Paper 1 – Contemporary Political Thought
समकालीन राजनीतिक चिंतन
समकालीन राजनीतिक चिंतन आधुनिक युग की उन राजनीतिक अवधारणाओं, सिद्धांतों, मूल्यों और विमर्शों का समग्र अध्ययन है जो विशेष रूप से बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से लेकर इक्कीसवीं शताब्दी तक की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा वैश्विक परिस्थितियों के संदर्भ में विकसित हुए हैं। यह केवल राजनीतिक सिद्धांतों का संकलन नहीं है, बल्कि बदलते हुए समाज, राज्य, नागरिक, बाजार, प्रौद्योगिकी और वैश्विक व्यवस्था के बीच स्थापित होने वाले नए संबंधों का विश्लेषण भी है। यदि प्राचीन राजनीतिक चिंतन का केंद्र आदर्श राज्य और न्यायपूर्ण शासन था तथा आधुनिक राजनीतिक चिंतन का केंद्र स्वतंत्रता, समानता, लोकतंत्र और राष्ट्र-राज्य का निर्माण था, तो समकालीन राजनीतिक चिंतन का प्रमुख उद्देश्य उन नई चुनौतियों को समझना है जो वैश्वीकरण, उदारीकरण, तकनीकी क्रांति, पर्यावरण संकट, मानवाधिकार, लैंगिक समानता, पहचान की राजनीति तथा बहुसांस्कृतिक समाज के उदय के कारण उत्पन्न हुई हैं।
समकालीन राजनीतिक चिंतन का मूल आधार यह है कि राजनीति स्थिर नहीं होती, बल्कि समय, समाज और परिस्थितियों के अनुसार निरंतर परिवर्तित होती रहती है। प्रत्येक युग की अपनी विशेष समस्याएँ होती हैं और उन्हीं समस्याओं के समाधान की खोज से नए राजनीतिक विचार जन्म लेते हैं। वर्तमान समय में विश्व पहले की अपेक्षा अधिक परस्पर जुड़ा हुआ है। संचार क्रांति, इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, वैश्विक व्यापार, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने राजनीतिक व्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप राजनीति अब केवल राज्य की सीमाओं तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि उसका संबंध वैश्विक शासन, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व और मानव सुरक्षा जैसे विषयों से भी जुड़ गया है।
समकालीन राजनीतिक चिंतन की एक प्रमुख विशेषता इसका बहुआयामी स्वरूप है। यह केवल राज्य और सरकार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग, प्रत्येक समुदाय और प्रत्येक व्यक्ति के अधिकारों तथा अवसरों पर विचार करता है। इसमें महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, दिव्यांगजनों, प्रवासियों तथा अन्य वंचित समूहों के अधिकारों को भी राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण विषय माना गया है। इस प्रकार राजनीति का क्षेत्र पहले की अपेक्षा कहीं अधिक व्यापक और समावेशी बन गया है।
समकालीन राजनीतिक चिंतन लोकतंत्र को केवल चुनाव तक सीमित नहीं मानता। इसके अनुसार वास्तविक लोकतंत्र वह है जिसमें नागरिकों को निर्णय प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर मिले, शासन पारदर्शी और उत्तरदायी हो, कानून का शासन स्थापित हो तथा प्रत्येक व्यक्ति को अभिव्यक्ति, संगठन और विरोध का अधिकार प्राप्त हो। इस दृष्टिकोण में नागरिक केवल मतदाता नहीं बल्कि शासन प्रक्रिया के सक्रिय सहभागी माने जाते हैं। इसलिए सुशासन, उत्तरदायित्व, पारदर्शिता, जनभागीदारी और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे विचार समकालीन राजनीति के महत्वपूर्ण अंग बन गए हैं।
समकालीन राजनीतिक चिंतन में मानवाधिकारों को विशेष महत्व प्राप्त है। यह विचारधारा मानती है कि प्रत्येक व्यक्ति केवल इसलिए सम्मान और अधिकारों का अधिकारी है क्योंकि वह मनुष्य है। जीवन का अधिकार, समानता का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, स्वास्थ्य का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता तथा गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के आधार बन चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों की रक्षा के लिए अनेक संस्थाएँ और समझौते विकसित हुए हैं, जिन्होंने राजनीति की दिशा को व्यापक रूप से प्रभावित किया है।
इस चिंतन की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता सामाजिक न्याय पर बल देना है। केवल कानूनी समानता पर्याप्त नहीं मानी जाती, बल्कि आर्थिक और सामाजिक असमानताओं को कम करने के लिए सकारात्मक उपायों की आवश्यकता स्वीकार की जाती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, आरक्षण, समान अवसर और संसाधनों तक न्यायपूर्ण पहुँच को सामाजिक न्याय के आवश्यक तत्व माना जाता है। इस प्रकार समकालीन राजनीतिक चिंतन स्वतंत्रता और समानता के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।
वैश्वीकरण समकालीन राजनीतिक चिंतन का एक केंद्रीय विषय है। वैश्वीकरण ने विश्व को आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से एक-दूसरे के निकट ला दिया है। इसके कारण व्यापार, निवेश, तकनीक और सूचना का आदान-प्रदान तीव्र हुआ है, परन्तु इसके साथ-साथ आर्थिक विषमता, सांस्कृतिक प्रभुत्व, बेरोजगारी और स्थानीय पहचान के संकट जैसी समस्याएँ भी उत्पन्न हुई हैं। इसलिए समकालीन राजनीतिक चिंतन वैश्वीकरण के लाभ और हानियों दोनों का संतुलित विश्लेषण करता है तथा यह समझने का प्रयास करता है कि विकास और सामाजिक न्याय के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित किया जाए।
समकालीन राजनीतिक चिंतन में पर्यावरणीय राजनीति का विशेष महत्व है। औद्योगिकीकरण और अनियंत्रित विकास के कारण जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण तथा जैव विविधता का संकट गंभीर रूप धारण कर चुके हैं। इसलिए अब राजनीति का उद्देश्य केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि सतत विकास भी माना जाता है। वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा करना समकालीन राजनीतिक चिंतन का महत्वपूर्ण आदर्श बन चुका है।
समकालीन राजनीतिक चिंतन पहचान की राजनीति को भी गंभीरता से स्वीकार करता है। जाति, भाषा, धर्म, संस्कृति, क्षेत्र, नस्ल और लिंग के आधार पर विभिन्न समूह अपनी विशिष्ट पहचान, सम्मान और अधिकारों की मांग करते हैं। यह चिंतन इन विविध पहचानों का सम्मान करते हुए सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है। बहुसांस्कृतिक समाज में सहिष्णुता, संवाद और पारस्परिक सम्मान को लोकतंत्र की सफलता के लिए अनिवार्य माना जाता है।
प्रौद्योगिकी और डिजिटल क्रांति ने भी समकालीन राजनीतिक चिंतन को नई दिशा प्रदान की है। इंटरनेट, सोशल मीडिया, डिजिटल शासन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा बड़े आँकड़ों (बिग डेटा) ने राजनीति की कार्यप्रणाली को बदल दिया है। जहाँ एक ओर नागरिकों की भागीदारी और सूचना तक पहुँच बढ़ी है, वहीं दूसरी ओर निजता, साइबर सुरक्षा, दुष्प्रचार, डिजिटल निगरानी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के नैतिक उपयोग जैसे नए प्रश्न भी सामने आए हैं। समकालीन राजनीतिक चिंतन इन चुनौतियों का लोकतांत्रिक और मानव-केंद्रित समाधान खोजने का प्रयास करता है।
भारतीय संदर्भ में समकालीन राजनीतिक चिंतन का संबंध संविधान के मूल्यों, लोकतांत्रिक संस्थाओं की सुदृढ़ता, सामाजिक न्याय, संघवाद, धर्मनिरपेक्षता, पंचायती राज, सुशासन, पारदर्शिता, समावेशी विकास तथा डिजिटल प्रशासन से भी है। भारत जैसे बहुभाषी, बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश में समकालीन राजनीतिक चिंतन का उद्देश्य केवल शासन चलाना नहीं, बल्कि विविधताओं के मध्य एकता, समान अवसर, संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक संस्कृति को मजबूत करना भी है।
इस प्रकार समकालीन राजनीतिक चिंतन एक गतिशील, बहुआयामी और निरंतर विकसित होने वाला अध्ययन क्षेत्र है। यह अतीत के राजनीतिक अनुभवों से शिक्षा ग्रहण करते हुए वर्तमान की जटिल चुनौतियों का विश्लेषण करता है और भविष्य के लिए अधिक न्यायपूर्ण, लोकतांत्रिक, समावेशी, उत्तरदायी तथा मानवीय राजनीतिक व्यवस्था की कल्पना प्रस्तुत करता है। यही कारण है कि वर्तमान समय में राजनीति विज्ञान के अध्ययन में समकालीन राजनीतिक चिंतन का महत्व अत्यंत बढ़ गया है, क्योंकि इसके माध्यम से बदलती हुई विश्व-व्यवस्था, समाज और राज्य के स्वरूप को गहराई से समझा जा सकता है।
Unit – 1
Utilitarian School : Bentham, J.S. Mill.
उपयोगितावादी विचारधारा: जेरेमी बेंथम एवं जॉन स्टुअर्ट मिल।
उपयोगितावादी विचारधारा आधुनिक पाश्चात्य राजनीतिक एवं नैतिक चिंतन की सबसे प्रभावशाली विचारधाराओं में से एक मानी जाती है। इस विचारधारा का मूल आधार यह है कि किसी भी कार्य, नीति, संस्था अथवा कानून का मूल्यांकन उसके परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए। यदि किसी कार्य से अधिक से अधिक लोगों को अधिकतम सुख प्राप्त होता है, तो वह कार्य नैतिक, उचित और न्यायसंगत माना जाएगा। उपयोगितावाद का केंद्रीय सिद्धांत “अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख” है। इस विचारधारा ने केवल नैतिक दर्शन को ही नहीं, बल्कि राजनीति, विधिशास्त्र, प्रशासन, अर्थशास्त्र तथा सार्वजनिक नीति के विकास को भी गहराई से प्रभावित किया। उपयोगितावादी चिंतन का सर्वाधिक व्यवस्थित प्रतिपादन जेरेमी बेंथम ने किया, जबकि जॉन स्टुअर्ट मिल ने इसे अधिक मानवीय, नैतिक और उदारवादी स्वरूप प्रदान किया। इस प्रकार उपयोगितावाद का विकास केवल सुख की गणना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने व्यक्ति की स्वतंत्रता, नैतिकता, शिक्षा, सामाजिक न्याय तथा लोकतांत्रिक शासन की अवधारणाओं को भी प्रभावित किया।
उपयोगितावाद का बौद्धिक आधार इस विचार में निहित है कि मनुष्य स्वभावतः सुख की प्राप्ति और दुःख से बचने का प्रयास करता है। मानव व्यवहार का अधिकांश भाग इसी मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति से संचालित होता है। इसलिए राज्य, समाज और कानून का उद्देश्य भी ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित करना होना चाहिए जिनसे अधिकतम लोगों का कल्याण सुनिश्चित हो सके। इस विचारधारा ने जन्म, वंश, परंपरा, धर्म अथवा विशेषाधिकारों के आधार पर किसी व्यवस्था को उचित मानने के स्थान पर उसके व्यावहारिक परिणामों को महत्व दिया। इस दृष्टि से उपयोगितावाद आधुनिक युग में तर्क, अनुभव और सामाजिक उपयोगिता पर आधारित सुधारवादी विचारधारा के रूप में विकसित हुआ।
जेरेमी बेंथम का जन्म 1748 में इंग्लैंड में हुआ। वे असाधारण प्रतिभा के धनी थे और प्रारंभिक अवस्था से ही विधिशास्त्र तथा दर्शन के अध्ययन में रुचि रखते थे। उन्होंने अपने समय की न्यायिक व्यवस्था, दंड व्यवस्था तथा प्रशासनिक संस्थाओं का गंभीर अध्ययन किया और पाया कि अनेक कानून केवल परंपरा और रूढ़ियों के कारण बने हुए हैं, जबकि उनका समाज के वास्तविक कल्याण से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि प्रत्येक कानून का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि वह समाज के लिए कितना उपयोगी है। उनके अनुसार यदि कोई कानून लोगों के सुख में वृद्धि नहीं करता, तो उसे बदल देना चाहिए।
बेंथम का संपूर्ण दर्शन उपयोगिता के सिद्धांत पर आधारित है। उनके अनुसार प्रकृति ने मनुष्य को दो स्वामियों—सुख और दुःख—के अधीन रखा है। यही दोनों मनुष्य के सभी निर्णयों तथा कार्यों का मार्गदर्शन करते हैं। इसलिए नैतिकता, राजनीति और कानून का उद्देश्य भी सुख की मात्रा बढ़ाना और दुःख को कम करना होना चाहिए। उन्होंने उपयोगिता को उस गुण के रूप में परिभाषित किया जो किसी वस्तु, नीति या कार्य के माध्यम से सुख उत्पन्न करे अथवा दुःख को कम करे। इस प्रकार नैतिकता का आधार किसी धार्मिक आदेश या प्राकृतिक अधिकार में नहीं, बल्कि उपयोगिता में निहित माना गया।
बेंथम ने सुख के मूल्यांकन के लिए एक विशिष्ट पद्धति प्रस्तुत की जिसे सुख-गणना अथवा हेडोनिक कैलकुलस कहा जाता है। उनके अनुसार किसी कार्य से प्राप्त सुख का मूल्यांकन उसकी तीव्रता, अवधि, निश्चितता, निकटता, उत्पादकता, शुद्धता तथा उससे लाभान्वित होने वाले व्यक्तियों की संख्या के आधार पर किया जा सकता है। इस प्रकार उन्होंने नैतिक निर्णयों को यथासंभव तर्कसंगत और वस्तुनिष्ठ बनाने का प्रयास किया। यद्यपि व्यवहार में सुख का इस प्रकार सटीक मापन कठिन है, फिर भी यह विचार आधुनिक नीति-निर्माण में लागत-लाभ विश्लेषण जैसी पद्धतियों का वैचारिक आधार बना।
बेंथम प्राकृतिक अधिकारों के कट्टर आलोचक थे। उनका मत था कि अधिकार किसी काल्पनिक प्राकृतिक अवस्था से उत्पन्न नहीं होते, बल्कि राज्य द्वारा निर्मित कानूनों से प्राप्त होते हैं। उन्होंने प्राकृतिक अधिकारों को कल्पनाश्रित और अव्यावहारिक बताया तथा विधि-निर्माण की सर्वोच्चता पर बल दिया। उनके अनुसार अधिकार तभी सुरक्षित रह सकते हैं जब उन्हें विधिक मान्यता प्राप्त हो। इस दृष्टिकोण ने आधुनिक विधिक प्रत्यक्षवाद के विकास को भी प्रभावित किया।
राज्य के संबंध में बेंथम का विचार अत्यंत व्यावहारिक था। उनके अनुसार राज्य का अस्तित्व किसी दैवी इच्छा या सामाजिक अनुबंध के कारण नहीं, बल्कि इसलिए है क्योंकि वह समाज के अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख को बढ़ाने का साधन है। यदि राज्य जनता के हितों की रक्षा नहीं करता, तो उसके स्वरूप एवं नीतियों में परिवर्तन किया जाना चाहिए। उन्होंने प्रशासनिक सुधार, न्यायिक सरलता, पारदर्शिता तथा उत्तरदायित्व पर विशेष बल दिया। दंड व्यवस्था के संबंध में उनका मत था कि दंड स्वयं में एक बुराई है, इसलिए उसका प्रयोग तभी किया जाना चाहिए जब उससे भविष्य में होने वाली बड़ी हानि को रोका जा सके। उन्होंने अपराध की रोकथाम को दंड देने से अधिक महत्वपूर्ण माना।
बेंथम आर्थिक क्षेत्र में अपेक्षाकृत स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा के समर्थक थे, किंतु उनका मुख्य उद्देश्य किसी विशेष आर्थिक व्यवस्था का समर्थन करना नहीं, बल्कि सार्वजनिक उपयोगिता को बढ़ाना था। उन्होंने शासन के प्रत्येक निर्णय का मूल्यांकन इस आधार पर करने का सुझाव दिया कि उससे समाज के कितने लोगों को वास्तविक लाभ प्राप्त होगा।
जॉन स्टुअर्ट मिल का जन्म 1806 में इंग्लैंड में हुआ। उनके पिता जेम्स मिल स्वयं उपयोगितावादी विचारक थे और उन्होंने पुत्र को अत्यंत कठोर एवं व्यवस्थित शिक्षा प्रदान की। जॉन स्टुअर्ट मिल ने बेंथम के विचारों को स्वीकार किया, किंतु समय के साथ उन्होंने अनुभव किया कि उपयोगितावाद को अधिक मानवीय, नैतिक तथा उदारवादी आधार देने की आवश्यकता है। उन्होंने साहित्य, दर्शन, इतिहास और मनोविज्ञान का व्यापक अध्ययन किया तथा उपयोगितावादी सिद्धांत का पुनर्व्याख्यान प्रस्तुत किया।
मिल का सबसे महत्वपूर्ण योगदान सुख की गुणवत्ता और मात्रा के बीच अंतर स्थापित करना था। बेंथम के अनुसार सभी प्रकार के सुख मूलतः समान थे और उनमें केवल मात्रा का अंतर था, जबकि मिल ने कहा कि सभी सुख समान नहीं हो सकते। उनके अनुसार बौद्धिक, नैतिक और सांस्कृतिक सुख शारीरिक सुखों की अपेक्षा अधिक उच्च और मूल्यवान हैं। उन्होंने प्रसिद्ध रूप से कहा कि असंतुष्ट मनुष्य होना संतुष्ट पशु होने से बेहतर है तथा असंतुष्ट सुकरात होना संतुष्ट मूर्ख होने से श्रेष्ठ है। इस कथन के माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट किया कि मानव जीवन का उद्देश्य केवल इंद्रिय-सुख प्राप्त करना नहीं, बल्कि बौद्धिक और नैतिक उत्कृष्टता भी है।
मिल ने उपयोगितावाद को केवल व्यक्तिगत सुख तक सीमित नहीं रखा। उनके अनुसार मनुष्य सामाजिक प्राणी है और उसमें दूसरों के प्रति सहानुभूति, सहयोग तथा नैतिक उत्तरदायित्व की भावना भी होती है। इसलिए उपयोगिता का वास्तविक अर्थ सम्पूर्ण समाज के दीर्घकालीन कल्याण से है। उन्होंने नैतिक शिक्षा, सामाजिक चेतना और चरित्र निर्माण को उपयोगितावाद के आवश्यक अंग के रूप में स्वीकार किया।
व्यक्ति की स्वतंत्रता के संबंध में मिल का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने प्रतिपादित किया कि प्रत्येक व्यक्ति को विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, संगठन तथा जीवन-पद्धति की स्वतंत्रता प्राप्त होनी चाहिए, जब तक कि उसके कार्यों से दूसरों को प्रत्यक्ष हानि न पहुँचे। उनके अनुसार विचारों की स्वतंत्रता केवल व्यक्ति का अधिकार नहीं, बल्कि समाज की उन्नति की शर्त भी है। यदि किसी विचार को दबा दिया जाता है, तो समाज सत्य की खोज का अवसर खो देता है। गलत विचार भी उपयोगी हो सकते हैं क्योंकि उनके माध्यम से सही विचारों की पुष्टि और विकास संभव होता है। इस प्रकार मिल ने उपयोगितावाद को उदार लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़ दिया।
मिल प्रतिनिधिक लोकतंत्र के समर्थक थे। उनका विश्वास था कि शासन की गुणवत्ता केवल शासकों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि नागरिकों की सक्रिय भागीदारी पर भी निर्भर करती है। उन्होंने शिक्षित नागरिकता, सार्वजनिक बहस, उत्तरदायी सरकार तथा अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा पर बल दिया। उनका मत था कि लोकतंत्र का उद्देश्य केवल बहुमत का शासन नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के बौद्धिक और नैतिक विकास को प्रोत्साहित करना भी है।
महिलाओं के अधिकारों के क्षेत्र में भी मिल का योगदान अत्यंत उल्लेखनीय है। उन्होंने स्त्री और पुरुष के बीच कानूनी तथा सामाजिक समानता का समर्थन किया। उनका विचार था कि महिलाओं को शिक्षा, संपत्ति, रोजगार तथा राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखना समाज के लिए हानिकारक है। उन्होंने महिला मताधिकार का समर्थन किया और यह प्रतिपादित किया कि किसी भी सभ्य समाज में लिंग के आधार पर असमानता का कोई औचित्य नहीं है। इस दृष्टि से वे आधुनिक नारीवादी चिंतन के अग्रदूतों में भी गिने जाते हैं।
बेंथम और मिल के उपयोगितावाद में अनेक समानताएँ हैं। दोनों ने उपयोगिता को नैतिकता का आधार माना, दोनों ने सामाजिक कल्याण को राजनीतिक निर्णयों का उद्देश्य स्वीकार किया, दोनों ने परंपरागत विशेषाधिकारों का विरोध किया तथा कानूनों और संस्थाओं का मूल्यांकन उनके परिणामों के आधार पर करने की वकालत की। दोनों ही लोकतांत्रिक सुधार, विधिक समानता तथा सार्वजनिक हित के समर्थक थे।
इसके साथ ही दोनों के विचारों में महत्वपूर्ण अंतर भी हैं। बेंथम का उपयोगितावाद मुख्यतः मात्रात्मक था, जबकि मिल ने गुणात्मक दृष्टिकोण अपनाया। बेंथम सुख की मात्रा पर बल देते थे, जबकि मिल ने सुख की गुणवत्ता को अधिक महत्व दिया। बेंथम ने अधिकारों को पूर्णतः विधिक आधार पर समझा, जबकि मिल ने स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों को सामाजिक प्रगति के लिए आवश्यक माना। बेंथम का चिंतन अधिक यांत्रिक और गणनात्मक प्रतीत होता है, जबकि मिल का चिंतन नैतिकता, व्यक्तित्व विकास और उदारवाद से अधिक गहराई से जुड़ा हुआ है।
उपयोगितावादी विचारधारा ने आधुनिक शासन व्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाला है। कल्याणकारी राज्य की अवधारणा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, सार्वभौमिक शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, प्रशासनिक सुधार, न्यायिक सुधार, कर नीति, लागत-लाभ विश्लेषण, सार्वजनिक नीति का मूल्यांकन तथा विकास योजनाओं के निर्माण में उपयोगितावादी दृष्टिकोण का व्यापक प्रभाव दिखाई देता है। आधुनिक लोकतांत्रिक सरकारें जब किसी नीति के लाभ और हानि का विश्लेषण करती हैं तथा अधिकतम जनकल्याण को ध्यान में रखकर निर्णय लेती हैं, तब वे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उपयोगितावादी परंपरा से प्रभावित होती हैं।
इसके बावजूद उपयोगितावाद की अनेक आलोचनाएँ भी की गई हैं। आलोचकों का मत है कि सुख और दुःख का वस्तुनिष्ठ मापन संभव नहीं है, इसलिए नैतिक निर्णयों को केवल उपयोगिता पर आधारित नहीं किया जा सकता। यह भी कहा गया कि यदि बहुसंख्यक लोगों का सुख अल्पसंख्यकों के अधिकारों का हनन करके प्राप्त किया जाए, तो उपयोगितावाद उसे उचित ठहरा सकता है। इसलिए न्याय, समानता, मानवाधिकार तथा नैतिक कर्तव्य जैसे मूल्यों की स्वतंत्र महत्ता भी स्वीकार की जानी चाहिए। कुछ दार्शनिकों ने यह भी तर्क दिया कि मानव जीवन में प्रेम, विश्वास, गरिमा, सत्यनिष्ठा और नैतिक दायित्व जैसे अनेक मूल्य ऐसे हैं जिन्हें केवल सुख की कसौटी पर नहीं आँका जा सकता।
इन आलोचनाओं के बावजूद उपयोगितावादी विचारधारा आधुनिक राजनीतिक दर्शन की सबसे प्रभावशाली परंपराओं में से एक बनी हुई है। इसका कारण यह है कि इसने शासन और कानून को जनता के वास्तविक कल्याण से जोड़ने का प्रयास किया तथा राजनीतिक निर्णयों में तर्क, अनुभव और परिणामों के विश्लेषण को महत्व दिया। बेंथम ने उपयोगिता के सिद्धांत के माध्यम से आधुनिक विधि और प्रशासनिक सुधारों की आधारशिला रखी, जबकि जॉन स्टुअर्ट मिल ने उसी सिद्धांत को स्वतंत्रता, नैतिकता, लोकतंत्र, शिक्षा और मानवीय गरिमा के साथ समन्वित करके उसे अधिक व्यापक और उदार स्वरूप प्रदान किया। इस प्रकार उपयोगितावाद केवल सुख का दर्शन नहीं, बल्कि आधुनिक लोकतांत्रिक शासन, सामाजिक सुधार, सार्वजनिक नीति और नैतिक चिंतन का एक महत्वपूर्ण आधार बन गया है। आज भी सार्वजनिक नीतियों के मूल्यांकन, संसाधनों के न्यायपूर्ण उपयोग, सामाजिक कल्याण की योजनाओं तथा लोकतांत्रिक निर्णय-निर्माण की प्रक्रियाओं में उपयोगितावादी विचारधारा की प्रासंगिकता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है और यही इसकी स्थायी बौद्धिक विरासत है।
