Unit-08
Evolution of Indian Administration–Ancient, Medival, Modern
भारतीय प्रशासन का विकास : प्राचीन, मध्यकालीन एवं आधुनिक प्रशासन
भारतीय प्रशासन का इतिहास विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध प्रशासनिक परंपराओं में से एक माना जाता है। भारत में प्रशासनिक व्यवस्था का विकास किसी एक काल या शासक का परिणाम नहीं है, बल्कि यह हजारों वर्षों में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक परिवर्तनों के साथ क्रमिक रूप से विकसित हुई एक सतत प्रक्रिया है। विभिन्न युगों में शासन की आवश्यकताओं, राज्य की प्रकृति, समाज की संरचना तथा जनता की अपेक्षाओं के अनुसार प्रशासनिक संस्थाओं और कार्यप्रणालियों में परिवर्तन होते रहे। यही कारण है कि आज का भारतीय प्रशासन प्राचीन भारतीय परंपराओं, मध्यकालीन प्रशासनिक अनुभवों तथा आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों का एक समन्वित स्वरूप प्रस्तुत करता है।
प्राचीन भारत में प्रशासन का आधार धर्म, नैतिकता, न्याय और लोककल्याण था। वैदिक काल में शासन अपेक्षाकृत सरल था तथा राजा को समाज का संरक्षक माना जाता था। राजा की शक्ति पूर्णतः निरंकुश नहीं थी, क्योंकि सभा, समिति तथा अन्य सामाजिक संस्थाएँ उसके कार्यों पर नैतिक नियंत्रण रखती थीं। प्रशासन का उद्देश्य केवल राज्य की सुरक्षा करना नहीं, बल्कि जनता के जीवन में शांति, समृद्धि और न्याय स्थापित करना भी था। शासन व्यवस्था में ग्राम प्रशासन का विशेष महत्व था। ग्राम समाज आर्थिक और प्रशासनिक दृष्टि से काफी हद तक आत्मनिर्भर था तथा ग्राम प्रमुख स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक कार्यों का संचालन करता था।
उत्तरवैदिक काल में राज्य का आकार बढ़ने के साथ प्रशासनिक व्यवस्था अधिक संगठित होती गई। कर व्यवस्था, न्याय व्यवस्था, सेना तथा राजस्व प्रशासन का विस्तार हुआ। महाजनपदों के उदय ने प्रशासनिक संस्थाओं को अधिक सुदृढ़ बनाया। इस काल में प्रशासन का उद्देश्य केवल शासन चलाना नहीं, बल्कि राज्य की आर्थिक शक्ति को मजबूत करना भी था।
मौर्य काल भारतीय प्रशासन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। इस युग में पहली बार एक विशाल साम्राज्य के संचालन के लिए अत्यंत संगठित, केंद्रीकृत और व्यवस्थित प्रशासनिक ढाँचे का निर्माण हुआ। सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य और उनके महामंत्री कौटिल्य ने प्रशासन को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में प्रशासन, वित्त, न्याय, विदेश नीति, गुप्तचर व्यवस्था तथा लोककल्याण के संबंध में विस्तृत सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं। मौर्य प्रशासन में विभिन्न विभागों की स्थापना की गई थी, जिनके लिए अलग-अलग अधिकारी नियुक्त किए जाते थे। कर संग्रह, व्यापार नियंत्रण, कृषि विकास, सिंचाई व्यवस्था, नगर प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाता था।
सम्राट अशोक के शासनकाल में प्रशासन को नैतिक और मानवीय दृष्टिकोण प्राप्त हुआ। अशोक ने ‘धम्म’ के सिद्धांतों के माध्यम से प्रशासन को लोककल्याण, धार्मिक सहिष्णुता, नैतिक आचरण और प्रजा के प्रति उत्तरदायित्व से जोड़ा। उन्होंने धर्ममहामात्रों की नियुक्ति की, जिनका कार्य जनता के नैतिक एवं सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देना था। अशोक के प्रशासन में शासन का उद्देश्य केवल कानून लागू करना नहीं, बल्कि जनता के जीवन को अधिक सुखी और सुरक्षित बनाना भी था।
गुप्त काल में प्रशासन अपेक्षाकृत विकेंद्रीकृत स्वरूप में विकसित हुआ। यद्यपि सम्राट सर्वोच्च शासक था, फिर भी प्रांतीय एवं स्थानीय अधिकारियों को पर्याप्त अधिकार प्राप्त थे। इस काल में नगर समितियों और ग्राम सभाओं की भूमिका बढ़ी। स्थानीय प्रशासन में जनता की भागीदारी अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देती है। प्रशासनिक स्थिरता और आर्थिक समृद्धि के कारण इस काल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग भी कहा जाता है।
प्राचीन भारतीय प्रशासन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उसमें शासन और लोककल्याण के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया गया। प्रशासन का आधार केवल शक्ति नहीं, बल्कि नैतिकता, न्याय, उत्तरदायित्व और सामाजिक समरसता भी था। ग्राम स्वशासन, कर व्यवस्था, न्याय प्रणाली और लोकहितकारी नीतियाँ आज भी भारतीय प्रशासनिक चिंतन के महत्वपूर्ण स्रोत मानी जाती हैं।
समय के साथ भारतीय उपमहाद्वीप में अनेक नए राजनीतिक परिवर्तन हुए, जिनके परिणामस्वरूप मध्यकालीन प्रशासन का विकास हुआ। इस काल में प्रशासनिक संरचना में कई नए तत्व जुड़े। दिल्ली सल्तनत और बाद में मुगल शासन ने प्रशासन को अधिक संगठित, अनुशासित तथा राजस्व-केंद्रित स्वरूप प्रदान किया। यद्यपि इन व्यवस्थाओं में केंद्रीकरण की प्रवृत्ति अधिक थी, फिर भी स्थानीय प्रशासन और राजस्व व्यवस्था को व्यवस्थित बनाने के अनेक प्रयास किए गए। भूमि व्यवस्था, सैन्य संगठन, न्यायिक संस्थाओं और प्रांतीय प्रशासन में महत्वपूर्ण सुधार किए गए, जिनका प्रभाव आगे चलकर आधुनिक प्रशासन पर भी पड़ा।
मध्यकालीन प्रशासन ने भारतीय प्रशासनिक परंपरा में कई नई व्यवस्थाओं को जन्म दिया। भूमि मापन, राजस्व निर्धारण, अभिलेखों का रख-रखाव, प्रांतों का प्रशासनिक विभाजन तथा अधिकारियों की नियुक्ति जैसी व्यवस्थाएँ अधिक व्यवस्थित हुईं। विशेष रूप से मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में प्रशासनिक सुधारों ने भारतीय प्रशासन को एक नई दिशा प्रदान की। टोडरमल की राजस्व व्यवस्था, मनसबदारी प्रणाली तथा प्रांतीय प्रशासन की संरचना प्रशासनिक इतिहास में महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ मानी जाती हैं।
इस प्रकार प्राचीन और मध्यकालीन प्रशासन ने भारतीय शासन व्यवस्था की मजबूत आधारशिला तैयार की। इन दोनों कालों के प्रशासनिक अनुभवों ने आगे चलकर आधुनिक भारतीय प्रशासन के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आधुनिक काल में औपनिवेशिक शासन, प्रशासनिक सुधारों, संवैधानिक विकास तथा स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था ने प्रशासन को एक नए स्वरूप में विकसित किया, जिसमें दक्षता, उत्तरदायित्व, विधि का शासन, लोकतंत्र और जनकल्याण को समान महत्व प्रदान किया गया।
मध्यकालीन भारत में प्रशासन का स्वरूप मुख्यतः इस्लामी शासन परंपराओं और भारतीय परिस्थितियों के समन्वय से विकसित हुआ। दिल्ली सल्तनत की स्थापना के साथ प्रशासन में केंद्रीकरण की प्रवृत्ति अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगी। सुल्तान को शासन का सर्वोच्च अधिकारी माना जाता था, जिसके हाथों में कार्यपालिका, विधायिका तथा न्यायपालिका से संबंधित व्यापक शक्तियाँ निहित थीं। यद्यपि सुल्तान सर्वोच्च शासक था, फिर भी उसके शासन को प्रभावी बनाने के लिए मंत्रिपरिषद तथा विभिन्न प्रशासनिक विभागों का गठन किया गया। वज़ीर वित्त और प्रशासन का प्रमुख अधिकारी होता था, जबकि सेना, न्याय, धार्मिक मामलों तथा राजस्व के लिए अलग-अलग अधिकारी नियुक्त किए जाते थे।
दिल्ली सल्तनत की प्रशासनिक व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य विशाल साम्राज्य पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना था। इसके लिए राज्य को विभिन्न प्रांतों में विभाजित किया गया, जहाँ सूबेदार अथवा अन्य अधिकारी शासन का संचालन करते थे। इन अधिकारियों का कार्य केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना ही नहीं था, बल्कि कर संग्रह करना, सैनिक व्यवस्था को सुदृढ़ रखना तथा सुल्तान के आदेशों का पालन सुनिश्चित करना भी था। स्थानीय स्तर पर गाँव प्रशासन अपनी परंपरागत संरचना के अनुसार कार्य करता रहा, जिससे प्रशासन में निरंतरता बनी रही।
मुगल शासन के आगमन के साथ भारतीय प्रशासन को और अधिक व्यवस्थित तथा संगठित स्वरूप प्राप्त हुआ। विशेष रूप से सम्राट अकबर के शासनकाल में प्रशासनिक सुधारों ने भारतीय प्रशासनिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा। अकबर ने शासन को केवल शक्ति का माध्यम न मानकर सुशासन और लोककल्याण का साधन बनाने का प्रयास किया। उसने प्रशासन में धार्मिक सहिष्णुता, योग्यता के आधार पर नियुक्ति तथा विभिन्न वर्गों की भागीदारी को प्रोत्साहित किया।
मुगल प्रशासन का सबसे महत्वपूर्ण आधार प्रांतीय प्रशासन था। पूरे साम्राज्य को अनेक सूबों में विभाजित किया गया। प्रत्येक सूबे में सूबेदार, दीवान, बख्शी, काज़ी तथा अन्य अधिकारी नियुक्त किए जाते थे। सूबेदार प्रशासन और कानून-व्यवस्था का प्रमुख अधिकारी होता था, जबकि दीवान राजस्व और वित्त का प्रबंधन करता था। इस प्रकार प्रशासनिक शक्तियों का विभाजन किया गया ताकि किसी एक अधिकारी के हाथों में अत्यधिक शक्ति केंद्रित न हो।
मुगल प्रशासन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में भूमि राजस्व व्यवस्था का विशेष स्थान है। राजा टोडरमल द्वारा विकसित भूमि मापन और कर निर्धारण प्रणाली ने राजस्व प्रशासन को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। भूमि की उपज, गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता के आधार पर कर निर्धारित किया जाता था। इस व्यवस्था से राज्य की आय में वृद्धि हुई तथा किसानों और प्रशासन के बीच अपेक्षाकृत स्पष्ट संबंध स्थापित हुए।
मुगल प्रशासन में मनसबदारी प्रणाली का भी विशेष महत्व था। इस व्यवस्था के अंतर्गत अधिकारियों को उनके पद, योग्यता तथा सैन्य उत्तरदायित्व के अनुसार मनसब प्रदान किया जाता था। मनसबदार प्रशासनिक तथा सैन्य दोनों प्रकार की जिम्मेदारियाँ निभाते थे। इससे प्रशासनिक नियंत्रण और सैन्य संगठन दोनों को सुदृढ़ बनाने में सहायता मिली।
यद्यपि मध्यकालीन प्रशासन अत्यधिक संगठित था, फिर भी उसकी कुछ सीमाएँ थीं। प्रशासन का अत्यधिक केंद्रीकरण, सम्राट पर निर्भरता, उत्तराधिकार संबंधी संघर्ष तथा विशाल साम्राज्य का प्रभावी नियंत्रण बनाए रखने की कठिनाइयाँ समय के साथ स्पष्ट होने लगीं। औरंगज़ेब के बाद केंद्रीय सत्ता के कमजोर होने के कारण प्रशासनिक व्यवस्था भी धीरे-धीरे शिथिल होती गई।
आधुनिक भारतीय प्रशासन का विकास मुख्यतः ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ। ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रारंभिक उद्देश्य व्यापार तक सीमित थे, किंतु धीरे-धीरे उसने राजनीतिक सत्ता स्थापित कर प्रशासनिक ढाँचे का निर्माण किया। कंपनी शासन के प्रारंभिक वर्षों में प्रशासन का प्रमुख उद्देश्य राजस्व संग्रह और व्यापारिक हितों की रक्षा था। इसलिए प्रशासनिक व्यवस्था जनता के कल्याण की अपेक्षा कंपनी के आर्थिक हितों पर अधिक केंद्रित थी।
1773 के रेगुलेटिंग एक्ट, 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट तथा बाद के विभिन्न चार्टर एक्टों ने भारतीय प्रशासन को अधिक संगठित स्वरूप प्रदान किया। इन अधिनियमों के माध्यम से प्रशासनिक नियंत्रण को व्यवस्थित किया गया तथा गवर्नर जनरल और उसकी परिषद की शक्तियों का निर्धारण किया गया। इसी काल में न्यायपालिका, पुलिस, राजस्व तथा जिला प्रशासन की संस्थाओं का क्रमिक विकास हुआ।
लॉर्ड कॉर्नवालिस ने प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से आधुनिक सिविल सेवा की आधारशिला रखी। प्रशासनिक अधिकारियों के लिए सेवा नियम निर्धारित किए गए, वेतन व्यवस्था में सुधार किया गया तथा भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने के प्रयास किए गए। बाद में लॉर्ड वेलेजली और लॉर्ड डलहौजी ने भी प्रशासनिक ढाँचे को और अधिक संगठित बनाया। रेलवे, डाक, तार, सार्वजनिक निर्माण तथा संचार व्यवस्था के विकास ने प्रशासन की कार्यक्षमता को बढ़ाया।
भारतीय सिविल सेवा (Indian Civil Service) को ब्रिटिश प्रशासन की सबसे महत्वपूर्ण संस्था माना जाता था। इसे प्रशासन की “स्टील फ्रेम” कहा गया क्योंकि यही सेवा पूरे प्रशासनिक ढाँचे को संचालित करती थी। प्रारंभ में भारतीयों की इसमें भागीदारी अत्यंत सीमित थी, लेकिन धीरे-धीरे प्रतियोगी परीक्षाओं तथा राजनीतिक आंदोलनों के प्रभाव से भारतीयों को भी इसमें अवसर मिलने लगे।
1858 में कंपनी शासन की समाप्ति के बाद भारत का प्रशासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन आ गया। इसके बाद प्रशासन में अधिक केंद्रीकरण आया तथा सचिव-ए-राज्य और वायसराय की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई। भारतीय परिषद अधिनियमों तथा 1919 एवं 1935 के भारत शासन अधिनियमों ने प्रशासनिक संस्थाओं में क्रमिक परिवर्तन किए। प्रांतीय स्वायत्तता, उत्तरदायी शासन तथा भारतीय प्रतिनिधित्व की अवधारणाओं का विकास इसी काल में हुआ।
1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारतीय प्रशासन में एक ऐतिहासिक परिवर्तन हुआ। अब प्रशासन का उद्देश्य विदेशी शासन के हितों की रक्षा करना नहीं, बल्कि लोकतंत्र, संविधान, सामाजिक न्याय, आर्थिक विकास तथा जनकल्याण को साकार करना था। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के बाद भारतीय प्रशासन को संवैधानिक आधार प्राप्त हुआ। प्रशासन को विधि के शासन, मौलिक अधिकारों, नीति-निर्देशक तत्वों तथा लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के सिद्धांतों के अनुरूप संचालित किया जाने लगा।
स्वतंत्र भारत ने ब्रिटिश प्रशासन की अनेक संस्थाओं को बनाए रखा, किंतु उनके उद्देश्यों और कार्यप्रणाली में व्यापक परिवर्तन किए। भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS), भारतीय पुलिस सेवा (IPS) तथा अन्य अखिल भारतीय सेवाओं का गठन राष्ट्रीय एकता और प्रशासनिक दक्षता को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से किया गया। पंचायती राज, नगर निकाय, वित्त आयोग, निर्वाचन आयोग, लोक सेवा आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक तथा अन्य संवैधानिक संस्थाओं ने प्रशासन को लोकतांत्रिक और उत्तरदायी स्वरूप प्रदान किया।
आधुनिक भारतीय प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व, विधि का शासन, संघीय व्यवस्था, लोककल्याणकारी राज्य, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय, विकेंद्रीकरण, पारदर्शिता, उत्तरदायित्व तथा नागरिक सहभागिता हैं। सूचना का अधिकार, ई-गवर्नेंस, डिजिटल प्रशासन, सेवा गारंटी कानून तथा सुशासन की अवधारणा ने प्रशासन को अधिक पारदर्शी और जनोन्मुख बनाने का प्रयास किया है।
भारतीय प्रशासन आज प्राचीन नैतिक परंपराओं, मध्यकालीन संगठनात्मक अनुभवों तथा आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों का समन्वित रूप है। इसकी ऐतिहासिक यात्रा यह दर्शाती है कि प्रशासन केवल शासन का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण, सामाजिक परिवर्तन और जनकल्याण का एक प्रभावी माध्यम भी है। बदलती वैश्विक परिस्थितियों, तकनीकी प्रगति और नागरिक अपेक्षाओं के अनुरूप भारतीय प्रशासन निरंतर विकसित हो रहा है। इसी सतत विकास की प्रक्रिया ने भारतीय प्रशासन को विश्व के सबसे व्यापक, जटिल और लोकतांत्रिक प्रशासनिक तंत्रों में स्थान दिलाया है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
भारतीय प्रशासन के ऐतिहासिक विकास का प्राचीन, मध्यकालीन एवं आधुनिक संदर्भ में विस्तृत विवेचन कीजिए।
प्राचीन भारतीय प्रशासन की प्रमुख विशेषताओं का समालोचनात्मक अध्ययन कीजिए।
वैदिक कालीन प्रशासनिक व्यवस्था का विस्तृत वर्णन कीजिए।
मौर्यकालीन प्रशासन की संरचना, कार्यप्रणाली एवं विशेषताओं का विश्लेषण कीजिए।
कौटिल्य के प्रशासनिक विचारों का भारतीय प्रशासन पर प्रभाव स्पष्ट कीजिए।
सम्राट अशोक के प्रशासन की प्रमुख विशेषताओं का मूल्यांकन कीजिए।
गुप्तकालीन प्रशासन का विस्तृत अध्ययन कीजिए।
प्राचीन भारतीय प्रशासन में ग्राम प्रशासन की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
मध्यकालीन भारतीय प्रशासन की प्रमुख विशेषताओं का विश्लेषण कीजिए।
दिल्ली सल्तनत की प्रशासनिक व्यवस्था का आलोचनात्मक अध्ययन कीजिए।
मुगल प्रशासन की संरचना एवं कार्यप्रणाली का विस्तृत वर्णन कीजिए।
अकबर के प्रशासनिक सुधारों का मूल्यांकन कीजिए।
मनसबदारी प्रणाली की विशेषताओं एवं महत्व का विवेचन कीजिए।
टोडरमल की भू-राजस्व व्यवस्था का विश्लेषण कीजिए।
मध्यकालीन प्रशासन की उपलब्धियों एवं सीमाओं का अध्ययन कीजिए।
ब्रिटिश कालीन भारतीय प्रशासन के विकास का विस्तृत विवेचन कीजिए।
ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासनिक ढाँचे का अध्ययन कीजिए।
रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 एवं पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 का भारतीय प्रशासन पर प्रभाव स्पष्ट कीजिए।
लॉर्ड कॉर्नवालिस के प्रशासनिक सुधारों का मूल्यांकन कीजिए।
भारतीय सिविल सेवा (ICS) के विकास एवं महत्व का अध्ययन कीजिए।
भारत शासन अधिनियम, 1919 एवं 1935 के प्रशासनिक महत्व का विश्लेषण कीजिए।
स्वतंत्रता के बाद भारतीय प्रशासन में आए प्रमुख परिवर्तनों का वर्णन कीजिए।
आधुनिक भारतीय प्रशासन की प्रमुख विशेषताओं का समालोचनात्मक अध्ययन कीजिए।
भारतीय प्रशासन में लोकतंत्र, विधि का शासन तथा उत्तरदायित्व के महत्व को स्पष्ट कीजिए।
भारतीय प्रशासन के विकास में प्राचीन, मध्यकालीन एवं आधुनिक परंपराओं के योगदान का तुलनात्मक विश्लेषण कीजिए।
भारतीय प्रशासन के ऐतिहासिक विकास का वर्तमान प्रशासन पर प्रभाव स्पष्ट कीजिए।
भारतीय प्रशासन के विकास में संविधान की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
आधुनिक भारतीय प्रशासन में ई-गवर्नेंस और डिजिटल प्रशासन के महत्व का अध्ययन कीजिए।
भारतीय प्रशासन में पंचायती राज संस्थाओं की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
भारतीय प्रशासन के विकास की प्रमुख चुनौतियों एवं भविष्य की संभावनाओं का विवेचन कीजिए।
लघु उत्तरीय प्रश्न
भारतीय प्रशासन से क्या अभिप्राय है?
प्राचीन भारतीय प्रशासन की दो विशेषताएँ लिखिए।
सभा और समिति क्या थीं?
कौटिल्य का प्रशासनिक योगदान लिखिए।
अशोक के प्रशासन की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
गुप्तकालीन प्रशासन की विशेषताएँ लिखिए।
ग्राम प्रशासन का महत्व स्पष्ट कीजिए।
दिल्ली सल्तनत के प्रशासन की दो विशेषताएँ लिखिए।
वज़ीर कौन था?
मनसबदारी प्रणाली क्या थी?
टोडरमल किस लिए प्रसिद्ध हैं?
सूबेदार के दो कार्य लिखिए।
ब्रिटिश प्रशासन का मुख्य उद्देश्य क्या था?
रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 का महत्व लिखिए।
पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 का महत्व लिखिए।
लॉर्ड कॉर्नवालिस का योगदान लिखिए।
भारतीय सिविल सेवा (ICS) क्या थी?
भारत शासन अधिनियम, 1935 का महत्व लिखिए।
स्वतंत्र भारत में प्रशासन का उद्देश्य क्या है?
भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) क्या है?
पंचायती राज का महत्व लिखिए।
विधि के शासन से क्या अभिप्राय है?
आधुनिक भारतीय प्रशासन की दो विशेषताएँ लिखिए।
ई-गवर्नेंस क्या है?
भारतीय प्रशासन में लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
अति लघु उत्तरीय प्रश्न
भारतीय प्रशासन का सबसे प्राचीन काल कौन-सा है?
उत्तर – वैदिक कालअर्थशास्त्र के लेखक कौन हैं?
उत्तर – कौटिल्य (चाणक्य)मौर्य साम्राज्य के संस्थापक कौन थे?
उत्तर – चंद्रगुप्त मौर्य'धम्म' नीति किस शासक से संबंधित है?
उत्तर – सम्राट अशोकमनसबदारी प्रणाली किसने विकसित की?
उत्तर – अकबरटोडरमल किस क्षेत्र से संबंधित थे?
उत्तर – भू-राजस्व प्रशासनरेगुलेटिंग एक्ट कब पारित हुआ?
उत्तर – 1773पिट्स इंडिया एक्ट कब पारित हुआ?
उत्तर – 1784ICS का पूरा नाम क्या है?
उत्तर – Indian Civil Serviceभारतीय संविधान कब लागू हुआ?
उत्तर – 26 जनवरी 1950
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs)
1. भारतीय प्रशासन का सबसे प्राचीन स्वरूप किस काल में विकसित हुआ?
(A) आधुनिक काल
(B) मध्यकाल
(C) वैदिक काल
(D) औपनिवेशिक काल
उत्तर – (C)
2. अर्थशास्त्र के रचयिता कौन हैं?
(A) मनु
(B) कौटिल्य
(C) कालिदास
(D) पतंजलि
उत्तर – (B)
3. मौर्य प्रशासन का प्रमुख आधार क्या था?
(A) विकेंद्रीकरण
(B) केंद्रीकृत प्रशासन
(C) लोकतंत्र
(D) संघवाद
उत्तर – (B)
4. सम्राट अशोक ने किस नीति को अपनाया?
(A) विस्तारवाद
(B) धम्म नीति
(C) सामंतवाद
(D) पूँजीवाद
उत्तर – (B)
5. गुप्तकाल को किस नाम से जाना जाता है?
(A) लौह युग
(B) स्वर्ण युग
(C) औद्योगिक युग
(D) आधुनिक युग
उत्तर – (B)
6. मनसबदारी प्रणाली किस शासक से संबंधित है?
(A) बाबर
(B) अकबर
(C) औरंगज़ेब
(D) हुमायूँ
उत्तर – (B)
7. टोडरमल का संबंध किससे था?
(A) न्याय व्यवस्था
(B) भू-राजस्व व्यवस्था
(C) विदेश नीति
(D) सैन्य संगठन
उत्तर – (B)
8. रेगुलेटिंग एक्ट कब पारित किया गया?
(A) 1757
(B) 1773
(C) 1784
(D) 1858
उत्तर – (B)
9. पिट्स इंडिया एक्ट कब पारित हुआ?
(A) 1773
(B) 1784
(C) 1833
(D) 1853
उत्तर – (B)
10. भारतीय सिविल सेवा (ICS) को किस नाम से जाना जाता था?
(A) प्रशासन की रीढ़ (Steel Frame)
(B) लोकसभा
(C) पंचायत सेवा
(D) पुलिस सेवा
उत्तर – (A)
11. भारत शासन अधिनियम, 1935 का प्रमुख योगदान क्या था?
(A) पंचायती राज
(B) प्रांतीय स्वायत्तता
(C) राष्ट्रपति शासन
(D) संविधान सभा
उत्तर – (B)
12. भारतीय संविधान कब लागू हुआ?
(A) 15 अगस्त 1947
(B) 26 जनवरी 1950
(C) 26 नवंबर 1949
(D) 1 जनवरी 1950
उत्तर – (B)
13. आधुनिक भारतीय प्रशासन किस सिद्धांत पर आधारित है?
(A) निरंकुशता
(B) लोकतंत्र एवं विधि का शासन
(C) राजतंत्र
(D) तानाशाही
उत्तर – (B)
14. भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) किस श्रेणी की सेवा है?
(A) राज्य सेवा
(B) अखिल भारतीय सेवा
(C) निजी सेवा
(D) न्यायिक सेवा
उत्तर – (B)
15. ई-गवर्नेंस का मुख्य उद्देश्य क्या है?
(A) प्रशासन को डिजिटल एवं पारदर्शी बनाना
(B) कर बढ़ाना
(C) चुनाव कराना
(D) न्यायपालिका का विस्तार करना
उत्तर – (A)
16. ग्राम प्रशासन की अवधारणा का सर्वाधिक विकास किस काल में हुआ?
(A) वैदिक एवं उत्तरवैदिक काल
(B) मुगल काल
(C) ब्रिटिश काल
(D) आधुनिक काल
उत्तर – (A)
17. दिल्ली सल्तनत में वज़ीर का मुख्य कार्य क्या था?
(A) सेना का नेतृत्व
(B) वित्त एवं प्रशासन का संचालन
(C) न्याय देना
(D) धार्मिक कार्य करना
उत्तर – (B)
18. ब्रिटिश प्रशासन का प्रारंभिक उद्देश्य क्या था?
(A) जनकल्याण
(B) व्यापार एवं राजस्व संग्रह
(C) लोकतंत्र स्थापित करना
(D) औद्योगीकरण
उत्तर – (B)
19. स्वतंत्र भारत के प्रशासन का प्रमुख उद्देश्य क्या है?
(A) औपनिवेशिक शासन को बनाए रखना
(B) जनकल्याण एवं लोकतांत्रिक शासन
(C) सैन्य शासन
(D) व्यापार विस्तार
उत्तर – (B)
20. भारतीय प्रशासन की प्रमुख विशेषता कौन-सी है?
(A) निरंकुश शासन
(B) लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व
(C) वंशानुगत प्रशासन
(D) सामंतवाद
उत्तर – (B)
सत्य / असत्य
कौटिल्य ने अर्थशास्त्र की रचना की। (सत्य)
मौर्य प्रशासन विकेंद्रीकृत प्रशासन का उदाहरण था। (असत्य)
सम्राट अशोक ने धम्म नीति को अपनाया। (सत्य)
मनसबदारी प्रणाली अकबर द्वारा विकसित की गई। (सत्य)
टोडरमल का संबंध राजस्व प्रशासन से था। (सत्य)
रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 ब्रिटिश प्रशासनिक सुधारों का महत्वपूर्ण अधिनियम था। (सत्य)
भारत शासन अधिनियम, 1935 ने प्रांतीय स्वायत्तता का प्रावधान किया। (सत्य)
भारतीय संविधान 26 जनवरी 1950 से लागू हुआ। (सत्य)
IAS एक अखिल भारतीय सेवा है। (सत्य)
आधुनिक भारतीय प्रशासन लोकतंत्र, विधि के शासन और जनकल्याण पर आधारित है। (सत्य)
