, आलोचनात्मक विवेक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उत्तरदायी शासन ही स्थायी लोकतंत्र के आधार हैं। दोनों विचारकों ने यह स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक समाज की शक्ति उसकी विविधता, सहिष्णुता, आत्मालोचना तथा निरंतर सुधार की क्षमता में निहित है। उनके विचार आज भी संवैधानिक लोकतंत्र, मानवाधिकार, नागरिक स्वतंत्रता, बहुसांस्कृतिक समाज, सार्वजनिक नीति तथा समकालीन राजनीतिक चिंतन के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं और आधुनिक उदार लोकतांत्रिक परंपरा के प्रमुख वैचारिक स्तंभों के रूप में स्वीकार किए जाते हैं।
