Unit -04

Pressure Groups, Determinants of Voting Behavior, Cast &Politics,Need of Electoral Reforms, The Politics Of Secession And Accommodation
दबाव समूह, मतदान व्यवहार के निर्धारक, जाति एवं राजनीति, निर्वाचन सुधारों की आवश्यकता तथा पृथकतावाद एवं समायोजन की राजनीति।

भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यहाँ शासन केवल संविधान और निर्वाचित सरकार के माध्यम से ही संचालित नहीं होता, बल्कि समाज के विभिन्न वर्ग, समुदाय, संगठन तथा नागरिक भी राजनीतिक प्रक्रिया को निरंतर प्रभावित करते रहते हैं। लोकतंत्र में जनता केवल मतदान करने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह अपने विचारों, अपेक्षाओं, मांगों और हितों को विभिन्न माध्यमों से सरकार तक पहुँचाती है। यही कारण है कि आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था को केवल प्रतिनिधि शासन नहीं, बल्कि सहभागी शासन भी कहा जाता है। लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि समाज के विभिन्न वर्गों को अपनी बात रखने का कितना अवसर मिलता है और शासन उनकी अपेक्षाओं को किस सीमा तक स्वीकार करता है।

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में राजनीतिक व्यवस्था अनेक सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय तत्वों से प्रभावित होती है। यहाँ विभिन्न भाषाएँ, धर्म, जातियाँ, परंपराएँ और जीवन-शैलियाँ विद्यमान हैं। प्रत्येक समूह की अपनी आवश्यकताएँ और आकांक्षाएँ हैं। इसलिए लोकतांत्रिक शासन को केवल कानून बनाकर संचालित नहीं किया जा सकता, बल्कि समाज की विविधताओं को समझते हुए निर्णय लेने पड़ते हैं। यही कारण है कि भारतीय राजनीति में दबाव समूह, मतदान व्यवहार, जातीय संरचना, निर्वाचन व्यवस्था तथा क्षेत्रीय आकांक्षाएँ अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।

लोकतंत्र का मूल आधार जनमत है। सरकारें चुनावों के माध्यम से बनती हैं और चुनावों में मतदाताओं का निर्णय सर्वोपरि माना जाता है। किंतु मतदाता किसी एक कारण से मतदान नहीं करता। उसका निर्णय अनेक सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा मनोवैज्ञानिक कारकों से प्रभावित होता है। किसी मतदाता के लिए उम्मीदवार का व्यक्तित्व महत्वपूर्ण हो सकता है, तो किसी अन्य के लिए राजनीतिक दल की विचारधारा या सरकार का कार्य प्रदर्शन अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। कहीं जातीय संबंध प्रभाव डालते हैं, तो कहीं धार्मिक, क्षेत्रीय अथवा आर्थिक परिस्थितियाँ निर्णायक बन जाती हैं। इसलिए मतदान व्यवहार का अध्ययन लोकतांत्रिक राजनीति को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।

भारतीय राजनीति की एक विशिष्ट विशेषता यह भी है कि यहाँ सामाजिक संरचना और राजनीतिक प्रक्रिया का गहरा संबंध रहा है। विशेष रूप से जाति व्यवस्था ने लंबे समय तक सामाजिक जीवन को प्रभावित किया और स्वतंत्रता के बाद लोकतांत्रिक राजनीति के विकास के साथ इसका राजनीतिक स्वरूप भी बदलता गया। प्रारंभिक वर्षों में जाति को केवल सामाजिक संस्था माना जाता था, किंतु धीरे-धीरे यह राजनीतिक संगठन, नेतृत्व, चुनावी रणनीति और सत्ता-साझेदारी का भी एक महत्वपूर्ण आधार बन गई। आज अनेक क्षेत्रों में जाति चुनावी व्यवहार, राजनीतिक दलों की रणनीति तथा नेतृत्व के चयन को प्रभावित करती है। इसके साथ ही सामाजिक न्याय, आरक्षण, प्रतिनिधित्व और समान अवसर जैसे प्रश्न भी जाति और राजनीति के अध्ययन को अत्यंत महत्वपूर्ण बना देते हैं।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनावों की निष्पक्षता और पारदर्शिता अत्यंत आवश्यक होती है। यदि चुनाव प्रक्रिया पर धनबल, बाहुबल, भ्रष्टाचार, अपराधीकरण, सांप्रदायिकता अथवा अन्य अनुचित प्रभाव हावी हो जाएँ, तो लोकतंत्र की गुणवत्ता प्रभावित होती है। स्वतंत्र भारत में निर्वाचन आयोग ने चुनावों को निष्पक्ष बनाने के लिए अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, फिर भी समय के साथ नई चुनौतियाँ सामने आती रही हैं। इसलिए निर्वाचन सुधारों की आवश्यकता निरंतर बनी रहती है। चुनाव सुधारों का उद्देश्य केवल मतदान की प्रक्रिया को बेहतर बनाना नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में जनता के विश्वास को मजबूत करना भी है।

भारत जैसे बहुजातीय, बहुभाषी और बहुधार्मिक देश में कभी-कभी क्षेत्रीय पहचान, सांस्कृतिक अस्मिता अथवा राजनीतिक असंतोष के कारण पृथकतावादी प्रवृत्तियाँ भी उभरती हैं। कुछ समूह अपने लिए अधिक स्वायत्तता, विशेष अधिकार अथवा अलग राजनीतिक व्यवस्था की मांग करते हैं। यदि इन मांगों का समाधान संवाद, संवैधानिक उपायों और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से किया जाए, तो राष्ट्रीय एकता और लोकतांत्रिक स्थिरता दोनों सुरक्षित रहती हैं। इसी प्रक्रिया को समायोजन की राजनीति कहा जाता है। भारतीय लोकतंत्र की एक बड़ी विशेषता यह रही है कि उसने अधिकांश क्षेत्रीय और सामाजिक मांगों का समाधान संवैधानिक ढाँचे के भीतर खोजने का प्रयास किया है।

इन सभी विषयों का परस्पर गहरा संबंध है। दबाव समूह सरकार की नीतियों को प्रभावित करते हैं, मतदान व्यवहार यह निर्धारित करता है कि कौन-सी सरकार बनेगी, जाति और अन्य सामाजिक कारक राजनीतिक प्रक्रिया को दिशा देते हैं, निर्वाचन सुधार लोकतंत्र को अधिक निष्पक्ष बनाते हैं और समायोजन की राजनीति राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करती है। इस प्रकार ये सभी तत्व मिलकर भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की प्रकृति और विकास को प्रभावित करते हैं।

आधुनिक भारतीय राजनीति का अध्ययन तभी पूर्ण माना जा सकता है जब इन सभी पक्षों को एक साथ समझा जाए। लोकतंत्र केवल संवैधानिक संस्थाओं का नाम नहीं है, बल्कि वह समाज, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और नागरिक सहभागिता से निरंतर प्रभावित होने वाली एक गतिशील प्रक्रिया है। भारतीय लोकतंत्र की शक्ति उसकी विविधता, सहिष्णुता, संवाद और समायोजन की क्षमता में निहित है। यही कारण है कि अनेक चुनौतियों के बावजूद भारत विश्व के सबसे बड़े और सबसे सशक्त लोकतंत्रों में अपना विशिष्ट स्थान बनाए हुए है।

इसी व्यापक पृष्ठभूमि में अब हम सबसे पहले दबाव समूह की अवधारणा, उसके विकास, प्रकार, कार्य, महत्व तथा भारतीय राजनीतिक व्यवस्था पर उसके प्रभाव का क्रमबद्ध अध्ययन करेंगे।

भाग–1 : वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs)

1. दबाव समूह (Pressure Group) का मुख्य उद्देश्य क्या होता है?
(अ) सरकार बनाना
(ब) सरकारी नीतियों को प्रभावित करना
(स) संविधान में संशोधन करना
(द) न्यायपालिका का गठन करना
उत्तर – (ब)

2. निम्नलिखित में से कौन दबाव समूह का उदाहरण है?
(अ) राजनीतिक दल
(ब) व्यापारिक संगठन
(स) निर्वाचन आयोग
(द) संसद
उत्तर – (ब)

3. दबाव समूह और राजनीतिक दल में मुख्य अंतर क्या है?
(अ) दोनों सरकार बनाते हैं
(ब) दबाव समूह सरकार नहीं बनाते, केवल नीतियों को प्रभावित करते हैं
(स) दोनों चुनाव नहीं लड़ते
(द) दोनों न्यायिक संस्थाएँ हैं
उत्तर – (ब)

4. मतदान व्यवहार से क्या अभिप्राय है?
(अ) मतदान की प्रक्रिया
(ब) मतदाता के मतदान संबंधी निर्णय और प्रवृत्ति
(स) चुनाव आयोग का कार्य
(द) मतगणना
उत्तर – (ब)

5. मतदान व्यवहार का प्रमुख सामाजिक निर्धारक कौन-सा है?
(अ) मौसम
(ब) जाति
(स) सड़क
(द) डाक व्यवस्था
उत्तर – (ब)

6. भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका मुख्यतः किससे संबंधित है?
(अ) विदेश नीति
(ब) सामाजिक एवं चुनावी राजनीति
(स) न्यायपालिका
(द) मुद्रा नीति
उत्तर – (ब)

7. निर्वाचन सुधारों का प्रमुख उद्देश्य क्या है?
(अ) चुनाव समाप्त करना
(ब) चुनावों को निष्पक्ष एवं पारदर्शी बनाना
(स) मतदाताओं की संख्या कम करना
(द) राजनीतिक दलों को समाप्त करना
उत्तर – (ब)

8. पृथकतावाद (Secession) का अर्थ क्या है?
(अ) राष्ट्रीय एकता
(ब) किसी क्षेत्र का अलग राजनीतिक अस्तित्व प्राप्त करने का प्रयास
(स) चुनाव सुधार
(द) स्थानीय स्वशासन
उत्तर – (ब)

9. समायोजन (Accommodation) की राजनीति का उद्देश्य क्या है?
(अ) संघर्ष बढ़ाना
(ब) संवाद एवं संवैधानिक समाधान द्वारा विवादों का निवारण
(स) चुनाव रोकना
(द) राजनीतिक दलों को समाप्त करना
उत्तर – (ब)

10. भारत में निर्वाचन कौन कराता है?
(अ) संसद
(ब) भारत निर्वाचन आयोग
(स) सर्वोच्च न्यायालय
(द) नीति आयोग
उत्तर – (ब)

11. मतदान व्यवहार का आर्थिक निर्धारक कौन-सा है?
(अ) रोजगार
(ब) भाषा
(स) धर्म
(द) संस्कृति
उत्तर – (अ)

12. निम्न में से कौन-सा दबाव समूह का प्रकार है?
(अ) व्यावसायिक समूह
(ब) न्यायपालिका
(स) मंत्रिपरिषद
(द) राज्यसभा
उत्तर – (अ)

13. लोकतंत्र में दबाव समूह किसका माध्यम माने जाते हैं?
(अ) जनहित की अभिव्यक्ति
(ब) न्यायिक निर्णय
(स) प्रशासनिक नियंत्रण
(द) सैन्य शासन
उत्तर – (अ)

14. जाति आधारित राजनीति का एक प्रमुख प्रभाव क्या है?
(अ) सामाजिक प्रतिनिधित्व
(ब) अंतरिक्ष अनुसंधान
(स) मुद्रा नियंत्रण
(द) विदेश व्यापार
उत्तर – (अ)

15. चुनाव सुधारों की आवश्यकता क्यों होती है?
(अ) लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए
(ब) संसद समाप्त करने के लिए
(स) न्यायपालिका समाप्त करने के लिए
(द) संविधान बदलने के लिए
उत्तर – (अ)

16. मतदान व्यवहार को प्रभावित करने वाला मनोवैज्ञानिक कारक कौन-सा है?
(अ) उम्मीदवार की छवि
(ब) सड़क
(स) जलवायु
(द) उद्योग
उत्तर – (अ)

17. दबाव समूह लोकतंत्र में किस प्रकार की भूमिका निभाते हैं?
(अ) जनमत निर्माण
(ब) संविधान निर्माण
(स) न्यायिक नियुक्ति
(द) मुद्रा जारी करना
उत्तर – (अ)

18. भारत में चुनाव सुधारों से सबसे अधिक कौन-सी संस्था जुड़ी है?
(अ) भारत निर्वाचन आयोग
(ब) राज्यपाल
(स) वित्त आयोग
(द) UPSC
उत्तर – (अ)

19. पृथकतावादी आंदोलनों का लोकतांत्रिक समाधान किससे संभव है?
(अ) संवाद एवं संवैधानिक उपाय
(ब) केवल बल प्रयोग
(स) चुनाव समाप्त करके
(द) राजनीतिक दलों पर प्रतिबंध लगाकर
उत्तर – (अ)

20. भारतीय लोकतंत्र की प्रमुख विशेषता क्या है?
(अ) विविधता में एकता
(ब) सैन्य शासन
(स) राजतंत्र
(द) तानाशाही
उत्तर – (अ)

भाग–2 : अति लघु उत्तरीय प्रश्न
  1. दबाव समूह क्या है?
  2. दबाव समूह की दो विशेषताएँ लिखिए।
  3. दबाव समूह और राजनीतिक दल में एक अंतर लिखिए।
  4. मतदान व्यवहार क्या है?
  5. मतदान व्यवहार के दो निर्धारक लिखिए।
  6. जाति एवं राजनीति से क्या अभिप्राय है?
  7. निर्वाचन सुधार क्या हैं?
  8. पृथकतावाद क्या है?
  9. समायोजन की राजनीति क्या है?
  10. जनमत निर्माण में दबाव समूह की भूमिका लिखिए।
  11. भारतीय राजनीति में जाति का महत्व लिखिए।
  12. चुनाव सुधार क्यों आवश्यक हैं?
  13. निर्वाचन आयोग की भूमिका लिखिए।
  14. दबाव समूह के दो उदाहरण दीजिए।
  15. मतदान व्यवहार में मीडिया की भूमिका लिखिए।
  16. जाति आधारित मतदान क्या है?
  17. चुनावों में धनबल का प्रभाव लिखिए।
  18. चुनावों में बाहुबल का प्रभाव लिखिए।
  19. पृथकतावाद के दो कारण लिखिए।
  20. राष्ट्रीय एकता में समायोजन की भूमिका लिखिए।
  21. मतदाता जागरूकता क्या है?
  22. दबाव समूह लोकतंत्र को कैसे प्रभावित करते हैं?
  23. उम्मीदवार की छवि मतदान को कैसे प्रभावित करती है?
  24. चुनाव सुधारों के दो सुझाव लिखिए।
  25. लोकतंत्र में नागरिक सहभागिता का महत्व लिखिए।

भाग–3 : लघु उत्तरीय प्रश्न
  1. दबाव समूह की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
  2. दबाव समूह की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
  3. दबाव समूहों के प्रकार लिखिए।
  4. दबाव समूह और राजनीतिक दल में अंतर स्पष्ट कीजिए।
  5. मतदान व्यवहार का अर्थ एवं महत्व बताइए।
  6. मतदान व्यवहार के प्रमुख निर्धारकों की व्याख्या कीजिए।
  7. भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
  8. जाति आधारित राजनीति के सकारात्मक एवं नकारात्मक पक्ष लिखिए।
  9. निर्वाचन सुधारों की आवश्यकता स्पष्ट कीजिए।
  10. भारत में चुनाव सुधारों के प्रमुख उपाय लिखिए।
  11. पृथकतावाद की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
  12. समायोजन की राजनीति का महत्व बताइए।
  13. लोकतंत्र में जनमत की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
  14. चुनावों में मीडिया की भूमिका का वर्णन कीजिए।
  15. चुनावों में धनबल और बाहुबल की समस्या पर टिप्पणी कीजिए।
  16. दबाव समूहों का लोकतंत्र पर प्रभाव लिखिए।
  17. मतदान व्यवहार में नेतृत्व की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
  18. निर्वाचन आयोग की भूमिका का वर्णन कीजिए।
  19. भारतीय लोकतंत्र में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव स्पष्ट कीजिए।
  20. लोकतांत्रिक राजनीति में सामाजिक न्याय का महत्व स्पष्ट कीजिए।

भाग–4 : दीर्घ उत्तरीय / निबंधात्मक प्रश्न
  1. दबाव समूह की अवधारणा, विशेषताओं एवं कार्यों का विस्तृत विवेचन कीजिए।
  2. दबाव समूह एवं राजनीतिक दल में अंतर स्पष्ट करते हुए लोकतंत्र में उनकी भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
  3. मतदान व्यवहार की अवधारणा एवं उसके प्रमुख निर्धारकों का विस्तृत अध्ययन कीजिए।
  4. भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
  5. निर्वाचन सुधारों की आवश्यकता एवं प्रमुख सुझावों का विश्लेषण कीजिए।
  6. भारत में निर्वाचन सुधारों के लिए किए गए प्रमुख प्रयासों का वर्णन कीजिए।
  7. पृथकतावाद एवं समायोजन की राजनीति का भारतीय संदर्भ में आलोचनात्मक अध्ययन कीजिए।
  8. भारतीय लोकतंत्र में दबाव समूहों की भूमिका एवं प्रभाव का मूल्यांकन कीजिए।
  9. लोकतंत्र में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों के महत्व का विश्लेषण कीजिए।
  10. "जाति भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण निर्धारक है।" इस कथन की समीक्षा कीजिए।
  11. मतदान व्यवहार को प्रभावित करने वाले सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक कारकों का विवेचन कीजिए।
  12. लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचन आयोग की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।
  13. भारतीय लोकतंत्र में मीडिया एवं दबाव समूहों की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
  14. पृथकतावाद की चुनौतियों एवं समायोजन की राजनीति के महत्व पर चर्चा कीजिए।
  15. लोकतांत्रिक राजनीति में नागरिक सहभागिता, दबाव समूह एवं जनमत के पारस्परिक संबंधों का विश्लेषण कीजिए।
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