Unit – 4
Socialist School: Bernstein, Gramski.
समाजवादी विचारधारा: एडुआर्ड बर्नस्टीन एवं एंटोनियो ग्राम्शी।
समाजवादी विचारधारा आधुनिक राजनीतिक दर्शन की एक व्यापक और बहुआयामी परंपरा है, जिसका मूल उद्देश्य सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता, श्रमिक अधिकारों की रक्षा तथा मानव गरिमा पर आधारित समाज की स्थापना करना है। समय के साथ समाजवाद का स्वरूप बदलता रहा और विभिन्न विचारकों ने अपने-अपने सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक संदर्भों के अनुसार इसकी नई व्याख्याएँ प्रस्तुत कीं। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में कार्ल मार्क्स द्वारा प्रतिपादित वैज्ञानिक समाजवाद ने समाजवादी चिंतन को एक मजबूत सैद्धांतिक आधार प्रदान किया, किंतु बाद के अनेक विचारकों ने बदलती परिस्थितियों में मार्क्सवाद का पुनर्मूल्यांकन भी किया। इनमें एडुआर्ड बर्नस्टीन और एंटोनियो ग्राम्शी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। बर्नस्टीन ने समाजवाद को लोकतांत्रिक, संसदीय और क्रमिक सुधारों के माध्यम से प्राप्त करने का मार्ग प्रस्तुत किया, जबकि ग्राम्शी ने संस्कृति, शिक्षा, वैचारिक नेतृत्व और नागरिक समाज की भूमिका को समाजवादी परिवर्तन के केंद्र में स्थापित किया। इन दोनों विचारकों ने समाजवादी चिंतन को नई दिशा प्रदान की और यह स्पष्ट किया कि सामाजिक परिवर्तन केवल आर्थिक संरचना के परिवर्तन से नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्थाओं, सांस्कृतिक मूल्यों और जनचेतना के विकास से भी जुड़ा हुआ है।
एडुआर्ड बर्नस्टीन का जन्म 1850 में जर्मनी में हुआ। वे जर्मन समाजवादी आंदोलन के प्रमुख नेता और विचारक थे। प्रारंभिक जीवन में वे मार्क्सवादी विचारों से अत्यधिक प्रभावित थे, किंतु समय के साथ उन्होंने यूरोप की बदलती आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों का गहन अध्ययन किया। उन्होंने देखा कि मार्क्स द्वारा जिन परिस्थितियों के आधार पर पूँजीवाद के शीघ्र पतन की भविष्यवाणी की गई थी, वे पूरी तरह साकार नहीं हो रही थीं। औद्योगिक देशों में श्रमिकों की स्थिति कुछ क्षेत्रों में सुधर रही थी, लोकतांत्रिक संस्थाएँ मजबूत हो रही थीं, श्रमिक संगठनों का विस्तार हो रहा था और सामाजिक सुधारों के माध्यम से पूँजीवादी व्यवस्था स्वयं को बदलने की क्षमता प्रदर्शित कर रही थी। इन अनुभवों के आधार पर बर्नस्टीन ने समाजवाद की एक नई व्याख्या प्रस्तुत की, जिसे संशोधनवाद अथवा विकासवादी समाजवाद कहा जाता है।
बर्नस्टीन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह था कि उन्होंने समाजवादी परिवर्तन के लिए हिंसात्मक क्रांति की अनिवार्यता को अस्वीकार किया। उनका विश्वास था कि लोकतांत्रिक संस्थाओं, चुनावों, श्रमिक संगठनों, सहकारी संस्थाओं तथा सामाजिक सुधारों के माध्यम से भी समाजवादी उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सकता है। उनके अनुसार यदि लोकतांत्रिक व्यवस्था जनता को अपनी सरकार चुनने, कानून बनाने और सामाजिक नीतियों को प्रभावित करने का अवसर देती है, तो समाजवादी परिवर्तन के लिए सशस्त्र क्रांति आवश्यक नहीं रह जाती। इस प्रकार उन्होंने समाजवाद और लोकतंत्र के बीच घनिष्ठ संबंध स्थापित किया।
बर्नस्टीन ने मार्क्स के आर्थिक विश्लेषण की भी आलोचनात्मक समीक्षा की। उनका मत था कि पूँजीवाद पूर्णतः स्थिर व्यवस्था नहीं है, बल्कि उसमें स्वयं को बदलने और नई परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलित करने की क्षमता होती है। उन्होंने देखा कि पूँजी का संपूर्ण केंद्रीकरण नहीं हुआ, बल्कि अनेक छोटे और मध्यम उद्योग भी अस्तित्व में बने रहे। श्रमिक वर्ग की स्थिति भी सर्वत्र लगातार खराब नहीं हुई, बल्कि अनेक देशों में मजदूरी, कार्य-स्थितियों और सामाजिक सुरक्षा में सुधार हुआ। इसलिए उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि समाजवाद का आधार केवल पूँजीवाद के अनिवार्य पतन की प्रतीक्षा करना नहीं होना चाहिए, बल्कि लोकतांत्रिक सुधारों के माध्यम से समाज को अधिक न्यायपूर्ण बनाया जा सकता है।
बर्नस्टीन ने सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और लोकतांत्रिक अधिकारों को एक-दूसरे का पूरक माना। उनके अनुसार समाजवाद का उद्देश्य केवल उत्पादन के साधनों पर सार्वजनिक नियंत्रण स्थापित करना नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रताओं, राजनीतिक अधिकारों और सामाजिक अवसरों का विस्तार भी होना चाहिए। उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, स्वतंत्र न्यायपालिका, बहुदलीय लोकतंत्र तथा संसदीय व्यवस्था का समर्थन किया। उनका विश्वास था कि लोकतांत्रिक संस्थाएँ समाजवादी परिवर्तन की सबसे प्रभावी आधारशिला बन सकती हैं।
बर्नस्टीन ने सहकारी संस्थाओं, श्रमिक संगठनों, सामाजिक बीमा, प्रगतिशील कर व्यवस्था, श्रम कानूनों तथा सार्वजनिक कल्याण की योजनाओं को समाजवाद की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि राज्य का उद्देश्य केवल आर्थिक नियंत्रण नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा तथा समान अवसरों की व्यवस्था करना भी होना चाहिए। इस प्रकार उनका समाजवाद क्रांतिकारी परिवर्तन की अपेक्षा क्रमिक और संवैधानिक परिवर्तन पर आधारित था।
बर्नस्टीन के विचारों का आधुनिक सामाजिक लोकतंत्र पर गहरा प्रभाव पड़ा। यूरोप के अनेक देशों में समाजवादी दलों ने उनके विचारों को अपनाते हुए लोकतांत्रिक राजनीति के माध्यम से श्रमिक अधिकारों, कल्याणकारी राज्य, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा तथा सामाजिक सुरक्षा की नीतियों को विकसित किया। आज जिन देशों में सामाजिक लोकतंत्र की परंपरा दिखाई देती है, वहाँ बर्नस्टीन के विचारों की स्पष्ट छाप मिलती है।
यद्यपि बर्नस्टीन के विचारों की व्यापक सराहना हुई, फिर भी उन्हें अनेक आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। पारंपरिक मार्क्सवादियों ने उन पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने वर्ग-संघर्ष और क्रांतिकारी परिवर्तन की मूल भावना को कमजोर कर दिया। उनका मत था कि पूँजीवाद में सुधार संभव अवश्य है, किंतु उसकी मूल संरचना शोषण पर आधारित रहती है। दूसरी ओर बर्नस्टीन का तर्क था कि यदि लोकतांत्रिक साधनों से सामाजिक न्याय प्राप्त किया जा सकता है, तो हिंसक क्रांति की आवश्यकता नहीं है। इसी मतभेद ने समाजवादी आंदोलन के भीतर संशोधनवाद और क्रांतिकारी समाजवाद के बीच महत्वपूर्ण वैचारिक बहस को जन्म दिया।
एंटोनियो ग्राम्शी का जन्म 1891 में इटली में हुआ। वे बीसवीं शताब्दी के सबसे मौलिक मार्क्सवादी विचारकों में गिने जाते हैं। उन्होंने राजनीतिक दर्शन, संस्कृति, शिक्षा, भाषा, इतिहास और समाजशास्त्र के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका जीवन राजनीतिक संघर्षों से भरा रहा। फासीवादी शासन के दौरान उन्हें कारावास का सामना करना पड़ा। जेल में रहते हुए उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण लेख लिखे, जिन्हें बाद में “प्रिजन नोटबुक्स” के नाम से प्रकाशित किया गया। इन लेखों में उन्होंने मार्क्सवाद की नई व्याख्या प्रस्तुत की और यह समझाने का प्रयास किया कि केवल आर्थिक संरचना के विश्लेषण से समाज को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।
ग्राम्शी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान सांस्कृतिक वर्चस्व अर्थात सांस्कृतिक हेजेमनी की अवधारणा है। उनके अनुसार किसी भी शासक वर्ग की शक्ति केवल आर्थिक संसाधनों या राजनीतिक बल पर आधारित नहीं होती, बल्कि वह समाज की विचारधारा, शिक्षा, धर्म, साहित्य, मीडिया, परिवार और सांस्कृतिक संस्थाओं के माध्यम से भी अपनी स्वीकृति प्राप्त करता है। जब जनता शासक वर्ग के मूल्यों और विचारों को स्वाभाविक तथा उचित मानने लगती है, तब सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित होता है। इस प्रकार सत्ता केवल बल प्रयोग से नहीं, बल्कि सहमति के निर्माण के माध्यम से भी संचालित होती है।
ग्राम्शी ने नागरिक समाज की भूमिका को विशेष महत्व दिया। उनके अनुसार विद्यालय, विश्वविद्यालय, धार्मिक संस्थाएँ, मीडिया, साहित्यिक संगठन, सांस्कृतिक मंच और सामाजिक संगठन केवल सामाजिक संस्थाएँ नहीं हैं, बल्कि वे समाज की वैचारिक दिशा निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि समाजवादी परिवर्तन करना है, तो इन संस्थाओं के भीतर वैकल्पिक विचारधारा और नई सामाजिक चेतना का विकास करना आवश्यक है। इस प्रकार उन्होंने राजनीतिक संघर्ष को केवल राज्य सत्ता प्राप्त करने तक सीमित न रखकर सांस्कृतिक और वैचारिक संघर्ष के रूप में भी देखा।
ग्राम्शी ने पारंपरिक और जैविक बुद्धिजीवियों की अवधारणा प्रस्तुत की। उनके अनुसार प्रत्येक समाज में बुद्धिजीवी केवल शिक्षक, लेखक या दार्शनिक नहीं होते, बल्कि वे सभी व्यक्ति जो समाज की विचारधारा को प्रभावित करते हैं, बुद्धिजीवी कहलाते हैं। पारंपरिक बुद्धिजीवी स्वयं को समाज से स्वतंत्र मानते हैं, जबकि जैविक बुद्धिजीवी किसी विशेष सामाजिक वर्ग के अनुभवों और संघर्षों से जुड़े होते हैं। ग्राम्शी का मत था कि श्रमिक वर्ग को अपने जैविक बुद्धिजीवियों का विकास करना चाहिए ताकि वह समाज में वैकल्पिक नेतृत्व और नई वैचारिक दिशा प्रदान कर सके।
ग्राम्शी ने राजनीतिक परिवर्तन की रणनीति में भी महत्वपूर्ण संशोधन किया। उन्होंने युद्ध की दो अवधारणाओं—स्थिति का युद्ध और आक्रमण का युद्ध—का उल्लेख किया। उनके अनुसार जिन देशों में लोकतांत्रिक संस्थाएँ, नागरिक समाज और सांस्कृतिक संगठन मजबूत होते हैं, वहाँ केवल प्रत्यक्ष राजनीतिक क्रांति पर्याप्त नहीं होती। पहले समाज में वैचारिक और सांस्कृतिक परिवर्तन लाना आवश्यक होता है। इस प्रक्रिया को उन्होंने स्थिति का युद्ध कहा। जब समाज में व्यापक वैचारिक समर्थन प्राप्त हो जाए, तब राजनीतिक परिवर्तन अधिक स्थायी और सफल हो सकता है।
ग्राम्शी के विचारों में शिक्षा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल व्यावसायिक दक्षता प्रदान करना नहीं, बल्कि आलोचनात्मक चेतना, सामाजिक उत्तरदायित्व तथा लोकतांत्रिक मूल्यों का विकास करना भी है। उन्होंने ऐसी शिक्षा व्यवस्था का समर्थन किया जो व्यक्ति को स्वतंत्र चिंतन, सामाजिक न्याय और सक्रिय नागरिकता के लिए तैयार करे। इस प्रकार शिक्षा को उन्होंने सामाजिक परिवर्तन का प्रमुख साधन माना।
राज्य के संबंध में ग्राम्शी का दृष्टिकोण भी व्यापक था। उनके अनुसार राज्य केवल प्रशासनिक संस्थाओं का समूह नहीं है, बल्कि राजनीतिक समाज और नागरिक समाज दोनों का समन्वित रूप है। राजनीतिक समाज कानून, पुलिस और प्रशासन के माध्यम से कार्य करता है, जबकि नागरिक समाज सहमति और वैचारिक नेतृत्व के माध्यम से समाज को प्रभावित करता है। इसलिए स्थायी सामाजिक परिवर्तन के लिए दोनों स्तरों पर कार्य करना आवश्यक है।
बर्नस्टीन और ग्राम्शी के विचारों में अनेक समानताएँ दिखाई देती हैं। दोनों ने समाजवादी परिवर्तन को केवल हिंसक क्रांति तक सीमित नहीं माना। दोनों ने लोकतांत्रिक संस्थाओं, शिक्षा, सामाजिक संगठनों और जनचेतना के महत्व को स्वीकार किया। दोनों का विश्वास था कि समाजवाद का उद्देश्य केवल आर्थिक समानता स्थापित करना नहीं, बल्कि लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और मानव गरिमा को भी सुदृढ़ करना है। दोनों ने बदलती परिस्थितियों के अनुसार मार्क्सवादी चिंतन का पुनर्मूल्यांकन किया और समाजवादी विचारधारा को अधिक व्यापक तथा व्यावहारिक स्वरूप प्रदान किया।
इसके साथ ही दोनों के विचारों में महत्वपूर्ण अंतर भी हैं। बर्नस्टीन का मुख्य ध्यान संसदीय लोकतंत्र, सामाजिक सुधार और आर्थिक नीतियों पर केंद्रित था। उन्होंने पूँजीवाद में सुधार की संभावनाओं को स्वीकार करते हुए क्रमिक परिवर्तन का समर्थन किया। दूसरी ओर ग्राम्शी का मुख्य ध्यान संस्कृति, विचारधारा, शिक्षा, नागरिक समाज और वैचारिक नेतृत्व पर था। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि जब तक समाज की सांस्कृतिक चेतना में परिवर्तन नहीं होगा, तब तक केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन स्थायी सामाजिक परिवर्तन नहीं ला सकता। इस प्रकार बर्नस्टीन ने लोकतांत्रिक समाजवाद की दिशा को मजबूत किया, जबकि ग्राम्शी ने सांस्कृतिक मार्क्सवाद और नव-मार्क्सवादी चिंतन की आधारशिला रखी।
आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत, समाजशास्त्र, सांस्कृतिक अध्ययन, शिक्षा, मीडिया अध्ययन और लोकतांत्रिक राजनीति पर इन दोनों विचारकों का गहरा प्रभाव पड़ा है। सामाजिक लोकतंत्र, कल्याणकारी राज्य, श्रमिक अधिकार, सामाजिक सुरक्षा, नागरिक समाज की भूमिका, वैचारिक नेतृत्व, सांस्कृतिक राजनीति तथा जनसंचार माध्यमों के अध्ययन में उनके विचार आज भी व्यापक रूप से प्रासंगिक माने जाते हैं। विशेष रूप से वैश्वीकरण, डिजिटल मीडिया, सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक आंदोलनों और लोकतांत्रिक भागीदारी के समकालीन विमर्श में ग्राम्शी की सांस्कृतिक वर्चस्व की अवधारणा तथा बर्नस्टीन की लोकतांत्रिक समाजवाद की अवधारणा नए संदर्भों में बार-बार उद्धृत की जाती है।
यद्यपि दोनों विचारकों के सिद्धांतों की आलोचना भी हुई है। कुछ मार्क्सवादी विद्वानों ने बर्नस्टीन पर समाजवादी आंदोलन की क्रांतिकारी भावना को कमजोर करने का आरोप लगाया, जबकि कुछ उदारवादी विद्वानों ने ग्राम्शी की सांस्कृतिक वर्चस्व की अवधारणा को अत्यधिक व्यापक और जटिल बताया। इसके बावजूद यह निर्विवाद है कि दोनों ने समाजवादी चिंतन को अधिक व्यावहारिक, लोकतांत्रिक और बहुआयामी स्वरूप प्रदान किया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि आधुनिक समाज में सामाजिक परिवर्तन केवल आर्थिक संरचना के परिवर्तन से संभव नहीं है, बल्कि उसके लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं, सांस्कृतिक मूल्यों, शिक्षा, नागरिक समाज, जनभागीदारी और वैचारिक नेतृत्व का भी समान रूप से महत्वपूर्ण योगदान होता है।
समग्र रूप से एडुआर्ड बर्नस्टीन और एंटोनियो ग्राम्शी समाजवादी विचारधारा के ऐसे महत्वपूर्ण स्तंभ हैं जिन्होंने मार्क्सवादी परंपरा को नई परिस्थितियों के अनुरूप विकसित किया। बर्नस्टीन ने लोकतांत्रिक समाजवाद, संवैधानिक सुधार, श्रमिक अधिकारों और कल्याणकारी राज्य की अवधारणाओं को मजबूत आधार प्रदान किया। ग्राम्शी ने संस्कृति, शिक्षा, नागरिक समाज, वैचारिक नेतृत्व और सांस्कृतिक वर्चस्व की अवधारणाओं के माध्यम से यह सिद्ध किया कि राजनीतिक शक्ति केवल आर्थिक नियंत्रण का परिणाम नहीं होती, बल्कि सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक सहमति पर भी आधारित होती है। इन दोनों विचारकों के योगदान ने समाजवादी विचारधारा को अधिक व्यापक, लोकतांत्रिक, मानवीय और समकालीन बनाया। आज भी सामाजिक न्याय, लोकतंत्र, समान अवसर, नागरिक भागीदारी, सांस्कृतिक विविधता और वैचारिक स्वतंत्रता पर होने वाले विमर्श में उनके विचार अत्यंत प्रासंगिक माने जाते हैं और आधुनिक राजनीतिक दर्शन के अध्ययन में उनका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
