Unit-2

Stages Of Constitutional Development, Making Of The Constituent Assembly Philosophy Of Indian Constitution, Citizenship.in Hindi
भारतीय संविधान : संवैधानिक विकास के चरण, संविधान सभा का गठन, भारतीय संविधान का दर्शन तथा नागरिकता।

भारतीय संविधान विश्व के सबसे विस्तृत, लिखित और लोकतांत्रिक संविधानों में से एक है। यह केवल शासन संचालन का विधिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम, राष्ट्रीय आंदोलन, सामाजिक परिवर्तन, लोकतांत्रिक आदर्शों और आधुनिक राष्ट्र-निर्माण की सामूहिक आकांक्षाओं का जीवंत प्रतीक भी है। भारतीय संविधान ने एक ऐसे राज्य की स्थापना की, जो संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और गणराज्य है तथा जिसका उद्देश्य प्रत्येक नागरिक को न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व प्रदान करना है। संविधान के निर्माण के पीछे लगभग दो शताब्दियों तक चले संवैधानिक विकास, राष्ट्रीय आंदोलन की राजनीतिक चेतना तथा संविधान सभा की व्यापक और गंभीर विचार-विमर्श की प्रक्रिया का योगदान रहा है। इसलिए भारतीय संविधान को समझने के लिए उसके संवैधानिक विकास के चरणों, संविधान सभा के गठन, संविधान के दार्शनिक आधार तथा नागरिकता की अवधारणा का समग्र अध्ययन आवश्यक है।

भारत में संवैधानिक विकास की प्रक्रिया ब्रिटिश शासन की स्थापना के साथ प्रारंभ हुई। ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक संगठन से राजनीतिक शक्ति बनने के बाद ब्रिटिश संसद ने समय-समय पर अनेक अधिनियम पारित किए, जिनके माध्यम से भारत के प्रशासन, न्याय व्यवस्था तथा शासन प्रणाली में परिवर्तन किए गए। प्रारंभिक उद्देश्य कंपनी के कार्यों को नियंत्रित करना था, किंतु धीरे-धीरे इन अधिनियमों ने भारत में आधुनिक प्रशासनिक एवं संवैधानिक व्यवस्था की नींव रखी। 1773 का रेग्युलेटिंग एक्ट भारत के संवैधानिक इतिहास का पहला महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। इस अधिनियम द्वारा बंगाल के गवर्नर को गवर्नर जनरल का पद दिया गया और उसकी सहायता के लिए एक परिषद की स्थापना की गई। साथ ही कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गई, जिससे न्यायिक प्रशासन का एक नया ढाँचा विकसित हुआ। यद्यपि यह अधिनियम भारतीय जनता को कोई राजनीतिक अधिकार नहीं देता था, फिर भी इसने भारत में केंद्रीय प्रशासन की आधारशिला रखी।

1784 का पिट्स इंडिया एक्ट संवैधानिक विकास की दिशा में अगला महत्वपूर्ण कदम था। इसके माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने कंपनी के राजनीतिक कार्यों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित किया। इस अधिनियम ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत का प्रशासन केवल एक व्यापारिक संस्था के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसके बाद 1813, 1833 और 1853 के चार्टर अधिनियमों ने भारतीय प्रशासन में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। 1833 के चार्टर एक्ट ने बंगाल के गवर्नर जनरल को भारत का गवर्नर जनरल बनाया और पूरे भारत के लिए कानून बनाने की शक्ति केंद्रीकृत की। इसी अधिनियम के माध्यम से प्रशासनिक एकीकरण की प्रक्रिया को गति मिली। 1853 के चार्टर एक्ट ने विधायी और कार्यपालिका के कार्यों को आंशिक रूप से अलग करने का प्रयास किया तथा प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से सिविल सेवाओं में भर्ती की दिशा में मार्ग प्रशस्त किया।

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद ब्रिटिश शासन की प्रकृति में बड़ा परिवर्तन हुआ। 1858 के भारत शासन अधिनियम के माध्यम से ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर भारत का प्रशासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन कर दिया गया। भारत सचिव तथा उसकी परिषद की स्थापना की गई और गवर्नर जनरल को वायसराय का पद दिया गया। इस अधिनियम ने कंपनी शासन का अंत कर औपचारिक रूप से ब्रिटिश शासन की शुरुआत की। इसके पश्चात 1861, 1892 और 1909 के भारतीय परिषद अधिनियमों ने विधायी परिषदों का विस्तार किया तथा सीमित भारतीय प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की। 1909 के मार्ले-मिंटो सुधारों के माध्यम से पहली बार मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था की गई, जिसने भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया।

1919 के भारत शासन अधिनियम, जिसे मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार भी कहा जाता है, ने प्रांतीय स्तर पर द्वैध शासन (डायार्की) की व्यवस्था लागू की। इसके माध्यम से प्रशासन के कुछ विषय भारतीय मंत्रियों को सौंपे गए, जबकि महत्वपूर्ण विषय ब्रिटिश अधिकारियों के नियंत्रण में रहे। यद्यपि यह व्यवस्था सफल नहीं रही, फिर भी इसने उत्तरदायी शासन की दिशा में एक प्रारंभिक कदम का कार्य किया। इसके बाद 1935 का भारत शासन अधिनियम भारतीय संवैधानिक विकास का सबसे महत्वपूर्ण औपनिवेशिक अधिनियम सिद्ध हुआ। इस अधिनियम ने प्रांतीय स्वायत्तता, संघीय ढाँचे की परिकल्पना, संघीय न्यायालय की स्थापना तथा संघ और प्रांतों के बीच शक्तियों के विभाजन जैसी व्यवस्थाएँ प्रदान कीं। भारतीय संविधान के अनेक प्रशासनिक प्रावधान, जैसे संघीय ढाँचा, राज्यपाल का पद, लोक सेवा आयोग तथा आपातकालीन प्रावधान, इसी अधिनियम से प्रेरित हैं। यद्यपि संघीय व्यवस्था पूर्ण रूप से लागू नहीं हो सकी, फिर भी यह अधिनियम भारतीय संविधान का महत्वपूर्ण आधार बना।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार ने यह स्वीकार कर लिया कि भारत को स्वतंत्रता प्रदान करना अनिवार्य है। 1946 में कैबिनेट मिशन योजना के अंतर्गत संविधान सभा के गठन का प्रस्ताव स्वीकार किया गया। संविधान सभा भारतीय संविधान के निर्माण के लिए गठित एक प्रतिनिधिक निकाय थी। इसका गठन प्रत्यक्ष चुनाव के माध्यम से नहीं, बल्कि प्रांतीय विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली से किया गया। संविधान सभा में प्रांतों तथा देशी रियासतों के प्रतिनिधियों को सम्मिलित किया गया। प्रारंभिक रूप से संविधान सभा में 389 सदस्य निर्धारित किए गए थे, जिनमें ब्रिटिश भारतीय प्रांतों और देशी रियासतों दोनों का प्रतिनिधित्व था। भारत के विभाजन के बाद पाकिस्तान के सदस्य अलग हो गए और संविधान सभा की कुल सदस्य संख्या घटकर 299 रह गई। संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई, जिसकी अध्यक्षता अस्थायी अध्यक्ष डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा ने की। बाद में डॉ. राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष निर्वाचित हुए।

संविधान सभा का कार्य अत्यंत व्यापक और जटिल था। इसके लिए विभिन्न विषयों पर अनेक समितियों का गठन किया गया। इनमें प्रारूप समिति, संघ शक्ति समिति, संघ संविधान समिति, मौलिक अधिकार समिति, अल्पसंख्यक समिति, प्रांतीय संविधान समिति तथा संचालन समिति विशेष रूप से उल्लेखनीय थीं। प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर थे, जिन्हें भारतीय संविधान का प्रमुख शिल्पकार कहा जाता है। उन्होंने विभिन्न समितियों की सिफारिशों, विश्व के संविधानों तथा भारतीय परिस्थितियों का गहन अध्ययन करके संविधान का प्रारूप तैयार किया। संविधान सभा में जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, के. एम. मुंशी, अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर, टी. टी. कृष्णमाचारी, एच. वी. कामथ, गोविंद बल्लभ पंत, पुरुषोत्तम दास टंडन तथा अनेक अन्य विद्वानों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। संविधान सभा ने लगभग दो वर्ष, ग्यारह महीने और अठारह दिन तक विस्तृत विचार-विमर्श किया। कुल 11 सत्र आयोजित हुए, 165 दिनों तक बहस चली तथा हजारों संशोधन प्रस्तावों पर विचार किया गया। अंततः 26 नवंबर 1949 को संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया गया तथा 26 जनवरी 1950 से इसे पूर्ण रूप से लागू किया गया। यही दिन भारत के गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है।

भारतीय संविधान का दर्शन उसके मूल आदर्शों, उद्देश्यों और मूल्यों में निहित है। संविधान की प्रस्तावना इन आदर्शों का संक्षिप्त एवं प्रभावशाली घोषणापत्र है। प्रस्तावना भारत को संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करती है तथा सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, अवसर की समानता तथा व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता एवं अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुत्व की भावना प्रदान करने का संकल्प व्यक्त करती है। संविधान का दर्शन केवल राजनीतिक लोकतंत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना का भी लक्ष्य रखता है। डॉ. आंबेडकर ने स्पष्ट किया था कि राजनीतिक लोकतंत्र तभी स्थायी होगा जब उसके साथ सामाजिक और आर्थिक समानता भी स्थापित की जाए।

भारतीय संविधान पर अनेक स्रोतों का प्रभाव दिखाई देता है। ब्रिटेन से संसदीय शासन प्रणाली, मंत्रिमंडलीय उत्तरदायित्व तथा विधि का शासन; अमेरिका से मौलिक अधिकार, न्यायिक समीक्षा तथा स्वतंत्र न्यायपालिका; आयरलैंड से राज्य के नीति-निर्देशक तत्व; कनाडा से संघीय व्यवस्था में शक्तिशाली केंद्र; ऑस्ट्रेलिया से समवर्ती सूची; जर्मनी से आपातकालीन प्रावधान; तथा सोवियत संघ से समाजवादी आदर्श और नागरिक कर्तव्यों की प्रेरणा प्राप्त हुई। किंतु इन सभी प्रावधानों को भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप संशोधित करके अपनाया गया। इसलिए भारतीय संविधान केवल विभिन्न संविधानों का संकलन नहीं है, बल्कि भारतीय अनुभवों, स्वतंत्रता संग्राम के आदर्शों और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का मौलिक समन्वय है।

भारतीय संविधान का मूल दर्शन न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों पर आधारित है। सामाजिक न्याय का उद्देश्य जाति, लिंग, धर्म और जन्म के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करना है। आर्थिक न्याय का लक्ष्य संसाधनों का न्यायसंगत वितरण तथा शोषण का अंत करना है। राजनीतिक न्याय प्रत्येक नागरिक को समान राजनीतिक अधिकार प्रदान करता है। स्वतंत्रता नागरिकों को विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और संगठन की स्वतंत्रता देती है। समानता सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता तथा अवसर की समानता प्रदान करती है। बंधुत्व राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता और व्यक्ति की गरिमा की रक्षा का आधार है। यही मूल्य भारतीय लोकतंत्र की आत्मा हैं।

भारतीय संविधान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय नागरिकता है। नागरिकता से अभिप्राय राज्य और व्यक्ति के बीच उस वैधानिक संबंध से है जिसके आधार पर व्यक्ति को राज्य के प्रति अधिकार प्राप्त होते हैं तथा उसके प्रति कुछ कर्तव्यों का पालन करना पड़ता है। प्रत्येक नागरिक राज्य का विधिक सदस्य होता है और उसे संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का लाभ प्राप्त होता है। भारतीय संविधान के भाग II में अनुच्छेद 5 से 11 तक नागरिकता संबंधी प्रावधान दिए गए हैं। संविधान लागू होने के समय नागरिकता का निर्धारण निवास, जन्म, वंश तथा प्रवास के आधार पर किया गया था। बाद में नागरिकता संबंधी विस्तृत व्यवस्था नागरिकता अधिनियम, 1955 द्वारा की गई, जिसमें जन्म, वंश, पंजीकरण, देशीयकरण तथा किसी क्षेत्र के भारत में विलय के आधार पर नागरिकता प्राप्त करने के प्रावधान किए गए।

भारतीय संविधान ने एकल नागरिकता (Single Citizenship) की व्यवस्था को अपनाया है। इसका अर्थ यह है कि भारत में संघ और राज्यों के लिए अलग-अलग नागरिकता नहीं है, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति केवल भारत का नागरिक होता है। यह व्यवस्था राष्ट्रीय एकता और अखंडता को मजबूत करती है। इसके विपरीत अमेरिका जैसे संघीय देशों में दोहरी नागरिकता की व्यवस्था पाई जाती है। भारतीय नागरिकों को मतदान का अधिकार, सार्वजनिक पदों पर नियुक्ति की पात्रता, मौलिक अधिकारों का संरक्षण तथा लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर प्राप्त होता है। साथ ही नागरिकों का कर्तव्य है कि वे संविधान का पालन करें, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करें, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करें, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करें, पर्यावरण की रक्षा करें तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाए रखें।

समय के साथ नागरिकता का महत्व और भी बढ़ गया है। वैश्वीकरण, प्रवासन, दोहरी नागरिकता, प्रवासी भारतीयों की स्थिति तथा राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे प्रश्न नागरिकता की अवधारणा को अधिक जटिल बनाते हैं। भारत ने प्रवासी भारतीयों के लिए भारतीय मूल के व्यक्तियों (PIO) तथा भारत के विदेशी नागरिक (OCI) जैसी व्यवस्थाएँ विकसित की हैं, यद्यपि पूर्ण दोहरी नागरिकता की व्यवस्था अभी भी स्वीकार नहीं की गई है। नागरिकता केवल कानूनी स्थिति नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक सहभागिता, राष्ट्रीय दायित्व और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता का भी प्रतीक है।

इस प्रकार भारतीय संविधान का निर्माण एक दीर्घ संवैधानिक विकास की प्रक्रिया का परिणाम है, जिसकी शुरुआत औपनिवेशिक शासन के विभिन्न अधिनियमों से हुई और जिसकी परिणति संविधान सभा द्वारा निर्मित एक लोकतांत्रिक, समावेशी और आधुनिक संविधान के रूप में हुई। संविधान सभा ने व्यापक विचार-विमर्श और राष्ट्रीय सहमति के आधार पर ऐसा संविधान तैयार किया जो भारतीय समाज की विविधता, लोकतांत्रिक आकांक्षाओं और सामाजिक न्याय की आवश्यकताओं को संतुलित रूप से अभिव्यक्त करता है। संविधान का दर्शन न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे सार्वभौमिक मूल्यों पर आधारित है तथा नागरिकता की अवधारणा राज्य और नागरिक के बीच अधिकारों एवं कर्तव्यों के संतुलित संबंध को स्थापित करती है। यही कारण है कि भारतीय संविधान केवल शासन का विधिक दस्तावेज नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा, राष्ट्रीय एकता का आधार और आधुनिक भारत के निर्माण का मार्गदर्शक ग्रंथ माना जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions) (2–5 अंक)
  1. भारतीय संविधान से क्या अभिप्राय है?
  2. भारत के संवैधानिक विकास से क्या आशय है?
  3. रेग्युलेटिंग एक्ट, 1773 का महत्व लिखिए।
  4. पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
  5. चार्टर एक्ट, 1833 का महत्व स्पष्ट कीजिए।
  6. चार्टर एक्ट, 1853 की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
  7. भारत शासन अधिनियम, 1858 का महत्व स्पष्ट कीजिए।
  8. भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 की विशेषताएँ लिखिए।
  9. भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 का महत्व बताइए।
  10. मार्ले-मिंटो सुधार, 1909 क्या थे?
  11. मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार, 1919 की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
  12. द्वैध शासन (Dyarchy) से क्या अभिप्राय है?
  13. भारत शासन अधिनियम, 1935 की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
  14. भारत शासन अधिनियम, 1935 को भारतीय संविधान का आधार क्यों कहा जाता है?
  15. संविधान सभा के गठन का प्रस्ताव किस योजना के अंतर्गत दिया गया?
  16. संविधान सभा का गठन कब हुआ?
  17. संविधान सभा की पहली बैठक कब हुई?
  18. संविधान सभा के अस्थायी अध्यक्ष कौन थे?
  19. संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष कौन थे?
  20. प्रारूप समिति (Drafting Committee) के अध्यक्ष कौन थे?
  21. डॉ. भीमराव आंबेडकर को संविधान का शिल्पकार क्यों कहा जाता है?
  22. संविधान सभा में कुल कितनी समितियाँ गठित की गई थीं?
  23. संविधान सभा ने संविधान बनाने में कितना समय लिया?
  24. भारतीय संविधान कब अंगीकृत किया गया?
  25. भारतीय संविधान कब लागू हुआ?
  26. संविधान की प्रस्तावना से क्या अभिप्राय है?
  27. प्रस्तावना में उल्लिखित चार प्रमुख आदर्श लिखिए।
  28. संविधान में "संप्रभु" शब्द का क्या अर्थ है?
  29. "समाजवादी" शब्द का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
  30. "धर्मनिरपेक्ष" राज्य से क्या अभिप्राय है?
  31. "लोकतांत्रिक गणराज्य" का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
  32. भारतीय संविधान के दर्शन का आधार क्या है?
  33. भारतीय संविधान पर ब्रिटिश संविधान का क्या प्रभाव है?
  34. भारतीय संविधान पर अमेरिकी संविधान का क्या प्रभाव है?
  35. नीति-निर्देशक तत्व किस देश से प्रेरित हैं?
  36. न्यायिक समीक्षा की अवधारणा किस देश से ली गई है?
  37. नागरिकता से क्या अभिप्राय है?
  38. भारतीय संविधान के किस भाग में नागरिकता का उल्लेख है?
  39. नागरिकता से संबंधित अनुच्छेद कौन-कौन से हैं?
  40. नागरिकता अधिनियम, 1955 का उद्देश्य क्या है?
  41. भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के प्रमुख आधार लिखिए।
  42. एकल नागरिकता से क्या अभिप्राय है?
  43. भारत में एकल नागरिकता क्यों अपनाई गई?
  44. दोहरी नागरिकता क्या होती है?
  45. भारतीय नागरिकों के दो प्रमुख अधिकार लिखिए।
  46. भारतीय नागरिकों के दो प्रमुख कर्तव्य लिखिए।
  47. मौलिक कर्तव्यों का महत्व स्पष्ट कीजिए।
  48. OCI (Overseas Citizen of India) से क्या अभिप्राय है?
  49. भारतीय संविधान की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
  50. भारतीय संविधान को विश्व का सबसे विस्तृत संविधान क्यों कहा जाता है?

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions) (10–20 अंक)
  1. भारत के संवैधानिक विकास के चरणों का क्रमबद्ध वर्णन कीजिए।
  2. रेग्युलेटिंग एक्ट, 1773 से भारत शासन अधिनियम, 1935 तक के संवैधानिक विकास का विश्लेषण कीजिए।
  3. भारत शासन अधिनियम, 1935 की प्रमुख विशेषताओं एवं महत्व का मूल्यांकन कीजिए।
  4. संविधान सभा के गठन, संरचना एवं कार्यों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
  5. संविधान निर्माण में डॉ. बी. आर. आंबेडकर के योगदान का विश्लेषण कीजिए।
  6. भारतीय संविधान के निर्माण की प्रक्रिया का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
  7. भारतीय संविधान के दर्शन का विवेचन कीजिए।
  8. भारतीय संविधान की प्रस्तावना के आदर्शों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
  9. भारतीय संविधान के दार्शनिक आधारों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
  10. भारतीय संविधान पर विभिन्न विदेशी संविधानों के प्रभाव का विश्लेषण कीजिए।
  11. भारतीय संविधान में न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की अवधारणाओं का विश्लेषण कीजिए।
  12. भारतीय नागरिकता की अवधारणा एवं नागरिकता प्राप्त करने के आधारों का वर्णन कीजिए।
  13. भारतीय संविधान में एकल नागरिकता की व्यवस्था का मूल्यांकन कीजिए।
  14. भारतीय नागरिकों के अधिकारों एवं कर्तव्यों का विश्लेषण कीजिए।
  15. भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताओं का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
  16. भारतीय संविधान को विश्व का सर्वश्रेष्ठ लोकतांत्रिक संविधान क्यों कहा जाता है? स्पष्ट कीजिए।
  17. भारतीय संविधान और राष्ट्रीय एकता के संबंध का विश्लेषण कीजिए।
  18. संविधान सभा की विभिन्न समितियों का वर्णन कीजिए।
  19. भारतीय संविधान के निर्माण में संविधान सभा की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।
  20. भारतीय संविधान की समकालीन प्रासंगिकता पर आलोचनात्मक टिप्पणी कीजिए।

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) (उत्तर सहित)

1. भारत के संवैधानिक विकास का प्रथम महत्वपूर्ण अधिनियम कौन-सा था?
(A) चार्टर एक्ट, 1833
(B) रेग्युलेटिंग एक्ट, 1773
(C) भारत शासन अधिनियम, 1858
(D) पिट्स इंडिया एक्ट, 1784
उत्तर – (B)

2. पिट्स इंडिया एक्ट कब पारित हुआ था?
(A) 1773
(B) 1784
(C) 1813
(D) 1833
उत्तर – (B)

3. भारत का पहला गवर्नर जनरल कौन था?
(A) लॉर्ड डलहौजी
(B) लॉर्ड विलियम बेंटिक
(C) वॉरेन हेस्टिंग्स
(D) लॉर्ड कर्जन
उत्तर – (C)

4. ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन किस अधिनियम द्वारा समाप्त किया गया?
(A) भारत शासन अधिनियम, 1858
(B) चार्टर एक्ट, 1853
(C) परिषद अधिनियम, 1861
(D) भारत शासन अधिनियम, 1935
उत्तर – (A)

5. मार्ले-मिंटो सुधार किस वर्ष लागू हुए?
(A) 1892
(B) 1909
(C) 1919
(D) 1935
उत्तर – (B)

6. मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार किस अधिनियम से संबंधित हैं?
(A) भारत शासन अधिनियम, 1919
(B) भारत शासन अधिनियम, 1935
(C) परिषद अधिनियम, 1909
(D) चार्टर एक्ट, 1833
उत्तर – (A)

7. द्वैध शासन (Dyarchy) किस अधिनियम द्वारा लागू किया गया?
(A) 1909
(B) 1919
(C) 1935
(D) 1858
उत्तर – (B)

8. भारत शासन अधिनियम, 1935 की प्रमुख विशेषता थी—
(A) प्रांतीय स्वायत्तता
(B) पृथक निर्वाचन
(C) कंपनी शासन
(D) प्रत्यक्ष चुनाव
उत्तर – (A)

9. संविधान सभा का गठन किस योजना के अंतर्गत हुआ?
(A) वेवेल योजना
(B) कैबिनेट मिशन योजना
(C) क्रिप्स योजना
(D) माउंटबेटन योजना
उत्तर – (B)

10. संविधान सभा की पहली बैठक कब हुई?
(A) 15 अगस्त 1947
(B) 9 दिसंबर 1946
(C) 26 नवंबर 1949
(D) 26 जनवरी 1950
उत्तर – (B)

11. संविधान सभा के अस्थायी अध्यक्ष कौन थे?
(A) डॉ. राजेंद्र प्रसाद
(B) डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा
(C) डॉ. बी. आर. आंबेडकर
(D) जवाहरलाल नेहरू
उत्तर – (B)

12. संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष कौन थे?
(A) जवाहरलाल नेहरू
(B) डॉ. बी. आर. आंबेडकर
(C) डॉ. राजेंद्र प्रसाद
(D) सरदार पटेल
उत्तर – (C)

13. प्रारूप समिति (Drafting Committee) के अध्यक्ष कौन थे?
(A) जवाहरलाल नेहरू
(B) डॉ. बी. आर. आंबेडकर
(C) सरदार पटेल
(D) के. एम. मुंशी
उत्तर – (B)

14. भारतीय संविधान कब अंगीकृत किया गया?
(A) 15 अगस्त 1947
(B) 26 नवंबर 1949
(C) 26 जनवरी 1950
(D) 9 दिसंबर 1946
उत्तर – (B)

15. भारतीय संविधान कब लागू हुआ?
(A) 15 अगस्त 1947
(B) 26 जनवरी 1950
(C) 26 नवंबर 1949
(D) 9 दिसंबर 1946
उत्तर – (B)

16. संविधान की प्रस्तावना में कितने प्रमुख आदर्शों का उल्लेख है?
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच
उत्तर – (C)

17. भारतीय संविधान में नीति-निर्देशक तत्व किस देश से लिए गए हैं?
(A) अमेरिका
(B) आयरलैंड
(C) कनाडा
(D) फ्रांस
उत्तर – (B)

18. न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की अवधारणा किस देश से ली गई है?
(A) ब्रिटेन
(B) अमेरिका
(C) रूस
(D) जापान
उत्तर – (B)

19. भारत में किस प्रकार की नागरिकता की व्यवस्था है?
(A) दोहरी नागरिकता
(B) एकल नागरिकता
(C) क्षेत्रीय नागरिकता
(D) अस्थायी नागरिकता
उत्तर – (B)

20. भारतीय संविधान में नागरिकता संबंधी प्रावधान किस भाग में हैं?
(A) भाग I
(B) भाग II
(C) भाग III
(D) भाग IV
उत्तर – (B)

21. नागरिकता संबंधी अनुच्छेद हैं—
(A) 1–4
(B) 5–11
(C) 12–35
(D) 36–51
उत्तर – (B)

22. नागरिकता अधिनियम किस वर्ष पारित किया गया?
(A) 1950
(B) 1952
(C) 1955
(D) 1976
उत्तर – (C)

23. भारतीय संविधान की प्रस्तावना में "धर्मनिरपेक्ष" शब्द किस संशोधन द्वारा जोड़ा गया?
(A) 24वाँ संशोधन
(B) 42वाँ संशोधन
(C) 44वाँ संशोधन
(D) 52वाँ संशोधन
उत्तर – (B)

24. भारतीय संविधान का मुख्य उद्देश्य है—
(A) निरंकुश शासन की स्थापना
(B) न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की स्थापना
(C) केवल आर्थिक विकास
(D) केवल प्रशासनिक सुधार
उत्तर – (B)

25. भारतीय संविधान को विश्व का सबसे विस्तृत लिखित संविधान माना जाता है क्योंकि—
(A) इसमें शासन, अधिकार, कर्तव्य, संघीय व्यवस्था और प्रशासन के विस्तृत प्रावधान हैं।
(B) इसमें केवल मौलिक अधिकार हैं।
(C) इसमें केवल न्यायपालिका का वर्णन है।
(D) इसमें केवल संसद का उल्लेख है।
उत्तर – (A)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!
dinamobet - dinamobet giriş - dinamobet güncel giriş
dinamobet
dinamobet - dinamobet giriş - dinamobet güncel giriş
dinamobet
dinamobet
dinamobet
Dinamobet
betasus
meritking
dinamobet