Unit – 4
August offer of 1940, Cripps Mission, Cabinet Mission, Mountbatten Plan.
अगस्त प्रस्ताव, 1940; क्रिप्स मिशन; कैबिनेट मिशन; तथा माउंटबेटन योजना।
अध्याय–1 : अगस्त प्रस्ताव, 1940 (August Offer, 1940)
भाग–1 : द्वितीय विश्वयुद्ध, भारतीय राजनीति और अगस्त प्रस्ताव की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल आंदोलनों, संघर्षों और राजनीतिक समझौतों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह ब्रिटिश साम्राज्यवाद और भारतीय राष्ट्रवाद के बीच निरंतर चलने वाले वैचारिक एवं संवैधानिक संघर्ष का भी इतिहास है। बीसवीं शताब्दी के चौथे दशक तक आते-आते यह संघर्ष अपने निर्णायक चरण में पहुँच चुका था। एक ओर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पूर्ण स्वराज्य की मांग को राष्ट्रीय लक्ष्य घोषित कर चुकी थी, तो दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार भारत पर अपना राजनीतिक नियंत्रण बनाए रखने के लिए समय-समय पर संवैधानिक सुधारों की घोषणा कर रही थी। किंतु इन सुधारों का उद्देश्य भारतीयों को वास्तविक सत्ता सौंपना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन की तीव्रता को नियंत्रित करना था। 1940 का अगस्त प्रस्ताव इसी राजनीतिक परिस्थिति की उपज था।
1935 के भारत शासन अधिनियम के लागू होने के बाद भारत में 1937 में प्रांतीय चुनाव कराए गए। इन चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को उल्लेखनीय सफलता प्राप्त हुई और उसने मद्रास, संयुक्त प्रांत, बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रांत, बंबई तथा अन्य कई प्रांतों में अपनी सरकारें बनाई। पहली बार भारतीय नेताओं को प्रशासन चलाने का वास्तविक अनुभव प्राप्त हुआ। इन कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने शिक्षा, कृषि, श्रमिक कल्याण, नागरिक स्वतंत्रता तथा ग्रामीण विकास के क्षेत्र में अनेक सुधारात्मक कदम उठाए। इससे जनता के बीच कांग्रेस की लोकप्रियता और अधिक बढ़ी तथा यह स्पष्ट हो गया कि भारतीय नेता केवल आंदोलन चलाने में ही नहीं, बल्कि शासन संचालन में भी सक्षम हैं।
ब्रिटिश सरकार इस परिवर्तन को गंभीरता से देख रही थी। उसे यह अनुभव होने लगा था कि भारत में राष्ट्रीय आंदोलन अब केवल कुछ नेताओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह जन-आंदोलन का रूप ले चुका है। इसके बावजूद ब्रिटिश सरकार भारत को वास्तविक राजनीतिक अधिकार देने के लिए तैयार नहीं थी। उसकी नीति यह थी कि सीमित सुधारों के माध्यम से भारतीय नेताओं को संतुष्ट रखा जाए, जबकि अंतिम नियंत्रण ब्रिटिश सरकार के हाथों में बना रहे।
इसी बीच अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक ऐसी घटना घटी जिसने भारत के संवैधानिक प्रश्न को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया। 1 सितंबर 1939 को जर्मनी ने पोलैंड पर आक्रमण कर दिया। इसके साथ ही द्वितीय विश्वयुद्ध का आरंभ हुआ। कुछ ही दिनों में ब्रिटेन और फ्रांस ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। ब्रिटिश साम्राज्य का भाग होने के कारण भारत भी इस युद्ध में शामिल माना गया।
भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने भारतीय नेताओं से कोई परामर्श किए बिना यह घोषणा कर दी कि भारत ब्रिटेन के साथ युद्ध में सम्मिलित है। यह निर्णय भारतीय राजनीतिक नेतृत्व के लिए अत्यंत अपमानजनक था। कांग्रेस का मत था कि यदि भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र नहीं है और उसे अपने भविष्य का निर्णय लेने का अधिकार नहीं है, तो ब्रिटिश सरकार को भारत की जनता की ओर से युद्ध में भाग लेने का अधिकार भी नहीं है।
कांग्रेस ने वायसराय से स्पष्ट प्रश्न किया कि यदि भारत ब्रिटेन के लिए युद्ध में सहयोग करे, तो बदले में भारत को क्या प्राप्त होगा? क्या युद्ध समाप्त होने के बाद भारत को स्वतंत्रता दी जाएगी? क्या तत्काल उत्तरदायी राष्ट्रीय सरकार का गठन किया जाएगा? किंतु ब्रिटिश सरकार इन प्रश्नों का कोई स्पष्ट उत्तर देने के लिए तैयार नहीं थी। उसका कहना था कि पहले युद्ध जीतना आवश्यक है, उसके बाद संवैधानिक सुधारों पर विचार किया जाएगा।
ब्रिटिश सरकार के इस रवैये से कांग्रेस अत्यंत निराश हुई। अक्टूबर 1939 से नवंबर 1939 के बीच कांग्रेस के सभी प्रांतीय मंत्रिमंडलों ने क्रमशः त्यागपत्र दे दिया। यह भारतीय राजनीति की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी। कांग्रेस का मानना था कि ऐसी सरकार में बने रहने का कोई औचित्य नहीं है, जहाँ वास्तविक शक्ति ब्रिटिश अधिकारियों के हाथों में हो और भारतीय जनता की इच्छा की उपेक्षा की जाए।
दूसरी ओर मुस्लिम लीग ने इस अवसर का राजनीतिक लाभ उठाया। मोहम्मद अली जिन्ना ने कांग्रेस मंत्रिमंडलों के इस्तीफे का स्वागत करते हुए 22 दिसंबर 1939 को “मुक्ति दिवस” (Day of Deliverance) मनाने का आह्वान किया। जिन्ना का आरोप था कि कांग्रेस की प्रांतीय सरकारों ने मुसलमानों के साथ न्याय नहीं किया। इस घटना के बाद कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक दूरी और अधिक बढ़ गई। ब्रिटिश सरकार ने भी इस मतभेद का लाभ उठाया और अपनी “फूट डालो और शासन करो” (Divide and Rule) की नीति को और अधिक सक्रिय रूप से अपनाया।
उधर यूरोप में युद्ध की स्थिति दिन-प्रतिदिन गंभीर होती जा रही थी। 1940 तक जर्मनी ने अनेक यूरोपीय देशों पर अधिकार कर लिया। ब्रिटेन स्वयं भी गंभीर संकट में था। उसे युद्ध जारी रखने के लिए अपने उपनिवेशों से सैनिकों, आर्थिक संसाधनों और जनसमर्थन की आवश्यकता थी। भारत ब्रिटिश साम्राज्य का सबसे बड़ा उपनिवेश था और यहाँ से बड़ी संख्या में सैनिक तथा आर्थिक सहायता प्राप्त की जा सकती थी। लेकिन बिना भारतीय जनता के सहयोग के यह संभव नहीं था।
ब्रिटिश सरकार अच्छी तरह समझती थी कि यदि कांग्रेस और अन्य राष्ट्रीय शक्तियाँ युद्ध का विरोध करती रहीं, तो भारत से अपेक्षित सहयोग प्राप्त करना कठिन हो जाएगा। इसलिए उसने भारतीय नेताओं को आश्वस्त करने के उद्देश्य से एक नई संवैधानिक घोषणा करने का निर्णय लिया। यह घोषणा भारत की स्वतंत्रता का वचन नहीं थी, बल्कि भारतीय जनमत को शांत करने और युद्धकालीन सहयोग प्राप्त करने का एक राजनीतिक प्रयास थी।
इसी पृष्ठभूमि में 8 अगस्त 1940 को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने एक महत्वपूर्ण घोषणा की, जिसे इतिहास में “अगस्त प्रस्ताव (August Offer)” के नाम से जाना जाता है।
अगस्त प्रस्ताव केवल एक प्रशासनिक घोषणा नहीं था, बल्कि यह ब्रिटिश सरकार की युद्धकालीन रणनीति का महत्वपूर्ण भाग था। इसका उद्देश्य भारतीय नेताओं को यह विश्वास दिलाना था कि युद्ध समाप्त होने के बाद भारत के संवैधानिक विकास पर गंभीरता से विचार किया जाएगा। साथ ही ब्रिटिश सरकार यह भी चाहती थी कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, मुस्लिम लीग तथा अन्य राजनीतिक संगठन अपने मतभेदों को कुछ समय के लिए पीछे छोड़कर ब्रिटेन का युद्ध में सहयोग करें।
यद्यपि इस प्रस्ताव को उस समय ब्रिटिश सरकार ने एक उदार संवैधानिक पहल के रूप में प्रस्तुत किया, परंतु भारतीय नेताओं ने इसे संदेह की दृष्टि से देखा। उनके अनुभव ने उन्हें सिखाया था कि ब्रिटिश सरकार की घोषणाएँ प्रायः वास्तविक सत्ता हस्तांतरण की बजाय राजनीतिक परिस्थितियों को नियंत्रित करने का साधन होती थीं। इसलिए अगस्त प्रस्ताव की घोषणा के साथ ही भारतीय राजनीति में एक नई बहस प्रारंभ हो गई कि क्या यह प्रस्ताव वास्तव में भारत की स्वतंत्रता की दिशा में एक कदम है, अथवा केवल युद्धकालीन आवश्यकता के कारण किया गया एक अस्थायी राजनीतिक आश्वासन।
अध्याय–1 : अगस्त प्रस्ताव, 1940 (August Offer, 1940)
भाग–2 : अगस्त प्रस्ताव की घोषणा, उसके प्रमुख प्रावधान तथा उनका विस्तृत विश्लेषण
8 अगस्त 1940 को वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो द्वारा की गई घोषणा भारतीय संवैधानिक इतिहास में “अगस्त प्रस्ताव” के नाम से प्रसिद्ध हुई। यह घोषणा ऐसे समय में की गई थी जब ब्रिटेन द्वितीय विश्वयुद्ध में गंभीर संकट से गुजर रहा था और उसे भारत के राजनीतिक सहयोग की अत्यंत आवश्यकता थी। ब्रिटिश सरकार को विश्वास था कि यदि भारतीय राजनीतिक दलों, विशेषकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, को कुछ संवैधानिक आश्वासन दिए जाएँ, तो वे युद्ध में ब्रिटेन का सहयोग करेंगे। इसलिए अगस्त प्रस्ताव का वास्तविक उद्देश्य भारतीयों को तत्काल स्वतंत्रता देना नहीं था, बल्कि युद्ध के दौरान उनका समर्थन प्राप्त करना था।
अगस्त प्रस्ताव की घोषणा करते हुए ब्रिटिश सरकार ने पहली बार यह स्वीकार किया कि भारत का भविष्य का संविधान भारतीयों की इच्छा के अनुसार बनाया जाएगा। यद्यपि यह घोषणा पूर्ण रूप से स्पष्ट नहीं थी, फिर भी पहली बार ब्रिटिश सरकार ने सार्वजनिक रूप से इस सिद्धांत को स्वीकार किया कि भारत के संवैधानिक विकास में भारतीयों की भूमिका अनिवार्य होगी। इस कारण यह प्रस्ताव पूर्ववर्ती घोषणाओं की अपेक्षा कुछ भिन्न दिखाई देता था।
प्रस्ताव का पहला महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि युद्ध समाप्त होने के बाद भारत के लिए एक ऐसे संविधान के निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ की जाएगी, जिसमें भारतीयों की प्रमुख भूमिका होगी। इसका आशय यह था कि भविष्य में किसी प्रकार की संवैधानिक संस्था गठित की जाएगी, जो भारत के संविधान के निर्माण में भाग लेगी। यद्यपि इसमें संविधान सभा (Constituent Assembly) शब्द का प्रयोग नहीं किया गया था, फिर भी यह विचार पहली बार औपचारिक रूप से ब्रिटिश नीति का भाग बनता दिखाई दिया। बाद में यही विचार विकसित होकर संविधान सभा के गठन का आधार बना।
अगस्त प्रस्ताव का दूसरा महत्वपूर्ण प्रावधान यह था कि वायसराय की कार्यकारिणी परिषद (Executive Council) का विस्तार किया जाएगा और उसमें अधिक संख्या में भारतीय सदस्यों को सम्मिलित किया जाएगा। ब्रिटिश सरकार का तर्क था कि इससे प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी बढ़ेगी और शासन अधिक प्रतिनिधिक स्वरूप ग्रहण करेगा। परंतु वास्तविक स्थिति यह थी कि कार्यकारिणी परिषद के सदस्य भारतीय अवश्य होते, लेकिन वे जनता के प्रति उत्तरदायी नहीं होते थे। वे वायसराय की सलाह पर कार्य करते थे और अंतिम निर्णय लेने का अधिकार अभी भी वायसराय के पास ही रहता था। इसलिए यह व्यवस्था वास्तविक उत्तरदायी शासन का विकल्प नहीं बन सकती थी।
प्रस्ताव का तीसरा महत्वपूर्ण तत्व यह था कि एक युद्ध सलाहकार परिषद (War Advisory Council) की स्थापना की जाएगी। इस परिषद में विभिन्न राजनीतिक दलों, भारतीय रियासतों तथा अन्य प्रमुख वर्गों के प्रतिनिधियों को सम्मिलित किया जाना था। इसका उद्देश्य युद्ध से संबंधित विषयों पर भारतीय नेताओं की राय प्राप्त करना था। किंतु यह परिषद केवल सलाह देने वाली संस्था थी। इसके पास कोई कार्यकारी या निर्णयात्मक अधिकार नहीं था। इसलिए भारतीय नेताओं ने इसे केवल औपचारिक संस्था माना, जो वास्तविक राजनीतिक अधिकार प्रदान नहीं करती थी।
अगस्त प्रस्ताव का सबसे अधिक चर्चित प्रावधान अल्पसंख्यकों के संबंध में था। ब्रिटिश सरकार ने घोषणा की कि भारत का कोई भी भविष्य का संविधान तब तक लागू नहीं किया जाएगा, जब तक देश के प्रमुख राजनीतिक दलों और विशेष रूप से अल्पसंख्यक समुदायों की सहमति प्राप्त न हो जाए। पहली दृष्टि में यह प्रावधान लोकतांत्रिक और न्यायपूर्ण प्रतीत होता था, क्योंकि इसमें सभी समुदायों के हितों की रक्षा का आश्वासन दिया गया था। किंतु गहराई से देखने पर स्पष्ट होता है कि यही वह प्रावधान था जिसने भविष्य में संवैधानिक प्रगति को अत्यंत जटिल बना दिया।
इस प्रावधान का अर्थ यह था कि यदि कोई एक प्रमुख समुदाय या राजनीतिक दल किसी संवैधानिक योजना से असहमत हो जाए, तो उस योजना को लागू नहीं किया जा सकेगा। इस प्रकार मुस्लिम लीग को अप्रत्यक्ष रूप से एक प्रकार का वीटो (Veto) अधिकार प्राप्त हो गया। परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार के लिए यह कहना सरल हो गया कि जब तक कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों सहमत नहीं होंगे, तब तक सत्ता हस्तांतरण संभव नहीं है। अनेक इतिहासकारों का मत है कि इस नीति ने भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक मतभेदों को और अधिक गहरा किया।
ब्रिटिश सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि युद्ध समाप्त होने तक भारत में तत्काल कोई उत्तरदायी राष्ट्रीय सरकार स्थापित नहीं की जाएगी। इसका अर्थ यह था कि भारत की वास्तविक सत्ता पहले की भाँति वायसराय और ब्रिटिश अधिकारियों के हाथों में ही बनी रहेगी। भारतीय नेताओं को केवल भविष्य के लिए आश्वासन दिया गया, वर्तमान में कोई ठोस राजनीतिक अधिकार नहीं दिए गए। यही कारण था कि कांग्रेस के अनेक नेताओं ने इस प्रस्ताव को “भविष्य के वादों का दस्तावेज़” कहा।
यदि अगस्त प्रस्ताव के सभी प्रावधानों का समग्र अध्ययन किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि इनमें एक ओर भारतीयों को संवैधानिक विकास का आश्वासन दिया गया था, वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार ने अपने राजनीतिक नियंत्रण को पूरी तरह सुरक्षित रखा। संविधान निर्माण की प्रक्रिया को युद्ध समाप्त होने तक टाल दिया गया, उत्तरदायी शासन की मांग स्वीकार नहीं की गई, और अल्पसंख्यकों की सहमति की अनिवार्यता जोड़कर संवैधानिक परिवर्तन की प्रक्रिया को और अधिक कठिन बना दिया गया।
राजनीतिक दृष्टि से अगस्त प्रस्ताव ब्रिटिश सरकार की एक संतुलनकारी रणनीति थी। वह कांग्रेस को यह विश्वास दिलाना चाहती थी कि भविष्य में भारत को संवैधानिक अधिकार मिलेंगे, वहीं दूसरी ओर मुस्लिम लीग को यह आश्वासन देना चाहती थी कि उसकी सहमति के बिना कोई संवैधानिक परिवर्तन नहीं किया जाएगा। इस प्रकार ब्रिटिश सरकार ने दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया, किंतु व्यवहार में यह नीति राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के बजाय राजनीतिक मतभेदों को और अधिक बढ़ाने वाली सिद्ध हुई।
अगस्त प्रस्ताव के प्रावधानों की घोषणा के तुरंत बाद भारतीय राजनीति में व्यापक चर्चा प्रारंभ हो गई। कांग्रेस, मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा तथा अन्य राजनीतिक संगठनों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से इसका मूल्यांकन किया। कुछ लोगों ने इसे ब्रिटिश नीति में एक सीमित परिवर्तन माना, जबकि अधिकांश राष्ट्रवादी नेताओं ने इसे भारतीय स्वतंत्रता की आकांक्षाओं से बहुत कम और अपर्याप्त बताया।
यही कारण था कि अगस्त प्रस्ताव भारतीय राजनीति में अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सका। इसके बाद भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एक नए चरण में प्रवेश करता है, जहाँ कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार के बीच मतभेद और अधिक तीव्र हो जाते हैं तथा अंततः यही परिस्थितियाँ आगे चलकर क्रिप्स मिशन (1942) और भारत छोड़ो आंदोलन (1942) की पृष्ठभूमि तैयार करती हैं।
अध्याय–1 : अगस्त प्रस्ताव, 1940 (August Offer, 1940)
भाग–3 : अगस्त प्रस्ताव पर भारतीय राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया, आलोचनात्मक मूल्यांकन एवं ऐतिहासिक महत्व
अगस्त प्रस्ताव की घोषणा के तुरंत बाद भारतीय राजनीति में व्यापक बहस प्रारंभ हो गई। ब्रिटिश सरकार को विश्वास था कि इस घोषणा के माध्यम से वह भारतीय नेताओं का सहयोग प्राप्त कर लेगी, किंतु वास्तविकता इसके विपरीत सिद्ध हुई। भारत के लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने इस प्रस्ताव का गहन अध्ययन किया और अपने-अपने राजनीतिक दृष्टिकोण के आधार पर इसकी व्याख्या की। परिणामस्वरूप यह प्रस्ताव भारतीय राजनीति में सहमति स्थापित करने के बजाय मतभेदों का नया कारण बन गया।
सबसे पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस प्रस्ताव पर विचार किया। कांग्रेस का मत था कि ब्रिटिश सरकार ने भारतीय जनता की मूल मांग—पूर्ण उत्तरदायी राष्ट्रीय सरकार—को स्वीकार नहीं किया है। कांग्रेस का यह भी कहना था कि यदि ब्रिटेन स्वयं लोकतंत्र और स्वतंत्रता की रक्षा के नाम पर युद्ध लड़ रहा है, तो उसे सबसे पहले भारत में लोकतांत्रिक शासन स्थापित करना चाहिए। भारतीयों से युद्ध में सहयोग मांगना और साथ ही उन्हें राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखना कांग्रेस के अनुसार एक गंभीर विरोधाभास था।
महात्मा गांधी ने अगस्त प्रस्ताव को अत्यंत निराशाजनक बताया। उनका विचार था कि ब्रिटिश सरकार भारतीयों को केवल भविष्य के आश्वासन दे रही है, जबकि वर्तमान में सत्ता अपने हाथों में बनाए रखना चाहती है। गांधीजी का मानना था कि भारत की स्वतंत्रता को युद्ध समाप्त होने तक स्थगित करना अन्यायपूर्ण है। उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्र को स्वतंत्रता भविष्य में दिए जाने वाले वादों के आधार पर नहीं, बल्कि वर्तमान में उसके अधिकारों को स्वीकार करके मिलनी चाहिए।
पंडित जवाहरलाल नेहरू भी इस प्रस्ताव से संतुष्ट नहीं थे। उनका मत था कि ब्रिटिश सरकार अभी भी भारत को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। नेहरू का मानना था कि भारतीय जनता अपने संविधान का निर्माण तभी स्वतंत्र रूप से कर सकती है, जब उसे पहले राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त हो। केवल संविधान बनाने का भविष्य का आश्वासन पर्याप्त नहीं था।
कांग्रेस ने विशेष रूप से उस प्रावधान का विरोध किया जिसमें कहा गया था कि भविष्य का कोई भी संविधान प्रमुख राजनीतिक दलों और अल्पसंख्यकों की सहमति के बिना लागू नहीं किया जाएगा। कांग्रेस के अनुसार यह व्यवस्था राष्ट्रीय प्रगति में बाधा उत्पन्न करेगी, क्योंकि इससे किसी एक राजनीतिक दल को संवैधानिक प्रक्रिया रोकने का अवसर मिल जाएगा। कांग्रेस का यह भी आरोप था कि ब्रिटिश सरकार जानबूझकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मतभेदों का लाभ उठाना चाहती है।
दूसरी ओर मुस्लिम लीग ने अगस्त प्रस्ताव का स्वागत तो नहीं किया, किंतु उसने इसमें अपने राजनीतिक हितों की संभावना अवश्य देखी। मोहम्मद अली जिन्ना ने विशेष रूप से उस प्रावधान का समर्थन किया जिसमें अल्पसंख्यकों की सहमति को अनिवार्य बनाया गया था। जिन्ना का मानना था कि इससे मुस्लिम लीग की राजनीतिक स्थिति मजबूत होगी और भविष्य के संविधान निर्माण में उसकी भूमिका निर्णायक बनेगी। इस प्रकार अगस्त प्रस्ताव ने अप्रत्यक्ष रूप से मुस्लिम लीग की राजनीतिक शक्ति को बढ़ाने का कार्य किया।
भारतीय रियासतों के शासकों ने भी इस प्रस्ताव को अपने हितों के अनुकूल माना। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें आश्वासन दिया था कि भविष्य की किसी भी संघीय व्यवस्था में उनकी सहमति आवश्यक होगी। इससे रियासतों को विश्वास हो गया कि उनकी स्वायत्त स्थिति तत्काल समाप्त नहीं की जाएगी।
हिंदू महासभा तथा अन्य कुछ राजनीतिक संगठनों ने भी इस प्रस्ताव की आलोचना की। उनका मत था कि ब्रिटिश सरकार भारतीयों को वास्तविक अधिकार देने के बजाय केवल राजनीतिक भ्रम उत्पन्न कर रही है। उनका कहना था कि जब तक केंद्र में उत्तरदायी राष्ट्रीय सरकार की स्थापना नहीं होती, तब तक किसी भी संवैधानिक घोषणा का विशेष महत्व नहीं है।
अगस्त प्रस्ताव की आलोचना केवल भारतीय नेताओं तक सीमित नहीं रही। अनेक संवैधानिक विशेषज्ञों और इतिहासकारों ने भी इसकी कमियों की ओर संकेत किया। उनका मत था कि यह प्रस्ताव तत्कालीन राजनीतिक संकट का स्थायी समाधान प्रस्तुत नहीं करता था। इसमें भविष्य के लिए अनेक वादे किए गए थे, लेकिन वर्तमान की किसी भी मूल समस्या का समाधान नहीं किया गया था।
इस प्रस्ताव की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि इसमें भारत को तत्काल उत्तरदायी शासन देने से स्पष्ट रूप से इंकार कर दिया गया। वायसराय की शक्तियों में कोई कमी नहीं की गई और न ही केंद्रीय शासन भारतीय मंत्रियों के प्रति उत्तरदायी बनाया गया। परिणामस्वरूप भारतीय जनता के लिए इस प्रस्ताव का व्यावहारिक महत्व अत्यंत सीमित रह गया।
दूसरी महत्वपूर्ण आलोचना यह थी कि अल्पसंख्यकों की सहमति को अनिवार्य बनाकर ब्रिटिश सरकार ने भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक प्रश्न को और अधिक जटिल बना दिया। कई इतिहासकारों का मत है कि यही नीति आगे चलकर भारत के विभाजन की परिस्थितियों को मजबूत करने वाले कारणों में से एक बनी। ब्रिटिश सरकार ने स्वयं को मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि वास्तविकता में वह विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच मतभेदों को समाप्त करने के बजाय उन्हें बनाए रखने में अधिक रुचि रखती थी।
इसके बावजूद अगस्त प्रस्ताव का ऐतिहासिक महत्व कम नहीं आँका जा सकता। पहली बार ब्रिटिश सरकार ने स्पष्ट रूप से यह स्वीकार किया कि भारत का भविष्य का संविधान भारतीयों की भागीदारी से बनाया जाएगा। यह सिद्धांत आगे चलकर संविधान सभा की स्थापना का आधार बना। यद्यपि प्रस्ताव में संविधान सभा का स्पष्ट उल्लेख नहीं था, फिर भी संवैधानिक विकास की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण वैचारिक परिवर्तन था।
इतिहासकारों का यह भी मत है कि अगस्त प्रस्ताव ने ब्रिटिश सरकार की राजनीतिक विवशता को उजागर कर दिया। अब वह पहले की तरह भारत की उपेक्षा करके शासन नहीं चला सकती थी। उसे भारतीय जनता और राजनीतिक दलों के सहयोग की आवश्यकता महसूस होने लगी थी। इसलिए अगस्त प्रस्ताव को ब्रिटिश नीति में एक मनोवैज्ञानिक परिवर्तन का संकेत भी माना जाता है।
दूसरी ओर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के लिए भी यह प्रस्ताव एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ। कांग्रेस ने यह अनुभव कर लिया कि ब्रिटिश सरकार केवल आश्वासनों के माध्यम से समय व्यतीत करना चाहती है। इसी कारण गांधीजी ने बाद में व्यक्तिगत सत्याग्रह का मार्ग अपनाया और जब 1942 में क्रिप्स मिशन भी असफल हो गया, तब भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान किया गया। इस दृष्टि से अगस्त प्रस्ताव भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अगले चरण की भूमिका तैयार करने वाली घटना सिद्ध हुआ।
इस प्रकार अगस्त प्रस्ताव न तो भारतीयों की आकांक्षाओं को संतुष्ट कर सका और न ही ब्रिटिश सरकार को अपेक्षित राजनीतिक सहयोग प्राप्त हुआ। फिर भी भारतीय संवैधानिक इतिहास में इसका स्थान महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसने भविष्य के संविधान निर्माण, भारतीय राजनीतिक दलों की भूमिका और ब्रिटिश नीति की सीमाओं को स्पष्ट रूप से सामने ला दिया।
अध्याय–1 : अगस्त प्रस्ताव, 1940 (August Offer, 1940)
भाग–4 : अगस्त प्रस्ताव का समग्र मूल्यांकन, इतिहासकारों की दृष्टि तथा निष्कर्ष
अगस्त प्रस्ताव, 1940 का समग्र अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि यह ब्रिटिश सरकार की एक ऐसी राजनीतिक घोषणा थी, जिसमें आश्वासनों की मात्रा अधिक थी और वास्तविक अधिकारों की मात्रा अत्यंत सीमित थी। द्वितीय विश्वयुद्ध की कठिन परिस्थितियों में ब्रिटेन को भारत के सैनिक, आर्थिक और राजनीतिक सहयोग की आवश्यकता थी। इसलिए उसने भारतीय नेताओं को कुछ संवैधानिक वचन देकर उनका समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया। किंतु भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन उस अवस्था में पहुँच चुका था जहाँ केवल भविष्य के वादों से उसे संतुष्ट नहीं किया जा सकता था। भारतीय जनता तत्काल उत्तरदायी शासन और स्वतंत्रता की दिशा में ठोस कदम चाहती थी।
यदि अगस्त प्रस्ताव की तुलना 1917 की मॉन्टेग्यू घोषणा तथा 1919 के भारत शासन अधिनियम से की जाए, तो यह निश्चित रूप से एक कदम आगे दिखाई देता है। पहली बार ब्रिटिश सरकार ने यह स्वीकार किया कि भारत का संविधान भारतीयों की सहभागिता से बनाया जाएगा। यह स्वीकारोक्ति अपने आप में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन थी, क्योंकि इससे पहले ब्रिटिश संसद ही भारत के संवैधानिक ढाँचे का अंतिम निर्धारण करती थी। इस दृष्टि से अगस्त प्रस्ताव ने भारतीय संविधान-निर्माण की अवधारणा को अप्रत्यक्ष रूप से मान्यता प्रदान की।
फिर भी इस प्रस्ताव की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि इसमें वर्तमान की समस्याओं का समाधान नहीं था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का मूल प्रश्न था कि यदि भारत से युद्ध में सहयोग माँगा जा रहा है, तो भारत को तत्काल उत्तरदायी शासन क्यों नहीं दिया जाता? ब्रिटिश सरकार इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं दे सकी। उसने केवल यह कहा कि युद्ध समाप्त होने के बाद संवैधानिक सुधारों पर विचार किया जाएगा। भारतीय नेताओं के लिए यह उत्तर स्वीकार्य नहीं था, क्योंकि उन्हें ब्रिटिश सरकार के पूर्व अनुभवों पर विश्वास नहीं रह गया था।
अगस्त प्रस्ताव का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष अल्पसंख्यकों के अधिकारों से संबंधित था। ब्रिटिश सरकार ने घोषणा की कि किसी भी संवैधानिक व्यवस्था को प्रमुख समुदायों और अल्पसंख्यकों की सहमति के बिना लागू नहीं किया जाएगा। देखने में यह व्यवस्था लोकतांत्रिक प्रतीत होती थी, किंतु व्यावहारिक रूप से इसने संवैधानिक प्रगति को अत्यंत कठिन बना दिया। इससे मुस्लिम लीग की राजनीतिक स्थिति पहले की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ हो गई, क्योंकि अब ब्रिटिश सरकार यह कह सकती थी कि जब तक लीग सहमत नहीं होगी, तब तक कोई भी संवैधानिक परिवर्तन लागू नहीं किया जा सकता। अनेक विद्वानों का मत है कि इस नीति ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच अविश्वास की खाई को और अधिक गहरा किया।
इतिहासकार बी. एल. ग्रोवर का मत है कि अगस्त प्रस्ताव ब्रिटिश सरकार की युद्धकालीन आवश्यकता का परिणाम था। उनके अनुसार इसका उद्देश्य भारत को स्वतंत्रता देना नहीं, बल्कि युद्ध के दौरान भारतीय सहयोग प्राप्त करना था। इसी प्रकार विपिन चंद्र का विचार है कि अगस्त प्रस्ताव में भारतीयों को वास्तविक सत्ता देने की कोई स्पष्ट योजना नहीं थी। यह केवल राजनीतिक असंतोष को कुछ समय के लिए शांत करने का प्रयास था। इतिहासकार आर. सी. अग्रवाल ने भी लिखा है कि इस प्रस्ताव ने भारतीयों की स्वतंत्रता की आकांक्षाओं को संतुष्ट नहीं किया, क्योंकि इसमें तत्काल उत्तरदायी शासन की मांग की उपेक्षा की गई थी।
कुछ विद्वानों ने यह भी माना है कि अगस्त प्रस्ताव ब्रिटिश नीति में एक मनोवैज्ञानिक परिवर्तन का संकेत था। अब ब्रिटिश सरकार पहली बार यह अनुभव कर रही थी कि भारतीयों की इच्छा के विरुद्ध शासन को अधिक समय तक बनाए रखना संभव नहीं है। इसलिए उसने भारतीयों की भागीदारी को सिद्धांततः स्वीकार किया। यद्यपि यह परिवर्तन सीमित था, फिर भी आगे चलकर क्रिप्स मिशन (1942), कैबिनेट मिशन (1946) तथा संविधान सभा के गठन का वैचारिक आधार इसी प्रक्रिया में विकसित हुआ।
राजनीतिक दृष्टि से अगस्त प्रस्ताव कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार के संबंधों में सुधार लाने में असफल रहा। कांग्रेस ने इसे अस्वीकार कर दिया, क्योंकि इसमें स्वतंत्रता की कोई निश्चित समय-सीमा नहीं थी। मुस्लिम लीग ने भी इसे पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया, क्योंकि उसमें पाकिस्तान की मांग का कोई उल्लेख नहीं था। इस प्रकार ब्रिटिश सरकार जिस व्यापक राजनीतिक सहमति की अपेक्षा कर रही थी, वह प्राप्त नहीं हो सकी।
अगस्त प्रस्ताव की असफलता का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि भारतीय राजनीति में अविश्वास और अधिक बढ़ गया। कांग्रेस को विश्वास हो गया कि ब्रिटिश सरकार केवल परिस्थितियों के दबाव में घोषणाएँ करती है और सत्ता हस्तांतरण के प्रति गंभीर नहीं है। दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार को लगा कि केवल सामान्य आश्वासनों से भारतीय नेतृत्व को संतुष्ट नहीं किया जा सकता। यही कारण था कि 1942 में उसने अधिक व्यापक प्रस्तावों के साथ क्रिप्स मिशन को भारत भेजा। यद्यपि क्रिप्स मिशन भी सफल नहीं हुआ, फिर भी अगस्त प्रस्ताव और क्रिप्स मिशन के बीच स्पष्ट वैचारिक संबंध दिखाई देता है।
यदि स्वतंत्र भारत के संविधान की दृष्टि से अगस्त प्रस्ताव का मूल्यांकन किया जाए, तो यह कहा जा सकता है कि इसने प्रत्यक्ष रूप से कोई संवैधानिक व्यवस्था लागू नहीं की, लेकिन इसने संविधान निर्माण की प्रक्रिया में भारतीयों की भूमिका को स्वीकार करने का मार्ग अवश्य प्रशस्त किया। आगे चलकर संविधान सभा की स्थापना, भारतीयों द्वारा संविधान का निर्माण तथा सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया इसी विचार को विकसित करती हुई दिखाई देती है।
अतः यह कहा जा सकता है कि अगस्त प्रस्ताव भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का कोई निर्णायक समाधान नहीं था, बल्कि ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रस्तुत एक सीमित राजनीतिक समझौते का प्रयास था। यह अपने तात्कालिक उद्देश्य में असफल रहा, क्योंकि इससे न तो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का सहयोग प्राप्त हुआ और न ही भारत की संवैधानिक समस्या का समाधान हो सका। फिर भी भारतीय संवैधानिक इतिहास में इसका विशेष महत्व है, क्योंकि इसने ब्रिटिश सरकार को पहली बार यह स्वीकार करने के लिए बाध्य किया कि भारत का भविष्य भारतीयों की सहभागिता के बिना निर्धारित नहीं किया जा सकता।
इस प्रकार अगस्त प्रस्ताव 1940 को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उस संक्रमणकालीन चरण का महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है, जिसने एक ओर ब्रिटिश साम्राज्य की राजनीतिक विवशताओं को उजागर किया और दूसरी ओर भारतीय राष्ट्रवाद को अधिक संगठित, अधिक आत्मविश्वासी तथा पूर्ण स्वतंत्रता के लक्ष्य के प्रति अधिक दृढ़ बनाया। यही कारण है कि भारतीय संवैधानिक विकास के अध्ययन में अगस्त प्रस्ताव को एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जाता है, जिसने क्रिप्स मिशन, भारत छोड़ो आंदोलन और अंततः भारत की स्वतंत्रता की दिशा में आगे की घटनाओं की पृष्ठभूमि तैयार की।
अध्याय–2 : क्रिप्स मिशन (Cripps Mission, 1942)
भाग–1 : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, द्वितीय विश्वयुद्ध और क्रिप्स मिशन की आवश्यकता
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वर्ष 1942 अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह वह समय था जब एक ओर विश्व द्वितीय विश्वयुद्ध की भीषण विभीषिका से गुजर रहा था और दूसरी ओर भारत का राष्ट्रीय आंदोलन निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुका था। अगस्त प्रस्ताव (1940) भारतीय नेताओं की अपेक्षाओं को पूरा करने में असफल सिद्ध हुआ था। कांग्रेस ने उसे इसलिए अस्वीकार कर दिया क्योंकि उसमें तत्काल उत्तरदायी सरकार की स्थापना तथा स्वतंत्रता का स्पष्ट आश्वासन नहीं था। दूसरी ओर मुस्लिम लीग भी उससे पूरी तरह संतुष्ट नहीं थी, क्योंकि उसमें पृथक राष्ट्र की उसकी राजनीतिक आकांक्षाओं का कोई उल्लेख नहीं था। परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार जिस राष्ट्रीय सहयोग की आशा कर रही थी, वह प्राप्त नहीं हो सका।
1940 के बाद अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में तेजी से परिवर्तन होने लगा। जर्मनी ने यूरोप के अनेक देशों पर अधिकार कर लिया था। फ्रांस जैसी शक्तिशाली शक्ति पराजित हो चुकी थी और ब्रिटेन स्वयं अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था। उधर एशिया में जापान अत्यंत तीव्र गति से अपना विस्तार कर रहा था। दिसंबर 1941 में जापान द्वारा पर्ल हार्बर पर आक्रमण के बाद युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदल गया। अमेरिका भी युद्ध में शामिल हो गया और प्रशांत क्षेत्र युद्ध का नया केंद्र बन गया।
जापान ने कुछ ही महीनों में मलाया, सिंगापुर और बर्मा (वर्तमान म्यांमार) पर अधिकार कर लिया। बर्मा पर जापानी नियंत्रण स्थापित होने के बाद भारत की पूर्वी सीमा पर प्रत्यक्ष सैन्य खतरा उत्पन्न हो गया। पहली बार ब्रिटिश सरकार को यह भय सताने लगा कि यदि भारत में राजनीतिक असंतोष बढ़ता रहा, तो जापान इसका लाभ उठा सकता है। इसलिए भारत का सहयोग केवल राजनीतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सैन्य दृष्टि से भी अत्यंत आवश्यक हो गया।
इसी समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ब्रिटेन पर दबाव बढ़ रहा था। संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति फ़्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट का मत था कि यदि ब्रिटेन लोकतंत्र और स्वतंत्रता की रक्षा के नाम पर युद्ध लड़ रहा है, तो उसे अपने उपनिवेशों में भी लोकतांत्रिक अधिकारों का विस्तार करना चाहिए। चीन के नेता च्यांग काई शेक ने भी ब्रिटेन से भारत की राजनीतिक समस्याओं के समाधान की अपेक्षा व्यक्त की। मित्र राष्ट्रों के भीतर भी यह प्रश्न उठने लगा कि यदि भारत को स्वतंत्रता या स्वशासन नहीं दिया जाएगा, तो भारतीय जनता पूरे मन से युद्ध में सहयोग क्यों करेगी।
ब्रिटिश सरकार यह समझ चुकी थी कि केवल सैनिक शक्ति के बल पर भारत में शासन करना अब पहले जितना सरल नहीं रहा। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जनाधार लगातार बढ़ रहा था और जनता राजनीतिक रूप से पहले की अपेक्षा कहीं अधिक जागरूक हो चुकी थी। यदि भारत का सहयोग प्राप्त करना है, तो कोई नया संवैधानिक प्रस्ताव प्रस्तुत करना आवश्यक होगा। इसी परिस्थिति में ब्रिटिश युद्ध मंत्रिमंडल (War Cabinet) ने भारत में एक विशेष मिशन भेजने का निर्णय लिया।
इस मिशन के नेतृत्व के लिए सर स्टैफर्ड क्रिप्स (Sir Stafford Cripps) का चयन किया गया। क्रिप्स ब्रिटेन की लेबर पार्टी के प्रमुख नेताओं में से थे और अपने उदार तथा प्रगतिशील विचारों के कारण प्रसिद्ध थे। वे भारत के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण रखते थे और भारतीय नेताओं के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध भी अपेक्षाकृत अच्छे थे। ब्रिटिश सरकार को विश्वास था कि उनके नेतृत्व में भेजा गया मिशन भारतीय नेताओं का विश्वास जीत सकेगा और युद्ध में उनका सहयोग प्राप्त कर लेगा।
मार्च 1942 में सर स्टैफर्ड क्रिप्स भारत पहुँचे। उनके आगमन से पूरे देश में आशा का वातावरण उत्पन्न हुआ। अनेक लोगों को विश्वास था कि इस बार ब्रिटिश सरकार भारत की राजनीतिक आकांक्षाओं को गंभीरता से स्वीकार करेगी। कांग्रेस, मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा, सिख प्रतिनिधियों, भारतीय रियासतों तथा अन्य राजनीतिक संगठनों ने भी इस मिशन से बड़ी अपेक्षाएँ बाँध ली थीं। समाचार पत्रों और राजनीतिक मंचों पर यह चर्चा होने लगी कि संभवतः अब भारत की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त होने वाला है।
किन्तु क्रिप्स मिशन का उद्देश्य तत्काल स्वतंत्रता प्रदान करना नहीं था। ब्रिटिश सरकार की प्राथमिक चिंता अभी भी युद्ध जीतना था। वह चाहती थी कि भारतीय राजनीतिक दल युद्ध समाप्त होने तक ब्रिटिश शासन का सहयोग करें। इसके बदले में वह भविष्य में भारत को संवैधानिक अधिकार देने का आश्वासन देने के लिए तैयार थी। इस प्रकार क्रिप्स मिशन भी एक सीमा तक अगस्त प्रस्ताव की ही अगली कड़ी था, किंतु इसमें संवैधानिक आश्वासनों का दायरा पहले की अपेक्षा अधिक विस्तृत था।
क्रिप्स भारत आने के बाद महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, मोहम्मद अली जिन्ना तथा अन्य प्रमुख नेताओं से मिले। उन्होंने ब्रिटिश सरकार की ओर से प्रस्तावित संवैधानिक योजना प्रस्तुत की और उससे संबंधित विचार-विमर्श प्रारंभ किया। प्रारंभिक बैठकों में वातावरण आशावादी दिखाई दिया, किंतु जैसे-जैसे प्रस्तावों का गहन अध्ययन किया गया, वैसे-वैसे भारतीय नेताओं को यह अनुभव होने लगा कि इन प्रस्तावों में भी कई गंभीर कमियाँ हैं।
फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि क्रिप्स मिशन भारतीय संवैधानिक इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी। पहली बार ब्रिटिश सरकार ने युद्ध के बाद भारत को डोमिनियन स्टेटस देने तथा भारतीयों द्वारा संविधान निर्माण की स्पष्ट योजना प्रस्तुत की। यद्यपि इन प्रस्तावों को अंततः स्वीकार नहीं किया गया, फिर भी उन्होंने भारत की स्वतंत्रता की प्रक्रिया को एक नए चरण में पहुँचा दिया।
यही कारण है कि इतिहासकार क्रिप्स मिशन को केवल एक असफल संवैधानिक प्रयास नहीं मानते, बल्कि इसे ब्रिटिश साम्राज्य की बदलती हुई राजनीतिक सोच और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के बढ़ते प्रभाव का महत्वपूर्ण प्रमाण भी मानते हैं।
अध्याय–2 : क्रिप्स मिशन (Cripps Mission, 1942)
भाग–2 : क्रिप्स मिशन के प्रस्ताव (Cripps Proposals) एवं उनका विस्तृत विश्लेषण
मार्च 1942 में भारत पहुँचने के बाद सर स्टैफर्ड क्रिप्स ने भारतीय नेताओं के समक्ष ब्रिटिश सरकार की ओर से एक विस्तृत संवैधानिक योजना प्रस्तुत की। ब्रिटिश सरकार का विश्वास था कि यदि भारतीय राजनीतिक दल इन प्रस्तावों को स्वीकार कर लेते हैं, तो वे द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटेन का पूर्ण सहयोग करेंगे। पहली दृष्टि में क्रिप्स मिशन के प्रस्ताव अगस्त प्रस्ताव की तुलना में अधिक उदार और व्यापक दिखाई देते थे, क्योंकि इनमें भारत के संवैधानिक भविष्य के संबंध में अपेक्षाकृत स्पष्ट आश्वासन दिए गए थे। किंतु जब इन प्रस्तावों का गहन अध्ययन किया गया, तो यह स्पष्ट हो गया कि इनके भीतर अनेक ऐसी शर्तें निहित थीं, जो भारतीय राष्ट्रीय आकांक्षाओं के अनुरूप नहीं थीं।
क्रिप्स मिशन का सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव यह था कि द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद भारत को डोमिनियन स्टेटस (Dominion Status) प्रदान किया जाएगा। इसका अर्थ यह था कि भारत को कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसे ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के स्वशासी देशों के समान दर्जा प्राप्त होगा। भारत अपनी आंतरिक शासन व्यवस्था स्वयं संचालित करेगा, किंतु ब्रिटिश सम्राट के साथ उसका संवैधानिक संबंध बना रहेगा। ब्रिटिश सरकार ने इसे एक बड़ी रियायत के रूप में प्रस्तुत किया, परंतु भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए यह पर्याप्त नहीं था। कांग्रेस अब केवल डोमिनियन स्टेटस नहीं, बल्कि पूर्ण स्वतंत्रता की मांग कर रही थी।
दूसरा और अत्यंत महत्वपूर्ण प्रस्ताव संविधान निर्माण से संबंधित था। क्रिप्स मिशन ने घोषणा की कि युद्ध समाप्त होने के बाद भारत में एक संविधान सभा (Constituent Assembly) का गठन किया जाएगा, जो भारत का नया संविधान तैयार करेगी। यह संविधान सभा प्रांतीय विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा चुनी जाएगी, जबकि भारतीय रियासतें अपने प्रतिनिधियों को स्वयं नामित करेंगी। भारतीय संवैधानिक इतिहास में यह पहली बार था जब संविधान सभा के गठन की स्पष्ट योजना ब्रिटिश सरकार की ओर से प्रस्तुत की गई। यद्यपि संविधान सभा का विचार इससे पहले भी भारतीय नेताओं द्वारा रखा जा चुका था, किंतु अब ब्रिटिश सरकार ने भी इसे औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया था।
संविधान सभा के संबंध में एक और महत्वपूर्ण प्रावधान यह था कि उसके द्वारा निर्मित संविधान को ब्रिटिश सरकार स्वीकार करेगी, बशर्ते वह निर्धारित शर्तों के अनुरूप हो। इससे ऐसा प्रतीत होता था कि भारत को अपना संविधान स्वयं बनाने का अवसर दिया जाएगा। किंतु इसके साथ जो शर्तें जोड़ी गई थीं, उन्होंने इस प्रस्ताव की उपयोगिता को सीमित कर दिया।
क्रिप्स मिशन का सबसे विवादास्पद प्रस्ताव यह था कि यदि कोई प्रांत भविष्य में बनने वाले भारतीय संघ में शामिल नहीं होना चाहता, तो उसे संघ से बाहर रहने का अधिकार होगा। दूसरे शब्दों में, किसी भी प्रांत को यह स्वतंत्रता दी गई कि वह संविधान सभा द्वारा निर्मित संविधान को स्वीकार न करे और अपने लिए अलग संवैधानिक व्यवस्था का विकल्प चुन सके। यह प्रावधान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए अत्यंत चिंताजनक था। कांग्रेस का मत था कि इससे भारत की राष्ट्रीय एकता कमजोर होगी और भविष्य में देश के विभाजन का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। बाद के इतिहास को देखें तो यही प्रावधान अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान की मांग को वैधानिक आधार देने वाला सिद्ध हुआ।
ब्रिटिश सरकार ने भारतीय रियासतों के संबंध में भी विशेष व्यवस्था की। प्रस्तावों के अनुसार रियासतों को यह अधिकार दिया गया कि वे अपनी इच्छा से भारतीय संघ में सम्मिलित हों। यदि वे चाहें तो संघ का भाग बनें और यदि न चाहें तो अलग रह सकती हैं। इस प्रकार रियासतों की स्वीकृति को अनिवार्य बना दिया गया। कांग्रेस का मत था कि इससे अखिल भारतीय एकता की स्थापना कठिन हो जाएगी, क्योंकि प्रत्येक रियासत अपने राजनीतिक हितों के अनुसार निर्णय ले सकती थी।
क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों में एक अन्य महत्वपूर्ण बिंदु यह था कि युद्ध समाप्त होने तक भारत की रक्षा (Defence) का पूरा नियंत्रण ब्रिटिश सरकार के हाथों में रहेगा। इसका तात्पर्य यह था कि भारतीय नेताओं को तत्काल कोई वास्तविक सत्ता नहीं दी जाएगी। ब्रिटिश सरकार का तर्क था कि युद्ध के समय रक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय को अपने नियंत्रण में रखना आवश्यक है। किंतु कांग्रेस का विचार था कि यदि भारत से युद्ध में पूर्ण सहयोग की अपेक्षा की जा रही है, तो भारतीयों को रक्षा विभाग पर भी अधिकार मिलना चाहिए।
इसके अतिरिक्त प्रस्तावों में यह भी कहा गया कि युद्ध समाप्त होने के बाद बनने वाली नई सरकार और ब्रिटिश सरकार के बीच एक संधि (Treaty) की जाएगी। इस संधि में दोनों देशों के पारस्परिक संबंधों, रक्षा, व्यापार तथा अन्य विषयों का निर्धारण किया जाएगा। ब्रिटिश सरकार इसे भविष्य के सहयोग का आधार मानती थी, किंतु भारतीय नेताओं को यह आशंका थी कि इस प्रकार की संधि के माध्यम से ब्रिटेन भविष्य में भी भारत के आंतरिक मामलों पर प्रभाव बनाए रखने का प्रयास कर सकता है।
यदि इन सभी प्रस्तावों का समग्र विश्लेषण किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि क्रिप्स मिशन ने पहली बार संविधान सभा, डोमिनियन स्टेटस और भारतीयों द्वारा संविधान निर्माण जैसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों को स्वीकार किया। यही कारण है कि कुछ इतिहासकार इसे ब्रिटिश नीति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन मानते हैं। किंतु दूसरी ओर तत्काल सत्ता हस्तांतरण से इंकार, रक्षा विभाग पर ब्रिटिश नियंत्रण तथा प्रांतों को संघ से अलग होने का अधिकार जैसे प्रावधानों ने इन प्रस्तावों को अत्यंत विवादास्पद बना दिया।
महात्मा गांधी ने इन प्रस्तावों का अध्ययन करने के बाद प्रसिद्ध टिप्पणी की कि “यह एक ऐसे बैंक का भविष्य दिनांक वाला चेक है, जो स्वयं दिवालिया होने वाला है।” इस कथन का आशय यह था कि ब्रिटिश सरकार भविष्य के ऐसे वादे कर रही है, जिनके पूरा होने की कोई निश्चित गारंटी नहीं है। गांधीजी का मानना था कि भारत को तत्काल राजनीतिक अधिकार मिलने चाहिए, न कि युद्ध समाप्त होने के बाद अनिश्चित भविष्य में।
जवाहरलाल नेहरू ने भी प्रस्तावों की आलोचना करते हुए कहा कि संविधान सभा की अवधारणा स्वागत योग्य है, किंतु भारत की एकता को कमजोर करने वाले प्रावधान स्वीकार नहीं किए जा सकते। वहीं मोहम्मद अली जिन्ना ने भी इन प्रस्तावों को पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया, क्योंकि उनमें पाकिस्तान की स्पष्ट स्वीकृति नहीं थी। इस प्रकार कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों अलग-अलग कारणों से इन प्रस्तावों से संतुष्ट नहीं हुईं।
इसी कारण धीरे-धीरे यह स्पष्ट होने लगा कि क्रिप्स मिशन का उद्देश्य भारतीय राजनीतिक दलों के बीच सहमति स्थापित करना था, किंतु उसके प्रस्ताव इतने विरोधाभासी थे कि वे किसी भी प्रमुख दल को पूर्णतः संतुष्ट नहीं कर सके। परिणामस्वरूप मिशन की सफलता की संभावना लगातार कम होती गई और भारतीय राजनीति एक बार फिर गहरे संवैधानिक संकट की ओर बढ़ने लगी।
अध्याय–2 : क्रिप्स मिशन (Cripps Mission, 1942)
भाग–3 : क्रिप्स मिशन की असफलता, भारतीय राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएँ तथा ऐतिहासिक मूल्यांकन
क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों की घोषणा के बाद पूरे देश में आशा और उत्सुकता का वातावरण था। भारतीय जनता को विश्वास था कि संभवतः इस बार ब्रिटिश सरकार भारत की स्वतंत्रता की दिशा में कोई ठोस कदम उठाएगी। किंतु जैसे-जैसे राजनीतिक दलों और राष्ट्रीय नेताओं ने प्रस्तावों का गहन अध्ययन किया, यह स्पष्ट होता गया कि इन प्रस्तावों में अनेक गंभीर कमियाँ हैं। परिणामस्वरूप कुछ ही दिनों में यह आशा निराशा में बदल गई और अंततः अप्रैल 1942 में क्रिप्स मिशन बिना किसी समझौते के इंग्लैंड लौट गया। भारतीय संवैधानिक इतिहास में इसे एक महत्वपूर्ण किंतु असफल संवैधानिक प्रयास माना जाता है।
क्रिप्स मिशन की असफलता का सबसे प्रमुख कारण यह था कि ब्रिटिश सरकार भारत को तत्काल उत्तरदायी शासन देने के लिए तैयार नहीं थी। कांग्रेस का स्पष्ट मत था कि यदि भारत से युद्ध में पूर्ण सहयोग की अपेक्षा की जा रही है, तो भारतीयों को केंद्र में वास्तविक सत्ता भी मिलनी चाहिए। विशेष रूप से रक्षा विभाग (Defence) भारतीय मंत्रियों के अधीन होना चाहिए, क्योंकि युद्ध के समय यही सबसे महत्वपूर्ण विभाग था। किंतु ब्रिटिश सरकार ने रक्षा का नियंत्रण अपने हाथों में बनाए रखने का निर्णय लिया। इससे कांग्रेस को यह विश्वास हो गया कि ब्रिटेन अभी भी भारत को वास्तविक राजनीतिक अधिकार देने के पक्ष में नहीं है।
महात्मा गांधी ने क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों की तीखी आलोचना की। उनका प्रसिद्ध कथन था कि यह “डूबते हुए बैंक का भविष्य दिनांक वाला चेक” (A post-dated cheque on a failing bank) है। गांधीजी का आशय यह था कि ब्रिटिश सरकार भविष्य के ऐसे वादे कर रही है, जिनके पूरे होने की कोई निश्चितता नहीं है। उनका विश्वास था कि यदि ब्रिटेन युद्ध हार गया, तो इन वादों का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा, और यदि वह जीत भी गया, तब भी यह आवश्यक नहीं कि वह अपने वचनों का पालन करे। इसलिए गांधीजी ने इन प्रस्तावों को अविश्वसनीय और अपर्याप्त माना।
पंडित जवाहरलाल नेहरू का दृष्टिकोण भी लगभग इसी प्रकार का था। वे संविधान सभा के विचार से सहमत थे, क्योंकि यह लंबे समय से कांग्रेस की मांग रही थी। लेकिन उन्होंने प्रांतों को संघ से अलग होने का अधिकार दिए जाने का विरोध किया। उनका मानना था कि इससे भारत की राष्ट्रीय एकता पर गंभीर आघात पहुँचेगा और भविष्य में देश के विभाजन की संभावना बढ़ जाएगी। नेहरू का विचार था कि भारत एक अखंड राष्ट्र है और उसकी राजनीतिक एकता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, जो उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष थे, ने भी प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कहा कि इन प्रस्तावों में स्वतंत्रता की वास्तविक भावना का अभाव है और ब्रिटिश सरकार भारतीय जनता पर विश्वास करने के लिए तैयार नहीं है। उनके अनुसार संविधान सभा का विचार स्वागत योग्य था, किंतु उसकी संरचना और उससे जुड़ी शर्तें लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं थीं।
दूसरी ओर मुस्लिम लीग ने भी क्रिप्स मिशन को स्वीकार नहीं किया। पहली दृष्टि में ऐसा लग सकता था कि प्रांतों को संघ से अलग होने का अधिकार दिए जाने से लीग संतुष्ट होगी, क्योंकि इससे पाकिस्तान की मांग को अप्रत्यक्ष आधार मिलता था। किंतु मोहम्मद अली जिन्ना का मत था कि ब्रिटिश सरकार को पाकिस्तान की मांग को स्पष्ट रूप से स्वीकार करना चाहिए था। चूँकि प्रस्तावों में पृथक पाकिस्तान की कोई निश्चित व्यवस्था नहीं थी, इसलिए मुस्लिम लीग ने भी इन्हें अस्वीकार कर दिया।
भारतीय रियासतों का दृष्टिकोण अपेक्षाकृत भिन्न था। उन्हें यह व्यवस्था अनुकूल लगी कि वे अपनी इच्छा से भारतीय संघ में शामिल हो सकती हैं। फिर भी रियासतों ने भी मिशन के पक्ष में कोई निर्णायक भूमिका नहीं निभाई। वे ब्रिटिश सरकार और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के बीच चल रहे संघर्ष को देखते हुए प्रतीक्षा की नीति अपनाए रहीं।
क्रिप्स मिशन की असफलता का एक महत्वपूर्ण कारण स्वयं ब्रिटिश सरकार की आंतरिक नीति भी थी। सर स्टैफर्ड क्रिप्स व्यक्तिगत रूप से भारतीयों को अधिक अधिकार देने के पक्षधर माने जाते थे, किंतु ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल और उनके मंत्रिमंडल के अनेक सदस्य भारत को व्यापक राजनीतिक अधिकार देने के विरोधी थे। इसलिए क्रिप्स के पास वार्ता में लचीलापन दिखाने की पर्याप्त स्वतंत्रता नहीं थी। वे भारतीय नेताओं की अनेक मांगों को स्वीकार करना चाहते थे, लेकिन उन्हें लंदन से इसकी अनुमति नहीं मिली। इस कारण वार्ता आगे नहीं बढ़ सकी।
इतिहासकारों का मत है कि क्रिप्स मिशन की विफलता लगभग निश्चित थी, क्योंकि ब्रिटिश सरकार और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उद्देश्य एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न थे। ब्रिटेन का उद्देश्य युद्ध के दौरान भारत का सहयोग प्राप्त करना था, जबकि कांग्रेस का उद्देश्य भारत की तत्काल स्वतंत्रता या कम-से-कम पूर्ण उत्तरदायी सरकार की स्थापना था। जब दोनों पक्षों के मूल लक्ष्य ही अलग थे, तब किसी स्थायी समझौते की संभावना अत्यंत कम थी।
इतिहासकार विपिन चंद्र का मत है कि क्रिप्स मिशन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि ब्रिटिश सरकार ने पहली बार संविधान सभा के सिद्धांत को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया। किंतु इसकी सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि उसने भारतीय एकता को कमजोर करने वाले प्रावधानों को भी साथ जोड़ दिया। बी. एल. ग्रोवर के अनुसार क्रिप्स मिशन एक ऐसा अवसर था, जिसे ब्रिटिश सरकार ने अपनी राजनीतिक हठधर्मिता के कारण खो दिया। वहीं आर. सी. अग्रवाल लिखते हैं कि यदि ब्रिटिश सरकार तत्काल उत्तरदायी सरकार की मांग स्वीकार कर लेती, तो संभवतः भारत छोड़ो आंदोलन जैसी परिस्थिति उत्पन्न नहीं होती।
क्रिप्स मिशन की असफलता का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर अत्यंत गहरा प्रभाव पड़ा। कांग्रेस के नेताओं को यह विश्वास हो गया कि ब्रिटिश सरकार स्वेच्छा से भारत को स्वतंत्रता देने के लिए तैयार नहीं है। अब उन्हें लगा कि केवल संवैधानिक वार्ताओं के माध्यम से स्वतंत्रता प्राप्त करना संभव नहीं होगा। इसी सोच ने महात्मा गांधी को एक नए और व्यापक जनआंदोलन की ओर प्रेरित किया।
जुलाई 1942 में कांग्रेस कार्यसमिति ने यह निर्णय लिया कि यदि ब्रिटिश सरकार भारत को तत्काल स्वतंत्रता नहीं देती, तो एक व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन प्रारंभ किया जाएगा। अंततः अगस्त 1942 में बंबई (अब मुंबई) में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में “भारत छोड़ो आंदोलन” (Quit India Movement) का प्रस्ताव पारित किया गया। गांधीजी ने इस अवसर पर देशवासियों को “करो या मरो” (Do or Die) का ऐतिहासिक मंत्र दिया। इस प्रकार क्रिप्स मिशन की असफलता सीधे-सीधे भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि बन गई।
इस दृष्टि से क्रिप्स मिशन केवल एक असफल वार्ता नहीं था, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था। इसने यह स्पष्ट कर दिया कि ब्रिटिश सरकार और भारतीय राष्ट्रवाद के बीच समझौते की संभावनाएँ लगभग समाप्त हो चुकी हैं। अब स्वतंत्रता का मार्ग केवल जनसंघर्ष, राजनीतिक दृढ़ता और राष्ट्रीय एकता के माध्यम से ही प्रशस्त हो सकता था।
अध्याय–2 : क्रिप्स मिशन (Cripps Mission, 1942)
भाग–4 : क्रिप्स मिशन का समग्र मूल्यांकन, ऐतिहासिक महत्व, दीर्घकालीन प्रभाव एवं निष्कर्ष
क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद भारतीय राजनीति में जो परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं, उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि ब्रिटिश सरकार और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के बीच विश्वास का संकट अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका था। पिछले लगभग तीन दशकों में ब्रिटिश सरकार ने अनेक संवैधानिक सुधारों और घोषणाओं के माध्यम से भारतीयों को संतुष्ट करने का प्रयास किया था। 1909 का भारतीय परिषद अधिनियम, 1919 का भारत शासन अधिनियम, 1935 का भारत शासन अधिनियम, अगस्त प्रस्ताव (1940) और अंततः क्रिप्स मिशन (1942)—इन सभी प्रयासों का मूल उद्देश्य भारत में राजनीतिक असंतोष को नियंत्रित करना था। किंतु प्रत्येक प्रयास के साथ भारतीय जनता की राजनीतिक चेतना और अधिक प्रखर होती गई तथा स्वतंत्रता की माँग और अधिक व्यापक रूप धारण करती गई।
क्रिप्स मिशन का सबसे बड़ा सकारात्मक पक्ष यह था कि पहली बार ब्रिटिश सरकार ने स्पष्ट रूप से यह स्वीकार किया कि भारत का संविधान भारतीयों द्वारा निर्मित होगा। यद्यपि संविधान सभा की माँग भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अन्य राष्ट्रवादी नेताओं द्वारा पहले ही उठाई जा चुकी थी, फिर भी ब्रिटिश सरकार द्वारा इस सिद्धांत को औपचारिक रूप से स्वीकार किया जाना एक महत्वपूर्ण संवैधानिक परिवर्तन था। आगे चलकर 1946 में गठित संविधान सभा के पीछे इसी विचार की वैचारिक पृष्ठभूमि दिखाई देती है।
इसी प्रकार, डोमिनियन स्टेटस का प्रस्ताव भी ब्रिटिश नीति में परिवर्तन का संकेत था। यद्यपि कांग्रेस इस प्रस्ताव से संतुष्ट नहीं थी, क्योंकि वह पूर्ण स्वतंत्रता चाहती थी, फिर भी यह स्पष्ट हो गया कि ब्रिटिश सरकार भारत को हमेशा के लिए उपनिवेश बनाए रखने की स्थिति में नहीं रही। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ, विश्वयुद्ध का दबाव और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की शक्ति—इन तीनों ने ब्रिटेन को अपनी औपनिवेशिक नीति पर पुनर्विचार करने के लिए विवश कर दिया।
इसके बावजूद क्रिप्स मिशन की कमियाँ उसकी उपलब्धियों से कहीं अधिक गंभीर थीं। सबसे बड़ी कमी यह थी कि उसने तत्काल सत्ता हस्तांतरण का कोई प्रावधान नहीं किया। भारतीय नेताओं से युद्ध में सहयोग माँगा गया, लेकिन उन्हें वास्तविक शासन में भागीदारी नहीं दी गई। इससे भारतीय जनता में यह धारणा और अधिक मजबूत हुई कि ब्रिटिश सरकार केवल अपने राजनीतिक हितों की रक्षा कर रही है।
दूसरी गंभीर कमी प्रांतों को भारतीय संघ से अलग रहने का अधिकार देना था। यह प्रावधान देखने में लोकतांत्रिक प्रतीत होता था, क्योंकि प्रत्येक प्रांत को अपनी इच्छा से निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी गई थी। किंतु व्यवहार में इसने भारत की राष्ट्रीय एकता को चुनौती दी। अनेक इतिहासकारों का मत है कि इसी प्रावधान ने भविष्य में भारत के विभाजन की संवैधानिक संभावना को बल प्रदान किया। कांग्रेस ने इसे भारत की अखंडता के विरुद्ध माना, जबकि मुस्लिम लीग ने इसे पाकिस्तान की माँग के समर्थन में एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा।
क्रिप्स मिशन की एक अन्य कमजोरी भारतीय रियासतों से संबंधित थी। संविधान सभा में उनके प्रतिनिधियों का चुनाव जनता द्वारा नहीं, बल्कि रियासतों के शासकों द्वारा किया जाना था। इससे संविधान सभा की लोकतांत्रिक प्रकृति पर प्रश्नचिह्न लग गया। कांग्रेस का मत था कि संविधान सभा पूर्णतः निर्वाचित और जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था होनी चाहिए।
इतिहासकार विपिन चंद्र के अनुसार, क्रिप्स मिशन की असफलता का मूल कारण यह था कि ब्रिटिश सरकार भारत को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्वीकार करने के लिए अभी भी मानसिक रूप से तैयार नहीं थी। वह युद्धकालीन सहयोग तो चाहती थी, किंतु सत्ता का वास्तविक हस्तांतरण नहीं करना चाहती थी। इसलिए उसके प्रस्तावों में आश्वासन अधिक और अधिकार कम थे।
इतिहासकार बी. एल. ग्रोवर लिखते हैं कि क्रिप्स मिशन ब्रिटिश साम्राज्यवाद और भारतीय राष्ट्रवाद के बीच अंतिम बड़े संवैधानिक समझौते का प्रयास था। यदि यह मिशन सफल हो जाता, तो संभव है कि भारत की स्वतंत्रता का मार्ग कुछ भिन्न होता। किंतु ब्रिटिश सरकार की अनिच्छा और भारतीय नेताओं की उचित शंकाओं के कारण यह अवसर व्यर्थ चला गया।
आर. सी. अग्रवाल का मत है कि क्रिप्स मिशन ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत की स्वतंत्रता अब केवल संवैधानिक घोषणाओं से प्राप्त नहीं होगी। इसके लिए जनशक्ति, राजनीतिक संघर्ष और राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता होगी। यही कारण है कि क्रिप्स मिशन की विफलता के कुछ ही महीनों बाद भारत छोड़ो आंदोलन प्रारंभ हुआ, जिसने स्वतंत्रता संग्राम को एक नया और निर्णायक स्वरूप प्रदान किया।
क्रिप्स मिशन का एक महत्वपूर्ण प्रभाव यह भी था कि इसने भारतीय राजनीति में संविधान सभा की अवधारणा को और अधिक मजबूत कर दिया। 1946 में जब कैबिनेट मिशन भारत आया और संविधान सभा के गठन की योजना प्रस्तुत की, तब उसका वैचारिक आधार काफी हद तक क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों से प्रभावित था। इस प्रकार, यद्यपि क्रिप्स मिशन अपने तात्कालिक उद्देश्य में असफल रहा, फिर भी उसने स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण वैचारिक आधार तैयार किया।
राजनीतिक दृष्टि से क्रिप्स मिशन ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच बढ़ते मतभेद भारत की सबसे बड़ी संवैधानिक समस्या बन चुके हैं। ब्रिटिश सरकार इन मतभेदों का समाधान करने के बजाय उन्हें संतुलित करने का प्रयास कर रही थी। परिणामस्वरूप कोई भी संवैधानिक योजना सभी पक्षों को स्वीकार्य नहीं हो सकी। आगे चलकर यही मतभेद कैबिनेट मिशन की योजना और अंततः भारत के विभाजन तक पहुँच गए।
यदि समग्र रूप से मूल्यांकन किया जाए, तो क्रिप्स मिशन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐसा अध्याय है, जिसमें आशा और निराशा दोनों साथ-साथ दिखाई देती हैं। एक ओर पहली बार संविधान सभा, भारतीय संविधान निर्माण और डोमिनियन स्टेटस जैसे सिद्धांतों को ब्रिटिश सरकार ने स्वीकार किया, वहीं दूसरी ओर तत्काल स्वतंत्रता से इंकार, भारत की एकता को कमजोर करने वाले प्रावधान और सत्ता हस्तांतरण में अनिच्छा ने इस मिशन को असफल बना दिया।
अतः यह कहा जा सकता है कि क्रिप्स मिशन 1942 भारतीय संवैधानिक इतिहास का एक संक्रमणकालीन चरण था। इसने ब्रिटिश साम्राज्य की सीमाओं, भारतीय राष्ट्रवाद की शक्ति और स्वतंत्रता की अनिवार्यता—तीनों को एक साथ उजागर किया। इसकी असफलता ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को और अधिक उग्र तथा संगठित बनाया और अंततः भारत छोड़ो आंदोलन का मार्ग प्रशस्त किया। साथ ही, संविधान सभा की अवधारणा को संस्थागत रूप देने में भी इस मिशन का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इस प्रकार क्रिप्स मिशन अपने तात्कालिक उद्देश्य में भले ही विफल रहा हो, किंतु भारतीय स्वतंत्रता और संविधान निर्माण की दीर्घकालीन प्रक्रिया में उसका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक है।
अध्याय–3 : कैबिनेट मिशन (Cabinet Mission, 1946)
भाग–1 : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की परिस्थितियाँ तथा कैबिनेट मिशन की आवश्यकता
क्रिप्स मिशन की असफलता और उसके तुरंत बाद प्रारम्भ हुए भारत छोड़ो आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नए और निर्णायक चरण में पहुँचा दिया। यद्यपि ब्रिटिश सरकार ने कठोर दमन की नीति अपनाकर आंदोलन को दबाने का प्रयास किया, फिर भी वह भारतीय जनता की स्वतंत्रता की आकांक्षा को समाप्त नहीं कर सकी। 1942 से 1945 के बीच भारतीय राजनीति में अनेक ऐसे परिवर्तन हुए जिन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि अब ब्रिटिश शासन का भारत में अधिक समय तक बने रहना संभव नहीं है। यही परिस्थितियाँ आगे चलकर 1946 में कैबिनेट मिशन के आगमन का आधार बनीं।
1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के साथ विश्व की राजनीतिक परिस्थितियों में व्यापक परिवर्तन आया। मित्र राष्ट्रों की विजय हुई, किंतु ब्रिटेन इस युद्ध से आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य दृष्टि से अत्यंत कमजोर हो चुका था। युद्ध के दौरान ब्रिटेन पर भारी आर्थिक बोझ पड़ा था। उसकी औद्योगिक उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई, विदेशी ऋण बढ़ गए और विशाल साम्राज्य का प्रशासन चलाना कठिन होता जा रहा था। ऐसी स्थिति में भारत जैसे विशाल उपनिवेश पर प्रत्यक्ष शासन बनाए रखना ब्रिटिश सरकार के लिए दिन-प्रतिदिन अधिक कठिन होता गया।
युद्ध समाप्त होने के बाद ब्रिटेन में आम चुनाव हुए। इन चुनावों में लेबर पार्टी को भारी सफलता मिली और क्लेमेंट एटली के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हुआ। लेबर पार्टी का दृष्टिकोण कंज़र्वेटिव पार्टी की तुलना में अधिक उदार था। नई सरकार का मत था कि भारत की राजनीतिक समस्या का शांतिपूर्ण और संवैधानिक समाधान खोजा जाना चाहिए। यद्यपि ब्रिटिश सरकार भारत को तत्काल पूर्ण स्वतंत्रता देने के पक्ष में नहीं थी, फिर भी वह यह समझ चुकी थी कि भारतीय नेताओं के साथ समझौते के बिना शासन चलाना अब संभव नहीं है।
इसी समय भारत के भीतर भी राजनीतिक परिस्थितियाँ तेजी से बदल रही थीं। भारत छोड़ो आंदोलन को दबा दिए जाने के बावजूद कांग्रेस की लोकप्रियता कम नहीं हुई थी। महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद तथा अन्य प्रमुख नेता पुनः सक्रिय हो चुके थे। जनता का विश्वास था कि अब स्वतंत्रता अधिक दूर नहीं है। दूसरी ओर मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग भी अत्यंत प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति के रूप में उभर चुकी थी। 1940 के लाहौर प्रस्ताव के बाद लीग ने पाकिस्तान की माँग को और अधिक संगठित रूप से प्रस्तुत करना प्रारम्भ कर दिया था।
1945–46 के चुनावों ने भारतीय राजनीति का नया स्वरूप स्पष्ट कर दिया। केंद्रीय विधानमंडल और प्रांतीय विधानसभाओं के चुनावों में कांग्रेस को सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में भारी सफलता मिली, जबकि मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम लीग ने लगभग पूर्ण विजय प्राप्त की। इससे यह सिद्ध हो गया कि कांग्रेस अधिकांश भारतीयों का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि मुस्लिम लीग स्वयं को मुसलमानों की प्रमुख राजनीतिक प्रतिनिधि के रूप में स्थापित करने में सफल हो गई है। इस चुनावी परिणाम ने भारतीय राजनीति को दो प्रमुख ध्रुवों में विभाजित कर दिया।
इसी अवधि में आज़ाद हिंद फ़ौज (INA) के सैनिकों पर चलाए गए मुकदमों ने भी राष्ट्रीय भावना को प्रबल बनाया। नेताजी सुभाषचंद्र बोस की अनुपस्थिति के बावजूद भारतीय जनता में उनके प्रति सम्मान और ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष निरंतर बढ़ता गया। इसके अतिरिक्त 1946 में रॉयल इंडियन नेवी (Royal Indian Navy) विद्रोह ने ब्रिटिश सरकार को यह संकेत दे दिया कि अब भारतीय सैनिकों में भी औपनिवेशिक शासन के प्रति असंतोष बढ़ रहा है। नौसेना, वायुसेना और सेना के कुछ वर्गों में असंतोष का वातावरण ब्रिटिश शासन के लिए अत्यंत चिंताजनक था।
इन परिस्थितियों में ब्रिटिश सरकार ने यह निष्कर्ष निकाला कि भारत के संवैधानिक प्रश्न का शीघ्र समाधान आवश्यक है। यदि भारतीय नेताओं के साथ समझौता नहीं किया गया, तो देश में व्यापक राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है। इसी उद्देश्य से ब्रिटिश मंत्रिमंडल ने भारत भेजने के लिए एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल का गठन किया, जिसे कैबिनेट मिशन कहा गया।
इस मिशन में ब्रिटिश मंत्रिमंडल के तीन वरिष्ठ सदस्य सम्मिलित थे—लॉर्ड पेथिक-लॉरेंस, जो भारत सचिव थे; सर स्टैफर्ड क्रिप्स, जिन्होंने 1942 में भी भारत का दौरा किया था; तथा ए. वी. अलेक्ज़ेंडर, जो ब्रिटिश नौसेना से संबंधित मंत्री थे। चूँकि यह प्रतिनिधिमंडल सीधे ब्रिटिश मंत्रिमंडल की ओर से भेजा गया था, इसलिए इसे कैबिनेट मिशन कहा गया।
मार्च 1946 में कैबिनेट मिशन भारत पहुँचा। इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय नेताओं के साथ वार्ता करके ऐसी संवैधानिक योजना तैयार करना था, जिसे कांग्रेस, मुस्लिम लीग, भारतीय रियासतें तथा अन्य राजनीतिक दल स्वीकार कर सकें। मिशन के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि एक ओर कांग्रेस अखंड और एकीकृत भारत की पक्षधर थी, जबकि दूसरी ओर मुस्लिम लीग पृथक पाकिस्तान की माँग पर दृढ़ थी। इन दोनों विरोधी दृष्टिकोणों के बीच संतुलन स्थापित करना अत्यंत कठिन कार्य था।
कैबिनेट मिशन ने भारत पहुँचने के बाद महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद, मोहम्मद अली जिन्ना, डॉ. भीमराव अंबेडकर, सिख नेताओं, भारतीय रियासतों के प्रतिनिधियों तथा अनेक अन्य राजनीतिक व्यक्तियों से विस्तृत विचार-विमर्श किया। इन बैठकों में भारत के भविष्य, संविधान निर्माण, सत्ता हस्तांतरण तथा हिंदू-मुस्लिम संबंधों जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर लंबी चर्चाएँ हुईं।
मिशन ने शीघ्र ही यह अनुभव कर लिया कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच पाकिस्तान के प्रश्न पर समझौता लगभग असंभव है। इसलिए उसने ऐसी योजना तैयार करने का प्रयास किया, जिसमें भारत की राजनीतिक एकता भी बनी रहे और मुस्लिम लीग की कुछ प्रमुख चिंताओं का समाधान भी हो सके। यही प्रयास आगे चलकर कैबिनेट मिशन योजना (Cabinet Mission Plan) के रूप में सामने आया, जिसे भारतीय संवैधानिक इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है।
इस प्रकार कैबिनेट मिशन केवल एक संवैधानिक आयोग नहीं था, बल्कि ब्रिटिश शासन द्वारा भारत की सत्ता भारतीयों को सौंपने की दिशा में किया गया सबसे गंभीर और व्यापक प्रयास था। यद्यपि अंततः इसकी योजना पूर्णतः सफल नहीं हो सकी, फिर भी इसी मिशन की सिफारिशों के आधार पर भारत की संविधान सभा का गठन हुआ और स्वतंत्र भारत के संविधान-निर्माण की प्रक्रिया औपचारिक रूप से प्रारंभ हुई।
अध्याय–3 : कैबिनेट मिशन (Cabinet Mission, 1946)
भाग–2 : कैबिनेट मिशन योजना (Cabinet Mission Plan, 1946) – प्रमुख प्रावधानों का विस्तृत विश्लेषण
भारत पहुँचने के बाद कैबिनेट मिशन ने लगभग दो महीने तक विभिन्न राजनीतिक दलों, भारतीय रियासतों तथा प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं से विस्तृत विचार-विमर्श किया। इन चर्चाओं के दौरान यह स्पष्ट हो गया कि भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक समस्या केवल सत्ता हस्तांतरण नहीं, बल्कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच बढ़ता हुआ वैचारिक तथा राजनीतिक मतभेद था। कांग्रेस एक अखंड, लोकतांत्रिक और शक्तिशाली केंद्र वाले भारत की समर्थक थी, जबकि मुस्लिम लीग पृथक पाकिस्तान की माँग पर अडिग थी। इन दोनों विरोधी दृष्टिकोणों के बीच संतुलन स्थापित करना अत्यंत कठिन था। इसलिए कैबिनेट मिशन ने एक ऐसी संवैधानिक योजना प्रस्तुत की, जिसमें भारत की एकता को बनाए रखने का प्रयास भी किया गया और मुस्लिम लीग की कुछ प्रमुख चिंताओं को भी ध्यान में रखा गया।
16 मई 1946 को कैबिनेट मिशन ने अपनी योजना की औपचारिक घोषणा की। यह योजना भारतीय संवैधानिक इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक मानी जाती है, क्योंकि इसी के आधार पर संविधान सभा के गठन और सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई।
कैबिनेट मिशन का सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव यह था कि भारत का विभाजन नहीं किया जाएगा। मिशन का मत था कि भारत का विभाजन न तो आर्थिक दृष्टि से उचित होगा, न प्रशासनिक दृष्टि से और न ही सामरिक दृष्टि से। यदि पाकिस्तान का निर्माण किया जाता, तो दोनों नए राज्यों के सामने रक्षा, संचार, व्यापार, वित्त तथा प्रशासन से संबंधित अनेक जटिल समस्याएँ उत्पन्न हो जातीं। इसलिए मिशन ने स्पष्ट रूप से कहा कि भारत की एकता को बनाए रखना ही सभी पक्षों के हित में होगा।
यद्यपि मिशन ने पाकिस्तान की माँग अस्वीकार कर दी, फिर भी उसने मुस्लिम लीग की आशंकाओं को दूर करने के लिए एक विशेष संघीय व्यवस्था (Federal Structure) का प्रस्ताव रखा। इस योजना के अनुसार भारत में एक संघ (Union of India) स्थापित किया जाएगा, जिसके अधिकार अत्यंत सीमित होंगे। संघीय सरकार केवल तीन विषयों—रक्षा (Defence), विदेश नीति (Foreign Affairs) तथा संचार (Communications)—का संचालन करेगी। इन विषयों के अतिरिक्त सभी शेष अधिकार प्रांतों के पास होंगे। इस प्रकार केंद्र को जानबूझकर कमजोर रखा गया ताकि मुस्लिम लीग को यह विश्वास दिलाया जा सके कि किसी शक्तिशाली केंद्रीय सरकार के माध्यम से मुस्लिम बहुल प्रांतों पर कांग्रेस का प्रभुत्व स्थापित नहीं होगा।
संघीय व्यवस्था के अंतर्गत एक संघीय कार्यपालिका तथा एक संघीय विधानमंडल की स्थापना का प्रस्ताव भी रखा गया। इन संस्थाओं में ब्रिटिश भारत के प्रांतों तथा भारतीय रियासतों दोनों का प्रतिनिधित्व होना था। इस प्रकार पहली बार ब्रिटिश भारत और देशी रियासतों को एक संवैधानिक ढाँचे में जोड़ने का गंभीर प्रयास किया गया।
कैबिनेट मिशन योजना का सबसे चर्चित और विवादास्पद प्रावधान प्रांतों का समूहों (Grouping of Provinces) में विभाजन था। मिशन ने प्रस्ताव रखा कि ब्रिटिश भारत के प्रांतों को तीन समूहों में संगठित किया जाए।
समूह ‘A’ में वे प्रांत शामिल किए गए जहाँ हिंदू बहुसंख्यक थे—मद्रास, बंबई, संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश), बिहार, मध्य प्रांत तथा उड़ीसा।
समूह ‘B’ में पंजाब, सिंध, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) तथा बलूचिस्तान को रखा गया, जहाँ मुस्लिम जनसंख्या अपेक्षाकृत अधिक थी।
समूह ‘C’ में बंगाल और असम को सम्मिलित किया गया।
प्रत्येक समूह को यह अधिकार दिया गया कि वह अपने लिए अलग संविधान और प्रशासनिक व्यवस्था विकसित कर सके। समूहों के पास शिक्षा, कृषि, कानून-व्यवस्था तथा अन्य अनेक विषयों पर संयुक्त रूप से कार्य करने की शक्ति भी हो सकती थी। यह व्यवस्था मुस्लिम लीग को संतुष्ट करने के उद्देश्य से बनाई गई थी, क्योंकि इससे मुस्लिम बहुल प्रांतों को व्यापक स्वायत्तता प्राप्त हो जाती।
हालाँकि यही समूह व्यवस्था आगे चलकर सबसे अधिक विवाद का कारण बनी। कांग्रेस का मत था कि प्रत्येक प्रांत को यह स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वह किसी भी समूह में शामिल हो या न हो। दूसरी ओर मुस्लिम लीग चाहती थी कि समूह व्यवस्था अनिवार्य हो, क्योंकि यही भविष्य में पाकिस्तान की आधारभूमि बन सकती थी।
कैबिनेट मिशन योजना का एक अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण प्रावधान संविधान सभा (Constituent Assembly) के गठन से संबंधित था। मिशन ने प्रस्ताव दिया कि भारत का संविधान बनाने के लिए एक संविधान सभा गठित की जाए। इस सभा में ब्रिटिश भारत के प्रांतों से निर्वाचित प्रतिनिधि आएँगे, जबकि भारतीय रियासतें अपने प्रतिनिधियों को नामित करेंगी।
संविधान सभा के सदस्यों का निर्वाचन प्रत्यक्ष मतदान से नहीं, बल्कि प्रांतीय विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जाना था। विभिन्न समुदायों—सामान्य, मुस्लिम और सिख—को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह था कि संविधान सभा भारतीय समाज की विविधता का प्रतिनिधित्व कर सके।
मिशन ने यह भी प्रस्ताव रखा कि संविधान सभा पहले संघीय विषयों पर विचार करेगी और उसके बाद प्रत्येक समूह अपने-अपने संविधान तथा प्रशासनिक व्यवस्था का निर्धारण करेगा। इस प्रकार संविधान निर्माण की प्रक्रिया को तीन स्तरों—संघ, समूह और प्रांत—में विभाजित किया गया।
कैबिनेट मिशन योजना का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष अंतरिम सरकार (Interim Government) का गठन था। ब्रिटिश सरकार ने यह स्वीकार किया कि जब तक नया संविधान नहीं बन जाता और सत्ता का पूर्ण हस्तांतरण नहीं हो जाता, तब तक भारत में एक अंतरिम राष्ट्रीय सरकार कार्य करेगी। इस सरकार में प्रमुख भारतीय राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को सम्मिलित किया जाएगा। यह प्रस्ताव इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि पहली बार केंद्र में भारतीय नेताओं को प्रशासन की वास्तविक जिम्मेदारी मिलने वाली थी।
मिशन ने भारतीय रियासतों के संबंध में भी विशेष व्यवस्था की। उन्हें संघ में सम्मिलित होने का अवसर दिया गया, किंतु उनके आंतरिक मामलों में स्वायत्तता बनाए रखने का आश्वासन भी दिया गया। ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि सत्ता हस्तांतरण के समय रियासतों और ब्रिटिश भारत के बीच किसी प्रकार का गंभीर संघर्ष उत्पन्न न हो।
यदि इन सभी प्रस्तावों का समग्र अध्ययन किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि कैबिनेट मिशन ने भारत की एकता बनाए रखने का अंतिम गंभीर प्रयास किया। उसने पाकिस्तान की माँग को अस्वीकार किया, किंतु मुस्लिम लीग को संतुष्ट करने के लिए प्रांतों के समूह, कमजोर केंद्र तथा व्यापक प्रांतीय स्वायत्तता जैसी व्यवस्थाएँ भी प्रस्तुत कीं। यही कारण है कि इस योजना को एक “समझौते की संवैधानिक योजना” (Compromise Constitutional Plan) भी कहा जाता है।
प्रारंभिक अवस्था में कांग्रेस और मुस्लिम लीग—दोनों ने कुछ शर्तों के साथ इस योजना को स्वीकार करने की इच्छा व्यक्त की। किंतु शीघ्र ही समूह व्यवस्था की व्याख्या को लेकर दोनों दलों के बीच गंभीर मतभेद उत्पन्न हो गए। यही मतभेद आगे चलकर इस योजना की विफलता का प्रमुख कारण बने और भारत की राजनीति एक बार फिर गहरे संकट में पहुँच गई।
अध्याय–3 : कैबिनेट मिशन (Cabinet Mission, 1946)
भाग–3 : कैबिनेट मिशन योजना पर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएँ, योजना की विफलता, डायरेक्ट एक्शन डे तथा अंतरिम सरकार
कैबिनेट मिशन योजना की घोषणा के बाद पूरे भारत में यह आशा व्यक्त की जाने लगी कि संभवतः अब भारत की राजनीतिक समस्या का शांतिपूर्ण समाधान निकल आएगा। ब्रिटिश सरकार को विश्वास था कि उसकी यह योजना कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौते का आधार बनेगी तथा सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया बिना किसी बड़े संघर्ष के पूर्ण हो जाएगी। प्रारंभिक चरण में ऐसा प्रतीत भी हुआ कि दोनों प्रमुख राजनीतिक दल इस योजना पर विचार करने के लिए तैयार हैं, किंतु कुछ ही समय बाद इसकी व्याख्या को लेकर गंभीर मतभेद उत्पन्न हो गए। यही मतभेद आगे चलकर योजना की असफलता तथा भारत के विभाजन की दिशा में निर्णायक सिद्ध हुए।
सबसे पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने कैबिनेट मिशन योजना का अध्ययन किया। कांग्रेस ने इस तथ्य का स्वागत किया कि मिशन ने भारत के विभाजन के विचार को अस्वीकार कर दिया था। कांग्रेस का मानना था कि भारत एक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक इकाई है, इसलिए उसका विभाजन किसी भी दृष्टि से उचित नहीं होगा। संविधान सभा के गठन का प्रस्ताव भी कांग्रेस की लंबे समय से चली आ रही माँग के अनुरूप था। इसलिए कांग्रेस ने संविधान सभा के विचार का समर्थन किया।
किन्तु कांग्रेस को मिशन की समूह व्यवस्था (Grouping System) पर गंभीर आपत्ति थी। उसका मत था कि प्रत्येक प्रांत को यह स्वतंत्र अधिकार होना चाहिए कि वह किसी समूह में सम्मिलित हो या न हो। कांग्रेस यह स्वीकार करने को तैयार नहीं थी कि किसी प्रांत को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी समूह का सदस्य बनाया जाए। कांग्रेस के नेताओं का विश्वास था कि यदि समूह व्यवस्था अनिवार्य कर दी गई, तो इससे भविष्य में भारत की एकता कमजोर होगी और सांप्रदायिक आधार पर राजनीतिक विभाजन को बढ़ावा मिलेगा।
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जुलाई 1946 में एक प्रेस सम्मेलन में कहा कि संविधान सभा सर्वोच्च संस्था होगी और उसे किसी भी योजना में आवश्यक परिवर्तन करने का अधिकार होगा। उनका आशय यह था कि संविधान सभा कैबिनेट मिशन की योजना से बंधी हुई नहीं होगी। मुस्लिम लीग ने नेहरू के इस कथन को अत्यंत गंभीरता से लिया। लीग का मत था कि यदि संविधान सभा समूह व्यवस्था को समाप्त कर देगी, तो मुस्लिम बहुल प्रांतों की राजनीतिक सुरक्षा समाप्त हो जाएगी।
दूसरी ओर मोहम्मद अली जिन्ना तथा मुस्लिम लीग ने प्रारंभ में कैबिनेट मिशन योजना को स्वीकार करने का संकेत दिया, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि समूह व्यवस्था के माध्यम से मुस्लिम बहुल प्रांत एक प्रकार का संयुक्त राजनीतिक ढाँचा विकसित कर सकेंगे। लीग को यह भी आशा थी कि भविष्य में यही व्यवस्था पाकिस्तान की स्थापना का आधार बन सकती है।
किन्तु जब कांग्रेस ने समूह व्यवस्था की अपनी व्याख्या प्रस्तुत की और जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा की सर्वोच्चता पर बल दिया, तब मुस्लिम लीग ने यह निष्कर्ष निकाला कि कांग्रेस सत्ता प्राप्त करने के बाद समूह व्यवस्था को समाप्त कर देगी। फलस्वरूप 29 जुलाई 1946 को मुस्लिम लीग परिषद ने कैबिनेट मिशन योजना की स्वीकृति वापस ले ली। इसी बैठक में लीग ने यह घोषणा की कि अब पाकिस्तान की प्राप्ति के लिए संवैधानिक उपायों के स्थान पर प्रत्यक्ष राजनीतिक संघर्ष का मार्ग अपनाया जाएगा।
मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त 1946 को “डायरेक्ट एक्शन डे (Direct Action Day)” मनाने की घोषणा की। जिन्ना का उद्देश्य यह प्रदर्शित करना था कि भारतीय मुसलमान पाकिस्तान की माँग के लिए किसी भी सीमा तक संघर्ष करने के लिए तैयार हैं। किंतु इस दिन की घटनाएँ अत्यंत दुखद सिद्ध हुईं। विशेष रूप से कलकत्ता (अब कोलकाता) में व्यापक सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे। कुछ ही दिनों में हजारों लोग मारे गए और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए। इन दंगों ने हिंदू-मुस्लिम संबंधों को अत्यंत गंभीर रूप से प्रभावित किया और पूरे देश में सांप्रदायिक तनाव फैल गया।
कलकत्ता के बाद नोआखाली, बिहार, पंजाब, उत्तर प्रदेश तथा अन्य अनेक क्षेत्रों में भी सांप्रदायिक हिंसा फैलने लगी। वर्षों से साथ रहने वाले समुदायों के बीच अविश्वास की भावना गहरी होती चली गई। इतिहासकारों का मत है कि डायरेक्ट एक्शन डे ने भारत के विभाजन की प्रक्रिया को अत्यधिक तीव्र कर दिया। इसके बाद कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौते की संभावना लगभग समाप्त हो गई।
इन राजनीतिक घटनाओं के समानांतर ब्रिटिश सरकार ने सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का प्रयास जारी रखा। 2 सितंबर 1946 को अंतरिम सरकार (Interim Government) का गठन किया गया। इसके उपाध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू बने और व्यावहारिक रूप से वे ही सरकार के प्रमुख थे। इस अंतरिम सरकार में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं को सम्मिलित किया गया।
प्रारंभ में मुस्लिम लीग ने अंतरिम सरकार में भाग लेने से इंकार कर दिया। उसका आरोप था कि कांग्रेस सरकार का उपयोग अपने राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने के लिए करेगी। किंतु कुछ समय बाद ब्रिटिश सरकार के आग्रह पर मुस्लिम लीग ने भी अंतरिम सरकार में भाग लेने का निर्णय लिया। अक्टूबर 1946 में लीग के प्रतिनिधि भी सरकार में सम्मिलित हुए।
हालाँकि कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों के एक ही सरकार में शामिल होने के बावजूद प्रशासनिक सहयोग की अपेक्षित भावना विकसित नहीं हो सकी। दोनों दलों के बीच निरंतर मतभेद बने रहे। अनेक महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय राजनीतिक विवादों का विषय बन गए। इस प्रकार अंतरिम सरकार राष्ट्रीय एकता का प्रभावी उदाहरण बनने के बजाय राजनीतिक संघर्ष का नया मंच बन गई।
इसी बीच कैबिनेट मिशन की सिफारिशों के आधार पर संविधान सभा के चुनाव भी सम्पन्न हुए। संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को नई दिल्ली में आयोजित हुई। मुस्लिम लीग ने इस बैठक का बहिष्कार किया और उसके सदस्य इसमें सम्मिलित नहीं हुए। परिणामस्वरूप संविधान सभा ने प्रारंभिक कार्य कांग्रेस तथा अन्य सहयोगी दलों के प्रतिनिधियों के साथ ही प्रारंभ किया।
11 दिसंबर 1946 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष निर्वाचित हुए। इसके बाद 13 दिसंबर 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने प्रसिद्ध उद्देश्य प्रस्ताव (Objectives Resolution) प्रस्तुत किया, जिसने आगे चलकर भारतीय संविधान की प्रस्तावना का आधार तैयार किया। इस प्रकार, यद्यपि कैबिनेट मिशन योजना पूर्णतः सफल नहीं हो सकी, फिर भी उसी के परिणामस्वरूप संविधान सभा अस्तित्व में आई और स्वतंत्र भारत के संविधान-निर्माण की ऐतिहासिक प्रक्रिया प्रारंभ हुई।
इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि कैबिनेट मिशन योजना की विफलता का प्रमुख कारण केवल ब्रिटिश नीति नहीं थी, बल्कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच बढ़ते हुए राजनीतिक अविश्वास, समूह व्यवस्था की भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ तथा पाकिस्तान के प्रश्न पर असहमति भी थी। यदि इन मतभेदों का समाधान हो जाता, तो संभवतः भारत का संवैधानिक विकास एक भिन्न दिशा में आगे बढ़ता।
किन्तु इतिहास ने दूसरा मार्ग चुना। सांप्रदायिक तनाव, राजनीतिक संघर्ष और प्रशासनिक अस्थिरता ने ब्रिटिश सरकार को यह विश्वास दिला दिया कि भारत की समस्या का समाधान अब केवल सत्ता हस्तांतरण से नहीं, बल्कि किसी अंतिम राजनीतिक निर्णय से ही संभव होगा। यही परिस्थितियाँ आगे चलकर माउंटबेटन योजना (1947) तथा भारत के विभाजन का आधार बनीं।
अध्याय–3 : कैबिनेट मिशन (Cabinet Mission, 1946)
भाग–4 : कैबिनेट मिशन का समग्र मूल्यांकन, ऐतिहासिक महत्व, संविधान निर्माण में योगदान तथा निष्कर्ष
कैबिनेट मिशन भारतीय संवैधानिक इतिहास की अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण ब्रिटिश संवैधानिक योजना थी। इससे पहले ब्रिटिश सरकार ने अनेक आयोगों, समितियों और मिशनों के माध्यम से भारत की राजनीतिक समस्या का समाधान खोजने का प्रयास किया था, किंतु वे या तो भारतीय जनता की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सके या फिर सभी राजनीतिक दलों की सहमति प्राप्त करने में असफल रहे। कैबिनेट मिशन उन सभी प्रयासों की तुलना में अधिक व्यापक, अधिक गंभीर और अधिक व्यावहारिक योजना थी। इसका उद्देश्य केवल कुछ संवैधानिक सुधार करना नहीं, बल्कि भारत में सत्ता हस्तांतरण की पूरी प्रक्रिया का मार्ग प्रशस्त करना था।
यदि कैबिनेट मिशन की उपलब्धियों का अध्ययन किया जाए, तो सबसे पहली और सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि इसने संविधान सभा के गठन का स्पष्ट और व्यावहारिक मार्ग प्रस्तुत किया। यद्यपि संविधान सभा की अवधारणा का समर्थन कांग्रेस लंबे समय से करती आ रही थी और 1942 के क्रिप्स मिशन ने भी इसे सिद्धांततः स्वीकार किया था, किंतु संविधान सभा के वास्तविक गठन की विस्तृत योजना पहली बार कैबिनेट मिशन ने ही प्रस्तुत की। इसी योजना के आधार पर संविधान सभा का गठन हुआ और स्वतंत्र भारत का संविधान तैयार किया गया। इसलिए भारतीय संविधान के इतिहास में कैबिनेट मिशन का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
दूसरी महत्वपूर्ण उपलब्धि यह थी कि मिशन ने भारत की राजनीतिक एकता बनाए रखने का गंभीर प्रयास किया। उस समय मुस्लिम लीग पाकिस्तान की स्पष्ट माँग कर रही थी, जबकि कांग्रेस अखंड भारत के पक्ष में थी। मिशन ने पाकिस्तान की माँग को अस्वीकार करते हुए यह तर्क दिया कि विभाजन से न तो सांप्रदायिक समस्या समाप्त होगी और न ही प्रशासनिक तथा आर्थिक कठिनाइयाँ कम होंगी। उसका मत था कि विभाजन के बाद भी दोनों देशों में बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक रहेंगे और नई समस्याएँ उत्पन्न होंगी। इस प्रकार कैबिनेट मिशन ने भारत की एकता को बनाए रखने का अंतिम संवैधानिक प्रयास किया।
मिशन की तीसरी महत्वपूर्ण उपलब्धि यह थी कि उसने सत्ता हस्तांतरण की दिशा में व्यावहारिक कदम उठाया। अंतरिम सरकार के गठन का प्रस्ताव इसी उद्देश्य से किया गया था कि भारतीय नेता प्रशासनिक अनुभव प्राप्त करें और धीरे-धीरे शासन की जिम्मेदारी अपने हाथों में लें। सितंबर 1946 में अंतरिम सरकार का गठन इसी प्रक्रिया का परिणाम था। यद्यपि इस सरकार में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मतभेद बने रहे, फिर भी भारतीय नेताओं ने पहली बार केंद्र स्तर पर शासन संचालन का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त किया।
इन उपलब्धियों के बावजूद कैबिनेट मिशन अपनी मूल राजनीतिक योजना को सफल बनाने में असफल रहा। इसका सबसे बड़ा कारण समूह व्यवस्था (Grouping System) था। मिशन ने यह व्यवस्था इस उद्देश्य से बनाई थी कि मुस्लिम लीग भारत की एकता को स्वीकार कर ले। किंतु यही व्यवस्था कांग्रेस और लीग के बीच सबसे बड़े विवाद का कारण बन गई। कांग्रेस इसे प्रांतों की स्वतंत्रता के विरुद्ध मानती थी, जबकि लीग इसे अपनी राजनीतिक सुरक्षा का आधार मानती थी। परिणामस्वरूप दोनों दलों ने इस व्यवस्था की अलग-अलग व्याख्या की और अंततः पूरी योजना विवादों में घिर गई।
मिशन की दूसरी कमजोरी यह थी कि उसने भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक समस्या—हिंदू-मुस्लिम संबंधों—का स्थायी समाधान प्रस्तुत नहीं किया। उसने दोनों पक्षों के बीच समझौता कराने का प्रयास अवश्य किया, किंतु वह किसी भी पक्ष को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर सका। कांग्रेस को कमजोर केंद्र स्वीकार नहीं था, जबकि मुस्लिम लीग अखंड भारत को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। इस प्रकार मिशन की संतुलनकारी नीति अंततः किसी भी पक्ष का विश्वास पूरी तरह प्राप्त नहीं कर सकी।
तीसरी महत्वपूर्ण कमजोरी यह थी कि मिशन ने यह स्पष्ट नहीं किया कि यदि कोई राजनीतिक दल योजना का पालन न करे, तो उस स्थिति में क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी। यही कारण था कि जब कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने योजना की भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ प्रस्तुत कीं, तब ब्रिटिश सरकार निर्णायक भूमिका निभाने में असफल रही। इससे राजनीतिक संकट और गहरा होता गया।
इतिहासकार विपिन चंद्र का मत है कि कैबिनेट मिशन भारत को एक संयुक्त संघीय राष्ट्र के रूप में बनाए रखने का अंतिम गंभीर प्रयास था। उनके अनुसार यदि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच कुछ अधिक राजनीतिक विश्वास होता, तो संभवतः भारत का विभाजन टाला जा सकता था। इसी प्रकार बी. एल. ग्रोवर लिखते हैं कि कैबिनेट मिशन योजना ब्रिटिश सरकार की सबसे व्यावहारिक संवैधानिक योजना थी, किंतु भारतीय राजनीति में बढ़ती सांप्रदायिकता ने इसकी सफलता की संभावना समाप्त कर दी।
इतिहासकार आर. सी. अग्रवाल के अनुसार कैबिनेट मिशन की सबसे बड़ी उपलब्धि संविधान सभा का गठन था। यदि यह मिशन केवल यही कार्य कर पाता और अन्य सभी उद्देश्य पूरे न भी होते, तब भी भारतीय संविधान के निर्माण में इसका योगदान ऐतिहासिक माना जाता। वास्तव में स्वतंत्र भारत का संविधान जिस संविधान सभा द्वारा बनाया गया, उसका गठन कैबिनेट मिशन की सिफारिशों के आधार पर ही हुआ था।
कुछ इतिहासकार यह भी मानते हैं कि कैबिनेट मिशन की विफलता के बाद भारत का विभाजन लगभग अनिवार्य हो गया था। डायरेक्ट एक्शन डे के दंगे, अंतरिम सरकार में लगातार संघर्ष, संविधान सभा का मुस्लिम लीग द्वारा बहिष्कार तथा देशभर में बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा ने ब्रिटिश सरकार को यह विश्वास दिला दिया कि अब संयुक्त भारत की योजना को लागू करना अत्यंत कठिन होगा। यही कारण था कि फरवरी 1947 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने भारत को शीघ्र स्वतंत्रता देने की घोषणा की और इसके कुछ ही समय बाद लॉर्ड माउंटबेटन को भारत का अंतिम वायसराय नियुक्त किया गया।
यदि भारतीय संविधान के विकास की दृष्टि से कैबिनेट मिशन का मूल्यांकन किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि इसकी सबसे स्थायी विरासत संविधान सभा है। संविधान सभा ने 9 दिसंबर 1946 से अपना कार्य प्रारंभ किया और लगभग तीन वर्षों के गहन विचार-विमर्श के बाद 26 नवंबर 1949 को भारतीय संविधान को स्वीकार किया। इस प्रकार कैबिनेट मिशन ने अप्रत्यक्ष रूप से स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक संविधान की नींव रखने का कार्य किया।
इस प्रकार कैबिनेट मिशन भारतीय संवैधानिक इतिहास का एक ऐसा अध्याय है, जिसमें सफलता और असफलता दोनों के महत्वपूर्ण पक्ष दिखाई देते हैं। यह भारत की एकता बनाए रखने में असफल रहा, किंतु संविधान निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ कराने में पूर्णतः सफल हुआ। यह पाकिस्तान की माँग को रोक नहीं सका, किंतु लोकतांत्रिक संविधान सभा की स्थापना कर गया। यही कारण है कि इतिहास में कैबिनेट मिशन को ब्रिटिश शासन का अंतिम व्यापक संवैधानिक प्रयास तथा स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माण की आधारशिला दोनों के रूप में स्मरण किया जाता है।
अतः यह कहा जा सकता है कि कैबिनेट मिशन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक निर्णायक मोड़ था। इसकी विफलता ने भारत के विभाजन का मार्ग प्रशस्त किया, जबकि इसकी सफलता ने संविधान सभा के माध्यम से आधुनिक भारतीय गणराज्य की नींव रखी। इसलिए भारतीय राजनीति और संविधान के अध्ययन में कैबिनेट मिशन का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण, ऐतिहासिक और स्थायी है।
अध्याय–4 : माउंटबेटन योजना (Mountbatten Plan, 1947)
भाग–1 : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, लॉर्ड माउंटबेटन का आगमन तथा विभाजन की अनिवार्यता
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अंतिम चरण अत्यंत जटिल, संवेदनशील और ऐतिहासिक दृष्टि से निर्णायक था। 1946 के अंत तक यह स्पष्ट हो चुका था कि ब्रिटिश शासन भारत में अधिक समय तक टिक नहीं सकता। लगभग दो शताब्दियों तक भारत पर शासन करने वाला ब्रिटिश साम्राज्य अब राजनीतिक, आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा था। दूसरी ओर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन अपने चरम पर पहुँच चुका था। कांग्रेस, मुस्लिम लीग, क्रांतिकारी आंदोलनों, किसान संगठनों, श्रमिक आंदोलनों तथा जनता के व्यापक समर्थन ने ब्रिटिश शासन की वैधता को लगभग समाप्त कर दिया था। इन परिस्थितियों में ब्रिटिश सरकार को भारत की सत्ता भारतीयों को सौंपने का अंतिम निर्णय लेना पड़ा।
कैबिनेट मिशन योजना की विफलता ने भारतीय राजनीति को अत्यंत गंभीर संकट में डाल दिया। संविधान सभा का कार्य प्रारंभ हो चुका था, किंतु मुस्लिम लीग ने उसका बहिष्कार कर दिया था। अंतरिम सरकार में कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों सम्मिलित थे, परंतु उनके बीच सहयोग के स्थान पर निरंतर टकराव बना रहा। प्रशासनिक निर्णयों पर मतभेद, राजनीतिक अविश्वास तथा सांप्रदायिक तनाव ने शासन व्यवस्था को अस्थिर बना दिया।
1946 के डायरेक्ट एक्शन डे के बाद कलकत्ता, नोआखाली, बिहार, पंजाब और उत्तर-पश्चिम भारत के अनेक क्षेत्रों में भयानक सांप्रदायिक दंगे हुए। हजारों लोग मारे गए, लाखों लोग बेघर हुए और समाज में वर्षों से चली आ रही पारस्परिक विश्वास की भावना गहरे संकट में पड़ गई। हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच अविश्वास इतना बढ़ चुका था कि संयुक्त भारत की कल्पना दिन-प्रतिदिन कठिन होती जा रही थी। ब्रिटिश प्रशासन भी इन दंगों को नियंत्रित करने में असफल सिद्ध हो रहा था।
इसी बीच ब्रिटेन की लेबर सरकार ने यह अनुभव किया कि भारत में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को अधिक समय तक टालना संभव नहीं है। यदि शीघ्र निर्णय नहीं लिया गया, तो देश व्यापक गृहयुद्ध की स्थिति में पहुँच सकता है। इसलिए 20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने ब्रिटिश संसद में एक ऐतिहासिक घोषणा की। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश सरकार जून 1948 तक भारत की सत्ता भारतीयों को हस्तांतरित कर देगी। यदि तब तक भारतीय राजनीतिक दल किसी संयुक्त संवैधानिक व्यवस्था पर सहमत नहीं होते, तो ब्रिटिश सरकार स्वयं उचित निर्णय लेकर सत्ता का हस्तांतरण कर देगी।
यह घोषणा भारतीय राजनीति में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई। अब पहली बार ब्रिटिश सरकार ने सत्ता हस्तांतरण की निश्चित समय-सीमा घोषित कर दी थी। इससे यह स्पष्ट हो गया कि भारत की स्वतंत्रता अब केवल राजनीतिक माँग नहीं रही, बल्कि निकट भविष्य की वास्तविकता बन चुकी है।
सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने भारत में नए वायसराय की नियुक्ति करने का निर्णय लिया। लॉर्ड वेवेल को पद से हटाकर उनकी जगह लॉर्ड लुई माउंटबेटन (Lord Louis Mountbatten) को भारत का अंतिम वायसराय नियुक्त किया गया। माउंटबेटन ब्रिटिश राजपरिवार से संबंधित थे और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नौसेना में उच्च पदों पर कार्य कर चुके थे। उन्हें कुशल प्रशासक, प्रभावशाली वार्ताकार तथा शीघ्र निर्णय लेने वाला अधिकारी माना जाता था।
24 मार्च 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत के वायसराय का पदभार ग्रहण किया। भारत आने के बाद उन्होंने सबसे पहले देश की वास्तविक राजनीतिक स्थिति का गहन अध्ययन किया। उन्होंने महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मोहम्मद अली जिन्ना, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, डॉ. भीमराव अंबेडकर, सिख नेताओं तथा भारतीय रियासतों के प्रतिनिधियों से अलग-अलग और सामूहिक रूप से अनेक दौर की वार्ताएँ कीं।
माउंटबेटन का प्रारंभिक उद्देश्य भारत को एक संयुक्त संघीय राष्ट्र के रूप में स्वतंत्र बनाना था। उन्होंने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौता कराने का भरसक प्रयास किया। किंतु शीघ्र ही उन्हें यह अनुभव हो गया कि पाकिस्तान के प्रश्न पर दोनों पक्ष अपने-अपने दृष्टिकोण से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं। कांग्रेस अब लंबे राजनीतिक गतिरोध को समाप्त कर शीघ्र स्वतंत्रता चाहती थी, जबकि मुस्लिम लीग पाकिस्तान की स्थापना से कम किसी समाधान को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी।
महात्मा गांधी अंतिम समय तक भारत के विभाजन के विरोधी रहे। उनका विश्वास था कि भारत की स्वतंत्रता सांप्रदायिक आधार पर विभाजन के माध्यम से प्राप्त नहीं की जानी चाहिए। वे हिंदू-मुस्लिम एकता को भारतीय राष्ट्रवाद की आत्मा मानते थे। उन्होंने अनेक बार जिन्ना तथा अन्य नेताओं से संवाद स्थापित करने का प्रयास किया, किंतु परिस्थितियाँ उनके अनुकूल नहीं रहीं।
दूसरी ओर सरदार वल्लभभाई पटेल और पंडित जवाहरलाल नेहरू धीरे-धीरे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि यदि विभाजन स्वीकार नहीं किया गया, तो देश में व्यापक गृहयुद्ध और निरंतर राजनीतिक अस्थिरता बनी रहेगी। उनका मत था कि एक शक्तिशाली और स्थिर भारत का निर्माण लंबे समय तक चलने वाले सांप्रदायिक संघर्ष से अधिक महत्वपूर्ण है। इसलिए अत्यंत पीड़ा और अनिच्छा के साथ उन्होंने विभाजन को एक व्यावहारिक राजनीतिक समाधान के रूप में स्वीकार करना प्रारंभ किया।
मोहम्मद अली जिन्ना का दृष्टिकोण बिल्कुल स्पष्ट था। उनका तर्क था कि हिंदू और मुसलमान दो पृथक राष्ट्र हैं, जिनकी संस्कृति, इतिहास, सामाजिक व्यवस्था और राजनीतिक हित अलग-अलग हैं। इसलिए दोनों के लिए अलग-अलग राष्ट्रों की स्थापना ही स्थायी समाधान हो सकता है। 1940 के लाहौर प्रस्ताव से लेकर 1947 तक मुस्लिम लीग लगातार इसी सिद्धांत का समर्थन करती रही।
इन सभी परिस्थितियों का गहन अध्ययन करने के बाद लॉर्ड माउंटबेटन इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि संयुक्त भारत की योजना को व्यवहार में लागू करना अत्यंत कठिन हो चुका है। यदि सत्ता हस्तांतरण में और अधिक विलंब किया गया, तो हिंसा और अराजकता पूरे देश में फैल सकती है। इसलिए उन्होंने ब्रिटिश सरकार को भारत के विभाजन के आधार पर सत्ता हस्तांतरण की योजना प्रस्तुत करने की सलाह दी।
यही विचार आगे चलकर 3 जून 1947 को घोषित माउंटबेटन योजना (3 June Plan) के रूप में सामने आया। इस योजना ने भारत के राजनीतिक इतिहास की दिशा ही बदल दी। इसके माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने पहली बार भारत के विभाजन को औपचारिक स्वीकृति प्रदान की और दो स्वतंत्र अधिराज्यों—भारत (India) तथा पाकिस्तान (Pakistan)—की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।
इस प्रकार माउंटबेटन योजना किसी एक दिन में लिया गया निर्णय नहीं थी। यह कई वर्षों से बढ़ते हुए राजनीतिक मतभेदों, सांप्रदायिक तनाव, ब्रिटिश साम्राज्य की कमजोरी, कैबिनेट मिशन की विफलता, मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की माँग तथा भारतीय नेताओं की व्यावहारिक राजनीतिक सोच का संयुक्त परिणाम थी। इसलिए इतिहासकार माउंटबेटन योजना को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अंतिम और सबसे निर्णायक संवैधानिक मोड़ मानते हैं।
अध्याय–4 : माउंटबेटन योजना (Mountbatten Plan, 1947)
भाग–2 : 3 जून 1947 की माउंटबेटन योजना के प्रमुख प्रावधानों का विस्तृत विश्लेषण
24 मार्च 1947 को भारत के अंतिम वायसराय के रूप में कार्यभार संभालने के बाद लॉर्ड लुई माउंटबेटन ने लगभग दो महीनों तक भारतीय राजनीतिक परिस्थिति का गहन अध्ययन किया। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, मुस्लिम लीग, सिख नेताओं, भारतीय रियासतों तथा ब्रिटिश अधिकारियों से अनेक दौर की वार्ताएँ कीं। इन चर्चाओं का मुख्य उद्देश्य ऐसा संवैधानिक समाधान खोजना था, जिससे भारत में सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण हो सके। किंतु राजनीतिक परिस्थितियाँ इतनी जटिल हो चुकी थीं कि संयुक्त भारत की योजना व्यवहारिक रूप से असंभव प्रतीत होने लगी। अंततः ब्रिटिश सरकार ने भारत के विभाजन के आधार पर सत्ता हस्तांतरण का निर्णय स्वीकार कर लिया।
3 जून 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली, वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन, कांग्रेस के प्रतिनिधि पंडित जवाहरलाल नेहरू, मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना तथा सिख समुदाय के प्रतिनिधि सरदार बलदेव सिंह ने रेडियो प्रसारण के माध्यम से इस ऐतिहासिक योजना की घोषणा की। यही योजना इतिहास में 3 जून योजना (3 June Plan) अथवा माउंटबेटन योजना (Mountbatten Plan) के नाम से प्रसिद्ध हुई।
इस योजना का सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक प्रावधान यह था कि ब्रिटिश भारत का विभाजन करके दो स्वतंत्र अधिराज्यों (Dominions)—भारत और पाकिस्तान—की स्थापना की जाएगी। यह ब्रिटिश सरकार की पूर्व नीति से एक बड़ा परिवर्तन था। कैबिनेट मिशन तक ब्रिटेन भारत की एकता बनाए रखने का प्रयास कर रहा था, किंतु अब उसने औपचारिक रूप से विभाजन को स्वीकार कर लिया। इस प्रकार पहली बार ब्रिटिश सरकार ने यह मान लिया कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच संयुक्त भारत पर सहमति संभव नहीं है।
योजना के अनुसार पाकिस्तान में मुस्लिम बहुल क्षेत्र सम्मिलित किए जाने थे। इसमें पश्चिमी भाग में पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान तथा उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) के संबंधित क्षेत्र तथा पूर्वी भाग में पूर्वी बंगाल को सम्मिलित करने का प्रस्ताव रखा गया। जबकि शेष क्षेत्र भारत का भाग बने रहने वाले थे।
चूँकि पंजाब और बंगाल दोनों मिश्रित जनसंख्या वाले प्रांत थे, इसलिए उनका विभाजन आवश्यक माना गया। योजना के अनुसार इन दोनों प्रांतों की विधानसभाओं की अलग-अलग बैठकें आयोजित की जानी थीं। यदि संबंधित भागों के सदस्य विभाजन के पक्ष में मतदान करते, तो इन प्रांतों का विभाजन किया जाता। इसी प्रक्रिया के माध्यम से आगे चलकर पंजाब का विभाजन होकर पूर्वी पंजाब भारत में तथा पश्चिमी पंजाब पाकिस्तान में सम्मिलित हुआ। इसी प्रकार बंगाल का विभाजन हुआ और पश्चिम बंगाल भारत तथा पूर्वी बंगाल पाकिस्तान (बाद में बांग्लादेश) का भाग बना।
उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (North-West Frontier Province) के विषय में योजना ने जनमत-संग्रह (Referendum) का प्रावधान किया। वहाँ की जनता को यह अधिकार दिया गया कि वह भारत या पाकिस्तान—किसके साथ रहना चाहती है। जनमत-संग्रह में अधिकांश मत पाकिस्तान के पक्ष में पड़े और यह प्रांत पाकिस्तान में सम्मिलित हो गया।
इसी प्रकार सिलहट (Sylhet) जिले, जो उस समय असम का भाग था, में भी जनमत-संग्रह कराने का निर्णय लिया गया। जनमत-संग्रह के परिणामस्वरूप सिलहट का अधिकांश भाग पूर्वी पाकिस्तान में शामिल हो गया, जबकि कुछ क्षेत्र भारत में बने रहे।
माउंटबेटन योजना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रावधान संविधान सभा से संबंधित था। योजना के अनुसार भारत और पाकिस्तान दोनों की अपनी-अपनी पृथक संविधान सभाएँ होंगी। भारतीय संविधान सभा भारत का संविधान तैयार करेगी, जबकि पाकिस्तान अपनी अलग संविधान सभा के माध्यम से अपना संविधान बनाएगा। इस प्रकार कैबिनेट मिशन के समय जिस संयुक्त संविधान सभा की कल्पना की गई थी, वह अब समाप्त हो गई।
योजना में यह भी स्पष्ट किया गया कि भारत और पाकिस्तान दोनों प्रारंभ में ब्रिटिश राष्ट्रमंडल (Commonwealth) के अंतर्गत अधिराज्य (Dominion) होंगे। दोनों देशों में गवर्नर जनरल की नियुक्ति होगी और वे अपने-अपने प्रशासन का संचालन करेंगे। बाद में दोनों देश अपनी इच्छा के अनुसार राष्ट्रमंडल में बने रहने या उससे अलग होने का निर्णय ले सकेंगे।
योजना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष देशी रियासतों (Princely States) से संबंधित था। ब्रिटिश सरकार ने घोषणा की कि स्वतंत्रता प्राप्त होने के साथ ही रियासतों पर ब्रिटिश सत्ता (Paramountcy) समाप्त हो जाएगी। इसके बाद प्रत्येक रियासत को यह अधिकार होगा कि वह भारत या पाकिस्तान में से किसी एक अधिराज्य में विलय का निर्णय स्वयं करे। यद्यपि सैद्धांतिक रूप से रियासतों को स्वतंत्र रहने का विकल्प भी दिखाई देता था, किंतु व्यवहार में उन्हें भारत अथवा पाकिस्तान में से किसी एक के साथ जुड़ना ही था। यही प्रश्न आगे चलकर हैदराबाद, जूनागढ़ तथा जम्मू-कश्मीर जैसी रियासतों के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।
माउंटबेटन योजना का एक अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान यह था कि सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया अत्यंत शीघ्र पूरी की जाएगी। पहले ब्रिटिश सरकार ने जून 1948 तक सत्ता हस्तांतरण की समय-सीमा निर्धारित की थी, किंतु माउंटबेटन ने यह अनुभव किया कि इतनी लंबी अवधि तक राजनीतिक अस्थिरता बनाए रखना अत्यंत खतरनाक होगा। इसलिए उन्होंने इस प्रक्रिया को तेज करते हुए अगस्त 1947 में ही सत्ता हस्तांतरण का निर्णय लिया। परिणामस्वरूप 15 अगस्त 1947 को भारत तथा 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान स्वतंत्र अधिराज्य बन गए।
योजना के अनुसार दोनों नए देशों के बीच संपत्ति, सेना, प्रशासनिक सेवाओं, वित्तीय संसाधनों, अभिलेखों तथा सरकारी संस्थानों का विभाजन भी किया जाना था। इसके लिए अलग-अलग विभाजन परिषदों (Partition Councils) तथा समितियों का गठन किया गया। भारतीय सेना, नौसेना, रेलवे, डाक, मुद्रा भंडार, सरकारी कार्यालयों और अन्य प्रशासनिक संस्थाओं का विभाजन अत्यंत जटिल कार्य था, जिसे सीमित समय में पूरा करना पड़ा।
पंजाब और बंगाल की नई सीमाओं का निर्धारण करने के लिए ब्रिटिश न्यायविद् सर सिरिल रेडक्लिफ (Sir Cyril Radcliffe) की अध्यक्षता में रेडक्लिफ सीमा आयोग (Radcliffe Boundary Commission) का गठन किया गया। इस आयोग का कार्य धार्मिक बहुलता, प्रशासनिक सुविधा तथा अन्य व्यावहारिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए भारत और पाकिस्तान की सीमाएँ निर्धारित करना था। किंतु सीमांकन का कार्य अत्यंत कम समय में किया गया, जिसके कारण अनेक विवाद उत्पन्न हुए और विभाजन के बाद व्यापक जनसंख्या-स्थानांतरण तथा सांप्रदायिक हिंसा देखने को मिली।
यदि माउंटबेटन योजना के इन सभी प्रावधानों का समग्र अध्ययन किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि इसका मूल उद्देश्य भारत में ब्रिटिश शासन का शीघ्र और व्यवस्थित अंत करना था। ब्रिटिश सरकार अब भारत की राजनीतिक समस्या का स्थायी समाधान खोजने की अपेक्षा सत्ता हस्तांतरण को प्राथमिकता दे रही थी। इसलिए इस योजना में प्रशासनिक व्यावहारिकता को राजनीतिक आदर्शों से अधिक महत्व दिया गया।
कांग्रेस ने अत्यंत दुःख और अनिच्छा के साथ इस योजना को स्वीकार किया। उसके नेताओं का विश्वास था कि यदि विभाजन स्वीकार नहीं किया गया, तो देश लंबे समय तक गृहयुद्ध और सांप्रदायिक संघर्ष में फँस सकता है। दूसरी ओर मुस्लिम लीग ने इस योजना का स्वागत किया, क्योंकि इसके माध्यम से उसकी लंबे समय से चली आ रही पाकिस्तान की माँग स्वीकार कर ली गई थी।
इस प्रकार 3 जून 1947 की माउंटबेटन योजना भारतीय इतिहास की सबसे निर्णायक संवैधानिक योजना सिद्ध हुई। इसने लगभग दो सौ वर्षों के ब्रिटिश शासन का अंत सुनिश्चित किया, किंतु साथ ही भारत के विभाजन जैसी अत्यंत पीड़ादायक ऐतिहासिक घटना का मार्ग भी प्रशस्त किया। इसलिए इस योजना को भारतीय स्वतंत्रता और विभाजन—दोनों का आधारभूत दस्तावेज माना जाता है।
अध्याय–4 : माउंटबेटन योजना (Mountbatten Plan, 1947)
भाग–3 : भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947, सत्ता हस्तांतरण, भारत-विभाजन की प्रक्रिया तथा उसके प्रभाव
3 जून 1947 को माउंटबेटन योजना की घोषणा के बाद भारत की राजनीति अत्यंत तीव्र गति से आगे बढ़ने लगी। लगभग दो शताब्दियों तक भारत पर शासन करने वाले ब्रिटिश साम्राज्य ने अब यह निर्णय कर लिया था कि वह शीघ्रातिशीघ्र सत्ता भारतीयों को सौंप देगा। कांग्रेस, मुस्लिम लीग तथा सिख नेताओं द्वारा माउंटबेटन योजना स्वीकार किए जाने के बाद ब्रिटिश सरकार ने इस योजना को कानूनी रूप देने की प्रक्रिया प्रारम्भ की। इसी उद्देश्य से ब्रिटिश संसद में एक विधेयक प्रस्तुत किया गया, जिसे आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 (Indian Independence Act, 1947) के नाम से जाना गया।
यह अधिनियम ब्रिटिश संसद द्वारा 18 जुलाई 1947 को पारित किया गया। इसे ब्रिटिश सम्राट की स्वीकृति भी प्राप्त हुई और इसके साथ ही यह भारत की स्वतंत्रता का विधिक आधार बन गया। यह अधिनियम केवल एक संवैधानिक कानून नहीं था, बल्कि ब्रिटिश शासन की समाप्ति की औपचारिक घोषणा भी था। इतिहासकारों का मत है कि 1858 में जब ब्रिटिश क्राउन ने ईस्ट इंडिया कंपनी से भारत का शासन अपने हाथ में लिया था, तब से लेकर 1947 तक के औपनिवेशिक शासन का समापन इसी अधिनियम के माध्यम से हुआ।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह था कि 15 अगस्त 1947 से भारत में ब्रिटिश शासन समाप्त हो जाएगा और उसकी जगह दो स्वतंत्र अधिराज्यों—भारत (India) तथा पाकिस्तान (Pakistan)—की स्थापना होगी। पाकिस्तान ने प्रशासनिक सुविधा के कारण 14 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त की, जबकि भारत ने 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अपना अस्तित्व प्राप्त किया।
इस अधिनियम के अनुसार दोनों नए अधिराज्यों को अपने-अपने संविधान बनने तक भारत शासन अधिनियम, 1935 के आधार पर शासन चलाने की अनुमति दी गई। जब तक नया संविधान लागू नहीं हो जाता, तब तक इसी अधिनियम में आवश्यक संशोधन करके प्रशासन संचालित किया जाना था। यही कारण है कि स्वतंत्र भारत में 26 जनवरी 1950 तक शासन की संवैधानिक व्यवस्था मुख्यतः 1935 के अधिनियम पर आधारित रही।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम का एक अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान यह था कि ब्रिटिश संसद की विधायी सर्वोच्चता भारत और पाकिस्तान दोनों पर समाप्त हो जाएगी। अब दोनों अधिराज्यों की विधानसभाएँ तथा संविधान सभाएँ अपने-अपने देश के लिए स्वतंत्र रूप से कानून बना सकेंगी। इस प्रकार पहली बार भारतीय जनता को अपने शासन की पूर्ण विधायी स्वतंत्रता प्राप्त हुई।
अधिनियम के अनुसार दोनों अधिराज्यों में एक-एक गवर्नर जनरल नियुक्त किया जाना था। भारत में लॉर्ड माउंटबेटन स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल बने, जबकि पाकिस्तान में मोहम्मद अली जिन्ना ने प्रथम गवर्नर जनरल का पद संभाला। गवर्नर जनरल का कार्य सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को व्यवस्थित रूप से सम्पन्न कराना तथा प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखना था।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के साथ ही ब्रिटिश सम्राट की सर्वोच्च सत्ता (Paramountcy) समाप्त कर दी गई। इसका सबसे अधिक प्रभाव भारतीय रियासतों पर पड़ा। लगभग 565 देशी रियासतों पर ब्रिटिश सरकार की जो सर्वोच्च सत्ता थी, वह समाप्त हो गई। अब प्रत्येक रियासत को यह निर्णय लेना था कि वह भारत में विलय करेगी या पाकिस्तान में। यही प्रश्न आगे चलकर भारतीय एकीकरण की सबसे बड़ी चुनौती बन गया।
रियासतों के विलय का कार्य स्वतंत्र भारत के उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल तथा उनके सचिव वी. पी. मेनन के नेतृत्व में अत्यंत कुशलता के साथ सम्पन्न हुआ। अधिकांश रियासतों ने स्वेच्छा से भारत में विलय स्वीकार कर लिया। किंतु जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर जैसी कुछ रियासतों में विशेष राजनीतिक परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं, जिनका समाधान बाद में अलग-अलग तरीकों से किया गया। भारतीय राजनीतिक एकीकरण के इतिहास में सरदार पटेल का यह योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
भारत के विभाजन की प्रक्रिया केवल राजनीतिक निर्णय तक सीमित नहीं रही। इसके साथ ही मानव इतिहास का सबसे बड़ा जनसंख्या स्थानांतरण (Mass Migration) प्रारम्भ हुआ। लाखों हिंदू और सिख पश्चिमी पंजाब, सिंध तथा पूर्वी बंगाल से भारत की ओर आने लगे, जबकि लाखों मुसलमान भारत के विभिन्न भागों से पाकिस्तान की ओर जाने लगे। अनुमान है कि लगभग एक करोड़ से डेढ़ करोड़ लोगों ने सीमाएँ पार कीं। इतनी बड़ी संख्या में लोगों का कुछ ही महीनों में स्थानांतरण विश्व इतिहास की अभूतपूर्व घटना थी।
दुर्भाग्यवश यह स्थानांतरण शांतिपूर्ण नहीं रहा। पंजाब, बंगाल, दिल्ली तथा अनेक सीमावर्ती क्षेत्रों में भयानक सांप्रदायिक हिंसा फैल गई। हजारों गाँव नष्ट हो गए, लाखों लोग बेघर हो गए और बड़ी संख्या में महिलाओं तथा बच्चों को भी अत्यंत अमानवीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। विभिन्न इतिहासकारों के अनुसार विभाजन की हिंसा में लगभग पाँच लाख से दस लाख लोगों की मृत्यु हुई। यद्यपि सटीक संख्या आज भी विवाद का विषय है, किंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि यह आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदियों में से एक थी।
स्वतंत्रता के साथ-साथ भारत के सामने अनेक प्रशासनिक चुनौतियाँ भी उपस्थित हुईं। सेना, नौसेना, रेलवे, डाक विभाग, न्यायपालिका, वित्तीय संसाधन, सरकारी अभिलेख, मुद्रा भंडार तथा प्रशासनिक सेवाओं का विभाजन अत्यंत कठिन कार्य था। इसके अतिरिक्त लाखों शरणार्थियों के पुनर्वास, भोजन, आवास, रोजगार तथा सुरक्षा की व्यवस्था भी स्वतंत्र भारत की नई सरकार के सामने तत्कालीन सबसे बड़ी जिम्मेदारी बन गई।
इन कठिन परिस्थितियों के बीच 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। नई दिल्ली में ऐतिहासिक समारोह आयोजित किया गया। संविधान सभा के विशेष अधिवेशन में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपना प्रसिद्ध भाषण “नियति से साक्षात्कार” (Tryst with Destiny) दिया। इस भाषण में उन्होंने कहा कि सदियों की दासता के बाद भारत आज स्वतंत्रता प्राप्त कर रहा है और अब उसके सामने एक नए राष्ट्र के निर्माण की ऐतिहासिक जिम्मेदारी है। यह भाषण भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास का अमर दस्तावेज माना जाता है।
दूसरी ओर पाकिस्तान भी स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया। मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर जनरल के रूप में कार्यभार ग्रहण किया और नए राष्ट्र के निर्माण की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। इस प्रकार ब्रिटिश भारत दो स्वतंत्र राष्ट्रों—भारत और पाकिस्तान—में विभाजित हो गया।
यदि इस पूरी प्रक्रिया का ऐतिहासिक दृष्टि से मूल्यांकन किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि भारत की स्वतंत्रता और विभाजन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए थे। स्वतंत्रता ने भारतीय जनता को राजनीतिक स्वाधीनता प्रदान की, किंतु विभाजन ने करोड़ों लोगों को गहरा सामाजिक, आर्थिक और मानसिक आघात भी पहुँचाया। इसलिए 1947 का वर्ष भारतीय इतिहास में स्वतंत्रता का वर्ष भी है और विभाजन की पीड़ा का वर्ष भी।
इसी कारण इतिहासकारों का मत है कि भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 केवल सत्ता हस्तांतरण का कानून नहीं था, बल्कि उसने दक्षिण एशिया की राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दिशा को भी स्थायी रूप से बदल दिया। इसके परिणाम आज भी भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश की राजनीति तथा समाज में विभिन्न रूपों में दिखाई देते हैं।
अध्याय–4 : माउंटबेटन योजना (Mountbatten Plan, 1947)
भाग–4 : माउंटबेटन योजना एवं भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 का समग्र मूल्यांकन, इतिहासकारों की दृष्टि, आलोचनाएँ तथा निष्कर्ष
माउंटबेटन योजना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की सबसे निर्णायक संवैधानिक योजना थी। यदि 1858 से 1947 तक ब्रिटिश शासन के समस्त संवैधानिक विकास का अध्ययन किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि इस अवधि में अनेक आयोग, समितियाँ और अधिनियम अस्तित्व में आए, किंतु उनमें से कोई भी भारत की राजनीतिक समस्या का स्थायी समाधान प्रस्तुत नहीं कर सका। माउंटबेटन योजना पहली ऐसी योजना थी जिसने भारत में ब्रिटिश शासन की समाप्ति की निश्चित तिथि निर्धारित की और सत्ता हस्तांतरण की संपूर्ण प्रक्रिया को व्यावहारिक रूप प्रदान किया। इस दृष्टि से इसका ऐतिहासिक महत्व अत्यंत व्यापक है।
इस योजना की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि इसने भारत को औपनिवेशिक शासन से मुक्त कर दिया। लगभग दो सौ वर्षों तक ब्रिटिश शासन के अधीन रहने के बाद भारत ने स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में विश्व के समक्ष अपनी पहचान स्थापित की। 15 अगस्त 1947 केवल सत्ता परिवर्तन का दिन नहीं था, बल्कि भारतीय जनता के लंबे संघर्ष, त्याग और बलिदान की ऐतिहासिक विजय का प्रतीक था। इस प्रकार माउंटबेटन योजना भारतीय स्वतंत्रता की औपचारिक आधारशिला सिद्ध हुई।
दूसरी महत्वपूर्ण उपलब्धि यह थी कि इस योजना ने सत्ता हस्तांतरण को अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण और संवैधानिक रूप प्रदान किया। अनेक उपनिवेशों में स्वतंत्रता सशस्त्र संघर्ष और लंबे गृहयुद्ध के बाद प्राप्त हुई, जबकि भारत में ब्रिटिश संसद द्वारा अधिनियम पारित करके संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से सत्ता भारतीय नेताओं को सौंप दी गई। यद्यपि विभाजन के समय व्यापक हिंसा हुई, फिर भी सत्ता हस्तांतरण की संवैधानिक प्रक्रिया सुव्यवस्थित रही। प्रशासन, न्यायपालिका, सेना और नौकरशाही जैसी संस्थाओं का संचालन पूरी तरह ध्वस्त नहीं हुआ, बल्कि उनमें निरंतरता बनी रही।
माउंटबेटन योजना का तीसरा महत्वपूर्ण योगदान भारतीय संविधान के निर्माण से संबंधित है। इस योजना के अनुसार भारत की संविधान सभा को स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अधिकार मिला। स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद संविधान सभा किसी विदेशी सत्ता के नियंत्रण में नहीं रही। परिणामस्वरूप भारतीय संविधान पूर्णतः भारतीय परिस्थितियों, आवश्यकताओं और लोकतांत्रिक आदर्शों के अनुरूप तैयार किया गया। इस प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से माउंटबेटन योजना ने भारतीय गणराज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।
इसके अतिरिक्त इस योजना ने भारतीय रियासतों के एकीकरण का मार्ग भी खोला। ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त होने के बाद रियासतों के सामने भारत अथवा पाकिस्तान में विलय का विकल्प था। यद्यपि यह प्रक्रिया अत्यंत चुनौतीपूर्ण थी, फिर भी सरदार वल्लभभाई पटेल और वी. पी. मेनन के नेतृत्व में अधिकांश रियासतों का भारत में सफलतापूर्वक विलय हो गया। यदि माउंटबेटन योजना में ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त करने का प्रावधान न होता, तो भारत का राजनीतिक एकीकरण संभवतः इतना शीघ्र और सफल नहीं हो पाता।
इन महत्वपूर्ण उपलब्धियों के बावजूद माउंटबेटन योजना अनेक गंभीर आलोचनाओं का विषय भी रही है। इसकी सबसे बड़ी आलोचना यह है कि इसने भारत के विभाजन को स्वीकार किया। अनेक इतिहासकारों का मत है कि विभाजन भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतिक और मानवीय त्रासदी थी। इससे न केवल दो राष्ट्र बने, बल्कि करोड़ों लोगों का जीवन स्थायी रूप से प्रभावित हुआ। लाखों परिवार उजड़ गए, सांप्रदायिक वैमनस्य बढ़ा और भारत-पाकिस्तान संबंधों में स्थायी तनाव उत्पन्न हो गया।
दूसरी प्रमुख आलोचना योजना के अत्यधिक शीघ्र क्रियान्वयन को लेकर की जाती है। फरवरी 1947 में ब्रिटिश सरकार ने जून 1948 तक सत्ता हस्तांतरण की घोषणा की थी, किंतु माउंटबेटन ने इस समय-सीमा को घटाकर अगस्त 1947 कर दिया। इस कारण प्रशासनिक तैयारियों के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल सका। सीमाओं का निर्धारण, प्रशासन का विभाजन, सेना का पुनर्गठन तथा शरणार्थियों के पुनर्वास जैसी जटिल प्रक्रियाएँ अत्यंत कम समय में पूरी करनी पड़ीं, जिससे अनेक गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हुईं।
तीसरी आलोचना रेडक्लिफ सीमा आयोग के संबंध में की जाती है। सर सिरिल रेडक्लिफ को भारत की भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों का पूर्व अनुभव नहीं था। उन्हें केवल कुछ सप्ताह के भीतर पंजाब और बंगाल की सीमाएँ निर्धारित करनी पड़ीं। सीमांकन की अंतिम रिपोर्ट स्वतंत्रता के बाद सार्वजनिक की गई, जिसके कारण अनेक क्षेत्रों में भ्रम और असंतोष उत्पन्न हुआ। इसके परिणामस्वरूप व्यापक हिंसा, जनसंख्या का पलायन और सीमा विवाद सामने आए।
कुछ इतिहासकारों का मत है कि यदि सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित ढंग से संचालित की जाती और सीमाओं का निर्धारण पहले कर दिया जाता, तो विभाजन के समय होने वाली हिंसा को काफी हद तक रोका जा सकता था। इस आधार पर माउंटबेटन की प्रशासनिक नीति की आलोचना भी की जाती है।
इतिहासकार विपिन चंद्र का मत है कि विभाजन किसी एक व्यक्ति या एक योजना का परिणाम नहीं था। यह कई दशकों से विकसित हो रही राजनीतिक परिस्थितियों, सांप्रदायिक राजनीति, ब्रिटिश ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति तथा कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच बढ़ते अविश्वास का संयुक्त परिणाम था। उनके अनुसार माउंटबेटन योजना ने केवल उन परिस्थितियों को अंतिम संवैधानिक रूप प्रदान किया, जो पहले से विकसित हो चुकी थीं।
इतिहासकार आर. सी. अग्रवाल लिखते हैं कि माउंटबेटन योजना ने भारत को स्वतंत्रता तो दिलाई, किंतु उसके साथ विभाजन की ऐसी पीड़ा भी दी, जिसकी स्मृति आज भी भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में जीवित है। वहीं बी. एल. ग्रोवर के अनुसार यह योजना तत्कालीन परिस्थितियों में सबसे व्यावहारिक समाधान थी, क्योंकि उस समय संयुक्त भारत की संभावना लगभग समाप्त हो चुकी थी।
कुछ विद्वानों का मत है कि यदि कांग्रेस विभाजन स्वीकार न करती, तो भारत लंबे समय तक गृहयुद्ध, सांप्रदायिक हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता में फँस सकता था। दूसरी ओर कुछ इतिहासकार यह भी मानते हैं कि यदि कैबिनेट मिशन योजना को सफलतापूर्वक लागू किया जाता, तो विभाजन टाला जा सकता था। इस विषय पर इतिहासकारों में आज भी मतभेद विद्यमान हैं।
भारतीय राजनीतिक इतिहास के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि माउंटबेटन योजना एक द्वैध विरासत (Dual Legacy) छोड़कर गई। एक ओर इसने भारत को स्वतंत्रता प्रदान की, लोकतांत्रिक शासन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया, संविधान निर्माण को गति दी और आधुनिक भारतीय राष्ट्र-राज्य के निर्माण की प्रक्रिया प्रारम्भ की। दूसरी ओर इसने विभाजन, विस्थापन, सांप्रदायिक हिंसा तथा भारत-पाकिस्तान के दीर्घकालिक विवादों की भी नींव रखी।
स्वतंत्र भारत के निर्माण की प्रक्रिया में इस योजना का महत्व इसलिए भी विशेष है क्योंकि इसके बाद संविधान सभा ने पूर्ण स्वतंत्रता के वातावरण में अपना कार्य जारी रखा। 26 नवंबर 1949 को संविधान स्वीकार किया गया और 26 जनवरी 1950 को भारत एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य बन गया। इस प्रकार माउंटबेटन योजना ने औपनिवेशिक शासन से लोकतांत्रिक गणराज्य तक की ऐतिहासिक यात्रा का अंतिम संवैधानिक पुल तैयार किया।
निष्कर्ष
माउंटबेटन योजना भारतीय इतिहास का एक ऐसा अध्याय है जिसमें स्वतंत्रता का गौरव और विभाजन की वेदना दोनों समान रूप से समाहित हैं। इसने भारत को विदेशी शासन से मुक्ति दिलाई, परंतु उसी समय लाखों लोगों के जीवन में विस्थापन, हिंसा और असुरक्षा की पीड़ा भी उत्पन्न हुई। इसलिए इस योजना का मूल्यांकन केवल राजनीतिक दृष्टि से नहीं, बल्कि सामाजिक, मानवीय, प्रशासनिक और संवैधानिक दृष्टि से भी किया जाना चाहिए।
यदि भारतीय संविधान के विकास के क्रम को देखा जाए, तो नेहरू प्रतिवेदन (1928) से प्रारंभ होकर साइमन आयोग, गोलमेज सम्मेलन, सांप्रदायिक पुरस्कार, भारत शासन अधिनियम, 1935, अगस्त प्रस्ताव, क्रिप्स मिशन, कैबिनेट मिशन और अंततः माउंटबेटन योजना तक की पूरी संवैधानिक यात्रा स्वतंत्र भारत के संविधान के निर्माण की आधारभूमि सिद्ध हुई। इस संपूर्ण विकासक्रम को समझे बिना भारतीय संविधान और भारतीय लोकतंत्र की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को पूर्णतः समझना संभव नहीं है।
