Unit-04
Sovereignty: Monism and Pluralism.Law: Definition: Source, Classification.
Punishment :Theories of punishment
सम्प्रभुता : एकतावाद एवं बहुलवाद; कानून : परिभाषा, स्रोत तथा वर्गीकरण; दण्ड : दण्ड के सिद्धांत।
राज्य की अवधारणा को समझने के लिए केवल उसके स्वरूप, उत्पत्ति और कार्यों का अध्ययन पर्याप्त नहीं होता। किसी भी राज्य की वास्तविक शक्ति, उसकी वैधानिक व्यवस्था तथा न्याय प्रणाली को समझने के लिए सम्प्रभुता, कानून और दण्ड जैसी अवधारणाओं का अध्ययन भी आवश्यक है। ये तीनों विषय राजनीति विज्ञान के मूल आधार हैं। सम्प्रभुता राज्य की सर्वोच्च सत्ता का प्रतीक है, कानून समाज में व्यवस्था और न्याय स्थापित करने का माध्यम है तथा दण्ड कानून के प्रभावी क्रियान्वयन का आवश्यक साधन है। इन तीनों के समन्वय से ही एक संगठित, अनुशासित और न्यायपूर्ण राज्य की स्थापना संभव होती है।
सम्प्रभुता राज्य का सबसे महत्वपूर्ण और अनिवार्य तत्व है। इसका अर्थ राज्य की सर्वोच्च, स्वतंत्र और अंतिम सत्ता से है। राज्य अपने निश्चित भू-भाग के भीतर सर्वोच्च अधिकार रखता है तथा उसके निर्णयों के ऊपर कोई अन्य आंतरिक शक्ति नहीं होती। इसी प्रकार बाहरी दृष्टि से भी राज्य किसी अन्य राज्य के अधीन नहीं होता और अपनी विदेश नीति तथा राष्ट्रीय हितों के अनुसार स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार रखता है। सम्प्रभुता के कारण ही राज्य अन्य सभी सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक संस्थाओं से श्रेष्ठ माना जाता है। यदि किसी राजनीतिक संगठन में सम्प्रभुता का अभाव हो, तो उसे पूर्ण राज्य नहीं कहा जा सकता।
सम्प्रभुता के स्वरूप को लेकर राजनीतिक विचारकों में दो प्रमुख दृष्टिकोण विकसित हुए—एकतावाद और बहुलवाद। इन दोनों ने राज्य की सर्वोच्च सत्ता की प्रकृति को अलग-अलग ढंग से समझाने का प्रयास किया।
एकतावाद का मत है कि सम्प्रभुता एक ही स्थान पर निहित होती है और उसका विभाजन नहीं किया जा सकता। इस दृष्टिकोण के अनुसार राज्य की सर्वोच्च सत्ता एकीकृत, अविभाज्य और अंतिम होती है। यदि सम्प्रभुता अनेक संस्थाओं में बाँट दी जाए तो राज्य की एकता और प्रभावशीलता समाप्त हो जाएगी। इसलिए कानून बनाने, उनका पालन कराने तथा अंतिम निर्णय लेने का अधिकार केवल राज्य के पास होना चाहिए। एकतावादी विचारधारा के अनुसार शासन व्यवस्था तभी प्रभावी हो सकती है जब सर्वोच्च सत्ता एक ही केंद्र में स्थित हो। इस दृष्टिकोण ने आधुनिक राष्ट्र-राज्य और केंद्रीकृत शासन व्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसके विपरीत बहुलवाद यह मानता है कि समाज में राज्य के अतिरिक्त अनेक संस्थाएँ भी महत्वपूर्ण होती हैं और उन्हें भी अपने-अपने क्षेत्र में पर्याप्त स्वतंत्रता प्राप्त होनी चाहिए। परिवार, धार्मिक संस्थाएँ, स्थानीय निकाय, श्रमिक संगठन, सहकारी संस्थाएँ तथा विभिन्न सामाजिक संगठन भी समाज के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए सम्प्रभुता को केवल राज्य तक सीमित नहीं माना जा सकता। बहुलवादी विचारधारा के अनुसार राज्य को अन्य सामाजिक संस्थाओं के साथ समन्वय स्थापित करते हुए कार्य करना चाहिए। यह दृष्टिकोण लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण, स्थानीय स्वशासन और नागरिक सहभागिता को प्रोत्साहित करता है। आधुनिक लोकतंत्रों में दोनों दृष्टिकोणों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया जाता है ताकि राज्य की एकता भी बनी रहे और सामाजिक संस्थाओं की स्वायत्तता भी सुरक्षित रहे।
राज्य की शक्ति का वास्तविक स्वरूप कानून के माध्यम से प्रकट होता है। कानून वह वैधानिक नियम है जिसे राज्य द्वारा बनाया या मान्यता प्रदान की जाती है तथा जिसका पालन प्रत्येक नागरिक के लिए अनिवार्य होता है। कानून का मुख्य उद्देश्य समाज में शांति, व्यवस्था, न्याय और समानता स्थापित करना है। यदि समाज में कानून न हो तो अराजकता, हिंसा और असुरक्षा का वातावरण उत्पन्न हो जाएगा। इसलिए कानून को सभ्य समाज की आधारशिला माना जाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होता है और कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं माना जाता।
कानून का निर्माण अनेक स्रोतों से होता है। सबसे प्रमुख स्रोत विधानमंडल है, जो समाज की आवश्यकताओं के अनुसार नए कानून बनाती है। संविधान भी कानून का मूल स्रोत है, क्योंकि देश के सभी कानून संविधान के अनुरूप बनाए जाते हैं। न्यायालयों के निर्णय भी अनेक बार भविष्य के मामलों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होते हैं और कानून के विकास में योगदान देते हैं। प्राचीन समाजों में रीति-रिवाज और परंपराएँ कानून का महत्वपूर्ण आधार थीं तथा आज भी अनेक क्षेत्रों में उनका प्रभाव दिखाई देता है। इसके अतिरिक्त धर्म, विद्वानों की व्याख्याएँ, अंतरराष्ट्रीय संधियाँ तथा सामाजिक आवश्यकताएँ भी कानून के विकास को प्रभावित करती हैं। इस प्रकार कानून केवल विधायिका की देन नहीं है, बल्कि यह समाज के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विकास का परिणाम भी होता है।
कानूनों का वर्गीकरण उनके स्वरूप और उद्देश्य के आधार पर किया जाता है। राष्ट्रीय कानून वे होते हैं जो किसी देश की सीमाओं के भीतर लागू होते हैं। अंतरराष्ट्रीय कानून विभिन्न देशों के बीच संबंधों को नियंत्रित करते हैं। सार्वजनिक कानून राज्य और नागरिकों के संबंधों से संबंधित होते हैं, जबकि निजी कानून नागरिकों के पारस्परिक संबंधों का नियमन करते हैं। संवैधानिक कानून शासन की मूल संरचना और शक्तियों का निर्धारण करते हैं। प्रशासनिक कानून सरकारी अधिकारियों और प्रशासनिक संस्थाओं के कार्यों को नियंत्रित करते हैं। आपराधिक कानून अपराधों तथा उनके दण्ड का निर्धारण करते हैं, जबकि दीवानी कानून संपत्ति, अनुबंध, उत्तराधिकार तथा व्यक्तिगत अधिकारों से संबंधित विवादों का समाधान करते हैं। आधुनिक राज्य में इन सभी प्रकार के कानून मिलकर न्याय व्यवस्था को प्रभावी बनाते हैं।
कानून तभी प्रभावी हो सकता है जब उसके उल्लंघन पर उचित दण्ड की व्यवस्था हो। दण्ड वह वैधानिक दायित्व है जो अपराध सिद्ध होने पर न्यायालय द्वारा अपराधी को दिया जाता है। दण्ड का उद्देश्य केवल अपराधी को कष्ट पहुँचाना नहीं होता, बल्कि समाज में न्याय स्थापित करना, अपराधों की पुनरावृत्ति रोकना तथा नागरिकों में कानून के प्रति सम्मान की भावना विकसित करना भी होता है। यदि कानून का उल्लंघन करने पर कोई दण्ड न हो तो कानून का महत्व समाप्त हो जाएगा और समाज में अनुशासन बनाए रखना कठिन हो जाएगा।
दण्ड के उद्देश्य को स्पष्ट करने के लिए विभिन्न सिद्धांत विकसित हुए हैं। प्रतिशोधात्मक सिद्धांत के अनुसार अपराधी को उसके अपराध के अनुपात में दण्ड मिलना चाहिए। इस सिद्धांत का आधार यह विचार है कि जिसने समाज को हानि पहुँचाई है, उसे उसके कृत्य का उचित परिणाम अवश्य भुगतना चाहिए। प्राचीन समय में यह सिद्धांत अधिक प्रचलित था, किंतु आधुनिक युग में इसे सीमित रूप में ही स्वीकार किया जाता है।
निवारक सिद्धांत का उद्देश्य अपराधी और अन्य लोगों में अपराध करने का भय उत्पन्न करना है। इसके अनुसार कठोर और निश्चित दण्ड समाज में अपराधों को कम करने में सहायक होता है। जब लोग यह जानते हैं कि अपराध करने पर उन्हें दण्ड मिलेगा, तो वे कानून का उल्लंघन करने से बचते हैं। इसलिए इस सिद्धांत का मुख्य लक्ष्य अपराध की रोकथाम है।
निरोधात्मक सिद्धांत का उद्देश्य अपराधी को कुछ समय के लिए समाज से अलग करके उसे पुनः अपराध करने से रोकना है। कारावास, आजीवन कारावास तथा कुछ परिस्थितियों में अन्य प्रतिबंधात्मक उपाय इसी सिद्धांत पर आधारित होते हैं। इससे समाज की सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाता है।
सुधारात्मक सिद्धांत आधुनिक न्याय व्यवस्था का सबसे मानवीय और प्रगतिशील सिद्धांत माना जाता है। इसके अनुसार अपराधी जन्मजात अपराधी नहीं होता, बल्कि अनेक सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक और मनोवैज्ञानिक परिस्थितियाँ उसे अपराध की ओर ले जाती हैं। इसलिए केवल दण्ड देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके व्यक्तित्व में सुधार करना भी आवश्यक है। शिक्षा, परामर्श, व्यावसायिक प्रशिक्षण, नैतिक मार्गदर्शन तथा पुनर्वास की योजनाओं के माध्यम से अपराधी को समाज का जिम्मेदार नागरिक बनाने का प्रयास किया जाता है। वर्तमान समय में अधिकांश लोकतांत्रिक देशों की दण्ड व्यवस्था इसी सिद्धांत को अधिक महत्व देती है।
इन सिद्धांतों के अतिरिक्त आधुनिक न्याय व्यवस्था में यह भी माना जाता है कि दण्ड न्यायपूर्ण, निष्पक्ष और मानवीय होना चाहिए। दण्ड का निर्धारण अपराध की प्रकृति, अपराधी की परिस्थितियों तथा समाज के हितों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। न्यायालयों का उद्देश्य केवल दण्ड देना नहीं, बल्कि न्याय की स्थापना करना होता है। इसलिए आधुनिक न्याय प्रणाली में मानवाधिकारों, विधिक प्रक्रिया तथा निष्पक्ष सुनवाई को विशेष महत्व दिया जाता है।
इस प्रकार सम्प्रभुता, कानून और दण्ड तीनों एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं। सम्प्रभुता राज्य को सर्वोच्च अधिकार प्रदान करती है, कानून उस अधिकार को वैधानिक स्वरूप देता है और दण्ड कानून के प्रभावी पालन को सुनिश्चित करता है। एकतावाद और बहुलवाद सम्प्रभुता की प्रकृति को अलग-अलग दृष्टिकोणों से स्पष्ट करते हैं, कानून समाज में न्याय और व्यवस्था स्थापित करता है तथा दण्ड अपराध नियंत्रण और सामाजिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण साधन बनता है। आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य में इन तीनों का उद्देश्य केवल शासन चलाना नहीं, बल्कि न्याय, समानता, स्वतंत्रता, विधि के शासन और मानव गरिमा की रक्षा करना भी है। इसी कारण राजनीति विज्ञान में इन अवधारणाओं का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
सम्प्रभुता से क्या अभिप्राय है? इसकी विशेषताओं का विस्तृत वर्णन कीजिए।
एकतावाद एवं बहुलवाद का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।
सम्प्रभुता के एकतावादी सिद्धांत की व्याख्या करते हुए उसके गुण एवं दोषों का वर्णन कीजिए।
बहुलवादी सिद्धांत का समालोचनात्मक विवेचन कीजिए।
एकतावाद और बहुलवाद में अंतर स्पष्ट कीजिए।
कानून की परिभाषा देते हुए उसके महत्व का वर्णन कीजिए।
कानून के प्रमुख स्रोतों का विस्तृत विवेचन कीजिए।
कानून के वर्गीकरण का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
संविधान कानून का प्रमुख स्रोत क्यों माना जाता है? स्पष्ट कीजिए।
कानून और नैतिकता के संबंध का विवेचन कीजिए।
दण्ड से क्या अभिप्राय है? उसके उद्देश्यों का वर्णन कीजिए।
दण्ड के विभिन्न सिद्धांतों का आलोचनात्मक विवेचन कीजिए।
प्रतिशोधात्मक एवं सुधारात्मक सिद्धांतों की तुलना कीजिए।
आधुनिक न्याय व्यवस्था में सुधारात्मक सिद्धांत का महत्व स्पष्ट कीजिए।
लोकतांत्रिक राज्य में कानून और दण्ड की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।
लघु उत्तरीय प्रश्न
सम्प्रभुता क्या है?
सम्प्रभुता की कोई चार विशेषताएँ लिखिए।
एकतावाद से क्या अभिप्राय है?
बहुलवाद क्या है?
एकतावाद और बहुलवाद में दो अंतर लिखिए।
कानून की परिभाषा दीजिए।
कानून का मुख्य उद्देश्य क्या है?
कानून के चार स्रोत लिखिए।
संविधान कानून का स्रोत कैसे है?
न्यायालय कानून के विकास में कैसे योगदान देते हैं?
रीति-रिवाज कानून का स्रोत कैसे हैं?
कानून के प्रमुख प्रकार लिखिए।
सार्वजनिक कानून क्या है?
निजी कानून क्या है?
संवैधानिक कानून क्या है?
आपराधिक कानून क्या है?
दण्ड से क्या अभिप्राय है?
दण्ड का मुख्य उद्देश्य क्या है?
प्रतिशोधात्मक सिद्धांत क्या है?
निवारक सिद्धांत क्या है?
निरोधात्मक सिद्धांत क्या है?
सुधारात्मक सिद्धांत क्या है?
आधुनिक न्याय व्यवस्था किस सिद्धांत को अधिक महत्व देती है?
कानून और दण्ड का संबंध स्पष्ट कीजिए।
लोकतंत्र में विधि के शासन का क्या महत्व है?
अति लघु उत्तरीय प्रश्न
सम्प्रभुता किसे कहते हैं?
सम्प्रभुता का सबसे महत्वपूर्ण गुण क्या है?
एकतावाद किस पर बल देता है?
बहुलवाद किसका समर्थन करता है?
कानून क्या है?
कानून का एक स्रोत लिखिए।
संविधान क्या है?
कानून का एक प्रकार लिखिए।
सार्वजनिक कानून किससे संबंधित है?
निजी कानून किससे संबंधित है?
दण्ड क्या है?
प्रतिशोधात्मक सिद्धांत किस पर आधारित है?
निवारक सिद्धांत का उद्देश्य क्या है?
सुधारात्मक सिद्धांत किस पर बल देता है?
आधुनिक लोकतंत्र में कौन-सा दण्ड सिद्धांत अधिक प्रचलित है?
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ)
1. सम्प्रभुता का अर्थ है—
(A) कर वसूलना
(B) सर्वोच्च एवं स्वतंत्र सत्ता
(C) चुनाव कराना
(D) कानून बनाना
उत्तर – (B)
2. राज्य का कौन-सा तत्व उसे अन्य संस्थाओं से श्रेष्ठ बनाता है?
(A) जनसंख्या
(B) भू-भाग
(C) संप्रभुता
(D) सरकार
उत्तर – (C)
3. एकतावाद किसका समर्थन करता है?
(A) सम्प्रभुता का विभाजन
(B) सम्प्रभुता की एकता
(C) स्थानीय स्वशासन
(D) बहुदलीय व्यवस्था
उत्तर – (B)
4. बहुलवाद के अनुसार सम्प्रभुता—
(A) केवल राज्य में निहित है।
(B) विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के महत्व को स्वीकार करती है।
(C) केवल राजा में निहित है।
(D) केवल संसद में निहित है।
उत्तर – (B)
5. कानून का मुख्य उद्देश्य क्या है?
(A) कर वसूलना
(B) समाज में शांति एवं न्याय स्थापित करना
(C) चुनाव कराना
(D) व्यापार बढ़ाना
उत्तर – (B)
6. निम्नलिखित में कानून का प्रमुख स्रोत कौन है?
(A) विधानमंडल
(B) संविधान
(C) न्यायालय
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर – (D)
7. रीति-रिवाज कानून के किस प्रकार के स्रोत हैं?
(A) सामाजिक स्रोत
(B) आर्थिक स्रोत
(C) धार्मिक स्रोत
(D) प्राकृतिक स्रोत
उत्तर – (A)
8. सार्वजनिक कानून किससे संबंधित होता है?
(A) नागरिकों के निजी विवादों से
(B) राज्य एवं नागरिकों के संबंधों से
(C) व्यापार से
(D) कृषि से
उत्तर – (B)
9. निजी कानून किससे संबंधित होता है?
(A) अंतरराष्ट्रीय संबंधों से
(B) नागरिकों के पारस्परिक संबंधों से
(C) संसद से
(D) न्यायपालिका से
उत्तर – (B)
10. संवैधानिक कानून किसका निर्धारण करता है?
(A) व्यापार
(B) शासन की मूल संरचना
(C) कृषि नीति
(D) विदेश व्यापार
उत्तर – (B)
11. आपराधिक कानून किससे संबंधित है?
(A) संपत्ति विवाद
(B) अपराध एवं दण्ड
(C) विवाह
(D) उत्तराधिकार
उत्तर – (B)
12. दण्ड का मुख्य उद्देश्य क्या है?
(A) केवल बदला लेना
(B) न्याय स्थापित करना एवं अपराध रोकना
(C) धन संग्रह करना
(D) प्रचार करना
उत्तर – (B)
13. प्रतिशोधात्मक सिद्धांत किस पर आधारित है?
(A) सुधार
(B) बदला या प्रतिशोध
(C) पुनर्वास
(D) शिक्षा
उत्तर – (B)
14. निवारक सिद्धांत का उद्देश्य क्या है?
(A) अपराधी को सुधारना
(B) अपराध करने से रोकना
(C) अपराधी को सम्मान देना
(D) केवल चेतावनी देना
उत्तर – (B)
15. निरोधात्मक सिद्धांत का उद्देश्य है—
(A) अपराधी को समाज से अलग रखना
(B) अपराधी को पुरस्कार देना
(C) कानून समाप्त करना
(D) चुनाव कराना
उत्तर – (A)
16. सुधारात्मक सिद्धांत किस पर बल देता है?
(A) कठोर दण्ड
(B) अपराधी के सुधार एवं पुनर्वास पर
(C) प्रतिशोध पर
(D) केवल कारावास पर
उत्तर – (B)
17. आधुनिक न्याय व्यवस्था किस सिद्धांत को अधिक महत्व देती है?
(A) प्रतिशोधात्मक
(B) सुधारात्मक
(C) दैवी
(D) बल सिद्धांत
उत्तर – (B)
18. बहुलवाद किसका समर्थन करता है?
(A) निरंकुश सत्ता
(B) सामाजिक संस्थाओं की स्वायत्तता
(C) सैन्य शासन
(D) राजतंत्र
उत्तर – (B)
19. विधि के शासन (Rule of Law) का अर्थ है—
(A) राजा की इच्छा सर्वोच्च है।
(B) कानून सभी पर समान रूप से लागू होता है।
(C) केवल सरकार कानून माने।
(D) केवल न्यायाधीश कानून माने।
उत्तर – (B)
20. लोकतांत्रिक राज्य में कानून का पालन क्यों आवश्यक है?
(A) सामाजिक व्यवस्था एवं न्याय बनाए रखने के लिए
(B) केवल कर वसूली के लिए
(C) केवल चुनाव कराने के लिए
(D) केवल सेना चलाने के लिए
उत्तर – (A)
रिक्त स्थान भरिए
सम्प्रभुता राज्य की ________ शक्ति है।
उत्तर: सर्वोच्चएकतावाद सम्प्रभुता की ________ पर बल देता है।
उत्तर: एकताबहुलवाद ________ संस्थाओं के महत्व को स्वीकार करता है।
उत्तर: सामाजिकसंविधान कानून का ________ स्रोत है।
उत्तर: प्रमुखआधुनिक न्याय व्यवस्था ________ सिद्धांत को अधिक महत्व देती है।
उत्तर: सुधारात्मक
सत्य / असत्य
सम्प्रभुता राज्य का अनिवार्य तत्व है। (सत्य)
बहुलवाद सम्प्रभुता के पूर्ण केंद्रीकरण का समर्थन करता है। (असत्य)
संविधान कानून का प्रमुख स्रोत है। (सत्य)
प्रतिशोधात्मक सिद्धांत अपराधी के सुधार पर बल देता है। (असत्य)
सुधारात्मक सिद्धांत अपराधी के पुनर्वास को महत्व देता है। (सत्य)
