Unit-01
A critical Appraisal of India’s Foreign Policy Post Independence, Evaluation of Politics in South Asia, South East Asia, West Asia, Indo- Pacific Region
स्वतंत्रता के बाद भारत की विदेश नीति का आलोचनात्मक मूल्यांकन तथा दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, पश्चिम एशिया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की राजनीति का मूल्यांकन।
भारत को 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त हुई। स्वतंत्रता के समय भारत के सामने अनेक आंतरिक समस्याओं के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गंभीर चुनौतियाँ थीं। देश का विभाजन हो चुका था, पाकिस्तान का निर्माण हुआ था और भारत को अपनी सुरक्षा, आर्थिक विकास तथा अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के लिए एक स्वतंत्र विदेश नीति विकसित करनी थी। दूसरी ओर विश्व राजनीति द्वितीय विश्व युद्ध के बाद तेजी से बदल रही थी। अमेरिका और सोवियत संघ दो महाशक्तियों के रूप में उभर चुके थे और उनके बीच शीतयुद्ध प्रारंभ हो गया था। ऐसी परिस्थिति में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि वह अपनी विदेश नीति को किसी शक्ति-गुट का हिस्सा बनाए बिना अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कैसे करे।
स्वतंत्र भारत की विदेश नीति के निर्माण में जवाहरलाल नेहरू की महत्वपूर्ण भूमिका रही। नेहरू का विश्वास था कि भारत को अपनी विदेश नीति में स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता बनाए रखनी चाहिए। भारत ने किसी सैन्य गुट में शामिल होने के बजाय गुटनिरपेक्षता को अपनाया। इसका उद्देश्य महाशक्तियों से अलग रहना मात्र नहीं था, बल्कि प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय प्रश्न पर उसके गुण-दोष और भारतीय हितों के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेना था। इस नीति ने भारत को शीतयुद्ध के दौर में अपनी अलग पहचान बनाने का अवसर दिया।
भारतीय विदेश नीति के प्रारंभिक स्वरूप पर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के अनुभव का भी गहरा प्रभाव था। भारत स्वयं लंबे समय तक औपनिवेशिक शासन के अधीन रहा था। इसलिए भारत ने साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद और नस्लीय भेदभाव का विरोध किया। एशिया और अफ्रीका के स्वतंत्रता आंदोलनों को भारत ने नैतिक और राजनीतिक समर्थन दिया। भारत का मानना था कि प्रत्येक राष्ट्र को अपनी राजनीतिक व्यवस्था और विकास की दिशा स्वयं निर्धारित करने का अधिकार होना चाहिए।
भारत की विदेश नीति में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को विशेष महत्व दिया गया। भारत ने अंतरराष्ट्रीय विवादों को बातचीत और शांतिपूर्ण साधनों से हल करने का समर्थन किया। भारत और चीन के बीच 1954 में पंचशील के सिद्धांतों पर आधारित समझौता इसी दृष्टिकोण का उदाहरण था। पंचशील में एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान, परस्पर अनाक्रमण, आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना, समानता एवं पारस्परिक लाभ तथा शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व जैसे सिद्धांतों को महत्व दिया गया।
भारत ने संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रति भी आस्था व्यक्त की। भारत का विश्वास था कि बड़ी और छोटी सभी शक्तियों को समान संप्रभु अधिकार प्राप्त होने चाहिए। भारत ने निरस्त्रीकरण, परमाणु हथियारों पर नियंत्रण और विश्व शांति के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रयासों का समर्थन किया।
भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष गुटनिरपेक्ष आंदोलन रहा। भारत ने यूगोस्लाविया, मिस्र, इंडोनेशिया और घाना जैसे देशों के साथ मिलकर ऐसे अंतरराष्ट्रीय वातावरण के निर्माण में योगदान दिया जिसमें नवस्वतंत्र देश अपनी स्वतंत्र विदेश नीति अपना सकें। 1961 में गुटनिरपेक्ष आंदोलन के औपचारिक गठन के बाद भारत इसके प्रमुख देशों में रहा।
हालाँकि भारतीय विदेश नीति को केवल आदर्शवादी दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता। समय के साथ भारत को अपनी विदेश नीति में आदर्शों और राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन बनाना पड़ा। 1962 के भारत-चीन युद्ध ने भारत की विदेश नीति की कुछ कमजोरियों को उजागर किया। भारत ने चीन के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और सहयोग की नीति अपनाई थी, लेकिन सीमा विवाद अंततः सैन्य संघर्ष में बदल गया। इस घटना के बाद भारत ने अपनी रक्षा क्षमता और सुरक्षा नीति पर अधिक ध्यान देना शुरू किया।
पाकिस्तान के साथ संबंध स्वतंत्रता के बाद से ही भारत की विदेश नीति की प्रमुख चुनौती रहे हैं। विभाजन के साथ ही कश्मीर का प्रश्न सामने आया। 1947-48 का युद्ध, 1965 का युद्ध, 1971 का युद्ध और 1999 का कारगिल संघर्ष भारत-पाकिस्तान संबंधों की जटिलता को दर्शाते हैं। आतंकवाद, सीमा विवाद, जल विवाद और कश्मीर का प्रश्न दोनों देशों के बीच तनाव के प्रमुख कारण बने रहे हैं। इसके बावजूद भारत ने समय-समय पर बातचीत और शांतिपूर्ण समाधान का प्रयास भी किया है।
1971 में भारत की विदेश नीति को एक महत्वपूर्ण सफलता मिली। भारत ने बांग्लादेश मुक्ति संघर्ष के दौरान परिस्थितियों के अनुसार अपनी रणनीति बनाई और दिसंबर 1971 के युद्ध के बाद बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया। इससे दक्षिण एशिया में भारत की सामरिक स्थिति मजबूत हुई। 1972 में भारत और पाकिस्तान के बीच शिमला समझौता हुआ, जिसमें द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से विवादों को हल करने पर जोर दिया गया।
1991 के बाद भारतीय विदेश नीति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई दिया। सोवियत संघ के विघटन और शीतयुद्ध की समाप्ति के साथ पुरानी द्विध्रुवीय व्यवस्था समाप्त हो गई। भारत ने आर्थिक उदारीकरण की नीति अपनाई और अपनी विदेश नीति में आर्थिक हितों को अधिक महत्व दिया। अमेरिका, यूरोप, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ भारत के संबंध तेजी से विकसित हुए।
21वीं शताब्दी में भारतीय विदेश नीति का प्रमुख आधार रणनीतिक स्वायत्तता बन गया है। भारत विभिन्न शक्तियों के साथ अपने संबंधों को राष्ट्रीय हित के आधार पर आगे बढ़ाता है। रूस के साथ पारंपरिक रक्षा संबंधों को बनाए रखते हुए भारत ने अमेरिका, यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों के साथ भी अपने रणनीतिक संबंध मजबूत किए हैं। इस दृष्टि से आधुनिक भारतीय विदेश नीति को गुटनिरपेक्षता की पुरानी अवधारणा के स्थान पर अधिक व्यावहारिक और बहुआयामी रणनीतिक स्वायत्तता के रूप में समझा जा सकता है।
आलोचनात्मक दृष्टि से भारतीय विदेश नीति की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि भारत ने बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच अपनी स्वतंत्र निर्णय क्षमता को बनाए रखने का प्रयास किया। भारत किसी एक महाशक्ति पर पूरी तरह निर्भर नहीं हुआ और उसने विकासशील देशों के हितों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाया। इसके साथ ही भारत ने अपनी आर्थिक और सामरिक शक्ति के विस्तार के साथ विदेश नीति के साधनों को भी व्यापक बनाया।
लेकिन इसकी कुछ सीमाएँ भी रही हैं। प्रारंभिक दौर में चीन के संबंध में भारत का आकलन अपेक्षाकृत आशावादी रहा। पाकिस्तान के साथ संबंधों में स्थायी समाधान नहीं हो सका। दक्षिण एशिया में भारत की बड़ी शक्ति की स्थिति के कारण कुछ पड़ोसी देशों में भारत के प्रति आशंका भी उत्पन्न हुई। इसके अतिरिक्त भारत को अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं और विकास संबंधी प्राथमिकताओं के बीच लगातार संतुलन बनाना पड़ा।
अब दक्षिण एशिया की राजनीति को समझना आवश्यक है, क्योंकि भारत की विदेश नीति का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव इसी क्षेत्र पर पड़ता है। दक्षिण एशिया में भारत के अतिरिक्त पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और मालदीव जैसे देश शामिल हैं। अफगानिस्तान को भी व्यापक दक्षिण एशियाई संदर्भ में देखा जाता है। इस क्षेत्र की राजनीति में ऐतिहासिक संबंध, सीमा विवाद, जातीय एवं सांस्कृतिक विविधता, जल संसाधन, सुरक्षा, आतंकवाद और आर्थिक विकास जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हैं।
दक्षिण एशिया में भारत की स्थिति विशेष है। क्षेत्रफल, जनसंख्या, अर्थव्यवस्था, सैन्य क्षमता और भौगोलिक स्थिति के कारण भारत क्षेत्र की सबसे बड़ी शक्ति है। इसलिए दक्षिण एशिया की लगभग प्रत्येक प्रमुख राजनीतिक और सुरक्षा घटना का किसी न किसी रूप में भारत से संबंध जुड़ता है।
भारत-पाकिस्तान संबंध दक्षिण एशियाई राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण और जटिल विषय हैं। कश्मीर विवाद दोनों देशों के बीच लंबे समय से तनाव का कारण रहा है। इसके अलावा आतंकवाद, सीमा-पार हिंसा और सैन्य प्रतिस्पर्धा ने संबंधों को प्रभावित किया है। दोनों देशों के पास परमाणु हथियार होने के कारण उनका द्विपक्षीय तनाव पूरे क्षेत्र की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण बन जाता है।
बांग्लादेश के साथ भारत के संबंधों में पिछले दशकों में सहयोग के अनेक क्षेत्र विकसित हुए हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार, सीमा प्रबंधन, नदी जल, ऊर्जा, परिवहन और सुरक्षा जैसे विषयों पर सहयोग हुआ है। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने में बांग्लादेश की भौगोलिक स्थिति भी महत्वपूर्ण है।
नेपाल के साथ भारत के संबंध ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से गहरे हैं। दोनों देशों के बीच खुली सीमा, व्यापार और सांस्कृतिक संबंध हैं। फिर भी समय-समय पर सीमा, राजनीतिक प्रभाव और आर्थिक संबंधों से जुड़े मतभेद सामने आते रहे हैं। भारत के लिए नेपाल का महत्व केवल पड़ोसी देश के रूप में नहीं, बल्कि हिमालयी सुरक्षा और क्षेत्रीय संपर्क के दृष्टिकोण से भी है।
भूटान के साथ भारत के संबंध सामान्यतः सहयोगपूर्ण रहे हैं। जलविद्युत, व्यापार, विकास सहयोग और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों ने लंबे समय से सहयोग किया है। भूटान की भौगोलिक स्थिति भारत की सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है।
श्रीलंका के साथ भारत के संबंधों में सांस्कृतिक निकटता के साथ-साथ राजनीतिक और सुरक्षा संबंध भी महत्वपूर्ण हैं। श्रीलंका के जातीय संघर्ष के दौरान भारत की भूमिका विवादास्पद रही। 1987 के भारत-श्रीलंका समझौते के बाद भारतीय शांति सेना को श्रीलंका भेजा गया, लेकिन यह अनुभव भारत की क्षेत्रीय नीति के लिए जटिल साबित हुआ। बाद के वर्षों में भारत ने श्रीलंका के साथ आर्थिक, राजनीतिक और मानवीय सहयोग को अधिक महत्व दिया।
मालदीव हिंद महासागर में अपनी रणनीतिक स्थिति के कारण भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा, आतंकवाद-विरोधी सहयोग, आपदा सहायता और समुद्री सुरक्षा भारत-मालदीव संबंधों के प्रमुख क्षेत्र हैं।
दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देने के लिए सार्क (SAARC) की स्थापना 1985 में हुई। इसका उद्देश्य क्षेत्रीय आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सहयोग को बढ़ाना था। लेकिन भारत-पाकिस्तान तनाव और अन्य राजनीतिक मतभेदों के कारण सार्क अपनी अपेक्षित क्षमता के अनुसार प्रभावी नहीं हो सका। इसके बावजूद दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग की आवश्यकता बनी हुई है।
समग्र रूप से देखा जाए तो दक्षिण एशिया की राजनीति में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत की विदेश नीति का एक प्रमुख लक्ष्य अपने पड़ोसी देशों के साथ शांतिपूर्ण और सहयोगपूर्ण संबंध विकसित करना रहा है। इसके लिए भारत ने आर्थिक सहायता, विकास सहयोग, आपदा राहत, व्यापार और संपर्क परियोजनाओं का सहारा लिया है। साथ ही अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक हितों की रक्षा के लिए भारत ने आवश्यकतानुसार कठोर नीतियाँ भी अपनाई हैं।
निष्कर्षतः, स्वतंत्रता के बाद भारत की विदेश नीति निरंतर विकसित होने वाली नीति रही है। इसके प्रारंभिक चरण में गुटनिरपेक्षता, पंचशील, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, उपनिवेशवाद-विरोध और विश्व शांति प्रमुख आधार थे। बाद में राष्ट्रीय सुरक्षा, परमाणु क्षमता, आर्थिक कूटनीति और रणनीतिक स्वायत्तता इसके महत्वपूर्ण तत्व बने। दक्षिण एशिया में भारत की भूमिका एक बड़ी क्षेत्रीय शक्ति की है, लेकिन इस भूमिका के साथ पड़ोसी देशों के विश्वास, क्षेत्रीय सहयोग और पारस्परिक सम्मान को बनाए रखना भी आवश्यक है। इसलिए भारतीय विदेश नीति की सफलता का वास्तविक मूल्यांकन इस बात से किया जा सकता है कि वह राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए क्षेत्रीय शांति, सहयोग और स्थिरता को किस सीमा तक आगे बढ़ा पाती है।
दक्षिण-पूर्व एशिया
दक्षिण-पूर्व एशिया विश्व राजनीति का ऐसा क्षेत्र है, जिसका महत्व केवल उसके भौगोलिक विस्तार तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र एशिया के दक्षिणी और पूर्वी भागों के बीच स्थित होने के कारण हिंद महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ता है। समुद्री व्यापार, ऊर्जा संसाधनों, महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों, उभरती अर्थव्यवस्थाओं और विभिन्न बड़ी शक्तियों के रणनीतिक हितों के कारण दक्षिण-पूर्व एशिया आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। भारत के लिए भी इस क्षेत्र का विशेष महत्व है, क्योंकि भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र दक्षिण-पूर्व एशिया से भौगोलिक रूप से जुड़ा हुआ है और हिंद महासागर के समुद्री मार्गों का एक बड़ा हिस्सा इसी व्यापक क्षेत्र से संबंधित है।
दक्षिण-पूर्व एशिया में सामान्यतः म्यांमार, थाईलैंड, लाओस, कंबोडिया, वियतनाम, मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया, फिलीपींस, ब्रुनेई और पूर्वी तिमोर जैसे देश शामिल माने जाते हैं। इस क्षेत्र में भाषाई, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विविधता बहुत अधिक है। कहीं लोकतांत्रिक शासन है तो कहीं सैन्य या केंद्रीकृत राजनीतिक व्यवस्था का प्रभाव दिखाई देता है। यही विविधता इस क्षेत्र की राजनीति को जटिल भी बनाती है और महत्वपूर्ण भी।
द्वितीय विश्व युद्ध से पहले दक्षिण-पूर्व एशिया के अधिकांश देश किसी न किसी रूप में औपनिवेशिक शासन के अधीन थे। इंडोनेशिया पर नीदरलैंड, मलेशिया और म्यांमार पर ब्रिटिश प्रभाव, वियतनाम, लाओस और कंबोडिया पर फ्रांसीसी शासन तथा फिलीपींस पर अमेरिकी प्रभाव रहा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद औपनिवेशिक व्यवस्था कमजोर हुई और इस क्षेत्र के देशों ने स्वतंत्रता प्राप्त करना शुरू किया। स्वतंत्रता के बाद इन देशों के सामने राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक विकास, राष्ट्रीय एकता और बाहरी शक्तियों के प्रभाव से स्वयं को सुरक्षित रखने की चुनौती थी।
शीतयुद्ध के दौर में दक्षिण-पूर्व एशिया महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण क्षेत्र बन गया। अमेरिका साम्यवाद के विस्तार को रोकना चाहता था, जबकि सोवियत संघ और चीन का प्रभाव भी इस क्षेत्र में बढ़ रहा था। वियतनाम युद्ध इस व्यापक शक्ति-संघर्ष का महत्वपूर्ण उदाहरण था। इस युद्ध ने क्षेत्र की राजनीति, सुरक्षा और समाज पर गहरा प्रभाव डाला। दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक देशों को यह अनुभव हुआ कि बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा से क्षेत्रीय शांति और विकास प्रभावित हो सकते हैं।
ऐसी परिस्थितियों में दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों ने क्षेत्रीय सहयोग की आवश्यकता महसूस की। 1967 में आसियान (ASEAN) की स्थापना हुई। इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर और थाईलैंड इसके प्रारंभिक सदस्य थे। बाद में ब्रुनेई, वियतनाम, लाओस, म्यांमार और कंबोडिया भी इससे जुड़े तथा संगठन का विस्तार हुआ। आसियान का मूल उद्देश्य क्षेत्र में शांति, स्थिरता, आर्थिक विकास और पारस्परिक सहयोग को बढ़ावा देना था।
आसियान ने दक्षिण-पूर्व एशिया की राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस संगठन ने सदस्य देशों के बीच संवाद को बढ़ावा दिया और क्षेत्रीय विवादों को बातचीत के माध्यम से हल करने की परंपरा विकसित की। आर्थिक सहयोग के माध्यम से क्षेत्रीय विकास को गति मिली और दक्षिण-पूर्व एशिया विश्व अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। आसियान की विशेषता यह रही कि उसने बड़ी शक्तियों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए क्षेत्रीय देशों की सामूहिक आवाज को मजबूत किया।
दक्षिण-पूर्व एशिया की राजनीति में चीन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। चीन आर्थिक, व्यापारिक और सामरिक दृष्टि से इस क्षेत्र में एक प्रमुख शक्ति है। दक्षिण चीन सागर से संबंधित विवाद चीन और कुछ दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संबंधों को प्रभावित करते हैं। समुद्री संसाधन, द्वीपों पर दावे और महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्ग इस विवाद को रणनीतिक महत्व प्रदान करते हैं। चीन की बढ़ती आर्थिक उपस्थिति ने कई देशों को विकास के अवसर दिए हैं, लेकिन साथ ही कुछ देशों में उसकी बढ़ती रणनीतिक शक्ति को लेकर चिंता भी दिखाई देती है।
अमेरिका भी दक्षिण-पूर्व एशिया की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अमेरिका की क्षेत्रीय उपस्थिति का संबंध समुद्री सुरक्षा, व्यापार, सैन्य सहयोग और चीन के बढ़ते प्रभाव से है। इस प्रकार दक्षिण-पूर्व एशिया में अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन का महत्वपूर्ण तत्व बन गई है। आसियान देश सामान्यतः किसी एक शक्ति के साथ पूरी तरह जुड़ने के बजाय दोनों के साथ संबंध बनाए रखने का प्रयास करते हैं।
दक्षिण-पूर्व एशिया की राजनीति में जापान और ऑस्ट्रेलिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। जापान आर्थिक निवेश, तकनीकी सहयोग और आधारभूत संरचना के विकास में योगदान देता है। ऑस्ट्रेलिया सुरक्षा और समुद्री सहयोग के माध्यम से क्षेत्रीय राजनीति में सक्रिय है। भारत भी इस क्षेत्र में अपनी भूमिका को लगातार बढ़ा रहा है।
भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के संबंध ऐतिहासिक रूप से पुराने हैं। व्यापार, बौद्ध धर्म, भारतीय संस्कृति, कला, भाषा और समुद्री संपर्कों ने प्राचीन काल से भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच संबंध बनाए रखे हैं। आधुनिक समय में भारत ने इन ऐतिहासिक संबंधों को आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी में बदलने का प्रयास किया है।
शीतयुद्ध के दौरान भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के संबंध अपेक्षाकृत सीमित रहे, लेकिन 1991 के बाद परिस्थितियों में महत्वपूर्ण बदलाव आया। भारत ने लुक ईस्ट नीति अपनाई। इसका उद्देश्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ आर्थिक और राजनीतिक संबंधों को मजबूत करना था। आगे चलकर इसी नीति को अधिक सक्रिय रूप देते हुए एक्ट ईस्ट नीति अपनाई गई। इसके माध्यम से भारत ने व्यापार, संपर्क, समुद्री सुरक्षा, रक्षा, संस्कृति और रणनीतिक सहयोग को अधिक महत्व दिया।
भारत के लिए म्यांमार विशेष महत्व रखता है। म्यांमार भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच एक भौगोलिक सेतु का कार्य करता है। भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र म्यांमार के माध्यम से दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से जुड़ सकता है। इसलिए भारत की एक्ट ईस्ट नीति में म्यांमार की भूमिका महत्वपूर्ण है। सड़क, समुद्री और बहु-माध्यम संपर्क परियोजनाओं के माध्यम से भारत अपने पूर्वोत्तर क्षेत्र को दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने का प्रयास कर रहा है।
भारत और आसियान के संबंध भी लगातार व्यापक हुए हैं। आर्थिक सहयोग के साथ-साथ समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद-विरोध, आपदा प्रबंधन, शिक्षा, विज्ञान-तकनीक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा है। भारत आसियान को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण साझेदार मानता है।
दक्षिण-पूर्व एशिया की राजनीति को प्रभावित करने वाली एक प्रमुख समस्या दक्षिण चीन सागर विवाद है। इस क्षेत्र में समुद्री सीमा, द्वीपों और प्राकृतिक संसाधनों को लेकर विभिन्न देशों के दावे हैं। यह विवाद केवल क्षेत्रीय समस्या नहीं रह गया है, बल्कि इसमें बड़ी शक्तियों के रणनीतिक हित भी जुड़े हुए हैं। समुद्री व्यापार के लिए यह क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण होने के कारण यहां किसी बड़े संघर्ष का प्रभाव पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
दक्षिण-पूर्व एशिया में आर्थिक विकास भी राजनीति का महत्वपूर्ण आधार है। सिंगापुर, मलेशिया, इंडोनेशिया, वियतनाम और थाईलैंड जैसे देशों ने औद्योगिक विकास, व्यापार और विदेशी निवेश के माध्यम से अपनी अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत किया है। चीन, जापान, अमेरिका, भारत और यूरोपीय देशों के साथ व्यापारिक संबंधों ने इस क्षेत्र को वैश्विक अर्थव्यवस्था से गहराई से जोड़ दिया है।
इसके बावजूद दक्षिण-पूर्व एशिया कई चुनौतियों का सामना करता है। क्षेत्रीय देशों के बीच राजनीतिक मतभेद, दक्षिण चीन सागर विवाद, म्यांमार की राजनीतिक अस्थिरता, समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद, मानव तस्करी, अवैध व्यापार और प्राकृतिक आपदाएँ प्रमुख चुनौतियाँ हैं। जलवायु परिवर्तन और समुद्र के बढ़ते स्तर का खतरा भी इस क्षेत्र के अनेक तटीय देशों के लिए महत्वपूर्ण है।
दक्षिण-पूर्व एशिया का महत्व अब हिंद-प्रशांत क्षेत्र के संदर्भ में और बढ़ गया है। हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच स्थित होने के कारण यह क्षेत्र वैश्विक समुद्री व्यापार की महत्वपूर्ण कड़ी है। भारत, अमेरिका, चीन, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसी शक्तियाँ इस क्षेत्र की स्थिरता और सुरक्षा को अत्यधिक महत्व देती हैं। भारत का मानना है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र स्वतंत्र, समावेशी, शांतिपूर्ण और नियम-आधारित होना चाहिए।
समग्र रूप से देखा जाए तो दक्षिण-पूर्व एशिया की राजनीति पर क्षेत्रीय देशों के साथ-साथ बड़ी शक्तियों का भी प्रभाव है। इस क्षेत्र ने संघर्ष और महाशक्ति प्रतिस्पर्धा के दौर से निकलकर क्षेत्रीय सहयोग, आर्थिक विकास और बहुपक्षीय संवाद की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। आसियान ने इस प्रक्रिया में केंद्रीय भूमिका निभाई है।
निष्कर्षतः, दक्षिण-पूर्व एशिया वर्तमान अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इसकी आर्थिक क्षमता, समुद्री स्थिति, रणनीतिक महत्व और चीन-अमेरिका प्रतिस्पर्धा ने इसे वैश्विक शक्ति-संतुलन का प्रमुख केंद्र बना दिया है। भारत के लिए यह क्षेत्र केवल व्यापार का बाजार नहीं, बल्कि उसकी एक्ट ईस्ट नीति, समुद्री सुरक्षा, पूर्वोत्तर विकास और हिंद-प्रशांत रणनीति का महत्वपूर्ण आधार है। इसलिए आने वाले समय में भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच मजबूत आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामरिक संबंध दोनों पक्षों के लिए महत्वपूर्ण बने रहेंगे।
पश्चिम एशिया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की राजनीति का मूल्यांकन
पश्चिम एशिया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र वर्तमान अंतरराष्ट्रीय राजनीति के दो अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। दोनों का महत्व केवल भौगोलिक स्थिति के कारण नहीं है, बल्कि इनके साथ ऊर्जा, समुद्री व्यापार, सुरक्षा, सामरिक प्रतिस्पर्धा, आर्थिक विकास और बड़ी शक्तियों के हित जुड़े हुए हैं। भारत के लिए इन दोनों क्षेत्रों का महत्व विशेष रूप से अधिक है, क्योंकि भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं, व्यापारिक मार्गों, प्रवासी भारतीयों और राष्ट्रीय सुरक्षा पर इन क्षेत्रों की परिस्थितियों का सीधा प्रभाव पड़ता है।
पश्चिम एशिया
पश्चिम एशिया एशिया, यूरोप और अफ्रीका के बीच स्थित एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक क्षेत्र है। सामान्यतः इस क्षेत्र में सऊदी अरब, ईरान, इराक, इजराइल, फिलिस्तीन, सीरिया, लेबनान, जॉर्डन, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, ओमान, यमन और बहरीन जैसे देश शामिल किए जाते हैं। इस क्षेत्र का महत्व मुख्य रूप से इसकी भौगोलिक स्थिति, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार तथा महत्वपूर्ण समुद्री और स्थल मार्गों के कारण है।
पश्चिम एशिया की राजनीति को समझने के लिए अरब-इजराइल संघर्ष का विशेष महत्व है। इजराइल की स्थापना के बाद अरब देशों और इजराइल के बीच कई युद्ध हुए। फिलिस्तीन का प्रश्न इस क्षेत्र की राजनीति का सबसे जटिल मुद्दा बना हुआ है। यह समस्या केवल क्षेत्रीय विवाद नहीं है, बल्कि इससे विश्व की बड़ी शक्तियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के हित भी जुड़े हुए हैं।
पश्चिम एशिया की राजनीति में ईरान और सऊदी अरब के बीच क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा भी महत्वपूर्ण रही है। दोनों देशों के राजनीतिक और रणनीतिक हितों में अंतर ने क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन को प्रभावित किया है। इराक, सीरिया, यमन और लेबनान जैसे देशों की राजनीति पर भी इस व्यापक प्रतिस्पर्धा का प्रभाव दिखाई देता है।
इस क्षेत्र में तेल और प्राकृतिक गैस की उपलब्धता ने पश्चिम एशिया को वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बना दिया है। विश्व के अनेक देश अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए इस क्षेत्र पर निर्भर रहे हैं। इसलिए यहां होने वाला कोई बड़ा राजनीतिक या सैन्य संकट अंतरराष्ट्रीय बाजार और ऊर्जा कीमतों को प्रभावित कर सकता है।
पश्चिम एशिया में अमेरिका की भूमिका भी लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। अमेरिका के इजराइल तथा कई अरब देशों के साथ सुरक्षा और रणनीतिक संबंध हैं। दूसरी ओर रूस और चीन ने भी इस क्षेत्र में अपनी राजनीतिक और आर्थिक उपस्थिति बढ़ाई है। इस प्रकार पश्चिम एशिया अब केवल क्षेत्रीय शक्तियों की प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र नहीं, बल्कि बड़ी शक्तियों के व्यापक रणनीतिक हितों का केंद्र भी है।
पश्चिम एशिया में आतंकवाद और राजनीतिक अस्थिरता भी गंभीर समस्याएँ रही हैं। इराक और सीरिया में उग्रवादी संगठनों के उदय ने क्षेत्रीय सुरक्षा को प्रभावित किया। इसके अतिरिक्त यमन और सीरिया जैसे देशों में संघर्षों ने मानवीय संकट को भी गहरा किया।
भारत के लिए पश्चिम एशिया का महत्व बहुआयामी है। भारत को इस क्षेत्र से बड़ी मात्रा में ऊर्जा प्राप्त होती है और बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक पश्चिम एशिया के देशों में कार्य करते हैं। भारत का इन देशों के साथ व्यापारिक और आर्थिक संबंध भी महत्वपूर्ण है। इसलिए भारत की नीति सामान्यतः सभी प्रमुख पक्षों के साथ संतुलित और व्यावहारिक संबंध बनाए रखने की रही है।
भारत के इजराइल के साथ रक्षा, कृषि, विज्ञान और तकनीक के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा है, वहीं अरब देशों के साथ भारत के पारंपरिक आर्थिक और सांस्कृतिक संबंध हैं। ईरान के साथ भारत के ऐतिहासिक और सामरिक संबंध हैं। इस प्रकार भारत पश्चिम एशिया में किसी एक पक्ष के साथ पूरी तरह जुड़ने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर विभिन्न देशों के साथ संबंध विकसित करता है।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र
21वीं शताब्दी में हिंद-प्रशांत क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्रों में उभरा है। यह क्षेत्र हिंद महासागर और प्रशांत महासागर को एक व्यापक रणनीतिक क्षेत्र के रूप में जोड़ता है। विश्व के प्रमुख व्यापारिक समुद्री मार्गों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है।
हिंद-प्रशांत की राजनीति में भारत, अमेरिका, चीन, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसी प्रमुख शक्तियों के हित जुड़े हुए हैं। इसके अतिरिक्त आसियान के सदस्य देश भी इस क्षेत्र की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
हिंद-प्रशांत की राजनीति का सबसे प्रमुख पक्ष चीन का बढ़ता प्रभाव है। चीन ने आर्थिक, नौसैनिक और सामरिक शक्ति में उल्लेखनीय वृद्धि की है। दक्षिण चीन सागर में उसके दावे तथा समुद्री गतिविधियाँ क्षेत्रीय देशों के लिए महत्वपूर्ण चिंता का विषय हैं। ताइवान का प्रश्न भी चीन और अमेरिका के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करता है।
अमेरिका हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी सैन्य और रणनीतिक उपस्थिति बनाए रखना चाहता है। उसका उद्देश्य समुद्री मार्गों की सुरक्षा, सहयोगी देशों के साथ साझेदारी और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन को बनाए रखना है। चीन और अमेरिका के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण हिंद-प्रशांत क्षेत्र वैश्विक शक्ति-राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया है।
क्वाड (Quad) भी हिंद-प्रशांत क्षेत्र की राजनीति में महत्वपूर्ण मंच है, जिसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। इसका उद्देश्य समुद्री सुरक्षा, आपदा राहत, तकनीकी सहयोग, आपूर्ति शृंखला और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देना है। भारत इसे किसी औपचारिक सैन्य गठबंधन के रूप में नहीं, बल्कि सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता के एक मंच के रूप में देखता है।
भारत के लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र का महत्व अत्यंत व्यापक है। भारत की लंबी समुद्री सीमा और हिंद महासागर में उसकी भौगोलिक स्थिति उसे इस क्षेत्र की राजनीति में स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है। भारत की ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा हिस्सा समुद्री मार्गों पर निर्भर करता है। इसलिए समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता और सुरक्षा भारत के लिए महत्वपूर्ण है।
भारत ने हिंद-प्रशांत के संदर्भ में सागर—Security and Growth for All in the Region की अवधारणा प्रस्तुत की है। इसका व्यापक उद्देश्य क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा, आर्थिक विकास, आपसी सहयोग और शांतिपूर्ण वातावरण को बढ़ावा देना है। भारत मुक्त, समावेशी, शांतिपूर्ण और नियम-आधारित हिंद-प्रशांत व्यवस्था का समर्थन करता है।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता आसियान की केंद्रीय भूमिका है। भारत आसियान देशों के साथ आर्थिक, सांस्कृतिक, सामरिक और समुद्री सहयोग को मजबूत कर रहा है। भारत की एक्ट ईस्ट नीति भी इसी व्यापक क्षेत्रीय दृष्टिकोण से जुड़ी हुई है।
हालाँकि हिंद-प्रशांत क्षेत्र के सामने अनेक चुनौतियाँ हैं। चीन और अमेरिका के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा, दक्षिण चीन सागर विवाद, ताइवान प्रश्न, समुद्री सुरक्षा, हथियारों की प्रतिस्पर्धा और आर्थिक निर्भरता प्रमुख मुद्दे हैं। यदि इन समस्याओं का शांतिपूर्ण समाधान नहीं किया गया तो क्षेत्रीय तनाव बढ़ सकता है।
समग्र मूल्यांकन
पश्चिम एशिया और हिंद-प्रशांत दोनों ही भारत की विदेश नीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं, लेकिन दोनों की प्रकृति अलग है। पश्चिम एशिया में भारत की प्राथमिकताएँ ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीय, व्यापार, क्षेत्रीय शांति और रणनीतिक संबंध हैं, जबकि हिंद-प्रशांत में समुद्री सुरक्षा, व्यापारिक मार्ग, शक्ति-संतुलन, चीन का उदय और रणनीतिक सहयोग अधिक महत्वपूर्ण हैं।
भारत की विदेश नीति इन दोनों क्षेत्रों में किसी एक शक्ति के पक्ष में पूरी तरह झुकने के बजाय रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देने का प्रयास करती है। भारत पश्चिम एशिया में इजराइल, अरब देशों और ईरान—सभी के साथ संबंध बनाए रखता है। इसी प्रकार हिंद-प्रशांत में भारत अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ सहयोग करते हुए चीन के साथ भी संवाद और आर्थिक संबंध बनाए रखने की कोशिश करता है।
निष्कर्षतः, पश्चिम एशिया और हिंद-प्रशांत दोनों ही 21वीं शताब्दी की विश्व राजनीति के निर्णायक क्षेत्र हैं। पश्चिम एशिया ऊर्जा और भू-राजनीतिक संघर्षों के कारण महत्वपूर्ण है, जबकि हिंद-प्रशांत वैश्विक व्यापार, समुद्री सुरक्षा और महाशक्ति प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन गया है। भारत के लिए इन दोनों क्षेत्रों में संतुलित, व्यावहारिक और स्वतंत्र विदेश नीति अपनाना आवश्यक है। यही दृष्टिकोण भारत को अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के साथ-साथ क्षेत्रीय शांति और वैश्विक स्थिरता में प्रभावी भूमिका निभाने में सहायता कर सकता है।
अति लघु उत्तरीय प्रश्न
पश्चिम एशिया से क्या अभिप्राय है?
पश्चिम एशिया का भौगोलिक महत्व क्या है?
पश्चिम एशिया को विश्व राजनीति का महत्वपूर्ण क्षेत्र क्यों माना जाता है?
पश्चिम एशिया में कौन-से प्रमुख देश शामिल हैं?
पश्चिम एशिया की राजनीति में तेल का क्या महत्व है?
अरब-इजराइल संघर्ष से क्या अभिप्राय है?
फिलिस्तीन प्रश्न क्या है?
इजराइल की स्थापना कब हुई?
पश्चिम एशिया में अमेरिका की भूमिका क्या है?
ईरान का पश्चिम एशिया की राजनीति में क्या महत्व है?
सऊदी अरब का क्षेत्रीय राजनीति में क्या महत्व है?
ईरान और सऊदी अरब के बीच प्रतिस्पर्धा का क्या प्रभाव है?
पश्चिम एशिया में आतंकवाद एक समस्या क्यों है?
पश्चिम एशिया की राजनीति में सीरिया का क्या महत्व है?
यमन संकट क्या है?
भारत के लिए पश्चिम एशिया क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत की ऊर्जा सुरक्षा का पश्चिम एशिया से क्या संबंध है?
पश्चिम एशिया में भारतीय प्रवासियों का क्या महत्व है?
हिंद-प्रशांत क्षेत्र से क्या अभिप्राय है?
हिंद-प्रशांत क्षेत्र का भौगोलिक महत्व क्या है?
हिंद-प्रशांत क्षेत्र को सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?
हिंद-प्रशांत में भारत की भूमिका क्या है?
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन का क्या महत्व है?
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की भूमिका क्या है?
क्वाड क्या है?
क्वाड में कितने देश शामिल हैं?
क्वाड के सदस्य देश कौन-कौन से हैं?
दक्षिण चीन सागर विवाद क्या है?
ताइवान प्रश्न क्या है?
हिंद-प्रशांत में समुद्री सुरक्षा क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत की सागर नीति क्या है?
SAGAR का पूरा नाम क्या है?
भारत की एक्ट ईस्ट नीति का हिंद-प्रशांत से क्या संबंध है?
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आसियान की क्या भूमिका है?
हिंद-प्रशांत में शक्ति-संतुलन से क्या अभिप्राय है?
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के उदय का क्या प्रभाव पड़ा है?
भारत के लिए समुद्री मार्गों का क्या महत्व है?
हिंद-प्रशांत में आर्थिक प्रतिस्पर्धा से क्या अभिप्राय है?
पश्चिम एशिया और हिंद-प्रशांत भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं?
रणनीतिक स्वायत्तता से क्या अभिप्राय है?
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)
41. पश्चिम एशिया का सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन कौन-सा है?
(A) कोयला
(B) पेट्रोलियम
(C) लौह अयस्क
(D) यूरेनियम
उत्तर — (B) पेट्रोलियम
42. पश्चिम एशिया की राजनीति में कौन-सा प्रश्न सबसे लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है?
(A) फिलिस्तीन प्रश्न
(B) कश्मीर प्रश्न
(C) तिब्बत प्रश्न
(D) कोरिया प्रश्न
उत्तर — (A) फिलिस्तीन प्रश्न
43. इजराइल की स्थापना किस वर्ष हुई?
(A) 1945
(B) 1947
(C) 1948
(D) 1950
उत्तर — (C) 1948
44. पश्चिम एशिया में भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक संसाधन कौन-सा है?
(A) कोयला
(B) पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस
(C) लोहा
(D) सोना
उत्तर — (B)
45. पश्चिम एशिया में भारत के संबंध किन देशों के साथ महत्वपूर्ण हैं?
(A) केवल इजराइल
(B) केवल ईरान
(C) केवल अरब देश
(D) इजराइल, ईरान और अरब देशों सहित अनेक देशों के साथ
उत्तर — (D)
46. पश्चिम एशिया की राजनीति में ईरान और किस देश के बीच क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा महत्वपूर्ण रही है?
(A) जापान
(B) सऊदी अरब
(C) भारत
(D) ऑस्ट्रेलिया
उत्तर — (B)
47. पश्चिम एशिया में ऊर्जा संसाधनों का महत्व किस कारण है?
(A) क्षेत्रीय पर्यटन
(B) वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति
(C) कृषि उत्पादन
(D) शिक्षा
उत्तर — (B)
48. हिंद-प्रशांत क्षेत्र किन दो महासागरीय क्षेत्रों को जोड़ता है?
(A) अटलांटिक और आर्कटिक
(B) हिंद और प्रशांत
(C) प्रशांत और अटलांटिक
(D) हिंद और अटलांटिक
उत्तर — (B)
49. हिंद-प्रशांत क्षेत्र में कौन-सा देश एक प्रमुख शक्ति है?
(A) भारत
(B) चीन
(C) अमेरिका
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर — (D)
50. क्वाड में कितने देश शामिल हैं?
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच
उत्तर — (C)
51. क्वाड में भारत के साथ कौन-से देश शामिल हैं?
(A) रूस, चीन और जापान
(B) अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया
(C) ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी
(D) चीन, रूस और ऑस्ट्रेलिया
उत्तर — (B)
52. हिंद-प्रशांत क्षेत्र में प्रमुख सामरिक प्रतिस्पर्धा किन दो शक्तियों के बीच है?
(A) भारत और जापान
(B) अमेरिका और चीन
(C) रूस और भारत
(D) जापान और ऑस्ट्रेलिया
उत्तर — (B)
53. दक्षिण चीन सागर किस क्षेत्र की राजनीति से संबंधित है?
(A) पश्चिम एशिया
(B) दक्षिण एशिया
(C) दक्षिण-पूर्व एशिया
(D) यूरोप
उत्तर — (C)
54. हिंद-प्रशांत में भारत की नीति का एक महत्वपूर्ण आधार क्या है?
(A) औपनिवेशिक विस्तार
(B) समुद्री सुरक्षा
(C) अलगाववाद
(D) सैन्य शासन
उत्तर — (B)
55. भारत की ‘सागर’ अवधारणा किससे संबंधित है?
(A) कृषि विकास
(B) समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय विकास
(C) परमाणु ऊर्जा
(D) अंतरिक्ष कार्यक्रम
उत्तर — (B)
56. हिंद-प्रशांत में आसियान की भूमिका कैसी है?
(A) नगण्य
(B) क्षेत्रीय रूप से महत्वपूर्ण
(C) केवल सैन्य
(D) केवल धार्मिक
उत्तर — (B)
57. हिंद-प्रशांत में ताइवान प्रश्न मुख्यतः किससे संबंधित है?
(A) भारत और पाकिस्तान
(B) चीन और ताइवान
(C) जापान और रूस
(D) अमेरिका और भारत
उत्तर — (B)
58. हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री व्यापार का महत्व क्यों है?
(A) विश्व व्यापार के महत्वपूर्ण मार्ग यहां स्थित हैं
(B) केवल पर्यटन के कारण
(C) केवल कृषि के कारण
(D) केवल मछली पालन के कारण
उत्तर — (A)
59. भारत के लिए पश्चिम एशिया का एक प्रमुख महत्व क्या है?
(A) ऊर्जा सुरक्षा
(B) पर्वतीय पर्यटन
(C) वन संसाधन
(D) कोयला उत्पादन
उत्तर — (A)
60. पश्चिम एशिया में भारत की विदेश नीति का प्रमुख आधार क्या है?
(A) किसी एक पक्ष का समर्थन
(B) संतुलित और राष्ट्रीय हित आधारित संबंध
(C) अलगाववाद
(D) सैन्य विस्तार
उत्तर — (B)
सही या गलत बताइए
पश्चिम एशिया पेट्रोलियम संसाधनों के कारण विश्व राजनीति में महत्वपूर्ण है।
उत्तर — सहीफिलिस्तीन प्रश्न पश्चिम एशिया की राजनीति से संबंधित नहीं है।
उत्तर — गलतभारत के लिए पश्चिम एशिया ऊर्जा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
उत्तर — सहीपश्चिम एशिया में भारतीय प्रवासी समुदाय का कोई आर्थिक महत्व नहीं है।
उत्तर — गलतहिंद-प्रशांत क्षेत्र का संबंध हिंद और प्रशांत महासागर से है।
उत्तर — सहीक्वाड में चार देश शामिल हैं।
उत्तर — सहीभारत क्वाड का सदस्य नहीं है।
उत्तर — गलतअमेरिका हिंद-प्रशांत की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उत्तर — सहीचीन हिंद-प्रशांत क्षेत्र की प्रमुख शक्तियों में शामिल नहीं है।
उत्तर — गलतदक्षिण चीन सागर हिंद-प्रशांत राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा है।
उत्तर — सहीसमुद्री सुरक्षा भारत के लिए हिंद-प्रशांत में महत्वपूर्ण है।
उत्तर — सहीभारत की सागर अवधारणा का संबंध समुद्री क्षेत्र से है।
उत्तर — सहीपश्चिम एशिया में केवल आर्थिक समस्याएँ हैं, राजनीतिक समस्याएँ नहीं।
उत्तर — गलतईरान और सऊदी अरब की प्रतिस्पर्धा पश्चिम एशिया की राजनीति को प्रभावित करती है।
उत्तर — सहीहिंद-प्रशांत क्षेत्र वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है।
उत्तर — सही
लघु उत्तरीय प्रश्न
पश्चिम एशिया की राजनीति की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
पश्चिम एशिया के सामरिक महत्व को स्पष्ट कीजिए।
पश्चिम एशिया की राजनीति में तेल की भूमिका समझाइए।
अरब-इजराइल संघर्ष के प्रमुख कारण बताइए।
फिलिस्तीन प्रश्न की व्याख्या कीजिए।
पश्चिम एशिया में अमेरिका की भूमिका का वर्णन कीजिए।
पश्चिम एशिया में ईरान की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
ईरान-सऊदी अरब प्रतिस्पर्धा का क्षेत्रीय राजनीति पर प्रभाव बताइए।
पश्चिम एशिया में आतंकवाद की समस्या पर टिप्पणी कीजिए।
भारत के लिए पश्चिम एशिया के महत्व की व्याख्या कीजिए।
भारत और इजराइल के संबंधों पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
भारत और ईरान के संबंधों का महत्व बताइए।
भारत और अरब देशों के संबंधों की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
पश्चिम एशिया की राजनीति में ऊर्जा सुरक्षा का महत्व स्पष्ट कीजिए।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र से क्या अभिप्राय है?
हिंद-प्रशांत क्षेत्र के सामरिक महत्व को समझाइए।
हिंद-प्रशांत में चीन की बढ़ती भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।
हिंद-प्रशांत में अमेरिका की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
क्वाड के उद्देश्य एवं महत्व बताइए।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की भूमिका की चर्चा कीजिए।
दक्षिण चीन सागर विवाद का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
ताइवान प्रश्न का हिंद-प्रशांत राजनीति पर क्या प्रभाव है?
हिंद-प्रशांत में समुद्री सुरक्षा का महत्व समझाइए।
भारत की सागर नीति की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
हिंद-प्रशांत में आसियान की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।
भारत की एक्ट ईस्ट नीति और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के बीच संबंध स्पष्ट कीजिए।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति-संतुलन की समस्या समझाइए।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन-अमेरिका प्रतिस्पर्धा का मूल्यांकन कीजिए।
भारत के लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र के आर्थिक महत्व को स्पष्ट कीजिए।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
पश्चिम एशिया की राजनीति की प्रमुख प्रवृत्तियों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
पश्चिम एशिया में अरब-इजराइल संघर्ष के कारणों और प्रभावों की विवेचना कीजिए।
पश्चिम एशिया की राजनीति में अमेरिका, रूस और चीन की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
पश्चिम एशिया की राजनीति में ऊर्जा संसाधनों की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
पश्चिम एशिया में ईरान-सऊदी अरब प्रतिद्वंद्विता का क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन पर प्रभाव स्पष्ट कीजिए।
भारत की पश्चिम एशिया नीति का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
पश्चिम एशिया में भारत के आर्थिक, ऊर्जा एवं सामरिक हितों की विवेचना कीजिए।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र की राजनीति की प्रमुख विशेषताओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के उदय और उसके प्रभाव का विश्लेषण कीजिए।
हिंद-प्रशांत में अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा का क्षेत्रीय एवं वैश्विक राजनीति पर प्रभाव समझाइए।
क्वाड की भूमिका एवं हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसके महत्व का मूल्यांकन कीजिए।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की भूमिका और उसकी रणनीतिक प्राथमिकताओं की विवेचना कीजिए।
भारत की ‘सागर’ अवधारणा का हिंद-प्रशांत की राजनीति के संदर्भ में मूल्यांकन कीजिए।
दक्षिण चीन सागर विवाद के कारणों और हिंद-प्रशांत की राजनीति पर उसके प्रभावों की चर्चा कीजिए।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और वैश्विक व्यापार के महत्व का विश्लेषण कीजिए।
पश्चिम एशिया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की राजनीति की तुलनात्मक समीक्षा करते हुए भारत के हितों का मूल्यांकन कीजिए।
21वीं शताब्दी की विश्व राजनीति में पश्चिम एशिया और हिंद-प्रशांत के बढ़ते महत्व की समग्र विवेचना कीजिए।
भारत की विदेश नीति के संदर्भ में पश्चिम एशिया और हिंद-प्रशांत दोनों क्षेत्रों के महत्व का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक शक्ति-संतुलन के संदर्भ में पश्चिम एशिया तथा हिंद-प्रशांत की राजनीति का मूल्यांकन कीजिए।
“भारत की रणनीतिक स्वायत्तता उसकी पश्चिम एशिया और हिंद-प्रशांत नीति का महत्वपूर्ण आधार है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
पश्चिम एशिया से हिंद-प्रशांत तक बदलती वैश्विक शक्ति-राजनीति में भारत की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
