Unit – 2

Financial Administration: Concept of Budget, Preparation and Execution of the Budget,
Performance Budgeting, Legislative control, Accounts and Audit

वित्तीय प्रशासन (Financial Administration): बजट की अवधारणा, बजट का निर्माण एवं क्रियान्वयन, निष्पादन (परफॉर्मेंस) बजट, विधायिका का वित्तीय नियंत्रण, लेखांकन एवं लेखा-परीक्षण

अध्याय–1 : वित्तीय प्रशासन एवं बजट की अवधारणा (Financial Administration and Concept of Budget)

जब हम किसी भी सरकार के कार्यों को देखते हैं तो हमारे मन में सबसे पहले यह प्रश्न आता है कि सरकार सड़कें कैसे बनाती है, विद्यालयों का निर्माण कैसे करती है, अस्पतालों में डॉक्टरों का वेतन कहाँ से आता है, सेना के लिए हथियार कैसे खरीदे जाते हैं, किसानों को सब्सिडी, विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति, वृद्धों को पेंशन तथा गरीबों को विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का लाभ कैसे मिलता है? इन सभी प्रश्नों का उत्तर एक ही शब्द में छिपा है—वित्त (Finance)। यदि किसी सरकार के पास पर्याप्त धन नहीं होगा या उपलब्ध धन का उचित प्रबंधन नहीं होगा, तो वह जनता के लिए कोई भी योजना प्रभावी ढंग से लागू नहीं कर पाएगी। इसी कारण लोक प्रशासन में वित्तीय प्रशासन को शासन व्यवस्था की रीढ़ कहा जाता है।

सरल शब्दों में कहा जाए तो वित्तीय प्रशासन वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से सरकार सार्वजनिक धन (Public Money) को प्राप्त करती है, उसका सुरक्षित प्रबंधन करती है, आवश्यक योजनाओं पर खर्च करती है, खर्च का लेखा-जोखा रखती है तथा अंत में उसकी जाँच भी कराती है। अर्थात् सरकार के धन से जुड़ा प्रत्येक कार्य वित्तीय प्रशासन का भाग है।

यदि किसी परिवार का उदाहरण लें तो बात और भी स्पष्ट हो जाती है। मान लीजिए किसी परिवार की मासिक आय ₹50,000 है। परिवार का मुखिया पहले यह सोचता है कि घर का किराया कितना देना है, बच्चों की पढ़ाई पर कितना खर्च होगा, भोजन, बिजली, दवा, यात्रा तथा भविष्य की बचत के लिए कितना धन रखा जाएगा। यदि वह बिना योजना के पूरा पैसा खर्च कर दे, तो महीने के अंत तक आर्थिक संकट उत्पन्न हो जाएगा। ठीक यही स्थिति सरकार के साथ भी होती है। अंतर केवल इतना है कि परिवार कुछ लोगों का होता है, जबकि सरकार करोड़ों नागरिकों की आवश्यकताओं को पूरा करती है। इसलिए सरकार को धन के प्रबंधन में कहीं अधिक सावधानी और वैज्ञानिक योजना की आवश्यकता होती है। यही कार्य वित्तीय प्रशासन करता है।

लोक प्रशासन के विद्वानों का मत है कि किसी भी सरकार की वास्तविक क्षमता इस बात से नहीं मापी जाती कि उसने कितनी योजनाएँ घोषित की हैं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि उन योजनाओं को लागू करने के लिए उसने वित्तीय संसाधनों का कितना प्रभावी उपयोग किया है। इसलिए कहा जाता है कि अच्छा प्रशासन वही है जहाँ अच्छा वित्तीय प्रशासन हो।

वित्तीय प्रशासन का अर्थ

‘वित्तीय प्रशासन’ दो शब्दों से मिलकर बना है—वित्त और प्रशासन। वित्त का अर्थ धन तथा आर्थिक संसाधनों से है, जबकि प्रशासन का अर्थ उन संसाधनों का सुव्यवस्थित प्रबंधन करना है। इसलिए वित्तीय प्रशासन का तात्पर्य सार्वजनिक धन की प्राप्ति, संग्रह, वितरण, व्यय, नियंत्रण, लेखांकन और लेखा-परीक्षण की सम्पूर्ण प्रक्रिया से है।

अनेक विद्वानों ने वित्तीय प्रशासन को अलग-अलग शब्दों में परिभाषित किया है, परंतु सभी का सार एक ही है कि सरकार के धन का वैज्ञानिक, पारदर्शी तथा उत्तरदायित्वपूर्ण प्रबंधन ही वित्तीय प्रशासन है। आधुनिक युग में वित्तीय प्रशासन केवल धन खर्च करने का माध्यम नहीं, बल्कि विकास, सामाजिक न्याय और सुशासन प्राप्त करने का महत्वपूर्ण साधन बन चुका है।

वित्तीय प्रशासन की आवश्यकता क्यों पड़ी?

यदि सरकार बिना किसी योजना के धन खर्च करने लगे तो अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो जाएँगी। कहीं आवश्यकता से अधिक धन खर्च होगा तो कहीं आवश्यक योजनाएँ धन के अभाव में रुक जाएँगी। इससे भ्रष्टाचार, अपव्यय और आर्थिक संकट पैदा हो सकता है। इसलिए वित्तीय प्रशासन की आवश्यकता महसूस हुई।

वित्तीय प्रशासन यह सुनिश्चित करता है कि सरकार जितना धन प्राप्त करे, उसका उपयोग सोच-समझकर करे। पहले आवश्यक कार्यों पर खर्च किया जाए, फिर कम आवश्यक कार्यों पर। प्रत्येक रुपये का हिसाब रखा जाए और जनता को यह बताया जाए कि उसका धन कहाँ खर्च हुआ। इसी कारण वित्तीय प्रशासन को लोकतांत्रिक शासन की आत्मा भी कहा जाता है।

वित्तीय प्रशासन के प्रमुख उद्देश्य

वित्तीय प्रशासन का पहला उद्देश्य सार्वजनिक धन का सही उपयोग करना है। सरकार के पास उपलब्ध प्रत्येक रुपया जनता का धन होता है, इसलिए उसका उपयोग केवल जनहित में होना चाहिए।

दूसरा उद्देश्य विकास को गति देना है। सड़क, पुल, विद्यालय, अस्पताल, सिंचाई, बिजली तथा अन्य विकास कार्य तभी संभव हैं जब धन का सही प्रबंधन किया जाए।

तीसरा उद्देश्य वित्तीय अनुशासन बनाए रखना है। सरकार आवश्यकता से अधिक खर्च न करे तथा अनावश्यक ऋण लेने से बचे।

चौथा उद्देश्य भ्रष्टाचार और अपव्यय पर नियंत्रण स्थापित करना है। यदि धन का उचित लेखा-जोखा रखा जाएगा और नियमित जाँच होगी, तो वित्तीय अनियमितताओं की संभावना कम होगी।

पाँचवाँ उद्देश्य जनता के प्रति उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना है। लोकतंत्र में सरकार जनता के धन की संरक्षक होती है, इसलिए उसे प्रत्येक व्यय का उत्तर देना पड़ता है।

वित्तीय प्रशासन का महत्व

आधुनिक कल्याणकारी राज्य में वित्तीय प्रशासन का महत्व पहले की तुलना में बहुत अधिक बढ़ गया है। आज सरकार केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है। वह शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, विज्ञान, पर्यावरण, सामाजिक सुरक्षा, डिजिटल सेवाएँ और रोजगार जैसे अनेक क्षेत्रों में कार्य करती है। इन सभी कार्यों के लिए भारी मात्रा में धन की आवश्यकता होती है।

यदि वित्तीय प्रशासन प्रभावी होगा तो विकास योजनाएँ समय पर पूरी होंगी, सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ेगी तथा जनता का सरकार पर विश्वास मजबूत होगा। इसके विपरीत यदि वित्तीय प्रशासन कमजोर होगा तो योजनाएँ अधूरी रह जाएँगी, भ्रष्टाचार बढ़ेगा और आर्थिक संकट उत्पन्न हो सकता है।

बजट क्या है?

वित्तीय प्रशासन का सबसे महत्वपूर्ण आधार बजट है। जिस प्रकार कोई किसान खेती शुरू करने से पहले बीज, खाद और सिंचाई का हिसाब लगाता है, कोई व्यापारी व्यापार प्रारंभ करने से पहले आय और खर्च का अनुमान लगाता है तथा कोई परिवार महीने की आय-व्यय की योजना बनाता है, उसी प्रकार सरकार भी प्रत्येक वर्ष यह योजना बनाती है कि अगले वर्ष उसे कितना धन प्राप्त होगा और वह धन कहाँ-कहाँ खर्च किया जाएगा। इस वार्षिक योजना को बजट कहा जाता है।

सरल भाषा में कहा जाए तो बजट सरकार की आय और व्यय का वार्षिक अनुमान है।

लेकिन वास्तव में बजट इससे कहीं अधिक व्यापक है। बजट सरकार की आर्थिक सोच, विकास की दिशा, सामाजिक प्राथमिकताओं और भविष्य की योजनाओं का दर्पण होता है। किसी सरकार की प्राथमिकताओं को समझना हो तो उसके बजट को देखना पर्याप्त होता है।

बजट शब्द की उत्पत्ति

‘बजट’ शब्द फ्रांसीसी भाषा के Bougette (बूजेट) शब्द से बना है, जिसका अर्थ है चमड़े का थैला (Leather Bag)। पुराने समय में इंग्लैंड के वित्त मंत्री सरकारी आय-व्यय के दस्तावेज़ चमड़े के बैग में रखकर संसद में लाते थे। धीरे-धीरे उसी बैग के नाम से पूरा वित्तीय विवरण ही Budget कहलाने लगा।

आज बजट केवल दस्तावेज़ नहीं, बल्कि सरकार की वार्षिक आर्थिक नीति का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जाता है।

बजट क्यों आवश्यक है?

यदि सरकार के पास बजट न हो, तो वह यह तय ही नहीं कर पाएगी कि पहले किस योजना पर खर्च किया जाए। कोई विभाग आवश्यकता से अधिक धन माँग सकता है, जबकि किसी दूसरे महत्वपूर्ण विभाग को पर्याप्त धन नहीं मिल पाएगा। परिणामस्वरूप आर्थिक असंतुलन उत्पन्न होगा।

बजट सरकार को यह निर्णय लेने में सहायता करता है कि सीमित संसाधनों का उपयोग अधिकतम जनहित के लिए कैसे किया जाए। यह सरकार को अनावश्यक खर्च से बचाता है, विकास कार्यों को प्राथमिकता देता है तथा वित्तीय अनुशासन बनाए रखता है।

इसी कारण प्रसिद्ध विद्वानों ने कहा है कि “बजट केवल आय-व्यय का लेखा नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों का दर्पण होता है।”

अध्याय–2 : बजट का निर्माण (Preparation of Budget)

पिछले अध्याय में हमने समझा कि बजट सरकार की वार्षिक आय और व्यय की योजना है। अब प्रश्न यह उठता है कि सरकार इतना बड़ा बजट तैयार कैसे करती है? क्या वित्त मंत्री अकेले बैठकर यह तय कर देते हैं कि किस विभाग को कितना धन मिलेगा? क्या सभी मंत्रालय अपनी इच्छानुसार धन की माँग कर सकते हैं? क्या बजट केवल अनुमान होता है या इसके पीछे कोई निश्चित प्रक्रिया भी होती है?

इन सभी प्रश्नों का उत्तर बजट निर्माण (Preparation of Budget) की प्रक्रिया में छिपा हुआ है। वास्तव में बजट तैयार करना एक अत्यंत जटिल, वैज्ञानिक तथा उत्तरदायित्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसमें सरकार के लगभग सभी मंत्रालय, विभाग, वित्त मंत्रालय, मंत्रिपरिषद तथा अंततः संसद या विधानमंडल भाग लेते हैं। इसलिए बजट को किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरी शासन व्यवस्था के सामूहिक प्रयास का परिणाम माना जाता है।

बजट निर्माण का अर्थ

बजट निर्माण का अर्थ है आगामी वित्तीय वर्ष के लिए सरकार की आय और व्यय का यथार्थ अनुमान तैयार करना तथा उपलब्ध संसाधनों के आधार पर यह निर्णय लेना कि किस कार्य पर कितना धन खर्च किया जाएगा।

दूसरे शब्दों में, बजट निर्माण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा सरकार अपनी विकास योजनाओं, प्रशासनिक आवश्यकताओं तथा जनकल्याणकारी कार्यक्रमों के लिए वित्तीय संसाधनों का वैज्ञानिक नियोजन करती है।

यह प्रक्रिया केवल धन बाँटने का कार्य नहीं है, बल्कि यह सरकार की प्राथमिकताओं को निर्धारित करने की प्रक्रिया भी है। यदि सरकार शिक्षा पर अधिक धन खर्च करती है तो इसका अर्थ है कि शिक्षा उसकी प्राथमिकता है। यदि स्वास्थ्य, कृषि या रक्षा पर अधिक व्यय किया जाता है तो उससे सरकार की नीति और उद्देश्य स्पष्ट हो जाते हैं। इसलिए बजट निर्माण सरकार की आर्थिक एवं विकास संबंधी सोच को भी व्यक्त करता है।

बजट निर्माण की आवश्यकता

सरकार के पास संसाधन सीमित होते हैं, जबकि जनता की आवश्यकताएँ असीमित होती हैं। प्रत्येक विभाग चाहता है कि उसे अधिक से अधिक धन मिले। शिक्षा विभाग अधिक विद्यालय खोलना चाहता है, स्वास्थ्य विभाग नए अस्पताल बनाना चाहता है, कृषि विभाग किसानों को अधिक सहायता देना चाहता है, रक्षा मंत्रालय आधुनिक हथियार खरीदना चाहता है, जबकि सड़क परिवहन मंत्रालय नई सड़कें और पुल बनाना चाहता है।

यदि सभी विभागों की माँग पूरी कर दी जाए, तो सरकार के पास उपलब्ध धन पर्याप्त नहीं होगा। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि उपलब्ध संसाधनों का विवेकपूर्ण वितरण किया जाए। यही कार्य बजट निर्माण के माध्यम से किया जाता है।

बजट निर्माण की प्रमुख विशेषताएँ

एक अच्छा बजट कई विशेषताओं पर आधारित होता है। सबसे पहले उसमें वास्तविक आय और व्यय का अनुमान होना चाहिए। अनुमान न तो बहुत अधिक होना चाहिए और न ही बहुत कम।

दूसरी विशेषता यह है कि बजट जनहित पर आधारित होना चाहिए। सरकार को पहले उन योजनाओं पर धन देना चाहिए जिनसे अधिक से अधिक नागरिकों को लाभ मिले।

तीसरी विशेषता वित्तीय अनुशासन है। सरकार को उतना ही खर्च करना चाहिए जितना आवश्यक हो। अनावश्यक व्यय भविष्य में आर्थिक संकट उत्पन्न कर सकता है।

चौथी विशेषता पारदर्शिता है। जनता को यह जानकारी होनी चाहिए कि सरकार उसका धन कहाँ और किस उद्देश्य से खर्च कर रही है।

पाँचवीं विशेषता उत्तरदायित्व है। प्रत्येक विभाग को यह बताना पड़ता है कि उसे जो धन मिला था, उसका उपयोग किस प्रकार किया गया।

भारत में बजट निर्माण की प्रक्रिया

भारत में बजट निर्माण कई चरणों में पूरा होता है। यह कार्य लगभग छह से आठ महीने पहले ही प्रारम्भ हो जाता है।

सबसे पहले वित्त मंत्रालय सभी मंत्रालयों और विभागों को एक परिपत्र (Budget Circular) भेजता है। इस परिपत्र में निर्देश दिए जाते हैं कि प्रत्येक विभाग अगले वित्तीय वर्ष के लिए अपनी आय और व्यय का अनुमान तैयार करे।

इसके बाद प्रत्येक मंत्रालय अपने अधीन आने वाले सभी विभागों, कार्यालयों तथा संस्थाओं से जानकारी प्राप्त करता है। उदाहरण के लिए शिक्षा मंत्रालय देशभर के विभिन्न शिक्षा विभागों, विश्वविद्यालयों और अन्य संस्थानों से उनकी वित्तीय आवश्यकताओं का विवरण प्राप्त करता है।

प्रत्येक विभाग यह बताता है कि पिछले वर्ष उसे कितना धन मिला था, उसमें कितना खर्च हुआ, कौन-सी योजनाएँ अभी अधूरी हैं तथा अगले वर्ष किन नई योजनाओं को प्रारम्भ करना है। इन सभी सूचनाओं के आधार पर व्यय का अनुमान तैयार किया जाता है।

इसके साथ-साथ सरकार की संभावित आय का भी अनुमान लगाया जाता है। यह देखा जाता है कि करों, सीमा शुल्क, वस्तु एवं सेवा कर (GST), आयकर, निगम कर, सार्वजनिक उपक्रमों की आय, ऋण तथा अन्य स्रोतों से सरकार को कितना धन प्राप्त होने की संभावना है।

जब सभी मंत्रालयों के प्रस्ताव वित्त मंत्रालय को प्राप्त हो जाते हैं, तब उनका गहन अध्ययन किया जाता है। कई बार मंत्रालय जितना धन माँगते हैं, उतना देना संभव नहीं होता। ऐसी स्थिति में वित्त मंत्रालय संबंधित मंत्रालयों के साथ बैठक करता है और आवश्यक संशोधन किए जाते हैं।

इस चरण में यह भी देखा जाता है कि कौन-सी योजनाएँ राष्ट्रीय विकास के लिए अधिक महत्वपूर्ण हैं। जिन योजनाओं का लाभ अधिक लोगों तक पहुँचता है, उन्हें सामान्यतः प्राथमिकता दी जाती है।

मंत्रिपरिषद की भूमिका

जब वित्त मंत्रालय बजट का प्रारूप तैयार कर लेता है, तब उसे मंत्रिपरिषद के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।

प्रधानमंत्री तथा अन्य मंत्री पूरे बजट की समीक्षा करते हैं। यदि किसी योजना में परिवर्तन आवश्यक हो तो उसमें संशोधन किया जाता है।

मंत्रिपरिषद की स्वीकृति मिलने के बाद ही बजट संसद में प्रस्तुत किया जाता है।

इससे स्पष्ट होता है कि बजट केवल वित्त मंत्रालय का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि पूरी सरकार की सामूहिक नीति का प्रतिनिधित्व करता है।

संसद में बजट प्रस्तुत करना

भारत में सामान्यतः प्रत्येक वर्ष फरवरी महीने में वित्त मंत्री संसद के लोकसभा सदन में बजट प्रस्तुत करते हैं।

बजट प्रस्तुत होने के बाद सांसद उसका गहन अध्ययन करते हैं। विभिन्न मंत्रालयों की अनुदान माँगों पर विस्तृत चर्चा होती है। सांसद सरकार से प्रश्न पूछते हैं तथा यह जानने का प्रयास करते हैं कि जनता का धन किस प्रकार खर्च किया जाएगा।

यदि संसद किसी व्यय को स्वीकृति नहीं देती, तो सरकार उस मद में धन खर्च नहीं कर सकती। यही लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है कि सरकार जनता के धन का उपयोग संसद की अनुमति के बिना नहीं कर सकती।

बजट निर्माण में किन बातों का ध्यान रखा जाता है?

बजट बनाते समय सरकार अनेक महत्वपूर्ण बातों पर विचार करती है। सबसे पहले देश की आर्थिक स्थिति का मूल्यांकन किया जाता है। यदि अर्थव्यवस्था मजबूत है तो विकास योजनाओं पर अधिक खर्च किया जा सकता है।

दूसरा, महँगाई की स्थिति को देखा जाता है। यदि महँगाई अधिक है तो सरकार ऐसी नीतियाँ अपनाती है जिससे आम जनता पर अतिरिक्त बोझ न पड़े।

तीसरा, बेरोजगारी, गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा कृषि जैसे क्षेत्रों की आवश्यकताओं का अध्ययन किया जाता है।

चौथा, राष्ट्रीय सुरक्षा तथा आपातकालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाता है।

पाँचवाँ, भविष्य की विकास योजनाओं तथा अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिस्थितियों का भी विश्लेषण किया जाता है।

इस प्रकार बजट केवल लेखा-जोखा नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक परिस्थितियों का समग्र अध्ययन करने के बाद तैयार किया जाने वाला दस्तावेज़ है।

बजट निर्माण की चुनौतियाँ

बजट बनाना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही कठिन भी है। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सीमित संसाधनों में असीमित आवश्यकताओं को पूरा करने की होती है।

इसके अतिरिक्त महँगाई, प्राकृतिक आपदाएँ, युद्ध, महामारी, वैश्विक आर्थिक मंदी, कर संग्रह में कमी तथा अचानक बढ़ने वाले सरकारी खर्च भी बजट निर्माण को प्रभावित करते हैं।

आज के समय में जलवायु परिवर्तन, डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा सतत विकास (Sustainable Development) जैसे नए विषय भी बजट निर्माण का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।

अध्याय–3 : बजट का क्रियान्वयन (Execution of Budget)

पिछले अध्याय में हमने विस्तार से समझा कि सरकार किस प्रकार बजट तैयार करती है और संसद या विधानमंडल से उसकी स्वीकृति प्राप्त करती है। लेकिन केवल बजट बन जाने या संसद द्वारा पारित हो जाने से सरकारी योजनाएँ पूरी नहीं हो जातीं। वास्तविक कार्य तब शुरू होता है जब स्वीकृत धन को सही समय पर, सही विभाग तक पहुँचाया जाता है और उसका उपयोग निर्धारित उद्देश्य के लिए किया जाता है। इसी पूरी प्रक्रिया को बजट का क्रियान्वयन (Budget Execution) कहा जाता है।

सरल शब्दों में कहा जाए तो बजट का क्रियान्वयन वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत संसद द्वारा स्वीकृत धन को विभिन्न मंत्रालयों और विभागों को उपलब्ध कराया जाता है तथा उसका उपयोग निर्धारित नियमों और उद्देश्यों के अनुसार किया जाता है।

यदि बजट शरीर की योजना है, तो उसका क्रियान्वयन उस योजना को वास्तविक जीवन में लागू करने की प्रक्रिया है। उदाहरण के लिए यदि सरकार ने बजट में घोषणा की कि देश में 500 नए विद्यालय बनाए जाएँगे, तो केवल घोषणा करने से विद्यालय नहीं बन जाते। भूमि का चयन करना, धन जारी करना, भवन का निर्माण कराना, शिक्षक नियुक्त करना तथा विद्यालय को चालू करना—ये सभी कार्य बजट के क्रियान्वयन का हिस्सा हैं।

बजट का क्रियान्वयन क्यों आवश्यक है?

सरकार हर वर्ष लाखों करोड़ रुपये का बजट प्रस्तुत करती है। यदि इन पैसों का उपयोग सही ढंग से न किया जाए तो विकास योजनाएँ केवल कागज़ों तक सीमित रह जाएँगी। इसलिए बजट का प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक है।

बजट का सही क्रियान्वयन यह सुनिश्चित करता है कि—

  • जनता के धन का दुरुपयोग न हो।

  • योजनाएँ समय पर पूरी हों।

  • विकास कार्यों की गुणवत्ता बनी रहे।

  • सरकारी धन का अनावश्यक अपव्यय न हो।

  • प्रत्येक विभाग अपनी निर्धारित सीमा के भीतर ही खर्च करे।

  • जनता को योजनाओं का वास्तविक लाभ मिले।

इस प्रकार बजट का क्रियान्वयन वित्तीय प्रशासन का सबसे महत्वपूर्ण व्यावहारिक चरण माना जाता है।

बजट क्रियान्वयन की प्रक्रिया

बजट के क्रियान्वयन की शुरुआत संसद द्वारा बजट पारित होने के बाद होती है। संसद से स्वीकृति मिलने के पश्चात सरकार को विभिन्न मंत्रालयों एवं विभागों पर धन खर्च करने का कानूनी अधिकार प्राप्त हो जाता है।

इसके बाद वित्त मंत्रालय प्रत्येक मंत्रालय को स्वीकृत धन की जानकारी देता है। प्रत्येक मंत्रालय अपने अधीन आने वाले विभागों, कार्यालयों तथा परियोजनाओं के बीच धन का वितरण करता है। उदाहरण के लिए यदि स्वास्थ्य मंत्रालय को किसी वर्ष ₹1 लाख करोड़ का बजट मिला है, तो वह इस राशि को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, चिकित्सा शिक्षा, सरकारी अस्पतालों, टीकाकरण कार्यक्रमों तथा अन्य स्वास्थ्य योजनाओं में बाँटता है।

इसके बाद संबंधित विभाग अपने-अपने कार्यक्रमों के अनुसार धन का उपयोग करना प्रारम्भ करते हैं। प्रत्येक व्यय निर्धारित नियमों के अनुसार किया जाता है और प्रत्येक भुगतान का पूरा रिकॉर्ड रखा जाता है।

बजट क्रियान्वयन में वित्त मंत्रालय की भूमिका

वित्त मंत्रालय पूरे वित्तीय प्रशासन का केंद्रीय स्तंभ होता है। इसका मुख्य कार्य केवल बजट बनाना नहीं, बल्कि उसके सही क्रियान्वयन की निगरानी करना भी है।

वित्त मंत्रालय यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी विभाग अपनी स्वीकृत सीमा से अधिक खर्च न करे। यदि किसी विभाग को अतिरिक्त धन की आवश्यकता होती है, तो उसे वित्त मंत्रालय से अनुमति प्राप्त करनी होती है।

यदि वर्ष के मध्य में किसी नई योजना की आवश्यकता उत्पन्न हो जाए या प्राकृतिक आपदा जैसी असाधारण स्थिति आ जाए, तो वित्त मंत्रालय अतिरिक्त धन उपलब्ध कराने की व्यवस्था करता है। कई बार इसके लिए संसद से अनुपूरक अनुदान (Supplementary Grant) भी प्राप्त किया जाता है।

प्रशासनिक विभागों की भूमिका

प्रत्येक मंत्रालय और विभाग अपने-अपने क्षेत्र में बजट के क्रियान्वयन के लिए उत्तरदायी होता है।

उदाहरण के लिए—

यदि शिक्षा मंत्रालय को नए विद्यालय खोलने के लिए धन मिला है, तो उसका दायित्व है कि विद्यालय वास्तव में स्थापित हों।

यदि सड़क परिवहन मंत्रालय को राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण के लिए धन मिला है, तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि सड़कें समय पर और निर्धारित गुणवत्ता के अनुसार बनें।

यदि कृषि मंत्रालय को किसानों के लिए अनुदान मिला है, तो वह यह देखेगा कि सहायता राशि वास्तविक किसानों तक पहुँचे।

अर्थात् प्रत्येक विभाग केवल धन खर्च नहीं करता, बल्कि उस धन से प्राप्त परिणामों के लिए भी उत्तरदायी होता है।

कोषागार (Treasury) की भूमिका

कोषागार सरकार का वित्तीय भंडार होता है। सरकारी धन का अधिकांश लेन-देन कोषागार के माध्यम से किया जाता है।

जब किसी विभाग को भुगतान करना होता है, तो वह निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार बिल प्रस्तुत करता है। जाँच के बाद कोषागार भुगतान जारी करता है।

आज अधिकांश राज्यों तथा केंद्र सरकार में यह कार्य डिजिटल प्रणाली के माध्यम से किया जाता है। इससे भुगतान तेज़, सुरक्षित और पारदर्शी हो गया है।

व्यय पर नियंत्रण

सरकार केवल धन खर्च नहीं करती, बल्कि उस खर्च पर लगातार नियंत्रण भी रखती है।

व्यय नियंत्रण के कुछ प्रमुख उपाय हैं—

पहला, प्रत्येक विभाग को केवल स्वीकृत राशि तक ही खर्च करने की अनुमति होती है।

दूसरा, प्रत्येक खर्च का उचित अभिलेख रखा जाता है।

तीसरा, समय-समय पर विभागीय निरीक्षण किया जाता है।

चौथा, वित्त मंत्रालय नियमित रूप से व्यय की समीक्षा करता है।

पाँचवाँ, वर्ष के अंत में सभी खर्चों का लेखा तैयार किया जाता है।

इन उपायों से यह सुनिश्चित किया जाता है कि सार्वजनिक धन का उपयोग नियमों के अनुसार हो।

बजट क्रियान्वयन की प्रमुख समस्याएँ

यद्यपि सरकार विस्तृत योजना बनाकर बजट लागू करती है, फिर भी व्यवहार में अनेक कठिनाइयाँ सामने आती हैं।

कई बार विभागों को समय पर धन नहीं मिल पाता, जिससे परियोजनाएँ देर से शुरू होती हैं।

कभी-कभी प्रशासनिक लापरवाही के कारण स्वीकृत धन समय पर खर्च नहीं हो पाता और वर्ष के अंत में जल्दबाज़ी में खर्च किया जाता है। इससे कार्यों की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।

भ्रष्टाचार, लालफीताशाही, अनावश्यक विलंब, गलत योजना निर्माण, तकनीकी कमियाँ तथा अधिकारियों के बीच समन्वय का अभाव भी बजट क्रियान्वयन को प्रभावित करते हैं।

कुछ योजनाओं में धन खर्च तो हो जाता है, लेकिन अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं होते। इसका कारण कई बार कमजोर निगरानी तथा प्रभावी मूल्यांकन का अभाव होता है।

आधुनिक समय में बजट क्रियान्वयन

आज डिजिटल तकनीक ने बजट क्रियान्वयन को अधिक प्रभावी बना दिया है।

सरकार Public Financial Management System (PFMS), ई-ऑफिस, ऑनलाइन ट्रेजरी, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) तथा ई-प्रोक्योरमेंट जैसी आधुनिक प्रणालियों का उपयोग कर रही है।

इन व्यवस्थाओं से सरकारी धन सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में पहुँचता है। इससे बिचौलियों की भूमिका कम होती है, भ्रष्टाचार घटता है तथा पारदर्शिता बढ़ती है।

उदाहरण के लिए यदि किसी किसान को सरकारी सहायता राशि मिलनी है, तो अब वह राशि सीधे उसके बैंक खाते में भेजी जाती है। इससे धन के दुरुपयोग की संभावना बहुत कम हो जाती है।

एक सरल उदाहरण

मान लीजिए सरकार ने किसी जिले में 100 करोड़ रुपये की लागत से एक मेडिकल कॉलेज बनाने का निर्णय लिया।

बजट में इस परियोजना के लिए राशि स्वीकृत की जाती है।

इसके बाद स्वास्थ्य मंत्रालय उस धन को राज्य सरकार को उपलब्ध कराता है।

राज्य सरकार संबंधित निर्माण एजेंसी को धन देती है।

निर्माण कार्य प्रारम्भ होता है।

समय-समय पर अधिकारियों द्वारा निरीक्षण किया जाता है कि कार्य सही ढंग से चल रहा है या नहीं।

निर्माण पूरा होने पर लेखा तैयार किया जाता है तथा बाद में उसका ऑडिट किया जाता है।

यह पूरी प्रक्रिया बजट के प्रभावी क्रियान्वयन का उदाहरण है।

अध्याय–4 : निष्पादन बजट (Performance Budgeting / कार्य-निष्पादन बजट)

वित्तीय प्रशासन के अध्ययन में जब हम बजट की बात करते हैं, तो सबसे पहले यह प्रश्न सामने आता है कि क्या केवल धन खर्च कर देना ही सरकार की सफलता का प्रमाण है? यदि किसी सरकार ने किसी योजना पर हजारों करोड़ रुपये खर्च कर दिए, लेकिन जनता को उसका लाभ नहीं मिला, तो क्या उस खर्च को सफल कहा जा सकता है? स्पष्ट रूप से उत्तर होगा—नहीं।

यही प्रश्न बीसवीं शताब्दी के मध्य में दुनिया के अनेक देशों के सामने भी खड़ा हुआ। सरकारें लगातार बजट का आकार बढ़ा रही थीं, सार्वजनिक व्यय में वृद्धि हो रही थी, लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि खर्च किए गए धन से वास्तव में क्या उपलब्धियाँ प्राप्त हुईं। इस समस्या ने प्रशासनिक विशेषज्ञों को एक नई सोच विकसित करने के लिए प्रेरित किया। इस सोच का परिणाम था निष्पादन बजट (Performance Budgeting)

निष्पादन बजट आधुनिक वित्तीय प्रशासन की ऐसी प्रणाली है जिसमें केवल यह नहीं देखा जाता कि सरकार ने कितना धन खर्च किया, बल्कि यह भी देखा जाता है कि उस धन से क्या कार्य हुआ, कितने लक्ष्य प्राप्त हुए और जनता को कितना लाभ मिला। दूसरे शब्दों में, इस प्रणाली में धन (Money) से अधिक परिणाम (Results) को महत्व दिया जाता है।

यदि पारंपरिक बजट यह बताता है कि “कितना पैसा खर्च होगा”, तो निष्पादन बजट यह बताता है कि “उस पैसे से क्या उपलब्धि प्राप्त होगी।”

निष्पादन बजट का अर्थ

सरल भाषा में कहा जाए तो निष्पादन बजट वह बजट प्रणाली है जिसमें सरकारी व्यय को उसके कार्यों, उद्देश्यों तथा प्राप्त परिणामों से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है।

उदाहरण के लिए यदि सरकार स्वास्थ्य विभाग को ₹5,000 करोड़ देती है, तो पारंपरिक बजट केवल यह बताएगा कि स्वास्थ्य विभाग को ₹5,000 करोड़ मिले हैं।

लेकिन निष्पादन बजट यह बताएगा कि—

  • इस राशि से 100 नए अस्पताल बनाए जाएँगे।

  • 10,000 डॉक्टरों की नियुक्ति होगी।

  • 50 लाख बच्चों का टीकाकरण किया जाएगा।

  • मातृ मृत्यु दर में कमी लाई जाएगी।

  • ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार किया जाएगा।

अर्थात् निष्पादन बजट में धन और उपलब्धियों के बीच सीधा संबंध स्थापित किया जाता है।

निष्पादन बजट की आवश्यकता क्यों पड़ी?

स्वतंत्रता के बाद अधिकांश देशों ने विकास योजनाओं पर भारी खर्च करना शुरू किया। शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, कृषि, सड़क, बिजली तथा सामाजिक कल्याण पर लगातार सरकारी व्यय बढ़ता गया।

लेकिन एक बड़ी समस्या सामने आई।

सरकार यह तो बता रही थी कि उसने कितना धन खर्च किया, परन्तु यह नहीं बता पा रही थी कि उस खर्च से वास्तव में कितना विकास हुआ।

कई परियोजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च हुए, फिर भी वे समय पर पूरी नहीं हुईं। कई योजनाएँ कागज़ों पर सफल दिखाई गईं, लेकिन जनता तक उनका लाभ नहीं पहुँचा।

ऐसी स्थिति में प्रशासनिक विशेषज्ञों ने कहा कि सरकारी सफलता का मापदंड केवल खर्च नहीं, बल्कि उपलब्धि (Achievement) होना चाहिए।

यहीं से निष्पादन बजट की अवधारणा का विकास हुआ।

निष्पादन बजट की परिभाषा

निष्पादन बजट वह वित्तीय प्रणाली है जिसमें प्रत्येक कार्यक्रम के लिए यह स्पष्ट किया जाता है कि—

  • कितना धन खर्च होगा,

  • किस उद्देश्य के लिए खर्च होगा,

  • कौन-सा कार्य किया जाएगा,

  • कितने परिणाम प्राप्त होंगे,

  • और उन परिणामों का मूल्यांकन कैसे किया जाएगा।

इस प्रकार निष्पादन बजट धन, कार्य और परिणाम—इन तीनों को एक साथ जोड़ता है।

निष्पादन बजट की प्रमुख विशेषताएँ

निष्पादन बजट की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें कार्य (Work) को केंद्र में रखा जाता है।

दूसरी विशेषता यह है कि प्रत्येक योजना के स्पष्ट उद्देश्य निर्धारित किए जाते हैं।

तीसरी विशेषता यह है कि प्रत्येक कार्यक्रम के परिणामों का मूल्यांकन किया जाता है।

चौथी विशेषता यह है कि इसमें अधिकारियों की जवाबदेही निश्चित होती है। यदि लक्ष्य पूरे नहीं होते, तो कारणों की समीक्षा की जाती है।

पाँचवीं विशेषता यह है कि इसमें केवल धन खर्च करने पर नहीं, बल्कि धन के प्रभावी उपयोग पर बल दिया जाता है।

एक सरल उदाहरण

मान लीजिए सरकार ने शिक्षा विभाग को ₹100 करोड़ दिए।

पारंपरिक बजट क्या बताएगा?

  • वेतन – ₹40 करोड़

  • भवन निर्माण – ₹30 करोड़

  • पुस्तकें – ₹20 करोड़

  • अन्य खर्च – ₹10 करोड़

यहीं तक जानकारी समाप्त हो जाती है।

लेकिन निष्पादन बजट इससे आगे जाकर बताएगा—

  • 50 नए विद्यालय स्थापित होंगे।

  • 500 नए शिक्षक नियुक्त होंगे।

  • 25,000 विद्यार्थियों का नामांकन होगा।

  • विद्यालय छोड़ने वाले बच्चों की संख्या 10% कम होगी।

  • परीक्षा परिणामों में सुधार होगा।

यही निष्पादन बजट की सबसे बड़ी विशेषता है।

निष्पादन बजट के उद्देश्य

निष्पादन बजट का सबसे पहला उद्देश्य सरकारी धन का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करना है।

दूसरा उद्देश्य प्रशासनिक कार्यकुशलता बढ़ाना है।

तीसरा उद्देश्य जनता के प्रति उत्तरदायित्व स्थापित करना है।

चौथा उद्देश्य योजनाओं की सफलता का वैज्ञानिक मूल्यांकन करना है।

पाँचवाँ उद्देश्य अनावश्यक एवं अपव्ययी खर्च को रोकना है।

छठा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ नागरिकों तक पहुँचे।

निष्पादन बजट कैसे तैयार किया जाता है?

निष्पादन बजट तैयार करने के लिए सबसे पहले प्रत्येक विभाग अपने उद्देश्यों को स्पष्ट करता है।

इसके बाद उन उद्देश्यों को छोटे-छोटे कार्यक्रमों में विभाजित किया जाता है।

प्रत्येक कार्यक्रम के लिए आवश्यक धन का अनुमान लगाया जाता है।

फिर यह निर्धारित किया जाता है कि उस धन से कितने कार्य पूरे होंगे।

इसके बाद प्रत्येक कार्यक्रम के लिए मापदंड (Performance Indicators) निर्धारित किए जाते हैं।

वर्ष समाप्त होने पर इन मापदंडों के आधार पर मूल्यांकन किया जाता है कि लक्ष्य कितने प्रतिशत पूरे हुए।

इस प्रकार निष्पादन बजट केवल योजना नहीं, बल्कि योजना + कार्य + मूल्यांकन—तीनों का संयुक्त रूप है।

निष्पादन बजट के लाभ

निष्पादन बजट सरकारी योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाता है।

इससे अधिकारियों की जवाबदेही बढ़ती है।

सार्वजनिक धन का दुरुपयोग कम होता है।

सरकार की प्राथमिकताएँ स्पष्ट होती हैं।

योजनाओं की सफलता को आसानी से मापा जा सकता है।

विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होता है।

जनता को यह जानकारी मिलती है कि उनके कर का पैसा वास्तव में कहाँ और किस परिणाम के लिए खर्च किया गया।

इससे प्रशासन अधिक पारदर्शी तथा उत्तरदायी बनता है।

निष्पादन बजट की सीमाएँ

यद्यपि यह प्रणाली अत्यंत उपयोगी है, फिर भी इसके सामने कुछ कठिनाइयाँ हैं।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि सभी कार्यों के परिणामों को मापना आसान नहीं होता।

उदाहरण के लिए शिक्षा, संस्कृति, सामाजिक जागरूकता तथा पर्यावरण संरक्षण जैसे क्षेत्रों में उपलब्धियों का सटीक मापन कठिन होता है।

दूसरी समस्या यह है कि इस प्रणाली के लिए प्रशिक्षित अधिकारियों की आवश्यकता होती है।

तीसरी समस्या यह है कि विस्तृत आँकड़े एकत्र करना समय और संसाधनों की दृष्टि से महँगा हो सकता है।

चौथी समस्या यह है कि कई बार विभाग केवल लक्ष्य पूरे करने पर ध्यान देते हैं और गुणवत्ता की उपेक्षा कर देते हैं।

भारत में निष्पादन बजट

भारत में निष्पादन बजट की अवधारणा को प्रशासनिक सुधारों के बाद विशेष महत्व मिला।

विशेषकर 1968 से केंद्र सरकार ने अनेक विभागों में इस प्रणाली का प्रयोग प्रारम्भ किया।

बाद में योजना आयोग (अब नीति आयोग), वित्त मंत्रालय तथा प्रशासनिक सुधार आयोगों ने भी इस प्रणाली को प्रोत्साहित किया।

आज अनेक मंत्रालय अपने कार्यक्रमों के लिए परिणाम आधारित योजना (Outcome-oriented Planning) अपनाते हैं।

डिजिटल तकनीक, ई-गवर्नेंस तथा ऑनलाइन निगरानी प्रणालियों ने निष्पादन बजट को और अधिक प्रभावी बना दिया है।

आधुनिक समय में निष्पादन बजट का महत्व

आज सरकार केवल यह नहीं पूछती कि “कितना खर्च हुआ?”, बल्कि यह भी पूछती है—

क्या लक्ष्य पूरे हुए?

जनता को क्या लाभ मिला?

गरीबी कितनी कम हुई?

रोजगार कितना बढ़ा?

स्वास्थ्य सेवाओं में कितना सुधार हुआ?

यही आधुनिक वित्तीय प्रशासन की सोच है।

आज लगभग सभी विकसित देशों में परिणाम-आधारित प्रशासन (Result Based Management) तथा निष्पादन बजट को सुशासन का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।

अध्याय–5 : विधायिका का वित्तीय नियंत्रण (Legislative Control over Finance)

लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि सरकार जनता के धन की मालिक नहीं, बल्कि उसकी संरक्षक (Trustee) होती है। सरकार जो भी धन खर्च करती है, वह जनता द्वारा दिए गए करों (Taxes), शुल्कों, सरकारी उपक्रमों की आय, ऋण तथा अन्य स्रोतों से प्राप्त होता है। इसलिए सरकार को यह अधिकार नहीं है कि वह जनता के धन का उपयोग अपनी इच्छा के अनुसार करे। लोकतंत्र में सार्वजनिक धन पर अंतिम अधिकार जनता के प्रतिनिधियों का होता है, जो संसद या विधानमंडल के माध्यम से अपनी शक्ति का प्रयोग करते हैं। इसी कारण सरकार के प्रत्येक वित्तीय कार्य पर विधायिका का नियंत्रण स्थापित किया गया है।

यदि सरकार पर कोई वित्तीय नियंत्रण न हो, तो वह मनमाने ढंग से धन खर्च कर सकती है। इससे भ्रष्टाचार, अपव्यय, वित्तीय अनियमितताएँ और आर्थिक संकट उत्पन्न हो सकते हैं। इसलिए लोकतांत्रिक शासन में यह व्यवस्था की गई है कि सरकार बिना संसद या विधानमंडल की अनुमति के न तो नया कर लगा सकती है और न ही सार्वजनिक धन खर्च कर सकती है। यही व्यवस्था विधायिका का वित्तीय नियंत्रण (Legislative Control over Finance) कहलाती है।

विधायिका का वित्तीय नियंत्रण क्या है?

सरल शब्दों में कहा जाए तो विधायिका का वित्तीय नियंत्रण वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से संसद या विधानमंडल सरकार की आय, व्यय, कर व्यवस्था तथा सार्वजनिक धन के उपयोग की जाँच, समीक्षा और निगरानी करता है।

इसका उद्देश्य केवल सरकार को नियंत्रित करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि जनता का धन केवल जनहित में, कानून के अनुसार तथा पूरी पारदर्शिता के साथ खर्च किया जाए।

दूसरे शब्दों में, विधायिका सरकार से यह प्रश्न पूछती है—

  • आपने जनता से कितना धन प्राप्त किया?

  • यह धन कहाँ-कहाँ खर्च किया?

  • क्या खर्च विधायिका की अनुमति के अनुसार हुआ?

  • क्या योजनाओं से जनता को लाभ मिला?

  • कहीं धन का दुरुपयोग तो नहीं हुआ?

इन प्रश्नों के उत्तर देने की जिम्मेदारी सरकार की होती है।

लोकतंत्र में वित्तीय नियंत्रण की आवश्यकता

लोकतंत्र में सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी होती है। जनता चुनाव के माध्यम से अपने प्रतिनिधियों को संसद में भेजती है। ये प्रतिनिधि जनता की ओर से सरकार के कार्यों की समीक्षा करते हैं।

यदि विधायिका सरकार के वित्तीय कार्यों पर नियंत्रण न रखे, तो निम्न समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं—

सरकारी धन का दुरुपयोग हो सकता है।

भ्रष्टाचार और अनियमितताएँ बढ़ सकती हैं।

सरकार अनावश्यक योजनाओं पर अधिक खर्च कर सकती है।

विकास कार्य प्रभावित हो सकते हैं।

जनता का सरकार पर विश्वास कम हो सकता है।

इसी कारण लोकतांत्रिक शासन में वित्तीय नियंत्रण को अत्यंत आवश्यक माना जाता है।

विधायिका के वित्तीय नियंत्रण के उद्देश्य

विधायिका का पहला उद्देश्य सार्वजनिक धन की सुरक्षा करना है।

दूसरा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकार जनता के धन का उपयोग केवल स्वीकृत उद्देश्यों के लिए करे।

तीसरा उद्देश्य सरकार को वित्तीय मामलों में उत्तरदायी बनाना है।

चौथा उद्देश्य भ्रष्टाचार और अनावश्यक खर्च को रोकना है।

पाँचवाँ उद्देश्य प्रशासन में पारदर्शिता और ईमानदारी बनाए रखना है।

छठा उद्देश्य सरकारी योजनाओं की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करना है।

विधायिका वित्तीय नियंत्रण कैसे करती है?

विधायिका सरकार पर कई प्रकार से वित्तीय नियंत्रण रखती है। यह नियंत्रण केवल बजट पारित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे वर्ष चलता रहता है।

(1) बजट पर चर्चा

जब सरकार बजट प्रस्तुत करती है, तो संसद के दोनों सदनों में उस पर विस्तृत चर्चा होती है।

सांसद यह जानने का प्रयास करते हैं कि सरकार किस क्षेत्र पर कितना धन खर्च करना चाहती है और उसका औचित्य क्या है।

यदि किसी योजना पर अनावश्यक व्यय प्रस्तावित हो, तो उस पर प्रश्न उठाए जाते हैं।

इस चर्चा के कारण सरकार को अपने प्रत्येक वित्तीय निर्णय का औचित्य स्पष्ट करना पड़ता है।

(2) अनुदानों की माँग (Demands for Grants)

प्रत्येक मंत्रालय संसद से अलग-अलग धन की माँग करता है।

उदाहरण के लिए—

  • शिक्षा मंत्रालय

  • स्वास्थ्य मंत्रालय

  • कृषि मंत्रालय

  • रक्षा मंत्रालय

सभी अपने-अपने कार्यों के लिए संसद से धन की अनुमति माँगते हैं।

लोकसभा इन माँगों पर चर्चा करती है और आवश्यक होने पर उनमें कटौती भी कर सकती है।

जब तक लोकसभा स्वीकृति नहीं देती, तब तक सरकार वह धन खर्च नहीं कर सकती।

(3) कटौती प्रस्ताव (Cut Motions)

यदि सांसद किसी मंत्रालय के कार्य से असंतुष्ट हों, तो वे कटौती प्रस्ताव प्रस्तुत कर सकते हैं।

कटौती प्रस्ताव का उद्देश्य केवल धन कम करना नहीं होता, बल्कि सरकार की नीति की आलोचना करना भी होता है।

इसके माध्यम से सरकार को अपनी कार्यप्रणाली स्पष्ट करनी पड़ती है।

(4) विनियोग विधेयक (Appropriation Bill)

जब संसद विभिन्न मंत्रालयों के लिए धन स्वीकृत कर देती है, तब सरकार एक विनियोग विधेयक प्रस्तुत करती है।

इस विधेयक के पारित होने के बाद ही सरकार भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) से धन निकाल सकती है।

यदि विनियोग विधेयक पारित न हो, तो सरकार एक भी रुपया खर्च नहीं कर सकती।

इसलिए इसे वित्तीय नियंत्रण का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी साधन माना जाता है।

(5) वित्त विधेयक (Finance Bill)

यदि सरकार कोई नया कर लगाना चाहती है या किसी पुराने कर में परिवर्तन करना चाहती है, तो उसे वित्त विधेयक प्रस्तुत करना पड़ता है।

संसद की स्वीकृति के बिना कोई नया कर लागू नहीं किया जा सकता।

यह व्यवस्था जनता को मनमाने करों से सुरक्षा प्रदान करती है।

संसदीय समितियों की भूमिका

संसद में प्रत्येक वित्तीय विषय पर विस्तृत चर्चा करना हमेशा संभव नहीं होता। इसलिए कुछ विशेष समितियों का गठन किया गया है जो पूरे वर्ष सरकार के वित्तीय कार्यों की गहराई से जाँच करती हैं।

लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee – PAC)

लोक लेखा समिति संसद की सबसे महत्वपूर्ण वित्तीय समिति मानी जाती है।

यह नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टों का अध्ययन करती है।

यदि किसी विभाग में धन का दुरुपयोग हुआ हो या नियमों का उल्लंघन हुआ हो, तो PAC उसकी जाँच करती है और सरकार से जवाब माँगती है।

इस समिति का मुख्य उद्देश्य यह देखना है कि संसद द्वारा स्वीकृत धन का उपयोग सही ढंग से हुआ या नहीं।

प्राक्कलन समिति (Estimates Committee)

इस समिति का कार्य भविष्य के सरकारी व्यय का अध्ययन करना तथा यह सुझाव देना है कि सरकारी खर्च को किस प्रकार अधिक मितव्ययी और प्रभावी बनाया जा सकता है।

यह समिति सरकारी योजनाओं की कार्यकुशलता का भी मूल्यांकन करती है।

लोक उपक्रम समिति (Committee on Public Undertakings)

यह समिति सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों जैसे सरकारी कंपनियों और निगमों के कार्यों की समीक्षा करती है।

यह देखती है कि सरकारी कंपनियाँ जनता के धन का उचित उपयोग कर रही हैं या नहीं।

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की भूमिका

विधायिका के वित्तीय नियंत्रण में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (Comptroller and Auditor General – CAG) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

CAG सरकार के विभिन्न विभागों के खर्च का स्वतंत्र लेखा-परीक्षण करता है।

यदि किसी विभाग में अनियमितता, अपव्यय, नियमों का उल्लंघन या वित्तीय गड़बड़ी मिलती है, तो उसकी रिपोर्ट संसद के समक्ष प्रस्तुत की जाती है।

इसके बाद संसद की लोक लेखा समिति उस रिपोर्ट पर विचार करती है और सरकार से स्पष्टीकरण माँगती है।

इसी कारण CAG को सार्वजनिक धन का प्रहरी (Watchdog of Public Finance) भी कहा जाता है।

विधायिका के वित्तीय नियंत्रण का महत्व

विधायिका का वित्तीय नियंत्रण लोकतंत्र की सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक है।

इससे सरकार की वित्तीय जवाबदेही बनी रहती है।

सार्वजनिक धन की सुरक्षा होती है।

भ्रष्टाचार की संभावना कम होती है।

सरकारी योजनाओं की गुणवत्ता में सुधार होता है।

जनता का सरकार पर विश्वास मजबूत होता है।

प्रशासन अधिक पारदर्शी और उत्तरदायी बनता है।

विधायिका के वित्तीय नियंत्रण की सीमाएँ

यद्यपि यह व्यवस्था अत्यंत प्रभावी है, फिर भी इसकी कुछ सीमाएँ हैं।

आज सरकार का कार्यक्षेत्र बहुत व्यापक हो गया है। प्रत्येक खर्च की विस्तार से जाँच करना संसद के लिए संभव नहीं होता।

कई बार राजनीतिक दलों के बहुमत के कारण सरकार की आलोचना प्रभावी ढंग से नहीं हो पाती।

तकनीकी विषयों में सभी सांसद विशेषज्ञ नहीं होते, जिससे कई बार गहन वित्तीय विश्लेषण कठिन हो जाता है।

फिर भी संसदीय समितियाँ, CAG तथा संसदीय बहसें इस कमी को काफी हद तक दूर कर देती हैं।

अध्याय–6 : लेखांकन एवं लेखा-परीक्षण (Accounts and Audit)

जब कोई सरकार किसी योजना पर धन खर्च करती है, तो केवल धन खर्च कर देना ही पर्याप्त नहीं होता। लोकतांत्रिक शासन में यह जानना भी उतना ही आवश्यक है कि कितना धन खर्च हुआ, किस कार्य पर खर्च हुआ, किस अधिकारी ने खर्च किया, क्या वह खर्च नियमों के अनुसार था, और क्या उस खर्च से जनता को वास्तविक लाभ मिला। यदि इन प्रश्नों के उत्तर उपलब्ध न हों, तो सरकारी वित्तीय व्यवस्था पर जनता का विश्वास समाप्त हो जाएगा। इसी कारण वित्तीय प्रशासन में लेखांकन (Accounts) और लेखा-परीक्षण (Audit) को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।

यदि बजट सरकार की आर्थिक योजना है और बजट का क्रियान्वयन उस योजना को लागू करने की प्रक्रिया है, तो लेखांकन और लेखा-परीक्षण उस पूरी प्रक्रिया की जाँच और सत्यापन का कार्य करते हैं। इन्हीं के कारण यह सुनिश्चित होता है कि सार्वजनिक धन सुरक्षित रहे, उसका दुरुपयोग न हो और सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी बनी रहे।

लेखांकन (Accounts) क्या है?

सरल शब्दों में लेखांकन का अर्थ है—सरकार की आय और व्यय का व्यवस्थित, क्रमबद्ध और प्रमाणिक अभिलेख (रिकॉर्ड) तैयार करना।

जब सरकार किसी स्रोत से धन प्राप्त करती है या किसी योजना पर धन खर्च करती है, तो उसका पूरा विवरण सरकारी अभिलेखों में दर्ज किया जाता है। इस प्रक्रिया को ही लेखांकन कहते हैं।

उदाहरण के लिए यदि सरकार ने किसी जिले में विद्यालय निर्माण के लिए 50 करोड़ रुपये स्वीकृत किए, तो लेखांकन में यह दर्ज होगा कि धन कब जारी हुआ, किस विभाग को मिला, किस अधिकारी ने भुगतान किया, कितना खर्च हुआ और कितना धन शेष बचा। इस प्रकार लेखांकन सरकार की वित्तीय गतिविधियों का पूरा इतिहास प्रस्तुत करता है।

लेखांकन केवल हिसाब-किताब लिखने का कार्य नहीं है, बल्कि यह वित्तीय अनुशासन, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व का आधार है।

लेखांकन की आवश्यकता

लेखांकन की आवश्यकता इसलिए होती है क्योंकि सरकार प्रतिदिन हजारों करोड़ रुपये का लेन-देन करती है। यदि इन सभी लेन-देन का व्यवस्थित रिकॉर्ड न रखा जाए, तो यह पता लगाना असंभव हो जाएगा कि धन कहाँ से आया और कहाँ खर्च हुआ।

लेखांकन के माध्यम से सरकार भविष्य की योजनाएँ भी बनाती है। यदि किसी विभाग का पिछले वर्षों का व्यय ज्ञात होगा, तभी अगले वर्ष के बजट का सही अनुमान लगाया जा सकेगा। इसलिए लेखांकन केवल वर्तमान का नहीं, बल्कि भविष्य की वित्तीय योजना का भी आधार है।

लेखांकन के उद्देश्य

लेखांकन का पहला उद्देश्य सरकार की आय और व्यय का सही रिकॉर्ड रखना है।

दूसरा उद्देश्य सार्वजनिक धन की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

तीसरा उद्देश्य वित्तीय निर्णयों के लिए विश्वसनीय आँकड़े उपलब्ध कराना है।

चौथा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक भुगतान का प्रमाण उपलब्ध हो।

पाँचवाँ उद्देश्य लेखा-परीक्षण (Audit) के लिए आवश्यक आधार तैयार करना है।

एक सरल उदाहरण

मान लीजिए किसी ग्राम पंचायत को सड़क निर्माण के लिए 2 करोड़ रुपये प्राप्त हुए।

यदि लेखांकन सही ढंग से किया जाएगा, तो रिकॉर्ड में यह स्पष्ट होगा कि—

  • धन किस तिथि को प्राप्त हुआ।

  • किस मद में खर्च किया गया।

  • किस ठेकेदार को भुगतान हुआ।

  • कितना कार्य पूरा हुआ।

  • कितना धन शेष बचा।

यदि भविष्य में कोई जाँच होती है, तो यही रिकॉर्ड सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण बनता है।

लेखांकन की विशेषताएँ

एक अच्छी लेखांकन प्रणाली में सटीकता, स्पष्टता, पारदर्शिता और समयबद्धता होनी चाहिए।

प्रत्येक लेन-देन का दस्तावेज़ होना चाहिए।

सभी अभिलेख निर्धारित नियमों के अनुसार सुरक्षित रखे जाने चाहिए।

लेखांकन ऐसी भाषा और पद्धति में होना चाहिए जिसे भविष्य में आसानी से समझा जा सके।

लेखा-परीक्षण (Audit) क्या है?

यदि लेखांकन वित्तीय रिकॉर्ड तैयार करता है, तो लेखा-परीक्षण (Audit) उन रिकॉर्डों की जाँच करता है।

सरल भाषा में लेखा-परीक्षण वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से यह जाँचा जाता है कि सरकारी धन का उपयोग नियमों, कानूनों और स्वीकृत उद्देश्यों के अनुसार किया गया या नहीं।

ऑडिट का उद्देश्य केवल गलती ढूँढ़ना नहीं होता, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी होता है कि सार्वजनिक धन सुरक्षित रहे, उसका दुरुपयोग न हो और भविष्य में प्रशासन अधिक उत्तरदायी बने।

दूसरे शब्दों में—

लेखांकन बताता है कि क्या हुआ।

लेखा-परीक्षण बताता है कि जो हुआ, वह सही था या नहीं।

लेखा-परीक्षण की आवश्यकता

यदि ऑडिट न हो, तो अधिकारी अपनी इच्छानुसार सरकारी धन खर्च कर सकते हैं।

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसका धन कहाँ खर्च हुआ।

ऑडिट इसी अधिकार की रक्षा करता है।

यह भ्रष्टाचार, फर्जी भुगतान, अनावश्यक खर्च, नियमों के उल्लंघन तथा वित्तीय अनियमितताओं को रोकने का सबसे प्रभावी माध्यम है।

लेखा-परीक्षण के उद्देश्य

लेखा-परीक्षण का मुख्य उद्देश्य यह देखना है कि—

सरकारी धन का उपयोग स्वीकृत उद्देश्य के लिए हुआ या नहीं।

खर्च वित्तीय नियमों के अनुसार हुआ या नहीं।

कहीं अनावश्यक व्यय तो नहीं किया गया।

कहीं भ्रष्टाचार या वित्तीय गड़बड़ी तो नहीं हुई।

क्या सरकारी योजनाओं से अपेक्षित परिणाम प्राप्त हुए।

लेखा-परीक्षण के प्रमुख प्रकार

1. वित्तीय लेखा-परीक्षण (Financial Audit)

इसमें यह जाँच की जाती है कि आय और व्यय का रिकॉर्ड सही है या नहीं।

2. अनुपालन लेखा-परीक्षण (Compliance Audit)

इसमें देखा जाता है कि सरकारी विभागों ने कानून, नियम तथा सरकारी निर्देशों का पालन किया या नहीं।

3. कार्य-निष्पादन लेखा-परीक्षण (Performance Audit)

इसमें यह जाँचा जाता है कि खर्च किए गए धन से वास्तव में कितनी उपलब्धियाँ प्राप्त हुईं।

यही आधुनिक प्रशासन में सबसे महत्वपूर्ण ऑडिट माना जाता है।

भारत में लेखा-परीक्षण की व्यवस्था

भारत में सरकारी खातों की स्वतंत्र जाँच का कार्य नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (Comptroller and Auditor General – CAG) करते हैं।

CAG का पद भारतीय संविधान द्वारा स्थापित एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है।

इसका उद्देश्य सरकार के वित्तीय कार्यों की निष्पक्ष जाँच करना है।

CAG सरकार के अधीन कार्य नहीं करता, बल्कि वह स्वतंत्र रूप से संसद के प्रति उत्तरदायी होता है।

इसी कारण उसकी रिपोर्टों को अत्यधिक विश्वसनीय माना जाता है।

CAG की प्रमुख भूमिकाएँ

CAG सरकारी विभागों, मंत्रालयों, सार्वजनिक उपक्रमों तथा अन्य सरकारी संस्थाओं के खातों का परीक्षण करता है।

वह यह देखता है कि सार्वजनिक धन का उपयोग नियमों के अनुसार हुआ या नहीं।

यदि किसी विभाग में वित्तीय गड़बड़ी मिलती है, तो वह अपनी रिपोर्ट संसद को भेजता है।

इसके बाद संसद की लोक लेखा समिति (PAC) उस रिपोर्ट की समीक्षा करती है और सरकार से स्पष्टीकरण माँगती है।

इस प्रकार CAG लोकतंत्र में वित्तीय उत्तरदायित्व का सबसे महत्वपूर्ण प्रहरी माना जाता है।

आधुनिक समय में डिजिटल लेखांकन

आज सूचना प्रौद्योगिकी ने लेखांकन प्रणाली को पूरी तरह बदल दिया है।

अब अधिकांश सरकारी भुगतान ऑनलाइन किए जाते हैं।

डिजिटल लेखांकन से रिकॉर्ड सुरक्षित रहते हैं।

गलतियों की संभावना कम होती है।

भुगतान तेज़ी से होता है।

पारदर्शिता बढ़ती है।

भ्रष्टाचार की संभावना कम होती है।

इसी कारण केंद्र और राज्य सरकारें अब डिजिटल वित्तीय प्रबंधन प्रणालियों का व्यापक उपयोग कर रही हैं।

लेखांकन और लेखा-परीक्षण में अंतर

अक्सर विद्यार्थी Accounts और Audit को एक ही समझ लेते हैं, जबकि दोनों अलग-अलग प्रक्रियाएँ हैं।

लेखांकन का कार्य रिकॉर्ड तैयार करना है, जबकि लेखा-परीक्षण का कार्य उन रिकॉर्डों की जाँच करना है।

लेखांकन प्रतिदिन किया जाता है, जबकि लेखा-परीक्षण निश्चित अवधि के बाद किया जाता है।

लेखांकन विभाग स्वयं करता है, जबकि ऑडिट स्वतंत्र संस्था या अधिकृत अधिकारी करते हैं।

लेखांकन वित्तीय सूचना प्रदान करता है, जबकि ऑडिट उस सूचना की सत्यता की पुष्टि करता है।

लेखांकन एवं लेखा-परीक्षण का महत्व

लोकतांत्रिक शासन में इन दोनों का अत्यधिक महत्व है।

इनसे वित्तीय अनुशासन स्थापित होता है।

सार्वजनिक धन सुरक्षित रहता है।

भ्रष्टाचार पर नियंत्रण होता है।

सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही बढ़ती है।

जनता का सरकार पर विश्वास मजबूत होता है।

सरकारी योजनाओं की गुणवत्ता में सुधार होता है।

प्रशासन अधिक पारदर्शी और उत्तरदायी बनता है।

वित्तीय प्रशासन एवं बजट की अवधारणा
(Financial Administration and Concept of Budget)
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (15–20 अंक)
  1. वित्तीय प्रशासन की अवधारणा स्पष्ट करते हुए उसके उद्देश्य, आवश्यकता एवं महत्व का विस्तृत विवेचन कीजिए।
  2. वित्तीय प्रशासन की परिभाषा दीजिए तथा आधुनिक कल्याणकारी राज्य में इसकी भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
  3. बजट का अर्थ एवं महत्व स्पष्ट करते हुए उसके प्रमुख उद्देश्यों की व्याख्या कीजिए।
  4. भारत में बजट निर्माण की प्रक्रिया का क्रमबद्ध वर्णन कीजिए।
  5. बजट निर्माण में वित्त मंत्रालय एवं मंत्रिपरिषद की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
  6. बजट के क्रियान्वयन की प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन कीजिए।
  7. बजट क्रियान्वयन में वित्त मंत्रालय, प्रशासनिक विभाग एवं कोषागार की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
  8. बजट क्रियान्वयन की प्रमुख समस्याओं एवं उनके समाधान पर प्रकाश डालिए।
  9. निष्पादन (Performance) बजट से आप क्या समझते हैं? इसकी विशेषताओं, उद्देश्यों, लाभ एवं सीमाओं का विवेचन कीजिए।
  10. पारंपरिक बजट एवं निष्पादन बजट में अंतर स्पष्ट कीजिए।
  11. विधायिका के वित्तीय नियंत्रण की आवश्यकता एवं महत्व का विस्तृत वर्णन कीजिए।
  12. संसद सरकार के वित्तीय कार्यों पर किस प्रकार नियंत्रण रखती है? विस्तारपूर्वक समझाइए।
  13. संसदीय समितियों द्वारा वित्तीय नियंत्रण की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।
  14. नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
  15. लेखांकन एवं लेखा-परीक्षण का अर्थ स्पष्ट करते हुए दोनों में अंतर लिखिए।
  16. वित्तीय प्रशासन में लेखांकन एवं लेखा-परीक्षण के महत्व का विस्तृत विवेचन कीजिए।
मध्यम उत्तरीय प्रश्न (8–10 अंक)
  1. वित्तीय प्रशासन का अर्थ एवं परिभाषा लिखिए।
  2. वित्तीय प्रशासन की आवश्यकता क्यों होती है?
  3. वित्तीय प्रशासन के प्रमुख उद्देश्य लिखिए।
  4. बजट क्या है? इसकी विशेषताएँ बताइए।
  5. बजट शब्द की उत्पत्ति स्पष्ट कीजिए।
  6. बजट क्यों आवश्यक है?
  7. बजट निर्माण की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
  8. बजट निर्माण में वित्त मंत्रालय की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
  9. संसद में बजट प्रस्तुत करने की प्रक्रिया लिखिए।
  10. बजट निर्माण में किन-किन बातों का ध्यान रखा जाता है?
  11. बजट क्रियान्वयन का अर्थ एवं महत्व लिखिए।
  12. व्यय नियंत्रण के प्रमुख उपायों का वर्णन कीजिए।
  13. निष्पादन बजट की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
  14. निष्पादन बजट के उद्देश्य बताइए।
  15. निष्पादन बजट के लाभ एवं सीमाएँ लिखिए।
  16. विधायिका के वित्तीय नियंत्रण के उद्देश्य लिखिए।
  17. कटौती प्रस्ताव (Cut Motion) क्या है?
  18. विनियोग विधेयक (Appropriation Bill) क्या है?
  19. वित्त विधेयक (Finance Bill) क्या है?
  20. लोक लेखा समिति (PAC) के कार्य लिखिए।
  21. प्राक्कलन समिति (Estimates Committee) के कार्य लिखिए।
  22. लोक उपक्रम समिति (Committee on Public Undertakings) की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
  23. CAG की प्रमुख भूमिकाएँ लिखिए।
  24. लेखांकन एवं लेखा-परीक्षण में अंतर लिखिए।
लघु उत्तरीय प्रश्न (3–5 अंक)
  1. वित्तीय प्रशासन क्या है?
  2. सार्वजनिक धन से क्या आशय है?
  3. वित्तीय अनुशासन क्या है?
  4. बजट की परिभाषा दीजिए।
  5. बजट का महत्व लिखिए।
  6. Budget Circular क्या है?
  7. बजट निर्माण का अर्थ लिखिए।
  8. बजट क्रियान्वयन क्या है?
  9. कोषागार (Treasury) क्या है?
  10. PFMS का पूरा नाम लिखिए।
  11. DBT क्या है?
  12. ई-प्रोक्योरमेंट क्या है?
  13. निष्पादन बजट क्या है?
  14. Performance Indicator क्या है?
  15. परिणाम आधारित प्रशासन (Result Based Management) क्या है?
  16. विधायिका का वित्तीय नियंत्रण क्या है?
  17. अनुदानों की माँग क्या है?
  18. विनियोग विधेयक क्या है?
  19. वित्त विधेयक क्या है?
  20. PAC का पूरा नाम लिखिए।
  21. CAG का पूरा नाम लिखिए।
  22. लेखांकन क्या है?
  23. लेखा-परीक्षण क्या है?
  24. वित्तीय लेखा-परीक्षण क्या है?
  25. अनुपालन लेखा-परीक्षण क्या है?
  26. कार्य-निष्पादन लेखा-परीक्षण क्या है?
परीक्षा की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न
  • वित्तीय प्रशासन की अवधारणा, उद्देश्य एवं महत्व।
  • भारत में बजट निर्माण की प्रक्रिया।
  • बजट क्रियान्वयन की प्रक्रिया एवं समस्याएँ।
  • निष्पादन बजट : अर्थ, विशेषताएँ, लाभ एवं सीमाएँ।
  • पारंपरिक बजट एवं निष्पादन बजट में अंतर।
  • विधायिका का वित्तीय नियंत्रण।
  • लोक लेखा समिति (PAC) एवं CAG की भूमिका।
  • लेखांकन एवं लेखा-परीक्षण का महत्व तथा दोनों में अंतर।
  • 1. वित्तीय प्रशासन का संबंध किससे है?
    (A) न्याय प्रशासन
    (B) सार्वजनिक धन के प्रबंधन से
    (C) चुनाव से
    (D) विदेश नीति से
    उत्तर – (B)

    2. वित्तीय प्रशासन को किसकी रीढ़ कहा जाता है?
    (A) न्यायपालिका
    (B) शासन व्यवस्था
    (C) सेना
    (D) मीडिया
    उत्तर – (B)

    3. सरकार का सबसे महत्वपूर्ण वित्तीय दस्तावेज़ कौन-सा है?
    (A) संविधान
    (B) बजट
    (C) जनगणना
    (D) अधिनियम
    उत्तर – (B)

    4. बजट किसका वार्षिक अनुमान है?
    (A) आय एवं व्यय का
    (B) केवल आय का
    (C) केवल व्यय का
    (D) जनसंख्या का
    उत्तर – (A)

    5. Budget शब्द किस भाषा से लिया गया है?
    (A) अंग्रेज़ी
    (B) फ्रांसीसी
    (C) लैटिन
    (D) जर्मन
    उत्तर – (B)

    6. Bougette का अर्थ क्या है?
    (A) खाता
    (B) चमड़े का थैला
    (C) सरकारी आदेश
    (D) कोष
    उत्तर – (B)

    7. भारत में सामान्यतः बजट कौन प्रस्तुत करता है?
    (A) राष्ट्रपति
    (B) प्रधानमंत्री
    (C) वित्त मंत्री
    (D) लोकसभा अध्यक्ष
    उत्तर – (C)

    8. बजट निर्माण की शुरुआत कौन करता है?
    (A) राष्ट्रपति
    (B) वित्त मंत्रालय
    (C) CAG
    (D) सर्वोच्च न्यायालय
    उत्तर – (B)

    9. बजट निर्माण हेतु मंत्रालयों को क्या भेजा जाता है?
    (A) वित्त विधेयक
    (B) बजट परिपत्र (Budget Circular)
    (C) अधिसूचना
    (D) आदेश पत्र
    उत्तर – (B)

    10. बजट निर्माण का अंतिम अनुमोदन किसके बाद संसद में जाता है?
    (A) राज्यपाल
    (B) CAG
    (C) मंत्रिपरिषद
    (D) निर्वाचन आयोग
    उत्तर – (C)

    11. बजट का क्रियान्वयन कब प्रारंभ होता है?
    (A) बजट बनने से पहले
    (B) संसद द्वारा पारित होने के बाद
    (C) चुनाव के बाद
    (D) वित्त आयोग की रिपोर्ट के बाद
    उत्तर – (B)

    12. बजट क्रियान्वयन में केंद्रीय भूमिका किसकी होती है?
    (A) गृह मंत्रालय
    (B) वित्त मंत्रालय
    (C) शिक्षा मंत्रालय
    (D) योजना आयोग
    उत्तर – (B)

    13. सरकारी धन का मुख्य भंडार क्या कहलाता है?
    (A) बैंक
    (B) कोषागार (Treasury)
    (C) निगम
    (D) न्यायालय
    उत्तर – (B)

    14. PFMS का पूरा नाम क्या है?
    (A) Public Financial Management System
    (B) Public Fund Management Service
    (C) Public Finance Monitoring Scheme
    (D) Public Financial Monitoring Service
    उत्तर – (A)

    15. DBT का पूरा नाम क्या है?
    (A) Direct Bank Transfer
    (B) Direct Benefit Transfer
    (C) Digital Benefit Transfer
    (D) Direct Budget Transfer
    उत्तर – (B)

    16. निष्पादन बजट में किस पर अधिक बल दिया जाता है?
    (A) धन पर
    (B) परिणाम पर
    (C) कर पर
    (D) ऋण पर
    उत्तर – (B)

    17. निष्पादन बजट का मुख्य उद्देश्य क्या है?
    (A) अधिक खर्च करना
    (B) परिणामों का मूल्यांकन करना
    (C) कर बढ़ाना
    (D) ऋण लेना
    उत्तर – (B)

    18. भारत में निष्पादन बजट को विशेष महत्व कब मिला?
    (A) 1950
    (B) 1968
    (C) 1975
    (D) 1991
    उत्तर – (B)

    19. लोकतंत्र में सार्वजनिक धन का अंतिम अधिकार किसका होता है?
    (A) प्रधानमंत्री
    (B) संसद
    (C) न्यायपालिका
    (D) राष्ट्रपति
    उत्तर – (B)

    20. सरकार बिना संसद की अनुमति के क्या नहीं कर सकती?
    (A) कानून बना सकती है
    (B) सार्वजनिक धन खर्च नहीं कर सकती
    (C) चुनाव नहीं करा सकती
    (D) नियुक्ति नहीं कर सकती
    उत्तर – (B)

    21. अनुदानों की माँग किस सदन में स्वीकृत होती है?
    (A) राज्यसभा
    (B) लोकसभा
    (C) विधान परिषद
    (D) दोनों सदनों में समान रूप से
    उत्तर – (B)

    22. Cut Motion का उद्देश्य क्या है?
    (A) बजट बढ़ाना
    (B) सरकार की नीति की आलोचना करना
    (C) कर समाप्त करना
    (D) संसद स्थगित करना
    उत्तर – (B)

    23. Appropriation Bill किससे संबंधित है?
    (A) कर लगाना
    (B) संचित निधि से धन निकालना
    (C) चुनाव कराना
    (D) ऋण लेना
    उत्तर – (B)

    24. Finance Bill किससे संबंधित है?
    (A) कराधान
    (B) शिक्षा
    (C) रक्षा
    (D) कृषि
    उत्तर – (A)

    25. PAC का पूरा नाम क्या है?
    (A) Public Accounts Committee
    (B) Public Audit Committee
    (C) Public Administration Committee
    (D) Public Authority Committee
    उत्तर – (A)

    26. PAC किसकी रिपोर्ट की जाँच करती है?
    (A) वित्त आयोग
    (B) CAG
    (C) नीति आयोग
    (D) RBI
    उत्तर – (B)

    27. CAG का पूरा नाम क्या है?
    (A) Comptroller and Auditor General
    (B) Controller of Accounts General
    (C) Central Audit General
    (D) Comptroller of Administration General
    उत्तर – (A)

    28. CAG को क्या कहा जाता है?
    (A) लोक सेवक
    (B) सार्वजनिक धन का प्रहरी
    (C) मुख्य सचिव
    (D) कोषाध्यक्ष
    उत्तर – (B)

    29. लेखांकन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
    (A) कानून बनाना
    (B) आय-व्यय का रिकॉर्ड रखना
    (C) कर लगाना
    (D) न्याय देना
    उत्तर – (B)

    30. लेखा-परीक्षण (Audit) का उद्देश्य क्या है?
    (A) रिकॉर्ड बनाना
    (B) रिकॉर्ड की जाँच करना
    (C) बजट बनाना
    (D) कर लगाना
    उत्तर – (B)

    31. लेखांकन कौन करता है?
    (A) विभाग स्वयं
    (B) CAG
    (C) संसद
    (D) न्यायालय
    उत्तर – (A)

    32. Audit सामान्यतः कब किया जाता है?
    (A) प्रतिदिन
    (B) निश्चित अवधि के बाद
    (C) प्रत्येक घंटे
    (D) कभी नहीं
    उत्तर – (B)

    33. Financial Audit में क्या जाँचा जाता है?
    (A) कानून
    (B) आय-व्यय का रिकॉर्ड
    (C) चुनाव
    (D) नीति
    उत्तर – (B)

    34. Compliance Audit किसकी जाँच करता है?
    (A) नियमों के पालन की
    (B) चुनाव की
    (C) संसद की
    (D) मीडिया की
    उत्तर – (A)

    35. Performance Audit किसका मूल्यांकन करता है?
    (A) परिणामों का
    (B) करों का
    (C) चुनाव का
    (D) संविधान का
    उत्तर – (A)

    36. वित्तीय प्रशासन का प्रमुख उद्देश्य क्या है?
    (A) सार्वजनिक धन का सही उपयोग
    (B) निजी लाभ
    (C) चुनाव कराना
    (D) न्याय देना
    उत्तर – (A)

    37. सरकार की आय का प्रमुख स्रोत कौन-सा है?
    (A) कर
    (B) खेल
    (C) फिल्में
    (D) पर्यटन
    उत्तर – (A)

    38. बजट का सबसे महत्वपूर्ण आधार क्या है?
    (A) लेखांकन
    (B) वित्तीय प्रशासन
    (C) बजट स्वयं
    (D) संसद
    उत्तर – (B)

    39. बजट किसका दर्पण माना जाता है?
    (A) सरकार की नीतियों का
    (B) जनता का
    (C) न्यायपालिका का
    (D) मीडिया का
    उत्तर – (A)

    40. आधुनिक कल्याणकारी राज्य में वित्तीय प्रशासन का महत्व क्यों बढ़ा?
    (A) सरकार के कार्यक्षेत्र के विस्तार के कारण
    (B) चुनाव के कारण
    (C) मीडिया के कारण
    (D) न्यायपालिका के कारण
    उत्तर – (A)

    41. भारत की संचित निधि से धन निकालने के लिए कौन-सा विधेयक आवश्यक है?
    (A) वित्त विधेयक
    (B) विनियोग विधेयक
    (C) संविधान संशोधन
    (D) धन विधेयक
    उत्तर – (B)

    42. सार्वजनिक धन का संरक्षक कौन है?
    (A) सरकार
    (B) जनता
    (C) न्यायालय
    (D) राज्यपाल
    उत्तर – (A)

    43. सरकार जनता के प्रति किसके माध्यम से उत्तरदायी होती है?
    (A) संसद
    (B) सेना
    (C) मीडिया
    (D) चुनाव आयोग
    उत्तर – (A)

    44. लेखा-परीक्षण का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य क्या है?
    (A) वित्तीय अनुशासन बनाए रखना
    (B) चुनाव कराना
    (C) न्याय देना
    (D) कर बढ़ाना
    उत्तर – (A)

    45. बजट निर्माण की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
    (A) असीमित संसाधन
    (B) सीमित संसाधनों में असीमित आवश्यकताएँ
    (C) चुनाव
    (D) संसद
    उत्तर – (B)

    46. बजट निर्माण में किसकी प्राथमिकता तय होती है?
    (A) सरकार की विकास नीति
    (B) न्यायपालिका
    (C) मीडिया
    (D) चुनाव आयोग
    उत्तर – (A)

    47. डिजिटल भुगतान से क्या लाभ होता है?
    (A) भ्रष्टाचार कम होता है
    (B) समय बढ़ता है
    (C) खर्च बढ़ता है
    (D) कोई लाभ नहीं
    उत्तर – (A)

    48. ई-प्रोक्योरमेंट का संबंध किससे है?
    (A) डिजिटल खरीद प्रक्रिया
    (B) चुनाव
    (C) न्यायालय
    (D) बैंकिंग परीक्षा
    उत्तर – (A)

    49. लोकतांत्रिक शासन में वित्तीय नियंत्रण का मुख्य उद्देश्य क्या है?
    (A) सार्वजनिक धन की सुरक्षा
    (B) चुनाव कराना
    (C) कानून बनाना
    (D) राष्ट्रपति चुनना
    उत्तर – (A)

    50. वित्तीय प्रशासन का अंतिम उद्देश्य क्या है?
    (A) सुशासन एवं जनकल्याण
    (B) केवल कर वसूली
    (C) केवल खर्च करना
    (D) केवल ऋण लेना
    उत्तर – (A)

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