Unit – 5
The Indian Independence Act 1947, Characteristics features of the Constitution of
India
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 तथा भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएँ।
अध्याय–1 : भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 (Indian Independence Act, 1947)
भाग–1 : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, अधिनियम की आवश्यकता तथा निर्माण की परिस्थितियाँ
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 भारतीय संवैधानिक इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक कानून माना जाता है। यदि भारतीय संविधान के विकास की पूरी प्रक्रिया का अध्ययन किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट से प्रारम्भ होकर 1858 के भारत शासन अधिनियम, 1861, 1892, 1909, 1919 तथा 1935 के भारत शासन अधिनियम तक अनेक संवैधानिक परिवर्तन किए गए, किंतु इन सभी का उद्देश्य भारत को पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करना नहीं था। इन अधिनियमों के माध्यम से ब्रिटिश सरकार अपने औपनिवेशिक शासन को अधिक संगठित और प्रभावी बनाना चाहती थी। इसके विपरीत भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 का उद्देश्य ब्रिटिश शासन का अंत करना तथा भारत को स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता प्रदान करना था। यही कारण है कि यह अधिनियम भारतीय संवैधानिक विकास का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण चरण माना जाता है।
इस अधिनियम की पृष्ठभूमि को समझने के लिए हमें बीसवीं शताब्दी के भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का अध्ययन करना आवश्यक है। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक भारतीयों में राजनीतिक चेतना का विकास प्रारम्भ हो चुका था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885) के बाद संवैधानिक सुधारों की माँग धीरे-धीरे स्वशासन (Self-Government) और अंततः पूर्ण स्वतंत्रता (Complete Independence) की माँग में परिवर्तित हो गई। प्रारम्भ में कांग्रेस ब्रिटिश शासन के भीतर सुधार चाहती थी, किंतु समय के साथ उसका उद्देश्य विदेशी शासन की समाप्ति बन गया।
1905 के बंग-भंग आंदोलन, 1919 के जलियाँवाला बाग हत्याकांड, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन तथा भारत छोड़ो आंदोलन जैसे राष्ट्रीय आंदोलनों ने ब्रिटिश शासन की वैधता को गंभीर रूप से चुनौती दी। महात्मा गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन पहली बार गाँव-गाँव तक पहुँचा और स्वतंत्रता की भावना जन-जन की चेतना का हिस्सा बन गई। लाखों भारतीयों ने जेल यात्राएँ कीं, आर्थिक कष्ट सहे और अनेक लोगों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया। इस प्रकार स्वतंत्रता केवल राजनीतिक नेताओं का लक्ष्य नहीं रही, बल्कि समस्त भारतीय समाज की सामूहिक आकांक्षा बन गई।
इसी अवधि में विश्व की परिस्थितियाँ भी तेजी से बदल रही थीं। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद उपनिवेशवाद के विरुद्ध विश्वभर में आवाज़ें उठने लगी थीं। अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने आत्मनिर्णय (Self-Determination) के सिद्धांत का समर्थन किया। यद्यपि यह सिद्धांत तत्काल भारत पर लागू नहीं हुआ, फिर भी इसने भारतीय नेताओं को यह विश्वास दिलाया कि प्रत्येक राष्ट्र को अपनी राजनीतिक व्यवस्था निर्धारित करने का अधिकार होना चाहिए।
द्वितीय विश्वयुद्ध (1939–1945) भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए निर्णायक सिद्ध हुआ। युद्ध में ब्रिटेन की विजय तो हुई, किंतु उसकी आर्थिक स्थिति अत्यंत कमजोर हो गई। विशाल साम्राज्य का प्रशासन चलाना उसके लिए कठिन होता जा रहा था। दूसरी ओर भारत में स्वतंत्रता आंदोलन और अधिक तीव्र हो गया। 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन ब्रिटिश शासन के लिए स्पष्ट चेतावनी था कि अब भारतीय जनता विदेशी शासन को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।
युद्ध समाप्त होने के बाद ब्रिटेन में आम चुनाव हुए। इन चुनावों में लेबर पार्टी को विजय प्राप्त हुई और क्लेमेंट एटली प्रधानमंत्री बने। लेबर सरकार का दृष्टिकोण भारत के प्रति अपेक्षाकृत उदार था। नई सरकार ने यह स्वीकार किया कि भारत की राजनीतिक समस्या का समाधान अब टाला नहीं जा सकता। यदि सत्ता हस्तांतरण में अधिक विलंब किया गया, तो भारत में व्यापक हिंसा और प्रशासनिक संकट उत्पन्न हो सकता है।
1946 में ब्रिटिश सरकार ने भारत की संवैधानिक समस्या का समाधान खोजने के लिए कैबिनेट मिशन भेजा। मिशन ने संयुक्त भारत के लिए संघीय योजना प्रस्तुत की तथा संविधान सभा के गठन का मार्ग प्रशस्त किया। संविधान सभा का गठन भी हुआ और उसने अपना कार्य प्रारम्भ कर दिया। किंतु कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच पाकिस्तान की माँग तथा समूह व्यवस्था को लेकर गंभीर मतभेद उत्पन्न हो गए। मुस्लिम लीग ने संविधान सभा का बहिष्कार किया और डायरेक्ट एक्शन डे की घोषणा के बाद देश में व्यापक सांप्रदायिक हिंसा फैल गई।
1946–47 के दौरान पंजाब, बंगाल, बिहार, नोआखाली तथा अनेक अन्य क्षेत्रों में भीषण दंगे हुए। लाखों लोग प्रभावित हुए और प्रशासन की स्थिति अत्यंत चिंताजनक हो गई। ब्रिटिश सरकार को यह स्पष्ट दिखाई देने लगा कि अब भारत पर प्रत्यक्ष शासन बनाए रखना संभव नहीं है। यदि शीघ्र समाधान नहीं निकाला गया, तो पूरा प्रशासनिक ढाँचा ध्वस्त हो सकता है।
इन्हीं परिस्थितियों में 20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने घोषणा की कि ब्रिटेन जून 1948 तक भारत की सत्ता भारतीयों को सौंप देगा। इसके साथ ही उन्होंने भारत में नए वायसराय के रूप में लॉर्ड लुई माउंटबेटन की नियुक्ति की। माउंटबेटन को स्पष्ट निर्देश दिया गया कि वे भारतीय नेताओं से वार्ता करके सत्ता हस्तांतरण की अंतिम योजना तैयार करें।
भारत आने के बाद माउंटबेटन ने कांग्रेस, मुस्लिम लीग, सिख नेताओं तथा भारतीय रियासतों के प्रतिनिधियों से अनेक दौर की बातचीत की। उन्होंने संयुक्त भारत बनाए रखने का प्रयास किया, किंतु राजनीतिक परिस्थितियाँ इतनी जटिल हो चुकी थीं कि यह संभव नहीं हो सका। अंततः उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि भारत का विभाजन ही तत्कालीन परिस्थितियों में सबसे व्यावहारिक समाधान है।
3 जून 1947 को माउंटबेटन योजना की घोषणा की गई। कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने, अलग-अलग कारणों से, इस योजना को स्वीकार कर लिया। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने इस योजना को कानूनी रूप देने के लिए ब्रिटिश संसद में एक विधेयक प्रस्तुत किया। यह विधेयक अत्यंत शीघ्रता से संसद के दोनों सदनों से पारित हुआ और 18 जुलाई 1947 को ब्रिटिश सम्राट की स्वीकृति प्राप्त होने के बाद भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 बन गया।
यह अधिनियम केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं था, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य और भारत के संबंधों में एक ऐतिहासिक परिवर्तन का प्रतीक था। लगभग दो शताब्दियों तक विदेशी शासन के अधीन रहने के बाद भारत पहली बार अपनी राजनीतिक नियति का निर्धारण स्वयं करने जा रहा था। इस अधिनियम ने ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता समाप्त कर दी, भारतीयों को अपने संविधान के निर्माण का अधिकार प्रदान किया और स्वतंत्र भारत के जन्म का मार्ग प्रशस्त किया।
इस प्रकार भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 किसी एक घटना का परिणाम नहीं था। यह लगभग एक शताब्दी तक चले राष्ट्रीय आंदोलन, अनेक जनसंघर्षों, राजनीतिक वार्ताओं, संवैधानिक प्रयोगों, अंतरराष्ट्रीय परिवर्तनों तथा भारतीय नेताओं के त्याग और दूरदर्शिता का संयुक्त परिणाम था। इसलिए भारतीय संवैधानिक इतिहास में इसका स्थान केवल एक अधिनियम के रूप में नहीं, बल्कि औपनिवेशिक शासन से राष्ट्रीय संप्रभुता तक की ऐतिहासिक यात्रा के अंतिम पड़ाव के रूप में माना जाता है।
अध्याय–1 : भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 (Indian Independence Act, 1947)
भाग–2 : भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के प्रमुख प्रावधान (लेखन क्रम में)
18 जुलाई 1947 को जब ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 को पारित किया, तब यह केवल एक नया कानून नहीं था, बल्कि लगभग दो सौ वर्षों से भारत पर स्थापित ब्रिटिश शासन के अंत की औपचारिक घोषणा थी। इस अधिनियम ने भारत के राजनीतिक इतिहास को पूरी तरह बदल दिया। अब भारत एक उपनिवेश (Colony) नहीं रहने वाला था, बल्कि अपने भविष्य का निर्णय स्वयं करने वाला स्वतंत्र राष्ट्र बनने जा रहा था। इसलिए इस अधिनियम के प्रत्येक प्रावधान को केवल कानूनी दृष्टि से नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अंतिम चरण के रूप में समझना आवश्यक है।
इस अधिनियम का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय यह था कि ब्रिटिश भारत को दो स्वतंत्र अधिराज्यों—भारत और पाकिस्तान—में विभाजित किया जाएगा। लंबे समय तक चले राजनीतिक संघर्ष, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मतभेद तथा माउंटबेटन योजना की स्वीकृति के बाद ब्रिटिश सरकार ने यह स्वीकार कर लिया कि सत्ता अब एक संयुक्त भारत को नहीं, बल्कि दो पृथक राष्ट्रों को सौंपी जाएगी। इसी निर्णय के आधार पर 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान तथा 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र अधिराज्य बने। इस प्रकार भारतीय इतिहास में पहली बार विदेशी शासन समाप्त हुआ और दो नए राष्ट्रों का जन्म हुआ।
जब दो नए राष्ट्र अस्तित्व में आए, तब सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि उनके ऊपर सर्वोच्च विधायी अधिकार किसका होगा। ब्रिटिश शासन के समय भारत के लिए अंतिम कानून ब्रिटिश संसद बनाती थी। भारत की केंद्रीय तथा प्रांतीय विधानसभाएँ सीमित अधिकार रखती थीं और उनके ऊपर ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता बनी रहती थी। भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम ने इस पूरी व्यवस्था को समाप्त कर दिया। स्वतंत्रता प्राप्त होने के साथ ही ब्रिटिश संसद का भारत और पाकिस्तान पर कानून बनाने का अधिकार समाप्त हो गया। अब भारत के लिए कानून केवल भारत के प्रतिनिधि बनाएँगे और पाकिस्तान के लिए पाकिस्तान के प्रतिनिधि। यही वह क्षण था जब भारत ने वास्तविक विधायी संप्रभुता (Legislative Sovereignty) प्राप्त की।
इसके साथ ही ब्रिटिश सम्राट की राजनीतिक सर्वोच्चता भी समाप्त हो गई। पहले भारत का समस्त प्रशासन ब्रिटिश सम्राट के नाम पर संचालित होता था और वायसराय उसी का प्रतिनिधि माना जाता था। किंतु स्वतंत्रता अधिनियम के लागू होते ही यह व्यवस्था समाप्त हो गई। अब भारत का प्रशासन भारतीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर चलने लगा। यद्यपि प्रारंभिक अवस्था में गवर्नर जनरल की व्यवस्था बनी रही, फिर भी उसकी भूमिका औपनिवेशिक शासन जैसी नहीं रही। वास्तविक शक्ति भारतीय नेतृत्व के हाथों में स्थानांतरित हो गई।
स्वतंत्रता प्राप्त होने के साथ ही एक नई समस्या सामने आई। भारत को अपना संविधान बनाने में समय लगने वाला था। यदि तत्काल कोई संवैधानिक व्यवस्था उपलब्ध नहीं होती, तो शासन व्यवस्था में गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता था। इस कठिनाई को ध्यान में रखते हुए भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम ने यह व्यवस्था की कि जब तक नया संविधान लागू नहीं हो जाता, तब तक भारत शासन अधिनियम, 1935 के प्रावधानों के आधार पर प्रशासन चलाया जाएगा। आवश्यकतानुसार उसमें संशोधन किए जा सकते थे। इस प्रकार भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद लगभग ढाई वर्षों तक इसी अधिनियम के आधार पर शासन चलाया और अंततः 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू होने पर यह व्यवस्था समाप्त हुई।
इसी समय संविधान सभा का महत्व भी अत्यधिक बढ़ गया। पहले संविधान सभा केवल नया संविधान तैयार करने वाली संस्था थी, किंतु स्वतंत्रता अधिनियम लागू होने के बाद उसे दोहरी जिम्मेदारी प्राप्त हुई। अब वही संविधान सभा भारत की अस्थायी संसद भी बन गई। एक ओर वह संविधान का निर्माण कर रही थी और दूसरी ओर स्वतंत्र भारत के लिए आवश्यक कानून भी बना रही थी। इस प्रकार पहली बार भारत के प्रतिनिधियों को पूर्ण विधायी अधिकार प्राप्त हुए। यह भारतीय लोकतंत्र के विकास की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम था।
अधिनियम का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष भारतीय रियासतों से संबंधित था। ब्रिटिश शासन के समय लगभग 565 देशी रियासतें ब्रिटिश सम्राट की सर्वोच्च सत्ता को स्वीकार करती थीं। इन रियासतों के विदेशी संबंध, रक्षा और अनेक अन्य विषय ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण में थे। भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम ने घोषणा की कि स्वतंत्रता प्राप्त होते ही ब्रिटिश सर्वोच्चता (Paramountcy) समाप्त हो जाएगी। इसका अर्थ यह था कि अब ब्रिटिश सरकार का रियासतों पर कोई अधिकार नहीं रहेगा। प्रत्येक रियासत को यह निर्णय करने का अधिकार दिया गया कि वह भारत में सम्मिलित होगी या पाकिस्तान में। यही निर्णय आगे चलकर भारत के राजनीतिक एकीकरण का आधार बना। बाद में सरदार वल्लभभाई पटेल और वी. पी. मेनन ने अधिकांश रियासतों का भारत में सफलतापूर्वक विलय कराया, जिसे आधुनिक भारत के निर्माण की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है।
दो नए राष्ट्रों की स्थापना के साथ ही अनेक व्यावहारिक समस्याएँ भी सामने आईं। सेना का विभाजन कैसे होगा? सरकारी धन किस प्रकार बाँटा जाएगा? रेलवे, डाक विभाग, संचार व्यवस्था, सरकारी भवन, न्यायालय, अभिलेख, हथियार तथा प्रशासनिक संसाधनों का बँटवारा किस प्रकार किया जाएगा? भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम ने इन सभी विषयों के समाधान के लिए कानूनी आधार प्रदान किया। विभाजन परिषदों तथा विशेष समितियों का गठन किया गया, जिन्होंने दोनों देशों के बीच प्रशासनिक संपत्तियों का विभाजन किया। यद्यपि यह कार्य अत्यंत कठिन था, फिर भी सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को व्यवस्थित रूप से पूरा करने का प्रयास किया गया।
प्रशासन की निरंतरता बनाए रखना भी ब्रिटिश सरकार की एक महत्वपूर्ण चिंता थी। यदि स्वतंत्रता प्राप्त होते ही सभी अधिकारी अपने पद छोड़ देते, तो प्रशासन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो सकता था। इसलिए अधिनियम में यह व्यवस्था की गई कि वर्तमान सरकारी अधिकारी, न्यायाधीश और प्रशासनिक कर्मचारी तब तक अपने पदों पर बने रहेंगे, जब तक नई सरकारें अन्य व्यवस्था न कर दें। इस निर्णय के कारण स्वतंत्रता के बाद भी शासन व्यवस्था में अचानक कोई बड़ा व्यवधान उत्पन्न नहीं हुआ।
न्यायपालिका के क्षेत्र में भी इस अधिनियम ने महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। ब्रिटिश शासन के दौरान भारत का सर्वोच्च अपीलीय न्यायालय इंग्लैंड की प्रिवी काउंसिल (Privy Council) थी। भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के लागू होने के बाद भारत धीरे-धीरे इस व्यवस्था से मुक्त होने लगा। स्वतंत्र भारत ने अपनी स्वतंत्र न्यायपालिका के निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाया और अंततः भारतीय संविधान लागू होने पर उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था बना।
इस अधिनियम ने भारतीय संविधान सभा को यह अधिकार भी प्रदान किया कि वह ब्रिटिश शासन द्वारा बनाए गए किसी भी कानून को स्वीकार कर सकती है, उसमें संशोधन कर सकती है अथवा उसे समाप्त कर सकती है। इसका अर्थ यह था कि अब भारत की विधायी व्यवस्था पूर्णतः भारतीय प्रतिनिधियों के नियंत्रण में थी। किसी विदेशी संसद का कानून भारत पर केवल इसलिए लागू नहीं रह सकता था कि वह ब्रिटिश संसद द्वारा बनाया गया था।
यदि भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के इन सभी प्रावधानों को एक साथ देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि यह केवल सत्ता हस्तांतरण का अधिनियम नहीं था। इसने भारत को राजनीतिक संप्रभुता, विधायी स्वतंत्रता, संविधान निर्माण का अधिकार, लोकतांत्रिक शासन की आधारभूमि तथा राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा प्रदान की। वास्तव में इस अधिनियम ने भारत को औपनिवेशिक शासन से निकालकर स्वतंत्र राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया में प्रवेश कराया।
इसी कारण भारतीय संवैधानिक इतिहास में भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 को केवल एक विधिक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता का संवैधानिक घोषणा-पत्र माना जाता है। इसने विदेशी शासन के अंत, राष्ट्रीय संप्रभुता की स्थापना तथा आधुनिक भारतीय लोकतांत्रिक राज्य के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। आगे चलकर यही प्रक्रिया भारतीय संविधान के निर्माण, गणराज्य की स्थापना और लोकतांत्रिक शासन की स्थायी व्यवस्था का आधार बनी।
अध्याय–1 : भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 (Indian Independence Act, 1947)
भाग–3 : भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 का प्रभाव, महत्व, उपलब्धियाँ, सीमाएँ, इतिहासकारों की दृष्टि तथा निष्कर्ष (लेखन क्रम में)
15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 का वास्तविक प्रभाव दिखाई देना प्रारम्भ हुआ। लगभग दो सौ वर्षों तक विदेशी शासन के अधीन रहने के बाद भारत ने पहली बार अपनी राजनीतिक, विधायी और प्रशासनिक शक्ति स्वयं अपने हाथों में ग्रहण की। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि भारतीय इतिहास में एक नए युग का आरम्भ था। इस अधिनियम ने औपनिवेशिक शासन और स्वतंत्र राष्ट्र के बीच एक संवैधानिक सेतु का कार्य किया। यदि यह अधिनियम न बनाया गया होता, तो सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया न तो विधिक रूप से वैध होती और न ही प्रशासनिक रूप से व्यवस्थित।
स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद सबसे पहले जिस परिवर्तन का अनुभव हुआ, वह था राष्ट्रीय संप्रभुता (National Sovereignty) की स्थापना। अब भारत किसी विदेशी शक्ति के अधीन नहीं था। ब्रिटिश संसद की विधायी सर्वोच्चता समाप्त हो चुकी थी और ब्रिटिश सम्राट का राजनीतिक अधिकार भी समाप्त हो गया था। भारतीय जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को शासन चलाने का अधिकार प्राप्त हुआ। इतिहास में पहली बार भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता प्राप्त की। यही स्वतंत्रता आगे चलकर भारतीय विदेश नीति, आर्थिक नीति और लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकास का आधार बनी।
इस अधिनियम का दूसरा महत्वपूर्ण प्रभाव भारतीय संविधान के निर्माण पर पड़ा। संविधान सभा का गठन तो 1946 में ही हो चुका था, परंतु तब वह ब्रिटिश शासन की संवैधानिक सीमाओं के भीतर कार्य कर रही थी। स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद संविधान सभा पूर्णतः स्वतंत्र संस्था बन गई। अब उस पर किसी विदेशी सरकार का नियंत्रण नहीं था। उसने भारतीय परिस्थितियों, भारतीय समाज की आवश्यकताओं और स्वतंत्र भारत के आदर्शों के अनुरूप संविधान का निर्माण किया। यही कारण है कि भारतीय संविधान को विश्व का सबसे व्यापक और मौलिक लोकतांत्रिक संविधान माना जाता है। यदि भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम संविधान सभा को यह स्वतंत्रता न देता, तो संविधान निर्माण की प्रक्रिया इतनी स्वतंत्र और प्रभावी नहीं हो पाती।
इस अधिनियम का तीसरा महत्वपूर्ण प्रभाव भारतीय लोकतंत्र के विकास पर पड़ा। संविधान सभा ने केवल संविधान ही नहीं बनाया, बल्कि अस्थायी संसद के रूप में कार्य करते हुए अनेक महत्वपूर्ण कानून भी पारित किए। इससे लोकतांत्रिक शासन की परंपरा विकसित हुई। स्वतंत्र भारत की प्रशासनिक व्यवस्था अचानक शून्य में नहीं पहुँची, बल्कि संवैधानिक निरंतरता बनी रही। यही निरंतरता भारतीय लोकतंत्र की स्थिरता का एक प्रमुख कारण बनी।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम ने भारतीय प्रशासन को भी स्थिरता प्रदान की। ब्रिटिश शासन समाप्त होने के बाद यदि सभी प्रशासनिक अधिकारी अपने पद छोड़ देते, तो देश में व्यापक अराजकता फैल सकती थी। अधिनियम ने यह सुनिश्चित किया कि प्रशासनिक सेवाएँ, न्यायपालिका और सरकारी विभाग निरंतर कार्य करते रहें। परिणामस्वरूप स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद भी शासन व्यवस्था सुचारु रूप से चलती रही। यह प्रशासनिक दृष्टि से इस अधिनियम की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक थी।
रियासतों के संदर्भ में भी इस अधिनियम का प्रभाव अत्यंत व्यापक था। ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त होने के बाद रियासतों को अपने भविष्य का निर्णय स्वयं करना था। इस स्थिति ने एक ओर नई चुनौतियाँ उत्पन्न कीं, तो दूसरी ओर भारत के राजनीतिक एकीकरण का अवसर भी प्रदान किया। सरदार वल्लभभाई पटेल और वी. पी. मेनन ने इस अवसर का सफलतापूर्वक उपयोग किया और अधिकांश रियासतों का भारत में विलय कराया। यदि भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त न करता, तो भारत का राजनीतिक एकीकरण इतना व्यापक और शीघ्र संभव नहीं होता।
किन्तु इस अधिनियम के प्रभाव केवल सकारात्मक नहीं थे। इसके साथ ही भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी भी जुड़ी हुई थी। भारत और पाकिस्तान के विभाजन ने करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित किया। पंजाब, बंगाल और सीमावर्ती क्षेत्रों में व्यापक सांप्रदायिक हिंसा हुई। लाखों लोग अपने घर छोड़ने के लिए विवश हुए। अनुमान है कि लगभग एक करोड़ से अधिक लोगों ने सीमा पार की और लाखों लोगों की मृत्यु हुई। इस प्रकार स्वतंत्रता का उत्सव विभाजन की पीड़ा से आच्छादित हो गया। इसलिए भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम को स्वतंत्रता का दस्तावेज़ होने के साथ-साथ विभाजन का संवैधानिक आधार भी माना जाता है।
अधिनियम की एक अन्य सीमा इसकी अत्यधिक शीघ्रता थी। फरवरी 1947 में ब्रिटिश सरकार ने जून 1948 तक सत्ता हस्तांतरण की समय-सीमा निर्धारित की थी, किंतु माउंटबेटन ने इसे घटाकर अगस्त 1947 कर दिया। परिणामस्वरूप प्रशासनिक तैयारियाँ पूरी नहीं हो सकीं। सीमाओं का निर्धारण, सरकारी संपत्तियों का विभाजन, शरणार्थियों के पुनर्वास और सुरक्षा की पर्याप्त व्यवस्था समय पर नहीं हो सकी। यही कारण था कि विभाजन के समय व्यापक हिंसा और अव्यवस्था देखने को मिली।
इतिहासकारों ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम का विभिन्न दृष्टिकोणों से मूल्यांकन किया है। इतिहासकार बी. एल. ग्रोवर का मत है कि यह अधिनियम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की संवैधानिक विजय का अंतिम चरण था। उनके अनुसार ब्रिटिश सरकार ने पहली बार भारतीयों को पूर्ण राजनीतिक अधिकार प्रदान किए और संविधान निर्माण की स्वतंत्रता स्वीकार की।
इतिहासकार विपिन चंद्र का मत है कि भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम को केवल एक कानूनी दस्तावेज़ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह लगभग एक शताब्दी तक चले राष्ट्रीय आंदोलन, जनसंघर्ष, त्याग और राजनीतिक चेतना का परिणाम था। उनके अनुसार भारत की स्वतंत्रता किसी ब्रिटिश उदारता का परिणाम नहीं, बल्कि भारतीय जनता के निरंतर संघर्ष की उपलब्धि थी।
दुर्गादास बसु भारतीय संवैधानिक इतिहास का विश्लेषण करते हुए लिखते हैं कि भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम ने भारत के संविधान निर्माण की दिशा को पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की। संविधान सभा अब किसी विदेशी संसद के प्रति उत्तरदायी नहीं रही। यही कारण है कि भारतीय संविधान पूर्णतः भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित हो सका।
कुछ इतिहासकारों ने इस अधिनियम की आलोचना भी की है। उनका मत है कि यदि सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया अधिक समय लेकर व्यवस्थित रूप से पूरी की जाती, तो विभाजन के समय होने वाली हिंसा को काफी हद तक रोका जा सकता था। इसी प्रकार कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि ब्रिटिश सरकार ने भारत छोड़ने की इतनी जल्दी दिखाई कि प्रशासनिक और मानवीय पक्षों की पर्याप्त तैयारी नहीं हो सकी। दूसरी ओर अनेक इतिहासकार यह भी मानते हैं कि उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों में शीघ्र सत्ता हस्तांतरण ही सबसे व्यावहारिक समाधान था, क्योंकि विलंब होने पर गृहयुद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती थी।
यदि भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम का समग्र मूल्यांकन किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि इसने भारत को केवल राजनीतिक स्वतंत्रता ही नहीं दी, बल्कि आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य की संस्थागत नींव भी रखी। संविधान सभा को स्वतंत्रता मिली, लोकतांत्रिक शासन की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई, विधायी संप्रभुता स्थापित हुई और भारतीय जनता को अपने भविष्य का निर्धारण स्वयं करने का अधिकार प्राप्त हुआ। इन सभी उपलब्धियों ने आगे चलकर भारतीय गणराज्य के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।
निष्कर्ष
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 भारतीय संवैधानिक विकास की उस लंबी यात्रा का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण चरण था, जिसकी शुरुआत ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में हुए प्रारम्भिक संवैधानिक सुधारों से हुई थी। इस अधिनियम ने औपनिवेशिक शासन का अंत किया, भारत को राष्ट्रीय संप्रभुता प्रदान की, संविधान निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया और लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना की आधारभूमि तैयार की।
यद्यपि इसके साथ भारत-विभाजन जैसी अत्यंत दुखद घटना भी जुड़ी हुई थी, फिर भी संवैधानिक दृष्टि से इसका महत्व असाधारण है। भारतीय संविधान, संसदीय लोकतंत्र, संघीय शासन, स्वतंत्र न्यायपालिका और सार्वभौमिक लोकतांत्रिक व्यवस्था—इन सभी की प्रारम्भिक संवैधानिक आधारशिला इसी अधिनियम ने रखी।
इसी कारण भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 को भारतीय इतिहास में केवल एक कानून नहीं, बल्कि भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता का विधिक घोषणा-पत्र तथा आधुनिक भारतीय राष्ट्र-राज्य के जन्म का संवैधानिक दस्तावेज़ माना जाता है।
अध्याय–2 : भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएँ (Characteristics / Salient Features of the Constitution of India)
भाग–1 : भारतीय संविधान का स्वरूप, निर्माण की पृष्ठभूमि तथा प्रमुख विशेषताओं का विकास (लेखन क्रम में)
भारतीय संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि भारत के स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में पुनर्जन्म का लिखित प्रमाण है। यह उन आदर्शों, संघर्षों, अनुभवों और आकांक्षाओं का परिणाम है, जिन्हें भारतीय जनता ने लगभग दो शताब्दियों तक चले स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान विकसित किया। इसलिए भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताओं को समझने से पहले यह जानना आवश्यक है कि यह संविधान किन परिस्थितियों में बना, इसके निर्माताओं ने किन समस्याओं का सामना किया और उन्होंने किन सिद्धांतों को अपनाकर आधुनिक भारत की राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण किया।
26 जनवरी 1950 को जब भारतीय संविधान लागू हुआ, तब विश्व के सामने एक ऐसे लोकतांत्रिक गणराज्य का उदय हुआ जिसकी सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषायी और धार्मिक विविधता अद्वितीय थी। उस समय भारत एक अत्यंत विशाल देश था, जहाँ अनेक धर्म, अनेक भाषाएँ, अनेक जातियाँ और विभिन्न सांस्कृतिक परंपराएँ विद्यमान थीं। विभाजन की पीड़ा अभी ताज़ा थी, लाखों शरणार्थियों का पुनर्वास चल रहा था, अनेक रियासतों का एकीकरण हाल ही में हुआ था और आर्थिक स्थिति भी अत्यंत कमजोर थी। इन कठिन परिस्थितियों में संविधान निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि वे ऐसा संविधान तैयार करें जो देश की एकता को बनाए रखे, लोकतंत्र को स्थिरता प्रदान करे और प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार उपलब्ध कराए।
संविधान सभा के सदस्यों ने यह स्पष्ट रूप से अनुभव किया कि भारत की समस्याओं का समाधान किसी एक देश के संविधान की नकल करके नहीं किया जा सकता। प्रत्येक देश का संविधान उसकी ऐतिहासिक परिस्थितियों, सामाजिक संरचना और राजनीतिक आवश्यकताओं के अनुसार विकसित होता है। इसलिए भारतीय संविधान का निर्माण करते समय विश्व के अनेक संविधानों का अध्ययन अवश्य किया गया, किंतु उन्हें भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप संशोधित करके अपनाया गया। यही कारण है कि भारतीय संविधान को न तो पूर्णतः मौलिक कहा जा सकता है और न ही पूर्णतः उधार लिया हुआ संविधान। वास्तव में यह विश्व की श्रेष्ठ संवैधानिक परंपराओं और भारतीय अनुभवों का संतुलित समन्वय है।
संविधान सभा ने लगभग 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन तक निरंतर विचार-विमर्श किया। इस अवधि में प्रत्येक अनुच्छेद पर गंभीर चर्चा हुई। विभिन्न समितियों की रिपोर्टों का अध्ययन किया गया, विशेषज्ञों की राय ली गई और देश के विभिन्न वर्गों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखा गया। संविधान सभा का उद्देश्य केवल शासन चलाने के नियम बनाना नहीं था, बल्कि ऐसे लोकतांत्रिक राज्य की स्थापना करना था जिसमें स्वतंत्रता, समानता, न्याय और बंधुत्व के आदर्श वास्तविक रूप से स्थापित किए जा सकें।
संविधान निर्माण की प्रक्रिया में डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। प्रारूप समिति (Drafting Committee) के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने विभिन्न संवैधानिक सिद्धांतों को एक सुव्यवस्थित रूप प्रदान किया। उन्होंने संविधान सभा में स्पष्ट कहा था कि संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, उसकी सफलता अंततः उन लोगों पर निर्भर करेगी जो उसे लागू करेंगे। इस विचार से स्पष्ट होता है कि संविधान निर्माताओं ने केवल कानूनी व्यवस्था पर ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक राजनीतिक संस्कृति के विकास पर भी समान रूप से बल दिया।
भारतीय संविधान की विशेषताओं का विकास किसी एक समय में नहीं हुआ। इसके पीछे लगभग डेढ़ सौ वर्षों का संवैधानिक अनुभव था। 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट से लेकर भारत शासन अधिनियम, 1935 तक अनेक संवैधानिक प्रयोग हुए। नेहरू प्रतिवेदन (1928) ने मौलिक अधिकारों और संसदीय शासन की अवधारणा प्रस्तुत की। कराची प्रस्ताव (1931) ने सामाजिक और आर्थिक अधिकारों पर बल दिया। कैबिनेट मिशन योजना (1946) ने संविधान सभा के गठन का मार्ग प्रशस्त किया। भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 ने संविधान सभा को पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की। इन सभी घटनाओं ने मिलकर भारतीय संविधान की वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार की।
संविधान निर्माताओं के सामने केवल शासन की संरचना निर्धारित करने का प्रश्न नहीं था। उन्हें यह भी सुनिश्चित करना था कि भारत में लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित न रहे, बल्कि प्रत्येक नागरिक के जीवन में न्याय, समानता और गरिमा की स्थापना हो। इसी उद्देश्य से संविधान में मौलिक अधिकार, राज्य के नीति-निर्देशक तत्व, स्वतंत्र न्यायपालिका, संसदीय शासन प्रणाली, संघीय व्यवस्था, धर्मनिरपेक्षता, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, एकल नागरिकता तथा स्वतंत्र निर्वाचन आयोग जैसी अनेक विशेषताओं को सम्मिलित किया गया।
भारतीय संविधान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की भी कल्पना की गई है। संविधान निर्माताओं का विश्वास था कि केवल मतदान का अधिकार प्रदान कर देना पर्याप्त नहीं है। जब तक समाज में समान अवसर, सामाजिक न्याय, शिक्षा, आर्थिक सुरक्षा और मानव गरिमा की स्थापना नहीं होगी, तब तक लोकतंत्र पूर्ण नहीं माना जा सकता। यही कारण है कि संविधान में मौलिक अधिकारों के साथ-साथ नीति-निर्देशक तत्वों को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया।
एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न राष्ट्रीय एकता का था। भारत की विविधता इतनी व्यापक थी कि यदि संविधान में केवल राज्यों को अधिक अधिकार दिए जाते, तो राष्ट्रीय एकता के सामने संकट उत्पन्न हो सकता था। दूसरी ओर यदि सम्पूर्ण शक्ति केंद्र के हाथों में केंद्रित कर दी जाती, तो राज्यों की स्वायत्तता प्रभावित होती। संविधान निर्माताओं ने इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करते हुए संघीय व्यवस्था के साथ सशक्त केंद्र की व्यवस्था अपनाई। यही कारण है कि भारतीय संविधान को अनेक विद्वान ‘अर्ध-संघीय (Quasi-Federal)’ या ‘सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism)’ की भावना पर आधारित संविधान मानते हैं।
इसी प्रकार शासन प्रणाली के प्रश्न पर भी गहन विचार हुआ। अमेरिका की राष्ट्रपति प्रणाली और ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली—दोनों का अध्ययन किया गया। अंततः संविधान सभा ने ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली को भारतीय परिस्थितियों के अधिक अनुकूल माना। इसके पीछे मुख्य कारण यह था कि संसदीय प्रणाली में कार्यपालिका संसद के प्रति उत्तरदायी रहती है और लोकतांत्रिक नियंत्रण अधिक प्रभावी रहता है।
यदि भारतीय संविधान के निर्माण की संपूर्ण प्रक्रिया का अध्ययन किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि इसकी प्रत्येक विशेषता किसी न किसी ऐतिहासिक अनुभव, राजनीतिक आवश्यकता या सामाजिक उद्देश्य से जुड़ी हुई है। संविधान की कोई भी व्यवस्था आकस्मिक नहीं है। प्रत्येक प्रावधान के पीछे स्वतंत्रता आंदोलन के अनुभव, विश्व के संवैधानिक विकास और भारतीय समाज की आवश्यकताओं का गहरा प्रभाव दिखाई देता है।
इसी कारण भारतीय संविधान को विश्व का सबसे व्यापक, सबसे विस्तृत, सबसे संतुलित और सबसे अधिक व्यावहारिक लोकतांत्रिक संविधान कहा जाता है। इसमें परंपरा और आधुनिकता, स्वतंत्रता और अनुशासन, केंद्र और राज्य, अधिकार और कर्तव्य तथा न्याय और विकास—इन सभी के बीच संतुलन स्थापित करने का सफल प्रयास किया गया है।
इस प्रकार भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन केवल अनुच्छेदों का अध्ययन नहीं है, बल्कि आधुनिक भारत के राजनीतिक दर्शन, लोकतांत्रिक आदर्शों और राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया को समझने का माध्यम है। संविधान की प्रत्येक विशेषता भारतीय लोकतंत्र की किसी न किसी मूलभूत आवश्यकता की पूर्ति करती है और इसी कारण वे आज भी समान रूप से प्रासंगिक हैं।
अध्याय–2 : भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएँ (Characteristics / Salient Features of the Constitution of India)
भाग–2 : भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताओं का विस्तृत अध्ययन (लेखन क्रम में)
भारतीय संविधान का निर्माण केवल शासन संचालन के लिए नियम बनाने के उद्देश्य से नहीं किया गया था। संविधान सभा का लक्ष्य एक ऐसे लोकतांत्रिक राज्य की स्थापना करना था जो स्वतंत्रता, समानता, न्याय और बंधुत्व के आदर्शों पर आधारित हो। इसी कारण संविधान में ऐसी अनेक विशेषताओं को सम्मिलित किया गया जो इसे विश्व के अन्य संविधानों से अलग और विशिष्ट बनाती हैं। इन विशेषताओं को समझे बिना भारतीय संविधान की आत्मा को समझना संभव नहीं है।
संविधान की सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका लिखित तथा विश्व का सबसे विस्तृत संविधान होना है। जब संविधान सभा अपना कार्य कर रही थी, तब उसके सामने यह प्रश्न था कि क्या भारत भी ब्रिटेन की तरह अलिखित संविधान अपनाए या अमेरिका की भाँति लिखित संविधान बनाए। गहन विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया कि भारत जैसे विशाल, विविधतापूर्ण और नवस्वतंत्र देश के लिए लिखित संविधान ही उपयुक्त होगा। इसके पीछे अनेक कारण थे। भारत में अनेक भाषाएँ, धर्म, जातियाँ, संस्कृतियाँ और सामाजिक परंपराएँ विद्यमान थीं। यदि संवैधानिक व्यवस्थाएँ स्पष्ट रूप से लिखित न होतीं, तो शासन और न्यायपालिका के समक्ष अनेक प्रकार के विवाद उत्पन्न हो सकते थे। इसलिए संविधान के प्रत्येक महत्वपूर्ण विषय को विस्तारपूर्वक लिखित रूप दिया गया।
26 जनवरी 1950 को लागू होने वाले मूल संविधान में 395 अनुच्छेद, 22 भाग और 8 अनुसूचियाँ थीं। समय के साथ अनेक संशोधनों के कारण आज संविधान में 25 भाग, 448 अनुच्छेद (क्रमांकन सहित) और 12 अनुसूचियाँ हैं। यह विश्व का सबसे विस्तृत लिखित संविधान माना जाता है। इसकी व्यापकता का कारण केवल अनुच्छेदों की संख्या नहीं है, बल्कि इसमें शासन, नागरिक अधिकार, न्यायपालिका, केंद्र-राज्य संबंध, निर्वाचन, आपातकाल, स्थानीय स्वशासन, अनुसूचित क्षेत्रों तथा अनेक प्रशासनिक विषयों का विस्तृत वर्णन किया गया है।
भारतीय संविधान की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता संविधान की सर्वोच्चता (Supremacy of the Constitution) है। संविधान निर्माताओं का स्पष्ट मत था कि लोकतंत्र में किसी व्यक्ति, संस्था अथवा सरकार को सर्वोच्च नहीं माना जा सकता। सर्वोच्च स्थान केवल संविधान को प्राप्त होना चाहिए। यही कारण है कि भारत में संसद भी संविधान के अधीन है। संसद ऐसा कोई कानून नहीं बना सकती जो संविधान के विपरीत हो। यदि कोई कानून संविधान के विरुद्ध पाया जाता है, तो न्यायपालिका उसे असंवैधानिक घोषित कर सकती है। इस व्यवस्था ने संविधान को भारतीय लोकतंत्र का सर्वोच्च विधिक दस्तावेज़ बना दिया।
संविधान की तीसरी प्रमुख विशेषता यह है कि भारत को “संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य” घोषित किया गया है। संविधान की प्रस्तावना (Preamble) में इन आदर्शों को अत्यंत स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया है। ‘संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न’ का अर्थ है कि भारत किसी विदेशी शक्ति के अधीन नहीं है और अपनी आंतरिक तथा बाह्य नीतियों का निर्धारण स्वतंत्र रूप से करता है। ‘समाजवादी’ शब्द यह स्पष्ट करता है कि राज्य सामाजिक और आर्थिक न्याय की स्थापना के लिए कार्य करेगा। ‘पंथनिरपेक्ष’ का अर्थ है कि राज्य किसी विशेष धर्म का पक्ष नहीं लेगा, बल्कि सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान का व्यवहार करेगा। ‘लोकतांत्रिक’ का तात्पर्य यह है कि शासन जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से संचालित होगा, जबकि ‘गणराज्य’ का अर्थ है कि राज्य का सर्वोच्च पद किसी वंशानुगत शासक के पास नहीं, बल्कि निर्वाचित राष्ट्रपति के पास होगा।
भारतीय संविधान की अगली महत्वपूर्ण विशेषता संसदीय शासन प्रणाली (Parliamentary System of Government) है। संविधान सभा ने ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली का अध्ययन करने के बाद उसे भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप अपनाया। इस प्रणाली में वास्तविक कार्यपालिका प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद होती है, जबकि राष्ट्रपति संवैधानिक प्रमुख होता है। मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी रहती है। यदि लोकसभा में सरकार अपना बहुमत खो देती है, तो उसे त्यागपत्र देना पड़ता है। इस व्यवस्था का उद्देश्य कार्यपालिका को लोकतांत्रिक नियंत्रण के अधीन रखना तथा जनता के प्रति उत्तरदायी शासन सुनिश्चित करना है।
भारतीय संविधान की एक अत्यंत महत्वपूर्ण विशेषता संघीय व्यवस्था के साथ सशक्त केंद्र (Federal System with a Strong Centre) है। संविधान निर्माताओं ने भारत की विशाल भौगोलिक संरचना और सांस्कृतिक विविधता को ध्यान में रखते हुए संघीय शासन प्रणाली को अपनाया। इसके अंतर्गत शासन की शक्तियों का विभाजन केंद्र और राज्यों के बीच किया गया। संविधान की सातवीं अनुसूची में संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची के माध्यम से विषयों का विभाजन किया गया है। किंतु राष्ट्रीय एकता, सुरक्षा और प्रशासनिक स्थिरता को ध्यान में रखते हुए केंद्र को अपेक्षाकृत अधिक शक्तियाँ प्रदान की गईं। इसलिए अनेक संवैधानिक विद्वान भारतीय संघवाद को ‘अर्ध-संघीय’ अथवा ‘सहकारी संघवाद’ की संज्ञा देते हैं।
भारतीय संविधान की सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक विशेषताओं में मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) का विशेष स्थान है। संविधान निर्माताओं का विश्वास था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी जब प्रत्येक नागरिक को कुछ मूलभूत अधिकार प्राप्त हों। इसी उद्देश्य से संविधान के भाग–III में नागरिकों को समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार, सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अधिकार तथा संवैधानिक उपचारों का अधिकार प्रदान किया गया। ये अधिकार व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक जीवन के आधार माने जाते हैं। भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर इन अधिकारों की व्यापक व्याख्या करके उन्हें और अधिक प्रभावी बनाया है।
मौलिक अधिकारों के साथ-साथ संविधान में राज्य के नीति-निर्देशक तत्व (Directive Principles of State Policy) को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। संविधान निर्माताओं का उद्देश्य केवल राजनीतिक लोकतंत्र की स्थापना करना नहीं था, बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय पर आधारित कल्याणकारी राज्य (Welfare State) का निर्माण भी था। इसलिए नीति-निर्देशक तत्वों के माध्यम से राज्य को यह निर्देश दिया गया कि वह समान नागरिक संहिता, समान वेतन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण विकास, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय जैसे उद्देश्यों की दिशा में निरंतर कार्य करे। यद्यपि ये न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं, फिर भी शासन की नीति निर्माण प्रक्रिया में इनका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।
अध्याय–2 : भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएँ (Characteristics / Salient Features of the Constitution of India)
भाग–3 : भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताओं का विस्तृत अध्ययन (लेखन क्रम में)
भारतीय संविधान की विशेषताओं का अध्ययन करते समय यह स्पष्ट होता है कि संविधान निर्माताओं ने केवल नागरिकों को अधिकार प्रदान करने तक ही अपने दायित्व को सीमित नहीं रखा। उनका उद्देश्य ऐसा लोकतांत्रिक समाज स्थापित करना था जिसमें नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों के प्रति भी जागरूक रहें। इसी विचार के आधार पर आगे चलकर संविधान में मौलिक कर्तव्यों (Fundamental Duties) को सम्मिलित किया गया। 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान के भाग–IV(क) में अनुच्छेद 51(क) के अंतर्गत नागरिकों के दस मौलिक कर्तव्यों को जोड़ा गया। बाद में 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा ग्यारहवाँ मौलिक कर्तव्य जोड़ा गया, जिसके अनुसार माता-पिता या अभिभावकों का यह दायित्व है कि वे 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को शिक्षा दिलाने का अवसर प्रदान करें।
मौलिक कर्तव्यों का उद्देश्य नागरिकों में राष्ट्रीय अनुशासन, संविधान के प्रति सम्मान, राष्ट्रीय एकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पर्यावरण संरक्षण तथा सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा जैसी भावनाओं का विकास करना है। संविधान निर्माताओं का विश्वास था कि यदि नागरिक केवल अधिकारों की बात करेंगे और कर्तव्यों की उपेक्षा करेंगे, तो लोकतंत्र संतुलित रूप से विकसित नहीं हो सकेगा। इसलिए अधिकार और कर्तव्य दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।
भारतीय संविधान की एक अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण विशेषता स्वतंत्र एवं एकीकृत न्यायपालिका (Independent and Integrated Judiciary) है। संविधान निर्माताओं ने न्यायपालिका को शासन के अन्य दोनों अंगों—विधायिका और कार्यपालिका—से स्वतंत्र रखा। उनका मत था कि यदि न्यायपालिका स्वतंत्र नहीं होगी, तो नागरिकों के मौलिक अधिकारों की प्रभावी रक्षा संभव नहीं होगी। इसी कारण सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति, कार्यकाल, वेतन और पद से हटाने की प्रक्रिया को विशेष संवैधानिक संरक्षण प्रदान किया गया।
भारत में न्यायपालिका की संरचना एकीकृत (Integrated) है। इसका अर्थ यह है कि पूरे देश के लिए एक ही न्यायिक व्यवस्था है, जिसके शीर्ष पर उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) स्थित है। उसके नीचे राज्यों के उच्च न्यायालय तथा उनसे नीचे अधीनस्थ न्यायालय कार्य करते हैं। यह व्यवस्था पूरे देश में कानून की समान व्याख्या और न्याय की एकरूपता सुनिश्चित करती है।
स्वतंत्र न्यायपालिका की प्रभावशीलता का सबसे बड़ा आधार न्यायिक पुनर्विलोकन (Judicial Review) की शक्ति है। न्यायिक पुनर्विलोकन का अर्थ है कि न्यायालय यह परीक्षण कर सकता है कि संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा बनाया गया कोई कानून संविधान के अनुरूप है या नहीं। यदि कोई कानून संविधान के प्रावधानों, विशेषकर मौलिक अधिकारों, का उल्लंघन करता है, तो सर्वोच्च न्यायालय अथवा उच्च न्यायालय उसे असंवैधानिक घोषित कर सकता है। यह व्यवस्था संविधान की सर्वोच्चता को व्यवहारिक रूप से लागू करती है और शासन के विभिन्न अंगों के बीच संतुलन बनाए रखती है।
भारतीय संविधान की एक विशिष्ट विशेषता एकल नागरिकता (Single Citizenship) है। संघीय शासन व्यवस्था अपनाने के बावजूद भारत में अमेरिका की भाँति दोहरी नागरिकता की व्यवस्था नहीं है। भारत का प्रत्येक नागरिक केवल भारतीय नागरिक है। वह किसी राज्य का पृथक नागरिक नहीं माना जाता। इस व्यवस्था का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना तथा नागरिकों में सम्पूर्ण भारत के प्रति समान निष्ठा की भावना विकसित करना है। संविधान निर्माताओं का विश्वास था कि यदि राज्यों की अलग-अलग नागरिकता होगी, तो क्षेत्रीय संकीर्णता और अलगाववाद को बढ़ावा मिल सकता है।
भारतीय लोकतंत्र का वास्तविक आधार सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Franchise) है। संविधान लागू होते ही भारत के प्रत्येक वयस्क नागरिक को, बिना किसी जाति, धर्म, लिंग, भाषा, संपत्ति या शिक्षा के भेदभाव के, मतदान का अधिकार प्रदान किया गया। प्रारम्भ में मतदान की आयु 21 वर्ष निर्धारित की गई थी, जिसे 61वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1988 द्वारा घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया। उस समय विश्व के अनेक देशों में भी इस प्रकार का व्यापक मताधिकार नहीं था। इसलिए भारत का यह निर्णय लोकतांत्रिक इतिहास में अत्यंत क्रांतिकारी माना जाता है।
सार्वभौमिक मताधिकार को निष्पक्ष रूप से लागू करने के लिए संविधान में स्वतंत्र निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) की स्थापना की गई। संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत गठित यह आयोग लोकसभा, राज्य विधानसभाओं, राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति के चुनावों का स्वतंत्र एवं निष्पक्ष संचालन करता है। निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता भारतीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता का आधार मानी जाती है। यदि चुनाव निष्पक्ष न हों, तो लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ समाप्त हो जाता है। इसलिए संविधान निर्माताओं ने निर्वाचन आयोग को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया।
भारतीय संविधान की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता आपातकालीन प्रावधान (Emergency Provisions) हैं। संविधान निर्माताओं ने यह अनुभव किया कि सामान्य परिस्थितियों के अतिरिक्त कभी-कभी ऐसी असाधारण परिस्थितियाँ भी उत्पन्न हो सकती हैं, जिनमें राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा के लिए विशेष उपाय आवश्यक हों। इसी उद्देश्य से संविधान में तीन प्रकार के आपातकाल का प्रावधान किया गया—राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352), राज्य आपातकाल अथवा राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) तथा वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360)। इन प्रावधानों के माध्यम से संकट की स्थिति में केंद्र सरकार को अतिरिक्त शक्तियाँ प्राप्त होती हैं। यद्यपि इनका उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा है, फिर भी इनके दुरुपयोग की संभावना को लेकर समय-समय पर बहस होती रही है।
भारतीय संविधान की एक अत्यंत उल्लेखनीय विशेषता इसका कठोर और लचीला (Rigid and Flexible) दोनों प्रकार का होना है। कुछ संवैधानिक प्रावधानों में संशोधन संसद साधारण बहुमत से कर सकती है, कुछ में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है और कुछ विषयों में संसद के साथ-साथ कम-से-कम आधे राज्यों की स्वीकृति भी आवश्यक होती है। इस मिश्रित व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि संविधान समय के साथ आवश्यक परिवर्तन भी स्वीकार करे और उसकी मूल संरचना भी सुरक्षित रहे। इस संतुलन के कारण भारतीय संविधान न तो अत्यधिक कठोर है और न ही अत्यधिक लचीला।
भारतीय संविधान की लोकतांत्रिक भावना केवल केंद्र और राज्यों तक सीमित नहीं है। संविधान में स्थानीय स्वशासन (Local Self-Government) को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। 73वें और 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा पंचायती राज संस्थाओं और नगर निकायों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया। इससे लोकतंत्र गाँव और नगर स्तर तक पहुँचा तथा जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी में वृद्धि हुई। महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के विचार को भी इससे नई दिशा मिली।
यदि इन सभी विशेषताओं का समग्र रूप से अध्ययन किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान केवल शासन की कानूनी रूपरेखा प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि वह एक ऐसे समाज की कल्पना करता है जिसमें लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता, धार्मिक सहिष्णुता, विधि का शासन, मानव गरिमा और राष्ट्रीय एकता समान रूप से विकसित हों। संविधान की प्रत्येक विशेषता अन्य विशेषताओं से जुड़ी हुई है। मौलिक अधिकार बिना स्वतंत्र न्यायपालिका के प्रभावी नहीं हो सकते, न्यायपालिका संविधान की सर्वोच्चता के बिना शक्तिशाली नहीं हो सकती, लोकतंत्र सार्वभौमिक मताधिकार के बिना पूर्ण नहीं हो सकता और राष्ट्रीय एकता संघीय व्यवस्था तथा एकल नागरिकता के संतुलन के बिना मजबूत नहीं हो सकती। यही परस्पर संबंध भारतीय संविधान को विश्व के अन्य संविधानों से विशिष्ट बनाता है।
अध्याय–2 : भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएँ (Characteristics / Salient Features of the Constitution of India)
भाग–4 : भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताओं का समग्र मूल्यांकन, संवैधानिक विद्वानों के विचार, आलोचनाएँ तथा निष्कर्ष (लेखन क्रम में)
भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताओं का विस्तृत अध्ययन करने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि यह केवल शासन संचालन का विधिक दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि आधुनिक भारत के राजनीतिक दर्शन, सामाजिक आदर्शों और राष्ट्रीय आकांक्षाओं का समन्वित रूप है। संविधान सभा ने लगभग तीन वर्षों तक गंभीर विचार-विमर्श करने के बाद ऐसा संविधान तैयार किया, जिसमें भारतीय परंपराओं, स्वतंत्रता आंदोलन के अनुभवों तथा विश्व की श्रेष्ठ संवैधानिक व्यवस्थाओं का संतुलित समावेश किया गया। यही कारण है कि भारतीय संविधान को विश्व के सबसे सफल लोकतांत्रिक संविधानों में स्थान प्राप्त है।
भारतीय संविधान की सबसे बड़ी विशेषता उसका समन्वयकारी स्वरूप (Synthetic Character) है। संविधान निर्माताओं ने किसी एक देश की संवैधानिक व्यवस्था को पूरी तरह नहीं अपनाया। उन्होंने ब्रिटेन से संसदीय शासन प्रणाली, अमेरिका से मौलिक अधिकार, न्यायिक पुनर्विलोकन और न्यायपालिका की स्वतंत्रता, आयरलैंड से राज्य के नीति-निर्देशक तत्व, कनाडा से सशक्त केंद्र वाली संघीय व्यवस्था, ऑस्ट्रेलिया से समवर्ती सूची तथा व्यापार की स्वतंत्रता, जर्मनी से आपातकालीन प्रावधान, सोवियत संघ (पूर्व) से मौलिक कर्तव्यों की प्रेरणा तथा दक्षिण अफ्रीका से संविधान संशोधन की कुछ प्रक्रियाओं को ग्रहण किया। इन सभी तत्वों को भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप संशोधित करके अपनाया गया। इसलिए भारतीय संविधान को अनेक विद्वान “विश्व की संवैधानिक परंपराओं का सर्वोत्तम समन्वय” कहते हैं।
भारतीय संविधान की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता उसकी लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता है। विश्व के अनेक देशों में लोकतंत्र धीरे-धीरे विकसित हुआ, किंतु भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त करते ही सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार स्वीकार कर लिया। उस समय देश में व्यापक गरीबी, निरक्षरता और सामाजिक असमानता थी, फिर भी संविधान निर्माताओं ने जनता की राजनीतिक क्षमता पर विश्वास व्यक्त किया। यह निर्णय भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति सिद्ध हुआ। आज नियमित चुनाव, शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निरंतरता इसी दूरदर्शी निर्णय का परिणाम हैं।
संविधान का तीसरा महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक परिवर्तन का साधन होना है। भारतीय संविधान केवल राज्य की शक्तियों का विभाजन नहीं करता, बल्कि समाज में न्याय और समानता स्थापित करने का भी प्रयास करता है। मौलिक अधिकार व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं, जबकि राज्य के नीति-निर्देशक तत्व सामाजिक और आर्थिक न्याय की दिशा निर्धारित करते हैं। अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान, महिलाओं और बच्चों के संरक्षण की व्यवस्था तथा शिक्षा और सामाजिक कल्याण संबंधी नीतियाँ संविधान के इसी परिवर्तनकारी स्वरूप को व्यक्त करती हैं।
भारतीय संविधान की एक अन्य उल्लेखनीय विशेषता उसकी अनुकूलन क्षमता (Adaptability) है। संविधान निर्माताओं ने यह समझ लिया था कि समाज समय के साथ बदलता रहता है और संविधान को भी बदलती परिस्थितियों के अनुरूप विकसित होना चाहिए। इसी उद्देश्य से संविधान संशोधन की व्यवस्था की गई। अब तक संविधान में सौ से अधिक संशोधन किए जा चुके हैं। इन संशोधनों ने संविधान को समयानुकूल बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) के माध्यम से यह सुनिश्चित किया कि संशोधन की शक्ति का प्रयोग संविधान की मूल आत्मा को नष्ट करने के लिए न किया जाए। इस प्रकार संविधान में परिवर्तन और स्थिरता के बीच संतुलन स्थापित किया गया।
भारतीय संविधान की इन उपलब्धियों के बावजूद इसकी कुछ आलोचनाएँ भी की गई हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि संविधान अत्यधिक विस्तृत है। उनका तर्क है कि इतने अधिक अनुच्छेदों और प्रावधानों के कारण सामान्य नागरिक के लिए इसे समझना कठिन हो जाता है। इसके विपरीत समर्थकों का मत है कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में विस्तृत संविधान आवश्यक था, क्योंकि इससे अनेक संभावित विवादों का समाधान पहले से ही स्पष्ट कर दिया गया।
कुछ आलोचकों का यह भी मत है कि संविधान में केंद्र सरकार को राज्यों की अपेक्षा अधिक शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। विशेषकर आपातकालीन प्रावधानों और अनुच्छेद 356 के प्रयोग को लेकर समय-समय पर विवाद उत्पन्न हुए हैं। कई अवसरों पर राष्ट्रपति शासन के राजनीतिक उपयोग की आलोचना की गई। हालांकि बाद में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों और संवैधानिक परंपराओं ने इन शक्तियों के दुरुपयोग पर महत्वपूर्ण नियंत्रण स्थापित किया।
संविधान के संबंध में एक अन्य आलोचना यह भी रही कि इसमें विदेशी संविधानों से अनेक प्रावधान लिए गए हैं। कुछ प्रारंभिक विद्वानों ने इसे “उधार का संविधान” तक कहा। किंतु अधिकांश संवैधानिक विशेषज्ञ इस आलोचना से सहमत नहीं हैं। उनका मत है कि संविधान निर्माताओं ने किसी भी व्यवस्था की नकल नहीं की, बल्कि विश्व के सफल संवैधानिक अनुभवों को भारतीय आवश्यकताओं के अनुसार ढालकर अपनाया। वास्तव में यही भारतीय संविधान की सबसे बड़ी व्यावहारिक विशेषता है।
भारतीय संविधान के विषय में डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर का प्रसिद्ध कथन अत्यंत महत्वपूर्ण है कि “संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे तो वह सफल नहीं हो सकता; और यदि संविधान साधारण भी हो, किंतु उसे चलाने वाले लोग अच्छे हों, तो वह सफल सिद्ध होगा।” इस कथन से स्पष्ट होता है कि संविधान की सफलता केवल उसके प्रावधानों पर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति नागरिकों और शासकों की प्रतिबद्धता पर भी निर्भर करती है।
संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भी संविधान को स्वीकार करते समय कहा था कि यह संविधान भारत को लोकतांत्रिक दिशा प्रदान करेगा, किंतु उसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि शासन चलाने वाले लोग कितनी ईमानदारी और संवैधानिक मर्यादा के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं।
संवैधानिक विद्वान दुर्गादास बसु ने भारतीय संविधान को विश्व का सबसे व्यापक और संतुलित संविधान बताया है। उनके अनुसार इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय दोनों को समान महत्व दिया गया है। इसी प्रकार ग्रेनविल ऑस्टिन (Granville Austin) ने भारतीय संविधान को “सामाजिक क्रांति का दस्तावेज़ (A Document of Social Revolution)” कहा। उनके मत में भारतीय संविधान का मूल उद्देश्य केवल राजनीतिक लोकतंत्र की स्थापना नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और समान अवसरों पर आधारित समाज का निर्माण भी है।
यदि भारतीय संविधान की समस्त विशेषताओं का समग्र मूल्यांकन किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि यह संविधान केवल शासन की रूपरेखा प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि भारतीय राष्ट्र-निर्माण की दीर्घकालिक योजना भी प्रदान करता है। इसमें लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय, संघवाद, विधि का शासन, स्वतंत्र न्यायपालिका, नागरिक अधिकार, उत्तरदायी शासन और राष्ट्रीय एकता—इन सभी मूल्यों का संतुलित समावेश किया गया है। यही कारण है कि सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी भारतीय संविधान सफलतापूर्वक कार्य कर रहा है और समय-समय पर बदलती परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को विकसित भी कर रहा है।
निष्कर्ष
भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएँ यह सिद्ध करती हैं कि यह केवल शासन संचालन का विधिक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीय चेतना, लोकतांत्रिक आदर्शों और सामाजिक न्याय की व्यापक दृष्टि का सजीव प्रतीक है। संविधान ने भारत को राजनीतिक स्थिरता, लोकतांत्रिक निरंतरता, सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्रीय एकता का ऐसा आधार प्रदान किया है, जिसकी तुलना विश्व के बहुत कम संविधानों से की जा सकती है।
स्वतंत्रता, समानता, न्याय और बंधुत्व के जिन आदर्शों को संविधान की प्रस्तावना में व्यक्त किया गया है, वे आज भी भारतीय लोकतंत्र के मार्गदर्शक सिद्धांत हैं। संविधान की प्रमुख विशेषताओं का वास्तविक महत्व इसी में है कि उन्होंने भारत जैसे विशाल, बहुभाषी, बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश को एक सशक्त लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में संगठित और स्थिर बनाए रखा है।
इसी कारण भारतीय संविधान को केवल “देश का सर्वोच्च कानून” नहीं, बल्कि “भारतीय लोकतंत्र की आत्मा”, “राष्ट्रीय एकता का आधार” और “सामाजिक परिवर्तन का मार्गदर्शक दस्तावेज़” भी कहा जाता है।
