Unit – 5
Deen Dayal Upadhyaya : A brief life sketch, his idea of Ekatma Manav Darshan.
दीनदयाल उपाध्याय: संक्षिप्त जीवन परिचय एवं उनका ‘एकात्म मानव दर्शन’ का विचार।
दीनदयाल उपाध्याय आधुनिक भारत के उन प्रमुख राजनीतिक चिंतकों में गिने जाते हैं जिन्होंने भारतीय संस्कृति, दर्शन और सामाजिक अनुभवों के आधार पर एक वैकल्पिक राजनीतिक एवं आर्थिक चिंतन प्रस्तुत करने का प्रयास किया। उनका व्यक्तित्व केवल एक राजनेता का नहीं था, बल्कि वे एक विचारक, लेखक, संगठनकर्ता, पत्रकार और समाज-द्रष्टा भी थे। उन्होंने भारतीय जीवन-दृष्टि को आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था, राष्ट्रीय पुनर्निर्माण और मानवीय विकास के साथ जोड़ने का प्रयास किया। उनका मानना था कि किसी भी राष्ट्र की राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था तभी स्थायी एवं सफल हो सकती है जब वह उस राष्ट्र की ऐतिहासिक चेतना, सांस्कृतिक परंपराओं, सामाजिक संरचना तथा नैतिक मूल्यों के अनुरूप विकसित की जाए। इसी उद्देश्य से उन्होंने “एकात्म मानव दर्शन” का प्रतिपादन किया, जिसे भारतीय चिंतन परंपरा पर आधारित एक समग्र मानववादी दर्शन माना जाता है।
दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर 1916 को उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद के नगला चंद्रभान ग्राम में हुआ, जिसे बाद में उनके सम्मान में दीनदयाल धाम के नाम से जाना जाने लगा। उनके पिता भगवती प्रसाद उपाध्याय रेलवे विभाग में कार्यरत थे और माता रामप्यारी धार्मिक एवं संस्कारवान महिला थीं। बाल्यकाल में ही माता-पिता के निधन के कारण उनका जीवन अनेक कठिनाइयों से भरा रहा। उनका पालन-पोषण ननिहाल में हुआ, जहाँ सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने शिक्षा के प्रति अद्भुत लगन दिखाई। वे प्रारंभ से ही मेधावी छात्र रहे और विभिन्न परीक्षाओं में उत्कृष्ट स्थान प्राप्त किया। उन्होंने विद्यालयी शिक्षा राजस्थान और उत्तर प्रदेश के विभिन्न स्थानों से प्राप्त की तथा उच्च शिक्षा कानपुर और प्रयाग में ग्रहण की। छात्र जीवन के दौरान उनमें राष्ट्रभक्ति, अनुशासन और सामाजिक सेवा की भावना विकसित हुई।
शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं की अपेक्षा राष्ट्रीय जीवन को प्राथमिकता दी। वे सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हुए और सामाजिक संगठन तथा राष्ट्रीय चेतना के प्रसार को अपना जीवन-ध्येय बनाया। उन्होंने पत्रकारिता को भी सामाजिक परिवर्तन का प्रभावी माध्यम माना। उनके संपादन में प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक अस्मिता, सामाजिक समरसता तथा स्वदेशी चिंतन को व्यापक अभिव्यक्ति मिली। उनकी लेखन शैली सरल, तर्कपूर्ण और विचारोत्तेजक थी। वे जटिल दार्शनिक विषयों को भी सहज भाषा में प्रस्तुत करने की क्षमता रखते थे।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के समक्ष राष्ट्र-निर्माण की चुनौती थी। उस समय विश्व दो प्रमुख विचारधाराओं—पूँजीवाद और साम्यवाद—के प्रभाव में विभाजित था। पूँजीवाद व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजी संपत्ति को अत्यधिक महत्व देता था, जबकि साम्यवाद राज्य को सर्वोच्च मानकर व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर देता था। दीनदयाल उपाध्याय ने इन दोनों व्यवस्थाओं का गंभीर अध्ययन किया और यह निष्कर्ष निकाला कि दोनों में कुछ सकारात्मक तत्व होने के बावजूद दोनों मानव जीवन की पूर्णता को समझने में असफल हैं। उनके अनुसार पूँजीवाद व्यक्ति को केवल उपभोक्ता और उत्पादक के रूप में देखता है, जबकि साम्यवाद व्यक्ति को वर्ग-संघर्ष का एक साधन मानता है। दोनों ही विचारधाराएँ मनुष्य के आध्यात्मिक, नैतिक और सांस्कृतिक पक्ष की उपेक्षा करती हैं। इसलिए उन्होंने भारतीय दर्शन पर आधारित एक ऐसे वैकल्पिक दृष्टिकोण की आवश्यकता अनुभव की जो मनुष्य के संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास कर सके।
इसी पृष्ठभूमि में उन्होंने एकात्म मानव दर्शन का प्रतिपादन किया। यह दर्शन इस विश्वास पर आधारित है कि मनुष्य केवल शरीर नहीं है और न ही केवल आर्थिक आवश्यकताओं का समूह है। मनुष्य शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का समन्वित स्वरूप है। इन चारों आयामों के संतुलित विकास के बिना न तो व्यक्ति का पूर्ण विकास संभव है और न ही समाज का। यदि केवल भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति पर बल दिया जाएगा तो जीवन में नैतिकता और आध्यात्मिकता का ह्रास होगा, और यदि केवल आध्यात्मिक पक्ष पर बल दिया जाएगा तो भौतिक आवश्यकताओं की उपेक्षा से सामाजिक असंतुलन उत्पन्न होगा। इसलिए एकात्म मानव दर्शन संतुलन, समन्वय और समग्रता पर आधारित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
इस दर्शन का मूल आधार भारतीय संस्कृति की वह अवधारणा है जिसमें समस्त सृष्टि को परस्पर संबंधित और परस्पर पूरक माना गया है। भारतीय परंपरा में व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व को एक-दूसरे से पृथक इकाइयों के रूप में नहीं, बल्कि एक अखंड जीवन-श्रृंखला के रूप में देखा जाता है। दीनदयाल उपाध्याय ने इसी विचार को आधुनिक राजनीतिक भाषा में व्यक्त किया। उनके अनुसार व्यक्ति का विकास समाज से जुड़ा है, समाज का विकास राष्ट्र से जुड़ा है और राष्ट्र का विकास सम्पूर्ण मानवता तथा प्रकृति के साथ संतुलित संबंध स्थापित किए बिना संभव नहीं है।
उन्होंने व्यक्ति और समाज के संबंध को प्रतिस्पर्धा के आधार पर नहीं, बल्कि सहयोग के आधार पर समझाया। उनका मानना था कि व्यक्ति और समाज एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। समाज व्यक्ति के विकास का माध्यम है और व्यक्ति समाज की उन्नति का आधार है। इसलिए ऐसी व्यवस्था आवश्यक है जिसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहे और सामाजिक उत्तरदायित्व भी सुदृढ़ हो। उन्होंने अधिकारों के साथ कर्तव्यों के महत्व पर विशेष बल दिया। उनका मत था कि यदि समाज केवल अधिकारों की मांग करेगा और कर्तव्यों की उपेक्षा करेगा तो लोकतंत्र दुर्बल हो जाएगा। स्वस्थ लोकतंत्र वही है जिसमें नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ सामाजिक एवं राष्ट्रीय दायित्वों का भी ईमानदारी से पालन करें।
एकात्म मानव दर्शन में धर्म की अवधारणा भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ धर्म का अर्थ किसी विशेष संप्रदाय, पूजा-पद्धति या धार्मिक पहचान से नहीं है। धर्म का आशय उन नैतिक सिद्धांतों और जीवन-मूल्यों से है जो समाज में न्याय, संतुलन, अनुशासन, करुणा और सद्भाव बनाए रखते हैं। उनके अनुसार राज्य किसी विशेष धर्म का पक्षधर नहीं होना चाहिए, किंतु राज्य की नीतियाँ नैतिक मूल्यों से प्रेरित अवश्य होनी चाहिए। शासन का उद्देश्य केवल कानून लागू करना नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित करना भी है जिनमें व्यक्ति का सर्वांगीण विकास संभव हो सके।
दीनदयाल उपाध्याय ने भारतीय परंपरा में वर्णित चार पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—को मानव जीवन की संतुलित संरचना के रूप में स्वीकार किया। उनके अनुसार अर्थ और काम मानव जीवन की स्वाभाविक आवश्यकताएँ हैं, किंतु उनका संचालन धर्म के मार्गदर्शन में होना चाहिए ताकि व्यक्ति और समाज दोनों का कल्याण सुनिश्चित हो। मोक्ष को उन्होंने केवल आध्यात्मिक मुक्ति के रूप में नहीं, बल्कि आत्मबोध, आंतरिक संतुलन और उच्च नैतिक चेतना की प्राप्ति के रूप में भी देखा। इस प्रकार उनका दर्शन भौतिक और आध्यात्मिक दोनों आयामों का समन्वय प्रस्तुत करता है।
आर्थिक चिंतन के क्षेत्र में उन्होंने ऐसी व्यवस्था का समर्थन किया जिसमें उत्पादन का उद्देश्य केवल लाभ अर्जित करना न होकर समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति और मानव कल्याण हो। उन्होंने स्वदेशी, विकेंद्रीकरण, लघु उद्योगों के विकास, ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सुदृढ़ता, रोजगार सृजन तथा स्थानीय संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग पर बल दिया। उनका विचार था कि आर्थिक नीतियों का मूल्यांकन केवल राष्ट्रीय आय की वृद्धि से नहीं, बल्कि इस आधार पर किया जाना चाहिए कि वे समाज के अंतिम व्यक्ति तक समृद्धि, सम्मान और अवसर पहुँचाने में कितनी सफल हैं। उन्होंने यह भी माना कि आर्थिक विकास पर्यावरणीय संतुलन और सामाजिक न्याय की उपेक्षा करके नहीं किया जाना चाहिए।
राजनीतिक दृष्टि से वे लोकतंत्र के समर्थक थे, किंतु लोकतंत्र को केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं मानते थे। उनके अनुसार लोकतंत्र तभी सार्थक है जब उसमें नैतिक नेतृत्व, उत्तरदायी शासन, सक्रिय नागरिक समाज, विकेंद्रीकृत प्रशासन तथा जनसहभागिता का समुचित विकास हो। वे राजनीतिक दलों से वैचारिक स्पष्टता, अनुशासन और जनसेवा की अपेक्षा करते थे। उनका मत था कि सत्ता स्वयं में लक्ष्य नहीं है; सत्ता समाज-सेवा और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का माध्यम है।
राष्ट्रीयता के संबंध में उनका दृष्टिकोण सांस्कृतिक आधार पर निर्मित था। उनके अनुसार राष्ट्र केवल राजनीतिक सीमाओं या प्रशासनिक संस्थाओं का समूह नहीं है। राष्ट्र एक जीवंत सांस्कृतिक चेतना है, जिसका निर्माण साझा इतिहास, परंपराओं, मूल्यों, स्मृतियों और सामूहिक आकांक्षाओं से होता है। उन्होंने राष्ट्रीय एकता को विविधताओं के सम्मान के साथ जोड़कर देखा। उनका विश्वास था कि भाषा, क्षेत्र, जाति या पंथ की विविधताओं के रहते हुए भी एक साझा राष्ट्रीय चेतना विकसित की जा सकती है।
सामाजिक दृष्टि से उन्होंने समरसता को विशेष महत्व दिया। उनके अनुसार समाज में जाति, वर्ग, क्षेत्र और आर्थिक असमानताओं के कारण उत्पन्न विभाजन राष्ट्रीय शक्ति को कमजोर करते हैं। इसलिए सामाजिक संबंधों में सम्मान, सहयोग, न्याय और समान अवसर की भावना विकसित होना आवश्यक है। वे ऐसे समाज की कल्पना करते थे जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को उसकी योग्यता के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर मिले तथा किसी प्रकार का भेदभाव सामाजिक प्रगति में बाधा न बने।
शिक्षा के संबंध में उनका विचार था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, राष्ट्रीय चेतना, नैतिक मूल्यों, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास भी होना चाहिए। ऐसी शिक्षा व्यवस्था व्यक्ति को अपनी संस्कृति से जोड़ते हुए आधुनिक ज्ञान और तकनीकी दक्षता से भी संपन्न बनाए। वे मानते थे कि शिक्षा का भारतीयकरण और आधुनिकीकरण परस्पर विरोधी नहीं हैं, बल्कि दोनों का समन्वय संभव और आवश्यक है।
एकात्म मानव दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता उसकी समग्र दृष्टि है। यह दर्शन व्यक्ति, समाज, राज्य, अर्थव्यवस्था, संस्कृति और प्रकृति को एक-दूसरे से जुड़ी हुई इकाइयों के रूप में देखता है। इसमें विकास का अर्थ केवल उत्पादन बढ़ाना या उपभोग बढ़ाना नहीं है, बल्कि मानवीय गरिमा, नैतिकता, सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक आत्मविश्वास, पर्यावरणीय संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति का समन्वित विस्तार है। इस कारण यह दर्शन आधुनिक विकास विमर्श में भी प्रासंगिक माना जाता है, विशेषकर तब जब विश्व जलवायु परिवर्तन, सामाजिक विषमता, उपभोक्तावाद और नैतिक संकट जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है।
यद्यपि एकात्म मानव दर्शन की व्यापक सराहना हुई है, फिर भी इसकी आलोचनाएँ भी की गई हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि इसकी अनेक अवधारणाएँ दार्शनिक रूप से प्रेरणादायक तो हैं, परंतु उनके व्यावहारिक क्रियान्वयन के लिए अधिक स्पष्ट नीतिगत ढाँचे की आवश्यकता है। कुछ अन्य विद्वान इसे भारतीय सांस्कृतिक परंपरा पर आधारित एक विशिष्ट वैचारिक मॉडल मानते हैं, जबकि समर्थकों का तर्क है कि इसकी मूल भावना सार्वभौमिक है क्योंकि यह मानव गरिमा, संतुलित विकास, नैतिक राजनीति और सामाजिक सहयोग जैसे सार्वभौमिक मूल्यों पर आधारित है। इन मतभेदों के बावजूद यह निर्विवाद है कि दीनदयाल उपाध्याय ने भारतीय राजनीतिक चिंतन को एक मौलिक वैचारिक दिशा प्रदान की।
समग्र रूप से दीनदयाल उपाध्याय का जीवन सादगी, सेवा, संगठन, वैचारिक निष्ठा और राष्ट्रीय समर्पण का उदाहरण प्रस्तुत करता है। उनका एकात्म मानव दर्शन भारतीय चिंतन परंपरा और आधुनिक लोकतांत्रिक आवश्यकताओं के मध्य समन्वय स्थापित करने का प्रयास है। यह दर्शन मनुष्य को केवल आर्थिक प्राणी न मानकर शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा से युक्त पूर्ण व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार करता है तथा विकास को नैतिकता, संस्कृति, सामाजिक समरसता, आर्थिक न्याय, पर्यावरणीय संतुलन और राष्ट्रीय एकता के साथ जोड़ता है। इसी कारण उनका चिंतन भारतीय राजनीतिक विचारधारा के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है और समकालीन राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक विमर्श में आज भी विचारणीय एवं प्रासंगिक बना हुआ है।
