Unit – 5

Existentialism: G.P. Sartre, Radical Humanist: M.N. Roy.

अस्तित्ववाद: जाँ-पॉल सार्त्र तथा उग्र मानवतावाद: एम. एन. राय।

अस्तित्ववाद और उग्र मानवतावाद बीसवीं शताब्दी की दो ऐसी महत्वपूर्ण विचारधाराएँ हैं जिन्होंने आधुनिक राजनीतिक दर्शन, नैतिक चिंतन तथा मानव जीवन की व्याख्या को नई दिशा प्रदान की। यद्यपि दोनों विचारधाराओं का उद्भव भिन्न ऐतिहासिक परिस्थितियों में हुआ और उनके दार्शनिक आधार भी अलग हैं, फिर भी दोनों का केंद्रबिंदु मनुष्य, उसकी स्वतंत्रता, उसकी चेतना तथा उसके उत्तरदायित्व को बनाना है। अस्तित्ववाद मुख्यतः व्यक्ति के अस्तित्व, स्वतंत्रता, विकल्प, चिंता, नैतिक दायित्व और आत्मनिर्माण पर बल देता है, जबकि उग्र मानवतावाद तर्क, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, लोकतंत्र, मानव गरिमा और विवेकपूर्ण सामाजिक परिवर्तन को मानव विकास का आधार मानता है। जाँ-पॉल सार्त्र ने अस्तित्ववाद को आधुनिक रूप प्रदान किया, जबकि एम. एन. राय ने भारतीय और वैश्विक राजनीतिक चिंतन में उग्र मानवतावाद का प्रतिपादन करते हुए व्यक्ति को सभी सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्थाओं का केंद्र माना। इन दोनों विचारकों ने मानव स्वतंत्रता को सर्वोच्च महत्व दिया, किंतु स्वतंत्रता को केवल अधिकार नहीं बल्कि उत्तरदायित्व भी माना।

बीसवीं शताब्दी का प्रारंभिक काल विश्व इतिहास में गहन उथल-पुथल का समय था। दो विश्वयुद्धों, आर्थिक संकटों, साम्राज्यवाद, अधिनायकवाद, फासीवाद तथा व्यापक मानवीय पीड़ा ने यह प्रश्न उठाया कि आधुनिक सभ्यता की वास्तविक दिशा क्या है। विज्ञान और तकनीक की अभूतपूर्व प्रगति के बावजूद मानव जीवन असुरक्षा, हिंसा और नैतिक संकट से घिरा हुआ था। इसी पृष्ठभूमि में अनेक विचारकों ने व्यक्ति की स्वतंत्रता, उसकी गरिमा और उसकी नैतिक जिम्मेदारी पर पुनर्विचार किया। अस्तित्ववाद और उग्र मानवतावाद इसी ऐतिहासिक संदर्भ की महत्वपूर्ण वैचारिक प्रतिक्रियाएँ हैं।

जाँ-पॉल सार्त्र का जन्म 1905 में फ्रांस में हुआ। वे दार्शनिक, साहित्यकार, नाटककार और राजनीतिक चिंतक थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के अनुभवों ने उनके चिंतन को गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि मनुष्य का अस्तित्व किसी पूर्वनिर्धारित उद्देश्य या दैवी योजना के अधीन नहीं है। मनुष्य पहले अस्तित्व में आता है और उसके बाद अपने निर्णयों, कर्मों तथा जीवन के माध्यम से अपने व्यक्तित्व और उद्देश्य का निर्माण करता है। इसी विचार को उन्होंने प्रसिद्ध सूत्र के रूप में व्यक्त किया कि अस्तित्व सार से पूर्व है। इसका अर्थ यह है कि मनुष्य का कोई निश्चित स्वभाव जन्म से निर्धारित नहीं होता; वह अपने चुनावों और कार्यों द्वारा स्वयं अपना स्वरूप निर्मित करता है।

सार्त्र के अनुसार मनुष्य मूलतः स्वतंत्र है। यह स्वतंत्रता बाहरी परिस्थितियों से पूर्णतः मुक्त होने का नाम नहीं है, बल्कि प्रत्येक परिस्थिति में विकल्प चुनने की क्षमता है। मनुष्य चाहे किसी भी सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक परिस्थिति में हो, उसके सामने किसी न किसी रूप में चुनाव की संभावना बनी रहती है। इसलिए व्यक्ति अपने जीवन के लिए स्वयं उत्तरदायी है। यदि वह अपने निर्णयों की जिम्मेदारी दूसरों, समाज, भाग्य अथवा ईश्वर पर डालता है, तो वह अपने वास्तविक अस्तित्व से दूर चला जाता है। इस प्रकार स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व उनके दर्शन के दो अभिन्न पक्ष हैं।

सार्त्र ने कहा कि मनुष्य स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त है। इस कथन का आशय यह नहीं है कि स्वतंत्रता कोई दंड है, बल्कि यह कि मनुष्य स्वतंत्रता से बच नहीं सकता। प्रत्येक निर्णय उसे स्वयं लेना पड़ता है और उसके परिणामों की जिम्मेदारी भी उसी की होती है। यही कारण है कि स्वतंत्रता के साथ चिंता, असुरक्षा और नैतिक द्वंद्व भी जुड़े रहते हैं। व्यक्ति जब अपने जीवन के बारे में निर्णय लेता है, तब वह केवल अपने लिए ही नहीं, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से यह भी संकेत देता है कि मनुष्य को किस प्रकार का जीवन जीना चाहिए। इसलिए व्यक्तिगत निर्णयों का सामाजिक और नैतिक महत्व भी होता है।

सार्त्र ने प्रामाणिकता की अवधारणा को अत्यधिक महत्व दिया। उनके अनुसार प्रामाणिक जीवन वही है जिसमें व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता को स्वीकार करता है और अपने निर्णयों की जिम्मेदारी स्वयं उठाता है। इसके विपरीत यदि व्यक्ति सामाजिक परंपराओं, रूढ़ियों, भय अथवा दूसरों की अपेक्षाओं के कारण अपने वास्तविक विचारों और इच्छाओं को दबा देता है, तो वह अप्रामाणिक जीवन जीता है। उन्होंने इस स्थिति को मिथ्या आस्था की संज्ञा दी। मिथ्या आस्था का अर्थ है स्वयं को यह विश्वास दिलाना कि हमारे पास कोई विकल्प नहीं है, जबकि वास्तव में विकल्प मौजूद होते हैं।

राजनीतिक दृष्टि से सार्त्र ने स्वतंत्रता, समानता और सामाजिक न्याय का समर्थन किया। उनका विश्वास था कि यदि समाज में आर्थिक, राजनीतिक अथवा सांस्कृतिक दमन मौजूद है, तो व्यक्ति की स्वतंत्रता अधूरी रह जाती है। इसलिए उन्होंने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ जोड़ा। उनका विचार था कि मनुष्य की स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब वह दूसरों की स्वतंत्रता का भी सम्मान करे। इस प्रकार उनका अस्तित्ववाद व्यक्तिवाद तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता और नैतिक उत्तरदायित्व को भी स्वीकार करता है।

सार्त्र साहित्य और कला को भी सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानते थे। उनके अनुसार लेखक और बुद्धिजीवी समाज के प्रति उत्तरदायी होते हैं। उन्हें अन्याय, शोषण और दमन के विरुद्ध अपनी रचनात्मक शक्ति का उपयोग करना चाहिए। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि विचारों की स्वतंत्रता का वास्तविक उद्देश्य मानव मुक्ति और सामाजिक चेतना का विकास है।

सार्त्र के अस्तित्ववाद की आलोचना भी हुई। कुछ विद्वानों ने कहा कि उनका दर्शन व्यक्ति की स्वतंत्रता पर अत्यधिक बल देता है और सामाजिक संरचनाओं, आर्थिक परिस्थितियों तथा ऐतिहासिक सीमाओं के प्रभाव को अपेक्षाकृत कम महत्व देता है। कुछ आलोचकों का मत था कि उनका चिंतन अत्यधिक व्यक्तिपरक और निराशावादी प्रतीत होता है क्योंकि उसमें चिंता, अकेलापन और संघर्ष को प्रमुख स्थान दिया गया है। इसके विपरीत उनके समर्थकों का तर्क है कि सार्त्र का उद्देश्य निराशा फैलाना नहीं, बल्कि व्यक्ति को उसकी वास्तविक शक्ति और नैतिक जिम्मेदारी का बोध कराना था।

एम. एन. राय का जन्म 1887 में बंगाल में हुआ। उनका मूल नाम नरेंद्रनाथ भट्टाचार्य था। वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, अंतरराष्ट्रीय साम्यवादी आंदोलन तथा आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतन के प्रमुख विचारकों में से एक थे। प्रारंभिक जीवन में वे क्रांतिकारी राष्ट्रवादी आंदोलन से जुड़े, बाद में साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित हुए और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय रहे। समय के साथ उन्होंने साम्यवाद की सीमाओं का अनुभव किया तथा अंततः उग्र मानवतावाद का प्रतिपादन किया। उनका विचार था कि न तो पूँजीवाद और न ही परंपरागत साम्यवाद मानव स्वतंत्रता और गरिमा की पूर्ण रक्षा कर सके हैं। इसलिए मानव केंद्रित, विवेकपूर्ण और लोकतांत्रिक विचारधारा की आवश्यकता है।

उग्र मानवतावाद का मूल आधार यह है कि मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है। मानव जीवन का संचालन किसी अलौकिक शक्ति या पूर्वनिर्धारित नियति द्वारा नहीं, बल्कि मानव बुद्धि, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नैतिक विवेक द्वारा होना चाहिए। राय ने तर्क दिया कि समाज और राज्य का उद्देश्य किसी विशेष वर्ग, जाति, धर्म अथवा राष्ट्र के हितों की रक्षा करना नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तित्व के विकास को सुनिश्चित करना होना चाहिए।

राय ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण को मानव प्रगति का आधार माना। उनके अनुसार अंधविश्वास, रूढ़िवादिता और अवैज्ञानिक मान्यताएँ समाज के विकास में बाधक होती हैं। उन्होंने शिक्षा, तर्क, अनुसंधान तथा स्वतंत्र चिंतन को आधुनिक समाज की आवश्यक शर्तें माना। उनका विश्वास था कि वैज्ञानिक चेतना केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक जीवन में भी उसका समावेश होना चाहिए।

उग्र मानवतावाद में स्वतंत्रता का विशेष महत्व है। राय के अनुसार स्वतंत्रता केवल राजनीतिक अधिकारों तक सीमित नहीं है। वास्तविक स्वतंत्रता तभी संभव है जब व्यक्ति बौद्धिक रूप से स्वतंत्र हो, नैतिक रूप से स्वायत्त हो और आर्थिक रूप से सम्मानजनक जीवन जीने में सक्षम हो। इसलिए उन्होंने ऐसी सामाजिक व्यवस्था का समर्थन किया जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा, रोजगार, विचार-अभिव्यक्ति तथा राजनीतिक भागीदारी के समान अवसर प्राप्त हों।

राय ने लोकतंत्र की नई व्याख्या प्रस्तुत की। उनका मत था कि लोकतंत्र केवल चुनावों और प्रतिनिधिक संस्थाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए। वास्तविक लोकतंत्र तभी संभव है जब नागरिक निरंतर राजनीतिक प्रक्रिया में सक्रिय भाग लें, स्थानीय संस्थाएँ सशक्त हों और सत्ता का विकेंद्रीकरण किया जाए। उन्होंने दलगत राजनीति की कुछ सीमाओं की ओर भी संकेत किया और नागरिक-आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था पर बल दिया। उनके अनुसार राजनीतिक शक्ति का उद्देश्य जनता पर शासन करना नहीं, बल्कि जनता को निर्णय-प्रक्रिया में सहभागी बनाना होना चाहिए।

राय ने नैतिकता को भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया। उनका विश्वास था कि नैतिकता का आधार किसी धार्मिक आदेश में नहीं, बल्कि मानव विवेक, सह-अस्तित्व और सामाजिक उत्तरदायित्व में निहित है। उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि मनुष्य अपने विवेक के आधार पर सही और गलत का निर्णय करने में सक्षम है। इसलिए नैतिक जीवन के लिए धार्मिक कट्टरता की अपेक्षा वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मानवीय संवेदनशीलता अधिक आवश्यक है।

अर्थव्यवस्था के संबंध में राय ने अत्यधिक केंद्रीकरण का विरोध किया। उनका मत था कि आर्थिक व्यवस्था का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा करना भी होना चाहिए। उन्होंने आर्थिक न्याय, सामाजिक उत्तरदायित्व तथा मानवीय विकास के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया। वे ऐसी व्यवस्था के समर्थक थे जिसमें आर्थिक विकास और व्यक्तिगत स्वतंत्रता दोनों का समन्वय हो।

सार्त्र और एम. एन. राय के विचारों में अनेक समानताएँ हैं। दोनों ने व्यक्ति को सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था का केंद्र माना। दोनों ने स्वतंत्रता को सर्वोच्च मानवीय मूल्य स्वीकार किया तथा यह स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा हुआ है। दोनों ने रूढ़िवादिता, अंधानुकरण और अधिनायकवाद का विरोध किया। दोनों का विश्वास था कि मनुष्य अपने विवेक और निर्णयों के आधार पर अपने जीवन तथा समाज को बेहतर बना सकता है। दोनों ने नैतिकता को बाहरी आदेशों की अपेक्षा मानव चेतना और उत्तरदायित्व से जोड़कर देखा।

इसके साथ ही दोनों के विचारों में महत्वपूर्ण अंतर भी हैं। सार्त्र का चिंतन मुख्यतः दार्शनिक और अस्तित्वगत प्रश्नों पर केंद्रित है। वे व्यक्ति की चेतना, स्वतंत्रता, चिंता और आत्मनिर्माण पर बल देते हैं। इसके विपरीत एम. एन. राय का चिंतन राजनीतिक, सामाजिक और संस्थागत प्रश्नों से अधिक जुड़ा हुआ है। उन्होंने लोकतंत्र, शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, विकेंद्रीकरण और मानवाधिकारों को उग्र मानवतावाद के व्यावहारिक आधार के रूप में प्रस्तुत किया। सार्त्र व्यक्तिगत अनुभव से सामाजिक उत्तरदायित्व की ओर बढ़ते हैं, जबकि राय सामाजिक संस्थाओं के सुधार के माध्यम से व्यक्ति की स्वतंत्रता को सुदृढ़ करने का प्रयास करते हैं।

आधुनिक राजनीतिक दर्शन, मानवाधिकार, लोकतंत्र, शिक्षा, नैतिक दर्शन तथा सामाजिक आंदोलनों पर इन दोनों विचारकों का गहरा प्रभाव पड़ा है। व्यक्तिगत गरिमा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मानवाधिकारों की रक्षा, नागरिक उत्तरदायित्व, लोकतांत्रिक भागीदारी तथा वैज्ञानिक चेतना जैसे विषयों पर होने वाले समकालीन विमर्श में उनके विचार आज भी अत्यंत प्रासंगिक माने जाते हैं। विशेष रूप से ऐसे समय में जब विश्व के अनेक समाज पहचान, स्वतंत्रता, असमानता, धार्मिक कट्टरता, तकनीकी परिवर्तन तथा लोकतांत्रिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, तब सार्त्र का उत्तरदायित्वपूर्ण स्वतंत्रता का सिद्धांत और एम. एन. राय का विवेक-आधारित मानवतावाद नई दृष्टि प्रदान करते हैं।

इन दोनों विचारधाराओं की आलोचना भी हुई है। कुछ आलोचकों का मत है कि अस्तित्ववाद सामाजिक और आर्थिक संरचनाओं की तुलना में व्यक्ति की भूमिका पर अधिक बल देता है, जबकि उग्र मानवतावाद पर यह आरोप लगाया गया कि वह मानव विवेक की शक्ति पर अत्यधिक विश्वास करता है और सामाजिक संघर्षों की जटिलताओं को अपेक्षाकृत कम महत्व देता है। फिर भी इन आलोचनाओं के बावजूद दोनों विचारधाराओं का स्थायी महत्व बना हुआ है क्योंकि वे मनुष्य को निष्क्रिय प्राणी नहीं, बल्कि सक्रिय, विवेकशील और उत्तरदायी सत्ता के रूप में स्वीकार करती हैं।

समग्र रूप से जाँ-पॉल सार्त्र का अस्तित्ववाद और एम. एन. राय का उग्र मानवतावाद आधुनिक राजनीतिक एवं दार्शनिक चिंतन की दो ऐसी महत्वपूर्ण धाराएँ हैं जिन्होंने मानव स्वतंत्रता, नैतिक उत्तरदायित्व और विवेकपूर्ण जीवन को सर्वोच्च मूल्य के रूप में स्थापित किया। सार्त्र ने यह प्रतिपादित किया कि मनुष्य अपने निर्णयों द्वारा स्वयं अपना निर्माण करता है और इसलिए उसे अपने प्रत्येक कर्म की जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए। एम. एन. राय ने यह स्पष्ट किया कि मानव समाज का वास्तविक विकास तभी संभव है जब राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संस्थाओं का केंद्र मनुष्य की गरिमा, वैज्ञानिक चेतना, लोकतांत्रिक सहभागिता और नैतिक विवेक हो। इन दोनों विचारकों के योगदान ने आधुनिक राजनीतिक दर्शन को अधिक मानवीय, अधिक उत्तरदायी और अधिक लोकतांत्रिक दिशा प्रदान की। आज भी स्वतंत्रता, मानवाधिकार, सामाजिक न्याय, लोकतंत्र, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा नैतिक उत्तरदायित्व पर होने वाले प्रत्येक गंभीर विमर्श में उनके विचार महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में उपस्थित रहते हैं।

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