Unit – 3
Accountability and Control: The concepts of Accountability and Control, Legislative,
Executive and Judicial Control over Administration, Citizen and Administration, Ombudsman
and Lokayukta.
उत्तरदायित्व एवं नियंत्रण: उत्तरदायित्व एवं नियंत्रण की अवधारणा, प्रशासन पर विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका का नियंत्रण, नागरिक और प्रशासन, लोकपाल एवं लोकायुक्त।
अध्याय–1 : उत्तरदायित्व एवं नियंत्रण की अवधारणा
लोक प्रशासन का मूल उद्देश्य जनता की आवश्यकताओं की पूर्ति करना, सार्वजनिक संसाधनों का न्यायसंगत उपयोग करना तथा संविधान के आदर्शों के अनुरूप शासन व्यवस्था का संचालन करना है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासन केवल आदेशों का पालन करने वाली संस्था नहीं होता, बल्कि वह सरकार और जनता के बीच एक सशक्त सेतु के रूप में कार्य करता है। सरकार द्वारा बनाई गई नीतियों, योजनाओं और कानूनों को व्यवहार में लागू करने का दायित्व प्रशासन पर होता है। इसलिए प्रशासन की सफलता केवल उसकी कार्यकुशलता से नहीं, बल्कि उसकी उत्तरदायित्व (Accountability) और नियंत्रण (Control) की व्यवस्था से भी निर्धारित होती है। यदि प्रशासन उत्तरदायी नहीं होगा और उस पर प्रभावी नियंत्रण नहीं होगा, तो शक्ति का दुरुपयोग, भ्रष्टाचार, पक्षपात, लालफीताशाही तथा मनमानी जैसी समस्याएँ उत्पन्न होंगी। इसी कारण आधुनिक लोक प्रशासन में उत्तरदायित्व एवं नियंत्रण को सुशासन (Good Governance) का आधार माना जाता है।
उत्तरदायित्व का सामान्य अर्थ है—अपने कार्यों, निर्णयों और व्यवहार के लिए किसी उच्च प्राधिकारी, कानून अथवा जनता के प्रति जवाबदेह होना। जब कोई लोक सेवक किसी सरकारी पद पर नियुक्त होता है, तो उसे केवल अधिकार ही नहीं मिलते, बल्कि उन अधिकारों के साथ अनेक कर्तव्य और उत्तरदायित्व भी प्राप्त होते हैं। वह जो भी निर्णय लेता है, उसके परिणामों के लिए उत्तरदायी होता है। यदि कोई अधिकारी अपने अधिकारों का अनुचित प्रयोग करता है, सार्वजनिक धन का दुरुपयोग करता है अथवा कानून के विरुद्ध कार्य करता है, तो उसे उसका उत्तर देना पड़ता है। यही उत्तरदायित्व का वास्तविक स्वरूप है।
लोक प्रशासन में उत्तरदायित्व केवल वरिष्ठ अधिकारियों के प्रति नहीं होता। एक अधिकारी अपने विभाग, सरकार, संविधान, न्यायपालिका, विधायिका, मीडिया तथा अंततः जनता के प्रति भी उत्तरदायी होता है। लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च होती है, इसलिए प्रशासन का अंतिम उत्तरदायित्व नागरिकों के प्रति माना जाता है। जनता कर (Tax) के रूप में सरकार को संसाधन उपलब्ध कराती है और उसी धन से प्रशासन संचालित होता है। इसलिए प्रशासन का प्रत्येक निर्णय जनहित, पारदर्शिता और विधि के शासन के अनुरूप होना चाहिए।
उत्तरदायित्व की अवधारणा का घनिष्ठ संबंध लोकतांत्रिक शासन से है। निरंकुश शासन में शासक अपनी इच्छा से निर्णय ले सकता है, परंतु लोकतंत्र में प्रत्येक निर्णय संविधान और कानून के अधीन होता है। यही कारण है कि आधुनिक लोकतंत्र में उत्तरदायित्व को शासन की वैधता (Legitimacy) का आधार माना जाता है। यदि सरकार और प्रशासन जनता के प्रति उत्तरदायी नहीं रहेंगे, तो लोकतंत्र केवल औपचारिक व्यवस्था बनकर रह जाएगा।
उत्तरदायित्व के साथ-साथ नियंत्रण की अवधारणा भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। नियंत्रण का अर्थ किसी संस्था या अधिकारी के कार्यों को निर्धारित नियमों, कानूनों तथा उद्देश्यों के अनुरूप बनाए रखना है। प्रशासनिक नियंत्रण का उद्देश्य अधिकारियों की स्वतंत्रता समाप्त करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि वे संविधान, कानून और सार्वजनिक हित की सीमाओं के भीतर रहकर कार्य करें। नियंत्रण के माध्यम से प्रशासन में अनुशासन, समन्वय, दक्षता और उत्तरदायित्व बनाए रखा जाता है।
नियंत्रण की आवश्यकता इसलिए भी होती है क्योंकि प्रशासन के पास व्यापक शक्तियाँ होती हैं। आधुनिक कल्याणकारी राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, सामाजिक सुरक्षा, पर्यावरण, डिजिटल सेवाएँ और विकास योजनाएँ—इन सभी क्षेत्रों में प्रशासन की भूमिका बढ़ गई है। जितनी अधिक शक्तियाँ प्रशासन को प्राप्त होती हैं, उतनी ही अधिक उत्तरदायित्व और नियंत्रण की आवश्यकता भी होती है। प्रसिद्ध राजनीतिक विचारक Lord Acton का प्रसिद्ध कथन है कि “Power tends to corrupt, and absolute power corrupts absolutely.” अर्थात् शक्ति व्यक्ति को भ्रष्ट करने की प्रवृत्ति रखती है और निरंकुश शक्ति पूर्ण रूप से भ्रष्ट कर सकती है। यही कारण है कि लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में शक्ति के साथ नियंत्रण की संस्थागत व्यवस्था विकसित की गई है।
आधुनिक लोक प्रशासन में उत्तरदायित्व के अनेक आयाम हैं। प्रशासनिक उत्तरदायित्व के अंतर्गत अधिकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों के प्रति उत्तरदायी होते हैं। राजनीतिक उत्तरदायित्व के अंतर्गत प्रशासन मंत्रिपरिषद के माध्यम से विधायिका के प्रति उत्तरदायी रहता है। कानूनी उत्तरदायित्व के अंतर्गत प्रत्येक प्रशासनिक निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन होता है। वित्तीय उत्तरदायित्व के अंतर्गत सार्वजनिक धन के उपयोग का लेखा-जोखा रखा जाता है तथा उसका लेखा-परीक्षण किया जाता है। नैतिक उत्तरदायित्व के अंतर्गत प्रशासनिक अधिकारियों से ईमानदारी, निष्पक्षता, पारदर्शिता और सार्वजनिक सेवा की भावना की अपेक्षा की जाती है। सामाजिक उत्तरदायित्व के अंतर्गत प्रशासन नागरिकों की अपेक्षाओं और जनहित के अनुरूप कार्य करता है।
उत्तरदायित्व और नियंत्रण एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि केवल उत्तरदायित्व हो और नियंत्रण की व्यवस्था न हो, तो उत्तरदायित्व प्रभावी नहीं रहेगा। इसी प्रकार यदि केवल नियंत्रण हो और उत्तरदायित्व की भावना न हो, तो प्रशासन भय और औपचारिकता का शिकार हो जाएगा। इसलिए एक स्वस्थ प्रशासनिक व्यवस्था में दोनों का संतुलन आवश्यक है। प्रभावी नियंत्रण प्रशासन को अनुशासित बनाता है, जबकि उत्तरदायित्व उसे जनोन्मुख, संवेदनशील और उत्तरदायी बनाता है।
आज के डिजिटल युग में उत्तरदायित्व की अवधारणा और अधिक व्यापक हो गई है। सूचना का अधिकार, ई-गवर्नेंस, सामाजिक अंकेक्षण, ऑनलाइन शिकायत निवारण, नागरिक चार्टर, सेवा गारंटी कानून और डिजिटल पारदर्शिता जैसे उपायों ने प्रशासन को पहले की तुलना में अधिक जवाबदेह बनाया है। अब नागरिक केवल मतदाता नहीं हैं, बल्कि शासन प्रक्रिया के सक्रिय सहभागी भी हैं। प्रशासन से अपेक्षा की जाती है कि वह केवल कानून का पालन ही न करे, बल्कि समयबद्ध, पारदर्शी, निष्पक्ष और गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ भी प्रदान करे।
उत्तरदायित्व एवं नियंत्रण की अवधारणा को और गहराई से समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि प्रशासन में उत्तरदायित्व केवल एक नैतिक आदर्श नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक और संस्थागत व्यवस्था है। प्रशासन का प्रत्येक अधिकारी अपने पद के साथ कुछ अधिकार प्राप्त करता है, परन्तु उन अधिकारों का प्रयोग वह अपनी व्यक्तिगत इच्छा से नहीं कर सकता। उसे संविधान, कानून, सरकारी नियमों, प्रशासनिक प्रक्रियाओं तथा जनहित के अनुरूप कार्य करना होता है। यदि कोई अधिकारी अपने अधिकारों का दुरुपयोग करता है, पक्षपातपूर्ण निर्णय लेता है, भ्रष्टाचार में संलग्न होता है अथवा सार्वजनिक हित की उपेक्षा करता है, तो उसके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई, न्यायिक हस्तक्षेप अथवा अन्य कानूनी उपाय किए जा सकते हैं। यही व्यवस्था प्रशासन को उत्तरदायी बनाती है।
प्रशासनिक उत्तरदायित्व के अनेक स्वरूप होते हैं। प्रशासनिक उत्तरदायित्व का अर्थ है कि प्रत्येक कर्मचारी अपने वरिष्ठ अधिकारी के प्रति उत्तरदायी होता है। प्रत्येक विभाग में आदेश ऊपर से नीचे की ओर आते हैं और कार्यों की समीक्षा नीचे से ऊपर की ओर होती है। इस प्रक्रिया में वरिष्ठ अधिकारी अधीनस्थ कर्मचारियों के कार्यों का निरीक्षण करते हैं, उनकी कार्यक्षमता का मूल्यांकन करते हैं तथा आवश्यक होने पर उन्हें निर्देश, परामर्श या अनुशासनात्मक दंड देते हैं। इससे प्रशासन में अनुशासन और कार्यकुशलता बनी रहती है।
राजनीतिक उत्तरदायित्व लोकतांत्रिक शासन की महत्वपूर्ण विशेषता है। भारत में प्रशासन मंत्रिपरिषद के माध्यम से संसद और राज्य विधानमंडलों के प्रति उत्तरदायी होता है। प्रत्येक मंत्रालय का राजनीतिक प्रमुख मंत्री होता है, जबकि प्रशासनिक प्रमुख सचिव या अन्य वरिष्ठ अधिकारी होते हैं। यदि किसी विभाग में गंभीर त्रुटि होती है, तो उसके लिए संबंधित मंत्री को भी विधायिका के समक्ष उत्तर देना पड़ता है। इस व्यवस्था से यह सुनिश्चित होता है कि प्रशासन जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों के नियंत्रण में कार्य करे।
विधिक या कानूनी उत्तरदायित्व का अर्थ है कि प्रशासन का प्रत्येक कार्य कानून के अनुरूप होना चाहिए। यदि कोई अधिकारी अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्य करता है, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है या नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करता है, तो न्यायालय उसके निर्णय को निरस्त कर सकता है। भारत में न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) तथा रिट अधिकार इसी उत्तरदायित्व को प्रभावी बनाते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि प्रशासन कानून से ऊपर नहीं है।
वित्तीय उत्तरदायित्व भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सरकार का प्रत्येक रुपया जनता का धन है। इसलिए उसका उपयोग केवल स्वीकृत उद्देश्य के लिए ही होना चाहिए। बजट, लेखांकन, लेखा-परीक्षण, संसदीय समितियाँ तथा नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) जैसी व्यवस्थाएँ वित्तीय उत्तरदायित्व सुनिश्चित करती हैं। यदि सार्वजनिक धन का दुरुपयोग होता है, तो उसकी जाँच की जाती है और दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की जा सकती है।
नैतिक उत्तरदायित्व प्रशासन की आत्मा माना जाता है। कोई भी नियम या कानून प्रत्येक परिस्थिति का समाधान नहीं दे सकता। अनेक अवसर ऐसे आते हैं जब अधिकारी को अपने विवेक, ईमानदारी और नैतिक मूल्यों के आधार पर निर्णय लेना पड़ता है। निष्पक्षता, सत्यनिष्ठा, पारदर्शिता, संवेदनशीलता, सेवा-भाव और सार्वजनिक हित के प्रति समर्पण प्रशासनिक नैतिकता के प्रमुख तत्व हैं। यदि अधिकारी केवल नियमों का पालन करे लेकिन नैतिकता की उपेक्षा करे, तो प्रशासन जनता का विश्वास खो सकता है।
इसी प्रकार सामाजिक उत्तरदायित्व का अर्थ है कि प्रशासन समाज की बदलती आवश्यकताओं, अपेक्षाओं और समस्याओं के प्रति संवेदनशील रहे। आधुनिक लोकतंत्र में प्रशासन केवल कानून लागू करने वाली संस्था नहीं है, बल्कि विकास, सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण, बाल अधिकार, दिव्यांगजन कल्याण तथा डिजिटल समावेशन जैसे अनेक क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाता है। इसलिए उसकी जवाबदेही समाज के व्यापक हितों के प्रति भी होती है।
उत्तरदायित्व की प्रभावशीलता के लिए नियंत्रण की सुदृढ़ व्यवस्था आवश्यक होती है। नियंत्रण का उद्देश्य प्रशासनिक स्वतंत्रता को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसे सही दिशा देना है। यदि किसी अधिकारी को पूर्ण स्वतंत्रता दे दी जाए और उसके कार्यों की समीक्षा न हो, तो मनमानी, भ्रष्टाचार और शक्ति का दुरुपयोग बढ़ सकता है। दूसरी ओर यदि अत्यधिक नियंत्रण स्थापित कर दिया जाए, तो निर्णय लेने की क्षमता कम हो जाती है और प्रशासन में अनावश्यक विलंब उत्पन्न होता है। इसलिए आधुनिक प्रशासन संतुलित नियंत्रण की व्यवस्था का समर्थन करता है, जिसमें अधिकारियों को आवश्यक स्वतंत्रता भी मिले और उनके कार्यों की प्रभावी समीक्षा भी होती रहे।
प्रशासनिक नियंत्रण के प्रमुख उद्देश्य हैं—प्रशासन में अनुशासन बनाए रखना, सरकारी नीतियों का सही क्रियान्वयन सुनिश्चित करना, भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को रोकना, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना, संसाधनों का उचित उपयोग करना तथा प्रशासनिक कार्यों में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व स्थापित करना। प्रभावी नियंत्रण के कारण अधिकारियों में उत्तरदायित्व की भावना विकसित होती है और जनता का प्रशासन पर विश्वास मजबूत होता है।
वर्तमान समय में उत्तरदायित्व एवं नियंत्रण की अवधारणा में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया है। पहले प्रशासन का मुख्य उद्देश्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना था, लेकिन आज उससे गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक सेवाएँ, समयबद्ध निर्णय, पारदर्शिता, जनसहभागिता तथा तकनीक आधारित सेवा वितरण की अपेक्षा की जाती है। सूचना का अधिकार, सामाजिक अंकेक्षण, नागरिक अधिकार पत्र (Citizen Charter), ई-गवर्नेंस, ऑनलाइन शिकायत निवारण प्रणाली, डिजिटल भुगतान व्यवस्था तथा सेवा गारंटी कानूनों ने प्रशासन को पहले की तुलना में अधिक उत्तरदायी और पारदर्शी बनाया है।
फिर भी अनेक चुनौतियाँ आज भी विद्यमान हैं। लालफीताशाही, भ्रष्टाचार, राजनीतिक हस्तक्षेप, निर्णय लेने में विलंब, संसाधनों की कमी, तकनीकी असमानता तथा जवाबदेही की कमजोर व्यवस्था कई बार प्रशासन की कार्यकुशलता को प्रभावित करती हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रशासनिक संस्कृति में ईमानदारी, पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और जनसेवा की भावना का विकास भी आवश्यक है।
उत्तरदायित्व एवं नियंत्रण की अवधारणा को समझते समय विभिन्न प्रशासनिक विद्वानों के विचारों का अध्ययन भी आवश्यक है, क्योंकि इन्हीं विचारों के आधार पर आधुनिक प्रशासनिक सिद्धांत विकसित हुए हैं। अनेक विद्वानों ने इस बात पर बल दिया है कि प्रशासन की वास्तविक सफलता केवल उसकी कार्यकुशलता में नहीं, बल्कि उसके उत्तरदायित्व, पारदर्शिता और जनहित के प्रति समर्पण में निहित होती है। प्रशासन यदि जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप कार्य नहीं करता, तो उसकी वैधता (Legitimacy) पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। इसलिए उत्तरदायित्व को लोकतांत्रिक शासन का मूल आधार माना गया है।
प्रशासनिक चिंतक Woodrow Wilson ने प्रशासन को राजनीति से अलग अध्ययन का विषय माना, किंतु उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासन का अंतिम उद्देश्य सार्वजनिक नीति का प्रभावी और उत्तरदायी क्रियान्वयन है। प्रशासन को दक्ष, निष्पक्ष और जनहितकारी होना चाहिए। इसी प्रकार Max Weber ने नौकरशाही (Bureaucracy) के आदर्श मॉडल का प्रतिपादन करते हुए नियमों, पदानुक्रम, विशेषज्ञता और निष्पक्षता पर बल दिया। वेबर का मत था कि यदि प्रशासन नियमों के अनुसार कार्य करेगा, तो उत्तरदायित्व और नियंत्रण दोनों मजबूत होंगे। हालांकि बाद के विद्वानों ने यह भी बताया कि अत्यधिक नियम-केंद्रित प्रशासन कभी-कभी लालफीताशाही और निर्णय में विलंब का कारण बन सकता है।
Herbert A. Simon ने प्रशासनिक निर्णयों के वैज्ञानिक विश्लेषण पर बल दिया। उनके अनुसार प्रशासनिक निर्णय तथ्यों, तर्क और विवेक पर आधारित होने चाहिए। यदि निर्णय व्यक्तिगत पसंद, राजनीतिक दबाव या पक्षपात के आधार पर लिए जाएँ, तो उत्तरदायित्व की भावना कमजोर पड़ जाती है। इसलिए उन्होंने विवेकपूर्ण निर्णय-निर्माण और उत्तरदायी प्रशासन को एक-दूसरे का पूरक माना।
Paul H. Appleby ने भारत के प्रशासनिक ढाँचे का अध्ययन करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक प्रशासन में उत्तरदायित्व केवल नियमों से नहीं आता, बल्कि प्रशासनिक संस्कृति, राजनीतिक नेतृत्व और जनता की सक्रिय भागीदारी से भी विकसित होता है। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि प्रशासन को जनता की आवश्यकताओं और अपेक्षाओं के अनुरूप कार्य करना चाहिए।
भारतीय संदर्भ में उत्तरदायित्व एवं नियंत्रण का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि भारत एक विशाल, विविधतापूर्ण तथा लोकतांत्रिक कल्याणकारी राज्य है। भारतीय संविधान ने प्रशासन को संविधान के प्रति उत्तरदायी बनाया है। संविधान के विभिन्न प्रावधानों के माध्यम से प्रशासन पर अनेक प्रकार के नियंत्रण स्थापित किए गए हैं। संसद और राज्य विधानमंडल प्रशासन की कार्यप्रणाली की समीक्षा करते हैं, न्यायपालिका प्रशासनिक निर्णयों की वैधता की जाँच करती है, कार्यपालिका प्रशासनिक अधिकारियों का मार्गदर्शन एवं नियंत्रण करती है, जबकि नागरिक सूचना के अधिकार, जनहित याचिका, सामाजिक अंकेक्षण तथा अन्य लोकतांत्रिक साधनों के माध्यम से प्रशासन को उत्तरदायी बनाते हैं।
भारतीय प्रशासन में उत्तरदायित्व की भावना को सुदृढ़ करने के लिए समय-समय पर अनेक सुधार किए गए हैं। प्रशासनिक सुधार आयोगों ने पारदर्शिता, उत्तरदायित्व, नैतिकता और नागरिक-केंद्रित प्रशासन पर विशेष बल दिया। सूचना का अधिकार अधिनियम ने नागरिकों को सरकारी अभिलेखों तक पहुँच का अधिकार प्रदान किया, जिससे प्रशासन की कार्यप्रणाली अधिक पारदर्शी बनी। इसी प्रकार नागरिक अधिकार पत्र (Citizen Charter), ई-गवर्नेंस, सेवा गारंटी कानून, डिजिटल शिकायत निवारण प्रणाली और सामाजिक अंकेक्षण जैसी व्यवस्थाओं ने प्रशासनिक उत्तरदायित्व को मजबूत किया है।
आधुनिक युग में उत्तरदायित्व की अवधारणा केवल सरकारी विभागों तक सीमित नहीं रही। सार्वजनिक-निजी भागीदारी (Public Private Partnership), स्वायत्त संस्थाएँ, नियामक आयोग, स्थानीय स्वशासन संस्थाएँ तथा सार्वजनिक उपक्रम भी जनता के प्रति उत्तरदायी माने जाते हैं। आज यह अपेक्षा की जाती है कि प्रत्येक सार्वजनिक संस्था अपने निर्णयों, व्ययों और कार्यों के संबंध में पारदर्शी रहे तथा समय-समय पर अपनी कार्यप्रणाली का मूल्यांकन कराए।
उत्तरदायित्व एवं नियंत्रण के प्रभावी होने के लिए कुछ आवश्यक शर्तें भी होती हैं। प्रशासनिक व्यवस्था स्पष्ट और सरल होनी चाहिए। अधिकारियों के अधिकार और दायित्व स्पष्ट रूप से निर्धारित होने चाहिए। निर्णय लेने की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए। शिकायत निवारण की प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए। स्वतंत्र न्यायपालिका, सक्रिय विधायिका, स्वतंत्र मीडिया और जागरूक नागरिक समाज का अस्तित्व भी उत्तरदायित्व को मजबूत बनाता है। यदि ये संस्थाएँ कमजोर पड़ जाएँ, तो प्रशासन में मनमानी और भ्रष्टाचार की संभावना बढ़ जाती है।
आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence), डिजिटल शासन (Digital Governance), बिग डेटा, ऑनलाइन सेवाओं तथा स्वचालित निर्णय प्रणालियों के बढ़ते उपयोग के कारण उत्तरदायित्व की नई चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि तकनीक का उपयोग पारदर्शिता और जनहित के लिए हो, न कि नागरिकों के अधिकारों के हनन या भेदभाव के लिए। इसलिए आधुनिक प्रशासन में डिजिटल उत्तरदायित्व (Digital Accountability) और डेटा सुरक्षा भी महत्वपूर्ण विषय बन चुके हैं।
अंततः यह निष्कर्ष निकलता है कि उत्तरदायित्व एवं नियंत्रण केवल प्रशासनिक अवधारणाएँ नहीं हैं, बल्कि लोकतांत्रिक शासन की आधारशिला हैं। इनकी सहायता से प्रशासन संविधान के प्रति निष्ठावान, जनता के प्रति जवाबदेह, कानून के प्रति प्रतिबद्ध तथा नैतिक मूल्यों के प्रति संवेदनशील बनता है। एक ऐसा प्रशासन जो उत्तरदायी हो, नियंत्रित हो, पारदर्शी हो और जनहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देता हो, वही वास्तविक अर्थों में सुशासन की स्थापना कर सकता है। इसलिए लोक प्रशासन के अध्ययन में उत्तरदायित्व एवं नियंत्रण को केंद्रीय स्थान प्राप्त है और यह विषय प्रशासनिक सिद्धांत तथा व्यवहार—दोनों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
अध्याय–2 : प्रशासन पर विधायिका का नियंत्रण (Legislative Control over Administration)
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का मूल सिद्धांत यह है कि प्रशासन जनता का सेवक है, स्वामी नहीं। जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है और वे प्रतिनिधि संसद तथा राज्य विधानमंडलों के माध्यम से शासन की दिशा निर्धारित करते हैं। प्रशासन इन नीतियों और कानूनों को लागू करता है। इसलिए प्रशासन को पूर्ण स्वतंत्रता नहीं दी जा सकती, क्योंकि बिना नियंत्रण के प्रशासनिक शक्ति का दुरुपयोग होने की संभावना बढ़ जाती है। इसी कारण लोकतांत्रिक देशों में प्रशासन पर विधायिका का प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया गया है। यह नियंत्रण लोकतंत्र की आत्मा माना जाता है, क्योंकि इसके माध्यम से प्रशासन जनता के प्रति उत्तरदायी बना रहता है।
विधायिका का प्रशासन पर नियंत्रण केवल दोष खोजने के लिए नहीं होता, बल्कि उसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि प्रशासन संविधान, कानून तथा जनहित के अनुरूप कार्य करे। यदि प्रशासन सरकार की नीतियों का सही क्रियान्वयन नहीं करता, सार्वजनिक धन का दुरुपयोग करता है या नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो विधायिका उसे उत्तरदायी ठहरा सकती है। इस प्रकार विधायिका प्रशासन और जनता के बीच उत्तरदायित्व की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है।
भारत में संसद और राज्य विधानमंडल प्रशासनिक नियंत्रण के प्रमुख संवैधानिक साधन हैं। संसद के माध्यम से जनता प्रशासन की कार्यप्रणाली पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण रखती है। मंत्री संसद के प्रति उत्तरदायी होते हैं और प्रशासन मंत्री के माध्यम से संसद के प्रति उत्तरदायी माना जाता है। इस व्यवस्था को मंत्रिस्तरीय उत्तरदायित्व (Ministerial Responsibility) कहा जाता है। इसका अर्थ यह है कि किसी भी प्रशासनिक विभाग की सफलता या विफलता के लिए संबंधित मंत्री संसद के समक्ष उत्तर देने के लिए बाध्य होता है। यद्यपि प्रशासनिक कार्य अधिकारी करते हैं, फिर भी राजनीतिक उत्तरदायित्व मंत्री का होता है। यही संसदीय लोकतंत्र की प्रमुख विशेषता है।
विधायिका प्रशासन पर सबसे पहले कानून निर्माण के माध्यम से नियंत्रण स्थापित करती है। संसद और विधानमंडल विभिन्न विषयों पर कानून बनाते हैं और प्रशासन उन्हीं कानूनों के अनुसार कार्य करता है। कोई भी प्रशासनिक अधिकारी कानून से ऊपर नहीं होता। यदि प्रशासन किसी कानून के विपरीत कार्य करता है, तो उसे विधायिका के समक्ष उत्तर देना पड़ सकता है। इसलिए कानून निर्माण विधायिका के नियंत्रण का सबसे मूलभूत साधन है।
दूसरा महत्वपूर्ण साधन वित्तीय नियंत्रण है। लोकतंत्र में यह सिद्धांत स्वीकार किया गया है कि सरकार जनता के धन को संसद की अनुमति के बिना खर्च नहीं कर सकती। प्रत्येक वर्ष सरकार अपना बजट संसद में प्रस्तुत करती है। संसद बजट पर विस्तार से चर्चा करती है, विभिन्न मंत्रालयों की अनुदान माँगों की समीक्षा करती है और आवश्यक होने पर उनमें संशोधन या कटौती का सुझाव देती है। यदि संसद बजट को स्वीकृति नहीं देती, तो सरकार सार्वजनिक धन खर्च नहीं कर सकती। इस प्रकार वित्तीय नियंत्रण के माध्यम से विधायिका प्रशासन को अनुशासित और उत्तरदायी बनाए रखती है।
प्रश्नकाल (Question Hour) भी विधायिका का अत्यंत प्रभावशाली नियंत्रण साधन है। संसद का प्रत्येक कार्य दिवस सामान्यतः प्रश्नकाल से प्रारंभ होता है। इस समय सांसद विभिन्न मंत्रालयों और विभागों से संबंधित प्रश्न पूछते हैं। मंत्री उन प्रश्नों का उत्तर देते हैं और प्रशासनिक कार्यों की जानकारी संसद के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। प्रश्नकाल के माध्यम से प्रशासन की त्रुटियाँ, अनियमितताएँ, भ्रष्टाचार तथा लापरवाही उजागर होती हैं। इससे प्रशासन सतर्क रहता है और जनता को भी सरकारी कार्यों की जानकारी प्राप्त होती है।
शून्यकाल (Zero Hour) भी प्रशासनिक उत्तरदायित्व का एक प्रभावी माध्यम है। इसमें सांसद बिना पूर्व सूचना के किसी महत्वपूर्ण सार्वजनिक विषय को उठाते हैं। यदि किसी प्रशासनिक विभाग में गंभीर समस्या उत्पन्न होती है या जनता से संबंधित कोई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है, तो सांसद शून्यकाल में उसे उठाकर सरकार से तत्काल स्पष्टीकरण माँग सकते हैं। इससे प्रशासन को शीघ्र कार्रवाई करने के लिए प्रेरणा मिलती है।
इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार की संसदीय चर्चाएँ भी प्रशासन पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करती हैं। अल्पकालिक चर्चा, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, स्थगन प्रस्ताव, विशेष उल्लेख तथा अन्य संसदीय प्रक्रियाओं के माध्यम से प्रशासन की कार्यप्रणाली पर विस्तृत विचार-विमर्श किया जाता है। इन चर्चाओं के दौरान सरकार को अपनी नीतियों तथा प्रशासनिक निर्णयों का औचित्य स्पष्ट करना पड़ता है। यदि सरकार संतोषजनक उत्तर देने में असफल रहती है, तो उसकी आलोचना होती है और कई बार उसे अपनी नीति में परिवर्तन भी करना पड़ता है।
विधायिका की विभिन्न स्थायी समितियाँ (Parliamentary Committees) भी प्रशासनिक नियंत्रण का अत्यंत प्रभावी माध्यम हैं। संसद के पास इतने अधिक कार्य होते हैं कि प्रत्येक विषय पर विस्तार से चर्चा करना संभव नहीं होता। इसलिए विभिन्न समितियाँ प्रशासनिक कार्यों की गहराई से समीक्षा करती हैं। लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee) सार्वजनिक धन के उपयोग की जाँच करती है। प्राक्कलन समिति (Estimates Committee) सरकारी व्यय की मितव्ययिता और कार्यकुशलता का अध्ययन करती है। लोक उपक्रम समिति (Committee on Public Undertakings) सरकारी उपक्रमों के कार्यों की समीक्षा करती है। इन समितियों की रिपोर्टें प्रशासनिक सुधारों का महत्वपूर्ण आधार बनती हैं और प्रशासन को अधिक उत्तरदायी बनाती हैं
विधायिका प्रशासन पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए अनेक संसदीय साधनों का उपयोग करती है। इनमें अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion) अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। संसदीय शासन प्रणाली में मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। यदि लोकसभा को यह विश्वास नहीं रह जाता कि सरकार प्रशासन का सही संचालन कर रही है, तो उसके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है। यदि यह प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो पूरी मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना पड़ता है। यद्यपि अविश्वास प्रस्ताव प्रत्यक्ष रूप से प्रशासनिक अधिकारियों के विरुद्ध नहीं होता, फिर भी इसका प्रभाव पूरे प्रशासन पर पड़ता है, क्योंकि प्रशासन मंत्रिपरिषद के निर्देशन में कार्य करता है। इसलिए यह संसदीय नियंत्रण का सबसे प्रभावशाली राजनीतिक साधन माना जाता है।
इसी प्रकार निंदा प्रस्ताव (Censure Motion) भी सरकार की किसी विशेष नीति या प्रशासनिक निर्णय के प्रति असहमति व्यक्त करने का संसदीय माध्यम है। इसके माध्यम से विपक्ष सरकार से किसी विशेष विषय पर उत्तर माँगता है। यदि सरकार संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाती, तो उसे अपनी नीति में सुधार करना पड़ सकता है। इस प्रकार निंदा प्रस्ताव प्रशासन को अधिक सावधानी और उत्तरदायित्व के साथ कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।
विशेषाधिकार प्रस्ताव (Privilege Motion) का उपयोग तब किया जाता है जब कोई मंत्री या अधिकारी संसद को गलत जानकारी देता है अथवा संसद के विशेषाधिकारों का उल्लंघन करता है। यदि यह सिद्ध हो जाए कि सदन को जानबूझकर भ्रमित किया गया है, तो संबंधित मंत्री को स्पष्टीकरण देना पड़ता है और आवश्यक होने पर उसके विरुद्ध कार्रवाई भी की जा सकती है। इससे प्रशासन में सत्यनिष्ठा और पारदर्शिता बनी रहती है।
संसदीय समितियाँ प्रशासन पर नियंत्रण का सबसे व्यावहारिक और प्रभावी माध्यम मानी जाती हैं। लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee) नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टों का परीक्षण करती है और यह देखती है कि सरकारी धन का उपयोग नियमों के अनुसार हुआ या नहीं। यदि किसी विभाग में वित्तीय अनियमितता पाई जाती है, तो समिति संबंधित अधिकारियों और मंत्रालय से स्पष्टीकरण माँगती है। इस प्रक्रिया के कारण सार्वजनिक धन के दुरुपयोग पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित होता है।
प्राक्कलन समिति (Estimates Committee) सरकारी योजनाओं और व्ययों का विश्लेषण करती है। इसका उद्देश्य केवल खर्च की जाँच करना नहीं, बल्कि यह देखना भी होता है कि सरकारी धन का उपयोग अधिक दक्षता, मितव्ययिता और प्रभावशीलता के साथ कैसे किया जा सकता है। यह समिति प्रशासनिक सुधारों के लिए भी महत्वपूर्ण सुझाव देती है।
लोक उपक्रम समिति (Committee on Public Undertakings) सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की कार्यप्रणाली, वित्तीय स्थिति तथा प्रशासनिक दक्षता का मूल्यांकन करती है। यह समिति यह सुनिश्चित करती है कि सरकारी उपक्रम जनहित और आर्थिक उत्तरदायित्व के अनुरूप कार्य करें।
इन समितियों का सबसे बड़ा महत्व यह है कि वे प्रशासनिक विषयों का गहन अध्ययन करती हैं। संसद के सामान्य अधिवेशन में समय की कमी के कारण जिन विषयों पर विस्तार से चर्चा नहीं हो पाती, उनका विश्लेषण समितियाँ करती हैं। इसलिए इन्हें संसदीय नियंत्रण की रीढ़ माना जाता है।
भारत में प्रशासन पर विधायिका के नियंत्रण का महत्व अनेक कारणों से अत्यधिक है। पहला, इससे लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व स्थापित होता है। दूसरा, प्रशासनिक भ्रष्टाचार और अनियमितताओं पर नियंत्रण रहता है। तीसरा, सार्वजनिक धन के उचित उपयोग की निगरानी होती है। चौथा, सरकारी योजनाओं की प्रभावशीलता का मूल्यांकन होता है। पाँचवाँ, नागरिकों की समस्याएँ संसद के माध्यम से प्रशासन तक पहुँचती हैं। इस प्रकार विधायिका प्रशासन और जनता के बीच एक प्रभावी सेतु का कार्य करती है।
हालाँकि विधायिका का नियंत्रण पूर्णतः दोषरहित नहीं है। व्यवहार में इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं। संसद और विधानमंडलों के पास कार्यों की संख्या अत्यधिक होती है, जिससे प्रत्येक प्रशासनिक विषय पर विस्तार से विचार करना संभव नहीं हो पाता। कई बार राजनीतिक दलों की प्रतिस्पर्धा के कारण प्रशासनिक मुद्दे भी राजनीतिक विवाद का विषय बन जाते हैं। दलगत अनुशासन (Party Whip) के कारण अनेक बार सांसद स्वतंत्र रूप से अपनी राय व्यक्त नहीं कर पाते। इसके अतिरिक्त प्रशासनिक कार्यों की तकनीकी जटिलता के कारण प्रत्येक जनप्रतिनिधि के लिए सभी विषयों का विशेषज्ञ ज्ञान रखना संभव नहीं होता। इन कारणों से विधायिका का नियंत्रण कभी-कभी अपेक्षित प्रभाव नहीं डाल पाता।
समकालीन भारत में प्रशासनिक उत्तरदायित्व को अधिक प्रभावी बनाने के लिए संसदीय नियंत्रण के साथ-साथ सूचना का अधिकार, डिजिटल शासन, ऑनलाइन शिकायत निवारण प्रणाली, सामाजिक अंकेक्षण, नागरिक अधिकार पत्र (Citizen Charter), ई-ऑफिस व्यवस्था तथा विभिन्न नियामक संस्थाओं की भूमिका भी बढ़ी है। आज नागरिक पहले की अपेक्षा अधिक जागरूक हैं और प्रशासन से पारदर्शिता तथा समयबद्ध सेवाओं की अपेक्षा करते हैं। इसलिए विधायिका भी प्रशासन की कार्यप्रणाली पर पहले से अधिक सक्रिय निगरानी रख रही है।
अध्याय–3 : प्रशासन पर कार्यपालिका का नियंत्रण (Executive Control over Administration)
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में प्रशासन पर नियंत्रण केवल विधायिका और न्यायपालिका द्वारा ही नहीं किया जाता, बल्कि कार्यपालिका भी प्रशासन को निर्देशित, नियंत्रित और उत्तरदायी बनाए रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वास्तव में प्रशासन प्रतिदिन जिन नीतियों और कार्यक्रमों को लागू करता है, उनका प्रत्यक्ष संचालन कार्यपालिका के माध्यम से ही होता है। इसलिए प्रशासन पर कार्यपालिका का नियंत्रण सबसे निकट, निरंतर और व्यावहारिक नियंत्रण माना जाता है। यदि यह नियंत्रण प्रभावी न हो, तो सरकारी नीतियों का सही क्रियान्वयन संभव नहीं हो सकेगा और प्रशासनिक व्यवस्था में अव्यवस्था उत्पन्न हो सकती है।
कार्यपालिका से आशय राष्ट्रपति, राज्यपाल, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद तथा विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के प्रशासनिक प्रमुखों से है। संसदीय शासन प्रणाली में राष्ट्रपति और राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख होते हैं, जबकि वास्तविक कार्यपालिका प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद होती है। प्रशासनिक अधिकारी इन्हीं के निर्देशन, नियंत्रण और पर्यवेक्षण में कार्य करते हैं। इसलिए प्रशासनिक उत्तरदायित्व का सबसे पहला स्तर कार्यपालिका के प्रति ही होता है।
कार्यपालिका का मुख्य कार्य विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों और स्वीकृत नीतियों को प्रभावी रूप से लागू करना है। प्रशासन इस कार्य का प्रमुख साधन है। यदि प्रशासन नीति के अनुरूप कार्य नहीं करता या किसी योजना के क्रियान्वयन में लापरवाही बरतता है, तो कार्यपालिका उसे आवश्यक निर्देश देती है, उसकी समीक्षा करती है तथा आवश्यक होने पर सुधारात्मक कदम उठाती है। इस प्रकार कार्यपालिका प्रशासन और सरकार के बीच समन्वय स्थापित करती है।
कार्यपालिका प्रशासन पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए अनेक साधनों का उपयोग करती है। सबसे पहला साधन नीति-निर्धारण (Policy Direction) है। सरकार राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर विभिन्न नीतियाँ बनाती है तथा प्रशासन को उनके अनुसार कार्य करने के निर्देश देती है। प्रशासन का दायित्व इन नीतियों को व्यवहार में लागू करना होता है। यदि किसी योजना के क्रियान्वयन में कठिनाई आती है, तो कार्यपालिका समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी करके प्रशासन को उचित मार्गदर्शन प्रदान करती है।
दूसरा महत्वपूर्ण साधन नियुक्ति (Appointment) है। प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति, पदस्थापन और पदोन्नति की व्यवस्था कार्यपालिका के नियंत्रण में होती है। योग्य, ईमानदार और दक्ष अधिकारियों की नियुक्ति से प्रशासन की गुणवत्ता में सुधार होता है। यदि नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी और योग्यता आधारित हो, तो प्रशासन अधिक उत्तरदायी और प्रभावी बनता है।
तीसरा साधन स्थानांतरण (Transfer) है। प्रशासनिक व्यवस्था में स्थानांतरण का उद्देश्य अधिकारियों के अनुभव का उचित उपयोग करना तथा प्रशासनिक निष्पक्षता बनाए रखना है। आवश्यकता पड़ने पर कार्यपालिका अधिकारियों का स्थानांतरण करके प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने का प्रयास करती है। हालांकि स्थानांतरण का उपयोग यदि राजनीतिक या व्यक्तिगत कारणों से किया जाए, तो इससे प्रशासन की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। इसलिए स्थानांतरण नीति न्यायसंगत, पारदर्शी और नियमसम्मत होनी चाहिए।
कार्यपालिका का एक महत्वपूर्ण नियंत्रण साधन निरीक्षण (Inspection) और पर्यवेक्षण (Supervision) भी है। वरिष्ठ अधिकारी समय-समय पर अधीनस्थ कार्यालयों का निरीक्षण करते हैं, योजनाओं की प्रगति का मूल्यांकन करते हैं तथा कमियों को दूर करने के निर्देश देते हैं। निरीक्षण के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि सरकारी योजनाएँ निर्धारित समय और गुणवत्ता के अनुसार पूरी हों तथा सार्वजनिक धन का दुरुपयोग न हो। निरीक्षण प्रशासनिक दक्षता और उत्तरदायित्व बढ़ाने का प्रभावी माध्यम है।
कार्यपालिका प्रशासनिक प्रतिवेदन (Administrative Reports) के माध्यम से भी नियंत्रण स्थापित करती है। प्रत्येक विभाग नियमित रूप से अपनी गतिविधियों, उपलब्धियों, समस्याओं तथा वित्तीय स्थिति से संबंधित प्रतिवेदन सरकार को प्रस्तुत करता है। इन प्रतिवेदनों का अध्ययन करके कार्यपालिका प्रशासन की कार्यप्रणाली का मूल्यांकन करती है तथा आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाती है। आज डिजिटल डैशबोर्ड, ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम और ई-गवर्नेंस के माध्यम से यह प्रक्रिया और अधिक प्रभावी हो गई है।
कार्यपालिका का नियंत्रण केवल निर्देश देने तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह अनुशासनात्मक कार्रवाई (Disciplinary Action) भी कर सकती है। यदि कोई अधिकारी भ्रष्टाचार, लापरवाही, कर्तव्य की उपेक्षा, अनुशासनहीनता या नियमों के उल्लंघन का दोषी पाया जाता है, तो उसके विरुद्ध चेतावनी, वेतनवृद्धि रोकना, निलंबन, पदावनति या सेवा से पृथक्करण जैसी कार्रवाई की जा सकती है। इससे प्रशासन में अनुशासन और उत्तरदायित्व बना रहता है।
प्रशासनिक नियंत्रण का एक अन्य महत्वपूर्ण साधन समन्वय (Coordination) है। आधुनिक शासन में अनेक मंत्रालय और विभाग एक ही योजना पर मिलकर कार्य करते हैं। यदि इनके बीच समन्वय न हो, तो योजनाओं में देरी, संसाधनों की बर्बादी तथा नीति-निर्माण में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। कार्यपालिका विभिन्न विभागों के बीच समन्वय स्थापित करके प्रशासनिक कार्यों को अधिक प्रभावी और सुव्यवस्थित बनाती है।
कार्यपालिका का नियंत्रण प्रशासनिक व्यवस्था में निरंतरता बनाए रखने का सबसे प्रभावी माध्यम माना जाता है। आधुनिक शासन में केवल आदेश जारी करना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक होता है कि वे आदेश सही समय पर और सही ढंग से लागू किए जाएँ। इसलिए कार्यपालिका समय-समय पर प्रशासनिक बैठकों, समीक्षा सम्मेलनों, प्रगति रिपोर्टों तथा क्षेत्रीय निरीक्षणों के माध्यम से योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी करती है। यदि किसी योजना में विलंब, अनियमितता या संसाधनों की कमी दिखाई देती है, तो कार्यपालिका तत्काल सुधारात्मक कदम उठाती है। इस प्रकार प्रशासनिक नियंत्रण केवल दंड देने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि प्रशासन को सही दिशा प्रदान करने का माध्यम भी है।
कार्यपालिका के नियंत्रण में मंत्रिपरिषद की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। संसदीय शासन प्रणाली में प्रत्येक मंत्रालय का राजनीतिक प्रमुख संबंधित मंत्री होता है। मंत्री अपने विभाग की नीतियाँ निर्धारित करता है, प्रशासनिक अधिकारियों को दिशा-निर्देश देता है तथा विभाग की गतिविधियों की समीक्षा करता है। मंत्रालय के अधिकारी मंत्री को आवश्यक तथ्य, आँकड़े तथा सुझाव उपलब्ध कराते हैं, जबकि अंतिम नीति संबंधी निर्णय मंत्री द्वारा लिया जाता है। इस प्रकार मंत्री और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच सहयोगात्मक संबंध स्थापित होता है। यदि किसी विभाग में गंभीर प्रशासनिक त्रुटि होती है, तो उसका उत्तर संबंधित मंत्री को संसद या विधानमंडल के समक्ष देना पड़ता है। यही व्यवस्था लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व की आधारशिला है।
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री भी प्रशासनिक नियंत्रण में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। प्रधानमंत्री पूरे केंद्रीय प्रशासन का नेतृत्व करते हैं तथा विभिन्न मंत्रालयों के बीच समन्वय स्थापित करते हैं। इसी प्रकार मुख्यमंत्री राज्य प्रशासन का सर्वोच्च कार्यकारी प्रमुख होता है। वे समय-समय पर उच्चस्तरीय बैठकों के माध्यम से योजनाओं की प्रगति की समीक्षा करते हैं, प्राथमिकताएँ निर्धारित करते हैं तथा प्रशासनिक अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश देते हैं। राष्ट्रीय महत्व की योजनाओं, आपदा प्रबंधन, कानून-व्यवस्था तथा विकास कार्यक्रमों में उनका नेतृत्व प्रशासनिक नियंत्रण को अधिक प्रभावी बनाता है।
प्रशासन पर नियंत्रण स्थापित करने में कैबिनेट सचिवालय तथा सचिवालय प्रणाली का भी महत्वपूर्ण योगदान है। सचिवालय विभिन्न मंत्रालयों के बीच समन्वय स्थापित करता है, नीति-निर्माण में सहायता प्रदान करता है, प्रशासनिक निर्णयों का अभिलेखीकरण करता है तथा उनके क्रियान्वयन की समीक्षा करता है। मंत्रालयों के सचिव अपने विभागों के प्रशासनिक प्रमुख होते हैं और वे सरकार तथा प्रशासन के बीच महत्वपूर्ण कड़ी का कार्य करते हैं। सचिवालय व्यवस्था के कारण प्रशासनिक निर्णयों में निरंतरता, स्पष्टता तथा उत्तरदायित्व बना रहता है।
कार्यपालिका प्रशासनिक नियंत्रण के लिए वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन (Annual Performance Appraisal Report), प्रदर्शन मूल्यांकन, सेवा अभिलेख, विभागीय जाँच तथा प्रशिक्षण कार्यक्रमों का भी उपयोग करती है। इन माध्यमों से अधिकारियों की कार्यक्षमता, ईमानदारी, नेतृत्व क्षमता तथा जनसेवा के प्रति उनके दृष्टिकोण का मूल्यांकन किया जाता है। उत्कृष्ट कार्य करने वाले अधिकारियों को पुरस्कार, पदोन्नति और सम्मान दिया जाता है, जबकि लगातार लापरवाही करने वाले अधिकारियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाती है। इससे प्रशासन में प्रतिस्पर्धा, उत्तरदायित्व और कार्यकुशलता का विकास होता है।
वर्तमान समय में डिजिटल तकनीक ने कार्यपालिका के नियंत्रण को और अधिक प्रभावी बना दिया है। विभिन्न मंत्रालय अब ई-ऑफिस, ऑनलाइन फाइल ट्रैकिंग, डिजिटल डैशबोर्ड, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, रियल-टाइम मॉनिटरिंग तथा डाटा विश्लेषण प्रणाली का उपयोग कर रहे हैं। इससे योजनाओं की प्रगति की निरंतर निगरानी संभव हुई है तथा निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक तेज, पारदर्शी और तथ्य-आधारित बनी है। डिजिटल प्रशासन के कारण भ्रष्टाचार की संभावना कम हुई है तथा जनता को समयबद्ध सेवाएँ उपलब्ध कराने में सुविधा हुई है।
हालाँकि कार्यपालिका के नियंत्रण की कुछ सीमाएँ भी हैं। यदि राजनीतिक हस्तक्षेप अत्यधिक बढ़ जाए, तो प्रशासनिक निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। बार-बार होने वाले स्थानांतरण अधिकारियों के मनोबल को कम कर सकते हैं और दीर्घकालीन योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं। कई बार व्यक्तिगत या राजनीतिक कारणों से लिए गए प्रशासनिक निर्णय प्रशासनिक दक्षता को प्रभावित करते हैं। इसके अतिरिक्त अत्यधिक केंद्रीकरण, लालफीताशाही, समन्वय की कमी तथा संसाधनों का अभाव भी कार्यपालिका के नियंत्रण को कमजोर कर सकते हैं। इसलिए आवश्यक है कि कार्यपालिका का नियंत्रण न्यायसंगत, पारदर्शी, नियमसम्मत तथा जनहित पर आधारित हो।
आधुनिक प्रशासन में यह स्वीकार किया जाता है कि प्रभावी नियंत्रण का अर्थ केवल आदेश देना नहीं, बल्कि अधिकारियों को प्रेरित करना, प्रशिक्षण देना, संसाधन उपलब्ध कराना और उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना भी है। एक सफल कार्यपालिका वही है जो प्रशासन को अनुशासित रखते हुए उसे नवाचार, दक्षता और जनसेवा के लिए भी प्रोत्साहित करे। नियंत्रण और प्रशासनिक स्वतंत्रता के बीच उचित संतुलन बनाए रखना ही सुशासन की वास्तविक पहचान है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि प्रशासन पर कार्यपालिका का नियंत्रण लोकतांत्रिक शासन की अनिवार्य आवश्यकता है। कार्यपालिका नीति-निर्धारण, नियुक्ति, स्थानांतरण, निरीक्षण, समन्वय, अनुशासन, मूल्यांकन तथा आधुनिक डिजिटल निगरानी प्रणालियों के माध्यम से प्रशासन को उत्तरदायी और प्रभावी बनाए रखती है। यदि यह नियंत्रण निष्पक्ष, पारदर्शी और जनहितकारी हो, तो प्रशासन में दक्षता, उत्तरदायित्व और सुशासन की स्थापना होती है। इसलिए लोक प्रशासन के अध्ययन में कार्यपालिका का नियंत्रण एक अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यावहारिक विषय माना जाता है।
अध्याय–4 : प्रशासन पर न्यायपालिका का नियंत्रण (Judicial Control over Administration)
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में न्यायपालिका प्रशासन पर नियंत्रण रखने वाली एक स्वतंत्र और निष्पक्ष संस्था है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रशासन संविधान, कानून और न्याय के सिद्धांतों के अनुसार कार्य करे। यदि कोई प्रशासनिक अधिकारी अपने अधिकारों का दुरुपयोग करता है, मनमाना निर्णय लेता है या किसी नागरिक के अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो न्यायपालिका हस्तक्षेप कर सकती है। इस प्रकार न्यायपालिका नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती है तथा प्रशासन को कानून के दायरे में रखती है।
भारत में न्यायपालिका प्रशासन पर मुख्य रूप से न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) के माध्यम से नियंत्रण रखती है। इसका अर्थ है कि न्यायालय प्रशासनिक निर्णयों की वैधता की जाँच करता है। यदि कोई निर्णय संविधान या कानून के विरुद्ध पाया जाता है, तो न्यायालय उसे निरस्त कर सकता है। इससे प्रशासन मनमाने ढंग से कार्य नहीं कर सकता।
न्यायपालिका रिट (Writs) के माध्यम से भी प्रशासन को नियंत्रित करती है। भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय पाँच प्रकार की रिट जारी कर सकते हैं—बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus), परमादेश (Mandamus), प्रतिषेध (Prohibition), उत्प्रेषण (Certiorari) तथा अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto)। इन रिटों के माध्यम से नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा कर सकते हैं और प्रशासनिक दुरुपयोग को चुनौती दे सकते हैं।
न्यायपालिका प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की भी रक्षा करती है। इन सिद्धांतों के अनुसार किसी भी व्यक्ति को बिना सुने दंड नहीं दिया जा सकता तथा कोई भी अधिकारी अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं बन सकता। यदि प्रशासन इन सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, तो न्यायालय उसके निर्णय को रद्द कर सकता है।
आधुनिक भारत में जनहित याचिका (Public Interest Litigation – PIL) ने न्यायपालिका की भूमिका को और अधिक प्रभावी बनाया है। इसके माध्यम से कोई भी व्यक्ति समाज या जनहित से जुड़े मामले में न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। पर्यावरण संरक्षण, मानवाधिकार, श्रमिक अधिकार, महिला एवं बाल संरक्षण जैसे अनेक मामलों में जनहित याचिकाओं ने प्रशासन को अधिक उत्तरदायी बनाया है।
हालाँकि न्यायपालिका के नियंत्रण की कुछ सीमाएँ भी हैं। न्यायालय स्वयं प्रशासनिक कार्य नहीं कर सकता और न ही सरकारी नीतियाँ बना सकता है। कई बार न्यायिक प्रक्रिया लंबी होने के कारण निर्णय आने में समय लगता है। फिर भी न्यायपालिका लोकतंत्र में नागरिकों के अधिकारों की अंतिम संरक्षक मानी जाती है।
अतः प्रशासन पर न्यायपालिका का नियंत्रण लोकतांत्रिक शासन की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। न्यायिक पुनरावलोकन, रिट, प्राकृतिक न्याय तथा जनहित याचिका के माध्यम से न्यायपालिका प्रशासन को कानून के अधीन रखती है, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती है और सुशासन की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
अध्याय–5 : नागरिक और प्रशासन (Citizen and Administration)
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में नागरिक और प्रशासन का संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। प्रशासन का मुख्य उद्देश्य जनता की आवश्यकताओं की पूर्ति करना, सार्वजनिक सेवाएँ प्रदान करना तथा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है। इसलिए नागरिक प्रशासन का केंद्रबिंदु माना जाता है। आधुनिक लोकतंत्र में प्रशासन केवल शासन का साधन नहीं, बल्कि जनता का सेवक है। उसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह नागरिकों की समस्याओं का समाधान कितनी दक्षता, निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ करता है।
प्रशासन और नागरिकों के बीच विश्वास, सहयोग तथा संवाद होना आवश्यक है। यदि प्रशासन जनहित की उपेक्षा करता है या नागरिकों की शिकायतों पर ध्यान नहीं देता, तो जनता का विश्वास कम होने लगता है। इसके विपरीत जब प्रशासन ईमानदारी, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के साथ कार्य करता है, तो शासन व्यवस्था अधिक प्रभावी और जनकल्याणकारी बन जाती है।
आधुनिक समय में नागरिकों को प्रशासन के प्रति अनेक अधिकार प्राप्त हैं। सूचना का अधिकार (RTI) के माध्यम से नागरिक सरकारी कार्यों और अभिलेखों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इससे प्रशासन में पारदर्शिता बढ़ी है और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण स्थापित हुआ है। इसी प्रकार नागरिक अधिकार पत्र (Citizen Charter) के माध्यम से विभिन्न सरकारी विभाग अपनी सेवाओं, समय-सीमा और अधिकारियों की जिम्मेदारियों को सार्वजनिक करते हैं, जिससे नागरिकों को बेहतर सेवाएँ प्राप्त होती हैं।
प्रशासन को उत्तरदायी बनाने में शिकायत निवारण प्रणाली (Grievance Redressal System) की महत्वपूर्ण भूमिका है। आज अधिकांश सरकारी विभागों में ऑनलाइन शिकायत पोर्टल, हेल्पलाइन और जनसुनवाई की व्यवस्था उपलब्ध है। इन माध्यमों से नागरिक अपनी समस्याएँ सीधे प्रशासन तक पहुँचा सकते हैं और उनके समाधान की अपेक्षा कर सकते हैं।
ई-गवर्नेंस (E-Governance) ने नागरिक और प्रशासन के संबंधों को अधिक सरल और प्रभावी बनाया है। ऑनलाइन प्रमाण-पत्र, डिजिटल भुगतान, आधार आधारित सेवाएँ, ऑनलाइन आवेदन तथा विभिन्न सरकारी पोर्टलों के माध्यम से नागरिकों को घर बैठे अनेक सुविधाएँ प्राप्त हो रही हैं। इससे समय की बचत, पारदर्शिता और प्रशासनिक दक्षता में वृद्धि हुई है।
सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit) भी नागरिकों की भागीदारी का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इसमें स्थानीय लोग स्वयं सरकारी योजनाओं की समीक्षा करते हैं और यह देखते हैं कि सार्वजनिक धन का उपयोग सही ढंग से हुआ है या नहीं। इससे प्रशासन अधिक उत्तरदायी बनता है तथा भ्रष्टाचार की संभावना कम होती है।
लोकतांत्रिक शासन में नागरिकों का केवल अधिकार ही नहीं, बल्कि कर्तव्य भी है कि वे कानून का पालन करें, करों का भुगतान करें, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करें तथा प्रशासन के साथ सहयोग करें। प्रशासन और नागरिक दोनों के पारस्परिक सहयोग से ही सुशासन (Good Governance) की स्थापना संभव है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि नागरिक और प्रशासन एक-दूसरे के पूरक हैं। प्रशासन का अस्तित्व जनता की सेवा के लिए है और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी प्रशासन को अधिक उत्तरदायी, पारदर्शी तथा प्रभावी बनाती है। इसलिए आधुनिक लोक प्रशासन में नागरिक-केंद्रित प्रशासन (Citizen-Centric Administration) को सुशासन का सबसे महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।
अध्याय–6 : लोकपाल एवं लोकायुक्त (Ombudsman and Lokayukta)
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में प्रशासन को भ्रष्टाचार, पक्षपात और शक्ति के दुरुपयोग से मुक्त रखना अत्यंत आवश्यक है। इसी उद्देश्य से लोकपाल और लोकायुक्त जैसी स्वतंत्र संस्थाओं की स्थापना की गई। इनका मुख्य कार्य लोक सेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार और कदाचार से संबंधित शिकायतों की निष्पक्ष जाँच करना तथा प्रशासन में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और ईमानदारी को बढ़ावा देना है।
लोकपाल (Lokpal) एक केंद्रीय स्तर की संस्था है, जबकि लोकायुक्त (Lokayukta) राज्यों में कार्य करने वाली संस्था है। इनका विचार सबसे पहले L. M. Singhvi ने भारत में प्रस्तुत किया था। इसके बाद लंबे समय तक इस विषय पर विचार-विमर्श हुआ और अंततः लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के माध्यम से लोकपाल की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ।
लोकपाल का उद्देश्य उच्च पदों पर कार्यरत लोक सेवकों के विरुद्ध प्राप्त शिकायतों की जाँच करना है। यदि किसी अधिकारी या लोक सेवक पर भ्रष्टाचार, पद के दुरुपयोग या अनुचित लाभ लेने का आरोप लगता है, तो लोकपाल उसकी जाँच कर सकता है। आवश्यकता होने पर संबंधित जाँच एजेंसियों से भी जाँच कराई जा सकती है।
लोकायुक्त राज्यों में इसी प्रकार की भूमिका निभाता है। प्रत्येक राज्य अपने कानून के अनुसार लोकायुक्त की स्थापना करता है। राज्य सरकार के मंत्रियों, अधिकारियों तथा अन्य लोक सेवकों के विरुद्ध शिकायतों की जाँच करना इसका मुख्य कार्य है। इससे राज्य प्रशासन में उत्तरदायित्व और पारदर्शिता बढ़ती है।
लोकपाल एवं लोकायुक्त की आवश्यकता इसलिए महसूस की गई क्योंकि केवल विभागीय जाँच या सामान्य न्यायिक प्रक्रिया से भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण कठिन था। एक स्वतंत्र संस्था होने के कारण लोकपाल निष्पक्ष जाँच कर सकता है तथा प्रशासन में जनता का विश्वास बढ़ाता है। यह संस्था ईमानदार और उत्तरदायी प्रशासन की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
हालाँकि लोकपाल एवं लोकायुक्त व्यवस्था की कुछ सीमाएँ भी हैं। शिकायतों की अधिक संख्या, जाँच में विलंब, विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी तथा राज्यों में लोकायुक्त की शक्तियों में भिन्नता जैसी समस्याएँ इसकी प्रभावशीलता को प्रभावित करती हैं। फिर भी यह व्यवस्था प्रशासन में जवाबदेही और भ्रष्टाचार-नियंत्रण का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
अंततः कहा जा सकता है कि लोकपाल एवं लोकायुक्त आधुनिक लोकतांत्रिक प्रशासन की महत्वपूर्ण संस्थाएँ हैं। ये प्रशासन को पारदर्शी, उत्तरदायी और भ्रष्टाचार-मुक्त बनाने में सहायक हैं। यदि इन्हें पर्याप्त स्वतंत्रता, संसाधन और जनसहयोग प्राप्त हो, तो ये सुशासन की स्थापना में अत्यंत प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं।
समग्र निष्कर्ष
उत्तरदायित्व एवं नियंत्रण आधुनिक लोक प्रशासन की आधारशिला हैं। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों प्रशासन को संविधान और कानून के अनुसार कार्य करने के लिए नियंत्रित करती हैं। नागरिकों की सक्रिय भागीदारी, सूचना का अधिकार, ई-गवर्नेंस, सामाजिक अंकेक्षण तथा लोकपाल-लोकायुक्त जैसी संस्थाएँ प्रशासन को अधिक पारदर्शी और उत्तरदायी बनाती हैं। लोकतांत्रिक शासन तभी सफल माना जाता है जब प्रशासन जनता के प्रति जवाबदेह, निष्पक्ष, ईमानदार तथा जनहित के प्रति समर्पित हो। इसलिए उत्तरदायित्व एवं नियंत्रण केवल प्रशासनिक सिद्धांत नहीं, बल्कि सुशासन, लोकतंत्र और जनकल्याण की अनिवार्य शर्त हैं।
प्रशासन पर विधायिका का नियंत्रण
(Legislative Control over Administration)
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (15–20 अंक)लोक प्रशासन में उत्तरदायित्व एवं नियंत्रण की अवधारणा का विस्तार से विवेचन कीजिए।
प्रशासनिक उत्तरदायित्व के विभिन्न प्रकारों का विश्लेषण कीजिए।
प्रशासन पर विधायिका के नियंत्रण के साधनों की विस्तृत व्याख्या कीजिए।
प्रशासन पर कार्यपालिका के नियंत्रण की आवश्यकता एवं महत्व स्पष्ट कीजिए।
न्यायपालिका प्रशासन पर किस प्रकार नियंत्रण स्थापित करती है? स्पष्ट कीजिए।
नागरिक एवं प्रशासन के मध्य संबंधों का विश्लेषण कीजिए।
लोकपाल एवं लोकायुक्त की आवश्यकता, संरचना तथा कार्यों का वर्णन कीजिए।
सुशासन की स्थापना में उत्तरदायित्व एवं नियंत्रण की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
प्रशासनिक नियंत्रण के विभिन्न साधनों का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।
आधुनिक डिजिटल प्रशासन में उत्तरदायित्व एवं पारदर्शिता का महत्व स्पष्ट कीजिए।
मध्यम उत्तरीय प्रश्न (8–10 अंक)
उत्तरदायित्व का अर्थ एवं महत्व लिखिए।
नियंत्रण की आवश्यकता क्यों होती है?
प्रशासनिक उत्तरदायित्व के प्रमुख स्वरूप लिखिए।
विधायिका के वित्तीय नियंत्रण को स्पष्ट कीजिए।
प्रश्नकाल एवं शून्यकाल में अंतर बताइए।
संसदीय समितियों की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
कार्यपालिका के नियंत्रण के प्रमुख साधन लिखिए।
न्यायिक पुनरावलोकन क्या है?
जनहित याचिका (PIL) का महत्व लिखिए।
नागरिक अधिकार पत्र (Citizen Charter) क्या है?
ई-गवर्नेंस का महत्व बताइए।
सामाजिक अंकेक्षण क्या है?
सूचना का अधिकार (RTI) का महत्व स्पष्ट कीजिए।
लोकपाल एवं लोकायुक्त में अंतर बताइए।
लोकपाल अधिनियम, 2013 की मुख्य विशेषताएँ लिखिए।
लघु उत्तरीय प्रश्न (2–5 अंक)
उत्तरदायित्व क्या है?
नियंत्रण से क्या आशय है?
प्रशासनिक उत्तरदायित्व क्या है?
राजनीतिक उत्तरदायित्व क्या है?
नैतिक उत्तरदायित्व क्या है?
प्रश्नकाल क्या है?
शून्यकाल क्या है?
अविश्वास प्रस्ताव क्या है?
निंदा प्रस्ताव क्या है?
विशेषाधिकार प्रस्ताव क्या है?
न्यायिक पुनरावलोकन क्या है?
रिट क्या है?
PIL का पूरा नाम लिखिए।
RTI का पूरा नाम लिखिए।
Citizen Charter क्या है?
Social Audit क्या है?
लोकपाल क्या है?
लोकायुक्त क्या है?
L.M. Singhvi कौन थे?
सुशासन क्या है?
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ) उत्तर सहित
1. लोक प्रशासन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
(A) कर वसूलना
(B) जनता की सेवा करना
(C) चुनाव कराना
(D) न्याय देना
उत्तर – (B)
2. उत्तरदायित्व का अर्थ है—
(A) अधिकार प्राप्त करना
(B) जवाबदेह होना
(C) पद प्राप्त करना
(D) आदेश देना
उत्तर – (B)
3. लोकतंत्र में प्रशासन किसके प्रति अंतिम रूप से उत्तरदायी होता है?
(A) राष्ट्रपति
(B) प्रधानमंत्री
(C) जनता
(D) न्यायपालिका
उत्तर – (C)
4. "Power tends to corrupt" कथन किसका है?
(A) मैक्स वेबर
(B) लॉर्ड एक्टन
(C) वुडरो विल्सन
(D) साइमन
उत्तर – (B)
5. प्रशासन पर राजनीतिक नियंत्रण किसके माध्यम से होता है?
(A) न्यायपालिका
(B) मंत्रिपरिषद
(C) निर्वाचन आयोग
(D) मीडिया
उत्तर – (B)
6. प्रश्नकाल का उद्देश्य क्या है?
(A) कानून बनाना
(B) सरकार से प्रश्न पूछना
(C) चुनाव कराना
(D) न्याय देना
उत्तर – (B)
7. शून्यकाल में क्या होता है?
(A) बजट पारित होता है
(B) बिना पूर्व सूचना के विषय उठाए जाते हैं
(C) चुनाव होते हैं
(D) न्यायिक सुनवाई होती है
उत्तर – (B)
8. लोक लेखा समिति किसकी रिपोर्ट की जाँच करती है?
(A) UPSC
(B) CAG
(C) वित्त आयोग
(D) नीति आयोग
उत्तर – (B)
9. न्यायिक पुनरावलोकन किसका अधिकार है?
(A) संसद
(B) न्यायपालिका
(C) कार्यपालिका
(D) निर्वाचन आयोग
उत्तर – (B)
10. भारतीय संविधान में कितनी प्रकार की रिटें हैं?
(A) 3
(B) 4
(C) 5
(D) 6
उत्तर – (C)
11. PIL का पूरा नाम क्या है?
(A) Public Interest Litigation
(B) Public Information Law
(C) Public Internal Law
(D) Public Indian Law
उत्तर – (A)
12. RTI का संबंध किससे है?
(A) सूचना प्राप्त करने से
(B) कर से
(C) न्याय से
(D) चुनाव से
उत्तर – (A)
13. Citizen Charter का उद्देश्य क्या है?
(A) नागरिकों को सेवाओं की जानकारी देना
(B) चुनाव कराना
(C) कर वसूलना
(D) कानून बनाना
उत्तर – (A)
14. Social Audit का संबंध किससे है?
(A) सामाजिक समीक्षा से
(B) चुनाव से
(C) बैंक से
(D) संसद से
उत्तर – (A)
15. लोकपाल किस स्तर पर कार्य करता है?
(A) ग्राम स्तर
(B) राज्य स्तर
(C) केंद्र स्तर
(D) जिला स्तर
उत्तर – (C)
16. लोकायुक्त कहाँ कार्य करता है?
(A) संसद में
(B) राज्यों में
(C) न्यायालय में
(D) पंचायत में
उत्तर – (B)
17. लोकपाल की अवधारणा भारत में सबसे पहले किसने प्रस्तुत की?
(A) एम.एन. राय
(B) एल. एम. सिंहवी
(C) पॉल एपलबी
(D) मैक्स वेबर
उत्तर – (B)
18. लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम कब पारित हुआ?
(A) 2005
(B) 2010
(C) 2013
(D) 2015
उत्तर – (C)
19. ई-गवर्नेंस का मुख्य उद्देश्य क्या है?
(A) डिजिटल माध्यम से प्रशासनिक सेवाएँ देना
(B) चुनाव कराना
(C) न्याय देना
(D) कर बढ़ाना
उत्तर – (A)
20. सुशासन का आधार क्या माना जाता है?
(A) उत्तरदायित्व एवं नियंत्रण
(B) सेना
(C) राजनीति
(D) कर व्यवस्था
उत्तर – (A)
