Paper 4 – Constitutional Development of India
भारत में संवैधानिक विकास
भारत में संवैधानिक विकास का अर्थ उस ऐतिहासिक, राजनीतिक और प्रशासनिक प्रक्रिया से है जिसके माध्यम से भारत की शासन व्यवस्था धीरे-धीरे विकसित होकर वर्तमान भारतीय संविधान के रूप में स्थापित हुई। यह विषय केवल भारतीय संविधान का अध्ययन नहीं है, बल्कि यह समझने का प्रयास है कि भारत में संविधान बनने से पहले शासन व्यवस्था किस प्रकार संचालित होती थी, समय-समय पर कौन-कौन से संवैधानिक परिवर्तन किए गए, ब्रिटिश सरकार ने कौन-कौन से अधिनियम लागू किए और उन परिवर्तनों ने भारतीय संविधान के निर्माण में क्या योगदान दिया। दूसरे शब्दों में, भारत में संवैधानिक विकास का अध्ययन भारत की संवैधानिक यात्रा का अध्ययन है, जो ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन से प्रारम्भ होकर स्वतंत्र भारत के संविधान लागू होने तक पहुँचती है।
इस विषय के अध्ययन में सबसे पहले संविधान और संवैधानिक विकास की अवधारणा को समझाया जाता है। इसके बाद यह बताया जाता है कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में किस प्रकार अपना शासन स्थापित किया और ब्रिटिश संसद ने कंपनी के प्रशासन को नियंत्रित करने के लिए कौन-कौन से कानून बनाए। इस क्रम में 1773 का रेगुलेटिंग एक्ट, 1784 का पिट्स इंडिया एक्ट, 1813, 1833 और 1853 के चार्टर एक्टों का अध्ययन किया जाता है, क्योंकि इन्हीं अधिनियमों ने भारत की आधुनिक प्रशासनिक और संवैधानिक व्यवस्था की नींव रखी।
इसके बाद ब्रिटिश क्राउन के शासनकाल के संवैधानिक विकास का अध्ययन किया जाता है। इसमें 1858 का भारत शासन अधिनियम, 1861 और 1892 के भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 के मॉर्ले–मिंटो सुधार, 1919 के मॉन्टेग्यू–चेम्सफोर्ड सुधार, 1935 का भारत शासन अधिनियम तथा 1947 का भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम प्रमुख रूप से शामिल होते हैं। इन अधिनियमों के माध्यम से भारत में प्रशासनिक संरचना, प्रतिनिधित्व, विधायिका, प्रांतीय शासन तथा उत्तरदायी शासन की अवधारणा का क्रमिक विकास हुआ।
इसके उपरांत संविधान सभा के गठन, उसकी संरचना, कार्यप्रणाली, विभिन्न समितियों तथा संविधान निर्माण की प्रक्रिया का अध्ययन किया जाता है। साथ ही यह भी समझा जाता है कि भारतीय संविधान के निर्माण में विभिन्न देशों की संवैधानिक व्यवस्थाओं से कौन-कौन से सिद्धांत ग्रहण किए गए और उन्हें भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप कैसे अपनाया गया। अंत में संविधान के निर्माण, उसके अंगीकरण, 26 जनवरी 1950 को उसके लागू होने तथा उसकी प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन किया जाता है।
इस प्रकार भारत में संवैधानिक विकास का अध्ययन हमें यह समझने में सहायता करता है कि वर्तमान भारतीय संविधान किसी एक दिन में निर्मित दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह लगभग दो सौ वर्षों के संवैधानिक सुधारों, राजनीतिक संघर्षों, प्रशासनिक अनुभवों और स्वतंत्रता आंदोलन की उपलब्धियों का परिणाम है। इसलिए इस विषय का मुख्य उद्देश्य भारतीय संविधान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, विकासक्रम, मूल सिद्धांतों तथा लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के क्रमिक विकास को गहराई से समझना है।
Unit – 1
The Government of India Act 1858, Indian Council Act 1861, Indian Council Act
1892.
भारत शासन अधिनियम, 1858; भारतीय परिषद अधिनियम, 1861; तथा भारतीय परिषद अधिनियम, 1892।
भारत शासन अधिनियम, 1858; भारतीय परिषद अधिनियम, 1861; तथा भारतीय परिषद अधिनियम, 1892
भारत के संवैधानिक विकास के इतिहास में 1858 से 1892 तक का काल अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस अवधि में ब्रिटिश संसद ने ऐसे संवैधानिक अधिनियम पारित किए, जिन्होंने भारत की शासन व्यवस्था को नया स्वरूप प्रदान किया। इन अधिनियमों का उद्देश्य एक ओर ब्रिटिश शासन को अधिक सुदृढ़ बनाना था, तो दूसरी ओर भारतीयों की बढ़ती राजनीतिक चेतना और प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुसार कुछ सीमित सुधार करना भी था। भारत शासन अधिनियम, 1858, भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 तथा भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 इसी क्रम के प्रमुख अधिनियम हैं। इन तीनों अधिनियमों ने आधुनिक भारतीय प्रशासन, विधायी संस्थाओं तथा प्रतिनिधित्व की व्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारत शासन अधिनियम, 1858 (Government of India Act, 1858)
भारत शासन अधिनियम, 1858 भारतीय संवैधानिक इतिहास का एक निर्णायक अधिनियम था। इसका प्रत्यक्ष कारण 1857 का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम था। इस विद्रोह ने ब्रिटिश सरकार को यह अनुभव कराया कि ईस्ट इंडिया कंपनी भारत जैसे विशाल देश का प्रभावी शासन चलाने में असफल रही है। कंपनी की आर्थिक शोषणकारी नीतियाँ, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, भारतीयों के साथ भेदभाव तथा धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप के कारण जनता में व्यापक असंतोष उत्पन्न हो चुका था। इन परिस्थितियों में ब्रिटिश संसद ने कंपनी का शासन समाप्त करके भारत का प्रशासन सीधे ब्रिटिश सम्राट के अधीन करने का निर्णय लिया।
इस अधिनियम के अनुसार ईस्ट इंडिया कंपनी के सभी प्रशासनिक और राजनीतिक अधिकार समाप्त कर दिए गए। अब भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन (British Crown) के अधीन आ गया। इससे कंपनी शासन का अंत हुआ और ब्रिटिश सरकार का प्रत्यक्ष शासन प्रारम्भ हुआ।
इस अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता भारत सचिव (Secretary of State for India) के पद की स्थापना थी। भारत सचिव ब्रिटिश मंत्रिमंडल का सदस्य होता था और भारत से संबंधित सभी प्रशासनिक, वित्तीय तथा राजनीतिक मामलों का सर्वोच्च अधिकारी माना जाता था। उसकी सहायता के लिए 15 सदस्यों की भारत परिषद (Council of India) बनाई गई। यह परिषद सलाहकार संस्था के रूप में कार्य करती थी।
भारत के गवर्नर जनरल को अब वायसराय (Viceroy) की उपाधि प्रदान की गई। वायसराय ब्रिटिश सम्राट का प्रतिनिधि माना गया और भारत में सर्वोच्च कार्यपालिका अधिकारी बन गया। इसके बाद लॉर्ड कैनिंग भारत के प्रथम वायसराय बने। इससे यह स्पष्ट हो गया कि अब भारत का प्रशासन सीधे ब्रिटिश सम्राट के नियंत्रण में संचालित होगा।
इस अधिनियम के साथ रानी विक्टोरिया की घोषणा (Queen Victoria’s Proclamation) भी जारी की गई। इसमें भारतीय जनता को धार्मिक स्वतंत्रता देने, भारतीय रियासतों के अधिकारों का सम्मान करने, योग्य भारतीयों को सरकारी सेवाओं में अवसर देने तथा न्यायपूर्ण शासन का आश्वासन दिया गया। इस घोषणा का उद्देश्य 1857 के विद्रोह के बाद भारतीय जनता का विश्वास पुनः प्राप्त करना था।
भारत शासन अधिनियम, 1858 के अनेक सकारात्मक प्रभाव पड़े। इससे प्रशासन अधिक संगठित हुआ, ब्रिटिश संसद का नियंत्रण बढ़ा तथा शासन में उत्तरदायित्व की भावना विकसित हुई। इसी अधिनियम ने आगे होने वाले संवैधानिक सुधारों का आधार तैयार किया। हालांकि इस अधिनियम की सबसे बड़ी सीमा यह थी कि भारतीयों को शासन में कोई वास्तविक भागीदारी नहीं दी गई। सत्ता पूरी तरह ब्रिटिश अधिकारियों के हाथों में ही रही और भारतीय जनता केवल शासित वर्ग बनी रही।
फिर भी संवैधानिक दृष्टि से यह अधिनियम अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी के माध्यम से भारत में कंपनी शासन समाप्त हुआ और आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था का नया चरण प्रारम्भ हुआ। आगे चलकर इसी व्यवस्था के आधार पर भारत में प्रतिनिधित्व, विधायी परिषदों और उत्तरदायी शासन की दिशा में क्रमिक विकास हुआ।
भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 (Indian Councils Act, 1861)
भारत शासन अधिनियम, 1858 के लागू होने के बाद ब्रिटिश सरकार ने यह अनुभव किया कि केवल प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित कर देने से भारत में स्थिर शासन संभव नहीं है। 1857 के विद्रोह ने यह स्पष्ट कर दिया था कि भारतीयों की उपेक्षा करके शासन चलाना कठिन होगा। इसलिए ब्रिटिश सरकार ने भारतीय समाज के प्रभावशाली वर्गों को सीमित रूप से शासन व्यवस्था में सम्मिलित करने का निर्णय लिया। इसी उद्देश्य से भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 पारित किया गया। यह अधिनियम भारत के संवैधानिक विकास में इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसने पहली बार भारतीयों को विधायी कार्यों में सीमित भागीदारी प्रदान की तथा विकेंद्रीकरण (Decentralization) की प्रक्रिया का प्रारम्भ किया।
इस अधिनियम का प्रमुख उद्देश्य ब्रिटिश शासन को अधिक स्थिर बनाना तथा प्रशासनिक व्यवस्था को व्यवस्थित करना था। इसके अंतर्गत गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषद के साथ-साथ उसकी विधायी परिषद (Legislative Council) का विस्तार किया गया। कानून बनाने के उद्देश्य से गवर्नर जनरल को अतिरिक्त सदस्यों को नामित करने का अधिकार दिया गया। इन अतिरिक्त सदस्यों में कुछ भारतीयों को भी स्थान दिया जा सकता था। यद्यपि उनकी संख्या बहुत कम थी और उन्हें चुनाव द्वारा नहीं, बल्कि सरकार द्वारा मनोनीत किया जाता था, फिर भी भारतीयों की विधायी प्रक्रिया में यह पहली औपचारिक भागीदारी थी।
इस अधिनियम की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता प्रांतीय विकेंद्रीकरण थी। बंबई और मद्रास की सरकारों को पुनः सीमित विधायी अधिकार प्रदान किए गए, जो पहले उनसे वापस ले लिए गए थे। इसके अतिरिक्त आवश्यकता पड़ने पर अन्य प्रांतों में भी विधायी परिषदों की स्थापना का प्रावधान किया गया। इससे स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार कानून बनाने की प्रक्रिया को प्रोत्साहन मिला और प्रशासन अधिक व्यावहारिक बना।
भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 के अंतर्गत गवर्नर जनरल को अध्यादेश (Ordinance) जारी करने का अधिकार भी दिया गया। यदि किसी आपातकालीन परिस्थिति में तत्काल कानून बनाने की आवश्यकता हो और विधायी परिषद का अधिवेशन न चल रहा हो, तो गवर्नर जनरल अध्यादेश जारी कर सकता था। यह अध्यादेश सीमित अवधि तक प्रभावी रहता था। इस व्यवस्था का उद्देश्य प्रशासनिक कार्यों में गति और लचीलापन बनाए रखना था।
इस अधिनियम ने विभागीय प्रणाली (Portfolio System) को भी अधिक संगठित रूप दिया। विभिन्न विभागों का कार्य अलग-अलग सदस्यों को सौंपा जाने लगा, जिससे प्रशासनिक उत्तरदायित्व और कार्यकुशलता में वृद्धि हुई। आगे चलकर यही प्रणाली आधुनिक मंत्रिमंडलीय शासन की आधारशिला बनी।
यद्यपि यह अधिनियम भारतीयों की भागीदारी की दिशा में एक प्रारंभिक कदम था, फिर भी इसकी अनेक सीमाएँ थीं। परिषदों के भारतीय सदस्य निर्वाचित नहीं थे, बल्कि सरकार द्वारा मनोनीत किए जाते थे। उन्हें केवल कानून निर्माण के समय सीमित चर्चा का अवसर मिलता था। वे सरकार की नीतियों की आलोचना नहीं कर सकते थे और न ही कार्यपालिका को उत्तरदायी बना सकते थे। परिषदों के पास वित्तीय मामलों या प्रशासनिक निर्णयों पर प्रभावी नियंत्रण का भी अधिकार नहीं था। इसलिए वास्तविक सत्ता अभी भी ब्रिटिश अधिकारियों के हाथों में ही केंद्रित रही।
इन सीमाओं के बावजूद भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 का संवैधानिक महत्व अत्यंत अधिक है। इसने भारत में विधायी परिषदों के विकास, भारतीयों की प्रशासनिक भागीदारी तथा प्रांतीय विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया को प्रारम्भ किया। यही व्यवस्था आगे चलकर भारतीय परिषद अधिनियम, 1892, 1909, 1919 तथा भारत शासन अधिनियम, 1935 जैसे व्यापक संवैधानिक सुधारों का आधार बनी। इस दृष्टि से 1861 का अधिनियम भारत में प्रतिनिधिक शासन (Representative Government) की दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।
अतः कहा जा सकता है कि भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 ने भारत के संवैधानिक विकास में नई दिशा प्रदान की। यद्यपि इसके द्वारा दिए गए अधिकार सीमित थे, फिर भी इसने प्रशासनिक विकेंद्रीकरण, विधायी संस्थाओं के विस्तार तथा भारतीयों की प्रारंभिक राजनीतिक भागीदारी का मार्ग प्रशस्त किया। इसी कारण यह अधिनियम भारतीय संवैधानिक इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक सुधारों में गिना जाता है।
भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 (Indian Councils Act, 1892)
भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 भारत के संवैधानिक विकास की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण चरण था। 1861 के अधिनियम के बाद भारतीय समाज में राजनीतिक जागरूकता तेजी से बढ़ने लगी। अंग्रेज़ी शिक्षा के प्रसार, समाचार-पत्रों के विकास तथा 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद भारतीयों ने शासन में अधिक प्रतिनिधित्व, प्रशासन में भागीदारी तथा उत्तरदायी सरकार की मांग उठानी प्रारम्भ कर दी। कांग्रेस ने अपने प्रारम्भिक अधिवेशनों में विधायी परिषदों का विस्तार, निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाने तथा परिषदों को अधिक अधिकार देने की मांग की। भारतीयों की इन बढ़ती मांगों को ध्यान में रखते हुए ब्रिटिश संसद ने भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 पारित किया।
इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य भारतीयों को सीमित रूप से शासन व्यवस्था में अधिक भागीदारी देना तथा ब्रिटिश प्रशासन के प्रति बढ़ते असंतोष को कुछ हद तक कम करना था। यद्यपि यह अधिनियम भारतीयों की सभी मांगों को पूरा नहीं करता था, फिर भी यह 1861 के अधिनियम की तुलना में एक महत्वपूर्ण प्रगति थी।
इस अधिनियम के अंतर्गत सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन केंद्रीय तथा प्रांतीय विधायी परिषदों के आकार में वृद्धि था। परिषदों में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई, जिससे अधिक व्यक्तियों को विधायी कार्यों में सम्मिलित होने का अवसर मिला। इससे परिषदों में चर्चा का दायरा पहले की अपेक्षा विस्तृत हुआ।
इस अधिनियम की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता अप्रत्यक्ष निर्वाचन (Indirect Election) की व्यवस्था थी। यद्यपि अधिनियम में “निर्वाचन” शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया था, फिर भी नगरपालिकाओं, जिला बोर्डों, विश्वविद्यालयों, वाणिज्य मंडलों तथा अन्य सार्वजनिक संस्थाओं को परिषदों के लिए सदस्यों के नाम सुझाने का अधिकार दिया गया। इन नामों में से सरकार सदस्यों की नियुक्ति करती थी। इसलिए इसे भारत में प्रतिनिधिक शासन और चुनाव प्रणाली की प्रारम्भिक शुरुआत माना जाता है।
भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 के अंतर्गत परिषदों के सदस्यों को पहली बार वार्षिक बजट पर चर्चा करने का अधिकार प्रदान किया गया। यह एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सुधार था, क्योंकि इससे सरकारी आय-व्यय पर विचार-विमर्श की परंपरा प्रारम्भ हुई। हालांकि सदस्य बजट में संशोधन या मतदान नहीं कर सकते थे, फिर भी उन्हें सरकार की वित्तीय नीतियों पर अपने विचार रखने का अवसर प्राप्त हुआ।
इसके अतिरिक्त परिषदों के सदस्यों को सरकार से प्रश्न पूछने का सीमित अधिकार भी दिया गया। सदस्य प्रशासनिक विषयों पर प्रश्न पूछ सकते थे, लेकिन पूरक प्रश्न पूछने या सरकार को बाध्य करने का अधिकार उनके पास नहीं था। इस कारण कार्यपालिका की वास्तविक उत्तरदायित्व व्यवस्था अभी भी स्थापित नहीं हो सकी।
इस अधिनियम के कुछ महत्वपूर्ण लाभ थे। इससे भारतीयों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी, प्रतिनिधित्व की भावना विकसित हुई, विधायी परिषदों में सार्वजनिक मुद्दों पर चर्चा प्रारम्भ हुई तथा भारतीय नेताओं को संसदीय कार्यप्रणाली का अनुभव प्राप्त हुआ। यही अनुभव आगे चलकर स्वतंत्र भारत की संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उपयोगी सिद्ध हुआ।
फिर भी इस अधिनियम की अनेक सीमाएँ थीं। सबसे बड़ी सीमा यह थी कि निर्वाचन की व्यवस्था प्रत्यक्ष और पूर्णतः लोकतांत्रिक नहीं थी। सरकार का अंतिम नियंत्रण बना रहा और अधिकांश सदस्य मनोनीत किए जाते थे। परिषदों के पास कानून बनाने की स्वतंत्र शक्ति नहीं थी तथा वे कार्यपालिका को उत्तरदायी नहीं बना सकती थीं। बजट पर चर्चा तो हो सकती थी, लेकिन उसमें संशोधन या उसे अस्वीकार करने का अधिकार नहीं था। इसी प्रकार प्रश्न पूछने का अधिकार भी अत्यंत सीमित था। इसलिए परिषदें केवल परामर्शदात्री संस्थाओं के रूप में कार्य करती रहीं।
इन सीमाओं के बावजूद भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 का संवैधानिक महत्व अत्यंत अधिक है। इसने भारत में प्रतिनिधित्व, निर्वाचन, वित्तीय चर्चा तथा विधायी बहस की संसदीय परंपराओं का विकास किया। इस अधिनियम ने भारतीय नेताओं में राजनीतिक चेतना को और अधिक सुदृढ़ किया तथा आगे चलकर भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 (मॉर्ले–मिंटो सुधार), भारत शासन अधिनियम, 1919 तथा भारत शासन अधिनियम, 1935 जैसे व्यापक संवैधानिक सुधारों का मार्ग प्रशस्त किया।
अंततः कहा जा सकता है कि भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 भारतीय संवैधानिक विकास की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण संक्रमणकालीन अधिनियम था। यद्यपि इसके द्वारा प्रदान किए गए अधिकार सीमित थे, फिर भी इसने भारतीयों की राजनीतिक भागीदारी का विस्तार किया, प्रतिनिधिक शासन की अवधारणा को विकसित किया तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्रमिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण आधार तैयार किया। इसी कारण यह अधिनियम भारतीय संविधान के विकासक्रम में एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में माना जाता है।
समग्र निष्कर्ष
भारत शासन अधिनियम, 1858, भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 तथा भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 भारतीय संवैधानिक विकास के तीन महत्वपूर्ण चरण हैं। 1858 के अधिनियम ने ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का अंत कर भारत को सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन कर दिया। 1861 के अधिनियम ने भारतीयों को पहली बार सीमित रूप से विधायी परिषदों में स्थान देकर प्रशासनिक विकेंद्रीकरण की शुरुआत की। 1892 के अधिनियम ने परिषदों का विस्तार किया, अप्रत्यक्ष निर्वाचन की व्यवस्था प्रारम्भ की तथा बजट पर चर्चा और प्रश्न पूछने जैसे सीमित संसदीय अधिकार प्रदान किए। यद्यपि इन अधिनियमों में लोकतांत्रिक अधिकार सीमित थे और वास्तविक सत्ता ब्रिटिश सरकार के हाथों में ही रही, फिर भी इन्होंने भारत में प्रतिनिधिक शासन, विधायी संस्थाओं और संसदीय परंपराओं की नींव रखी। यही संवैधानिक विकास आगे चलकर उत्तरदायी शासन और स्वतंत्र भारत के संविधान के निर्माण का आधार बना।
भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 (मॉर्ले–मिंटो सुधार) (Indian Councils Act, 1909 / Morley–Minto Reforms)
भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 भारत के संवैधानिक विकास के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अधिनियम है। इसे मॉर्ले–मिंटो सुधार (Morley–Minto Reforms) के नाम से भी जाना जाता है। उस समय John Morley भारत सचिव थे तथा Lord Minto भारत के वायसराय थे। इन्हीं दोनों के प्रयासों से यह अधिनियम लागू किया गया, इसलिए इसे मॉर्ले–मिंटो सुधार कहा जाता है।
पृष्ठभूमि
उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों तथा बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारत में राष्ट्रीय आंदोलन तीव्र गति से विकसित हो रहा था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस शासन में अधिक प्रतिनिधित्व, उत्तरदायी सरकार तथा विधायी परिषदों के अधिकारों में वृद्धि की मांग कर रही थी। 1905 में बंगाल विभाजन के कारण पूरे देश में व्यापक असंतोष और स्वदेशी आंदोलन प्रारम्भ हो गया। इन परिस्थितियों में ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को कुछ सीमित राजनीतिक अधिकार देकर आंदोलन को शांत करने का प्रयास किया। इसी उद्देश्य से 1909 का अधिनियम पारित किया गया।
प्रमुख विशेषताएँ
इस अधिनियम के अंतर्गत केंद्रीय तथा प्रांतीय विधायी परिषदों का विस्तार किया गया। परिषदों में सदस्यों की संख्या पहले की तुलना में काफी बढ़ाई गई, जिससे अधिक भारतीयों को परिषदों में स्थान मिला। पहली बार कुछ सदस्यों के निर्वाचन की व्यवस्था को अधिक स्पष्ट रूप दिया गया, जिससे प्रतिनिधित्व का दायरा बढ़ा।
इस अधिनियम के अनुसार परिषदों के सदस्यों को बजट पर विस्तृत चर्चा करने, प्रस्ताव रखने तथा सार्वजनिक महत्व के विषयों पर प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया। इससे विधायी परिषदों की कार्यवाही पहले की अपेक्षा अधिक सक्रिय हुई, यद्यपि सरकार अभी भी परिषदों के प्रति उत्तरदायी नहीं थी।
इस अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद विशेषता पृथक निर्वाचन प्रणाली (Separate Electorate) की स्थापना थी। इसके अंतर्गत मुसलमान मतदाता केवल मुस्लिम उम्मीदवारों को ही चुन सकते थे और मुस्लिम उम्मीदवार केवल मुस्लिम निर्वाचन क्षेत्रों से ही चुने जाते थे। यह व्यवस्था भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की शुरुआत थी।
इसके अतिरिक्त पहली बार एक भारतीय को वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में नियुक्त किया गया। Satyendra Prasanna Sinha इस परिषद के पहले भारतीय सदस्य बने। यह भारतीयों की उच्च प्रशासनिक भागीदारी की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
अधिनियम का महत्व
भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 का महत्व इस बात में है कि इसने भारतीयों की राजनीतिक भागीदारी को पहले की अपेक्षा बढ़ाया। परिषदों में चर्चा का स्तर विस्तृत हुआ, निर्वाचित सदस्यों की संख्या बढ़ी तथा भारतीय नेताओं को संसदीय कार्यप्रणाली का अधिक अनुभव प्राप्त हुआ। इस अधिनियम ने आगे चलकर उत्तरदायी शासन की मांग को और अधिक बल प्रदान किया।
सीमाएँ
यद्यपि यह अधिनियम एक महत्वपूर्ण सुधार था, फिर भी इसकी अनेक सीमाएँ थीं। सबसे बड़ी कमी पृथक निर्वाचन प्रणाली थी, जिसने भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक आधार पर प्रतिनिधित्व की शुरुआत की। आगे चलकर यही व्यवस्था हिंदू–मुस्लिम राजनीतिक विभाजन का प्रमुख कारण बनी।
परिषदों के अधिकार अभी भी सीमित थे। वे सरकार को उत्तरदायी नहीं बना सकती थीं, न ही कार्यपालिका पर प्रभावी नियंत्रण रख सकती थीं। गवर्नर जनरल तथा वायसराय के पास व्यापक वीटो और विशेष शक्तियाँ बनी रहीं। इसलिए वास्तविक सत्ता अभी भी ब्रिटिश सरकार के हाथों में ही केंद्रित रही।
मूल्यांकन
भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 भारतीय संवैधानिक विकास का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। इसने प्रतिनिधित्व और राजनीतिक भागीदारी का विस्तार किया, लेकिन साथ ही पृथक निर्वाचन प्रणाली लागू करके भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिकता के बीज भी बो दिए। इसलिए इतिहासकार इसे एक ओर संवैधानिक सुधार का चरण मानते हैं, तो दूसरी ओर भारत की राजनीतिक एकता के लिए चुनौती भी मानते हैं।
अंततः कहा जा सकता है कि मॉर्ले–मिंटो सुधारों ने भारतीय संवैधानिक विकास को नई दिशा दी। इन सुधारों ने सीमित राजनीतिक अधिकार प्रदान किए, परन्तु भारतीय जनता की उत्तरदायी शासन की मांग को पूरा नहीं कर सके। परिणामस्वरूप आगे और व्यापक संवैधानिक सुधारों की आवश्यकता बनी रही, जिसके फलस्वरूप भारत शासन अधिनियम, 1919 अस्तित्व में आया।
भारत शासन अधिनियम, 1919 (Government of India Act, 1919) / मॉन्टेग्यू–चेम्सफोर्ड सुधार (Montagu–Chelmsford Reforms)
भारत शासन अधिनियम, 1919 भारत के संवैधानिक विकास की प्रक्रिया में एक अत्यंत महत्वपूर्ण अधिनियम था। इसे मॉन्टेग्यू–चेम्सफोर्ड सुधार (Montagu–Chelmsford Reforms) के नाम से भी जाना जाता है। उस समय Edwin Montagu भारत सचिव थे तथा Lord Chelmsford भारत के वायसराय थे। इन दोनों के सुझावों के आधार पर यह अधिनियम पारित किया गया। इसका उद्देश्य भारतीयों को शासन में पहले की अपेक्षा अधिक भागीदारी देना तथा उत्तरदायी शासन की दिशा में क्रमिक प्रगति करना था।
इस अधिनियम की पृष्ठभूमि प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918), भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की तीव्रता तथा भारतीय नेताओं की स्वशासन (Self-Government) की बढ़ती मांग से जुड़ी हुई थी। युद्ध के दौरान भारत ने ब्रिटिश सरकार को सैनिक, धन और संसाधनों के रूप में व्यापक सहयोग दिया था। इसके बदले भारतीय नेताओं को आशा थी कि उन्हें शासन में अधिक अधिकार दिए जाएंगे। इसी संदर्भ में 1917 में मॉन्टेग्यू ने घोषणा की कि भारत में क्रमिक रूप से उत्तरदायी शासन स्थापित किया जाएगा। इसी घोषणा को लागू करने के लिए 1919 का अधिनियम बनाया गया।
इस अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता द्वैध शासन (Dyarchy) की व्यवस्था थी, जिसे केवल प्रांतीय स्तर पर लागू किया गया। इसके अंतर्गत प्रांतीय प्रशासन के विषयों को दो भागों में विभाजित किया गया—आरक्षित विषय (Reserved Subjects) और हस्तांतरित विषय (Transferred Subjects)।
आरक्षित विषयों में पुलिस, न्याय, भूमि राजस्व, सिंचाई तथा कानून-व्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण विभाग शामिल थे। इन पर गवर्नर और उसके कार्यकारी अधिकारी नियंत्रण रखते थे तथा वे विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी नहीं थे।
हस्तांतरित विषयों में शिक्षा, स्थानीय स्वशासन, कृषि, स्वास्थ्य, सहकारिता, उद्योग तथा सार्वजनिक कल्याण जैसे विभाग शामिल थे। इनका संचालन भारतीय मंत्रियों द्वारा किया जाता था, जो प्रांतीय विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी होते थे। यह व्यवस्था भारतीयों को प्रशासनिक अनुभव देने के उद्देश्य से लागू की गई थी।
1919 के अधिनियम द्वारा केंद्रीय विधानमंडल को द्विसदनीय (Bicameral Legislature) बनाया गया। पहली बार केंद्र में दो सदनों—राज्य परिषद (Council of State) तथा केंद्रीय विधान सभा (Legislative Assembly)—की स्थापना की गई। इससे भारत में द्विसदनीय संसदीय व्यवस्था का प्रारम्भ हुआ।
इस अधिनियम के अंतर्गत मताधिकार का कुछ विस्तार भी किया गया। हालांकि मतदान का अधिकार अभी भी सीमित था और केवल संपत्ति, आय, कर तथा शिक्षा जैसी योग्यताओं को पूरा करने वाले व्यक्तियों को ही मतदान करने का अधिकार प्राप्त था। इसलिए सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की व्यवस्था अभी स्थापित नहीं हुई थी।
इस अधिनियम की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि लोक सेवा आयोग (Public Service Commission) की स्थापना का प्रावधान किया गया। इसी के आधार पर 1926 में लोक सेवा आयोग की स्थापना हुई, जिसने आगे चलकर संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के विकास का मार्ग प्रशस्त किया।
1919 के अधिनियम के अंतर्गत भारत के महालेखा परीक्षक (Auditor General) की व्यवस्था को भी सुदृढ़ किया गया, जिससे सरकारी आय-व्यय की स्वतंत्र जाँच और वित्तीय उत्तरदायित्व को बढ़ावा मिला।
यद्यपि यह अधिनियम अपने समय का एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सुधार था, फिर भी इसकी अनेक सीमाएँ थीं। द्वैध शासन की व्यवस्था व्यवहार में सफल नहीं हो सकी क्योंकि महत्वपूर्ण विभाग गवर्नर के नियंत्रण में ही रहे और भारतीय मंत्रियों के पास सीमित अधिकार थे। गवर्नर को विशेष शक्तियाँ प्राप्त थीं, जिनके माध्यम से वह मंत्रियों के निर्णयों को अस्वीकार कर सकता था। केंद्र में भी ब्रिटिश सरकार का पूर्ण नियंत्रण बना रहा।
सबसे बड़ी आलोचना यह थी कि यह अधिनियम वास्तविक उत्तरदायी शासन स्थापित नहीं कर सका। भारतीयों को सीमित अधिकार देकर प्रशासनिक अनुभव तो दिया गया, परन्तु सत्ता का वास्तविक नियंत्रण ब्रिटिश अधिकारियों के हाथों में ही रहा। इसी कारण भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सहित अनेक राजनीतिक संगठनों ने इस अधिनियम की आलोचना की।
फिर भी भारत शासन अधिनियम, 1919 का ऐतिहासिक महत्व अत्यंत अधिक है। इसने प्रांतों में उत्तरदायी शासन की अवधारणा को प्रारम्भ किया, द्विसदनीय विधानमंडल की स्थापना की, लोक सेवा आयोग जैसी महत्वपूर्ण संस्था के गठन का मार्ग प्रशस्त किया तथा भारतीयों की प्रशासनिक भागीदारी को पहले की अपेक्षा अधिक विस्तृत बनाया। यद्यपि इसकी सीमाएँ स्पष्ट थीं, फिर भी इसने आगे आने वाले भारत शासन अधिनियम, 1935 की आधारशिला तैयार की।
अंततः कहा जा सकता है कि भारत शासन अधिनियम, 1919 भारतीय संवैधानिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण लेकिन अपूर्ण कदम था। इसने भारतीयों को शासन में अधिक भागीदारी दी, परन्तु पूर्ण उत्तरदायी सरकार स्थापित करने में सफल नहीं हो सका। इसके बावजूद इस अधिनियम ने आधुनिक लोकतांत्रिक संस्थाओं और संसदीय परंपराओं के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया तथा स्वतंत्र भारत के संविधान के निर्माण की प्रक्रिया को नई दिशा प्रदान की।
भारत शासन अधिनियम, 1935 (Government of India Act, 1935)
भारत शासन अधिनियम, 1935 भारत के संवैधानिक इतिहास का सबसे व्यापक, विस्तृत और महत्वपूर्ण अधिनियम माना जाता है। यह ब्रिटिश संसद द्वारा पारित सबसे बड़ा संवैधानिक कानून था, जिसमें 321 धाराएँ और 10 अनुसूचियाँ थीं। इस अधिनियम ने भारतीय प्रशासन, केंद्र एवं प्रांतों के संबंध, विधायिका, न्यायपालिका तथा लोक सेवाओं की संरचना में व्यापक परिवर्तन किए। स्वतंत्र भारत के संविधान का निर्माण करते समय भी इस अधिनियम के अनेक प्रावधानों को संशोधित रूप में अपनाया गया। इसलिए इसे भारतीय संविधान का एक महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।
पृष्ठभूमि
1919 के भारत शासन अधिनियम की अनेक कमियों के कारण भारतीयों में असंतोष बढ़ता गया। द्वैध शासन (Dyarchy) सफल नहीं हो पाया और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पूर्ण उत्तरदायी शासन की मांग कर रही थी। इसी बीच साइमन आयोग (Simon Commission), तीन गोलमेज सम्मेलन तथा श्वेत पत्र (White Paper) के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने भारत शासन अधिनियम, 1935 तैयार किया।
प्रमुख विशेषताएँ
इस अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता अखिल भारतीय संघ (All India Federation) की परिकल्पना थी। प्रस्ताव था कि ब्रिटिश भारत के प्रांतों तथा देशी रियासतों को मिलाकर एक संघ बनाया जाए। हालांकि अधिकांश रियासतों ने इसमें भाग नहीं लिया, इसलिए यह व्यवस्था व्यवहार में लागू नहीं हो सकी।
दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता प्रांतीय स्वायत्तता (Provincial Autonomy) थी। 1919 के अधिनियम में लागू द्वैध शासन को समाप्त कर दिया गया और प्रांतों में पूर्ण प्रांतीय स्वायत्तता प्रदान की गई। अब प्रांतीय मंत्रिपरिषद विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी थी तथा शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य, स्थानीय स्वशासन और अन्य प्रांतीय विषयों पर निर्णय लेने का अधिकार उसे प्राप्त हुआ।
केंद्र में पहली बार द्वैध शासन (Dyarchy) लागू करने का प्रावधान किया गया। यद्यपि यह व्यवस्था व्यवहार में लागू नहीं हो सकी, फिर भी यह अधिनियम का एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान था।
इस अधिनियम ने केंद्र और प्रांतों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया। विषयों को तीन सूचियों में बाँटा गया—
संघ सूची (Federal List)
प्रांतीय सूची (Provincial List)
समवर्ती सूची (Concurrent List)
यह व्यवस्था आगे चलकर भारतीय संविधान में भी अपनाई गई।
इस अधिनियम के अंतर्गत संघीय न्यायालय (Federal Court) की स्थापना का प्रावधान किया गया। 1937 में इसकी स्थापना हुई। यही न्यायालय आगे चलकर स्वतंत्र भारत के सर्वोच्च न्यायालय की आधारशिला बना।
इस अधिनियम द्वारा Reserve Bank of India की स्थापना का भी प्रावधान किया गया। इसके परिणामस्वरूप 1935 में भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना हुई, जिसने देश की मुद्रा और बैंकिंग व्यवस्था का संचालन प्रारम्भ किया।
लोक सेवा व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए संघ लोक सेवा आयोग तथा प्रांतीय लोक सेवा आयोगों की व्यवस्था को कानूनी आधार दिया गया। इससे प्रशासनिक सेवाओं की भर्ती अधिक संगठित और नियमित बनी।
मताधिकार का विस्तार भी किया गया। पहले की अपेक्षा अधिक लोगों को मतदान का अधिकार मिला, हालांकि सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार अभी भी लागू नहीं किया गया था। मतदान का अधिकार संपत्ति, आय, कर तथा शिक्षा जैसी योग्यताओं पर आधारित रहा।
अधिनियम का महत्व
भारत शासन अधिनियम, 1935 भारतीय संवैधानिक विकास का सबसे प्रभावशाली अधिनियम था। इसने प्रांतीय स्वायत्तता की स्थापना की, संघीय शासन की अवधारणा प्रस्तुत की, शक्तियों के विभाजन की व्यवस्था की तथा न्यायपालिका और लोक सेवा संस्थाओं को अधिक संगठित स्वरूप प्रदान किया। स्वतंत्र भारत के संविधान में संघीय व्यवस्था, सूचियों के आधार पर शक्तियों का विभाजन, लोक सेवा आयोग तथा राज्यपाल जैसे अनेक प्रावधान इसी अधिनियम से प्रेरित हैं।
सीमाएँ
यद्यपि यह अधिनियम अत्यंत व्यापक था, फिर भी इसकी कई सीमाएँ थीं। सबसे बड़ी कमी यह थी कि वास्तविक सत्ता अभी भी ब्रिटिश सरकार के हाथों में केंद्रित थी। गवर्नर जनरल और प्रांतीय गवर्नरों को विशेष अधिकार प्राप्त थे, जिनके माध्यम से वे निर्वाचित मंत्रियों के निर्णयों को रोक सकते थे।
संघीय व्यवस्था व्यवहार में लागू नहीं हो सकी क्योंकि देशी रियासतों ने इसमें भाग नहीं लिया। मताधिकार सीमित था और अधिकांश भारतीय अभी भी मतदान से वंचित थे। केंद्र में उत्तरदायी सरकार की स्थापना भी नहीं की गई। इसलिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस अधिनियम को पूर्ण स्वराज्य की मांग की दृष्टि से अपर्याप्त माना।
मूल्यांकन
भारत शासन अधिनियम, 1935 भारतीय संविधान के विकास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यद्यपि इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन को बनाए रखना था, फिर भी इसने ऐसी अनेक प्रशासनिक और संवैधानिक व्यवस्थाएँ स्थापित कीं जिन्हें स्वतंत्र भारत ने लोकतांत्रिक रूप में अपनाया। यही कारण है कि इसे भारतीय संविधान का सबसे महत्वपूर्ण पूर्ववर्ती संवैधानिक दस्तावेज़ माना जाता है।
अंततः कहा जा सकता है कि भारत शासन अधिनियम, 1935 भारतीय संवैधानिक विकास की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी था। इसने संघीय शासन, प्रांतीय स्वायत्तता, न्यायपालिका, लोक सेवा तथा प्रशासनिक संरचना को नई दिशा दी। यद्यपि इसमें पूर्ण लोकतंत्र और उत्तरदायी शासन का अभाव था, फिर भी इसने स्वतंत्र भारत के संविधान के निर्माण की मजबूत आधारशिला रखी और भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के विकास में ऐतिहासिक योगदान दिया।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 (Indian Independence Act, 1947)
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 भारत के संवैधानिक विकास का अंतिम और सबसे ऐतिहासिक चरण माना जाता है। इस अधिनियम के माध्यम से लगभग दो सौ वर्षों से चले आ रहे ब्रिटिश शासन का अंत हुआ और भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में विश्व के मानचित्र पर स्थापित हुआ। यह अधिनियम केवल सत्ता हस्तांतरण का दस्तावेज़ नहीं था, बल्कि इसने भारत और पाकिस्तान नामक दो स्वतंत्र अधिराज्यों (Dominions) के गठन का कानूनी आधार भी प्रदान किया। इसी अधिनियम ने भारतीय संविधान के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया तथा भारतीय जनता को अपने शासन की व्यवस्था स्वयं निर्धारित करने का अधिकार दिया।
पृष्ठभूमि
द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945) के बाद ब्रिटेन की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति कमजोर हो गई थी। दूसरी ओर भारत में स्वतंत्रता आंदोलन अत्यंत तीव्र हो चुका था। भारत छोड़ो आंदोलन (1942), आज़ाद हिन्द फ़ौज की गतिविधियाँ, नौसेना विद्रोह (1946) तथा व्यापक जनदबाव के कारण ब्रिटिश सरकार को यह स्पष्ट हो गया कि भारत पर अधिक समय तक शासन करना संभव नहीं है। इसी बीच कैबिनेट मिशन भारत आया, परन्तु उसका प्रस्ताव सफल नहीं हो सका। इसके बाद भारत के अंतिम वायसराय Lord Mountbatten ने सत्ता हस्तांतरण की योजना प्रस्तुत की, जिसे माउंटबेटन योजना (3 जून 1947) कहा जाता है। इसी योजना के आधार पर ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 पारित किया।
प्रमुख विशेषताएँ
इस अधिनियम के अनुसार 15 अगस्त 1947 से भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र अधिराज्यों के रूप में अस्तित्व में आए। ब्रिटिश संसद का भारत पर विधायी अधिकार समाप्त हो गया और दोनों देशों को अपने-अपने कानून बनाने का पूर्ण अधिकार प्राप्त हुआ।
इस अधिनियम के अंतर्गत ब्रिटिश सम्राट की भारत पर संप्रभुता समाप्त कर दी गई। अब ब्रिटिश सरकार भारत के प्रशासन में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं कर सकती थी। भारत और पाकिस्तान दोनों अपने-अपने गवर्नर जनरल की नियुक्ति कर सकते थे, जो संबंधित देश के संवैधानिक प्रमुख के रूप में कार्य करते थे।
इस अधिनियम द्वारा देशी रियासतों (Princely States) पर ब्रिटिश सरकार की सर्वोच्चता (Paramountcy) समाप्त कर दी गई। रियासतों को यह अधिकार दिया गया कि वे भारत या पाकिस्तान में से किसी एक में विलय करें या स्वतंत्र रहने का प्रयास करें। बाद में अधिकांश रियासतों का भारत में विलय हुआ, जिसने भारतीय राष्ट्रीय एकता को मजबूत बनाया।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 ने संविधान सभा को पूर्ण विधायी अधिकार प्रदान किया। अब संविधान सभा केवल संविधान बनाने का कार्य ही नहीं करती थी, बल्कि वह स्वतंत्र भारत की अस्थायी संसद के रूप में भी कार्य करती थी। इसी संविधान सभा ने आगे चलकर भारतीय संविधान का निर्माण किया।
इस अधिनियम के लागू होने के साथ भारत शासन अधिनियम, 1935 अस्थायी रूप से प्रभावी रहा, जब तक कि नया भारतीय संविधान लागू नहीं हो गया। इसलिए 26 जनवरी 1950 तक भारत का शासन मुख्यतः 1935 के अधिनियम के संशोधित प्रावधानों के आधार पर संचालित हुआ।
महत्व
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 का सबसे बड़ा महत्व यह है कि इसने भारत को राजनीतिक स्वतंत्रता प्रदान की। पहली बार भारतीय जनता को अपने शासन, प्रशासन और संविधान का निर्माण स्वयं करने का अधिकार प्राप्त हुआ। इसी अधिनियम के कारण संविधान सभा पूर्ण रूप से स्वतंत्र होकर लोकतांत्रिक, गणतांत्रिक और कल्याणकारी संविधान तैयार कर सकी।
यह अधिनियम भारतीय लोकतंत्र के विकास की आधारशिला भी बना। इसके माध्यम से विदेशी शासन का अंत हुआ, राष्ट्रीय संप्रभुता स्थापित हुई तथा भारतीय जनता के प्रतिनिधियों को शासन संचालन का अवसर प्राप्त हुआ। यही वह क्षण था, जहाँ से भारत का संवैधानिक विकास ब्रिटिश नियंत्रण से मुक्त होकर पूर्णतः भारतीय नेतृत्व के हाथों में आ गया।
सीमाएँ
यद्यपि भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 ने भारत को स्वतंत्रता प्रदान की, फिर भी इसके साथ देश का विभाजन भी हुआ। विभाजन के कारण व्यापक सांप्रदायिक हिंसा, जन-धन की हानि तथा करोड़ों लोगों का विस्थापन हुआ। भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा विवाद तथा अनेक राजनीतिक समस्याएँ भी उत्पन्न हुईं, जिनका प्रभाव लंबे समय तक बना रहा।
मूल्यांकन
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 भारत के संवैधानिक विकास की अंतिम औपनिवेशिक कड़ी था। इसने विदेशी शासन का अंत कर भारतीयों को पूर्ण राजनीतिक अधिकार प्रदान किए। इसके परिणामस्वरूप संविधान सभा ने स्वतंत्र रूप से संविधान का निर्माण किया और भारत को एक लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित किया।
अंततः कहा जा सकता है कि भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 केवल एक कानूनी अधिनियम नहीं था, बल्कि भारतीय इतिहास का वह निर्णायक मोड़ था जिसने भारत को दासता से स्वतंत्रता, औपनिवेशिक शासन से लोकतंत्र तथा पराधीनता से संप्रभुता की ओर अग्रसर किया। भारतीय संविधान के निर्माण और आधुनिक भारत की स्थापना में इस अधिनियम की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक रही।
संविधान सभा का गठन, संरचना, कार्य तथा भारतीय संविधान का निर्माण
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के लागू होने के बाद स्वतंत्र भारत के लिए एक ऐसे संविधान की आवश्यकता थी जो भारतीय जनता की आकांक्षाओं, लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक न्याय तथा राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ आधार प्रदान कर सके। यद्यपि संविधान सभा का गठन स्वतंत्रता से पहले ही हो चुका था, परन्तु स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद उसे पूर्ण संवैधानिक अधिकार प्राप्त हुए। संविधान सभा ने लगभग तीन वर्षों तक गहन विचार-विमर्श, बहस और अध्ययन के बाद विश्व के सबसे विस्तृत लिखित संविधान का निर्माण किया। भारतीय संविधान केवल कानूनी दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्रता संग्राम के आदर्शों, लोकतंत्र, समानता, न्याय तथा मानव गरिमा की भावना का जीवंत प्रतीक है।
संविधान सभा के गठन का विचार सर्वप्रथम 1934 में M. N. Roy ने प्रस्तुत किया था। बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी संविधान सभा की माँग का समर्थन किया। अंततः ब्रिटिश सरकार द्वारा भेजे गए कैबिनेट मिशन (1946) की योजना के अनुसार संविधान सभा का गठन किया गया। संविधान सभा के सदस्य प्रत्यक्ष चुनाव से नहीं, बल्कि प्रांतीय विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से चुने गए थे। प्रारम्भ में संविधान सभा की कुल सदस्य संख्या 389 थी। इनमें 292 सदस्य ब्रिटिश भारत के प्रांतों से, 93 सदस्य देशी रियासतों से तथा 4 सदस्य मुख्य आयुक्त शासित क्षेत्रों से लिए गए थे।
1947 में भारत के विभाजन के बाद पाकिस्तान के सदस्य अलग हो गए, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय संविधान सभा की सदस्य संख्या घटकर 299 रह गई। इनमें से अधिकांश सदस्य स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माण में सक्रिय रूप से शामिल हुए।
संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसम्बर 1946 को आयोजित हुई। इस बैठक की अध्यक्षता सबसे वरिष्ठ सदस्य Sachchidananda Sinha ने अस्थायी अध्यक्ष के रूप में की। बाद में 11 दिसम्बर 1946 को Rajendra Prasad को संविधान सभा का स्थायी अध्यक्ष चुना गया। संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार (Constitutional Adviser) के रूप में B. N. Rau ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
संविधान सभा ने संविधान निर्माण के लिए अनेक समितियों का गठन किया। इन समितियों ने विभिन्न विषयों पर विस्तृत अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इनमें सबसे महत्वपूर्ण समिति प्रारूप समिति (Drafting Committee) थी, जिसके अध्यक्ष B. R. Ambedkar थे। डॉ. अम्बेडकर के नेतृत्व में प्रारूप समिति ने संविधान का प्रारूप तैयार किया। इसी कारण उन्हें भारतीय संविधान का मुख्य शिल्पकार (Chief Architect of the Indian Constitution) कहा जाता है।
संविधान सभा ने लगभग 2 वर्ष 11 माह 18 दिन तक कार्य किया। इस अवधि में कुल 11 सत्र आयोजित किए गए तथा लगभग 165 दिनों तक संविधान के विभिन्न प्रावधानों पर विस्तृत चर्चा हुई। संविधान सभा में प्रत्येक अनुच्छेद पर गहन विचार-विमर्श किया गया, संशोधन प्रस्तुत किए गए और लोकतांत्रिक सहमति के आधार पर अंतिम निर्णय लिए गए। यह प्रक्रिया भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
संविधान सभा ने 26 नवम्बर 1949 को भारतीय संविधान को अंगीकृत (Adopt), अधिनियमित (Enact) और आत्मार्पित (Give to Ourselves) किया। इसके बाद संविधान का अधिकांश भाग 26 जनवरी 1950 से लागू किया गया। 26 जनवरी की तिथि इसलिए चुनी गई क्योंकि 1930 में इसी दिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य दिवस मनाया था। इस प्रकार 26 जनवरी 1950 को भारत एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य बना। (बाद में 1976 के 42वें संविधान संशोधन द्वारा “समाजवादी” और “पंथनिरपेक्ष” शब्द भी प्रस्तावना में जोड़े गए।)
भारतीय संविधान विश्व का सबसे विस्तृत लिखित संविधान है। इसमें संसदीय शासन प्रणाली, संघीय व्यवस्था, स्वतंत्र न्यायपालिका, मौलिक अधिकार, राज्य के नीति-निर्देशक तत्व, मौलिक कर्तव्य, विधि का शासन, न्यायिक पुनरावलोकन तथा एकल नागरिकता जैसी अनेक महत्वपूर्ण विशेषताएँ सम्मिलित हैं। संविधान निर्माताओं ने विभिन्न देशों के संविधानों से उपयोगी सिद्धांत ग्रहण किए, किन्तु उन्हें भारतीय परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुसार संशोधित करके अपनाया। इस प्रकार भारतीय संविधान मौलिकता और व्यावहारिकता का उत्कृष्ट उदाहरण है।
संविधान सभा का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उसने भारत जैसे विविधताओं से परिपूर्ण देश को एक लोकतांत्रिक, गणतांत्रिक और संवैधानिक ढाँचा प्रदान किया। संविधान ने प्रत्येक नागरिक को समानता, स्वतंत्रता, न्याय और गरिमा का अधिकार दिया तथा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय पर आधारित राष्ट्र निर्माण की दिशा निर्धारित की।
अंततः कहा जा सकता है कि संविधान सभा भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला थी। इसके सदस्यों ने मतभेदों के बावजूद राष्ट्रीय हित को सर्वोच्च स्थान दिया और ऐसा संविधान बनाया जो आज भी विश्व के सबसे सफल लोकतांत्रिक संविधानों में गिना जाता है। भारतीय संविधान केवल शासन संचालन का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह भारत की राष्ट्रीय एकता, लोकतांत्रिक परंपराओं, सामाजिक न्याय तथा संवैधानिक मूल्यों का स्थायी आधार है।
समग्र निष्कर्ष : भारत में संवैधानिक विकास
भारत में संवैधानिक विकास एक निरंतर चलने वाली ऐतिहासिक प्रक्रिया रही है, जिसकी शुरुआत ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन से हुई और जिसका समापन 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान के लागू होने के साथ हुआ। इस अवधि में 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट से लेकर भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 तक अनेक संवैधानिक सुधार किए गए। प्रत्येक अधिनियम ने भारतीय प्रशासन, विधायिका, न्यायपालिका तथा प्रतिनिधिक शासन के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। अंततः संविधान सभा ने इन सभी अनुभवों, स्वतंत्रता आंदोलन के आदर्शों तथा भारतीय समाज की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए एक लोकतांत्रिक, गणराज्यात्मक, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी और कल्याणकारी संविधान का निर्माण किया। इसलिए भारत में संवैधानिक विकास का अध्ययन केवल ऐतिहासिक घटनाओं का अध्ययन नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, सुशासन, विधि के शासन और संवैधानिक मूल्यों के क्रमिक विकास को समझने का अध्ययन है। यही प्रक्रिया आधुनिक भारत की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था की वास्तविक आधारशिला है।
