Unit-05
Religion &Politics in India, Debates on Secularism
भारत में धर्म एवं राजनीति तथा धर्मनिरपेक्षता पर बहस।
मानव सभ्यता के विकास के साथ धर्म और राजनीति दोनों ने समाज के संगठन तथा संचालन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। धर्म ने मनुष्य को नैतिकता, आचरण, कर्तव्य, विश्वास तथा आध्यात्मिक जीवन की दिशा प्रदान की, जबकि राजनीति ने समाज में व्यवस्था, शासन, कानून और सार्वजनिक जीवन को संगठित करने का कार्य किया। यद्यपि दोनों की प्रकृति और उद्देश्य भिन्न हैं, फिर भी इतिहास के लगभग प्रत्येक काल में इनका परस्पर संबंध किसी न किसी रूप में विद्यमान रहा है। कई बार धर्म ने राजनीति को नैतिक आधार प्रदान किया, तो कई अवसरों पर राजनीति ने धर्म का उपयोग सत्ता प्राप्ति अथवा सामाजिक समर्थन के साधन के रूप में किया। इसी कारण धर्म और राजनीति का संबंध राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय माना जाता है।
भारत का सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन विविधताओं से परिपूर्ण है। यहाँ अनेक धर्म, भाषाएँ, संस्कृतियाँ, परंपराएँ और जीवन-पद्धतियाँ सहस्राब्दियों से साथ-साथ विकसित होती रही हैं। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी तथा अन्य अनेक धार्मिक समुदाय भारतीय समाज का अभिन्न अंग हैं। यह विविधता भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है। किंतु इतनी व्यापक धार्मिक विविधता वाले समाज में शासन की व्यवस्था केवल किसी एक धर्म के आधार पर संचालित नहीं की जा सकती। लोकतांत्रिक राज्य का दायित्व सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करना और प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता प्रदान करना है। इसी आवश्यकता ने भारतीय धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को जन्म दिया।
प्राचीन भारत में धर्म और राज्य के संबंधों का स्वरूप आधुनिक काल से भिन्न था। शासकों को धर्म का संरक्षक माना जाता था, किंतु विभिन्न धार्मिक परंपराओं के प्रति सहिष्णुता भी भारतीय जीवन का महत्वपूर्ण गुण रही। सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म को अपनाने के बाद भी अन्य धर्मों के प्रति सम्मान और सहिष्णुता का संदेश दिया। मध्यकाल में भी अनेक शासकों ने धार्मिक सह-अस्तित्व को बढ़ावा दिया, जबकि कुछ कालखंडों में धार्मिक असहिष्णुता और संघर्ष भी देखने को मिले। इन ऐतिहासिक अनुभवों ने भारतीय समाज को यह सिखाया कि स्थायी शांति और सामाजिक समरसता के लिए धार्मिक सहिष्णुता आवश्यक है।
ब्रिटिश शासन के दौरान धर्म और राजनीति का संबंध एक नए रूप में सामने आया। औपनिवेशिक शासन ने अनेक अवसरों पर धार्मिक और सामुदायिक भेदों का राजनीतिक उपयोग किया। पृथक निर्वाचन, सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व और विभाजनकारी नीतियों ने विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच अविश्वास को बढ़ाया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, डॉ. भीमराव अम्बेडकर तथा अन्य नेताओं ने धार्मिक स्वतंत्रता, सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता पर बल दिया। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय देश के विभाजन ने यह स्पष्ट कर दिया कि धर्म और राजनीति का असंतुलित संबंध राष्ट्रीय एकता के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में भारत ने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना का मार्ग चुना। भारतीय संविधान ने किसी एक धर्म को राज्य धर्म घोषित नहीं किया। इसके स्थान पर सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान, धार्मिक स्वतंत्रता, समान नागरिकता और विधि के समक्ष समानता को संवैधानिक आधार प्रदान किया गया। संविधान के मौलिक अधिकार प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने, उसका प्रचार करने और धार्मिक संस्थाओं की स्थापना करने की स्वतंत्रता प्रदान करते हैं, बशर्ते कि यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के विरुद्ध न हो। इस प्रकार भारतीय धर्मनिरपेक्षता धर्म-विरोध नहीं, बल्कि सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार और राज्य की निष्पक्षता का सिद्धांत है।
भारतीय लोकतंत्र में धर्म और राजनीति का संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। चुनावों, राजनीतिक दलों, सामाजिक आंदोलनों और जनमत निर्माण में धार्मिक पहचान कभी-कभी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अनेक राजनीतिक दल धार्मिक समुदायों की आकांक्षाओं, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक हितों से जुड़े मुद्दों को अपने राजनीतिक कार्यक्रमों में स्थान देते हैं। दूसरी ओर, न्यायपालिका और निर्वाचन आयोग समय-समय पर यह सुनिश्चित करने का प्रयास करते हैं कि धर्म का उपयोग संविधान की भावना और लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध न हो।
भारत में धर्म और राजनीति का संबंध अत्यंत जटिल है। एक ओर धर्म नागरिकों के नैतिक जीवन, सामाजिक सेवा, शिक्षा, दान तथा सांस्कृतिक संरक्षण में सकारात्मक भूमिका निभाता है। दूसरी ओर यदि धर्म का उपयोग राजनीतिक ध्रुवीकरण, सांप्रदायिक तनाव या चुनावी लाभ के लिए किया जाए, तो इससे लोकतंत्र, सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता प्रभावित हो सकती है। इसलिए भारतीय लोकतंत्र का उद्देश्य धर्म का दमन करना नहीं, बल्कि सभी धार्मिक समुदायों के बीच समानता, सहिष्णुता और संवैधानिक मर्यादा बनाए रखना है।
धर्मनिरपेक्षता पर होने वाली बहसें भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। कुछ विचारकों का मत है कि राज्य को धर्म से पूर्णतः अलग रहना चाहिए, जबकि अन्य का मानना है कि भारतीय परिस्थितियों में राज्य को सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान रखते हुए आवश्यक होने पर सामाजिक सुधार के लिए हस्तक्षेप भी करना चाहिए। भारतीय अनुभव ने धर्मनिरपेक्षता को एक व्यावहारिक और संतुलित रूप प्रदान किया है, जिसमें धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया जाता है।
वर्तमान समय में वैश्वीकरण, सामाजिक मीडिया, पहचान की राजनीति और बदलते राजनीतिक परिवेश ने धर्म एवं राजनीति के संबंध को और अधिक जटिल बना दिया है। इसलिए भारत में धर्म और राजनीति का अध्ययन केवल ऐतिहासिक या संवैधानिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और लोकतांत्रिक विकास के संदर्भ में भी अत्यंत आवश्यक है। भारतीय लोकतंत्र की स्थिरता और सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि धार्मिक विविधता को राष्ट्रीय एकता, संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक संस्कृति के साथ किस प्रकार संतुलित किया जाता है।
भाग–1 : वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs)
1. भारतीय संविधान के अनुसार भारत किस प्रकार का राज्य है?
(अ) धार्मिक राज्य
(ब) धर्मनिरपेक्ष राज्य
(स) राजतंत्रीय राज्य
(द) साम्यवादी राज्य
उत्तर – (ब)
2. भारतीय संविधान की प्रस्तावना में 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द किस संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया?
(अ) 24वाँ
(ब) 42वाँ
(स) 44वाँ
(द) 52वाँ
उत्तर – (ब)
3. भारतीय संविधान का कौन-सा अनुच्छेद धर्म की स्वतंत्रता प्रदान करता है?
(अ) अनुच्छेद 14
(ब) अनुच्छेद 19
(स) अनुच्छेद 25
(द) अनुच्छेद 32
उत्तर – (स)
4. अनुच्छेद 26 किससे संबंधित है?
(अ) समानता
(ब) धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन की स्वतंत्रता
(स) शिक्षा का अधिकार
(द) मतदान का अधिकार
उत्तर – (ब)
5. भारतीय धर्मनिरपेक्षता का मूल सिद्धांत क्या है?
(अ) राज्य का किसी एक धर्म का समर्थन
(ब) सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान
(स) धर्म पर प्रतिबंध
(द) केवल बहुसंख्यक धर्म की मान्यता
उत्तर – (ब)
6. निम्नलिखित में से कौन भारतीय धर्मनिरपेक्षता की विशेषता है?
(अ) राज्य धर्म
(ब) सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार
(स) धर्म का निषेध
(द) धार्मिक शासन
उत्तर – (ब)
7. भारत में धार्मिक स्वतंत्रता किस भाग में दी गई है?
(अ) नीति-निर्देशक तत्व
(ब) मौलिक अधिकार
(स) मूल कर्तव्य
(द) अनुसूचियाँ
उत्तर – (ब)
8. धर्म और राजनीति के संतुलन का उद्देश्य क्या है?
(अ) सामाजिक सद्भाव बनाए रखना
(ब) धर्म समाप्त करना
(स) चुनाव समाप्त करना
(द) संसद समाप्त करना
उत्तर – (अ)
9. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 27 किससे संबंधित है?
(अ) धार्मिक कर से मुक्ति
(ब) शिक्षा
(स) निर्वाचन
(द) नागरिकता
उत्तर – (अ)
10. अनुच्छेद 28 किससे संबंधित है?
(अ) धार्मिक शिक्षा
(ब) संसद
(स) न्यायपालिका
(द) राष्ट्रपति
उत्तर – (अ)
11. भारतीय धर्मनिरपेक्षता का उद्देश्य क्या है?
(अ) सभी धर्मों की समान सुरक्षा
(ब) केवल एक धर्म का संरक्षण
(स) धर्म समाप्त करना
(द) धर्म परिवर्तन कराना
उत्तर – (अ)
12. धर्म आधारित राजनीति का नकारात्मक प्रभाव क्या हो सकता है?
(अ) राष्ट्रीय एकता
(ब) सांप्रदायिक तनाव
(स) वैज्ञानिक विकास
(द) आर्थिक प्रगति
उत्तर – (ब)
13. भारतीय लोकतंत्र का आधार क्या है?
(अ) धार्मिक शासन
(ब) संवैधानिक शासन
(स) राजतंत्र
(द) सैन्य शासन
उत्तर – (ब)
14. भारत में सभी नागरिकों को समानता का अधिकार किस अनुच्छेद में दिया गया है?
(अ) अनुच्छेद 14
(ब) अनुच्छेद 21
(स) अनुच्छेद 25
(द) अनुच्छेद 29
उत्तर – (अ)
15. निम्न में से कौन भारतीय धर्मनिरपेक्षता की चुनौती है?
(अ) सांप्रदायिकता
(ब) वैज्ञानिक अनुसंधान
(स) पंचायती राज
(द) हरित क्रांति
उत्तर – (अ)
16. भारतीय संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता किन अनुच्छेदों में निहित है?
(अ) 12–18
(ब) 25–28
(स) 32–35
(द) 36–51
उत्तर – (ब)
17. धर्मनिरपेक्ष राज्य का अर्थ है—
(अ) राज्य का कोई धर्म नहीं होता
(ब) राज्य धर्म का विरोध करता है
(स) राज्य केवल बहुसंख्यक धर्म को मान्यता देता है
(द) राज्य धार्मिक संस्थाओं द्वारा संचालित होता है
उत्तर – (अ)
18. भारतीय धर्मनिरपेक्षता किस सिद्धांत पर आधारित है?
(अ) सर्वधर्म समभाव
(ब) धार्मिक शासन
(स) राजतंत्र
(द) साम्यवाद
उत्तर – (अ)
19. भारतीय संविधान का सर्वोच्च उद्देश्य क्या है?
(अ) धार्मिक शासन
(ब) लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और न्यायपूर्ण समाज
(स) राजशाही
(द) सैन्य शासन
उत्तर – (ब)
20. भारतीय लोकतंत्र में धर्म की भूमिका कैसी होनी चाहिए?
(अ) संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर
(ब) राज्य पर पूर्ण नियंत्रण
(स) चुनावों पर पूर्ण नियंत्रण
(द) न्यायपालिका का संचालन
उत्तर – (अ)
भाग–2 : अति लघु उत्तरीय प्रश्न
धर्मनिरपेक्षता क्या है?
भारतीय धर्मनिरपेक्षता से क्या अभिप्राय है?
धर्म और राजनीति में क्या अंतर है?
अनुच्छेद 25 क्या है?
अनुच्छेद 26 क्या है?
अनुच्छेद 27 क्या है?
अनुच्छेद 28 क्या है?
सर्वधर्म समभाव क्या है?
सांप्रदायिकता क्या है?
धर्म आधारित राजनीति क्या है?
भारतीय संविधान में धर्म की स्वतंत्रता क्यों दी गई है?
धर्मनिरपेक्ष राज्य की दो विशेषताएँ लिखिए।
धार्मिक स्वतंत्रता का महत्व लिखिए।
धर्मनिरपेक्षता और समानता का संबंध लिखिए।
धार्मिक सहिष्णुता क्या है?
भारतीय लोकतंत्र में धर्म की भूमिका लिखिए।
राजनीति में धर्म के सकारात्मक पक्ष लिखिए।
राजनीति में धर्म के नकारात्मक पक्ष लिखिए।
धार्मिक विविधता का महत्व लिखिए।
राष्ट्रीय एकता में धर्मनिरपेक्षता का योगदान लिखिए।
संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष शब्द कब जोड़ा गया?
धर्मनिरपेक्षता पर बहस क्यों होती है?
धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों का संबंध लिखिए।
भारतीय धर्मनिरपेक्षता की दो विशेषताएँ लिखिए।
धार्मिक सद्भाव का महत्व लिखिए।
भाग–3 : लघु उत्तरीय प्रश्न
धर्म एवं राजनीति की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
भारत में धर्म एवं राजनीति के संबंध का वर्णन कीजिए।
भारतीय धर्मनिरपेक्षता की विशेषताएँ लिखिए।
धर्मनिरपेक्षता और पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता में अंतर स्पष्ट कीजिए।
अनुच्छेद 25–28 का महत्व स्पष्ट कीजिए।
धर्म आधारित राजनीति के सकारात्मक पक्ष लिखिए।
धर्म आधारित राजनीति के नकारात्मक पक्ष लिखिए।
सांप्रदायिकता की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
धार्मिक सहिष्णुता का महत्व बताइए।
धर्म और लोकतंत्र के संबंध की व्याख्या कीजिए।
भारतीय संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता का महत्व स्पष्ट कीजिए।
धर्मनिरपेक्षता पर प्रमुख बहसों का उल्लेख कीजिए।
राष्ट्रीय एकता में धर्मनिरपेक्षता की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
भारतीय राजनीति में धार्मिक विविधता का प्रभाव बताइए।
धर्म और सामाजिक न्याय का संबंध स्पष्ट कीजिए।
धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों का संबंध स्पष्ट कीजिए।
धर्मनिरपेक्षता की चुनौतियों का वर्णन कीजिए।
धर्मनिरपेक्ष राज्य की विशेषताएँ लिखिए।
राजनीति में धार्मिक प्रतीकों के उपयोग पर टिप्पणी कीजिए।
भारतीय लोकतंत्र में संवैधानिक मूल्यों का महत्व स्पष्ट कीजिए।
भाग–4 : दीर्घ उत्तरीय / निबंधात्मक प्रश्न
भारत में धर्म एवं राजनीति के संबंध का विस्तृत विश्लेषण कीजिए।
भारतीय धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा एवं विशेषताओं का विवेचन कीजिए।
भारतीय संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित प्रावधानों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
धर्मनिरपेक्षता पर प्रमुख बहसों का आलोचनात्मक अध्ययन कीजिए।
भारतीय धर्मनिरपेक्षता एवं पाश्चात्य धर्मनिरपेक्षता का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।
भारतीय लोकतंत्र में धर्म की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।
राजनीति में धर्म की सकारात्मक एवं नकारात्मक भूमिकाओं का विश्लेषण कीजिए।
सांप्रदायिकता के कारणों एवं उसके समाधान पर विस्तृत चर्चा कीजिए।
राष्ट्रीय एकता एवं सामाजिक सद्भाव में धर्मनिरपेक्षता की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
"भारतीय धर्मनिरपेक्षता सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान पर आधारित है।" इस कथन की समीक्षा कीजिए।
भारतीय संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता एवं समानता के सिद्धांत का विश्लेषण कीजिए।
धर्म एवं राजनीति के संबंध का समकालीन भारतीय संदर्भ में आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के पारस्परिक संबंध की व्याख्या कीजिए।
भारतीय लोकतंत्र के समक्ष धर्म आधारित राजनीति की चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए।
धार्मिक बहुलता और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए।
