Introduction to Political Science
राजनीति विज्ञान का परिचय
Course Code POL 001F Paper -01.
What is Politics? (राजनीति क्या है?)
राजनीति मानव समाज के संगठन, संचालन और विकास से जुड़ी एक अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक एवं राजनीतिक प्रक्रिया है। मानव एक सामाजिक प्राणी है और वह अकेले जीवन नहीं जी सकता। समाज में रहते हुए व्यक्तियों के बीच सहयोग, प्रतिस्पर्धा, अधिकार, कर्तव्य, संसाधनों का उपयोग, निर्णय लेने की प्रक्रिया तथा विभिन्न प्रकार के मतभेद स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होते हैं। इन सभी परिस्थितियों को व्यवस्थित करने तथा समाज में शांति, न्याय, सुरक्षा और विकास सुनिश्चित करने के लिए जिस व्यवस्था और प्रक्रिया का निर्माण होता है, उसे राजनीति कहा जाता है। इसलिए राजनीति केवल सरकार बनाने या चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज के समग्र जीवन को प्रभावित करने वाली एक व्यापक और निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।
राजनीति का मूल उद्देश्य समाज में ऐसी व्यवस्था स्थापित करना है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपने अधिकारों का संरक्षण प्राप्त हो, अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने का अवसर मिले तथा सभी नागरिक समान रूप से कानून के अधीन जीवन व्यतीत कर सकें। राजनीति राज्य, सरकार, प्रशासन, कानून, न्याय, सार्वजनिक नीति, नागरिक अधिकार, कर्तव्य, राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास तथा सामाजिक कल्याण जैसे अनेक विषयों को अपने अंतर्गत समाहित करती है। इसी कारण राजनीति का अध्ययन केवल सत्ता प्राप्ति के साधनों का अध्ययन नहीं है, बल्कि यह समाज और राज्य के बीच संबंधों को समझने का भी माध्यम है।
प्राचीन काल में राजनीति का अर्थ मुख्यतः राज्य के शासन और प्रशासन से लगाया जाता था। उस समय यह माना जाता था कि राजनीति का कार्य राज्य का संचालन करना, कानून बनाना तथा समाज में व्यवस्था बनाए रखना है। समय के साथ समाज अधिक जटिल होता गया, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन हुए तथा लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का विकास हुआ। परिणामस्वरूप राजनीति की अवधारणा भी विस्तृत होती गई। आधुनिक युग में राजनीति का संबंध केवल सरकार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज के प्रत्येक ऐसे क्षेत्र तक पहुँच गया जहाँ निर्णय लिए जाते हैं, संसाधनों का वितरण होता है, अधिकारों का निर्धारण किया जाता है तथा विभिन्न हितों के बीच संतुलन स्थापित किया जाता है।
राजनीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष शक्ति से जुड़ा हुआ है। प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में निर्णय लेने और उन्हें लागू करने के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है। सरकार कानून बनाती है, प्रशासन उन्हें लागू करता है और न्यायपालिका उनके पालन की निगरानी करती है। इन सभी कार्यों के पीछे शक्ति का आधार होता है। किंतु राजनीति केवल शक्ति प्राप्त करने का माध्यम नहीं है। यदि शक्ति का उपयोग जनहित, न्याय, समानता और विकास के लिए किया जाए तो वह लोकतंत्र को मजबूत बनाती है, जबकि शक्ति का दुरुपयोग समाज में अन्याय, असमानता और असंतोष को जन्म देता है। इसलिए राजनीति में शक्ति के साथ उत्तरदायित्व, नैतिकता और पारदर्शिता का भी समान महत्व है।
राजनीति का संबंध सार्वजनिक जीवन से भी है। समाज में अनेक ऐसे विषय होते हैं जिनका प्रभाव केवल किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पूरे समाज पर पड़ता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, रोजगार, कृषि, उद्योग, परिवहन, राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास जैसे विषय सार्वजनिक महत्व के होते हैं। इन विषयों पर सरकार द्वारा बनाई गई नीतियाँ और लिए गए निर्णय राजनीति का हिस्सा होते हैं। इसलिए राजनीति को सार्वजनिक मामलों के संचालन की प्रक्रिया भी कहा जाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार का दायित्व केवल शासन करना नहीं, बल्कि नागरिकों की आवश्यकताओं को समझकर उनके हित में प्रभावी नीतियाँ बनाना भी होता है।
राजनीति का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष सहमति और समझौते से संबंधित है। किसी भी समाज में सभी व्यक्तियों के विचार, आवश्यकताएँ और हित समान नहीं होते। विभिन्न राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन, आर्थिक वर्ग और सांस्कृतिक समूह अपने-अपने हितों की रक्षा करना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में यदि केवल संघर्ष और प्रतिस्पर्धा को महत्व दिया जाए तो समाज में अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है। इसलिए राजनीति संवाद, विचार-विमर्श, सहिष्णुता, समझौते और सहमति के माध्यम से विभिन्न हितों के बीच संतुलन स्थापित करने का कार्य करती है। लोकतंत्र की सफलता इसी बात पर निर्भर करती है कि समाज के विभिन्न वर्ग आपसी मतभेदों का समाधान संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीकों से करें।
राजनीति का संबंध नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों से भी अत्यंत गहरा है। प्रत्येक नागरिक को संविधान द्वारा कुछ अधिकार प्रदान किए जाते हैं, जैसे समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शिक्षा का अधिकार तथा न्याय प्राप्त करने का अधिकार। इन अधिकारों की रक्षा करना राज्य और सरकार का दायित्व होता है। इसके साथ ही नागरिकों का भी कर्तव्य होता है कि वे कानून का पालन करें, राष्ट्रीय एकता बनाए रखें, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में भाग लें तथा सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करें। राजनीति इन अधिकारों और कर्तव्यों के बीच संतुलन स्थापित करने का माध्यम बनती है।
लोकतंत्र में राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण आधार जनता की भागीदारी है। जनता चुनावों के माध्यम से अपने प्रतिनिधियों का चयन करती है और उन्हें शासन की जिम्मेदारी सौंपती है। यदि सरकार जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप कार्य नहीं करती, तो अगले चुनाव में जनता उसे बदल सकती है। इस प्रकार लोकतांत्रिक राजनीति जनता की इच्छा और जनमत पर आधारित होती है। चुनाव, राजनीतिक दल, संसद, विधानमंडल, न्यायपालिका, स्वतंत्र मीडिया तथा नागरिक समाज लोकतांत्रिक राजनीति के प्रमुख आधार हैं। ये सभी संस्थाएँ मिलकर शासन को उत्तरदायी, पारदर्शी और जनहितकारी बनाने का कार्य करती हैं।
आधुनिक युग में राजनीति का क्षेत्र राष्ट्रीय सीमाओं से आगे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँच चुका है। आज जलवायु परिवर्तन, वैश्विक व्यापार, मानवाधिकार, आतंकवाद, प्रवासन, ऊर्जा सुरक्षा, महामारी नियंत्रण तथा तकनीकी विकास जैसे अनेक विषय ऐसे हैं जिनका समाधान केवल एक देश अकेले नहीं कर सकता। इसलिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग, कूटनीति और वैश्विक संस्थाओं की भूमिका भी आधुनिक राजनीति का महत्वपूर्ण भाग बन चुकी है। इस प्रकार राजनीति आज स्थानीय प्रशासन से लेकर वैश्विक शासन तक विस्तृत हो चुकी है।
राजनीति का प्रभाव प्रत्येक नागरिक के दैनिक जीवन पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से पड़ता है। सरकार द्वारा बनाई गई शिक्षा नीति विद्यार्थियों को प्रभावित करती है, आर्थिक नीति व्यापार और उद्योग को प्रभावित करती है, कृषि नीति किसानों के जीवन को प्रभावित करती है, श्रम नीति मजदूरों की स्थिति को प्रभावित करती है तथा स्वास्थ्य नीति प्रत्येक नागरिक के जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करती है। इसलिए राजनीति केवल नेताओं और सरकारों तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक के जीवन का अभिन्न अंग है।
राजनीति का अध्ययन विद्यार्थियों में विश्लेषणात्मक दृष्टि, तार्किक चिंतन और लोकतांत्रिक चेतना का विकास करता है। इसके माध्यम से वे शासन प्रणाली, संविधान, नागरिक अधिकारों, प्रशासनिक संस्थाओं, सार्वजनिक नीतियों तथा सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रियाओं को समझते हैं। राजनीति का ज्ञान व्यक्ति को केवल एक अच्छा विद्यार्थी ही नहीं, बल्कि एक जागरूक, जिम्मेदार और सक्रिय नागरिक भी बनाता है। एक ऐसा नागरिक जो अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को भी समझता है और समाज तथा राष्ट्र के विकास में सकारात्मक योगदान देता है।
यद्यपि राजनीति का उद्देश्य जनकल्याण और सामाजिक विकास है, फिर भी व्यवहार में अनेक चुनौतियाँ सामने आती हैं। भ्रष्टाचार, सत्ता का दुरुपयोग, जातीय एवं धार्मिक ध्रुवीकरण, आर्थिक असमानता, हिंसा, राजनीतिक अस्थिरता, गलत सूचना का प्रसार तथा स्वार्थपरक नेतृत्व जैसी समस्याएँ राजनीति की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए स्वस्थ राजनीति के लिए पारदर्शिता, जवाबदेही, संवैधानिक मूल्यों का सम्मान, स्वतंत्र न्यायपालिका, निष्पक्ष चुनाव, सक्रिय नागरिक समाज और जागरूक नागरिकों की आवश्यकता होती है। जब राजनीति नैतिकता, जनसेवा और उत्तरदायित्व के सिद्धांतों पर आधारित होती है, तभी लोकतंत्र मजबूत होता है और राष्ट्र निरंतर प्रगति करता है।
अंततः राजनीति को मानव समाज के संगठन, शासन, निर्णय-निर्माण, शक्ति के संतुलित उपयोग, सार्वजनिक हित की रक्षा तथा सामाजिक विकास की व्यापक प्रक्रिया के रूप में समझा जाना चाहिए। यह केवल सत्ता प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि समाज में न्याय, समानता, स्वतंत्रता, शांति और विकास की स्थापना का माध्यम है। राजनीति का वास्तविक उद्देश्य नागरिकों के जीवन को अधिक सुरक्षित, सम्मानपूर्ण और समृद्ध बनाना है। इसी कारण राजनीति का अध्ययन प्रत्येक विद्यार्थी, नागरिक और समाज के लिए अत्यंत आवश्यक माना जाता है, क्योंकि इसके माध्यम से ही एक उत्तरदायी शासन, सशक्त लोकतंत्र और प्रगतिशील राष्ट्र का निर्माण संभव होता है।
Defining Politics. (राजनीति की परिभाषा)
राजनीति की परिभाषा को समझना राजनीति विज्ञान के अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण आधार माना जाता है, क्योंकि राजनीति एक ऐसा विषय है जिसका संबंध केवल सरकार, चुनाव या सत्ता से नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सामाजिक जीवन, राज्य व्यवस्था, सार्वजनिक निर्णयों, नागरिकों के अधिकारों, कर्तव्यों तथा जनकल्याण से होता है। राजनीति मानव समाज के संगठन और संचालन की वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से राज्य अपने नागरिकों के लिए नियम, कानून और नीतियाँ बनाता है तथा समाज में शांति, न्याय, सुरक्षा और विकास की व्यवस्था स्थापित करता है। सरल शब्दों में कहा जाए तो राजनीति वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा समाज में यह निर्धारित किया जाता है कि सार्वजनिक निर्णय कौन लेगा, किस प्रकार लेगा और उनका लाभ समाज के विभिन्न वर्गों तक किस प्रकार पहुँचेगा। इसी कारण राजनीति को केवल शासन की व्यवस्था न मानकर सार्वजनिक जीवन के संचालन की व्यापक प्रक्रिया माना जाता है।
राजनीति शब्द का अर्थ समय के साथ निरंतर विकसित हुआ है। प्राचीन समय में राजनीति को मुख्यतः राज्य के शासन और प्रशासन तक सीमित माना जाता था। उस समय यह विश्वास था कि राजनीति का उद्देश्य राज्य का सुचारु संचालन, न्याय की स्थापना तथा नागरिकों के जीवन को सुरक्षित बनाना है। आधुनिक युग में राजनीति की अवधारणा अधिक व्यापक हो गई है। आज राजनीति का संबंध केवल राज्य और सरकार से नहीं, बल्कि उन सभी संस्थाओं, प्रक्रियाओं और गतिविधियों से है जो समाज के सार्वजनिक जीवन को प्रभावित करती हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, महिला सशक्तिकरण, श्रमिक कल्याण, अंतरराष्ट्रीय संबंध तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी जैसे विषय भी राजनीति के अध्ययन का अभिन्न भाग बन चुके हैं।
राजनीति की परिभाषा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह समाज में शक्ति और अधिकार के वितरण को स्पष्ट करती है। प्रत्येक समाज में कुछ संस्थाओं और व्यक्तियों को निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त होता है। सरकार कानून बनाती है, प्रशासन उन्हें लागू करता है और न्यायपालिका उनके पालन की निगरानी करती है। इन सभी कार्यों का उद्देश्य समाज में व्यवस्था बनाए रखना और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना होता है। राजनीति इस संपूर्ण प्रक्रिया का अध्ययन करती है कि शक्ति किसके पास है, उसका उपयोग किस प्रकार किया जाता है और उसके प्रयोग से समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है। इसी कारण राजनीति को शक्ति, अधिकार और उत्तरदायित्व के संतुलित प्रयोग का विज्ञान भी कहा जाता है।
राजनीति की परिभाषा केवल सत्ता प्राप्त करने तक सीमित नहीं है। यदि राजनीति को केवल सत्ता का साधन मान लिया जाए तो उसका वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। वास्तव में राजनीति का प्रमुख उद्देश्य सार्वजनिक हित की रक्षा करना, समाज में समान अवसर उपलब्ध कराना, न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित करना तथा नागरिकों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाना है। सरकार द्वारा बनाई गई शिक्षा नीति, स्वास्थ्य नीति, कृषि नीति, औद्योगिक नीति, रोजगार योजनाएँ तथा सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम राजनीति के ही परिणाम होते हैं। इस प्रकार राजनीति समाज के प्रत्येक व्यक्ति के दैनिक जीवन को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है।
राजनीति की परिभाषा का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष सार्वजनिक मामलों से जुड़ा हुआ है। समाज में अनेक ऐसे विषय होते हैं जिनका प्रभाव केवल किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पूरे समुदाय पर पड़ता है। उदाहरण के लिए सड़क निर्माण, जल संरक्षण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता, राष्ट्रीय सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग ऐसे विषय हैं जिन पर सामूहिक निर्णय लिए जाते हैं। इन विषयों से संबंधित निर्णयों का निर्माण और क्रियान्वयन राजनीति का ही भाग है। इसलिए राजनीति को सार्वजनिक मामलों के प्रबंधन और संचालन की प्रक्रिया भी कहा जाता है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीति की परिभाषा और भी व्यापक हो जाती है। लोकतंत्र में सत्ता का वास्तविक स्रोत जनता होती है। जनता चुनाव के माध्यम से अपने प्रतिनिधियों का चयन करती है और उन्हें शासन की जिम्मेदारी सौंपती है। यदि सरकार जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप कार्य नहीं करती, तो जनता अगले चुनाव में उसे बदल सकती है। इस प्रकार लोकतांत्रिक राजनीति जनता की भागीदारी, उत्तरदायित्व और पारदर्शिता पर आधारित होती है। चुनाव, राजनीतिक दल, संसद, न्यायपालिका, स्वतंत्र मीडिया तथा नागरिक समाज लोकतांत्रिक राजनीति के महत्वपूर्ण आधार हैं। ये सभी संस्थाएँ मिलकर शासन को जनहितकारी और उत्तरदायी बनाती हैं।
राजनीति की परिभाषा को समझने के लिए यह भी आवश्यक है कि समाज में मतभेदों और विविधताओं की भूमिका को समझा जाए। प्रत्येक समाज में विभिन्न धर्म, भाषाएँ, संस्कृतियाँ, आर्थिक वर्ग तथा सामाजिक समूह होते हैं। इनके हित और अपेक्षाएँ अलग-अलग हो सकती हैं। राजनीति इन विभिन्न हितों के बीच संतुलन स्थापित करने का कार्य करती है। विचार-विमर्श, संवाद, समझौता, सहमति तथा संवैधानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से ऐसे निर्णय लिए जाते हैं जो समाज के अधिकतम लोगों के हित में हों। इसलिए राजनीति केवल संघर्ष की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि सहयोग और समन्वय की प्रक्रिया भी है।
राजनीति की परिभाषा में नैतिकता का भी महत्वपूर्ण स्थान है। एक आदर्श राजनीतिक व्यवस्था वही मानी जाती है जिसमें शासन ईमानदारी, न्याय, समानता और उत्तरदायित्व के सिद्धांतों पर आधारित हो। यदि राजनीति से नैतिकता समाप्त हो जाए तो भ्रष्टाचार, पक्षपात, शक्ति का दुरुपयोग तथा सामाजिक असमानता जैसी समस्याएँ उत्पन्न होने लगती हैं। इसलिए आधुनिक राजनीति विज्ञान में सुशासन, पारदर्शिता, उत्तरदायित्व, मानवाधिकार और विधि के शासन को राजनीति की मूल विशेषताएँ माना जाता है।
आधुनिक युग में राजनीति का स्वरूप वैश्विक भी हो गया है। आज कोई भी देश पूरी तरह अलग-थलग रहकर विकास नहीं कर सकता। जलवायु परिवर्तन, वैश्विक व्यापार, आतंकवाद, महामारी, ऊर्जा संकट, साइबर सुरक्षा तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे विषय राष्ट्रीय सीमाओं से परे हैं। इसलिए आधुनिक राजनीति की परिभाषा में अंतरराष्ट्रीय संगठनों, वैश्विक संस्थाओं तथा विभिन्न देशों के पारस्परिक संबंधों को भी शामिल किया जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि राजनीति का क्षेत्र निरंतर विस्तृत होता जा रहा है और उसका प्रभाव विश्व स्तर तक पहुँच चुका है।
राजनीति की परिभाषा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य नागरिकों में राजनीतिक चेतना और उत्तरदायित्व का विकास करना भी है। एक जागरूक नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों को समझता है, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में भाग लेता है, कानून का सम्मान करता है तथा सार्वजनिक हित के विषयों में अपनी सकारात्मक भूमिका निभाता है। राजनीति का अध्ययन व्यक्ति को केवल शासन की जानकारी नहीं देता, बल्कि उसे सामाजिक उत्तरदायित्व, संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक आदर्शों के प्रति भी जागरूक बनाता है। इसी कारण राजनीति विज्ञान का अध्ययन केवल विद्यार्थियों के लिए ही नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के लिए उपयोगी माना जाता है।
यद्यपि राजनीति का मूल उद्देश्य समाज का कल्याण है, फिर भी व्यवहार में अनेक चुनौतियाँ सामने आती हैं। भ्रष्टाचार, सत्ता का दुरुपयोग, जातिवाद, सांप्रदायिकता, आर्थिक असमानता, राजनीतिक हिंसा, दुष्प्रचार तथा स्वार्थपरक नेतृत्व राजनीति की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं। इन समस्याओं का समाधान केवल प्रभावी कानूनों से ही नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों, उत्तरदायी नेतृत्व, स्वतंत्र न्यायपालिका, निष्पक्ष चुनाव और मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से संभव है। जब राजनीति जनसेवा, न्याय और उत्तरदायित्व के सिद्धांतों पर आधारित होती है, तभी लोकतंत्र मजबूत बनता है और राष्ट्र निरंतर प्रगति करता है।
अंततः राजनीति की परिभाषा को केवल एक वाक्य में सीमित नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह एक बहुआयामी और गतिशील अवधारणा है। राजनीति राज्य, सरकार, शक्ति, कानून, सार्वजनिक नीति, नागरिक अधिकार, कर्तव्य, जनभागीदारी, सामाजिक न्याय, आर्थिक विकास और नैतिक उत्तरदायित्व जैसे अनेक तत्वों का समन्वित रूप है। इसका वास्तविक उद्देश्य समाज में ऐसी व्यवस्था स्थापित करना है जिसमें प्रत्येक नागरिक को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर मिले, न्याय की रक्षा हो, सार्वजनिक संसाधनों का उचित उपयोग हो और राष्ट्र का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित किया जा सके। इसलिए राजनीति की परिभाषा केवल शासन की व्याख्या नहीं है, बल्कि मानव समाज के संगठित, उत्तरदायी और कल्याणकारी जीवन की व्यापक व्याख्या है।
Politics as the art of Government. (शासन संचालन की कला के रूप में राजनीति)
सरकार चलाने की कला के रूप में राजनीति राजनीति की सबसे प्राचीन और पारंपरिक अवधारणाओं में से एक है। इस दृष्टिकोण के अनुसार राजनीति का मुख्य उद्देश्य राज्य का संचालन करना, शासन व्यवस्था को सुचारु बनाए रखना तथा समाज में शांति, सुरक्षा, न्याय और व्यवस्था की स्थापना करना है। इस विचार में राजनीति को केवल सत्ता प्राप्त करने की प्रक्रिया नहीं माना जाता, बल्कि शासन संचालन की एक ऐसी व्यावहारिक कला माना जाता है जिसके माध्यम से राज्य अपने नागरिकों के हितों की रक्षा करता है और सार्वजनिक जीवन को व्यवस्थित रूप से संचालित करता है। जिस प्रकार किसी कलाकार को अपनी कला में दक्षता, अनुभव और विवेक की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार एक सफल शासक या सरकार को भी शासन संचालन के लिए बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता, निर्णय क्षमता और प्रशासनिक कौशल की आवश्यकता होती है। इसलिए राजनीति को सरकार चलाने की कला कहा गया है।
इस अवधारणा की जड़ें प्राचीन राजनीतिक चिंतन में मिलती हैं। प्रारंभिक समय में राज्य को समाज का सर्वोच्च संगठन माना जाता था और यह विश्वास किया जाता था कि नागरिकों का सुख, सुरक्षा और विकास एक अच्छी सरकार पर निर्भर करता है। इसलिए राजनीति का अध्ययन मुख्य रूप से इस प्रश्न के इर्द-गिर्द विकसित हुआ कि राज्य का शासन किस प्रकार चलाया जाए, कानून कैसे बनाए जाएँ, न्याय किस प्रकार स्थापित किया जाए और जनता के हितों की रक्षा कैसे की जाए। इस दृष्टिकोण में राजनीति का मूल केंद्र सरकार और उसका प्रशासन होता है। सरकार राज्य की कार्यकारी संस्था है जो कानूनों को लागू करती है, प्रशासन का संचालन करती है, सार्वजनिक नीतियों का निर्माण करती है तथा राष्ट्रीय संसाधनों का प्रबंधन करती है। यदि सरकार अपने दायित्वों का उचित निर्वहन करती है, तो समाज में स्थिरता और विकास बना रहता है।
सरकार चलाने की कला के रूप में राजनीति का अर्थ केवल शासन करना नहीं है, बल्कि शासन को प्रभावी, न्यायपूर्ण और उत्तरदायी बनाना भी है। किसी भी सरकार के सामने अनेक प्रकार की चुनौतियाँ होती हैं, जैसे कानून-व्यवस्था बनाए रखना, आर्थिक विकास को गति देना, शिक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्था करना, रोजगार के अवसर बढ़ाना, सामाजिक न्याय स्थापित करना तथा राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना। इन सभी कार्यों के लिए केवल शक्ति पर्याप्त नहीं होती, बल्कि उचित योजना, प्रशासनिक दक्षता, नैतिक नेतृत्व और दूरदर्शी नीति निर्माण की आवश्यकता होती है। इसलिए इस अवधारणा में राजनीति को एक ऐसी कला माना गया है जिसमें ज्ञान, अनुभव और व्यवहारिक बुद्धिमत्ता का समन्वय आवश्यक है।
इस दृष्टिकोण के अनुसार सरकार का सबसे महत्वपूर्ण दायित्व नागरिकों के जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति की रक्षा करना है। यदि किसी राज्य में कानूनों का प्रभावी ढंग से पालन नहीं होता, अपराध बढ़ जाते हैं, प्रशासन निष्क्रिय हो जाता है अथवा सरकार जनहित की उपेक्षा करने लगती है, तो राजनीतिक व्यवस्था कमजोर हो जाती है। इसलिए एक सफल सरकार वही मानी जाती है जो निष्पक्ष प्रशासन स्थापित करे, न्याय प्रणाली को सुदृढ़ बनाए, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण रखे तथा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करे। राजनीति की सफलता इसी बात से मापी जाती है कि सरकार अपने नागरिकों के जीवन को कितना सुरक्षित, सम्मानजनक और समृद्ध बना पाती है।
सरकार चलाने की कला के रूप में राजनीति प्रशासनिक संगठन को भी अत्यधिक महत्व देती है। किसी भी शासन व्यवस्था की सफलता उसके प्रशासन की दक्षता पर निर्भर करती है। यदि सरकारी विभागों में समन्वय, अनुशासन और उत्तरदायित्व होगा, तभी सरकार अपनी योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू कर सकेगी। प्रशासन केवल आदेश देने का माध्यम नहीं है, बल्कि जनता और सरकार के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु भी है। इसलिए राजनीति में प्रशासनिक क्षमता, पारदर्शिता, जवाबदेही और कार्यकुशलता को अत्यंत आवश्यक माना जाता है।
इस अवधारणा में कानून का विशेष महत्व है। सरकार का प्रत्येक कार्य संविधान और कानून के अनुरूप होना चाहिए। कानून समाज में समानता, न्याय और अनुशासन स्थापित करने का प्रमुख साधन है। यदि सरकार कानून से ऊपर कार्य करने लगे या अपने अधिकारों का दुरुपयोग करे, तो शासन व्यवस्था में असंतुलन उत्पन्न हो सकता है। इसलिए राजनीति का उद्देश्य केवल शासन करना नहीं, बल्कि विधि के शासन की स्थापना करना भी है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार स्वयं भी संविधान और कानून के अधीन रहती है, जिससे नागरिकों के अधिकार सुरक्षित रहते हैं।
सरकार चलाने की कला के रूप में राजनीति में नेतृत्व की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। एक कुशल नेता केवल आदेश देने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह समाज की आवश्यकताओं को समझने वाला, जनता की समस्याओं को सुनने वाला और भविष्य की चुनौतियों का पूर्वानुमान लगाने वाला दूरदर्शी व्यक्तित्व होता है। प्रभावी नेतृत्व सरकार को सही दिशा प्रदान करता है और कठिन परिस्थितियों में भी उचित निर्णय लेने की क्षमता विकसित करता है। संकट की स्थिति, जैसे प्राकृतिक आपदा, महामारी, आर्थिक मंदी या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी समस्याओं में सरकार की सफलता उसके नेतृत्व की गुणवत्ता पर निर्भर करती है।
आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस अवधारणा का स्वरूप पहले की तुलना में अधिक व्यापक हो गया है। अब सरकार का कार्य केवल कर वसूलना और कानून लागू करना नहीं रह गया है। आज सरकार से अपेक्षा की जाती है कि वह शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान, तकनीकी विकास, पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण, सामाजिक सुरक्षा, रोजगार, डिजिटल सेवाओं तथा सतत विकास जैसे क्षेत्रों में भी सक्रिय भूमिका निभाए। इसलिए सरकार चलाने की कला का अर्थ आज एक जनकल्याणकारी, उत्तरदायी और सहभागी शासन स्थापित करना है, जिसमें नागरिकों की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
लोकतांत्रिक राजनीति में जनता की भागीदारी भी सरकार चलाने की कला का महत्वपूर्ण अंग है। लोकतंत्र में सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है और जनता के प्रति उत्तरदायी होती है। इसलिए सरकार को अपनी नीतियों और निर्णयों में पारदर्शिता बनाए रखनी चाहिए तथा नागरिकों की राय और सुझावों का सम्मान करना चाहिए। चुनाव, संसद, न्यायपालिका, स्वतंत्र मीडिया और नागरिक समाज जैसी संस्थाएँ सरकार को उत्तरदायी बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इस प्रकार आधुनिक राजनीति में सरकार चलाने की कला केवल शासकों की क्षमता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकार और जनता के बीच सहयोग, विश्वास और संवाद पर भी आधारित है।
इस अवधारणा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि सरकार को शक्ति का प्रयोग विवेकपूर्ण ढंग से करना चाहिए। शक्ति का उद्देश्य जनता पर प्रभुत्व स्थापित करना नहीं, बल्कि जनहित की रक्षा करना है। यदि सरकार शक्ति का प्रयोग संविधान, कानून और नैतिक मूल्यों के अनुरूप करती है, तो शासन व्यवस्था मजबूत होती है और नागरिकों का विश्वास बढ़ता है। इसके विपरीत यदि शक्ति का उपयोग व्यक्तिगत लाभ, राजनीतिक प्रतिशोध या दमन के लिए किया जाए, तो लोकतांत्रिक मूल्यों को क्षति पहुँचती है और शासन की वैधता कमजोर हो जाती है। इसलिए राजनीति में शक्ति और उत्तरदायित्व दोनों का संतुलन आवश्यक है।
यद्यपि सरकार चलाने की कला के रूप में राजनीति की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है, फिर भी इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं। यह दृष्टिकोण राजनीति को मुख्यतः सरकार और शासन तक सीमित कर देता है, जबकि आधुनिक राजनीति का क्षेत्र इससे कहीं अधिक व्यापक है। आज राजनीति का संबंध सामाजिक आंदोलनों, नागरिक संगठनों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, आर्थिक नीतियों, मीडिया, जनमत तथा वैश्विक सहयोग से भी है। इसके अतिरिक्त यह अवधारणा कई बार राजनीति के संघर्ष, प्रतिस्पर्धा, सहमति और जनभागीदारी जैसे पक्षों को अपेक्षाकृत कम महत्व देती है। इसलिए आधुनिक राजनीति विज्ञान में इसे राजनीति की एक महत्वपूर्ण, किंतु पूर्ण नहीं, अवधारणा माना जाता है।
वर्तमान समय में सुशासन की अवधारणा ने सरकार चलाने की कला को और अधिक प्रासंगिक बना दिया है। सुशासन का अर्थ है कि सरकार पारदर्शी, उत्तरदायी, प्रभावी, न्यायपूर्ण और जनहितकारी हो। ई-गवर्नेंस, डिजिटल प्रशासन, नागरिक सेवाओं का सरलीकरण, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण, सूचना का अधिकार तथा सहभागी शासन जैसी व्यवस्थाएँ इसी विचार को मजबूत करती हैं कि सरकार का वास्तविक उद्देश्य नागरिकों की सेवा करना है। एक सफल सरकार वही है जो सीमित संसाधनों का उचित उपयोग करते हुए अधिकतम जनकल्याण सुनिश्चित कर सके।
अंततः कहा जा सकता है कि सरकार चलाने की कला के रूप में राजनीति राजनीति की एक ऐसी पारंपरिक और व्यावहारिक अवधारणा है जो शासन की गुणवत्ता, प्रशासनिक दक्षता, न्यायपूर्ण कानून, उत्तरदायी नेतृत्व और जनकल्याणकारी नीतियों पर विशेष बल देती है। यह हमें यह समझाती है कि राजनीति का वास्तविक उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि उस सत्ता का विवेकपूर्ण, न्यायपूर्ण और उत्तरदायित्वपूर्ण उपयोग करके समाज में शांति, व्यवस्था, सुरक्षा, समानता और विकास स्थापित करना है। जब सरकार संविधान, नैतिक मूल्यों और जनहित को आधार बनाकर शासन करती है, तब राजनीति अपने सर्वोच्च उद्देश्य को प्राप्त करती है और राष्ट्र के सर्वांगीण विकास का सशक्त माध्यम बनती है।
Politics as public affairs. (लोक-कार्यों के रूप में राजनीति)
लोक-कार्यों के रूप में राजनीति की अवधारणा आधुनिक राजनीति विज्ञान की सबसे महत्वपूर्ण और व्यापक अवधारणाओं में से एक मानी जाती है। इस दृष्टिकोण के अनुसार राजनीति का संबंध केवल राज्य, सरकार या सत्ता प्राप्त करने की प्रक्रिया से नहीं है, बल्कि उन सभी सार्वजनिक कार्यों, नीतियों, निर्णयों और व्यवस्थाओं से है जिनका प्रभाव समाज के प्रत्येक नागरिक पर पड़ता है। इस विचारधारा में राजनीति को जनहित की सेवा करने वाली एक सतत सामाजिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है, जिसका उद्देश्य समाज की सामूहिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना, सार्वजनिक समस्याओं का समाधान करना तथा नागरिकों के जीवन को अधिक सुरक्षित, न्यायपूर्ण और समृद्ध बनाना है। इसलिए राजनीति का वास्तविक स्वरूप केवल शासन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह समाज के प्रत्येक ऐसे क्षेत्र में उपस्थित होती है जहाँ सार्वजनिक हित से जुड़े निर्णय लिए जाते हैं।
इस अवधारणा के अनुसार समाज में अनेक ऐसे विषय होते हैं जिनका प्रभाव केवल किसी एक व्यक्ति या परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनका संबंध पूरे समाज से होता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ पेयजल, सड़क निर्माण, विद्युत व्यवस्था, पर्यावरण संरक्षण, कृषि विकास, रोजगार सृजन, सार्वजनिक परिवहन, सामाजिक सुरक्षा, महिला एवं बाल कल्याण, वृद्धजन सहायता, राष्ट्रीय सुरक्षा तथा आर्थिक विकास जैसे विषय सार्वजनिक जीवन का हिस्सा हैं। इन विषयों पर जो निर्णय सरकार, स्थानीय प्रशासन अथवा अन्य सार्वजनिक संस्थाएँ लेती हैं, वे सभी राजनीति के दायरे में आते हैं। इस प्रकार राजनीति का मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक जीवन का सुचारु संचालन करना और समाज की सामूहिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना है।
लोक-कार्यों के रूप में राजनीति की अवधारणा यह स्पष्ट करती है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार का वास्तविक दायित्व केवल शासन करना नहीं, बल्कि जनता की आवश्यकताओं को समझना और उनके समाधान के लिए प्रभावी नीतियाँ बनाना है। सरकार द्वारा तैयार की गई प्रत्येक सार्वजनिक नीति का उद्देश्य समाज के अधिकतम लोगों को लाभ पहुँचाना होना चाहिए। यदि शिक्षा नीति बनाई जाती है तो उसका लक्ष्य प्रत्येक नागरिक तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुँचाना होता है। यदि स्वास्थ्य नीति बनाई जाती है तो उसका उद्देश्य सभी लोगों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध कराना होता है। इसी प्रकार आर्थिक नीतियों का उद्देश्य रोजगार के अवसर बढ़ाना, गरीबी कम करना तथा राष्ट्रीय आय में वृद्धि करना होता है। इस प्रकार राजनीति का केंद्र बिंदु सार्वजनिक हित बन जाता है।
इस विचारधारा में राजनीति को समाज और सरकार के बीच एक सक्रिय संवाद की प्रक्रिया माना गया है। सरकार केवल आदेश देने वाली संस्था नहीं होती, बल्कि वह जनता की इच्छाओं, आवश्यकताओं और अपेक्षाओं को समझकर उनके अनुरूप कार्य करने वाली संस्था होती है। लोकतंत्र में नागरिक मतदान, जनमत, सामाजिक संगठनों, मीडिया, जनसुनवाई तथा अन्य संवैधानिक माध्यमों के द्वारा सरकार तक अपनी बात पहुँचाते हैं। सरकार इन सुझावों, आवश्यकताओं और समस्याओं का अध्ययन करके नीतियाँ बनाती है। इस प्रकार राजनीति जनता और सरकार के बीच निरंतर चलने वाली सहभागिता की प्रक्रिया बन जाती है।
लोक-कार्यों के रूप में राजनीति की अवधारणा सामाजिक न्याय पर भी विशेष बल देती है। समाज के सभी वर्ग आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से समान स्थिति में नहीं होते। कुछ वर्ग अपेक्षाकृत अधिक सुविधासंपन्न होते हैं, जबकि कुछ वर्ग विकास की मुख्यधारा से पीछे रह जाते हैं। ऐसी स्थिति में सरकार का दायित्व केवल समान कानून बनाना नहीं, बल्कि ऐसी नीतियाँ तैयार करना भी होता है जो कमजोर और वंचित वर्गों को आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करें। छात्रवृत्ति योजनाएँ, सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम, ग्रामीण विकास योजनाएँ, महिला सशक्तिकरण, अनुसूचित जाति एवं जनजाति कल्याण योजनाएँ तथा दिव्यांगजन सहायता कार्यक्रम इसी दृष्टिकोण का परिणाम हैं। इससे स्पष्ट होता है कि राजनीति केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक समानता स्थापित करने का माध्यम भी है।
इस अवधारणा में सार्वजनिक संसाधनों के उचित उपयोग का भी अत्यधिक महत्व है। प्राकृतिक संसाधन, सरकारी धन, सार्वजनिक संपत्ति तथा राष्ट्रीय संस्थाएँ सम्पूर्ण समाज की धरोहर होती हैं। इसलिए राजनीति का कार्य केवल इन संसाधनों का नियंत्रण करना नहीं, बल्कि उनका न्यायपूर्ण और पारदर्शी उपयोग सुनिश्चित करना भी है। यदि सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग निष्पक्षता और उत्तरदायित्व के साथ किया जाए, तो समाज में विकास की गति बढ़ती है और नागरिकों का जीवन स्तर ऊँचा होता है। इसके विपरीत यदि संसाधनों का दुरुपयोग हो, तो भ्रष्टाचार, असमानता और सामाजिक असंतोष जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए राजनीति में उत्तरदायित्व और पारदर्शिता को अत्यंत आवश्यक माना गया है।
लोक-कार्यों के रूप में राजनीति की अवधारणा लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के साथ गहराई से जुड़ी हुई है। लोकतंत्र में सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है और जनता के प्रति उत्तरदायी होती है। इसलिए प्रत्येक सार्वजनिक निर्णय का उद्देश्य जनहित होना चाहिए। चुनाव केवल सरकार बनाने का माध्यम नहीं है, बल्कि जनता द्वारा सरकार के कार्यों का मूल्यांकन करने का भी अवसर है। यदि सरकार सार्वजनिक हित में कार्य करती है, तो जनता उसे पुनः शासन करने का अवसर देती है। यदि सरकार अपने दायित्वों का उचित निर्वहन नहीं करती, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से उसे बदला जा सकता है। यही लोकतांत्रिक राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता है।
आधुनिक समय में लोक-कार्यों के रूप में राजनीति का क्षेत्र पहले की तुलना में कहीं अधिक विस्तृत हो गया है। आज सरकार को केवल प्रशासन चलाने तक सीमित नहीं माना जाता। सूचना प्रौद्योगिकी, डिजिटल सेवाएँ, ई-गवर्नेंस, जलवायु परिवर्तन, साइबर सुरक्षा, जैव विविधता संरक्षण, ऊर्जा प्रबंधन, शहरी विकास, ग्रामीण पुनर्निर्माण तथा वैश्विक सहयोग जैसे विषय भी सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण भाग बन चुके हैं। इन सभी क्षेत्रों में प्रभावी नीतियाँ बनाना और उन्हें सफलतापूर्वक लागू करना आधुनिक राजनीति की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। इससे स्पष्ट होता है कि राजनीति निरंतर बदलती हुई सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार स्वयं को विकसित करती रहती है।
इस अवधारणा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि राजनीति केवल सरकार का कार्य नहीं है। नागरिक, सामाजिक संगठन, स्वयंसेवी संस्थाएँ, मीडिया, शिक्षण संस्थान, न्यायपालिका तथा स्थानीय स्वशासन संस्थाएँ भी सार्वजनिक जीवन के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जब समाज के विभिन्न वर्ग मिलकर सार्वजनिक समस्याओं के समाधान में योगदान देते हैं, तभी लोकतंत्र अधिक सशक्त और उत्तरदायी बनता है। इसलिए राजनीति को सामूहिक उत्तरदायित्व की प्रक्रिया भी माना जाता है।
यद्यपि यह अवधारणा राजनीति के जनकल्याणकारी स्वरूप को स्पष्ट करती है, फिर भी इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं। यह दृष्टिकोण राजनीति के शक्ति संघर्ष, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और वैचारिक मतभेदों जैसे पक्षों को अपेक्षाकृत कम महत्व देता है। व्यवहार में कई बार सार्वजनिक हित की परिभाषा सभी लोगों के लिए समान नहीं होती, क्योंकि विभिन्न सामाजिक समूहों की आवश्यकताएँ और प्राथमिकताएँ अलग-अलग हो सकती हैं। अनेक बार सरकार को ऐसे निर्णय लेने पड़ते हैं जिनसे कुछ वर्ग संतुष्ट होते हैं और कुछ असंतुष्ट। इसलिए सार्वजनिक हित का निर्धारण एक जटिल और निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। इसके बावजूद यह अवधारणा आधुनिक लोकतंत्र को समझने का अत्यंत प्रभावी आधार प्रदान करती है।
वर्तमान समय में सुशासन की अवधारणा ने लोक-कार्यों के रूप में राजनीति को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। आज किसी सरकार की सफलता केवल उसके अधिकारों या शक्ति से नहीं मापी जाती, बल्कि इस आधार पर आँकी जाती है कि उसने नागरिकों के जीवन में कितना सकारात्मक परिवर्तन किया है। यदि सरकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ, सुरक्षित वातावरण, रोजगार के अवसर, सामाजिक न्याय, पारदर्शी प्रशासन तथा उत्तरदायी शासन उपलब्ध कराती है, तो उसे सफल और जनहितकारी सरकार माना जाता है। यही राजनीति का वास्तविक उद्देश्य भी है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि लोक-कार्यों के रूप में राजनीति राजनीति की एक ऐसी व्यापक और आधुनिक अवधारणा है जो राजनीति को केवल सत्ता प्राप्त करने की प्रक्रिया नहीं मानती, बल्कि उसे समाज के सामूहिक जीवन के संगठन, सार्वजनिक हित की रक्षा, जनकल्याण, सामाजिक न्याय, उत्तरदायी शासन तथा लोकतांत्रिक सहभागिता का प्रभावी माध्यम मानती है। इस दृष्टिकोण में राजनीति का सर्वोच्च उद्देश्य प्रत्येक नागरिक के जीवन को अधिक सुरक्षित, सम्मानजनक, न्यायपूर्ण और समृद्ध बनाना है। जब राजनीति का संचालन सार्वजनिक हित, नैतिक मूल्यों, संवैधानिक सिद्धांतों और जनभागीदारी के आधार पर किया जाता है, तभी वह अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करती है और समाज तथा राष्ट्र के सर्वांगीण विकास का सशक्त साधन बनती है।
Politic as compromise and consensus. (समझौता एवं सहमति के रूप में राजनीति)
समझौता एवं सहमति के रूप में राजनीति की अवधारणा आधुनिक राजनीति विज्ञान की अत्यंत महत्वपूर्ण और लोकतांत्रिक अवधारणाओं में से एक है। इस दृष्टिकोण के अनुसार राजनीति का वास्तविक उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना या शासन करना नहीं है, बल्कि समाज में विद्यमान विभिन्न विचारों, हितों, आवश्यकताओं और मतभेदों के बीच संतुलन स्थापित करना है। प्रत्येक समाज विविधताओं से परिपूर्ण होता है। लोगों की सामाजिक स्थिति, आर्थिक आवश्यकताएँ, धार्मिक मान्यताएँ, सांस्कृतिक परंपराएँ, राजनीतिक विचारधाराएँ तथा व्यक्तिगत अपेक्षाएँ अलग-अलग होती हैं। इन विविधताओं के कारण मतभेद उत्पन्न होना स्वाभाविक है। यदि इन मतभेदों का समाधान शांतिपूर्ण ढंग से न किया जाए तो समाज में संघर्ष, अस्थिरता और अव्यवस्था उत्पन्न हो सकती है। इसलिए राजनीति को ऐसी प्रक्रिया माना गया है जिसके माध्यम से संवाद, विचार-विमर्श, समझौते और सहमति के आधार पर सार्वजनिक निर्णय लिए जाते हैं।
इस अवधारणा में समझौते का अर्थ किसी पक्ष की पूर्ण पराजय या दूसरे पक्ष की पूर्ण विजय नहीं है, बल्कि ऐसा संतुलित समाधान है जिसमें सभी पक्ष अपनी कुछ अपेक्षाओं में लचीलापन दिखाकर सामूहिक हित को प्राथमिकता देते हैं। समझौता लोकतांत्रिक जीवन की एक व्यावहारिक आवश्यकता है, क्योंकि किसी भी समाज में सभी व्यक्तियों की इच्छाओं को पूर्ण रूप से पूरा करना संभव नहीं होता। जब विभिन्न समूह अपने मतभेदों को बातचीत और सहयोग के माध्यम से सुलझाते हैं, तब समाज में स्थिरता और विश्वास का वातावरण निर्मित होता है। इसलिए समझौता कमजोरी का नहीं, बल्कि परिपक्व लोकतांत्रिक सोच का प्रतीक माना जाता है।
सहमति का अर्थ यह नहीं है कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति हर विषय पर समान विचार रखता हो। सहमति का वास्तविक अर्थ यह है कि व्यापक चर्चा और विचार-विमर्श के बाद अधिकांश लोग किसी निर्णय को स्वीकार करने के लिए तैयार हो जाएँ। लोकतंत्र में अनेक निर्णय ऐसे होते हैं जिनमें सभी लोग पूरी तरह संतुष्ट नहीं होते, फिर भी वे सामूहिक हित और संवैधानिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए उस निर्णय को स्वीकार करते हैं। यही लोकतांत्रिक सहमति का आधार है। इस प्रकार सहमति समाज में राजनीतिक स्थिरता, विश्वास और सहयोग की भावना को विकसित करती है।
समझौता एवं सहमति के रूप में राजनीति की अवधारणा यह मानती है कि लोकतंत्र केवल बहुमत का शासन नहीं है, बल्कि विभिन्न विचारों और हितों का सम्मान करते हुए सामूहिक निर्णय लेने की प्रक्रिया है। यदि केवल बहुमत के आधार पर निर्णय लिए जाएँ और अल्पसंख्यकों की भावनाओं एवं आवश्यकताओं की उपेक्षा की जाए, तो लोकतंत्र की मूल भावना कमजोर हो सकती है। इसलिए राजनीति का दायित्व यह है कि वह बहुमत और अल्पमत दोनों के बीच संतुलन बनाए तथा सभी नागरिकों को अपनी बात रखने का समान अवसर प्रदान करे। इस प्रकार राजनीति समाज में संवाद और सहभागिता की संस्कृति को विकसित करती है।
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में संसद, विधानसभाएँ, स्थानीय स्वशासन संस्थाएँ, संसदीय समितियाँ तथा विभिन्न संवैधानिक संस्थाएँ इसी सिद्धांत पर कार्य करती हैं। किसी विधेयक, नीति या योजना को लागू करने से पहले उस पर व्यापक चर्चा की जाती है, विभिन्न पक्षों के सुझाव लिए जाते हैं और आवश्यक संशोधन किए जाते हैं। अनेक बार राजनीतिक दलों के बीच मतभेद होते हैं, फिर भी राष्ट्रीय हित के विषयों पर वे सहमति बनाने का प्रयास करते हैं। यही प्रक्रिया लोकतांत्रिक राजनीति की सफलता का आधार बनती है। इस प्रकार राजनीति केवल विरोध और प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र नहीं है, बल्कि सहयोग और समन्वय का भी क्षेत्र है।
यह अवधारणा सार्वजनिक नीति निर्माण में भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सरकार जब शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, पर्यावरण, सामाजिक सुरक्षा या आर्थिक विकास से संबंधित नीतियाँ बनाती है, तब उसे समाज के विभिन्न वर्गों की आवश्यकताओं और अपेक्षाओं का ध्यान रखना पड़ता है। यदि सरकार केवल किसी एक वर्ग के हितों को प्राथमिकता दे, तो सामाजिक असंतोष उत्पन्न हो सकता है। इसलिए प्रभावी सार्वजनिक नीति वही मानी जाती है जो व्यापक विचार-विमर्श, विशेषज्ञों की सलाह तथा नागरिकों की भागीदारी के आधार पर तैयार की गई हो। इस प्रकार समझौता और सहमति सार्वजनिक नीतियों को अधिक संतुलित, व्यावहारिक और स्वीकार्य बनाते हैं।
इस दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक विविधता का सम्मान करना भी है। भारत जैसे बहुभाषी, बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश में विभिन्न समुदायों की आवश्यकताएँ और जीवन-शैली अलग-अलग हैं। ऐसी स्थिति में राजनीति का कार्य किसी एक विचार या संस्कृति को दूसरों पर थोपना नहीं, बल्कि सभी वर्गों को साथ लेकर चलना है। लोकतंत्र की सफलता इसी में है कि विभिन्न विचारधाराओं और सामाजिक समूहों के बीच सहयोग की भावना विकसित हो तथा राष्ट्रीय एकता को बनाए रखते हुए विविधताओं का सम्मान किया जाए। इसलिए समझौता एवं सहमति की राजनीति राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया को भी मजबूत बनाती है।
इस अवधारणा में राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। एक सफल नेता वही माना जाता है जो विभिन्न मतों को सुनने की क्षमता रखता हो, संवाद को प्रोत्साहित करता हो, मतभेदों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझा सके तथा सार्वजनिक हित को व्यक्तिगत या दलगत हित से ऊपर रखे। ऐसा नेतृत्व समाज में विश्वास उत्पन्न करता है और लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिक प्रभावी बनाता है। इसके विपरीत यदि राजनीतिक नेतृत्व केवल टकराव, कटुता और विभाजन की राजनीति को बढ़ावा दे, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर हो सकती है।
आधुनिक वैश्विक परिदृश्य में भी समझौता और सहमति का महत्व निरंतर बढ़ता जा रहा है। आज अनेक समस्याएँ ऐसी हैं जिनका समाधान केवल एक देश अकेले नहीं कर सकता। जलवायु परिवर्तन, वैश्विक महामारी, आतंकवाद, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासन तथा पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों पर विभिन्न देशों को आपसी सहयोग और सहमति के आधार पर कार्य करना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भूमिका भी इसी सिद्धांत पर आधारित है कि संवाद और समझौते के माध्यम से वैश्विक समस्याओं का समाधान खोजा जाए। इससे स्पष्ट होता है कि यह अवधारणा केवल राष्ट्रीय राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भी समान रूप से प्रासंगिक है।
यद्यपि समझौता एवं सहमति के रूप में राजनीति लोकतांत्रिक जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी है, फिर भी इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं। प्रत्येक विषय पर सहमति बनाना संभव नहीं होता। कई बार वैचारिक मतभेद इतने गहरे होते हैं कि सभी पक्ष किसी एक निर्णय पर सहमत नहीं हो पाते। कभी-कभी अत्यधिक समझौते की प्रवृत्ति आवश्यक सुधारों को धीमा कर देती है। कुछ परिस्थितियों में प्रभावशाली समूह अपने हितों को सुरक्षित रखने के लिए समझौते की प्रक्रिया को प्रभावित भी कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय सुरक्षा, प्राकृतिक आपदा या आपातकाल जैसी परिस्थितियों में त्वरित निर्णय लेने की आवश्यकता होती है, जहाँ लंबी चर्चा और सहमति की प्रक्रिया संभव नहीं होती। इसलिए व्यवहार में समझौता और सहमति के साथ-साथ प्रभावी नेतृत्व और समयोचित निर्णय क्षमता भी आवश्यक होती है।
आधुनिक लोकतांत्रिक शासन में सुशासन की अवधारणा ने इस विचार को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। आज सरकारों से अपेक्षा की जाती है कि वे पारदर्शी हों, जनता के प्रति उत्तरदायी हों, सभी वर्गों को साथ लेकर चलें तथा सार्वजनिक निर्णयों में अधिकाधिक जनभागीदारी सुनिश्चित करें। ई-गवर्नेंस, जनसुनवाई, सामाजिक अंकेक्षण, नीति निर्माण में नागरिकों की भागीदारी तथा विभिन्न हितधारकों से परामर्श जैसी व्यवस्थाएँ इसी सोच को मजबूत करती हैं कि लोकतंत्र केवल शासन की प्रणाली नहीं, बल्कि सहमति और सहयोग पर आधारित सार्वजनिक जीवन की व्यवस्था है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि समझौता एवं सहमति के रूप में राजनीति राजनीति की एक लोकतांत्रिक, मानवीय और व्यावहारिक अवधारणा है, जो यह मानती है कि समाज की स्थिरता, प्रगति और एकता केवल शक्ति या संघर्ष से नहीं, बल्कि संवाद, सहयोग, सहिष्णुता, सहभागिता और पारस्परिक सम्मान से सुनिश्चित होती है। राजनीति का वास्तविक उद्देश्य विभिन्न विचारों और हितों के बीच ऐसा संतुलन स्थापित करना है जिससे सार्वजनिक कल्याण, सामाजिक न्याय, राष्ट्रीय एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा हो सके। जब राजनीति इस भावना के साथ संचालित होती है, तब वह केवल शासन की प्रक्रिया नहीं रहती, बल्कि समाज में विश्वास, सहयोग और सामूहिक विकास का सशक्त माध्यम बन जाती है।
Politics as power. (शक्ति के रूप में राजनीति)
शक्ति के रूप में राजनीति की अवधारणा आधुनिक राजनीति विज्ञान की सबसे प्रभावशाली और व्यापक अवधारणाओं में से एक मानी जाती है। इस दृष्टिकोण के अनुसार राजनीति का मूल आधार शक्ति है और राजनीतिक जीवन की अधिकांश गतिविधियाँ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शक्ति के अर्जन, संरक्षण, वितरण तथा प्रयोग से जुड़ी होती हैं। समाज में जहाँ कहीं भी यह निर्धारित किया जाता है कि निर्णय कौन लेगा, संसाधनों का उपयोग किस प्रकार होगा, नियम कौन बनाएगा और उनका पालन कौन कराएगा, वहाँ शक्ति की भूमिका अवश्य होती है। इसी कारण इस विचारधारा में राजनीति को शक्ति की प्रक्रिया के रूप में समझा जाता है। यह अवधारणा इस बात पर विशेष बल देती है कि राजनीति केवल सरकार, संसद, चुनाव या प्रशासन तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक ऐसे क्षेत्र में उपस्थित होती है जहाँ प्रभाव, नियंत्रण, नेतृत्व अथवा निर्णय लेने की क्षमता का प्रश्न उठता है।
शक्ति का सामान्य अर्थ किसी व्यक्ति, समूह, संस्था या राज्य की उस क्षमता से है जिसके माध्यम से वह दूसरों के व्यवहार, विचार, निर्णय अथवा कार्यों को प्रभावित कर सके। राजनीतिक जीवन में शक्ति का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि राज्य को कानून बनाने, उन्हें लागू करने, न्याय स्थापित करने, नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए अधिकार और शक्ति दोनों की आवश्यकता होती है। यदि शासन व्यवस्था के पास वैध शक्ति न हो तो वह अपने निर्णयों को प्रभावी रूप से लागू नहीं कर सकती। इसलिए राजनीति और शक्ति का संबंध अत्यंत निकट माना जाता है। यहाँ शक्ति का उद्देश्य केवल नियंत्रण स्थापित करना नहीं होता, बल्कि समाज में व्यवस्था, सुरक्षा और सामूहिक जीवन की निरंतरता बनाए रखना भी होता है।
शक्ति के रूप में राजनीति की अवधारणा यह भी स्पष्ट करती है कि समाज में विभिन्न व्यक्ति, संगठन, राजनीतिक दल, आर्थिक वर्ग तथा सामाजिक समूह अपने-अपने हितों की रक्षा और उन्नति के लिए निरंतर प्रयास करते रहते हैं। प्रत्येक समूह चाहता है कि उसकी आवश्यकताओं और विचारों को सार्वजनिक नीतियों में स्थान मिले। इसी कारण विभिन्न समूहों के बीच प्रभाव स्थापित करने और निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करने की प्रतिस्पर्धा चलती रहती है। यही प्रतिस्पर्धा राजनीति को गतिशील बनाती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह संघर्ष चुनाव, सार्वजनिक बहस, जनमत, संसद तथा संवैधानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से संचालित होता है, जबकि अलोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में शक्ति सीमित व्यक्तियों या संस्थाओं के हाथों में केंद्रित हो सकती है।
इस अवधारणा के अनुसार शक्ति का स्वरूप केवल प्रत्यक्ष नहीं होता। कई बार शक्ति बिना बल प्रयोग के भी कार्य करती है। कोई सरकार अपनी नीतियों, कानूनों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के माध्यम से नागरिकों के जीवन को प्रभावित करती है। न्यायपालिका अपने निर्णयों द्वारा शासन को नियंत्रित करती है। मीडिया जनमत का निर्माण करके राजनीतिक निर्णयों पर प्रभाव डालता है। विश्वविद्यालय, सामाजिक संगठन, धार्मिक संस्थाएँ तथा नागरिक समूह भी विचारों और मूल्यों के माध्यम से समाज को प्रभावित करते हैं। इस प्रकार शक्ति अनेक रूपों में कार्य करती है और राजनीति इन सभी रूपों के अध्ययन का विषय बन जाती है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में शक्ति का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत जनता मानी जाती है। नागरिक अपने मताधिकार के माध्यम से प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं और उन्हें शासन की वैध शक्ति प्रदान करते हैं। इस प्रकार सरकार की शक्ति जनता की स्वीकृति पर आधारित होती है। लोकतंत्र में शक्ति स्थायी नहीं होती, बल्कि समय-समय पर जनता के निर्णय के अनुसार बदलती रहती है। यही कारण है कि चुनाव, जनमत, राजनीतिक दल और नागरिक भागीदारी लोकतांत्रिक राजनीति के अनिवार्य अंग माने जाते हैं। इस व्यवस्था में शक्ति के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा होता है। सरकार को अपने प्रत्येक निर्णय के लिए जनता के प्रति जवाबदेह रहना पड़ता है और संविधान उसकी शक्तियों की सीमाएँ निर्धारित करता है।
शक्ति के रूप में राजनीति का संबंध केवल सरकार के अधिकारों से नहीं, बल्कि सार्वजनिक संसाधनों के वितरण से भी है। किसी भी समाज में भूमि, जल, खनिज, आर्थिक संसाधन, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार तथा विकास योजनाओं का वितरण समान रूप से नहीं होता। राजनीति यह निर्धारित करती है कि इन संसाधनों का उपयोग किस प्रकार किया जाएगा और किन क्षेत्रों या वर्गों को प्राथमिकता दी जाएगी। यदि शक्ति का प्रयोग न्यायपूर्ण और संतुलित ढंग से किया जाए तो समाज में समान अवसर और समावेशी विकास संभव होता है। इसके विपरीत यदि शक्ति का उपयोग केवल सीमित समूहों के हित में किया जाए तो सामाजिक असमानता, असंतोष और संघर्ष उत्पन्न हो सकते हैं। इसलिए शक्ति का नैतिक और उत्तरदायित्वपूर्ण प्रयोग लोकतांत्रिक शासन की मूल आवश्यकता माना जाता है।
इस अवधारणा में संविधान और कानून का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। लोकतांत्रिक राजनीति में शक्ति का प्रयोग मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता। संविधान सरकार की शक्तियों को परिभाषित करता है तथा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है। विधायिका कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है और न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि शक्ति का प्रयोग संविधान के अनुरूप हो। इस प्रकार शक्ति पर नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था लोकतंत्र को स्थिर और उत्तरदायी बनाती है। यदि शक्ति पर कोई नियंत्रण न हो तो निरंकुशता, भ्रष्टाचार और अधिकारों के दुरुपयोग की संभावना बढ़ जाती है।
राजनीतिक नेतृत्व भी शक्ति की अवधारणा से गहराई से जुड़ा हुआ है। एक प्रभावी नेता केवल अधिकार प्राप्त करने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह समाज को दिशा देने, लोगों को प्रेरित करने, संकट की स्थिति में उचित निर्णय लेने तथा सार्वजनिक विश्वास बनाए रखने की क्षमता रखता है। नेतृत्व का वास्तविक मूल्य शक्ति के विवेकपूर्ण उपयोग में निहित होता है। जब नेतृत्व जनहित, नैतिकता और संवैधानिक मूल्यों को प्राथमिकता देता है, तब शक्ति समाज के विकास का माध्यम बनती है। इसके विपरीत यदि नेतृत्व व्यक्तिगत लाभ, दमन या पक्षपात के लिए शक्ति का उपयोग करे, तो लोकतांत्रिक संस्थाएँ कमजोर होने लगती हैं।
आधुनिक समय में शक्ति का स्वरूप पहले की तुलना में अधिक जटिल और व्यापक हो गया है। आज केवल सैन्य या प्रशासनिक शक्ति ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि आर्थिक शक्ति, तकनीकी शक्ति, सूचना शक्ति, वैचारिक शक्ति और सांस्कृतिक प्रभाव भी राजनीति को गहराई से प्रभावित करते हैं। डिजिटल संचार, सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, वैश्विक व्यापार, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएँ तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भी राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित करने लगी हैं। इससे स्पष्ट होता है कि आधुनिक राजनीति में शक्ति का अध्ययन केवल राज्य तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर उसका प्रभाव दिखाई देता है।
शक्ति के रूप में राजनीति की अवधारणा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि समाज में परिवर्तन लाने के लिए शक्ति आवश्यक होती है। सामाजिक सुधार, आर्थिक परिवर्तन, शिक्षा का विस्तार, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण तथा सामाजिक न्याय जैसे उद्देश्यों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सरकार को वैध शक्ति का प्रयोग करना पड़ता है। यदि शासन के पास आवश्यक अधिकार और प्रशासनिक क्षमता न हो, तो कल्याणकारी योजनाएँ केवल कागज़ों तक सीमित रह सकती हैं। इसलिए शक्ति को केवल नियंत्रण का साधन न मानकर परिवर्तन और विकास का माध्यम भी समझा जाता है।
यद्यपि यह अवधारणा राजनीति की वास्तविक प्रकृति को समझने में अत्यंत उपयोगी है, फिर भी इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं। यदि राजनीति को केवल शक्ति तक सीमित कर दिया जाए, तो जनसेवा, नैतिकता, सहयोग, सहमति, सार्वजनिक कल्याण और लोकतांत्रिक मूल्यों जैसे महत्वपूर्ण पक्षों की उपेक्षा हो सकती है। राजनीति का उद्देश्य केवल शक्ति प्राप्त करना नहीं है, बल्कि उस शक्ति का उपयोग समाज के व्यापक हित में करना भी है। इसलिए आधुनिक राजनीति विज्ञान शक्ति के साथ-साथ उत्तरदायित्व, पारदर्शिता, जनभागीदारी, विधि का शासन तथा मानवाधिकारों को भी समान महत्व देता है।
वर्तमान लोकतांत्रिक युग में सुशासन की अवधारणा ने शक्ति के महत्व को नई दिशा प्रदान की है। अब किसी सरकार की सफलता केवल इस आधार पर नहीं आँकी जाती कि उसके पास कितनी शक्ति है, बल्कि इस आधार पर भी देखी जाती है कि उसने उस शक्ति का उपयोग किस प्रकार किया है। यदि शक्ति का प्रयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण, आर्थिक विकास तथा नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए किया जाता है, तो वह लोकतंत्र को मजबूत बनाती है। यदि उसका उपयोग दमन, भेदभाव या निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए किया जाए, तो राजनीतिक व्यवस्था कमजोर हो जाती है और जनता का विश्वास कम होने लगता है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि शक्ति के रूप में राजनीति राजनीति की एक अत्यंत प्रभावशाली आधुनिक अवधारणा है, जो यह स्पष्ट करती है कि सार्वजनिक जीवन में निर्णय लेने, संसाधनों के वितरण, शासन के संचालन और सामाजिक परिवर्तन के पीछे शक्ति की केंद्रीय भूमिका होती है। किंतु शक्ति का वास्तविक महत्व तभी है जब उसका प्रयोग संविधान, कानून, नैतिक मूल्यों और जनहित के अनुरूप किया जाए। राजनीति का सर्वोच्च उद्देश्य केवल शक्ति प्राप्त करना नहीं, बल्कि उस शक्ति के माध्यम से न्यायपूर्ण, उत्तरदायी, लोकतांत्रिक और कल्याणकारी समाज की स्थापना करना है। जब शक्ति जनसेवा, समानता, स्वतंत्रता और सामाजिक विकास का माध्यम बनती है, तभी राजनीति अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करती है और राष्ट्र की प्रगति का आधार बनती है।
