Unit – 2

Indian Council Act 1909 (Morley-Minto Reforms), Montague-Chelmsford Report and
the Government of India Act 1919.

भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 (मॉर्ले–मिंटो सुधार), मॉन्टेग्यू–चेम्सफोर्ड प्रतिवेदन (रिपोर्ट) तथा भारत शासन अधिनियम, 1919।

भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 (मॉर्ले–मिंटो सुधार), मॉन्टेग्यू–चेम्सफोर्ड प्रतिवेदन तथा भारत शासन अधिनियम, 1919

उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारत में राष्ट्रीय चेतना तीव्र गति से विकसित होने लगी। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में शिक्षित भारतीय शासन में अधिक भागीदारी, उत्तरदायी सरकार और राजनीतिक अधिकारों की मांग कर रहे थे। दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार भारतीय असंतोष को नियंत्रित करते हुए अपने शासन को बनाए रखना चाहती थी। इसी पृष्ठभूमि में 1909 का भारतीय परिषद अधिनियम, 1918 का मॉन्टेग्यू–चेम्सफोर्ड प्रतिवेदन तथा 1919 का भारत शासन अधिनियम अस्तित्व में आए। इन तीनों घटनाओं ने भारतीय संवैधानिक विकास को नई दिशा प्रदान की।

भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 (मॉर्ले–मिंटो सुधार)

भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 को मॉर्ले–मिंटो सुधार कहा जाता है क्योंकि उस समय ब्रिटेन के भारत सचिव जॉन मॉर्ले तथा भारत के वायसराय लॉर्ड मिंटो थे। इस अधिनियम का उद्देश्य भारतीयों को सीमित राजनीतिक अधिकार देकर बढ़ते राष्ट्रीय आंदोलन को नियंत्रित करना तथा ब्रिटिश शासन के प्रति सहयोग बनाए रखना था।

इस अधिनियम के अंतर्गत केंद्रीय और प्रांतीय विधायी परिषदों का विस्तार किया गया तथा परिषदों में भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई। परिषदों के सदस्यों को बजट पर चर्चा करने, प्रश्न पूछने तथा सार्वजनिक विषयों पर सीमित विचार व्यक्त करने का अधिकार दिया गया। इससे विधायी परिषदें पहले की अपेक्षा अधिक सक्रिय हुईं।

इस अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली (Separate Electorate) की स्थापना थी। इसके अनुसार मुस्लिम मतदाता केवल मुस्लिम उम्मीदवारों को ही चुन सकते थे। ब्रिटिश सरकार का उद्देश्य विभिन्न समुदायों के बीच राजनीतिक विभाजन उत्पन्न करके अपने शासन को सुरक्षित रखना था। आगे चलकर यही व्यवस्था सांप्रदायिक राजनीति के विस्तार का प्रमुख कारण बनी।

एक अन्य महत्वपूर्ण परिवर्तन यह था कि पहली बार एक भारतीय को वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में स्थान दिया गया। इससे भारतीयों की उच्च प्रशासनिक स्तर पर सीमित भागीदारी प्रारम्भ हुई।

यद्यपि इस अधिनियम ने भारतीयों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाई, लेकिन वास्तविक सत्ता ब्रिटिश सरकार के हाथों में ही रही। परिषदों के अधिकार सीमित थे और वे कार्यपालिका को उत्तरदायी नहीं बना सकती थीं। इसलिए भारतीय राष्ट्रीय नेताओं ने इसे अपर्याप्त सुधार माना।

मॉन्टेग्यू–चेम्सफोर्ड प्रतिवेदन (1918)

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत ने ब्रिटिश सरकार को व्यापक सहयोग दिया। इसके बाद भारतीयों ने आशा व्यक्त की कि उन्हें शासन में अधिक अधिकार दिए जाएंगे। इसी पृष्ठभूमि में 1917 में भारत सचिव एडविन मॉन्टेग्यू ने घोषणा की कि भारत में क्रमिक रूप से उत्तरदायी शासन स्थापित किया जाएगा। इस घोषणा के आधार पर मॉन्टेग्यू और भारत के वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड ने भारत की प्रशासनिक व्यवस्था का अध्ययन कर 1918 में एक विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत किया, जिसे मॉन्टेग्यू–चेम्सफोर्ड रिपोर्ट कहा जाता है।

इस प्रतिवेदन में सुझाव दिया गया कि प्रांतों में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाई जाए, प्रशासनिक शक्तियों का विकेंद्रीकरण किया जाए तथा उत्तरदायी शासन की दिशा में धीरे-धीरे प्रगति की जाए। रिपोर्ट में प्रांतीय स्तर पर द्वैध शासन (Dyarchy) लागू करने की सिफारिश की गई। इसके अनुसार कुछ विभाग निर्वाचित भारतीय मंत्रियों को तथा महत्वपूर्ण विभाग गवर्नर के नियंत्रण में रखने का प्रस्ताव था।

रिपोर्ट में केंद्रीय और प्रांतीय विधायी परिषदों का विस्तार, मताधिकार में वृद्धि, लोक सेवा व्यवस्था में सुधार तथा प्रशासनिक उत्तरदायित्व को क्रमिक रूप से विकसित करने पर भी बल दिया गया। यही प्रतिवेदन आगे चलकर भारत शासन अधिनियम, 1919 का आधार बना।

भारत शासन अधिनियम, 1919

मॉन्टेग्यू–चेम्सफोर्ड प्रतिवेदन के आधार पर ब्रिटिश संसद ने भारत शासन अधिनियम, 1919 पारित किया। यह अधिनियम भारतीय संवैधानिक विकास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसने पहली बार उत्तरदायी शासन की दिशा में व्यावहारिक कदम उठाया।

इस अधिनियम की सबसे प्रमुख विशेषता प्रांतों में द्वैध शासन (Dyarchy) की व्यवस्था थी। प्रशासनिक विषयों को दो भागों में विभाजित किया गया—आरक्षित विषय तथा हस्तांतरित विषय। आरक्षित विषय जैसे पुलिस, न्याय, भूमि राजस्व और कानून-व्यवस्था गवर्नर के नियंत्रण में रहे, जबकि शिक्षा, कृषि, स्थानीय स्वशासन, स्वास्थ्य तथा सहकारिता जैसे हस्तांतरित विषय भारतीय मंत्रियों को सौंपे गए।

इस अधिनियम द्वारा केंद्र में पहली बार द्विसदनीय विधानमंडल की स्थापना की गई। राज्य परिषद (Council of State) और केंद्रीय विधान सभा (Legislative Assembly) का गठन हुआ। इससे संसदीय परंपराओं का विकास हुआ।

मताधिकार का कुछ विस्तार किया गया, यद्यपि मतदान का अधिकार अभी भी सीमित वर्ग तक ही सीमित था। परिषदों को बजट पर चर्चा तथा प्रश्न पूछने के अधिक अधिकार दिए गए। साथ ही लोक सेवा आयोग की स्थापना का प्रावधान किया गया, जिससे प्रशासनिक सेवाओं की भर्ती अधिक व्यवस्थित हुई।

हालाँकि इस अधिनियम की कई सीमाएँ भी थीं। प्रांतों में द्वैध शासन व्यवहार में सफल नहीं हुआ क्योंकि महत्वपूर्ण विभाग गवर्नर के नियंत्रण में थे। केंद्र में उत्तरदायी सरकार की स्थापना नहीं की गई और गवर्नर जनरल को व्यापक विशेषाधिकार प्राप्त रहे। इस कारण भारतीय नेताओं ने इसे अधूरा सुधार माना।

समग्र मूल्यांकन

भारतीय परिषद अधिनियम, 1909, मॉन्टेग्यू–चेम्सफोर्ड प्रतिवेदन तथा भारत शासन अधिनियम, 1919 भारतीय संवैधानिक विकास के महत्वपूर्ण चरण हैं। 1909 के अधिनियम ने भारतीयों की सीमित राजनीतिक भागीदारी बढ़ाई, लेकिन पृथक निर्वाचन की व्यवस्था लागू करके सांप्रदायिक राजनीति को बढ़ावा दिया। मॉन्टेग्यू–चेम्सफोर्ड प्रतिवेदन ने उत्तरदायी शासन और प्रशासनिक सुधारों की रूपरेखा प्रस्तुत की। 1919 के अधिनियम ने प्रांतीय स्तर पर द्वैध शासन लागू कर भारतीयों को प्रशासनिक अनुभव प्रदान किया तथा संसदीय संस्थाओं के विकास को गति दी। यद्यपि इन सुधारों से पूर्ण स्वशासन स्थापित नहीं हुआ, फिर भी इन्होंने आगे चलकर 1935 के भारत शासन अधिनियम और स्वतंत्र भारत के संविधान के निर्माण के लिए मजबूत आधार तैयार किया।

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