Unit -02
Governments & System : Traditional systems of classifications,
Why classify political System?, Classical typologies, The three
words typology.
सरकारें एवं राजनीतिक व्यवस्थाएँ : वर्गीकरण की पारंपरिक प्रणालियाँ, राजनीतिक व्यवस्था का वर्गीकरण क्यों किया जाता है?,शास्त्रीय वर्गीकरण अथवा,तीन-विश्व वर्गीकरण
सरकारें एवं राजनीतिक व्यवस्थाएँ : वर्गीकरण की पारंपरिक प्रणालियाँ
राजनीति विज्ञान के अध्ययन में सरकार और राजनीतिक व्यवस्था का विशेष महत्व है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होने के कारण समाज में रहते हुए अपने सामूहिक जीवन को व्यवस्थित करने के लिए ऐसी संस्था की आवश्यकता महसूस करता है जो नियमों का निर्माण करे, उनका पालन सुनिश्चित करे, विवादों का समाधान करे तथा समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखे। इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए राज्य और सरकार जैसी राजनीतिक संस्थाओं का विकास हुआ। प्रत्येक समाज में शासन करने की पद्धति एक जैसी नहीं रही है। कहीं एक व्यक्ति के हाथों में सत्ता केंद्रित रही, कहीं कुछ विशेष लोगों ने शासन किया और कहीं व्यापक जनसमुदाय को शासन में भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ। इसी प्रकार किसी देश में राजा या सम्राट राज्य का प्रमुख रहा, तो किसी देश में निर्वाचित राष्ट्रपति या संसद शासन की प्रमुख संस्था बनी। इसलिए विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं को समझने के लिए उनका वर्गीकरण करना राजनीति विज्ञान की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता बन गया।
राजनीतिक व्यवस्था के वर्गीकरण का अर्थ विभिन्न राज्यों और सरकारों को उनकी समानताओं तथा भिन्नताओं के आधार पर अलग-अलग वर्गों या श्रेणियों में रखना है। इसका उद्देश्य केवल सरकारों को अलग-अलग नाम देना नहीं है, बल्कि यह पता लगाना है कि विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं की संरचना क्या है, उनमें सत्ता का वितरण किस प्रकार हुआ है, शासन में किस वर्ग या समूह की भूमिका है, जनता को कितनी राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त है और सरकार किस प्रकार निर्णय लेती है। राजनीतिक वर्गीकरण के माध्यम से राजनीति विज्ञान का विद्यार्थी यह समझ सकता है कि विभिन्न देशों की शासन-व्यवस्थाओं में कौन-सी समानताएँ हैं और किन आधारों पर वे एक-दूसरे से अलग हैं।
राजनीतिक व्यवस्थाओं के वर्गीकरण का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। प्राचीन यूनान में जब नगर-राज्यों का विकास हुआ तब राजनीतिक चिंतकों ने अलग-अलग प्रकार की सरकारों का प्रत्यक्ष अध्ययन किया। उस समय आज की तरह आधुनिक राष्ट्र-राज्य अस्तित्व में नहीं थे, बल्कि छोटे-छोटे नगर-राज्य राजनीतिक जीवन की मुख्य इकाइयाँ थे। इन नगर-राज्यों में शासन के विभिन्न रूप दिखाई देते थे। कहीं राजा शासन करता था, कहीं कुछ कुलीन परिवार सत्ता पर नियंत्रण रखते थे और कहीं नागरिकों की सभा राजनीतिक निर्णयों में भाग लेती थी। इन भिन्नताओं ने राजनीतिक विचारकों को सरकारों के स्वरूप के अध्ययन और वर्गीकरण के लिए प्रेरित किया।
इस दिशा में प्लेटो का योगदान महत्वपूर्ण माना जाता है। प्लेटो ने शासन-व्यवस्थाओं को उनके नैतिक और राजनीतिक चरित्र के आधार पर समझने का प्रयास किया। उन्होंने आदर्श शासन को दार्शनिकों के शासन के रूप में देखा और यह माना कि जब शासन करने वाले व्यक्ति निजी स्वार्थ के स्थान पर सार्वजनिक हित को महत्व देते हैं, तब शासन व्यवस्था श्रेष्ठ होती है। इसके विपरीत जब शासक सत्ता का उपयोग अपने व्यक्तिगत हितों की पूर्ति के लिए करने लगते हैं, तब शासन व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य से विचलित हो जाती है। प्लेटो का वर्गीकरण मुख्य रूप से राजनीतिक व्यवस्था के नैतिक पतन और उसके परिवर्तन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास था।
पारंपरिक राजनीतिक वर्गीकरण के क्षेत्र में अरस्तू का योगदान सबसे अधिक प्रभावशाली माना जाता है। अरस्तू ने विभिन्न शासन-व्यवस्थाओं का व्यवस्थित अध्ययन किया और उनके वर्गीकरण के लिए दो प्रमुख आधार अपनाए। पहला आधार था कि शासन में कितने लोग भाग लेते हैं और दूसरा आधार था कि शासन का उद्देश्य क्या है। उनके अनुसार शासन एक व्यक्ति के हाथ में हो सकता है, कुछ व्यक्तियों के हाथ में हो सकता है अथवा अनेक व्यक्तियों के हाथ में हो सकता है। लेकिन केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि शासन कितने लोगों द्वारा किया जा रहा है। यह भी देखना आवश्यक है कि शासक शासन का उपयोग किस उद्देश्य से कर रहे हैं। यदि शासन का उद्देश्य पूरे समाज का कल्याण है तो वह उचित शासन है और यदि शासक केवल अपने निजी हितों के लिए सत्ता का उपयोग करते हैं तो वह शासन का विकृत रूप है।
इसी आधार पर अरस्तू ने शासन के तीन शुद्ध रूप बताए—राजतंत्र, अभिजाततंत्र और पॉलिटी। राजतंत्र में एक व्यक्ति शासन करता है और यदि वह व्यक्ति राज्य के सामान्य हित में शासन करता है तो इसे उचित शासन माना जाता है। अभिजाततंत्र में कुछ योग्य और श्रेष्ठ व्यक्ति शासन करते हैं तथा उनका उद्देश्य सार्वजनिक हित की रक्षा करना होता है। पॉलिटी में अनेक नागरिक शासन में भाग लेते हैं और शासन का उद्देश्य सामान्य हित की प्राप्ति माना जाता है।
अरस्तू ने इन शासन-रूपों के विकृत स्वरूपों की भी चर्चा की। जब राजतंत्र का शासक सार्वजनिक हित के स्थान पर अपने निजी हित को सर्वोच्च मानने लगता है तो राजतंत्र निरंकुशतंत्र में बदल जाता है। इसी प्रकार जब कुछ श्रेष्ठ व्यक्तियों का शासन अपने वर्गीय या व्यक्तिगत हितों की रक्षा करने लगता है तो अभिजाततंत्र का स्थान कुलीनतंत्र या धनिकतंत्र ले लेता है। पॉलिटी का विकृत रूप अरस्तू ने लोकतंत्र को माना था। यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि अरस्तू का लोकतंत्र संबंधी विचार आधुनिक लोकतंत्र से भिन्न था। आधुनिक समय में लोकतंत्र को जनता की स्वतंत्रता, समानता, प्रतिनिधित्व और राजनीतिक सहभागिता से जोड़ा जाता है, जबकि अरस्तू अपने समय की सामाजिक परिस्थितियों में लोकतंत्र को बहुसंख्यक गरीब वर्ग के शासन के रूप में देखते थे।
अरस्तू का वर्गीकरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने पहली बार शासन के रूपों को केवल बाहरी स्वरूप से नहीं, बल्कि उनके उद्देश्य और कार्यप्रणाली के आधार पर भी समझने का प्रयास किया। उनके विचारों ने बाद के राजनीतिक चिंतकों को सरकारों के वर्गीकरण के लिए आधार प्रदान किया। हालांकि आधुनिक राजनीतिक व्यवस्थाएँ अरस्तू के समय की व्यवस्थाओं से बहुत अधिक जटिल हैं, फिर भी शासन करने वालों की संख्या तथा शासन के उद्देश्य को वर्गीकरण का आधार बनाने की उनकी पद्धति राजनीतिक चिंतन के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
समय के साथ राजनीतिक संस्थाओं और शासन प्रणालियों में परिवर्तन हुआ और सरकारों के वर्गीकरण के नए आधार सामने आए। मध्यकाल में राजतंत्र राजनीतिक व्यवस्था का प्रमुख स्वरूप रहा। राजा को शासन का केंद्र माना जाता था और सत्ता सामान्यतः वंशानुगत रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती थी। आधुनिक युग में जब पुनर्जागरण, धर्म-सुधार, प्रबोधन, लोकतांत्रिक विचार और राष्ट्रवाद का विकास हुआ, तब राजसत्ता की निरंकुशता को चुनौती मिलने लगी। जनता की राजनीतिक भागीदारी, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता और प्रतिनिधि संस्थाओं के विकास ने सरकार के नए स्वरूपों को जन्म दिया।
आधुनिक राजनीतिक चिंतन में सरकारों को राजतंत्र और गणतंत्र के रूप में भी वर्गीकृत किया गया। राजतंत्र में राज्य का प्रमुख सामान्यतः राजा या रानी होता है और उसका पद प्रायः वंशानुगत होता है। इसके विपरीत गणतंत्र में राज्य का प्रमुख जनता द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चुना जाता है। आधुनिक समय में ब्रिटेन जैसे देशों में संवैधानिक राजतंत्र पाया जाता है, जहाँ राजा या सम्राट राज्य का औपचारिक प्रमुख होता है, जबकि वास्तविक राजनीतिक सत्ता निर्वाचित सरकार के हाथ में होती है। दूसरी ओर भारत एक गणतांत्रिक व्यवस्था है, जहाँ राष्ट्रपति राष्ट्र का संवैधानिक प्रमुख होता है।
सरकारों के वर्गीकरण का एक महत्वपूर्ण आधार लोकतंत्र और गैर-लोकतंत्र भी है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता को शासन के निर्माण और संचालन में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से भाग लेने का अवसर मिलता है। जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है और सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी होती है। इसके विपरीत गैर-लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक सत्ता सीमित व्यक्तियों, किसी एक नेता, सैन्य समूह या किसी विशेष राजनीतिक संगठन के हाथों में केंद्रित हो सकती है। ऐसी व्यवस्थाओं में राजनीतिक स्वतंत्रता और जनता की भागीदारी सीमित हो सकती है।
आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था को समझने के लिए संसदीय और अध्यक्षात्मक सरकार का वर्गीकरण भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। संसदीय व्यवस्था में कार्यपालिका का राजनीतिक नेतृत्व सामान्यतः संसद में बहुमत प्राप्त दल या गठबंधन के हाथ में रहता है। प्रधानमंत्री सरकार का वास्तविक प्रमुख होता है और मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से संसद के प्रति उत्तरदायी होती है। भारत और ब्रिटेन इसके प्रमुख उदाहरण हैं। अध्यक्षात्मक व्यवस्था में राष्ट्रपति राज्य का प्रमुख होने के साथ-साथ सरकार का वास्तविक प्रमुख भी होता है। वह अपने मंत्रियों की नियुक्ति करता है और उसकी कार्यपालिका विधायिका के विश्वास पर उसी प्रकार निर्भर नहीं होती जिस प्रकार संसदीय व्यवस्था में मंत्रिपरिषद निर्भर होती है। संयुक्त राज्य अमेरिका अध्यक्षात्मक व्यवस्था का प्रमुख उदाहरण है।
इसी प्रकार राजनीतिक व्यवस्थाओं को एकात्मक और संघात्मक सरकारों में भी विभाजित किया जाता है। एकात्मक व्यवस्था में शासन की सर्वोच्च संवैधानिक शक्ति सामान्यतः केंद्रीय सरकार के पास रहती है और स्थानीय या क्षेत्रीय इकाइयों की शक्तियाँ केंद्र से प्राप्त होती हैं। संघात्मक व्यवस्था में संविधान द्वारा केंद्र तथा राज्यों या प्रांतों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया जाता है। दोनों स्तर की सरकारें अपने-अपने संवैधानिक क्षेत्र में कार्य करती हैं। भारत में संघात्मक विशेषताओं के साथ एक मजबूत केंद्र वाली व्यवस्था दिखाई देती है, जबकि अमेरिका को संघात्मक व्यवस्था का प्रमुख उदाहरण माना जाता है।
पारंपरिक वर्गीकरण का मुख्य आधार राजनीतिक संस्थाएँ और संवैधानिक संरचना रही हैं। इस दृष्टिकोण में यह देखा जाता था कि राज्य का प्रमुख कौन है, सरकार का निर्माण कैसे होता है, विधायिका और कार्यपालिका के बीच संबंध कैसे हैं तथा केंद्र और स्थानीय इकाइयों के बीच शक्ति का वितरण किस प्रकार हुआ है। इसलिए पारंपरिक वर्गीकरण को मुख्यतः संस्थागत और संवैधानिक दृष्टिकोण से जुड़ा हुआ माना जाता है।
हालाँकि केवल संवैधानिक संरचना के आधार पर राजनीतिक व्यवस्था को पूरी तरह समझना संभव नहीं है। दो देशों का संविधान देखने में समान हो सकता है, लेकिन व्यवहार में उनकी राजनीतिक व्यवस्थाएँ काफी अलग हो सकती हैं। किसी देश के संविधान में लोकतांत्रिक संस्थाओं की व्यवस्था हो सकती है, लेकिन यदि वहाँ राजनीतिक दल कमजोर हों, चुनाव स्वतंत्र न हों, नागरिक स्वतंत्रताएँ सीमित हों और सत्ता कुछ लोगों के हाथों में केंद्रित हो, तो केवल संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर उस व्यवस्था को समझना अधूरा होगा। इसी कारण आधुनिक तुलनात्मक राजनीति ने राजनीतिक संस्थाओं के साथ-साथ राजनीतिक व्यवहार, राजनीतिक संस्कृति, राजनीतिक दल, दबाव समूह, सामाजिक संरचना और जनसहभागिता को भी महत्व देना शुरू किया।
फिर भी राजनीतिक व्यवस्थाओं की पारंपरिक वर्गीकरण प्रणाली का महत्व समाप्त नहीं हुआ है। यह आधुनिक राजनीतिक अध्ययन की आधारभूत पृष्ठभूमि प्रदान करती है। राजतंत्र, गणतंत्र, लोकतंत्र, निरंकुशतंत्र, संसदीय व्यवस्था, अध्यक्षात्मक व्यवस्था, एकात्मक व्यवस्था और संघात्मक व्यवस्था जैसे वर्गीकरण आज भी राजनीतिक संस्थाओं को समझने में उपयोगी हैं। इन वर्गीकरणों के माध्यम से विद्यार्थी यह समझ पाता है कि किसी देश में राजनीतिक सत्ता का संगठन किस प्रकार हुआ है और शासन की प्रमुख संस्थाओं के बीच संबंध किस प्रकार स्थापित किए गए हैं।
अंततः कहा जा सकता है कि सरकारों एवं राजनीतिक व्यवस्थाओं का पारंपरिक वर्गीकरण राजनीति विज्ञान के विकास का एक महत्वपूर्ण चरण है। प्राचीन यूनानी विचारकों से प्रारंभ होकर आधुनिक संवैधानिक चिंतन तक सरकारों को विभिन्न आधारों पर वर्गीकृत किया गया। अरस्तू ने शासन करने वालों की संख्या और शासन के उद्देश्य को आधार बनाया, जबकि आधुनिक राजनीतिक चिंतकों ने राजतंत्र-गणतंत्र, लोकतंत्र-अलोकतंत्र, संसदीय-अध्यक्षात्मक तथा एकात्मक-संघात्मक जैसे आधार विकसित किए। इन वर्गीकरणों का मूल उद्देश्य राजनीतिक व्यवस्थाओं की प्रकृति, संरचना और कार्यप्रणाली को व्यवस्थित ढंग से समझना है। यद्यपि वर्तमान समय की राजनीतिक वास्तविकताएँ इतनी जटिल हो गई हैं कि किसी देश को केवल एक श्रेणी में रखकर उसकी संपूर्ण राजनीतिक व्यवस्था को समझना कठिन है, फिर भी पारंपरिक वर्गीकरण राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन की बुनियादी सीढ़ी के रूप में आज भी अत्यंत उपयोगी है।
राजनीतिक व्यवस्था का वर्गीकरण क्यों किया जाता है?
राजनीति विज्ञान में राजनीतिक व्यवस्था एक अत्यंत व्यापक और महत्वपूर्ण अवधारणा है। किसी भी समाज में राजनीतिक सत्ता का संगठन, उसका संचालन, निर्णय लेने की प्रक्रिया, शासन की संस्थाएँ, राजनीतिक दल, नागरिकों की भागीदारी तथा सरकार और जनता के बीच संबंध मिलकर राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण करते हैं। संसार के सभी देशों में राजनीतिक व्यवस्थाएँ एक जैसी नहीं हैं। प्रत्येक देश की ऐतिहासिक परिस्थितियाँ, सामाजिक संरचना, आर्थिक व्यवस्था, राजनीतिक संस्कृति, संविधान, शासन संस्थाएँ तथा राजनीतिक परंपराएँ अलग-अलग होती हैं। इसी कारण राजनीतिक वैज्ञानिकों के सामने यह आवश्यकता उत्पन्न हुई कि विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं को कुछ सामान्य विशेषताओं के आधार पर वर्गीकृत किया जाए।
राजनीतिक व्यवस्था के वर्गीकरण का सामान्य अर्थ है—दुनिया की विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं को उनकी समानताओं, भिन्नताओं, संरचना, कार्यप्रणाली और राजनीतिक व्यवहार के आधार पर अलग-अलग समूहों में रखना। इसका उद्देश्य केवल यह बताना नहीं है कि कोई व्यवस्था लोकतांत्रिक है या राजतंत्रीय, बल्कि यह समझना भी है कि उस व्यवस्था में सत्ता किसके पास है, सत्ता का प्रयोग किस प्रकार किया जाता है, राजनीतिक संस्थाएँ किस प्रकार कार्य करती हैं और नागरिकों को राजनीतिक प्रक्रिया में कितनी भागीदारी प्राप्त है।
सबसे पहले राजनीतिक व्यवस्था का वर्गीकरण इसलिए किया जाता है ताकि विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं को व्यवस्थित रूप से समझा जा सके। संसार में अनेक प्रकार की शासन-व्यवस्थाएँ हैं। यदि प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था का अध्ययन बिल्कुल अलग इकाई के रूप में किया जाए तो उनके बीच समानताओं और भिन्नताओं को समझना कठिन हो जाएगा। वर्गीकरण राजनीतिक वास्तविकताओं को कुछ सामान्य श्रेणियों में व्यवस्थित करता है। उदाहरण के लिए जब हम राजतंत्र, गणतंत्र, लोकतंत्र, अधिनायकवाद, संसदीय व्यवस्था, अध्यक्षात्मक व्यवस्था, एकात्मक व्यवस्था और संघात्मक व्यवस्था जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं, तो वास्तव में हम विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं की प्रमुख विशेषताओं को कुछ निश्चित श्रेणियों में समझने का प्रयास करते हैं।
राजनीतिक व्यवस्था के वर्गीकरण का दूसरा महत्वपूर्ण उद्देश्य तुलना को सरल बनाना है। राजनीति विज्ञान में तुलनात्मक अध्ययन का बहुत महत्व है। यदि हमें भारत और अमेरिका की राजनीतिक व्यवस्थाओं को समझना है तो हमें यह देखना होगा कि दोनों देशों में शासन की संस्थाएँ किस प्रकार कार्य करती हैं। दोनों देशों में लोकतांत्रिक शासन है, लेकिन भारत में संसदीय व्यवस्था है जबकि अमेरिका में अध्यक्षात्मक व्यवस्था है। इसी प्रकार दोनों देशों में संघात्मक विशेषताएँ हैं, लेकिन केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के संबंधों में अंतर दिखाई देता है। इस प्रकार वर्गीकरण के माध्यम से राजनीतिक व्यवस्थाओं की समानताओं और असमानताओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है।
वर्गीकरण का एक अन्य महत्वपूर्ण उद्देश्य राजनीतिक संस्थाओं की प्रकृति को समझना है। किसी राजनीतिक व्यवस्था को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि उसकी प्रमुख संस्थाएँ कौन-कौन-सी हैं और वे किस प्रकार कार्य करती हैं। विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, राजनीतिक दल, निर्वाचन प्रणाली और प्रशासनिक संस्थाएँ राजनीतिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग हैं। वर्गीकरण के माध्यम से यह पता लगाया जा सकता है कि अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं में इन संस्थाओं की भूमिका और शक्ति किस प्रकार अलग होती है।
उदाहरण के लिए संसदीय शासन में कार्यपालिका संसद के प्रति उत्तरदायी होती है, जबकि अध्यक्षात्मक शासन में कार्यपालिका का प्रमुख राष्ट्रपति होता है और उसका कार्यकाल सामान्यतः विधायिका के विश्वास पर निर्भर नहीं करता। इसी प्रकार संघात्मक व्यवस्था में केंद्र और राज्यों के बीच संवैधानिक शक्तियों का विभाजन होता है, जबकि एकात्मक व्यवस्था में केंद्रीय सत्ता की स्थिति अधिक प्रभावशाली होती है। इस प्रकार वर्गीकरण राजनीतिक संस्थाओं के आपसी संबंधों को समझने का आधार प्रदान करता है।
राजनीतिक व्यवस्था का वर्गीकरण सत्ता के स्वरूप और वितरण को समझने के लिए भी आवश्यक है। राजनीति का मूल प्रश्न सत्ता से जुड़ा हुआ है। यह जानना महत्वपूर्ण है कि किसी समाज में राजनीतिक शक्ति किस व्यक्ति, वर्ग, समूह या संस्था के पास है। कुछ व्यवस्थाओं में सत्ता एक व्यक्ति के हाथों में केंद्रित होती है, कुछ में सीमित समूह के हाथों में और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सत्ता के प्रयोग को व्यापक जनसहमति तथा संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से नियंत्रित किया जाता है। इसलिए वर्गीकरण से यह समझने में सहायता मिलती है कि किसी राजनीतिक व्यवस्था में सत्ता का केंद्रीकरण कितना है और उसका वितरण किस प्रकार किया गया है।
राजनीतिक वर्गीकरण लोकतांत्रिक और गैर-लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के बीच अंतर स्पष्ट करने में भी उपयोगी है। लोकतंत्र में जनता राजनीतिक सत्ता के निर्माण और परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, राजनीतिक दलों की प्रतिस्पर्धा, नागरिक स्वतंत्रता, कानून का शासन और सरकार की जवाबदेही लोकतांत्रिक व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ हैं। दूसरी ओर अधिनायकवादी व्यवस्था में राजनीतिक शक्ति सीमित व्यक्तियों या किसी विशेष समूह के हाथों में केंद्रित हो सकती है तथा नागरिकों की राजनीतिक स्वतंत्रता सीमित हो सकती है। इस अंतर को समझने के लिए वर्गीकरण एक उपयोगी साधन है।
राजनीतिक व्यवस्था का वर्गीकरण राजनीतिक विकास को समझने में भी सहायता करता है। कोई भी राजनीतिक व्यवस्था स्थिर और अपरिवर्तनशील नहीं होती। समय के साथ राजनीतिक संस्थाओं और राजनीतिक व्यवहार में परिवर्तन होता रहता है। अनेक देशों ने राजतंत्र से संवैधानिक शासन की ओर, औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्र शासन की ओर और गैर-लोकतांत्रिक शासन से लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर परिवर्तन किया है। राजनीतिक व्यवस्थाओं के वर्गीकरण से इस परिवर्तन की दिशा और प्रकृति को समझना आसान हो जाता है।
वर्गीकरण का महत्व राजनीतिक परिवर्तन और संक्रमण की प्रक्रिया को समझने में विशेष रूप से दिखाई देता है। जब किसी देश में राजनीतिक संकट उत्पन्न होता है तो यह देखना आवश्यक होता है कि उसकी राजनीतिक व्यवस्था किस प्रकार की है और उसमें परिवर्तन के कौन-से अवसर उपलब्ध हैं। उदाहरण के लिए किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता का परिवर्तन सामान्यतः चुनाव के माध्यम से होता है, जबकि किसी सैन्य शासन में सत्ता परिवर्तन अलग तरीके से हो सकता है। इसलिए राजनीतिक व्यवस्था का वर्गीकरण राजनीतिक परिवर्तन के स्वरूप को समझने में सहायता करता है।
राजनीतिक व्यवस्था का वर्गीकरण तुलनात्मक राजनीति के विकास का आधार भी है। तुलनात्मक राजनीति का उद्देश्य विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं का अध्ययन करके यह पता लगाना है कि उनकी राजनीतिक संस्थाएँ और प्रक्रियाएँ किस प्रकार कार्य करती हैं। यदि राजनीतिक व्यवस्थाओं का कोई वर्गीकरण न हो तो तुलनात्मक अध्ययन बहुत अधिक जटिल हो जाएगा। वर्गीकरण के माध्यम से समान प्रकृति वाले देशों को एक समूह में रखकर उनका अध्ययन किया जा सकता है और फिर उनके बीच मौजूद सूक्ष्म भिन्नताओं का विश्लेषण किया जा सकता है।
वर्गीकरण राजनीतिक व्यवस्था की विशेषताओं को पहचानने में भी सहायता करता है। किसी राजनीतिक व्यवस्था की कुछ विशिष्ट विशेषताएँ होती हैं, जैसे शासन में जनता की भागीदारी, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, सत्ता का केंद्रीकरण या विकेंद्रीकरण, संस्थाओं की स्वतंत्रता, राजनीतिक अधिकारों की स्थिति आदि। जब किसी व्यवस्था को किसी विशेष वर्ग में रखा जाता है तो उसके अध्ययन की प्रारंभिक दिशा स्पष्ट हो जाती है। इससे विद्यार्थी और शोधकर्ता दोनों के लिए राजनीतिक व्यवस्था को समझना सरल हो जाता है।
इसके अतिरिक्त राजनीतिक वर्गीकरण से राजनीतिक अवधारणाओं को स्पष्ट करने में सहायता मिलती है। राजनीति विज्ञान में लोकतंत्र, राजतंत्र, गणतंत्र, अधिनायकवाद, संसदीय शासन, अध्यक्षात्मक शासन, संघवाद आदि अनेक अवधारणाएँ हैं। इन अवधारणाओं के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करने के लिए वर्गीकरण आवश्यक है। उदाहरण के लिए लोकतंत्र और राजतंत्र को केवल राज्य के प्रमुख के आधार पर अलग नहीं किया जा सकता; इनके बीच जनता की भूमिका, सत्ता के स्रोत और शासन की वैधता के आधार पर भी अंतर होता है। वर्गीकरण इन अवधारणाओं की सीमाओं और विशेषताओं को स्पष्ट करता है।
राजनीतिक व्यवस्था का वर्गीकरण राजनीतिक समस्याओं के अध्ययन में भी उपयोगी होता है। अलग-अलग प्रकार की राजनीतिक व्यवस्थाओं में समस्याओं का स्वरूप अलग हो सकता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक अस्थिरता, दलगत प्रतिस्पर्धा, चुनावी राजनीति और जनमत से संबंधित समस्याएँ अधिक महत्वपूर्ण हो सकती हैं, जबकि अधिनायकवादी व्यवस्था में सत्ता के केंद्रीकरण, नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक दमन जैसी समस्याएँ प्रमुख हो सकती हैं। वर्गीकरण के माध्यम से इन समस्याओं को उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में समझा जा सकता है।
इसके साथ ही राजनीतिक वर्गीकरण नीति-निर्माण और शासन की कार्यप्रणाली को समझने में भी सहायक है। किसी देश में नीतियाँ कैसे बनती हैं, उनमें जनता और राजनीतिक दलों की भूमिका क्या है, विधायिका और कार्यपालिका के बीच किस प्रकार का संबंध है तथा प्रशासन किस प्रकार निर्णयों को लागू करता है—इन सभी प्रश्नों का अध्ययन राजनीतिक व्यवस्था के स्वरूप से जुड़ा होता है। इसलिए किसी राजनीतिक व्यवस्था की प्रकृति को समझे बिना उसकी शासन प्रक्रिया का सही मूल्यांकन करना कठिन होता है।
राजनीतिक व्यवस्था के वर्गीकरण का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य राजनीतिक स्थिरता और अस्थिरता को समझना भी है। राजनीतिक स्थिरता केवल सरकार के बने रहने से निर्धारित नहीं होती, बल्कि राजनीतिक संस्थाओं की स्वीकार्यता, जनता का विश्वास, संवैधानिक व्यवस्था की मजबूती और सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण से भी संबंधित होती है। अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं में स्थिरता प्राप्त करने के तरीके अलग हो सकते हैं। वर्गीकरण के माध्यम से यह अध्ययन किया जा सकता है कि किस प्रकार की राजनीतिक संरचना किन परिस्थितियों में अधिक स्थिर या अस्थिर हो सकती है।
हालाँकि राजनीतिक व्यवस्था का वर्गीकरण करते समय कुछ सावधानियाँ भी आवश्यक हैं। किसी देश को केवल एक श्रेणी में रखकर उसकी पूरी राजनीतिक वास्तविकता को समझना संभव नहीं होता। उदाहरण के लिए कोई देश संवैधानिक रूप से लोकतांत्रिक हो सकता है, लेकिन वहाँ राजनीतिक संस्कृति, सामाजिक असमानता, आर्थिक शक्ति और राजनीतिक संस्थाओं की वास्तविक कार्यप्रणाली लोकतंत्र के स्वरूप को प्रभावित कर सकती है। इसी प्रकार दो देशों में समान संवैधानिक व्यवस्था होते हुए भी उनके राजनीतिक व्यवहार में पर्याप्त अंतर हो सकता है। इसलिए आधुनिक राजनीति विज्ञान में केवल औपचारिक संस्थाओं के आधार पर वर्गीकरण करने के बजाय राजनीतिक व्यवहार, राजनीतिक संस्कृति, सामाजिक संरचना, आर्थिक परिस्थितियों और नागरिक सहभागिता को भी महत्व दिया जाता है।
इस प्रकार राजनीतिक व्यवस्था का वर्गीकरण राजनीति विज्ञान की एक आवश्यक अध्ययन-पद्धति है। इसका मुख्य उद्देश्य विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं को व्यवस्थित रूप से समझना, उनकी तुलना करना, सत्ता के स्वरूप और वितरण का अध्ययन करना, राजनीतिक संस्थाओं की भूमिका को स्पष्ट करना तथा राजनीतिक परिवर्तन और विकास की प्रक्रिया को समझना है। वर्गीकरण के माध्यम से जटिल राजनीतिक वास्तविकताओं को कुछ व्यापक श्रेणियों में व्यवस्थित किया जाता है, जिससे उनका अध्ययन अधिक सरल और वैज्ञानिक बनता है। यद्यपि कोई भी वर्गीकरण पूर्ण नहीं हो सकता, फिर भी यह राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन को दिशा और व्यवस्थित आधार प्रदान करता है।
अंततः कहा जा सकता है कि राजनीतिक व्यवस्था का वर्गीकरण राजनीति विज्ञान में उसी प्रकार उपयोगी है जिस प्रकार किसी विशाल विषय को समझने के लिए उसे तार्किक क्रम में विभाजित करना आवश्यक होता है। इसके माध्यम से हम यह जान पाते हैं कि विभिन्न देशों में सत्ता का संगठन किस प्रकार हुआ है, राजनीतिक संस्थाएँ कैसे कार्य करती हैं, जनता की भूमिका कितनी है, सरकार किस प्रकार उत्तरदायी होती है और राजनीतिक परिवर्तन किन परिस्थितियों में संभव होता है। इसलिए राजनीतिक व्यवस्था का वर्गीकरण केवल अध्ययन की सुविधा का साधन नहीं, बल्कि राजनीतिक वास्तविकता को समझने, उसकी तुलना करने और उसकी व्याख्या करने का एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक आधार है।
शास्त्रीय वर्गीकरण अथवा Classical Typologies
राजनीति विज्ञान में राजनीतिक व्यवस्थाओं के वर्गीकरण का इतिहास अत्यंत पुराना है। मनुष्य ने जब संगठित राजनीतिक जीवन की शुरुआत की और विभिन्न प्रकार की शासन-व्यवस्थाओं का अनुभव किया, तभी से यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो गया कि सरकारों को किन आधारों पर अलग-अलग वर्गों में रखा जाए। किसी राज्य में एक व्यक्ति शासन करता था, किसी में कुछ प्रभावशाली व्यक्ति सत्ता का संचालन करते थे और कहीं नागरिकों का व्यापक समूह शासन-निर्णयों में भाग लेता था। इन विभिन्न रूपों को समझने और उनके बीच अंतर स्पष्ट करने के लिए प्राचीन राजनीतिक चिंतकों ने सरकारों के वर्गीकरण की शुरुआत की। राजनीति विज्ञान के इतिहास में इस प्रारंभिक और व्यवस्थित वर्गीकरण को सामान्यतः शास्त्रीय वर्गीकरण अथवा Classical Typologies कहा जाता है।
शास्त्रीय वर्गीकरण का मुख्य उद्देश्य विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं को उनकी मूल प्रकृति, शासन करने वालों की संख्या, सत्ता के प्रयोग के उद्देश्य तथा राजनीतिक संस्थाओं के स्वरूप के आधार पर समझना था। इस दृष्टिकोण में राजनीतिक व्यवस्था को मुख्यतः उसके संवैधानिक और संस्थागत स्वरूप के आधार पर देखा जाता था। उस समय आधुनिक अर्थों में राजनीतिक दल, जनसंचार माध्यम, दबाव समूह, राजनीतिक संस्कृति और जनमत जैसे तत्व विकसित नहीं हुए थे। इसलिए प्राचीन राजनीतिक चिंतकों का ध्यान मुख्य रूप से इस बात पर था कि राज्य में वास्तविक सत्ता किसके हाथों में है और शासन किस उद्देश्य से संचालित किया जा रहा है।
शास्त्रीय वर्गीकरण के विकास में प्राचीन यूनानी राजनीतिक चिंतन का विशेष महत्व है। यूनान के नगर-राज्यों में विभिन्न प्रकार की शासन-व्यवस्थाएँ अस्तित्व में थीं। प्लेटो और अरस्तू जैसे चिंतकों ने इन राजनीतिक व्यवस्थाओं का अध्ययन किया और उनके आधार पर सरकार के विभिन्न रूपों को समझाने का प्रयास किया। विशेष रूप से अरस्तू का वर्गीकरण राजनीतिक विचार के इतिहास में अत्यंत प्रसिद्ध और प्रभावशाली माना जाता है।
प्लेटो ने राजनीतिक व्यवस्थाओं का अध्ययन मुख्यतः उनके नैतिक चरित्र और शासन करने वाले वर्ग की मानसिकता के आधार पर किया। उनका मानना था कि राज्य का उद्देश्य केवल कानून और व्यवस्था बनाए रखना नहीं है, बल्कि नागरिकों के जीवन को नैतिक और व्यवस्थित बनाना भी है। प्लेटो के आदर्श राज्य में शासन उन व्यक्तियों के हाथों में होना चाहिए जो ज्ञान, विवेक और न्याय की वास्तविक समझ रखते हों। इसी कारण उन्होंने दार्शनिक-राजा की अवधारणा प्रस्तुत की। उनके अनुसार यदि सत्ता ऐसे व्यक्तियों के हाथों में रहती है जो व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज के हित में निर्णय लेते हैं तो शासन व्यवस्था श्रेष्ठ होती है। लेकिन जब सत्ता का उद्देश्य सार्वजनिक हित के स्थान पर व्यक्तिगत लाभ बन जाता है तो राजनीतिक व्यवस्था का पतन आरंभ हो जाता है।
प्लेटो ने राजनीतिक व्यवस्थाओं के क्रमिक परिवर्तन की भी चर्चा की। उनके अनुसार आदर्श व्यवस्था के पतन के बाद टिमोक्रेसी, फिर अल्पतंत्र या धनिकतंत्र, उसके बाद लोकतंत्र और अंततः तानाशाही जैसी व्यवस्थाएँ विकसित हो सकती हैं। यहाँ प्लेटो का उद्देश्य केवल शासन के नाम बताना नहीं था, बल्कि यह दिखाना था कि राजनीतिक व्यवस्था में नैतिक मूल्यों के पतन के साथ शासन का स्वरूप भी बदल सकता है। उनके लिए राजनीति और नैतिकता एक-दूसरे से अलग नहीं थीं।
हालाँकि शास्त्रीय वर्गीकरण के क्षेत्र में सबसे व्यवस्थित और प्रभावशाली योगदान अरस्तू का माना जाता है। अरस्तू ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ “Politics” में विभिन्न नगर-राज्यों की राजनीतिक व्यवस्थाओं का अध्ययन किया और शासन के रूपों को वैज्ञानिक ढंग से वर्गीकृत करने का प्रयास किया। उन्होंने शासन को समझने के लिए दो प्रमुख प्रश्नों को आधार बनाया। पहला, शासन कौन कर रहा है और कितने लोग शासन कर रहे हैं? दूसरा, शासन किस उद्देश्य से किया जा रहा है?
अरस्तू के अनुसार यदि शासन एक व्यक्ति के हाथ में है तो वह राजतंत्र हो सकता है, यदि कुछ लोगों के हाथ में है तो वह अभिजाततंत्र हो सकता है और यदि अनेक नागरिक शासन में भाग लेते हैं तो वह पॉलिटी का रूप ग्रहण कर सकता है। लेकिन शासन करने वालों की संख्या अपने आप में यह निर्धारित नहीं करती कि शासन अच्छा है या बुरा। इसके लिए यह देखना भी आवश्यक है कि शासक अपने शासन का उपयोग सामान्य हित के लिए कर रहे हैं अथवा अपने निजी हित के लिए।
अरस्तू ने इस आधार पर सरकार के छह रूपों की चर्चा की। इनमें तीन को उन्होंने शुद्ध या उचित रूप माना और तीन को उनके विकृत रूप के रूप में देखा। शुद्ध रूपों में राजतंत्र, अभिजाततंत्र और पॉलिटी को रखा गया। विकृत रूपों में निरंकुशतंत्र, कुलीनतंत्र या धनिकतंत्र और लोकतंत्र को रखा गया। यह वर्गीकरण आधुनिक लोकतंत्र की अवधारणा से अलग है और इसे उस समय की यूनानी सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में समझना चाहिए।
राजतंत्र में शासन एक व्यक्ति के हाथ में होता है। यदि राजा या शासक अपनी शक्ति का प्रयोग पूरे राज्य के हित में करता है तो अरस्तू इसे शासन का उचित रूप मानते थे। लेकिन यदि वही शासक अपने निजी हित और सत्ता को बनाए रखने के लिए शासन करने लगे तो राजतंत्र का विकृत रूप निरंकुशतंत्र उत्पन्न होता है। इस प्रकार अरस्तू के लिए किसी शासन की श्रेष्ठता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती थी कि शासन एक व्यक्ति करता है, बल्कि इस बात पर निर्भर करती थी कि वह व्यक्ति अपनी शक्ति का उपयोग किस उद्देश्य से करता है।
अभिजाततंत्र में शासन कुछ योग्य और श्रेष्ठ व्यक्तियों के हाथ में होता है। अरस्तू के अनुसार यदि ये व्यक्ति राज्य और समाज के सामान्य हित को ध्यान में रखते हुए शासन करते हैं तो यह एक उचित शासन-रूप है। लेकिन जब शासक वर्ग केवल अपने आर्थिक और वर्गीय हितों की रक्षा करने लगता है और शासन को अपने विशेषाधिकारों का साधन बना लेता है, तब यह व्यवस्था कुलीनतंत्र या धनिकतंत्र का रूप ले लेती है। यहाँ शासन का उद्देश्य सार्वजनिक हित के बजाय सीमित वर्ग के हितों की रक्षा करना हो जाता है।
पॉलिटी अरस्तू के वर्गीकरण का तीसरा उचित शासन-रूप था। इसमें अनेक नागरिक राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेते हैं और शासन का उद्देश्य सामान्य हित की प्राप्ति होता है। अरस्तू इसे अत्यधिक व्यावहारिक शासन-रूप मानते थे, क्योंकि इसमें समाज के विभिन्न वर्गों के हितों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। इसके विपरीत जब बहुसंख्यक वर्ग केवल अपने हितों को सर्वोच्च मानकर शासन करने लगता है, तब अरस्तू के अनुसार इसका विकृत रूप लोकतंत्र बन सकता है। यह बात फिर से ध्यान देने योग्य है कि अरस्तू जिस “लोकतंत्र” की आलोचना करते थे, वह आधुनिक प्रतिनिधि लोकतंत्र नहीं था।
अरस्तू के शास्त्रीय वर्गीकरण की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने राजनीतिक व्यवस्थाओं को शासकों की संख्या और शासन के उद्देश्य दोनों के आधार पर समझने का प्रयास किया। उन्होंने शासन के बाहरी स्वरूप के साथ उसके वास्तविक उद्देश्य को भी महत्व दिया। इस दृष्टि से उनका वर्गीकरण केवल वर्णनात्मक नहीं था, बल्कि उसमें मूल्यात्मक तत्व भी शामिल था। वे यह जानने का प्रयास करते थे कि कौन-सी राजनीतिक व्यवस्था सार्वजनिक हित को बढ़ावा देती है और कौन-सी व्यवस्था निजी या वर्गीय हितों को।
शास्त्रीय वर्गीकरण की एक अन्य विशेषता यह है कि इसमें राज्य और सरकार के बीच अंतर उतना स्पष्ट नहीं था जितना आधुनिक राजनीति विज्ञान में है। प्राचीन राजनीतिक चिंतक आज की तरह राज्य, सरकार, राजनीतिक व्यवस्था, राजनीतिक समाज और प्रशासन को अलग-अलग अवधारणाओं के रूप में विकसित नहीं कर पाए थे। इसलिए उनके वर्गीकरण में सरकार का स्वरूप ही व्यापक रूप से राजनीतिक व्यवस्था के स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता था।
बाद के राजनीतिक चिंतकों ने भी शास्त्रीय वर्गीकरण की परंपरा को आगे बढ़ाया। पॉलीबियस ने शासन के विभिन्न रूपों और उनके परिवर्तन की प्रक्रिया का अध्ययन किया। उन्होंने राजतंत्र, अभिजाततंत्र और लोकतंत्र को शासन के प्रमुख रूपों के रूप में देखा तथा यह बताया कि ये व्यवस्थाएँ समय के साथ अपने विकृत रूपों में बदल सकती हैं। उन्होंने मिश्रित संविधान की अवधारणा को महत्व दिया। उनके अनुसार यदि शासन की विभिन्न संस्थाओं और शक्तियों के बीच संतुलन स्थापित कर दिया जाए तो राजनीतिक अस्थिरता को कम किया जा सकता है।
बाद के काल में मोंतेस्क्यू ने राजनीतिक संस्थाओं और सत्ता के विभाजन के आधार पर सरकारों को समझने का प्रयास किया। उन्होंने शासन की संस्थाओं तथा स्वतंत्रता के संबंध पर विचार किया और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को विशेष महत्व दिया। यद्यपि उनका वर्गीकरण प्राचीन यूनानी वर्गीकरण से अलग था, फिर भी इसे शास्त्रीय संस्थागत दृष्टिकोण के विकास की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जा सकता है।
शास्त्रीय वर्गीकरण में बाद के समय में राजतंत्र, अभिजाततंत्र और लोकतंत्र जैसी व्यापक श्रेणियाँ राजनीतिक अध्ययन का हिस्सा बनी रहीं। आधुनिक काल में लोकतंत्र का अर्थ पूरी तरह बदल गया। आज लोकतंत्र को केवल बहुसंख्यक लोगों के शासन के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि इसमें लोकप्रिय संप्रभुता, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव, राजनीतिक समानता, नागरिक स्वतंत्रता, कानून का शासन, बहुदलीय व्यवस्था, उत्तरदायी सरकार और संवैधानिक सीमाएँ शामिल हैं। इसलिए आधुनिक लोकतंत्र को अरस्तू के लोकतंत्र के समान मानना उचित नहीं होगा।
शास्त्रीय वर्गीकरण की उपयोगिता इस बात में है कि इसने राजनीतिक व्यवस्थाओं को समझने के लिए एक प्रारंभिक वैचारिक ढाँचा उपलब्ध कराया। इससे राजनीतिक चिंतकों को यह समझने में सहायता मिली कि शासन के विभिन्न रूपों की अपनी-अपनी विशेषताएँ होती हैं और किसी भी शासन-व्यवस्था को केवल उसके नाम से नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक कार्यप्रणाली और उद्देश्य से समझना चाहिए। इस परंपरा ने आगे चलकर आधुनिक तुलनात्मक राजनीति के विकास के लिए आधार तैयार किया।
लेकिन शास्त्रीय वर्गीकरण की कुछ सीमाएँ भी हैं। पहली सीमा यह है कि यह मुख्यतः औपचारिक राजनीतिक संस्थाओं पर आधारित था। इसमें सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। दूसरी सीमा यह है कि प्राचीन चिंतकों का अनुभव मुख्यतः यूनानी नगर-राज्यों तक सीमित था, इसलिए उनका वर्गीकरण आधुनिक विशाल राष्ट्र-राज्यों पर पूरी तरह लागू नहीं किया जा सकता। तीसरी सीमा यह है कि इस वर्गीकरण में शासन-व्यवस्थाओं को कुछ निश्चित श्रेणियों में बाँट दिया जाता है, जबकि वास्तविक राजनीतिक व्यवस्थाएँ अक्सर मिश्रित और जटिल होती हैं। चौथी सीमा यह है कि अरस्तू और अन्य चिंतकों के वर्गीकरण में मूल्यात्मक निर्णय बहुत अधिक दिखाई देते हैं; अर्थात वे केवल यह नहीं बताते कि व्यवस्था कैसी है, बल्कि यह भी बताते हैं कि वह अच्छी है या बुरी।
आधुनिक राजनीतिक विज्ञान ने इन सीमाओं को ध्यान में रखते हुए राजनीतिक व्यवस्था के अध्ययन को अधिक व्यापक बनाया। अब केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं माना जाता कि शासन एक व्यक्ति, कुछ व्यक्तियों या अनेक व्यक्तियों के हाथ में है। इसके साथ यह भी देखा जाता है कि राजनीतिक दल किस प्रकार कार्य करते हैं, नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी कितनी है, राजनीतिक संस्कृति कैसी है, प्रशासनिक संस्थाएँ कितनी प्रभावी हैं, सत्ता का वास्तविक वितरण किस प्रकार हुआ है और जनता तथा राजनीतिक संस्थाओं के बीच संबंध कैसे हैं।
फिर भी शास्त्रीय वर्गीकरण का महत्व आज भी बना हुआ है। राजनीति विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए यह राजनीतिक व्यवस्थाओं के अध्ययन की आधारभूत समझ विकसित करता है। इसके माध्यम से यह समझा जा सकता है कि राजनीतिक विचार के आरंभिक दौर में चिंतकों ने शासन और सत्ता की समस्या को किस प्रकार देखा था। विशेष रूप से अरस्तू का वर्गीकरण आज भी राजनीतिक चिंतन के इतिहास में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने शासन के संख्यात्मक आधार और नैतिक उद्देश्य दोनों को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया।
इस प्रकार शास्त्रीय वर्गीकरण अथवा Classical Typologies राजनीतिक विज्ञान के विकास की प्रारंभिक और महत्वपूर्ण अवस्था को व्यक्त करता है। प्लेटो ने राजनीतिक व्यवस्थाओं को उनके नैतिक स्वरूप और पतन की प्रक्रिया के संदर्भ में समझाया, जबकि अरस्तू ने शासन करने वालों की संख्या तथा शासन के उद्देश्य को आधार बनाकर राजतंत्र, अभिजाततंत्र और पॉलिटी जैसे उचित रूपों तथा निरंकुशतंत्र, कुलीनतंत्र और लोकतंत्र जैसे विकृत रूपों की व्याख्या की। आगे चलकर पॉलीबियस और मोंतेस्क्यू जैसे चिंतकों ने इस परंपरा को अलग-अलग रूपों में विकसित किया।
अंततः कहा जा सकता है कि शास्त्रीय वर्गीकरण ने राजनीतिक व्यवस्थाओं के व्यवस्थित अध्ययन की नींव रखी। यद्यपि आधुनिक लोकतांत्रिक और जटिल राजनीतिक व्यवस्थाओं को केवल प्राचीन वर्गीकरणों के आधार पर पूरी तरह समझना संभव नहीं है, फिर भी इन वर्गीकरणों के बिना राजनीतिक चिंतन के विकास और तुलनात्मक राजनीति की बौद्धिक पृष्ठभूमि को समझना कठिन होगा। इसलिए Classical Typologies राजनीति विज्ञान में केवल एक ऐतिहासिक अवधारणा नहीं, बल्कि राजनीतिक सत्ता, शासन और राज्य की प्रकृति को समझने की प्रारंभिक वैचारिक आधारशिला है।
तीन-विश्व वर्गीकरण
राजनीति विज्ञान और विशेष रूप से तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन में विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं को समझने के लिए अनेक प्रकार के वर्गीकरण किए गए हैं। इनमें तीन-विश्व वर्गीकरण अथवा Three Worlds Typology का विशेष महत्व रहा है। इसका विकास मुख्यतः बीसवीं शताब्दी के मध्य में हुआ, जब विश्व की राजनीति पर शीतयुद्ध का प्रभाव बहुत अधिक था। उस समय संसार की प्रमुख राजनीतिक शक्तियाँ दो बड़े गुटों में विभाजित थीं। एक ओर संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में पूँजीवादी और उदार लोकतांत्रिक देश थे तथा दूसरी ओर सोवियत संघ के नेतृत्व में समाजवादी और साम्यवादी देश थे। इन दोनों के अतिरिक्त एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अनेक ऐसे देश भी थे जो औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्र होकर अपने राजनीतिक और आर्थिक विकास का मार्ग स्वयं निर्धारित करना चाहते थे। इन्हीं परिस्थितियों में विश्व को सामान्यतः प्रथम विश्व, द्वितीय विश्व और तृतीय विश्व के रूप में समझने की पद्धति विकसित हुई।
तीन-विश्व वर्गीकरण को समझने से पहले यह समझना आवश्यक है कि यहाँ “विश्व” शब्द का अर्थ केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं है। इसका संबंध मुख्यतः राजनीतिक विचारधारा, आर्थिक व्यवस्था, विकास के स्तर और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक गुटबंदी से था। इसलिए प्रथम, द्वितीय और तृतीय विश्व की संज्ञाएँ मूल रूप से शीतयुद्ध की राजनीतिक परिस्थितियों को समझने के लिए प्रयुक्त हुई थीं।
प्रथम विश्व से सामान्यतः उन देशों का आशय था जो पश्चिमी पूँजीवादी आर्थिक व्यवस्था और उदार लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था से जुड़े हुए थे। संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, पश्चिमी यूरोप के अधिकांश देश, जापान तथा ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को इस समूह में रखा जाता था। इन देशों में निजी संपत्ति, बाजार आधारित अर्थव्यवस्था, औद्योगिक विकास, प्रतिनिधि लोकतंत्र और बहुदलीय राजनीतिक प्रतिस्पर्धा जैसी विशेषताएँ प्रमुख थीं। इनमें से अनेक देश आर्थिक और तकनीकी दृष्टि से अत्यधिक विकसित थे तथा अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उनका प्रभाव भी व्यापक था।
प्रथम विश्व की राजनीतिक व्यवस्था को सामान्यतः पूँजीवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था के रूप में देखा जाता था। यहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निजी संपत्ति, राजनीतिक अधिकार और प्रतिनिधि संस्थाओं को विशेष महत्व दिया जाता था। हालांकि सभी प्रथम विश्व देशों की राजनीतिक व्यवस्थाएँ बिल्कुल समान नहीं थीं। उदाहरण के लिए कुछ देशों में संसदीय शासन था, जबकि कुछ देशों में अध्यक्षात्मक व्यवस्था थी। कहीं संवैधानिक राजतंत्र था तो कहीं गणतंत्र। इसलिए प्रथम विश्व को एक पूर्णतः समान राजनीतिक श्रेणी मानना उचित नहीं था। यह वर्गीकरण मुख्यतः उनकी व्यापक आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक स्थिति को व्यक्त करता था।
द्वितीय विश्व से मुख्यतः उन देशों का आशय था जो समाजवादी अथवा साम्यवादी राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था से जुड़े हुए थे। इस समूह का सबसे प्रमुख और शक्तिशाली देश सोवियत संघ था। पूर्वी यूरोप के अनेक समाजवादी देश भी इसी समूह में शामिल थे। इन देशों में उत्पादन के प्रमुख साधनों पर राज्य का नियंत्रण, नियोजित अर्थव्यवस्था, एकदलीय या प्रभुत्वशाली दल व्यवस्था और समाजवादी विचारधारा की प्रधानता दिखाई देती थी।
द्वितीय विश्व की राजनीतिक व्यवस्था प्रथम विश्व की पूँजीवादी व्यवस्था के वैकल्पिक मॉडल के रूप में विकसित हुई थी। सोवियत संघ और उसके सहयोगी देशों का मानना था कि पूँजीवादी व्यवस्था आर्थिक असमानता और वर्गीय शोषण को बढ़ावा देती है, जबकि समाजवादी व्यवस्था सामाजिक और आर्थिक समानता स्थापित करने का प्रयास करती है। इस प्रकार प्रथम और द्वितीय विश्व के बीच संघर्ष केवल सैन्य या कूटनीतिक संघर्ष नहीं था, बल्कि यह दो अलग-अलग राजनीतिक और आर्थिक विचारधाराओं के बीच प्रतिस्पर्धा भी थी।
इस संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण दौर शीतयुद्ध के रूप में सामने आया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ दो महाशक्तियों के रूप में उभरे। दोनों के बीच प्रत्यक्ष युद्ध नहीं हुआ, लेकिन राजनीतिक प्रभाव, सैन्य शक्ति, आर्थिक सहायता, तकनीकी क्षमता और वैचारिक प्रभाव के क्षेत्र में तीव्र प्रतिस्पर्धा रही। दुनिया के अनेक देशों में राजनीतिक संघर्षों पर भी इस प्रतिस्पर्धा का प्रभाव पड़ा। इस परिस्थिति में प्रथम और द्वितीय विश्व की अवधारणा को व्यापक स्वीकृति मिली।
इसके बीच तृतीय विश्व की अवधारणा सामने आई। तृतीय विश्व में मुख्यतः एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के वे देश शामिल किए जाते थे जो औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्र हुए थे और जिनके सामने आर्थिक विकास, गरीबी, सामाजिक असमानता, राष्ट्र-निर्माण तथा राजनीतिक स्थिरता जैसी गंभीर चुनौतियाँ थीं। इन देशों की बड़ी संख्या ने न तो अमेरिकी नेतृत्व वाले पश्चिमी गुट के साथ पूर्ण रूप से जुड़ना स्वीकार किया और न ही सोवियत गुट का हिस्सा बनना चाहा।
भारत को इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जाता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने अपनी विदेश नीति में गुटनिरपेक्षता को महत्व दिया। भारत का उद्देश्य किसी एक महाशक्ति के सैन्य या राजनीतिक गुट का हिस्सा बनना नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय हितों और स्वतंत्र विदेश नीति के आधार पर अंतरराष्ट्रीय संबंधों का संचालन करना था। गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने इसी व्यापक विचार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभिव्यक्ति प्रदान की।
तृतीय विश्व के देशों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनमें से अधिकांश देश लंबे समय तक औपनिवेशिक शासन के अधीन रहे थे। औपनिवेशिक शासन ने उनके आर्थिक संसाधनों, प्रशासनिक संस्थाओं और सामाजिक संरचनाओं को गहराई से प्रभावित किया था। स्वतंत्रता के बाद इन देशों के सामने केवल राजनीतिक स्वतंत्रता को बनाए रखने की चुनौती नहीं थी, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता, सामाजिक न्याय, शिक्षा, स्वास्थ्य, औद्योगीकरण और राष्ट्र-निर्माण जैसी समस्याओं का समाधान भी आवश्यक था।
इसी कारण तृतीय विश्व की अवधारणा में आर्थिक विकास का तत्व भी जुड़ गया। धीरे-धीरे “तृतीय विश्व” शब्द का प्रयोग केवल गुटनिरपेक्ष देशों के लिए नहीं, बल्कि उन देशों के लिए भी होने लगा जिन्हें आर्थिक रूप से विकासशील या अपेक्षाकृत पिछड़ा माना जाता था। इस प्रकार राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय अर्थ वाला शब्द धीरे-धीरे एक व्यापक सामाजिक-आर्थिक अर्थ ग्रहण करने लगा।
तीन-विश्व वर्गीकरण का महत्व इसलिए भी है क्योंकि इससे शीतयुद्धकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति की संरचना को समझने में सहायता मिलती है। उस समय दुनिया केवल दो महाशक्तियों के बीच विभाजित नहीं थी। एशिया और अफ्रीका के नए स्वतंत्र देशों ने भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने का प्रयास किया। उन्होंने उपनिवेशवाद, नस्लवाद, साम्राज्यवाद और आर्थिक असमानता का विरोध किया तथा विकासशील देशों के हितों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाया।
इस वर्गीकरण के पीछे आर्थिक विचारधारा की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। प्रथम विश्व को बाजार आधारित पूँजीवादी अर्थव्यवस्था से, द्वितीय विश्व को राज्य-नियंत्रित समाजवादी अर्थव्यवस्था से और तृतीय विश्व को विकासशील अथवा नवस्वतंत्र अर्थव्यवस्थाओं से जोड़ा जाने लगा। इस दृष्टि से तीन-विश्व वर्गीकरण ने राजनीतिक व्यवस्था और आर्थिक व्यवस्था के बीच संबंध को समझने का भी प्रयास किया।
हालाँकि तीन-विश्व वर्गीकरण को पूर्ण और वैज्ञानिक वर्गीकरण नहीं माना जा सकता। इसकी सबसे बड़ी सीमा यह है कि एक ही श्रेणी में रखे गए देशों के बीच भी बहुत अधिक अंतर था। प्रथम विश्व के सभी देशों की राजनीतिक व्यवस्थाएँ समान नहीं थीं और न ही तृतीय विश्व के सभी देशों की आर्थिक तथा राजनीतिक परिस्थितियाँ एक जैसी थीं। उदाहरण के लिए एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों में इतिहास, संस्कृति, राजनीतिक संस्थाओं और आर्थिक विकास के स्तर में व्यापक अंतर था। इसलिए केवल “तृतीय विश्व” कह देने से किसी देश की पूरी राजनीतिक वास्तविकता स्पष्ट नहीं होती।
इस वर्गीकरण की दूसरी सीमा यह थी कि इसमें देशों को मुख्यतः शीतयुद्ध की गुटीय राजनीति के संदर्भ में देखा गया। इससे राजनीतिक व्यवस्था की आंतरिक विशेषताएँ कई बार पीछे छूट जाती थीं। किसी देश में लोकतंत्र है या अधिनायकवाद, उसकी राजनीतिक संस्थाएँ कितनी मजबूत हैं, नागरिक स्वतंत्रता की स्थिति क्या है, राजनीतिक दल कैसे कार्य करते हैं और राज्य तथा समाज के बीच संबंध कैसे हैं—इन प्रश्नों का उत्तर केवल प्रथम, द्वितीय या तृतीय विश्व की श्रेणी से नहीं मिल सकता।
तीसरी महत्वपूर्ण सीमा यह है कि सोवियत संघ के विघटन और शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद तीन-विश्व वर्गीकरण की पारंपरिक उपयोगिता काफी कम हो गई। जब दुनिया में दो महाशक्तियों के बीच वैचारिक और सैन्य प्रतिस्पर्धा समाप्त हुई, तब प्रथम और द्वितीय विश्व की पुरानी अवधारणा भी कमजोर हो गई। पूर्व समाजवादी देशों में अनेक देशों ने बाजार अर्थव्यवस्था और बहुदलीय लोकतंत्र की दिशा में परिवर्तन किया। इस परिवर्तन ने पुराने तीन-विश्व विभाजन को काफी हद तक अप्रासंगिक बना दिया।
आज राजनीतिक विज्ञान में किसी देश को केवल प्रथम, द्वितीय या तृतीय विश्व कहकर उसकी राजनीतिक व्यवस्था को समझना पर्याप्त नहीं माना जाता। आधुनिक अध्ययन में विकसित देश, विकासशील देश, उभरती अर्थव्यवस्थाएँ, लोकतांत्रिक व्यवस्था, अधिनायकवादी व्यवस्था, उदार लोकतंत्र, प्रतिस्पर्धात्मक अधिनायकवाद, संक्रमणशील लोकतंत्र आदि अधिक विशिष्ट अवधारणाओं का प्रयोग किया जाता है। इसी प्रकार मानव विकास, प्रति व्यक्ति आय, सामाजिक विकास, राजनीतिक स्वतंत्रता, संस्थागत क्षमता और सुशासन जैसे मानदंड भी देशों के वर्गीकरण में उपयोग किए जाते हैं।
फिर भी तीन-विश्व वर्गीकरण का ऐतिहासिक महत्व कम नहीं हुआ है। इसके माध्यम से विद्यार्थियों को यह समझने में सहायता मिलती है कि शीतयुद्ध के समय विश्व राजनीति किस प्रकार संरचित थी और नवस्वतंत्र देशों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका किस प्रकार निर्धारित की। यह वर्गीकरण विशेष रूप से उपनिवेशवाद से मुक्ति, गुटनिरपेक्षता, विकासशील देशों की समस्याओं और महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा को समझने में उपयोगी है।
तीन-विश्व वर्गीकरण का अध्ययन यह भी स्पष्ट करता है कि राजनीतिक व्यवस्था को केवल देश के भीतर की शासन प्रणाली के आधार पर नहीं समझा जा सकता। किसी देश की राजनीतिक दिशा पर अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का भी प्रभाव पड़ता है। शीतयुद्ध के दौरान अनेक देशों की आंतरिक राजनीति पर अमेरिका और सोवियत संघ की प्रतिस्पर्धा का प्रभाव पड़ा। आर्थिक सहायता, सैन्य सहयोग, वैचारिक समर्थन और कूटनीतिक संबंधों के माध्यम से महाशक्तियाँ विभिन्न देशों की राजनीति को प्रभावित करती थीं। इसलिए तीन-विश्व वर्गीकरण अंतरराष्ट्रीय राजनीति और तुलनात्मक राजनीति के बीच संबंध को समझने में भी सहायक है।
भारत के संदर्भ में तीन-विश्व वर्गीकरण का अध्ययन विशेष महत्व रखता है। स्वतंत्रता के बाद भारत ने लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था को अपनाया, लेकिन आर्थिक विकास के लिए राज्य की सक्रिय भूमिका को भी स्वीकार किया। भारत ने पश्चिमी पूँजीवादी देशों और सोवियत समाजवादी देशों दोनों के साथ संबंध बनाए, लेकिन किसी सैन्य गुट में शामिल होने से बचा। इस प्रकार भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों के आधार पर विश्व राजनीति में अपनी भूमिका निर्धारित करने का प्रयास किया। इससे स्पष्ट होता है कि तृतीय विश्व के देशों को केवल किसी एक महाशक्ति के प्रभाव क्षेत्र के रूप में देखना उनके राजनीतिक व्यवहार को पूरी तरह समझने के लिए पर्याप्त नहीं था।
इस प्रकार तीन-विश्व वर्गीकरण मूल रूप से शीतयुद्धकालीन विश्व व्यवस्था को समझने की एक महत्वपूर्ण राजनीतिक अवधारणा थी। प्रथम विश्व पूँजीवादी और पश्चिमी विकसित देशों से, द्वितीय विश्व समाजवादी-साम्यवादी देशों से और तृतीय विश्व मुख्यतः नवस्वतंत्र तथा विकासशील देशों से संबंधित था। इसका आधार केवल आर्थिक विकास नहीं था, बल्कि राजनीतिक विचारधारा, आर्थिक व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय गुटबंदी भी थी।
अंततः कहा जा सकता है कि तीन-विश्व वर्गीकरण आज अपने मूल अर्थ में उतना उपयोगी नहीं रह गया है जितना शीतयुद्ध के समय था, लेकिन इसका ऐतिहासिक और राजनीतिक महत्व अभी भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह वर्गीकरण हमें बताता है कि बीसवीं शताब्दी में विश्व राजनीति केवल राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर सीमित नहीं थी, बल्कि पूँजीवाद, समाजवाद, उपनिवेशवाद, राष्ट्रवाद, विकास और गुटीय राजनीति जैसी शक्तियाँ भी राजनीतिक व्यवस्थाओं को प्रभावित कर रही थीं। इसलिए बी.ए. स्तर पर तीन-विश्व वर्गीकरण का अध्ययन करते समय इसे केवल “प्रथम, द्वितीय और तृतीय विश्व” के नाम याद करने के रूप में नहीं, बल्कि शीतयुद्ध, वैचारिक संघर्ष, विकासशील देशों की स्थिति और बदलती विश्व राजनीति को समझने के एक ऐतिहासिक दृष्टिकोण के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions) (2–5 अंक)
राजनीतिक व्यवस्था से क्या अभिप्राय है?
सरकार और राजनीतिक व्यवस्था में क्या अंतर है?
राजनीतिक व्यवस्थाओं का वर्गीकरण क्यों आवश्यक है?
राजनीतिक व्यवस्था के प्रमुख तत्वों का उल्लेख कीजिए।
वर्गीकरण का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
तुलनात्मक राजनीति में वर्गीकरण का क्या महत्व है?
प्लेटो के अनुसार सर्वोत्तम शासन-व्यवस्था कौन-सी है?
प्लेटो ने शासन-व्यवस्थाओं के कितने रूप बताए?
अरस्तू ने राजनीतिक व्यवस्थाओं के वर्गीकरण के कौन-कौन से आधार स्वीकार किए?
अरस्तू के अनुसार शुद्ध शासन-रूप कौन-कौन से हैं?
अरस्तू के अनुसार विकृत शासन-रूप कौन-कौन से हैं?
पोलिटी (Polity) से क्या अभिप्राय है?
राजतंत्र की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
कुलीनतंत्र (Aristocracy) क्या है?
अल्पतंत्र (Oligarchy) से क्या अभिप्राय है?
तानाशाही (Tyranny) की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
सिसरो के मिश्रित शासन सिद्धांत को स्पष्ट कीजिए।
शास्त्रीय वर्गीकरण से क्या अभिप्राय है?
शास्त्रीय वर्गीकरण की दो विशेषताएँ लिखिए।
शास्त्रीय वर्गीकरण की दो सीमाएँ बताइए।
तीन-विश्व वर्गीकरण क्या है?
प्रथम विश्व के देशों की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
द्वितीय विश्व किन देशों को कहा जाता था?
तृतीय विश्व के देशों की प्रमुख समस्याएँ क्या थीं?
शीत युद्ध का तीन-विश्व वर्गीकरण से क्या संबंध था?
प्रथम विश्व के दो उदाहरण दीजिए।
द्वितीय विश्व के दो उदाहरण दीजिए।
तृतीय विश्व के चार उदाहरण दीजिए।
वैश्वीकरण ने राजनीतिक वर्गीकरण को कैसे प्रभावित किया?
आधुनिक राजनीतिक वर्गीकरण के दो आधार लिखिए।
लोकतांत्रिक व्यवस्था की दो विशेषताएँ लिखिए।
अधिनायकवादी व्यवस्था की दो विशेषताएँ लिखिए।
राजनीतिक संस्कृति का वर्गीकरण में क्या महत्व है?
राजनीतिक विकास से क्या अभिप्राय है?
तुलनात्मक राजनीति में वर्गीकरण का योगदान स्पष्ट कीजिए।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions) (10–20 अंक)
राजनीतिक व्यवस्थाओं के वर्गीकरण का अर्थ, आवश्यकता एवं महत्व का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
राजनीतिक व्यवस्थाओं के वर्गीकरण की पारंपरिक प्रणालियों का आलोचनात्मक विवेचन कीजिए।
प्लेटो द्वारा प्रस्तुत शासन-व्यवस्थाओं के वर्गीकरण का विस्तृत वर्णन कीजिए।
अरस्तू के राजनीतिक व्यवस्थाओं के वर्गीकरण की व्याख्या करते हुए उसकी विशेषताओं एवं सीमाओं का मूल्यांकन कीजिए।
शास्त्रीय वर्गीकरण से क्या अभिप्राय है? इसकी प्रमुख विशेषताओं एवं सीमाओं का वर्णन कीजिए।
राजनीतिक व्यवस्थाओं के वर्गीकरण की आवश्यकता क्यों होती है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
तीन-विश्व वर्गीकरण (Three Worlds Typology) का विस्तृत विवेचन कीजिए।
प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय विश्व की राजनीतिक एवं आर्थिक विशेषताओं का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।
तीन-विश्व वर्गीकरण की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए।
आधुनिक युग में राजनीतिक व्यवस्थाओं के वर्गीकरण के आधारों का विश्लेषण कीजिए।
राजनीतिक व्यवस्थाओं के वर्गीकरण में शास्त्रीय एवं आधुनिक दृष्टिकोणों की तुलना कीजिए।
वर्गीकरण किस प्रकार तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन को वैज्ञानिक बनाता है? स्पष्ट कीजिए।
प्लेटो एवं अरस्तू के वर्गीकरणों का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।
राजनीतिक व्यवस्थाओं के वर्गीकरण में शीत युद्ध की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
वर्तमान वैश्वीकरण के युग में तीन-विश्व वर्गीकरण की प्रासंगिकता का मूल्यांकन कीजिए।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
1. राजनीतिक व्यवस्थाओं के वैज्ञानिक वर्गीकरण का जनक किसे माना जाता है?
(A) प्लेटो
(B) अरस्तू
(C) लॉक
(D) रूसो
उत्तर – (B)
2. राजनीतिक व्यवस्था का संबंध मुख्यतः किससे है?
(A) केवल सरकार से
(B) केवल संविधान से
(C) सत्ता एवं निर्णय निर्माण की संपूर्ण प्रक्रिया से
(D) केवल चुनाव से
उत्तर – (C)
3. राजनीतिक व्यवस्थाओं का वर्गीकरण मुख्यतः किस उद्देश्य से किया जाता है?
(A) युद्ध करने के लिए
(B) देशों को विभाजित करने के लिए
(C) तुलनात्मक अध्ययन को सरल बनाने के लिए
(D) कर लगाने के लिए
उत्तर – (C)
4. प्लेटो की प्रसिद्ध कृति है—
(A) पॉलिटिक्स
(B) रिपब्लिक
(C) सोशल कॉन्ट्रैक्ट
(D) लेवायथन
उत्तर – (B)
5. अरस्तू ने शासन-व्यवस्थाओं का वर्गीकरण मुख्यतः कितने आधारों पर किया?
(A) एक
(B) दो
(C) तीन
(D) चार
उत्तर – (B)
6. अरस्तू के अनुसार शुद्ध शासन-रूप नहीं है—
(A) राजतंत्र
(B) कुलीनतंत्र
(C) पोलिटी
(D) तानाशाही
उत्तर – (D)
7. अरस्तू के अनुसार विकृत शासन-रूप है—
(A) पोलिटी
(B) राजतंत्र
(C) तानाशाही
(D) कुलीनतंत्र
उत्तर – (C)
8. मिश्रित शासन सिद्धांत का समर्थन किसने किया?
(A) सिसरो
(B) प्लेटो
(C) मार्क्स
(D) मैकियावेली
उत्तर – (A)
9. प्रथम विश्व के देशों की प्रमुख आर्थिक व्यवस्था थी—
(A) साम्यवाद
(B) पूँजीवाद
(C) सामंतवाद
(D) दासप्रथा
उत्तर – (B)
10. द्वितीय विश्व का नेतृत्व किसके हाथ में था?
(A) भारत
(B) चीन
(C) सोवियत संघ
(D) जापान
उत्तर – (C)
11. तृतीय विश्व के देशों की प्रमुख विशेषता थी—
(A) अत्यधिक औद्योगिक विकास
(B) औपनिवेशिक विरासत एवं विकासशील अर्थव्यवस्था
(C) पूर्ण साम्यवाद
(D) पूर्ण राजतंत्र
उत्तर – (B)
12. निम्नलिखित में से कौन प्रथम विश्व का देश था?
(A) अमेरिका
(B) भारत
(C) ब्राजील
(D) मिस्र
उत्तर – (A)
13. निम्नलिखित में से कौन तृतीय विश्व का देश माना जाता था?
(A) ब्रिटेन
(B) फ्रांस
(C) भारत
(D) कनाडा
उत्तर – (C)
14. शीत युद्ध की समाप्ति के बाद सबसे अधिक प्रभाव किस वर्गीकरण पर पड़ा?
(A) शास्त्रीय वर्गीकरण
(B) तीन-विश्व वर्गीकरण
(C) लोकतंत्र
(D) राजतंत्र
उत्तर – (B)
15. आधुनिक वर्गीकरण में किस आधार को भी महत्व दिया जाता है?
(A) राजनीतिक संस्कृति
(B) मानवाधिकार
(C) आर्थिक विकास
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर – (D)
16. पोलिटी किस विचारक से संबंधित है?
(A) प्लेटो
(B) अरस्तू
(C) हॉब्स
(D) लॉक
उत्तर – (B)
17. लोकतंत्र की प्रमुख विशेषता है—
(A) जनता की सहभागिता
(B) एकदलीय शासन
(C) निरंकुश सत्ता
(D) वंशानुगत शासन
उत्तर – (A)
18. अधिनायकवादी व्यवस्था में सत्ता होती है—
(A) जनता के हाथ में
(B) न्यायपालिका के हाथ में
(C) सीमित व्यक्तियों या एक दल के हाथ में
(D) ग्राम पंचायत के हाथ में
उत्तर – (C)
19. तुलनात्मक राजनीति का प्रमुख उद्देश्य है—
(A) युद्ध करना
(B) देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं की तुलना करना
(C) व्यापार करना
(D) चुनाव कराना
उत्तर – (B)
20. तीन-विश्व वर्गीकरण मुख्यतः किस काल में लोकप्रिय हुआ?
(A) पुनर्जागरण काल
(B) शीत युद्ध काल
(C) मध्यकाल
(D) प्राचीन काल
उत्तर – (B)
