Unit – 2
Jawaharlal Nehru : A brief life sketch, his Idea of Socialism, Nationalism, Plannig, Democracy & Modernism.
जवाहरलाल नेहरू : संक्षिप्त जीवन-परिचय, समाजवाद का सिद्धांत, राष्ट्रवाद का सिद्धांत, नियोजन (योजनाबद्ध विकास) का सिद्धांत, लोकतंत्र का सिद्धांत तथा आधुनिकता की अवधारणा।
अध्याय–1 : जवाहरलाल नेहरू – संक्षिप्त जीवन-परिचय
भाग–1 : जन्म, परिवार, शिक्षा तथा व्यक्तित्व का निर्माण (लेखन क्रम में)
आधुनिक भारत के निर्माण में जिन नेताओं का योगदान सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, उनमें पंडित Jawaharlal Nehru का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। वे केवल भारत के प्रथम प्रधानमंत्री ही नहीं थे, बल्कि एक दूरदर्शी राजनेता, स्वतंत्रता सेनानी, लोकतांत्रिक चिंतक, आधुनिक भारत के निर्माता तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर के विचारक भी थे। उन्होंने स्वतंत्र भारत की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और वैज्ञानिक दिशा निर्धारित करने में निर्णायक भूमिका निभाई। यदि महात्मा गांधी ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नैतिक शक्ति और जनआंदोलन का स्वरूप दिया, तो जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत को आधुनिक राष्ट्र-राज्य के रूप में विकसित करने की आधारशिला रखी।
जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवम्बर 1889 को Prayagraj (तत्कालीन इलाहाबाद) में एक समृद्ध एवं प्रतिष्ठित कश्मीरी ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता Motilal Nehru देश के प्रसिद्ध वकील तथा भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से थे। उनकी माता Swarup Rani Nehru धार्मिक एवं सरल स्वभाव की महिला थीं। नेहरू का बचपन आर्थिक अभाव से दूर, उच्च शिक्षित और सांस्कृतिक वातावरण में बीता। इस वातावरण ने उनके व्यक्तित्व के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
नेहरू की प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही निजी शिक्षकों द्वारा कराई गई। बचपन से ही उनमें अध्ययन की गहरी रुचि थी। इतिहास, विज्ञान, साहित्य और प्रकृति के प्रति उनका विशेष आकर्षण था। उनके अंग्रेज़ शिक्षक फर्डिनेंड टी. ब्रूक्स ने उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तार्किक सोच विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही कारण है कि आगे चलकर नेहरू ने अंधविश्वास और रूढ़िवादिता के स्थान पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण को राष्ट्रीय विकास का आधार माना।
उच्च शिक्षा के लिए नेहरू इंग्लैंड गए। उन्होंने Harrow School में प्रारम्भिक उच्च शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद Trinity College, Cambridge में प्राकृतिक विज्ञान (Natural Sciences) का अध्ययन किया। विज्ञान की शिक्षा ने उनके विचारों को तार्किक, विश्लेषणात्मक और आधुनिक बनाया। बाद में उन्होंने Inner Temple से विधि (Law) की शिक्षा प्राप्त की और बैरिस्टर बने।
इंग्लैंड में अध्ययन के दौरान नेहरू केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने यूरोप की राजनीति, समाजवाद, उदारवाद, राष्ट्रवाद और लोकतंत्र के विचारों का गहराई से अध्ययन किया। उस समय यूरोप में औद्योगिक क्रांति के प्रभाव, समाजवादी आंदोलनों का विकास और राष्ट्रवादी संघर्ष तेज़ी से चल रहे थे। इन सबका नेहरू के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ा। वे विज्ञान, आधुनिकता और सामाजिक न्याय के समर्थक बनकर भारत लौटे।
1912 में भारत लौटने के बाद उन्होंने कुछ समय तक वकालत की, लेकिन उनका मन इस पेशे में अधिक नहीं लगा। इसी बीच भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन गति पकड़ रहा था। प्रारम्भ में वे अपने पिता के साथ सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हुए, किंतु शीघ्र ही उन्होंने अनुभव किया कि देश की वास्तविक समस्या केवल राजनीतिक दासता नहीं, बल्कि गरीबी, अशिक्षा, आर्थिक असमानता और सामाजिक पिछड़ापन भी है। इस अनुभव ने उन्हें पूर्णकालिक राष्ट्रसेवक बना दिया।
नेहरू के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा मोड़ महात्मा Mahatma Gandhi से उनकी भेंट थी। गांधी के नेतृत्व ने नेहरू को गहराई से प्रभावित किया। यद्यपि दोनों के विचारों में कुछ विषयों पर मतभेद थे—विशेषकर औद्योगीकरण और आर्थिक विकास के प्रश्न पर—फिर भी दोनों का लक्ष्य भारत की स्वतंत्रता और जनता का कल्याण था। गांधी ने नेहरू की नेतृत्व क्षमता को पहचाना और उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन के अग्रणी नेताओं में स्थान दिया।
नेहरू ने असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन सहित लगभग सभी प्रमुख राष्ट्रीय आंदोलनों में सक्रिय भाग लिया। इस दौरान उन्हें अनेक बार जेल जाना पड़ा। उन्होंने अपने जीवन के लगभग नौ वर्ष विभिन्न जेलों में बिताए। लेकिन उन्होंने जेल को निराशा का स्थान नहीं, बल्कि अध्ययन और चिंतन का अवसर बनाया।
कारावास के दौरान नेहरू ने अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं। उनकी प्रसिद्ध कृतियों में An Autobiography, The Discovery of India तथा Glimpses of World History विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन पुस्तकों में उन्होंने भारतीय इतिहास, विश्व इतिहास, संस्कृति, राजनीति और मानव सभ्यता का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया। उनकी लेखन शैली सरल, तार्किक और ऐतिहासिक दृष्टि से समृद्ध है।
1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद नेहरू स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने। यह दायित्व अत्यंत चुनौतीपूर्ण था। देश विभाजन, शरणार्थी समस्या, आर्थिक पिछड़ापन, अशिक्षा, रियासतों का एकीकरण और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना जैसी अनेक कठिन चुनौतियाँ उनके सामने थीं। उन्होंने धैर्य, दूरदृष्टि और लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर इन समस्याओं का समाधान करने का प्रयास किया।
नेहरू का विश्वास था कि आधुनिक भारत का निर्माण केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से संभव नहीं है। इसके लिए वैज्ञानिक सोच, औद्योगिक विकास, शिक्षा का विस्तार, योजनाबद्ध आर्थिक विकास, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र और सामाजिक न्याय आवश्यक हैं। इसी कारण उन्होंने बड़े बाँधों, इस्पात संयंत्रों, वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थानों, उच्च शिक्षण संस्थाओं और पंचवर्षीय योजनाओं को राष्ट्रीय विकास का आधार बनाया। वे कहा करते थे कि बड़े बाँध और आधुनिक उद्योग “आधुनिक भारत के नए तीर्थ” हैं।
नेहरू का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे एक राजनेता होने के साथ-साथ साहित्यकार, इतिहासकार, चिंतक, मानवतावादी और अंतरराष्ट्रीयतावादी भी थे। बच्चों के प्रति उनके स्नेह के कारण उन्हें “चाचा नेहरू” कहा जाता है और उनके जन्मदिन 14 नवम्बर को भारत में बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।
27 मई 1964 को उनका निधन हो गया। किंतु उनके द्वारा स्थापित लोकतांत्रिक संस्थाएँ, योजनाबद्ध विकास की परंपरा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आधुनिक भारत की परिकल्पना आज भी भारतीय राज्य व्यवस्था की महत्वपूर्ण आधारशिलाएँ हैं। इसलिए उन्हें उचित ही “आधुनिक भारत का निर्माता” कहा जाता है।
अध्याय–2 : जवाहरलाल नेहरू का समाजवाद (Jawaharlal Nehru’s Idea of Socialism)
भाग–1 : समाजवाद की अवधारणा, विकास, स्रोत तथा नेहरू के समाजवादी चिंतन का आधार (लेखन क्रम में)
भारत की स्वतंत्रता के समय देश केवल राजनीतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत पिछड़ा हुआ था। गरीबी व्यापक थी, बेरोज़गारी बढ़ रही थी, कृषि पर अत्यधिक निर्भरता थी, उद्योगों का विकास सीमित था और समाज में आर्थिक असमानता स्पष्ट दिखाई देती थी। पंडित Jawaharlal Nehru का मानना था कि केवल अंग्रेज़ों के शासन से मुक्ति प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं होगा। यदि स्वतंत्र भारत में भी गरीबी, शोषण और असमानता बनी रही, तो स्वतंत्रता का वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। इसी कारण उन्होंने राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ आर्थिक लोकतंत्र और सामाजिक न्याय को भी राष्ट्र-निर्माण का अनिवार्य आधार माना।
नेहरू के समाजवाद को समझने से पहले समाजवाद की सामान्य अवधारणा को समझना आवश्यक है। सामान्य रूप से समाजवाद वह विचारधारा है जो आर्थिक और सामाजिक समानता, उत्पादन के साधनों पर समाज या राज्य की महत्वपूर्ण भूमिका, अवसरों की समानता तथा शोषण-मुक्त समाज की स्थापना पर बल देती है। समाजवाद का उद्देश्य केवल धन का पुनर्वितरण नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था स्थापित करना है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानपूर्वक जीवन जीने, शिक्षा प्राप्त करने, स्वास्थ्य सुविधाएँ पाने और अपनी क्षमता का विकास करने का अवसर मिले।
नेहरू ने समाजवाद को किसी एक विदेशी सिद्धांत के रूप में स्वीकार नहीं किया। उन्होंने यूरोप की समाजवादी विचारधाराओं का अध्ययन अवश्य किया, लेकिन भारतीय परिस्थितियों के अनुसार उनका पुनर्विचार किया। उनका समाजवाद भारतीय लोकतंत्र, राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक व्यवस्था के साथ जुड़ा हुआ था। इसलिए उनके समाजवाद को लोकतांत्रिक समाजवाद (Democratic Socialism) कहा जाता है।
नेहरू के समाजवादी चिंतन पर अनेक स्रोतों का प्रभाव पड़ा। इंग्लैंड में शिक्षा के दौरान उन्होंने यूरोप के समाजवादी आंदोलनों, औद्योगिक क्रांति और श्रमिक आंदोलनों का अध्ययन किया। उन्होंने देखा कि अनियंत्रित पूँजीवाद के कारण समाज में अमीरी और गरीबी के बीच बहुत बड़ा अंतर उत्पन्न हो गया है। कुछ लोगों के हाथों में अपार संपत्ति केंद्रित हो गई, जबकि बड़ी संख्या में श्रमिक अत्यंत कठिन परिस्थितियों में जीवन व्यतीत कर रहे थे। इस अनुभव ने उन्हें आर्थिक न्याय की आवश्यकता का अनुभव कराया।
नेहरू पर मार्क्सवादी विचारों का भी प्रभाव पड़ा, किंतु उन्होंने Karl Marx के सभी विचारों को स्वीकार नहीं किया। वे मार्क्स के पूँजीवाद संबंधी विश्लेषण और आर्थिक असमानता की आलोचना से प्रभावित थे, परंतु वर्ग-संघर्ष, हिंसक क्रांति और एक-दलीय शासन के समर्थक नहीं थे। उनका विश्वास था कि भारत जैसे विविधतापूर्ण लोकतांत्रिक देश में परिवर्तन संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीकों से होना चाहिए।
महात्मा Mahatma Gandhi का भी नेहरू के समाजवादी चिंतन पर गहरा प्रभाव था। गांधी सामाजिक न्याय, ग्राम विकास, श्रम की गरिमा और आर्थिक समानता के पक्षधर थे। यद्यपि गांधी बड़े उद्योगों के प्रति सावधान थे और नेहरू आधुनिक औद्योगीकरण के समर्थक थे, फिर भी दोनों का लक्ष्य शोषण-मुक्त और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना था। नेहरू ने गांधी की नैतिकता और सामाजिक संवेदनशीलता को आधुनिक आर्थिक नियोजन के साथ जोड़ने का प्रयास किया।
नेहरू का मानना था कि गरीबी केवल आर्थिक समस्या नहीं है। यह शिक्षा, स्वास्थ्य, अवसरों की कमी और सामाजिक असमानता से भी जुड़ी हुई है। इसलिए उन्होंने समाजवाद को केवल आय के पुनर्वितरण तक सीमित नहीं रखा। उनके अनुसार समाजवाद का उद्देश्य प्रत्येक नागरिक को सम्मानजनक जीवन उपलब्ध कराना है। यदि कोई व्यक्ति भूखा है, अशिक्षित है या उपचार के अभाव में पीड़ित है, तो राजनीतिक स्वतंत्रता उसके लिए बहुत कम अर्थ रखती है।
इसी कारण नेहरू ने समाजवाद को मानवतावादी समाजवाद का स्वरूप दिया। उनका विश्वास था कि आर्थिक विकास का अंतिम उद्देश्य मनुष्य का विकास होना चाहिए। यदि उत्पादन बढ़ता है, लेकिन उसका लाभ केवल कुछ लोगों तक सीमित रह जाता है, तो ऐसी प्रगति अधूरी है। वास्तविक विकास वही है जिसमें समाज के प्रत्येक वर्ग को समान अवसर प्राप्त हों।
नेहरू ने निजी संपत्ति का पूर्ण उन्मूलन नहीं चाहा। उनका मत था कि निजी क्षेत्र की अपनी भूमिका है, किंतु जिन क्षेत्रों का संबंध राष्ट्रीय सुरक्षा, आधारभूत उद्योगों, ऊर्जा, इस्पात, परिवहन और प्राकृतिक संसाधनों से है, उनमें राज्य की प्रमुख भूमिका होनी चाहिए। इसीलिए उन्होंने मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) की अवधारणा को अपनाया। इसमें सार्वजनिक और निजी—दोनों क्षेत्र साथ-साथ कार्य करते हैं।
नेहरू के अनुसार राज्य केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाला संगठन नहीं है। उसे सामाजिक न्याय स्थापित करने, शिक्षा और स्वास्थ्य का विस्तार करने, उद्योगों का विकास करने, बेरोज़गारी कम करने और आर्थिक अवसरों की समानता सुनिश्चित करने की सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। इसलिए उन्होंने कल्याणकारी राज्य (Welfare State) की अवधारणा का समर्थन किया।
नेहरू का विश्वास था कि लोकतंत्र तभी सफल हो सकता है जब उसके साथ आर्थिक समानता भी जुड़ी हो। यदि कुछ लोगों के पास अत्यधिक धन और अधिकांश जनता गरीबी में जीवन बिताए, तो लोकतंत्र केवल औपचारिक व्यवस्था बनकर रह जाएगा। इसलिए उन्होंने बार-बार कहा कि राजनीतिक लोकतंत्र को आर्थिक लोकतंत्र का आधार मिलना चाहिए।
उन्होंने समाजवाद को राष्ट्रीय एकता से भी जोड़ा। उनका मानना था कि अत्यधिक आर्थिक असमानता सामाजिक तनाव और क्षेत्रीय असंतोष को जन्म देती है। यदि विकास का लाभ केवल कुछ क्षेत्रों या वर्गों तक सीमित रहेगा, तो राष्ट्र की एकता कमजोर होगी। इसलिए योजनाबद्ध विकास और संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण को उन्होंने राष्ट्रीय एकीकरण का भी माध्यम माना।
इस प्रकार स्पष्ट होता है कि नेहरू का समाजवाद न तो पारंपरिक पूँजीवाद था और न ही कट्टर साम्यवाद। यह भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित लोकतांत्रिक, मानवतावादी, संवैधानिक और योजनाबद्ध समाजवाद था। इसका उद्देश्य हिंसक क्रांति नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक साधनों द्वारा आर्थिक समानता, सामाजिक न्याय और आधुनिक राष्ट्र का निर्माण करना था।
अध्याय–2 : जवाहरलाल नेहरू का समाजवाद (Jawaharlal Nehru’s Idea of Socialism)
भाग–2 : नेहरू के समाजवाद के प्रमुख सिद्धांत, लोकतांत्रिक समाजवाद, मिश्रित अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक क्षेत्र तथा भारतीय विकास मॉडल (लेखन क्रम में)
पिछले भाग में यह स्पष्ट किया गया कि पंडित Jawaharlal Nehru का समाजवाद किसी विदेशी विचारधारा की नकल नहीं था। यह भारतीय परिस्थितियों, लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक न्याय की आवश्यकता को ध्यान में रखकर विकसित किया गया एक व्यावहारिक दर्शन था। नेहरू का विश्वास था कि स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी चुनौती केवल शासन परिवर्तन नहीं, बल्कि गरीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा और आर्थिक विषमता का अंत करना है। इसलिए उन्होंने समाजवाद को राष्ट्र-निर्माण का प्रमुख आधार बनाया।
नेहरू के समाजवाद का पहला प्रमुख सिद्धांत लोकतांत्रिक समाजवाद (Democratic Socialism) था। उनका मानना था कि समाजवाद की स्थापना हिंसक क्रांति, तानाशाही या एक-दलीय शासन के माध्यम से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा होनी चाहिए। वे संविधान, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र प्रेस और नागरिक स्वतंत्रताओं को बनाए रखते हुए आर्थिक परिवर्तन चाहते थे। उनका विश्वास था कि लोकतंत्र और समाजवाद एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
नेहरू ने स्पष्ट कहा कि यदि समाजवाद के नाम पर व्यक्ति की स्वतंत्रता समाप्त कर दी जाए, तो वह समाजवाद नहीं रह जाता। इसी प्रकार यदि लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित रह जाए और जनता आर्थिक रूप से शोषित रहे, तो वह भी अधूरा लोकतंत्र है। इसलिए उन्होंने राजनीतिक लोकतंत्र और आर्थिक लोकतंत्र के समन्वय पर बल दिया।
नेहरू के समाजवाद का दूसरा महत्वपूर्ण आधार मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) था। उन्होंने न तो पूर्ण पूँजीवाद को स्वीकार किया और न ही पूर्ण राज्य नियंत्रण वाली साम्यवादी व्यवस्था को। उनका मानना था कि दोनों व्यवस्थाओं में कुछ गुण और कुछ सीमाएँ हैं। इसलिए उन्होंने ऐसी आर्थिक व्यवस्था का समर्थन किया जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र दोनों मिलकर राष्ट्रीय विकास में योगदान दें।
इस व्यवस्था के अंतर्गत भारी उद्योग, इस्पात, ऊर्जा, रेल, रक्षा उत्पादन, खनिज, सिंचाई और आधारभूत संरचना जैसे क्षेत्रों में राज्य की प्रमुख भूमिका निर्धारित की गई, जबकि कृषि, व्यापार, लघु उद्योग और अनेक उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन में निजी क्षेत्र को भी अवसर दिया गया। नेहरू का विश्वास था कि इससे आर्थिक विकास भी होगा और राष्ट्रीय हित भी सुरक्षित रहेगा।
नेहरू के समाजवाद का तीसरा प्रमुख तत्व सार्वजनिक क्षेत्र (Public Sector) का विकास था। उनका मानना था कि कुछ उद्योग इतने महत्वपूर्ण होते हैं कि उन्हें केवल निजी लाभ के आधार पर नहीं छोड़ा जा सकता। यदि बिजली, इस्पात, कोयला, तेल, परिवहन और रक्षा उत्पादन जैसे क्षेत्र पूरी तरह निजी नियंत्रण में होंगे, तो राष्ट्रीय विकास असंतुलित हो सकता है। इसलिए उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना।
इसी सोच के कारण उनके नेतृत्व में बड़े सार्वजनिक उपक्रमों की स्थापना हुई। भारी उद्योगों, इस्पात संयंत्रों, विद्युत परियोजनाओं और वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थानों का विकास किया गया। उनका उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं था, बल्कि भारत को आत्मनिर्भर औद्योगिक राष्ट्र बनाना था।
नेहरू के समाजवाद का चौथा महत्वपूर्ण सिद्धांत आर्थिक नियोजन (Economic Planning) था। उनका विश्वास था कि भारत जैसे विशाल और संसाधन-सीमित देश में विकास को केवल बाजार की शक्तियों पर नहीं छोड़ा जा सकता। यदि योजनाबद्ध विकास नहीं होगा, तो कुछ क्षेत्र तेजी से आगे बढ़ेंगे और अन्य क्षेत्र पिछड़ जाएंगे। इसी कारण उन्होंने योजनाबद्ध विकास की नीति अपनाई।
उन्होंने यह माना कि राष्ट्रीय संसाधनों का उपयोग वैज्ञानिक ढंग से होना चाहिए। कृषि, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और विज्ञान—सभी क्षेत्रों के विकास के लिए दीर्घकालीन योजनाएँ बनाई जानी चाहिए। योजनाबद्ध विकास का उद्देश्य केवल आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि संतुलित और समावेशी विकास था।
नेहरू के समाजवाद का पाँचवाँ आधार औद्योगीकरण (Industrialization) था। उनका विश्वास था कि केवल कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था आधुनिक राष्ट्र की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकती। उन्होंने भारी उद्योगों को राष्ट्रीय शक्ति का आधार माना। उनके अनुसार औद्योगीकरण से रोजगार बढ़ेगा, उत्पादन क्षमता में वृद्धि होगी, वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रोत्साहन मिलेगा और देश आत्मनिर्भर बनेगा।
इसी संदर्भ में उन्होंने बड़े बाँधों, इस्पात कारखानों, वैज्ञानिक संस्थानों और तकनीकी शिक्षा संस्थानों की स्थापना को अत्यधिक महत्व दिया। वे इन परियोजनाओं को “आधुनिक भारत के नए मंदिर” कहा करते थे, क्योंकि उनके अनुसार यही संस्थाएँ भविष्य के भारत की समृद्धि का आधार बनेंगी।
नेहरू का समाजवाद केवल उद्योगों तक सीमित नहीं था। उन्होंने कृषि सुधारों को भी समान महत्व दिया। उनका मानना था कि भारत की अधिकांश जनता कृषि पर निर्भर है, इसलिए किसानों की स्थिति सुधारे बिना आर्थिक विकास संभव नहीं है। इसी कारण उन्होंने जमींदारी उन्मूलन, सिंचाई सुविधाओं के विस्तार, कृषि अनुसंधान और सहकारी कृषि जैसी नीतियों का समर्थन किया।
उन्होंने अवसरों की समानता पर भी विशेष बल दिया। उनके अनुसार समाजवाद का अर्थ केवल आय की समानता नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और विकास के समान अवसर उपलब्ध कराना भी है। यदि कोई व्यक्ति केवल जन्म, जाति, लिंग या आर्थिक स्थिति के कारण पीछे रह जाता है, तो यह लोकतांत्रिक समाज के लिए उचित नहीं है।
नेहरू ने विज्ञान और समाजवाद के बीच भी गहरा संबंध स्थापित किया। उनका मानना था कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बिना समाजवाद सफल नहीं हो सकता। अंधविश्वास, रूढ़िवादिता और अवैज्ञानिक सोच विकास में बाधा उत्पन्न करते हैं। इसलिए उन्होंने वैज्ञानिक चेतना को राष्ट्रीय चरित्र का आवश्यक अंग माना।
उन्होंने बार-बार कहा कि भारत को ऐसा समाज बनाना होगा जहाँ आर्थिक प्रगति के साथ सामाजिक न्याय भी हो। यदि केवल उत्पादन बढ़े और उसका लाभ समाज के छोटे से वर्ग तक सीमित रह जाए, तो विकास का उद्देश्य पूरा नहीं होगा। इसलिए उन्होंने विकास और वितरण—दोनों पर समान बल दिया।
इस प्रकार नेहरू का समाजवाद भारतीय लोकतंत्र, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, योजनाबद्ध विकास, सार्वजनिक क्षेत्र, मिश्रित अर्थव्यवस्था और सामाजिक न्याय पर आधारित एक संतुलित विकास मॉडल था। यह न तो निजी क्षेत्र का विरोध करता था और न ही राज्य को सर्वशक्तिमान बनाना चाहता था। इसका उद्देश्य दोनों के सहयोग से एक आधुनिक, समतामूलक और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करना था।
अध्याय–2 : जवाहरलाल नेहरू का समाजवाद (Jawaharlal Nehru’s Idea of Socialism)
भाग–3 : नेहरू के समाजवाद की विशेषताएँ, आलोचनाएँ, समकालीन प्रासंगिकता, समग्र मूल्यांकन तथा अध्याय की मूल बात (लेखन क्रम में)
नेहरू का समाजवाद भारतीय राजनीतिक चिंतन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक माना जाता है। उन्होंने स्वतंत्र भारत के सामने उपस्थित चुनौतियों का गहराई से अध्ययन किया और यह निष्कर्ष निकाला कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से राष्ट्र समृद्ध नहीं बन सकता। जब तक आर्थिक असमानता कम नहीं होगी, शिक्षा और स्वास्थ्य का विस्तार नहीं होगा, तथा प्रत्येक नागरिक को सम्मानजनक जीवन का अवसर नहीं मिलेगा, तब तक लोकतंत्र की जड़ें मजबूत नहीं हो सकतीं। इसलिए उनका समाजवाद केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की व्यापक विचारधारा था।
नेहरू के समाजवाद की पहली विशेषता यह थी कि वह लोकतांत्रिक समाजवाद था। उन्होंने कभी भी एक-दलीय शासन, तानाशाही अथवा हिंसक क्रांति का समर्थन नहीं किया। उनका विश्वास था कि लोकतंत्र और समाजवाद एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि समाजवाद व्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ले, तो वह मानवता के विरुद्ध होगा; और यदि लोकतंत्र आर्थिक न्याय न दे सके, तो वह केवल औपचारिक व्यवस्था बनकर रह जाएगा। इसलिए उन्होंने संविधान, चुनाव, स्वतंत्र न्यायपालिका और नागरिक अधिकारों को बनाए रखते हुए समाजवादी लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्रयास किया।
दूसरी विशेषता यह थी कि उनका समाजवाद वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित था। नेहरू का मानना था कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति अंधविश्वास, रूढ़िवादिता और संकीर्ण सोच से नहीं हो सकती। उन्होंने विज्ञान, अनुसंधान, तकनीकी शिक्षा और आधुनिक औद्योगीकरण को राष्ट्रीय विकास का आधार बनाया। इसी सोच के कारण स्वतंत्र भारत में वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थानों, तकनीकी शिक्षण संस्थानों, बड़े बाँधों, इस्पात संयंत्रों और ऊर्जा परियोजनाओं का विकास हुआ। उनके अनुसार वैज्ञानिक दृष्टिकोण केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि वह नागरिकों के सोचने और निर्णय लेने की शैली का भी हिस्सा बनना चाहिए।
तीसरी विशेषता यह थी कि नेहरू का समाजवाद मिश्रित अर्थव्यवस्था पर आधारित था। उन्होंने न तो निजी क्षेत्र को समाप्त किया और न ही संपूर्ण अर्थव्यवस्था को राज्य के नियंत्रण में देने का समर्थन किया। उनका विचार था कि जहाँ राष्ट्रीय हित की दृष्टि से आवश्यक हो वहाँ राज्य नेतृत्व करे, और जहाँ निजी क्षेत्र अधिक प्रभावी ढंग से कार्य कर सकता हो, वहाँ उसे भी अवसर मिले। इस प्रकार उन्होंने पूँजीवाद और साम्यवाद के बीच एक व्यावहारिक भारतीय मार्ग अपनाया।
चौथी विशेषता यह थी कि उन्होंने सामाजिक न्याय को आर्थिक विकास के साथ जोड़ा। उनके अनुसार विकास का वास्तविक अर्थ तभी है जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सिंचाई, औद्योगिक विकास और ग्रामीण उत्थान—इन सभी को उन्होंने समान महत्व दिया। उनका विश्वास था कि विकास केवल शहरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि गाँवों और पिछड़े क्षेत्रों तक भी पहुँचना चाहिए।
पाँचवीं विशेषता यह थी कि नेहरू का समाजवाद धर्मनिरपेक्ष और समावेशी था। उनका उद्देश्य किसी एक वर्ग, जाति या धर्म का विकास नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का संतुलित विकास था। उन्होंने आर्थिक नीति को सांप्रदायिक या जातीय आधार पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित और सामाजिक न्याय के आधार पर देखा। इसी कारण उनका समाजवाद भारतीय संविधान के मूल आदर्शों—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व—से गहराई से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।
यद्यपि नेहरू के समाजवाद ने स्वतंत्र भारत की विकास यात्रा को दिशा दी, फिर भी इसकी अनेक आलोचनाएँ भी हुईं। सबसे प्रमुख आलोचना यह थी कि सार्वजनिक क्षेत्र का अत्यधिक विस्तार होने से सरकारी नियंत्रण बढ़ गया। कई सार्वजनिक उपक्रम समय के साथ अलाभकारी हो गए और प्रशासनिक अक्षमता, भ्रष्टाचार तथा लालफीताशाही की समस्याएँ सामने आने लगीं। आलोचकों का मत था कि अत्यधिक सरकारी हस्तक्षेप से निजी उद्यम और प्रतिस्पर्धा प्रभावित हुई।
दूसरी आलोचना योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था को लेकर की गई। कुछ अर्थशास्त्रियों का तर्क था कि अत्यधिक केंद्रीकृत नियोजन के कारण निर्णय लेने की प्रक्रिया धीमी हो गई। अनेक उद्योगों की स्थापना में लाइसेंस, परमिट और सरकारी स्वीकृतियों की जटिल व्यवस्था विकसित हुई, जिसे बाद में “लाइसेंस-परमिट राज” कहा गया। इससे उद्यमिता और नवाचार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
तीसरी आलोचना यह रही कि औद्योगीकरण पर अधिक बल देने के कारण प्रारंभिक वर्षों में कृषि क्षेत्र को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं मिल सकी। यद्यपि सिंचाई और कृषि सुधारों के प्रयास किए गए, फिर भी ग्रामीण गरीबी और बेरोज़गारी की समस्या लंबे समय तक बनी रही। कुछ विद्वानों का मत है कि यदि कृषि और ग्रामीण उद्योगों पर और अधिक ध्यान दिया जाता, तो विकास अधिक संतुलित होता।
चौथी आलोचना यह है कि समाजवाद के लक्ष्य अत्यंत व्यापक थे, लेकिन संसाधन सीमित थे। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और औद्योगिक विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई, परंतु सभी उद्देश्यों की प्राप्ति अपेक्षित गति से नहीं हो सकी। इसका कारण देश का विशाल आकार, सीमित पूँजी, विभाजन के बाद की कठिन परिस्थितियाँ और प्रशासनिक चुनौतियाँ भी थीं।
इन आलोचनाओं के बावजूद नेहरू के समाजवाद की ऐतिहासिक उपलब्धियाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उनके नेतृत्व में भारत ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखते हुए योजनाबद्ध आर्थिक विकास का मार्ग अपनाया। भारी उद्योगों की स्थापना, वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी शिक्षा, सार्वजनिक क्षेत्र का विकास, आधारभूत संरचना का निर्माण और आधुनिक संस्थाओं की स्थापना ने भारत की दीर्घकालीन प्रगति की मजबूत नींव रखी। आज भारत जिन औद्योगिक और वैज्ञानिक उपलब्धियों पर गर्व करता है, उनमें नेहरू काल की नीतियों का महत्वपूर्ण योगदान है।
समकालीन संदर्भ में भी नेहरू के समाजवाद की प्रासंगिकता बनी हुई है। यद्यपि भारत ने 1991 के बाद आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियाँ अपनाईं, फिर भी शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, आधारभूत संरचना, पर्यावरण संरक्षण और समावेशी विकास जैसे क्षेत्रों में राज्य की भूमिका आज भी महत्वपूर्ण है। इससे स्पष्ट होता है कि नेहरू का यह विचार आज भी प्रासंगिक है कि आर्थिक विकास का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि समाज के सभी वर्गों का कल्याण सुनिश्चित करना होना चाहिए।
आज जब आय और संपत्ति की असमानता, बेरोज़गारी, क्षेत्रीय विषमता और सामाजिक न्याय जैसे प्रश्न फिर से प्रमुख हो रहे हैं, तब नेहरू के समाजवाद के अनेक तत्व—विशेषकर समावेशी विकास, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, योजनाबद्ध नीति-निर्माण और कल्याणकारी राज्य—नई प्रासंगिकता प्राप्त करते हैं।
यदि नेहरू के समाजवाद का समग्र मूल्यांकन किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने भारत के लिए ऐसा विकास मॉडल प्रस्तुत किया जो लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, वैज्ञानिक सोच और आर्थिक प्रगति के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है। यद्यपि इसकी कुछ व्यावहारिक सीमाएँ थीं, फिर भी स्वतंत्र भारत की प्रारंभिक दशाओं में यह मॉडल राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुआ।
अध्याय–2 की मूल बात
जवाहरलाल नेहरू का समाजवाद भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित लोकतांत्रिक समाजवाद था। इसका उद्देश्य हिंसक क्रांति के माध्यम से व्यवस्था परिवर्तन करना नहीं, बल्कि संविधान, लोकतंत्र और योजनाबद्ध विकास के माध्यम से आर्थिक समानता, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय प्रगति सुनिश्चित करना था।
उन्होंने मिश्रित अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक क्षेत्र, पंचवर्षीय योजनाओं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, औद्योगीकरण और कल्याणकारी राज्य को समाजवाद का व्यावहारिक आधार बनाया। यद्यपि उनके मॉडल की कुछ आलोचनाएँ हुईं, फिर भी आधुनिक भारत के औद्योगिक, वैज्ञानिक और संस्थागत विकास की मजबूत नींव रखने का श्रेय काफी हद तक नेहरू के समाजवादी दृष्टिकोण को दिया जाता है।
अगला अध्याय
अध्याय–3 : जवाहरलाल नेहरू का राष्ट्रवाद (Jawaharlal Nehru’s Idea of Nationalism)
राष्ट्रवाद का अर्थ एवं विकास
नेहरू के राष्ट्रवाद की अवधारणा
धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद
सांस्कृतिक विविधता और राष्ट्रीय एकता
अंतरराष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद का संबंध
आलोचनाएँ, समकालीन प्रासंगिकता, समग्र मूल्यांकन तथा अध्याय की मूल बात
इस विषय पर विद्यार्थी खुद आगे का नोट्स तैयार करेंगे.
जवाहरलाल नेहरू का समाजवाद
(Jawaharlal Nehru’s Idea of Socialism)
(A) दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions – 15/20 अंक)
जवाहरलाल नेहरू के जीवन, शिक्षा एवं राजनीतिक व्यक्तित्व का विस्तार से वर्णन कीजिए।
आधुनिक भारत के निर्माण में जवाहरलाल नेहरू के योगदान का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
जवाहरलाल नेहरू के समाजवाद की अवधारणा की व्याख्या करते हुए उसके प्रमुख स्रोतों का वर्णन कीजिए।
लोकतांत्रिक समाजवाद से आप क्या समझते हैं? नेहरू के लोकतांत्रिक समाजवाद की प्रमुख विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
नेहरू के समाजवादी चिंतन पर मार्क्सवाद तथा गांधीवाद के प्रभाव का विश्लेषण कीजिए।
मिश्रित अर्थव्यवस्था की अवधारणा का वर्णन करते हुए बताइए कि नेहरू ने इसे क्यों अपनाया?
नेहरू के समाजवाद में सार्वजनिक क्षेत्र (Public Sector) की भूमिका का आलोचनात्मक अध्ययन कीजिए।
नेहरू के आर्थिक नियोजन (Economic Planning) के सिद्धांत का विश्लेषण कीजिए।
नेहरू के औद्योगीकरण संबंधी विचारों का मूल्यांकन कीजिए।
नेहरू के समाजवाद में कल्याणकारी राज्य (Welfare State) की अवधारणा का विवेचन कीजिए।
नेहरू के समाजवाद की प्रमुख विशेषताओं एवं सीमाओं का आलोचनात्मक अध्ययन कीजिए।
नेहरू के समाजवाद की समकालीन प्रासंगिकता पर विस्तार से चर्चा कीजिए।
भारतीय विकास मॉडल के निर्माण में नेहरू के योगदान का मूल्यांकन कीजिए।
नेहरू के समाजवाद और मार्क्सवादी समाजवाद में अंतर स्पष्ट कीजिए।
"नेहरू का समाजवाद भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित लोकतांत्रिक समाजवाद था।" इस कथन की समीक्षा कीजिए।
(B) मध्यम / लघु उत्तरीय प्रश्न (5–10 अंक)
जवाहरलाल नेहरू के व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
नेहरू की शिक्षा का उनके राजनीतिक विचारों पर क्या प्रभाव पड़ा?
महात्मा गांधी और नेहरू के संबंधों पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
नेहरू की प्रमुख पुस्तकों का परिचय दीजिए।
नेहरू को "आधुनिक भारत का निर्माता" क्यों कहा जाता है?
लोकतांत्रिक समाजवाद से क्या अभिप्राय है?
नेहरू के समाजवाद के प्रमुख स्रोत कौन-कौन से थे?
मिश्रित अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ लिखिए।
सार्वजनिक क्षेत्र का महत्व स्पष्ट कीजिए।
आर्थिक नियोजन से आप क्या समझते हैं?
पंचवर्षीय योजनाओं की आवश्यकता क्यों थी?
नेहरू के अनुसार वैज्ञानिक दृष्टिकोण का क्या महत्व था?
कल्याणकारी राज्य की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
आर्थिक लोकतंत्र क्या है?
सामाजिक न्याय के संबंध में नेहरू के विचार लिखिए।
औद्योगीकरण के संबंध में नेहरू के विचार स्पष्ट कीजिए।
कृषि सुधारों के प्रति नेहरू का दृष्टिकोण क्या था?
नेहरू के समाजवाद की कोई चार विशेषताएँ लिखिए।
नेहरू के समाजवाद की चार आलोचनाएँ लिखिए।
समकालीन भारत में नेहरू के समाजवाद की प्रासंगिकता बताइए।
(C) अति लघु उत्तरीय प्रश्न (2–3 अंक)
जवाहरलाल नेहरू का जन्म कब हुआ?
नेहरू का जन्म कहाँ हुआ?
नेहरू के पिता का नाम क्या था?
नेहरू की माता का नाम क्या था?
नेहरू ने किस विद्यालय में शिक्षा प्राप्त की?
Trinity College किस विश्वविद्यालय से संबंधित है?
नेहरू ने कानून की शिक्षा कहाँ से प्राप्त की?
नेहरू भारत के प्रथम प्रधानमंत्री कब बने?
नेहरू का जन्मदिन किस रूप में मनाया जाता है?
नेहरू की दो प्रसिद्ध पुस्तकों के नाम लिखिए।
लोकतांत्रिक समाजवाद क्या है?
मिश्रित अर्थव्यवस्था क्या है?
सार्वजनिक क्षेत्र से क्या अभिप्राय है?
कल्याणकारी राज्य किसे कहते हैं?
आर्थिक नियोजन क्या है?
पंचवर्षीय योजना क्या है?
सार्वजनिक क्षेत्र का एक उदाहरण दीजिए।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से क्या अभिप्राय है?
आर्थिक लोकतंत्र क्या है?
समाजवाद का मुख्य उद्देश्य क्या है?
(D) वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Questions)
रिक्त स्थान भरिए
जवाहरलाल नेहरू का जन्म ________ को हुआ था।
नेहरू भारत के प्रथम ________ थे।
नेहरू ने ________ विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की।
नेहरू ने ________ समाजवाद का समर्थन किया।
मिश्रित अर्थव्यवस्था में ________ और ________ दोनों क्षेत्र कार्य करते हैं।
नेहरू ________ दृष्टिकोण के समर्थक थे।
भारत में ________ योजनाओं की शुरुआत नेहरू काल में हुई।
नेहरू ने ________ राज्य की अवधारणा का समर्थन किया।
बड़े बाँधों को नेहरू ने ________ कहा।
नेहरू का जन्मदिन ________ के रूप में मनाया जाता है।
सही/गलत बताइए
नेहरू हिंसक क्रांति के समर्थक थे।
नेहरू लोकतांत्रिक समाजवाद के समर्थक थे।
नेहरू ने पूर्ण साम्यवाद का समर्थन किया।
मिश्रित अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र की भी भूमिका होती है।
नेहरू वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विरोधी थे।
नेहरू ने सार्वजनिक क्षेत्र को महत्व दिया।
नेहरू पंचवर्षीय योजनाओं के समर्थक थे।
नेहरू ने कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को स्वीकार किया।
नेहरू भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे।
नेहरू की प्रसिद्ध पुस्तक The Discovery of India है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)
जवाहरलाल नेहरू का जन्म हुआ था—
(A) 1887
(B) 1889
(C) 1890
(D) 1892नेहरू ने किस प्रकार के समाजवाद का समर्थन किया?
(A) साम्यवादी समाजवाद
(B) फासीवादी समाजवाद
(C) लोकतांत्रिक समाजवाद
(D) अराजकतावादनेहरू किस आर्थिक व्यवस्था के समर्थक थे?
(A) पूर्ण पूँजीवाद
(B) पूर्ण साम्यवाद
(C) मिश्रित अर्थव्यवस्था
(D) सामंतवादनेहरू की प्रसिद्ध पुस्तक कौन-सी है?
(A) हिन्द स्वराज
(B) The Discovery of India
(C) दास कैपिटल
(D) रिपब्लिकनेहरू ने बड़े बाँधों को क्या कहा?
(A) राष्ट्रीय धरोहर
(B) विकास केंद्र
(C) आधुनिक भारत के नए मंदिर
(D) राष्ट्रीय संपत्तिनेहरू किसके समर्थक थे?
(A) तानाशाही
(B) राजतंत्र
(C) लोकतंत्र
(D) सैन्य शासननेहरू के समाजवाद का मुख्य उद्देश्य था—
(A) केवल औद्योगीकरण
(B) केवल कृषि विकास
(C) सामाजिक न्याय एवं आर्थिक समानता
(D) केवल व्यापारनेहरू किस दृष्टिकोण को राष्ट्रीय विकास का आधार मानते थे?
(A) धार्मिक दृष्टिकोण
(B) वैज्ञानिक दृष्टिकोण
(C) सामंती दृष्टिकोण
(D) रूढ़िवादी दृष्टिकोणनेहरू का समाजवाद मुख्यतः किस पर आधारित था?
(A) हिंसक क्रांति
(B) सैन्य शासन
(C) लोकतंत्र और योजनाबद्ध विकास
(D) राजतंत्रनेहरू का जन्मदिन मनाया जाता है—
(A) शिक्षक दिवस
(B) युवा दिवस
(C) बाल दिवस
(D) संविधान दिवस
