International Relations

अंतरराष्ट्रीय संबंध

Course Code POL 307F A060602T Paper – 05

Unit-01 Definition. (परिभाषा)

परिभाषा किसी भी ज्ञान-विज्ञान, विचार, सिद्धांत, अवधारणा, वस्तु, घटना, प्रक्रिया अथवा संस्था को स्पष्ट, निश्चित और सीमित रूप में समझाने का माध्यम है। जब किसी शब्द, विषय या विचार का वास्तविक अर्थ, उसकी विशेषताएँ, उसकी सीमाएँ तथा अन्य समान अवधारणाओं से उसका अंतर स्पष्ट किया जाता है, तब उसे परिभाषा कहा जाता है। ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में अध्ययन की शुरुआत परिभाषा से होती है क्योंकि बिना स्पष्ट परिभाषा के किसी भी विषय की सही समझ विकसित नहीं हो सकती। परिभाषा किसी विषय की मूल पहचान प्रदान करती है और उसके अध्ययन की दिशा निर्धारित करती है। यही कारण है कि दर्शन, राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, इतिहास, विधि, मनोविज्ञान, विज्ञान तथा अन्य सभी विषयों में परिभाषा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।

मानव जीवन में भाषा का प्रमुख उद्देश्य विचारों का आदान-प्रदान करना है। यदि शब्दों के अर्थ निश्चित न हों तो संचार में भ्रम उत्पन्न हो जाएगा। परिभाषा इस भ्रम को समाप्त करती है और यह सुनिश्चित करती है कि किसी विशेष शब्द या अवधारणा को सभी लोग समान अर्थ में समझें। उदाहरण के लिए लोकतंत्र, राज्य, समाज, न्याय, स्वतंत्रता, समानता, संस्कृति, संविधान, विकास अथवा अधिकार जैसे शब्दों का सामान्य जीवन में अनेक अर्थ लगाए जा सकते हैं, किंतु राजनीति विज्ञान में इन सभी की विशिष्ट परिभाषाएँ हैं जो उनके अध्ययन को वैज्ञानिक और व्यवस्थित बनाती हैं। इसलिए परिभाषा ज्ञान को स्पष्टता और सुसंगतता प्रदान करती है।

परिभाषा का उद्देश्य केवल किसी शब्द का अर्थ बताना नहीं होता, बल्कि उसके स्वरूप, प्रकृति, सीमा और प्रयोजन को भी स्पष्ट करना होता है। किसी भी परिभाषा में यह बताया जाता है कि संबंधित विषय क्या है, उसकी मुख्य विशेषताएँ क्या हैं, वह किन तत्वों से मिलकर बना है तथा उसका उपयोग किस संदर्भ में किया जाता है। इस प्रकार परिभाषा किसी अवधारणा का संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित परिचय होती है। एक अच्छी परिभाषा में स्पष्टता, सरलता, सटीकता और तार्किकता का समन्वय होना चाहिए।

ज्ञान के विकास में परिभाषा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब किसी विषय का अध्ययन किया जाता है, तब सबसे पहले उसकी मूल अवधारणाओं को समझना आवश्यक होता है। यदि विद्यार्थी प्रारंभ से ही सही परिभाषा को समझ लेता है, तो उसके लिए आगे के सिद्धांत, व्याख्याएँ और विश्लेषण समझना सरल हो जाता है। इसके विपरीत यदि परिभाषा ही अस्पष्ट हो, तो पूरा अध्ययन भ्रमपूर्ण हो सकता है। इसलिए प्रत्येक शैक्षणिक अनुशासन में मूल अवधारणाओं की परिभाषाओं को विशेष महत्व दिया जाता है।

राजनीति विज्ञान में परिभाषाओं का विशेष महत्व है क्योंकि इस विषय में अनेक ऐसे शब्द प्रयुक्त होते हैं जिनके सामान्य और शैक्षणिक अर्थ अलग-अलग हो सकते हैं। उदाहरण के लिए राज्य और सरकार को सामान्य जीवन में प्रायः एक ही समझ लिया जाता है, जबकि राजनीति विज्ञान में दोनों की परिभाषाएँ भिन्न हैं। इसी प्रकार शक्ति, सत्ता, वैधता, अधिकार, नीति, प्रशासन और शासन जैसे शब्दों का भी विशिष्ट अर्थ होता है। इनकी स्पष्ट परिभाषा के बिना राजनीतिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं का सही अध्ययन संभव नहीं है।

समाजशास्त्र में परिवार, समुदाय, संस्कृति, समाजीकरण, सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक नियंत्रण जैसी अवधारणाओं की परिभाषाएँ सामाजिक जीवन को समझने का आधार बनती हैं। अर्थशास्त्र में उत्पादन, उपभोग, माँग, पूर्ति, पूँजी, आय और विकास जैसी अवधारणाओं की स्पष्ट परिभाषाएँ आर्थिक विश्लेषण की नींव हैं। इसी प्रकार विधि के क्षेत्र में अपराध, न्याय, अधिकार, दायित्व और संविधान की परिभाषाएँ कानूनी व्यवस्था को स्पष्ट करती हैं। विज्ञान में प्रत्येक सिद्धांत, नियम, पदार्थ और प्रक्रिया की सटीक परिभाषा आवश्यक होती है ताकि प्रयोग और अनुसंधान में एकरूपता बनी रहे।

परिभाषाएँ समय के साथ विकसित भी होती हैं। समाज, विज्ञान, तकनीक और ज्ञान के विकास के साथ अनेक अवधारणाओं के अर्थ विस्तृत या परिवर्तित हो जाते हैं। उदाहरण के लिए विकास की पारंपरिक परिभाषा केवल आर्थिक वृद्धि तक सीमित मानी जाती थी, जबकि आधुनिक समय में इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता और मानव विकास जैसे अनेक तत्व भी सम्मिलित कर लिए गए हैं। इसी प्रकार लोकतंत्र की अवधारणा भी केवल चुनाव तक सीमित न रहकर आज मानवाधिकार, नागरिक सहभागिता, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व जैसे व्यापक तत्वों को समाहित करती है। इससे स्पष्ट होता है कि परिभाषाएँ स्थिर नहीं होतीं, बल्कि ज्ञान और परिस्थितियों के अनुसार उनमें परिवर्तन और विस्तार होता रहता है।

दर्शनशास्त्र में परिभाषा का विशेष महत्व है क्योंकि दर्शन का उद्देश्य वस्तुओं और विचारों के मूल स्वरूप को समझना है। दार्शनिक किसी भी अवधारणा की परिभाषा केवल शब्दार्थ के आधार पर नहीं करते, बल्कि उसके अस्तित्व, उद्देश्य और वास्तविक स्वरूप का विश्लेषण भी करते हैं। इसलिए दर्शन में परिभाषाएँ प्रायः गहन और विचारोत्तेजक होती हैं। वे केवल तथ्य प्रस्तुत नहीं करतीं, बल्कि चिंतन और तर्क के लिए भी प्रेरित करती हैं।

परिभाषा का निर्माण करते समय कुछ सिद्धांतों का ध्यान रखना आवश्यक होता है। एक अच्छी परिभाषा सरल भाषा में होनी चाहिए ताकि उसे आसानी से समझा जा सके। उसमें अनावश्यक शब्दों का प्रयोग नहीं होना चाहिए। वह न तो अत्यधिक व्यापक हो और न ही अत्यधिक संकीर्ण। परिभाषा ऐसी होनी चाहिए जो संबंधित विषय की सभी आवश्यक विशेषताओं को समाहित करे, परंतु उससे असंबंधित तत्वों को शामिल न करे। उसमें अस्पष्टता, विरोधाभास और भ्रम की संभावना नहीं होनी चाहिए। यदि परिभाषा इन गुणों से युक्त हो, तो वह अध्ययन और अनुसंधान दोनों के लिए उपयोगी सिद्ध होती है।

शिक्षा के क्षेत्र में परिभाषा का महत्व अत्यधिक है। किसी भी विद्यार्थी के लिए नई अवधारणाओं को समझने का पहला चरण उनकी परिभाषा को जानना होता है। जब वह किसी विषय की स्पष्ट परिभाषा समझ लेता है, तब उसके लिए उस विषय के सिद्धांतों, उदाहरणों और व्यावहारिक पक्षों का अध्ययन करना सरल हो जाता है। इसी कारण पाठ्यपुस्तकों, शब्दकोशों, विश्वकोशों और शैक्षणिक पुस्तकों में प्रत्येक महत्वपूर्ण विषय की परिभाषा दी जाती है। परिभाषाएँ न केवल ज्ञान प्रदान करती हैं, बल्कि अध्ययन की दिशा भी निर्धारित करती हैं।

प्रशासनिक और कानूनी दृष्टि से भी परिभाषाओं का विशेष महत्व है। किसी कानून, नीति या नियम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए उसमें प्रयुक्त शब्दों की स्पष्ट परिभाषा आवश्यक होती है। यदि कानूनी शब्द अस्पष्ट हों, तो न्यायिक विवाद उत्पन्न हो सकते हैं और कानून का समान रूप से पालन करना कठिन हो जाता है। इसलिए संविधान, अधिनियमों और सरकारी नीतियों में अनेक महत्वपूर्ण शब्दों की स्पष्ट परिभाषाएँ दी जाती हैं। इससे प्रशासनिक कार्यों में पारदर्शिता और एकरूपता बनी रहती है।

अनुसंधान के क्षेत्र में भी परिभाषाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। कोई भी शोध तभी विश्वसनीय माना जाता है जब उसमें प्रयुक्त प्रमुख अवधारणाओं की स्पष्ट परिभाषा दी गई हो। इससे शोधकर्ता और पाठक दोनों यह समझ पाते हैं कि अध्ययन किस अर्थ में किया जा रहा है। यदि अवधारणाएँ स्पष्ट न हों, तो अनुसंधान के निष्कर्ष भी अस्पष्ट हो सकते हैं। इसलिए वैज्ञानिक अनुसंधान में कार्यपरक परिभाषाओं का विशेष महत्व होता है।

सामान्य जीवन में भी परिभाषाओं का अप्रत्यक्ष रूप से व्यापक उपयोग होता है। हम प्रतिदिन अनेक शब्दों और अवधारणाओं का प्रयोग करते हैं, जिनका अर्थ समाज द्वारा स्वीकार की गई परिभाषाओं पर आधारित होता है। भाषा की स्पष्टता, शिक्षा की गुणवत्ता, न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता, प्रशासन की दक्षता और वैज्ञानिक अनुसंधान की विश्वसनीयता—इन सभी का आधार सही और सटीक परिभाषाएँ हैं। परिभाषा विचारों को व्यवस्थित करती है, ज्ञान को स्पष्ट बनाती है और संवाद को प्रभावी बनाती है।

अंततः कहा जा सकता है कि परिभाषा किसी भी विषय के अध्ययन की आधारशिला है। यह केवल शब्दों का अर्थ बताने का साधन नहीं, बल्कि ज्ञान को व्यवस्थित, स्पष्ट, वैज्ञानिक और तार्किक बनाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। परिभाषा के माध्यम से किसी अवधारणा का वास्तविक स्वरूप, उसकी विशेषताएँ, उसकी सीमाएँ और उसका महत्व समझा जा सकता है। शिक्षा, दर्शन, राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, विज्ञान, विधि और प्रशासन सहित सभी ज्ञान क्षेत्रों में परिभाषा की केंद्रीय भूमिका है। इस प्रकार परिभाषा ज्ञानार्जन की प्रथम सीढ़ी, बौद्धिक स्पष्टता का आधार और वैज्ञानिक अध्ययन की अनिवार्य आवश्यकता मानी जाती है।

Nature & Scope of International politics. (अंतरराष्ट्रीय राजनीति का स्वरूप एवं क्षेत्र)

अंतरराष्ट्रीय राजनीति वह अध्ययन क्षेत्र है जिसमें विश्व के विभिन्न संप्रभु राज्यों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों, क्षेत्रीय संगठनों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, गैर-सरकारी संगठनों तथा अन्य वैश्विक शक्तियों के बीच होने वाले राजनीतिक, आर्थिक, सामरिक, कूटनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संबंधों का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। यह केवल राज्यों के बीच संघर्ष और युद्ध तक सीमित नहीं है, बल्कि सहयोग, शांति स्थापना, व्यापार, पर्यावरण संरक्षण, मानवाधिकार, विकास, वैश्विक शासन, तकनीकी परिवर्तन और अंतरराष्ट्रीय कानून जैसे अनेक विषयों को भी अपने भीतर समाहित करती है। आधुनिक युग में विश्व के देशों के बीच बढ़ती पारस्परिक निर्भरता के कारण अंतरराष्ट्रीय राजनीति का महत्व निरंतर बढ़ता गया है। आज कोई भी राष्ट्र पूर्णतः आत्मनिर्भर नहीं रह सकता, इसलिए प्रत्येक देश को अपनी सुरक्षा, आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति और वैश्विक प्रतिष्ठा के लिए अन्य देशों के साथ संबंध स्थापित करने पड़ते हैं। इन्हीं संबंधों की प्रकृति, दिशा और प्रभाव का अध्ययन अंतरराष्ट्रीय राजनीति का मुख्य उद्देश्य है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति का स्वरूप अत्यंत व्यापक, गतिशील और बहुआयामी है। यह स्थिर विषय नहीं है, बल्कि समय, परिस्थितियों और वैश्विक परिवर्तनों के अनुसार निरंतर विकसित होता रहता है। प्राचीन काल में अंतरराष्ट्रीय संबंध मुख्यतः युद्ध, साम्राज्य विस्तार और शक्ति संतुलन तक सीमित थे, किंतु आधुनिक युग में विज्ञान, प्रौद्योगिकी, संचार क्रांति, वैश्वीकरण, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और बहुपक्षीय संस्थाओं के विकास ने इसे अधिक जटिल और व्यापक बना दिया है। आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल सरकारों के बीच होने वाले निर्णयों का अध्ययन नहीं करती, बल्कि उन सभी वैश्विक प्रक्रियाओं का विश्लेषण करती है जो विश्व व्यवस्था को प्रभावित करती हैं।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण स्वरूप राज्यों के बीच संबंधों से संबंधित है। प्रत्येक राज्य अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक समृद्धि, राजनीतिक स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को सुरक्षित रखने का प्रयास करता है। इसी उद्देश्य से वह अन्य देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करता है, संधियाँ करता है, व्यापारिक समझौते करता है तथा आवश्यकता पड़ने पर अपनी सुरक्षा के लिए सैन्य सहयोग भी प्राप्त करता है। कभी-कभी विभिन्न देशों के हितों में टकराव होने पर विवाद, तनाव और युद्ध जैसी परिस्थितियाँ भी उत्पन्न हो जाती हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सहयोग और संघर्ष दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

राष्ट्रीय हित अंतरराष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख आधार माना जाता है। प्रत्येक देश अपनी विदेश नीति का निर्माण अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर करता है। राष्ट्रीय हितों में क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा, राजनीतिक स्वतंत्रता, आर्थिक विकास, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी उन्नति, समुद्री मार्गों की सुरक्षा तथा नागरिकों के हितों का संरक्षण सम्मिलित होता है। विभिन्न देशों के राष्ट्रीय हित कभी-कभी समान होते हैं, जिससे सहयोग बढ़ता है, जबकि अनेक बार वे परस्पर विरोधी होते हैं, जिससे संघर्ष की संभावना उत्पन्न होती है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति इन परिस्थितियों का विश्लेषण करके यह समझने का प्रयास करती है कि राष्ट्र अपने हितों की पूर्ति के लिए कौन-कौन से साधनों का उपयोग करते हैं।

शक्ति अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक केंद्रीय तत्व है। किसी भी राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय स्थिति उसके आर्थिक संसाधनों, सैन्य क्षमता, वैज्ञानिक उपलब्धियों, तकनीकी विकास, जनसंख्या, प्राकृतिक संसाधनों, राजनीतिक स्थिरता और कूटनीतिक दक्षता पर निर्भर करती है। शक्ति का उपयोग केवल युद्ध करने के लिए नहीं होता, बल्कि वार्ता, आर्थिक सहायता, सांस्कृतिक प्रभाव, व्यापारिक संबंधों और तकनीकी सहयोग के माध्यम से भी किया जाता है। आधुनिक समय में सॉफ्ट पावर अर्थात् संस्कृति, शिक्षा, विज्ञान, कला और नैतिक प्रभाव का महत्व भी अत्यधिक बढ़ गया है।

कूटनीति अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अत्यंत महत्वपूर्ण स्वरूप है। कूटनीति वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से विभिन्न देश आपसी वार्ता, समझौते, संवाद और सहयोग के द्वारा अपने संबंधों को संचालित करते हैं। कूटनीति का उद्देश्य केवल विवादों का समाधान करना नहीं, बल्कि दीर्घकालीन मैत्री, आर्थिक सहयोग, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और वैश्विक शांति को भी बढ़ावा देना है। राजदूत, दूतावास, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन और बहुपक्षीय वार्ताएँ कूटनीतिक प्रक्रिया के प्रमुख साधन हैं।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक अन्य महत्वपूर्ण स्वरूप अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भूमिका से संबंधित है। वर्तमान समय में अनेक वैश्विक और क्षेत्रीय संगठन विश्व शांति, आर्थिक सहयोग, मानवाधिकार संरक्षण, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण और विकास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। ये संगठन विभिन्न देशों के बीच संवाद स्थापित करते हैं, विवादों के समाधान में सहायता करते हैं तथा वैश्विक समस्याओं के लिए सामूहिक प्रयासों को प्रोत्साहित करते हैं। इस कारण अंतरराष्ट्रीय राजनीति अब केवल राज्यों तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि संस्थागत सहयोग का भी अध्ययन करती है।

वैश्वीकरण ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के स्वरूप को अत्यंत व्यापक बना दिया है। वस्तुओं, सेवाओं, पूँजी, तकनीक, सूचना और लोगों का सीमाओं के पार तेजी से आवागमन होने लगा है। इसका परिणाम यह हुआ कि किसी एक देश की आर्थिक या राजनीतिक घटना का प्रभाव दूसरे देशों पर भी पड़ने लगा। उदाहरण के लिए किसी बड़े देश में आर्थिक मंदी आने पर विश्व व्यापार प्रभावित हो सकता है, किसी क्षेत्र में युद्ध होने पर ऊर्जा संकट उत्पन्न हो सकता है अथवा किसी महामारी का प्रभाव संपूर्ण विश्व पर दिखाई दे सकता है। इसलिए आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति वैश्विक परस्पर निर्भरता का अध्ययन भी करती है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति का क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है। इसका पहला प्रमुख क्षेत्र राज्यों के बीच राजनीतिक संबंधों का अध्ययन है। इसमें विदेश नीति, कूटनीतिक संबंध, संधियाँ, युद्ध, शांति, शक्ति संतुलन, सुरक्षा व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय विवादों का विश्लेषण किया जाता है। दूसरा प्रमुख क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंधों का है, जिसमें वैश्विक व्यापार, विदेशी निवेश, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएँ, मुद्रा विनिमय, विकास सहयोग तथा आर्थिक प्रतिबंधों का अध्ययन किया जाता है। तीसरा क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय कानून से संबंधित है, जिसके अंतर्गत राज्यों के अधिकारों और दायित्वों, संधियों, समुद्री कानून, मानवाधिकार कानून तथा युद्ध संबंधी नियमों का अध्ययन किया जाता है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा है। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, सामूहिक सुरक्षा, सामरिक गठबंधन, परमाणु हथियार, आतंकवाद, साइबर सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा तथा सीमा विवादों का अध्ययन किया जाता है। आधुनिक समय में सुरक्षा की अवधारणा केवल सैन्य दृष्टिकोण तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, जल सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा और पर्यावरणीय सुरक्षा जैसे नए आयाम भी जुड़ गए हैं।

मानवाधिकार भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण अध्ययन क्षेत्र बन चुके हैं। विभिन्न देशों में नागरिक स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता, बाल अधिकार, शरणार्थियों की स्थिति तथा अल्पसंख्यकों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा होती है। अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए कार्य करती हैं और विभिन्न देशों की नीतियों का मूल्यांकन भी करती हैं।

पर्यावरण संरक्षण आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। जलवायु परिवर्तन, वैश्विक तापवृद्धि, जैव विविधता का संरक्षण, समुद्री प्रदूषण, वनों की रक्षा और सतत विकास जैसी समस्याएँ किसी एक देश तक सीमित नहीं हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए विभिन्न देशों को मिलकर कार्य करना पड़ता है। इसलिए पर्यावरणीय सहयोग और अंतरराष्ट्रीय समझौते आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण भाग बन गए हैं।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति का क्षेत्र विज्ञान और प्रौद्योगिकी तक भी विस्तृत हो चुका है। अंतरिक्ष अनुसंधान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर तकनीक, जैव प्रौद्योगिकी और डिजिटल संचार जैसे क्षेत्रों में विभिन्न देशों के बीच सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों देखने को मिलते हैं। इन नई तकनीकों ने वैश्विक शक्ति संतुलन, राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास को भी प्रभावित किया है।

सांस्कृतिक संबंध भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन का महत्वपूर्ण भाग हैं। विभिन्न देशों के बीच शिक्षा, साहित्य, कला, भाषा, पर्यटन, खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से संबंध स्थापित होते हैं। सांस्कृतिक सहयोग देशों के बीच विश्वास और मैत्री को मजबूत बनाता है तथा संघर्ष की संभावनाओं को कम करने में सहायता करता है। आज सांस्कृतिक कूटनीति अनेक देशों की विदेश नीति का महत्वपूर्ण अंग बन चुकी है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अध्ययन केवल सिद्धांतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका व्यावहारिक महत्व भी अत्यधिक है। यह नीति निर्माताओं को विदेश नीति तैयार करने में सहायता करता है, कूटनीतिज्ञों को अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को समझने में सक्षम बनाता है तथा नागरिकों को वैश्विक घटनाओं के प्रभाव का ज्ञान प्रदान करता है। यह विषय विद्यार्थियों में वैश्विक दृष्टिकोण, आलोचनात्मक चिंतन और विश्व समुदाय के प्रति उत्तरदायित्व की भावना का विकास करता है।

आधुनिक युग में अंतरराष्ट्रीय राजनीति का महत्व पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ गया है क्योंकि विश्व की अधिकांश समस्याएँ अब वैश्विक स्वरूप धारण कर चुकी हैं। महामारी, आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, आर्थिक संकट, साइबर अपराध, ऊर्जा सुरक्षा और प्रवासन जैसी समस्याओं का समाधान किसी एक राष्ट्र द्वारा संभव नहीं है। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग, संवाद और सामूहिक निर्णय आवश्यक हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल संघर्ष का अध्ययन नहीं, बल्कि सहयोग, समन्वय और वैश्विक शासन की प्रक्रिया को भी समझने का माध्यम है।

अंततः कहा जा सकता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति का स्वरूप व्यापक, परिवर्तनशील, बहुआयामी और गतिशील है तथा इसका क्षेत्र राज्यों के राजनीतिक संबंधों से लेकर वैश्विक अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, मानवाधिकार, पर्यावरण, विज्ञान, संस्कृति, अंतरराष्ट्रीय कानून और वैश्विक शासन तक विस्तृत है। यह विषय विश्व व्यवस्था की जटिलताओं को समझने, राष्ट्रों के बीच सहयोग और संघर्ष का विश्लेषण करने तथा वैश्विक शांति, विकास और मानव कल्याण के लिए आवश्यक नीतियों का अध्ययन करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। वर्तमान समय में जब विश्व पहले से अधिक परस्पर जुड़ा हुआ है, तब अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अध्ययन प्रत्येक विद्यार्थी, शोधकर्ता और नीति निर्माता के लिए अत्यंत आवश्यक और उपयोगी माना जाता है।

Approaches & Theories: Idealism, Realism. (उपागम एवं सिद्धांत : आदर्शवाद और यथार्थवाद)

अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन में उपागम और सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं क्योंकि इनके माध्यम से विभिन्न देशों के बीच होने वाले संबंधों, संघर्षों, सहयोग, शक्ति संतुलन, विदेश नीति तथा वैश्विक व्यवस्था को समझने का प्रयास किया जाता है। किसी भी विषय का वैज्ञानिक अध्ययन केवल घटनाओं का वर्णन करने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन घटनाओं के कारणों, स्वरूप, परिणामों और भविष्य की संभावनाओं का भी विश्लेषण करता है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अनेक उपागम और सिद्धांत विकसित हुए हैं, जिनमें आदर्शवाद और यथार्थवाद सबसे प्रमुख माने जाते हैं। दोनों सिद्धांत विश्व राजनीति की प्रकृति, राज्यों के व्यवहार, शांति और युद्ध के कारणों तथा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के संबंध में अलग-अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। इन दोनों के अध्ययन से यह समझ विकसित होती है कि विश्व राजनीति केवल शक्ति संघर्ष का क्षेत्र नहीं है और न ही केवल नैतिक आदर्शों पर आधारित है, बल्कि इन दोनों के बीच निरंतर संतुलन स्थापित करने का प्रयास भी चलता रहता है।

आदर्शवाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति का ऐसा सिद्धांत है जो मानव की नैतिक क्षमता, सहयोग की भावना और विश्व शांति की संभावना पर विश्वास करता है। इस सिद्धांत के अनुसार मनुष्य स्वभाव से केवल संघर्षशील नहीं होता, बल्कि उसमें सहयोग, सद्भाव, न्याय और नैतिकता की भावना भी विद्यमान होती है। यदि राष्ट्र पारस्परिक विश्वास, अंतरराष्ट्रीय कानून, कूटनीति, न्याय और सहयोग को महत्व दें, तो युद्धों को रोका जा सकता है तथा विश्व में स्थायी शांति स्थापित की जा सकती है। आदर्शवाद का विकास विशेष रूप से प्रथम विश्व युद्ध के बाद हुआ, जब विश्व के अनेक विचारकों और नेताओं ने यह अनुभव किया कि युद्ध मानवता के लिए अत्यंत विनाशकारी है और भविष्य में ऐसी परिस्थितियों को रोकने के लिए नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का निर्माण आवश्यक है।

आदर्शवादी विचारधारा का मूल आधार यह है कि अंतरराष्ट्रीय संबंध केवल शक्ति और सैन्य क्षमता पर आधारित नहीं होने चाहिए, बल्कि नैतिक मूल्यों और न्यायपूर्ण सिद्धांतों पर भी आधारित होने चाहिए। इसके अनुसार प्रत्येक राष्ट्र को अन्य राष्ट्रों की संप्रभुता, स्वतंत्रता और अधिकारों का सम्मान करना चाहिए। युद्ध के स्थान पर वार्ता, मध्यस्थता, पंचनिर्णय और अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों के माध्यम से विवादों का समाधान किया जाना चाहिए। आदर्शवाद का विश्वास है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ विश्व शांति बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

आदर्शवाद अंतरराष्ट्रीय कानून के महत्व पर विशेष बल देता है। इसके अनुसार यदि सभी राष्ट्र समान रूप से अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करें, तो विश्व व्यवस्था अधिक स्थिर और सुरक्षित बन सकती है। अंतरराष्ट्रीय संधियाँ, समझौते और संगठन राज्यों के व्यवहार को नियंत्रित करने में सहायता करते हैं। इसी कारण आदर्शवादी विचारधारा संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठनों की स्थापना और उनकी भूमिका का समर्थन करती है। उनका विश्वास है कि सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था युद्ध की संभावनाओं को कम कर सकती है।

आदर्शवाद का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष मानवता की एकता की अवधारणा है। इस दृष्टिकोण के अनुसार सभी मनुष्य समान हैं और विश्व को एक बड़े परिवार के रूप में देखा जाना चाहिए। राष्ट्रों के बीच सहयोग केवल राजनीतिक आवश्यकता नहीं, बल्कि नैतिक दायित्व भी है। आर्थिक विकास, पर्यावरण संरक्षण, मानवाधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य और विज्ञान जैसे क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग से संपूर्ण मानव समाज का कल्याण संभव है। इस प्रकार आदर्शवाद विश्वबंधुत्व और वैश्विक सहयोग की भावना को प्रोत्साहित करता है।

यद्यपि आदर्शवाद के अनेक सकारात्मक पक्ष हैं, फिर भी इसकी आलोचना भी की जाती है। आलोचकों का मत है कि यह सिद्धांत मानव स्वभाव और अंतरराष्ट्रीय राजनीति की वास्तविक परिस्थितियों को अत्यधिक आदर्शवादी दृष्टि से देखता है। सभी राष्ट्र सदैव नैतिक आधार पर निर्णय नहीं लेते, बल्कि अनेक बार अपने राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं। इसलिए केवल नैतिक अपीलों के आधार पर अंतरराष्ट्रीय संबंधों को संचालित करना व्यावहारिक नहीं माना जाता।

यथार्थवाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति का दूसरा प्रमुख सिद्धांत है। यह सिद्धांत आदर्शवाद की अपेक्षा अधिक व्यावहारिक और अनुभव आधारित माना जाता है। यथार्थवाद का मूल विश्वास यह है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख आधार शक्ति और राष्ट्रीय हित हैं। प्रत्येक राज्य का पहला उद्देश्य अपनी सुरक्षा, स्वतंत्रता और अस्तित्व की रक्षा करना होता है। इस कारण विभिन्न राष्ट्र अपने हितों की पूर्ति के लिए शक्ति अर्जित करने का प्रयास करते हैं। यथार्थवाद के अनुसार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में कोई सर्वोच्च विश्व सरकार नहीं होती जो सभी राज्यों को नियंत्रित कर सके। इसलिए प्रत्येक राष्ट्र को अपनी सुरक्षा स्वयं सुनिश्चित करनी पड़ती है।

यथार्थवादी विचारधारा के अनुसार मानव स्वभाव स्वार्थपूर्ण और प्रतिस्पर्धात्मक है। यही प्रवृत्ति राज्यों के व्यवहार में भी दिखाई देती है। जब प्रत्येक राष्ट्र अपने हितों की रक्षा के लिए कार्य करता है, तब अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती है। इस दृष्टिकोण के अनुसार युद्ध, संघर्ष और प्रतिस्पर्धा अंतरराष्ट्रीय जीवन के स्वाभाविक अंग हैं। इसलिए किसी भी राष्ट्र को केवल नैतिक आदर्शों पर निर्भर रहने के बजाय अपनी सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक शक्ति को सुदृढ़ करना चाहिए।

राष्ट्रीय हित यथार्थवाद का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है। प्रत्येक देश अपनी विदेश नीति का निर्माण अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर करता है। यदि किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते से राष्ट्र के हितों की रक्षा होती है, तो वह उसमें भाग लेता है, अन्यथा उससे दूरी बना सकता है। यथार्थवाद के अनुसार नैतिकता महत्वपूर्ण हो सकती है, किंतु राष्ट्रीय सुरक्षा और अस्तित्व उससे भी अधिक महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विदेश नीति का मूल्यांकन आदर्शों के बजाय राष्ट्रीय हितों की दृष्टि से किया जाना चाहिए।

यथार्थवाद शक्ति संतुलन की अवधारणा को भी विशेष महत्व देता है। यदि किसी एक राष्ट्र की शक्ति अत्यधिक बढ़ जाती है, तो अन्य राष्ट्र उसके प्रभाव को संतुलित करने के लिए गठबंधन बना सकते हैं। इस प्रकार शक्ति संतुलन युद्ध की संभावना को कम करने और किसी एक राष्ट्र के प्रभुत्व को रोकने का साधन माना जाता है। इतिहास में अनेक अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों और सामरिक समझौतों को इसी दृष्टिकोण से समझा जाता है।

यथार्थवाद अंतरराष्ट्रीय संगठनों के महत्व को पूरी तरह अस्वीकार नहीं करता, किंतु उनका प्रभाव सीमित मानता है। उसके अनुसार संयुक्त राष्ट्र या अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ तभी प्रभावी हो सकती हैं जब शक्तिशाली राष्ट्र उनका समर्थन करें। यदि किसी राष्ट्र के मूल राष्ट्रीय हित प्रभावित होते हैं, तो वह अंतरराष्ट्रीय नियमों की उपेक्षा भी कर सकता है। इसलिए यथार्थवादी विचारधारा शक्ति को अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अंतिम निर्धारक मानती है।

यथार्थवाद की भी आलोचना की जाती है। आलोचकों का मत है कि यह सिद्धांत सहयोग, नैतिकता, मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका को अपेक्षाकृत कम महत्व देता है। आधुनिक विश्व में अनेक समस्याएँ जैसे जलवायु परिवर्तन, महामारी, आतंकवाद, साइबर अपराध और आर्थिक संकट केवल शक्ति के माध्यम से हल नहीं की जा सकतीं। इनके समाधान के लिए सहयोग और सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं। इसलिए केवल शक्ति आधारित दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं माना जाता।

आदर्शवाद और यथार्थवाद दोनों के बीच अनेक महत्वपूर्ण अंतर हैं। आदर्शवाद मानव स्वभाव को मूलतः सहयोगी और नैतिक मानता है, जबकि यथार्थवाद उसे स्वार्थी और प्रतिस्पर्धात्मक मानता है। आदर्शवाद विश्व शांति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर बल देता है, जबकि यथार्थवाद राष्ट्रीय सुरक्षा और शक्ति को प्राथमिकता देता है। आदर्शवाद अंतरराष्ट्रीय कानून और संगठनों में विश्वास करता है, जबकि यथार्थवाद उनकी प्रभावशीलता को राज्यों की शक्ति और हितों पर निर्भर मानता है। आदर्शवाद नैतिकता को विदेश नीति का आधार मानता है, जबकि यथार्थवाद राष्ट्रीय हित को सर्वोच्च स्थान देता है। इन दोनों दृष्टिकोणों के अंतर के बावजूद दोनों का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय राजनीति को समझना और उसकी व्याख्या करना है।

वर्तमान समय की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इन दोनों सिद्धांतों का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। जब विभिन्न देश जलवायु परिवर्तन, वैश्विक स्वास्थ्य, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, मानवाधिकार और सतत विकास जैसे विषयों पर मिलकर कार्य करते हैं, तब आदर्शवादी दृष्टिकोण की झलक मिलती है। दूसरी ओर जब राष्ट्र अपनी सीमाओं की सुरक्षा, सैन्य शक्ति, सामरिक गठबंधन, परमाणु नीति और आर्थिक हितों को प्राथमिकता देते हैं, तब यथार्थवादी दृष्टिकोण अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। वास्तव में आधुनिक विश्व राजनीति में दोनों सिद्धांतों के तत्व एक साथ कार्य करते हैं।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन में इन दोनों सिद्धांतों का महत्व इसलिए भी है क्योंकि ये विद्यार्थियों को विभिन्न दृष्टिकोणों से विश्व घटनाओं का विश्लेषण करना सिखाते हैं। किसी भी युद्ध, संधि, अंतरराष्ट्रीय संगठन, आर्थिक समझौते या विदेश नीति को समझने के लिए केवल एक दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं होता। अनेक बार किसी घटना में राष्ट्रीय हित और नैतिकता दोनों की भूमिका होती है। इसलिए राजनीति विज्ञान का अध्ययन संतुलित दृष्टिकोण विकसित करने पर बल देता है।

आज के वैश्वीकरण के युग में जब विश्व पहले की अपेक्षा अधिक परस्पर जुड़ा हुआ है, तब अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति और सहयोग दोनों की आवश्यकता बनी हुई है। कोई भी राष्ट्र केवल सैन्य शक्ति के आधार पर दीर्घकालीन विकास प्राप्त नहीं कर सकता और न ही केवल आदर्शों के आधार पर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है। इसलिए आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों में व्यावहारिकता और नैतिकता, राष्ट्रीय हित और वैश्विक सहयोग, शक्ति और कानून—इन सभी के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया जाता है।

अंततः कहा जा सकता है कि आदर्शवाद और यथार्थवाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति के दो मूलभूत और प्रभावशाली सिद्धांत हैं। आदर्शवाद विश्व शांति, नैतिकता, सहयोग, अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवता के आदर्शों को महत्व देता है, जबकि यथार्थवाद शक्ति, राष्ट्रीय हित, सुरक्षा और व्यावहारिक राजनीति को अंतरराष्ट्रीय संबंधों का आधार मानता है। दोनों सिद्धांतों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन को समृद्ध बनाया है और विश्व व्यवस्था की विभिन्न घटनाओं को समझने के लिए महत्वपूर्ण वैचारिक आधार प्रदान किया है। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति को सही रूप में समझने के लिए इन दोनों दृष्टिकोणों का संतुलित अध्ययन आवश्यक है, क्योंकि वास्तविक विश्व व्यवस्था में आदर्श और यथार्थ दोनों एक साथ कार्य करते हैं।

Neo Realism. (नव-यथार्थवाद)

नव-यथार्थवाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण आधुनिक सिद्धांत है, जिसका विकास पारंपरिक यथार्थवाद की सीमाओं को दूर करने तथा अंतरराष्ट्रीय संबंधों का अधिक वैज्ञानिक और संरचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करने के उद्देश्य से किया गया। इसे संरचनात्मक यथार्थवाद भी कहा जाता है। इस सिद्धांत का सर्वाधिक व्यवस्थित प्रतिपादन अमेरिकी विद्वान केनेथ वाल्ट्ज ने अपनी प्रसिद्ध कृति Theory of International Politics के माध्यम से किया। नव-यथार्थवाद का मुख्य उद्देश्य यह स्पष्ट करना था कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में राज्यों का व्यवहार केवल मानव स्वभाव या नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से निर्धारित नहीं होता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की संरचना स्वयं राज्यों को एक विशेष प्रकार का व्यवहार अपनाने के लिए प्रेरित करती है। इस प्रकार नव-यथार्थवाद ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन को अधिक व्यवस्थित, विश्लेषणात्मक और वैज्ञानिक आधार प्रदान किया।

पारंपरिक यथार्थवाद का मत था कि मनुष्य स्वभाव से स्वार्थी, प्रतिस्पर्धी और शक्ति प्राप्त करने की इच्छा रखने वाला प्राणी है, इसलिए राज्य भी शक्ति के लिए संघर्ष करते हैं। नव-यथार्थवाद इस विचार को पूर्णतः अस्वीकार नहीं करता, किंतु वह संघर्ष का मुख्य कारण मानव स्वभाव के बजाय अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की प्रकृति को मानता है। उसके अनुसार विश्व में कोई ऐसी सर्वोच्च राजनीतिक सत्ता नहीं है जो सभी राज्यों को नियंत्रित कर सके। इस स्थिति को अराजकता कहा जाता है। यहाँ अराजकता का अर्थ अव्यवस्था या अराजक जीवन नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था से है जिसमें कोई विश्व सरकार नहीं होती। प्रत्येक राष्ट्र अपनी सुरक्षा और अस्तित्व की रक्षा के लिए स्वयं उत्तरदायी होता है। यही परिस्थिति राज्यों को शक्ति प्राप्त करने और अपनी सुरक्षा बढ़ाने के लिए प्रेरित करती है।

नव-यथार्थवाद के अनुसार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण तत्व उसकी संरचना है। यह संरचना दो प्रमुख विशेषताओं पर आधारित होती है। पहली, विश्व व्यवस्था अराजकतापूर्ण है क्योंकि राज्यों के ऊपर कोई सर्वोच्च राजनीतिक प्राधिकरण नहीं है। दूसरी, सभी राज्य औपचारिक रूप से समान संप्रभु इकाइयाँ हैं, किंतु उनकी शक्ति, संसाधनों, सैन्य क्षमता, तकनीकी विकास और आर्थिक सामर्थ्य में अंतर होता है। यही शक्ति का असमान वितरण विश्व राजनीति की दिशा निर्धारित करता है। इसलिए नव-यथार्थवाद राज्यों के व्यवहार की व्याख्या उनके आंतरिक गुणों के बजाय अंतरराष्ट्रीय संरचना के आधार पर करता है।

नव-यथार्थवाद में राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च महत्व दिया गया है। प्रत्येक राज्य का प्रथम उद्देश्य अपने अस्तित्व की रक्षा करना होता है। यदि कोई राष्ट्र अपनी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पाता, तो उसके अन्य सभी लक्ष्य गौण हो जाते हैं। इसलिए राज्य अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाते हैं, आधुनिक तकनीक विकसित करते हैं, आर्थिक संसाधनों को मजबूत बनाते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर अन्य देशों के साथ सामरिक गठबंधन भी स्थापित करते हैं। इस दृष्टिकोण में शक्ति स्वयं में अंतिम लक्ष्य नहीं है, बल्कि सुरक्षा प्राप्त करने का प्रमुख साधन है।

नव-यथार्थवाद का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत आत्म-सहायता की अवधारणा है। इसका अर्थ है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में कोई भी राष्ट्र अपनी सुरक्षा के लिए पूर्णतः दूसरे देशों या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर निर्भर नहीं रह सकता। प्रत्येक राज्य को अपनी रक्षा की व्यवस्था स्वयं करनी पड़ती है। यदि कोई राष्ट्र अत्यधिक निर्भर हो जाता है, तो संकट की स्थिति में उसकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। इसलिए आत्मनिर्भर सुरक्षा व्यवस्था नव-यथार्थवाद की प्रमुख विशेषता मानी जाती है।

शक्ति संतुलन की अवधारणा नव-यथार्थवाद में अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब किसी एक राष्ट्र की शक्ति अत्यधिक बढ़ने लगती है और वह अन्य राज्यों के लिए संभावित खतरा बन जाता है, तब अन्य राष्ट्र उसके प्रभाव को संतुलित करने के लिए गठबंधन बनाते हैं या अपनी शक्ति बढ़ाने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार शक्ति संतुलन अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में स्थिरता बनाए रखने का साधन बन जाता है। नव-यथार्थवाद के अनुसार इतिहास में अनेक सैन्य गठबंधनों और सामरिक समझौतों को इसी दृष्टि से समझा जा सकता है।

नव-यथार्थवाद यह भी मानता है कि राज्यों के बीच सहयोग संभव है, किंतु यह सहयोग सीमित और परिस्थितिजन्य होता है। यदि सहयोग से राष्ट्रीय हितों की पूर्ति होती है, तो राज्य उसमें भाग लेते हैं। यदि सहयोग से किसी अन्य राष्ट्र की शक्ति अत्यधिक बढ़ने की संभावना हो, तो राज्य सावधानी बरतते हैं। इसीलिए नव-यथार्थवाद सापेक्ष लाभ की अवधारणा पर बल देता है। इसका अर्थ है कि कोई राष्ट्र केवल यह नहीं देखता कि उसे कितना लाभ होगा, बल्कि यह भी देखता है कि दूसरे राष्ट्र को उससे अधिक लाभ तो नहीं मिल रहा। यदि प्रतिद्वंद्वी राष्ट्र अधिक लाभ प्राप्त करता है, तो भविष्य में वह अधिक शक्तिशाली बन सकता है, जिससे शक्ति संतुलन प्रभावित हो सकता है।

नव-यथार्थवाद के अनुसार अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका सीमित होती है। संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन अथवा अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ संवाद और सहयोग को बढ़ावा दे सकती हैं, परंतु वे राज्यों के मूल राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा संबंधी निर्णयों को पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकतीं। जब किसी राष्ट्र की सुरक्षा या अस्तित्व का प्रश्न सामने आता है, तब वह अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है। इसलिए नव-यथार्थवादी विचारक मानते हैं कि विश्व राजनीति में अंतिम निर्णय शक्ति और राष्ट्रीय हितों से प्रभावित होते हैं।

नव-यथार्थवाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में द्विध्रुवीय, एकध्रुवीय और बहुध्रुवीय शक्ति संरचनाओं का भी अध्ययन करता है। यदि विश्व में दो महाशक्तियाँ हों तो उसे द्विध्रुवीय व्यवस्था कहा जाता है। यदि एक ही महाशक्ति का प्रभुत्व हो तो वह एकध्रुवीय व्यवस्था होती है और यदि अनेक शक्तिशाली राष्ट्र हों तो उसे बहुध्रुवीय व्यवस्था कहा जाता है। नव-यथार्थवाद का मत है कि इन विभिन्न संरचनाओं के अनुसार राज्यों का व्यवहार बदलता है। उदाहरण के लिए शीत युद्ध के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के बीच द्विध्रुवीय व्यवस्था थी, जिसने विश्व राजनीति को कई दशकों तक प्रभावित किया।

विदेश नीति के अध्ययन में भी नव-यथार्थवाद का महत्वपूर्ण योगदान है। इस सिद्धांत के अनुसार किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति का निर्माण केवल उसके नेताओं की इच्छाओं से नहीं होता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन, सुरक्षा संबंधी चुनौतियों, आर्थिक परिस्थितियों और वैश्विक संरचना से प्रभावित होता है। इसलिए विभिन्न देशों की विदेश नीतियों का विश्लेषण करते समय उनके आंतरिक कारकों के साथ-साथ बाहरी संरचनात्मक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

नव-यथार्थवाद का आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में व्यापक उपयोग होता है। परमाणु हथियारों की होड़, सामरिक गठबंधनों का निर्माण, समुद्री सुरक्षा, सीमाई विवाद, सैन्य आधुनिकीकरण, रक्षा बजट में वृद्धि तथा महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा जैसी घटनाओं को समझने में यह सिद्धांत अत्यंत उपयोगी माना जाता है। वर्तमान समय में विभिन्न देशों द्वारा अपनी रक्षा क्षमता को मजबूत करना, नई सैन्य तकनीकों का विकास करना और रणनीतिक साझेदारियाँ स्थापित करना नव-यथार्थवादी दृष्टिकोण के अनुरूप माना जाता है।

यद्यपि नव-यथार्थवाद अत्यंत प्रभावशाली सिद्धांत है, फिर भी इसकी आलोचना भी की जाती है। आलोचकों का मत है कि यह सिद्धांत आर्थिक सहयोग, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, वैश्विक संस्थाओं, पर्यावरणीय समस्याओं, मानवाधिकारों तथा सांस्कृतिक संबंधों को अपेक्षाकृत कम महत्व देता है। आज के वैश्वीकरण के युग में अनेक समस्याएँ केवल शक्ति के माध्यम से हल नहीं की जा सकतीं। जलवायु परिवर्तन, महामारी, साइबर अपराध, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकट तथा सतत विकास जैसे विषयों में सहयोग अधिक महत्वपूर्ण होता है। इसलिए केवल संरचनात्मक शक्ति विश्लेषण आधुनिक विश्व की सभी जटिलताओं की पूर्ण व्याख्या नहीं कर सकता।

उदारवादी और नव-उदारवादी विचारकों का मत है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ, आर्थिक परस्पर निर्भरता और लोकतांत्रिक शासन राज्यों के बीच सहयोग को बढ़ा सकते हैं। वहीं निर्माणवादी विचारक यह तर्क देते हैं कि केवल शक्ति और संरचना ही राज्यों के व्यवहार को निर्धारित नहीं करती, बल्कि विचार, पहचान, संस्कृति और सामाजिक मान्यताएँ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसके बावजूद नव-यथार्थवाद आज भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली सिद्धांतों में गिना जाता है क्योंकि यह शक्ति, सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संरचना के बीच गहरे संबंधों की प्रभावी व्याख्या प्रस्तुत करता है।

समकालीन विश्व व्यवस्था में जब महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा, क्षेत्रीय संघर्ष, सामरिक गठबंधन, ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री मार्गों का नियंत्रण और तकनीकी प्रभुत्व जैसे विषय महत्वपूर्ण बने हुए हैं, तब नव-यथार्थवाद की प्रासंगिकता और अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। अनेक राष्ट्र आज भी अपनी विदेश नीति का निर्माण करते समय राष्ट्रीय सुरक्षा, सामरिक संतुलन और शक्ति संरचना को प्राथमिकता देते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि नव-यथार्थवादी दृष्टिकोण केवल सैद्धांतिक महत्व नहीं रखता, बल्कि व्यवहारिक राजनीति में भी उसका व्यापक प्रभाव है।

अंततः कहा जा सकता है कि नव-यथार्थवाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक वैज्ञानिक, संरचनात्मक और प्रभावशाली सिद्धांत है, जिसने पारंपरिक यथार्थवाद को नया आयाम प्रदान किया। यह सिद्धांत स्पष्ट करता है कि विश्व राजनीति में राज्यों का व्यवहार मुख्यतः अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की अराजकतापूर्ण संरचना, राष्ट्रीय सुरक्षा की आवश्यकता, शक्ति संतुलन और आत्म-सहायता की प्रवृत्ति से प्रभावित होता है। यद्यपि इसकी कुछ सीमाएँ हैं, फिर भी शक्ति, सुरक्षा, विदेश नीति, सामरिक प्रतिस्पर्धा और वैश्विक शक्ति संरचना को समझने के लिए यह आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों में से एक माना जाता है।

Decision-Making. (निर्णय-निर्माण)

निर्णय-निर्माण वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से किसी व्यक्ति, समूह, संस्था, सरकार अथवा राज्य द्वारा उपलब्ध विकल्पों में से किसी एक उपयुक्त विकल्प का चयन किया जाता है ताकि निर्धारित उद्देश्य की प्राप्ति की जा सके। राजनीति विज्ञान, लोक प्रशासन तथा अंतरराष्ट्रीय राजनीति में निर्णय-निर्माण की अवधारणा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि शासन, प्रशासन, विदेश नीति, सुरक्षा, आर्थिक विकास तथा सामाजिक कल्याण से संबंधित सभी कार्य अंततः निर्णयों पर आधारित होते हैं। किसी भी राजनीतिक व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके निर्णय कितने विवेकपूर्ण, समयानुकूल, तथ्यपरक तथा जनहितकारी हैं। निर्णय केवल किसी एक व्यक्ति की इच्छा का परिणाम नहीं होते, बल्कि वे अनेक सूचनाओं, परिस्थितियों, विकल्पों, संसाधनों, हितों, अनुभवों और संभावित परिणामों के विश्लेषण के बाद लिए जाते हैं। इस कारण निर्णय-निर्माण को एक वैज्ञानिक, बौद्धिक तथा व्यावहारिक प्रक्रिया माना जाता है।

मानव जीवन का प्रत्येक क्षेत्र निर्णयों से जुड़ा हुआ है। व्यक्ति अपने व्यक्तिगत जीवन में शिक्षा, रोजगार, विवाह, व्यवसाय तथा सामाजिक संबंधों से संबंधित अनेक निर्णय लेता है। इसी प्रकार सरकारें आर्थिक नीतियाँ बनाती हैं, कानून तैयार करती हैं, योजनाएँ लागू करती हैं तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े निर्णय लेती हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विभिन्न राष्ट्र अपनी विदेश नीति, सैन्य रणनीति, व्यापारिक समझौते तथा कूटनीतिक संबंधों से संबंधित निर्णय लेते हैं। इस प्रकार निर्णय-निर्माण व्यक्तिगत, सामाजिक, प्रशासनिक, राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय जीवन का आधार है।

राजनीति विज्ञान में निर्णय-निर्माण का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि राज्य की समस्त गतिविधियाँ निर्णयों के माध्यम से संचालित होती हैं। संसद कानून बनाने का निर्णय करती है, मंत्रिपरिषद नीतियों को स्वीकृति देती है, न्यायपालिका न्यायिक निर्णय प्रदान करती है तथा प्रशासनिक अधिकारी सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन से संबंधित निर्णय लेते हैं। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में निर्णय-निर्माण केवल शासकों का कार्य नहीं होता, बल्कि इसमें जनता, राजनीतिक दलों, दबाव समूहों, विशेषज्ञों, मीडिया और नागरिक समाज का भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव होता है। इसलिए आधुनिक लोकतंत्र में निर्णय-निर्माण को सहभागी प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है।

निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया सामान्यतः किसी समस्या की पहचान से प्रारंभ होती है। जब किसी सरकार या संस्था के सामने कोई चुनौती या आवश्यकता उत्पन्न होती है, तब सबसे पहले उस समस्या का स्वरूप समझा जाता है। इसके बाद उससे संबंधित सूचनाएँ और तथ्य एकत्र किए जाते हैं। उपलब्ध विकल्पों का विश्लेषण किया जाता है तथा प्रत्येक विकल्प के लाभ, हानि, लागत, व्यवहारिकता और संभावित परिणामों का मूल्यांकन किया जाता है। इसके पश्चात सबसे उपयुक्त विकल्प का चयन किया जाता है और उसे लागू करने की योजना बनाई जाती है। निर्णय लागू होने के बाद उसके परिणामों का मूल्यांकन भी किया जाता है ताकि आवश्यकता पड़ने पर उसमें सुधार किया जा सके। इस प्रकार निर्णय-निर्माण एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।

तथ्यों और सूचनाओं का निर्णय-निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान होता है। यदि निर्णय सही और विश्वसनीय जानकारी के आधार पर लिया जाए तो उसके सफल होने की संभावना अधिक होती है। इसके विपरीत अपूर्ण, गलत या पक्षपातपूर्ण सूचनाओं के आधार पर लिया गया निर्णय अनेक समस्याएँ उत्पन्न कर सकता है। इसलिए आधुनिक शासन व्यवस्था में आँकड़ों का संग्रह, शोध, सर्वेक्षण, विशेषज्ञों की राय तथा वैज्ञानिक विश्लेषण को विशेष महत्व दिया जाता है। सूचना प्रौद्योगिकी के विकास ने भी निर्णय-निर्माण को अधिक प्रभावी और त्वरित बनाया है।

निर्णय-निर्माण को प्रभावित करने वाले अनेक कारक होते हैं। राष्ट्रीय हित, आर्थिक संसाधन, राजनीतिक परिस्थितियाँ, सामाजिक अपेक्षाएँ, सांस्कृतिक मूल्य, प्रशासनिक क्षमता, उपलब्ध समय, कानूनी प्रावधान तथा अंतरराष्ट्रीय वातावरण निर्णयों की दिशा को प्रभावित करते हैं। किसी भी सरकार को निर्णय लेते समय इन सभी कारकों का संतुलित मूल्यांकन करना पड़ता है। उदाहरण के लिए आर्थिक नीति बनाते समय केवल आर्थिक लाभ ही नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, रोजगार, पर्यावरण संरक्षण और दीर्घकालीन विकास को भी ध्यान में रखना आवश्यक होता है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में निर्णय-निर्माण का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है क्योंकि यहाँ लिए गए निर्णय केवल एक देश को नहीं, बल्कि अनेक देशों और कभी-कभी पूरे विश्व को प्रभावित कर सकते हैं। किसी देश की विदेश नीति, युद्ध अथवा शांति का निर्णय, अंतरराष्ट्रीय संधियों पर हस्ताक्षर, आर्थिक प्रतिबंध, व्यापारिक समझौते या अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भागीदारी जैसे निर्णय वैश्विक राजनीति की दिशा बदल सकते हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय निर्णय-निर्माण में अत्यधिक सावधानी, गहन विश्लेषण और दीर्घकालीन दृष्टिकोण आवश्यक होता है।

निर्णय-निर्माण सिद्धांत का विकास विशेष रूप से बीसवीं शताब्दी में हुआ। अनेक विद्वानों ने यह समझाने का प्रयास किया कि सरकारें और नीति-निर्माता किस प्रकार निर्णय लेते हैं। कुछ विद्वानों का मत था कि निर्णय पूरी तरह तार्किक विश्लेषण के आधार पर लिए जाते हैं, जबकि अन्य विचारकों ने यह बताया कि समय की कमी, सीमित जानकारी, राजनीतिक दबाव तथा मानवीय सीमाओं के कारण निर्णय सदैव पूर्णतः तार्किक नहीं हो सकते। इस प्रकार निर्णय-निर्माण के अध्ययन ने राजनीति विज्ञान और लोक प्रशासन में व्यवहारवादी दृष्टिकोण को भी विकसित किया।

तार्किक निर्णय-निर्माण की अवधारणा के अनुसार निर्णय लेने वाला व्यक्ति अथवा संस्था पहले सभी संभावित विकल्पों का अध्ययन करती है, फिर उनके लाभ और हानियों की तुलना करती है और अंततः वह विकल्प चुनती है जिससे अधिकतम लाभ और न्यूनतम हानि होने की संभावना हो। यह आदर्श स्थिति मानी जाती है, किंतु व्यवहार में ऐसा सदैव संभव नहीं होता क्योंकि सभी सूचनाएँ उपलब्ध नहीं होतीं और भविष्य के परिणामों का पूर्णतः अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता।

व्यवहारिक जीवन में सीमित तार्किकता का सिद्धांत अधिक यथार्थवादी माना जाता है। इसके अनुसार निर्णय लेने वाले व्यक्ति के पास सीमित समय, सीमित संसाधन और सीमित जानकारी होती है। इसलिए वह सर्वोत्तम विकल्प की खोज करने के बजाय ऐसा विकल्प चुनता है जो परिस्थितियों के अनुसार पर्याप्त रूप से उपयुक्त हो। इस प्रकार निर्णय वास्तविक परिस्थितियों, अनुभवों और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर लिए जाते हैं।

समूह निर्णय-निर्माण भी आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण पक्ष है। मंत्रिपरिषद, संसद, समितियाँ, आयोग, स्थानीय निकाय तथा अंतरराष्ट्रीय संगठन सामूहिक रूप से निर्णय लेते हैं। समूह निर्णयों का लाभ यह है कि उनमें विभिन्न दृष्टिकोणों और विशेषज्ञताओं का समावेश होता है, जिससे निर्णय अधिक संतुलित और व्यावहारिक बन सकते हैं। दूसरी ओर अनेक बार अधिक लोगों की भागीदारी के कारण निर्णय लेने में विलंब भी हो सकता है। इसलिए समूह निर्णय-निर्माण में समन्वय, नेतृत्व और स्पष्ट प्रक्रिया का विशेष महत्व होता है।

निर्णय-निर्माण में नैतिकता का भी महत्वपूर्ण स्थान है। कोई निर्णय केवल कानूनी रूप से सही होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि वह न्यायपूर्ण, पारदर्शी, उत्तरदायी और जनहितकारी भी होना चाहिए। विशेष रूप से लोकतांत्रिक शासन में निर्णय लेते समय समानता, निष्पक्षता, मानवाधिकारों का सम्मान और सार्वजनिक हित जैसे सिद्धांतों का पालन आवश्यक माना जाता है। यदि निर्णय केवल व्यक्तिगत या राजनीतिक लाभ के लिए लिए जाएँ, तो शासन व्यवस्था में जनता का विश्वास कमजोर हो सकता है।

लोक प्रशासन के क्षेत्र में निर्णय-निर्माण प्रशासनिक दक्षता का प्रमुख आधार है। अधिकारी प्रतिदिन अनेक छोटे और बड़े निर्णय लेते हैं, जिनका सीधा प्रभाव नागरिकों पर पड़ता है। योजनाओं का क्रियान्वयन, संसाधनों का वितरण, कर्मचारियों का प्रबंधन, आपदा प्रबंधन तथा जनसेवाओं की उपलब्धता सभी प्रभावी निर्णयों पर निर्भर करते हैं। इसलिए प्रशासनिक प्रशिक्षण में निर्णय-निर्माण क्षमता का विकास अत्यंत आवश्यक माना जाता है।

आधुनिक युग में विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया को नई दिशा दी है। कंप्यूटर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आँकड़ा विश्लेषण, डिजिटल डेटाबेस तथा सूचना प्रबंधन प्रणालियाँ नीति-निर्माताओं को अधिक सटीक जानकारी उपलब्ध कराती हैं। इससे निर्णयों की गुणवत्ता में सुधार होता है तथा उनके परिणामों का पूर्वानुमान लगाने में भी सहायता मिलती है। फिर भी अंतिम निर्णय मानव विवेक, अनुभव और उत्तरदायित्व पर ही आधारित रहता है।

निर्णय-निर्माण में जनमत और लोकतांत्रिक सहभागिता का महत्व लगातार बढ़ रहा है। आधुनिक सरकारें नीतियाँ बनाते समय विशेषज्ञों के साथ-साथ नागरिकों, सामाजिक संगठनों, उद्योग जगत, शिक्षाविदों और विभिन्न हितधारकों की राय भी प्राप्त करती हैं। इससे निर्णय अधिक लोकतांत्रिक, स्वीकार्य और प्रभावी बनते हैं। पारदर्शिता तथा उत्तरदायित्व भी निर्णय-निर्माण की गुणवत्ता को बढ़ाते हैं क्योंकि जनता के प्रति जवाबदेही निर्णय लेने वालों को अधिक सावधानी और निष्पक्षता अपनाने के लिए प्रेरित करती है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निर्णय-निर्माण और भी जटिल होता है क्योंकि यहाँ विभिन्न देशों के राष्ट्रीय हित, शक्ति संतुलन, कूटनीतिक संबंध, आर्थिक प्रतिस्पर्धा तथा वैश्विक परिस्थितियाँ एक साथ प्रभाव डालती हैं। संयुक्त राष्ट्र, क्षेत्रीय संगठन, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन तथा बहुपक्षीय वार्ताएँ ऐसे मंच हैं जहाँ सामूहिक निर्णय लेने का प्रयास किया जाता है। जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, महामारी, वैश्विक व्यापार और समुद्री सुरक्षा जैसी समस्याओं के समाधान के लिए बहुपक्षीय निर्णय-निर्माण अत्यंत आवश्यक हो गया है।

अंततः कहा जा सकता है कि निर्णय-निर्माण शासन, प्रशासन और अंतरराष्ट्रीय राजनीति की आधारभूत प्रक्रिया है। यह केवल विकल्प चुनने की साधारण क्रिया नहीं, बल्कि तथ्यों, तर्क, अनुभव, नैतिकता, जनहित और भविष्य की संभावनाओं के संतुलित विश्लेषण पर आधारित एक व्यापक प्रक्रिया है। प्रभावी निर्णय-निर्माण से सुशासन, विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा, प्रशासनिक दक्षता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सुदृढ़ किया जा सकता है। इसलिए राजनीति विज्ञान, लोक प्रशासन और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अध्ययन में निर्णय-निर्माण की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण, व्यावहारिक और स्थायी महत्व रखती है।

System Theory & Game Theory. (प्रणाली सिद्धांत एवं खेल सिद्धांत)

प्रणाली सिद्धांत एवं खेल सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय राजनीति तथा राजनीति विज्ञान के ऐसे महत्वपूर्ण विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण हैं जिनके माध्यम से राज्यों, संस्थाओं तथा विभिन्न राजनीतिक इकाइयों के व्यवहार को वैज्ञानिक ढंग से समझने का प्रयास किया जाता है। आधुनिक राजनीति विज्ञान में इन दोनों सिद्धांतों का विशेष महत्व है क्योंकि ये केवल घटनाओं का वर्णन नहीं करते, बल्कि उनके पीछे कार्य करने वाली प्रक्रियाओं, संबंधों, विकल्पों तथा परिणामों का तार्किक विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। बीसवीं शताब्दी के मध्य में जब राजनीति विज्ञान में व्यवहारवादी दृष्टिकोण का विकास हुआ, तब राजनीतिक घटनाओं के अध्ययन में वैज्ञानिक पद्धतियों, गणितीय विश्लेषण तथा संरचनात्मक दृष्टिकोण का उपयोग बढ़ा। इसी काल में प्रणाली सिद्धांत और खेल सिद्धांत ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन को नई दिशा प्रदान की।

प्रणाली सिद्धांत का मूल विचार यह है कि किसी भी राजनीतिक व्यवस्था को अलग-थलग इकाई के रूप में नहीं समझा जा सकता, बल्कि उसे एक व्यापक प्रणाली के भाग के रूप में देखना चाहिए। प्रणाली का अर्थ उन विभिन्न तत्वों, संस्थाओं, प्रक्रियाओं और संबंधों के ऐसे संगठित समूह से है जो एक-दूसरे से जुड़े होते हैं और परस्पर प्रभाव डालते हैं। किसी भी प्रणाली में अनेक भाग होते हैं, परंतु वे सभी मिलकर एक समग्र व्यवस्था का निर्माण करते हैं। यदि किसी एक भाग में परिवर्तन होता है, तो उसका प्रभाव अन्य भागों पर भी पड़ता है। यही कारण है कि प्रणाली सिद्धांत राजनीतिक घटनाओं को अलग-अलग नहीं, बल्कि समग्र दृष्टि से समझने पर बल देता है।

राजनीति विज्ञान में प्रणाली सिद्धांत को विशेष रूप से अमेरिकी विद्वान डेविड ईस्टन ने व्यवस्थित रूप से विकसित किया। उनके अनुसार राजनीतिक व्यवस्था एक खुली प्रणाली होती है जो अपने सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और अंतरराष्ट्रीय वातावरण से निरंतर प्रभावित होती रहती है। समाज से विभिन्न प्रकार की माँगें और समर्थन राजनीतिक व्यवस्था तक पहुँचते हैं। सरकार इन माँगों का विश्लेषण करके नीतियाँ, कानून और निर्णय तैयार करती है। इन निर्णयों का प्रभाव पुनः समाज पर पड़ता है और समाज की प्रतिक्रिया फिर से नई माँगों के रूप में राजनीतिक व्यवस्था तक पहुँचती है। इस प्रकार राजनीतिक प्रणाली निरंतर चलने वाली प्रक्रिया के रूप में कार्य करती है।

प्रणाली सिद्धांत में निवेश और निर्गत की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है। निवेश से आशय उन माँगों, अपेक्षाओं, शिकायतों, सुझावों और समर्थन से है जो नागरिक, समूह या संस्थाएँ सरकार के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। सरकार इनका अध्ययन करती है और इनके आधार पर निर्णय लेती है। सरकार द्वारा बनाए गए कानून, नीतियाँ, योजनाएँ और प्रशासनिक निर्णय निर्गत कहलाते हैं। इन निर्गतों के परिणामस्वरूप समाज में जो परिवर्तन होते हैं तथा नागरिकों की जो प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न होती हैं, उन्हें पुनर्निवेशन या प्रतिपुष्टि कहा जाता है। इसी प्रतिपुष्टि के आधार पर सरकार अपनी नीतियों में आवश्यक परिवर्तन करती है। इस प्रकार प्रणाली सिद्धांत राजनीतिक व्यवस्था को एक निरंतर गतिशील प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करता है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रणाली सिद्धांत का प्रयोग विश्व व्यवस्था को समझने के लिए भी किया जाता है। संपूर्ण विश्व को एक अंतरराष्ट्रीय प्रणाली माना जाता है जिसमें विभिन्न राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय संगठन, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, क्षेत्रीय संगठन तथा अन्य वैश्विक संस्थाएँ परस्पर जुड़ी हुई होती हैं। किसी एक देश की राजनीतिक, आर्थिक अथवा सैन्य गतिविधि का प्रभाव अन्य देशों पर भी पड़ता है। उदाहरण के लिए किसी बड़े देश में आर्थिक संकट उत्पन्न होने पर विश्व व्यापार प्रभावित हो सकता है, किसी क्षेत्रीय युद्ध से ऊर्जा संकट उत्पन्न हो सकता है या किसी महामारी का प्रभाव संपूर्ण विश्व पर दिखाई दे सकता है। प्रणाली सिद्धांत इन सभी घटनाओं को परस्पर संबंधित प्रक्रियाओं के रूप में समझने का प्रयास करता है।

प्रणाली सिद्धांत का एक महत्वपूर्ण गुण इसकी समग्र दृष्टि है। यह किसी एक घटना के पृथक विश्लेषण के बजाय सम्पूर्ण व्यवस्था को ध्यान में रखता है। इसके माध्यम से यह समझा जा सकता है कि राजनीतिक निर्णय केवल सरकार की इच्छा का परिणाम नहीं होते, बल्कि वे सामाजिक परिस्थितियों, आर्थिक संसाधनों, जनमत, प्रशासनिक क्षमता तथा अंतरराष्ट्रीय वातावरण से भी प्रभावित होते हैं। इसी कारण प्रणाली सिद्धांत को आधुनिक राजनीतिक विश्लेषण की वैज्ञानिक पद्धति माना जाता है।

यद्यपि प्रणाली सिद्धांत अत्यंत उपयोगी है, फिर भी इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं। अनेक विद्वानों का मत है कि यह सिद्धांत राजनीतिक संघर्ष, शक्ति असमानता तथा वैचारिक टकराव को अपेक्षाकृत कम महत्व देता है। यह राजनीतिक व्यवस्था की स्थिरता पर अधिक बल देता है, जबकि अनेक बार राजनीतिक परिवर्तन, क्रांति और संघर्ष भी व्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके अतिरिक्त यह सिद्धांत कई बार अत्यधिक सामान्य हो जाता है, जिसके कारण विशिष्ट राजनीतिक घटनाओं की विस्तृत व्याख्या करना कठिन हो सकता है।

खेल सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय राजनीति का दूसरा महत्वपूर्ण विश्लेषणात्मक सिद्धांत है। इसका विकास मूल रूप से गणित और अर्थशास्त्र में हुआ, किंतु बाद में इसका उपयोग राजनीति विज्ञान, अंतरराष्ट्रीय संबंध, रक्षा अध्ययन, व्यापार, प्रबंधन और कूटनीति में भी होने लगा। खेल सिद्धांत का उद्देश्य यह समझना है कि जब दो या दो से अधिक पक्षों के सामने विभिन्न विकल्प उपलब्ध हों और प्रत्येक पक्ष का निर्णय दूसरे पक्ष के निर्णय से प्रभावित होता हो, तब वे किस प्रकार निर्णय लेते हैं। इस सिद्धांत में प्रतिस्पर्धा, सहयोग, रणनीति और संभावित परिणामों का तार्किक विश्लेषण किया जाता है।

खेल सिद्धांत में विभिन्न पक्षों को खिलाड़ी कहा जाता है। प्रत्येक खिलाड़ी के पास अनेक विकल्प होते हैं और वह अपने हितों की रक्षा करते हुए ऐसा निर्णय लेने का प्रयास करता है जिससे उसे अधिकतम लाभ प्राप्त हो। किंतु किसी खिलाड़ी का अंतिम परिणाम केवल उसके अपने निर्णय पर निर्भर नहीं करता, बल्कि अन्य खिलाड़ियों के निर्णयों पर भी निर्भर करता है। इसी कारण खेल सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय राजनीति में राज्यों के व्यवहार का विश्लेषण करने के लिए अत्यंत उपयोगी माना जाता है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में खेल सिद्धांत का व्यापक उपयोग शीत युद्ध के दौरान हुआ। उस समय महाशक्तियों के बीच परमाणु हथियारों की होड़, सैन्य गठबंधन, कूटनीतिक रणनीतियाँ तथा शक्ति संतुलन को समझने के लिए इस सिद्धांत का प्रयोग किया गया। उदाहरण के लिए यदि दो राष्ट्र परमाणु हथियारों का विकास करते हैं, तो प्रत्येक राष्ट्र यह विचार करता है कि यदि वह हथियार विकसित नहीं करेगा और दूसरा करेगा, तो उसकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। दूसरी ओर यदि दोनों अत्यधिक हथियार विकसित करते हैं, तो युद्ध की संभावना और आर्थिक बोझ दोनों बढ़ जाते हैं। इस प्रकार प्रत्येक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के संभावित निर्णय को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति तैयार करता है।

खेल सिद्धांत में शून्य-योग और अशून्य-योग खेल की अवधारणाएँ महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। शून्य-योग खेल में एक पक्ष की जीत दूसरे पक्ष की हार मानी जाती है। अर्थात् कुल लाभ और कुल हानि का योग शून्य होता है। युद्ध जैसी परिस्थितियों को कई बार इसी दृष्टि से समझा जाता है। इसके विपरीत अशून्य-योग खेल में सहयोग की संभावना रहती है, जहाँ दोनों पक्ष लाभ प्राप्त कर सकते हैं या दोनों को हानि भी हो सकती है। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यापार, पर्यावरण संरक्षण तथा वैश्विक स्वास्थ्य सहयोग जैसे अनेक क्षेत्र अशून्य-योग खेल के उदाहरण माने जाते हैं क्योंकि सहयोग से सभी पक्षों को लाभ हो सकता है।

खेल सिद्धांत रणनीतिक सोच पर विशेष बल देता है। किसी भी राष्ट्र को केवल वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखकर निर्णय नहीं लेना चाहिए, बल्कि उसे यह भी विचार करना चाहिए कि उसके निर्णय पर अन्य राष्ट्र किस प्रकार प्रतिक्रिया देंगे। इसलिए विदेश नीति, रक्षा नीति तथा कूटनीतिक संबंधों के निर्माण में संभावित प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण अत्यंत आवश्यक माना जाता है। इस प्रकार खेल सिद्धांत राजनीतिक निर्णयों को अधिक तार्किक और दूरदर्शी बनाने में सहायता करता है।

अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं में भी खेल सिद्धांत का महत्वपूर्ण उपयोग होता है। जब विभिन्न देश व्यापारिक समझौते, सीमा विवाद, जल संसाधनों के उपयोग, जलवायु परिवर्तन अथवा सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर वार्ता करते हैं, तब प्रत्येक देश अपनी रणनीति इस प्रकार बनाता है कि उसके राष्ट्रीय हित सुरक्षित रहें और अधिकतम लाभ प्राप्त हो। खेल सिद्धांत इन परिस्थितियों का विश्लेषण करके यह समझने में सहायता करता है कि कौन-सी रणनीति अधिक प्रभावी हो सकती है।

यद्यपि खेल सिद्धांत अत्यंत उपयोगी विश्लेषणात्मक उपकरण है, फिर भी इसकी कुछ सीमाएँ हैं। आलोचकों का मत है कि यह सिद्धांत यह मानकर चलता है कि सभी निर्णय पूर्णतः तार्किक होते हैं, जबकि वास्तविक जीवन में अनेक निर्णय भावनाओं, वैचारिक मतभेदों, सांस्कृतिक मूल्यों, राजनीतिक दबावों और अधूरी जानकारी के आधार पर भी लिए जाते हैं। इसके अतिरिक्त कई बार मानव व्यवहार को गणितीय मॉडल में पूरी तरह व्यक्त करना संभव नहीं होता। इसलिए खेल सिद्धांत सभी राजनीतिक परिस्थितियों की पूर्ण व्याख्या नहीं कर सकता।

प्रणाली सिद्धांत और खेल सिद्धांत दोनों आधुनिक राजनीति विज्ञान के महत्वपूर्ण विश्लेषणात्मक उपकरण हैं, किंतु दोनों की कार्यप्रणाली अलग-अलग है। प्रणाली सिद्धांत संपूर्ण राजनीतिक व्यवस्था, उसके विभिन्न भागों तथा उनके पारस्परिक संबंधों का अध्ययन करता है, जबकि खेल सिद्धांत विशेष परिस्थितियों में निर्णय लेने वाले पक्षों की रणनीतियों और उनके संभावित परिणामों का विश्लेषण करता है। प्रणाली सिद्धांत व्यापक संरचना को समझने में सहायक है, जबकि खेल सिद्धांत विशिष्ट निर्णयों और प्रतिस्पर्धात्मक परिस्थितियों की व्याख्या करने में अधिक उपयोगी माना जाता है।

समकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इन दोनों सिद्धांतों की प्रासंगिकता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। वैश्वीकरण, जलवायु परिवर्तन, महामारी, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, साइबर सुरक्षा, आतंकवाद तथा क्षेत्रीय संघर्ष जैसी समस्याओं को समझने में प्रणाली सिद्धांत उपयोगी सिद्ध होता है क्योंकि ये सभी परस्पर जुड़े हुए वैश्विक तंत्र का भाग हैं। दूसरी ओर सामरिक प्रतिस्पर्धा, कूटनीतिक वार्ताएँ, रक्षा समझौते, आर्थिक प्रतिबंध तथा महाशक्तियों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का विश्लेषण खेल सिद्धांत के माध्यम से अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।

अंततः कहा जा सकता है कि प्रणाली सिद्धांत एवं खेल सिद्धांत दोनों ने राजनीति विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन को अधिक वैज्ञानिक, विश्लेषणात्मक और व्यावहारिक बनाया है। प्रणाली सिद्धांत राजनीतिक व्यवस्था की समग्र संरचना, प्रक्रियाओं और पारस्परिक संबंधों को समझने का आधार प्रदान करता है, जबकि खेल सिद्धांत रणनीतिक निर्णयों, प्रतिस्पर्धा, सहयोग तथा संभावित परिणामों का तार्किक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। आधुनिक विश्व की जटिल राजनीतिक परिस्थितियों को समझने के लिए इन दोनों सिद्धांतों का अध्ययन अत्यंत आवश्यक माना जाता है, क्योंकि ये न केवल राजनीतिक घटनाओं की व्याख्या करते हैं, बल्कि नीति-निर्माण, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के व्यवहारिक पक्ष को भी गहराई से समझने में सहायता प्रदान करते हैं।

Unit-02

The Nation State System: National Power. (राष्ट्र-राज्य व्यवस्था : राष्ट्रीय शक्ति)

राष्ट्र-राज्य व्यवस्था आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण आधारभूत अवधारणाओं में से एक है। वर्तमान विश्व व्यवस्था का अधिकांश भाग स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र-राज्यों पर आधारित है, जिनके अपने निश्चित भू-भाग, स्थायी जनसंख्या, संगठित सरकार तथा अन्य राज्यों से संबंध स्थापित करने की स्वतंत्र क्षमता होती है। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों का संपूर्ण ढाँचा इन्हीं राष्ट्र-राज्यों के अस्तित्व, उनकी संप्रभुता तथा उनके पारस्परिक संबंधों पर आधारित है। राष्ट्र-राज्य व्यवस्था केवल राजनीतिक संगठन का एक स्वरूप नहीं है, बल्कि यह आधुनिक विश्व राजनीति, अंतरराष्ट्रीय कानून, कूटनीति, वैश्विक व्यापार, सुरक्षा व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की कार्यप्रणाली का मूल आधार भी है। इस व्यवस्था के अंतर्गत प्रत्येक राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए अन्य राष्ट्रों के साथ सहयोग, प्रतिस्पर्धा अथवा संघर्ष के संबंध स्थापित करता है। इसी संदर्भ में राष्ट्रीय शक्ति का विशेष महत्व सामने आता है, क्योंकि किसी भी राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय स्थिति, उसकी प्रभावशीलता और उसकी विदेश नीति का स्वरूप उसकी राष्ट्रीय शक्ति से गहराई से जुड़ा होता है।

राष्ट्र-राज्य की अवधारणा का विकास अनेक ऐतिहासिक प्रक्रियाओं का परिणाम है। प्राचीन और मध्यकालीन युग में विश्व के अधिकांश भागों में साम्राज्य, नगर-राज्य, सामंती राज्य तथा धार्मिक सत्ता का प्रभाव था। उस समय राजनीतिक अधिकार प्रायः किसी राजा, साम्राज्य या धार्मिक संस्था के हाथों में केंद्रित रहता था। धीरे-धीरे राष्ट्रीय चेतना, जनसत्ता की अवधारणा, आधुनिक प्रशासन, औद्योगिक क्रांति तथा लोकतांत्रिक विचारों के विकास ने राष्ट्र-राज्य की अवधारणा को जन्म दिया। इसके परिणामस्वरूप राजनीतिक सत्ता का आधार किसी व्यक्ति विशेष के बजाय राष्ट्र और उसके नागरिकों को माना जाने लगा। आधुनिक काल में संप्रभुता की अवधारणा ने भी राष्ट्र-राज्य व्यवस्था को सुदृढ़ किया, जिसके अनुसार प्रत्येक राज्य अपने आंतरिक और बाह्य मामलों में स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार रखता है।

राष्ट्र-राज्य व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता संप्रभुता है। संप्रभुता का अर्थ है कि प्रत्येक राज्य अपने भू-भाग के भीतर सर्वोच्च राजनीतिक अधिकार रखता है और उसके ऊपर कोई बाहरी राजनीतिक शक्ति शासन नहीं करती। प्रत्येक राष्ट्र अपनी विदेश नीति, आर्थिक नीति, रक्षा नीति तथा प्रशासनिक व्यवस्था का निर्धारण स्वयं करता है। अन्य राष्ट्र उसकी स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करते हैं। यही सिद्धांत आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का आधार माना जाता है। यद्यपि वैश्वीकरण और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के विकास के कारण राज्यों के बीच परस्पर निर्भरता बढ़ी है, फिर भी संप्रभुता आज भी राष्ट्र-राज्य की प्रमुख पहचान बनी हुई है।

राष्ट्र-राज्य व्यवस्था का दूसरा महत्वपूर्ण आधार राष्ट्रीय हित है। प्रत्येक राष्ट्र अपनी विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का निर्माण अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार करता है। राष्ट्रीय हितों में राष्ट्रीय सुरक्षा, क्षेत्रीय अखंडता, आर्थिक विकास, राजनीतिक स्थिरता, वैज्ञानिक प्रगति, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा तथा अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा जैसे अनेक तत्व सम्मिलित होते हैं। विभिन्न राष्ट्र अपने हितों की रक्षा और उन्नति के लिए कूटनीति, व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, सैन्य सहयोग तथा अंतरराष्ट्रीय समझौतों का सहारा लेते हैं। जब विभिन्न देशों के हित एक-दूसरे के अनुकूल होते हैं, तब सहयोग बढ़ता है, जबकि हितों में टकराव होने पर प्रतिस्पर्धा या संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

राष्ट्र-राज्य व्यवस्था में राष्ट्रीय शक्ति का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। राष्ट्रीय शक्ति वह समग्र क्षमता है जिसके माध्यम से कोई राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करता है, अपनी विदेश नीति को प्रभावी बनाता है, अन्य राष्ट्रों को प्रभावित करता है तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान और प्रभाव प्राप्त करता है। राष्ट्रीय शक्ति केवल सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसमें आर्थिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक, तकनीकी, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा कूटनीतिक क्षमताएँ भी सम्मिलित होती हैं। आधुनिक युग में किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति इन सभी तत्वों के संतुलित विकास पर निर्भर करती है।

भौगोलिक स्थिति राष्ट्रीय शक्ति का एक प्रमुख आधार मानी जाती है। किसी राष्ट्र का क्षेत्रफल, प्राकृतिक सीमाएँ, समुद्री तट, पर्वत, नदियाँ तथा सामरिक स्थिति उसकी सुरक्षा और विकास को प्रभावित करती हैं। जिन देशों के पास समुद्री मार्गों तक पहुँच होती है, उन्हें अंतरराष्ट्रीय व्यापार और सामरिक दृष्टि से विशेष लाभ प्राप्त होता है। इसी प्रकार प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध देश आर्थिक दृष्टि से अधिक सशक्त बन सकते हैं। भूगोल किसी राष्ट्र की रक्षा व्यवस्था, परिवहन, कृषि तथा आर्थिक गतिविधियों को भी प्रभावित करता है।

प्राकृतिक संसाधन राष्ट्रीय शक्ति का दूसरा महत्वपूर्ण आधार हैं। खनिज पदार्थ, जल संसाधन, वन, कृषि योग्य भूमि, ऊर्जा स्रोत तथा जैव विविधता किसी भी राष्ट्र की आर्थिक प्रगति के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। जिन देशों के पास पर्याप्त प्राकृतिक संसाधन होते हैं, वे औद्योगिक विकास, ऊर्जा उत्पादन तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकते हैं। यद्यपि आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने संसाधनों के उपयोग की क्षमता को बढ़ाया है, फिर भी प्राकृतिक संसाधनों का महत्व आज भी बना हुआ है।

जनसंख्या भी राष्ट्रीय शक्ति का महत्वपूर्ण तत्व है। केवल जनसंख्या की संख्या ही महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि उसकी गुणवत्ता भी उतनी ही आवश्यक है। शिक्षित, स्वस्थ, कुशल और अनुशासित जनसंख्या किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है। यदि जनसंख्या को उचित शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और तकनीकी प्रशिक्षण उपलब्ध हो, तो वह आर्थिक विकास, वैज्ञानिक अनुसंधान, रक्षा क्षमता और सामाजिक प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान देती है। इसके विपरीत अशिक्षा, बेरोजगारी और गरीबी जनसंख्या को शक्ति के बजाय चुनौती में बदल सकती हैं।

आर्थिक शक्ति आधुनिक राष्ट्रीय शक्ति का प्रमुख आधार बन चुकी है। मजबूत अर्थव्यवस्था वाला राष्ट्र अपनी रक्षा क्षमता को सुदृढ़ कर सकता है, वैज्ञानिक अनुसंधान में निवेश कर सकता है, नागरिकों के जीवन स्तर को सुधार सकता है तथा अंतरराष्ट्रीय सहायता और निवेश के माध्यम से अन्य देशों को भी प्रभावित कर सकता है। औद्योगिक उत्पादन, व्यापार, विदेशी मुद्रा भंडार, वित्तीय स्थिरता, तकनीकी नवाचार तथा आधारभूत संरचना आर्थिक शक्ति के महत्वपूर्ण संकेतक माने जाते हैं।

सैन्य शक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसी राष्ट्र की सेना, नौसेना, वायुसेना, आधुनिक हथियार, रक्षा प्रौद्योगिकी, सामरिक प्रशिक्षण तथा रक्षा उद्योग उसकी सैन्य क्षमता का निर्धारण करते हैं। आधुनिक युग में परमाणु शक्ति, मिसाइल प्रणाली, साइबर सुरक्षा तथा अंतरिक्ष तकनीक भी सैन्य शक्ति के महत्वपूर्ण अंग बन चुके हैं। सैन्य शक्ति का उद्देश्य केवल युद्ध करना नहीं, बल्कि संभावित आक्रमण को रोकना तथा राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है।

वैज्ञानिक और तकनीकी विकास राष्ट्रीय शक्ति का आधुनिक आधार है। जिन देशों के पास उन्नत विज्ञान, अनुसंधान संस्थान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष अनुसंधान तथा जैव प्रौद्योगिकी जैसी क्षमताएँ होती हैं, वे आर्थिक और सामरिक दोनों दृष्टियों से अधिक प्रभावशाली बन जाते हैं। तकनीकी प्रगति उत्पादन क्षमता, संचार, शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा तथा प्रशासन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित करती है।

राजनीतिक स्थिरता और प्रभावी नेतृत्व भी राष्ट्रीय शक्ति के महत्वपूर्ण घटक हैं। यदि किसी देश में स्थिर सरकार, उत्तरदायी प्रशासन, विधि का शासन और प्रभावी नेतृत्व हो, तो वह राष्ट्रीय संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सकता है और संकट की परिस्थितियों का सफलतापूर्वक सामना कर सकता है। राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अक्षमता राष्ट्रीय शक्ति को कमजोर कर सकती है।

कूटनीतिक क्षमता राष्ट्रीय शक्ति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष है। कोई भी राष्ट्र केवल सैन्य या आर्थिक शक्ति के आधार पर ही प्रभावशाली नहीं बनता, बल्कि उसकी विदेश नीति, अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं में दक्षता, वैश्विक संगठनों में सक्रिय भागीदारी तथा अन्य देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध भी उसकी शक्ति को बढ़ाते हैं। प्रभावी कूटनीति के माध्यम से राष्ट्र बिना युद्ध किए भी अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर सकता है और अंतरराष्ट्रीय समर्थन प्राप्त कर सकता है।

सांस्कृतिक प्रभाव अथवा सॉफ्ट पावर भी राष्ट्रीय शक्ति का आधुनिक स्वरूप माना जाता है। किसी देश की भाषा, साहित्य, संगीत, कला, शिक्षा, विज्ञान, लोकतांत्रिक मूल्य, सांस्कृतिक परंपराएँ और जीवन शैली अन्य देशों के लोगों को प्रभावित करती हैं। यदि कोई राष्ट्र अपनी संस्कृति और मूल्यों के माध्यम से विश्व में सकारात्मक छवि स्थापित करता है, तो उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और प्रभाव दोनों बढ़ते हैं। आधुनिक समय में सांस्कृतिक कूटनीति राष्ट्रीय शक्ति का महत्वपूर्ण साधन बन चुकी है।

राष्ट्रीय शक्ति स्थिर नहीं होती, बल्कि समय के साथ बदलती रहती है। विज्ञान, तकनीक, अर्थव्यवस्था, जनसंख्या, नेतृत्व, अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ तथा वैश्विक घटनाएँ किसी राष्ट्र की शक्ति को बढ़ा या घटा सकती हैं। इसलिए प्रत्येक राष्ट्र अपनी शक्ति को सुदृढ़ बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयास करता है। शिक्षा, अनुसंधान, औद्योगिक विकास, रक्षा आधुनिकीकरण, आधारभूत संरचना, सुशासन तथा सामाजिक समरसता राष्ट्रीय शक्ति को दीर्घकाल तक मजबूत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

समकालीन विश्व में राष्ट्र-राज्य व्यवस्था अनेक नई चुनौतियों का सामना कर रही है। वैश्वीकरण, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, साइबर अपराध, महामारी, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रभाव तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों की बढ़ती भूमिका ने राष्ट्र-राज्यों के सामने नई परिस्थितियाँ उत्पन्न की हैं। इसके बावजूद राष्ट्र-राज्य आज भी विश्व राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण इकाई बना हुआ है और राष्ट्रीय शक्ति उसकी स्वतंत्रता तथा प्रभावशीलता का प्रमुख आधार है।

अंततः कहा जा सकता है कि राष्ट्र-राज्य व्यवस्था आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति की मूल संरचना है, जिसके केंद्र में संप्रभु राज्य और उनके राष्ट्रीय हित स्थित हैं। इस व्यवस्था में राष्ट्रीय शक्ति किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा, विकास, प्रतिष्ठा तथा अंतरराष्ट्रीय प्रभाव का आधार बनती है। भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक संसाधन, जनसंख्या, अर्थव्यवस्था, सैन्य क्षमता, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, राजनीतिक स्थिरता, नेतृत्व, कूटनीति और सांस्कृतिक प्रभाव मिलकर राष्ट्रीय शक्ति का निर्माण करते हैं। आधुनिक विश्व में जो राष्ट्र इन सभी क्षेत्रों में संतुलित और सतत विकास प्राप्त करते हैं, वे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अधिक प्रभावशाली भूमिका निभाने में सफल होते हैं। इस प्रकार राष्ट्र-राज्य व्यवस्था और राष्ट्रीय शक्ति का अध्ययन अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रकृति, विश्व व्यवस्था की संरचना तथा वैश्विक राजनीति के वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए अत्यंत आवश्यक और महत्वपूर्ण माना जाता है।

National Interest. (राष्ट्रीय हित)

राष्ट्रीय हित अंतरराष्ट्रीय राजनीति, विदेश नीति तथा राजनीति विज्ञान की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणाओं में से एक है। प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्र अपने अस्तित्व, सुरक्षा, विकास, समृद्धि और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा की रक्षा तथा उन्नति के लिए जिन उद्देश्यों और आवश्यकताओं को सर्वोच्च महत्व देता है, उन्हें सामूहिक रूप से राष्ट्रीय हित कहा जाता है। किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति, कूटनीति, रक्षा नीति, आर्थिक नीति तथा अंतरराष्ट्रीय संबंधों का निर्माण मुख्यतः राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि प्रत्येक राज्य अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए कार्य करता है और विश्व राजनीति में उसका व्यवहार इन्हीं हितों से निर्देशित होता है। यही कारण है कि राष्ट्रीय हित को आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों का केंद्रीय आधार माना जाता है।

राष्ट्रीय हित की अवधारणा का संबंध केवल किसी सरकार की नीतियों से नहीं होता, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र के दीर्घकालीन कल्याण से जुड़ा होता है। इसमें राष्ट्र की स्वतंत्रता, संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता, नागरिकों की सुरक्षा, आर्थिक प्रगति, सामाजिक स्थिरता, सांस्कृतिक पहचान, वैज्ञानिक विकास तथा अंतरराष्ट्रीय सम्मान जैसे अनेक तत्व सम्मिलित होते हैं। किसी भी राष्ट्र के लिए राष्ट्रीय हित समय, परिस्थितियों और वैश्विक परिवर्तनों के अनुसार बदल भी सकते हैं, किंतु राष्ट्र की सुरक्षा और अस्तित्व को सामान्यतः सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय हित माना जाता है।

राष्ट्रीय हित का सबसे पहला आधार राष्ट्रीय सुरक्षा है। यदि किसी राष्ट्र की स्वतंत्रता और सुरक्षा ही संकट में पड़ जाए, तो उसके अन्य सभी उद्देश्य गौण हो जाते हैं। इसलिए प्रत्येक राज्य अपनी सीमाओं की रक्षा, सैन्य क्षमता के विकास, आधुनिक हथियारों के निर्माण, खुफिया तंत्र की मजबूती तथा संभावित खतरों से बचाव के लिए निरंतर प्रयास करता है। रक्षा नीति, सैन्य गठबंधन, सीमा प्रबंधन तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित निर्णय इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए लिए जाते हैं। आधुनिक समय में सुरक्षा की अवधारणा केवल सैन्य सुरक्षा तक सीमित नहीं रही है, बल्कि आर्थिक सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, साइबर सुरक्षा तथा पर्यावरणीय सुरक्षा भी राष्ट्रीय हित का महत्वपूर्ण भाग बन चुकी हैं।

राष्ट्रीय हित का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष आर्थिक विकास है। कोई भी राष्ट्र तभी सशक्त बन सकता है जब उसकी अर्थव्यवस्था मजबूत हो। औद्योगिक विकास, कृषि उत्पादन, व्यापार, विदेशी निवेश, रोजगार, तकनीकी उन्नति तथा आधारभूत संरचना का विकास राष्ट्रीय हित के महत्वपूर्ण अंग माने जाते हैं। आर्थिक रूप से सुदृढ़ राष्ट्र न केवल अपने नागरिकों के जीवन स्तर को बेहतर बना सकता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकता है। इसलिए आधुनिक राष्ट्र अपनी विदेश नीति में आर्थिक सहयोग, व्यापारिक समझौतों, ऊर्जा संसाधनों की उपलब्धता तथा वैश्विक बाजारों तक पहुँच को विशेष महत्व देते हैं।

राष्ट्रीय हित का तीसरा आधार राजनीतिक स्वतंत्रता और संप्रभुता है। प्रत्येक राष्ट्र चाहता है कि उसके आंतरिक मामलों में कोई बाहरी शक्ति हस्तक्षेप न करे और वह अपने राजनीतिक निर्णय स्वतंत्र रूप से ले सके। लोकतांत्रिक व्यवस्था, प्रभावी शासन, विधि का शासन तथा राजनीतिक स्थिरता किसी भी राष्ट्र के दीर्घकालीन हितों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि किसी राष्ट्र की राजनीतिक व्यवस्था कमजोर हो जाती है, तो उसका प्रभाव उसकी विदेश नीति तथा अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा पर भी पड़ता है।

सामाजिक और सांस्कृतिक संरक्षण भी राष्ट्रीय हित का महत्वपूर्ण भाग है। प्रत्येक राष्ट्र अपनी भाषा, संस्कृति, परंपराओं, ऐतिहासिक विरासत और सामाजिक मूल्यों की रक्षा करना चाहता है। सांस्कृतिक पहचान राष्ट्रीय एकता को मजबूत करती है और नागरिकों में राष्ट्र के प्रति अपनत्व तथा उत्तरदायित्व की भावना विकसित करती है। आधुनिक समय में सांस्कृतिक कूटनीति भी राष्ट्रीय हितों की पूर्ति का एक प्रभावी माध्यम बन गई है, जिसके द्वारा राष्ट्र अपनी संस्कृति और मूल्यों को विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित करने का प्रयास करते हैं।

वैज्ञानिक और तकनीकी विकास भी राष्ट्रीय हित की महत्वपूर्ण आवश्यकता बन चुका है। आधुनिक विश्व में विज्ञान और प्रौद्योगिकी आर्थिक समृद्धि, रक्षा क्षमता, स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार तथा प्रशासन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित करते हैं। जिन देशों के पास उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक तकनीक तथा नवाचार की क्षमता होती है, वे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अधिक सफल होते हैं। इसलिए शिक्षा, अनुसंधान, अंतरिक्ष विज्ञान, सूचना प्रौद्योगिकी तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्रों में निवेश राष्ट्रीय हित का महत्वपूर्ण अंग माना जाता है।

राष्ट्रीय हितों का स्वरूप स्थायी और अस्थायी दोनों प्रकार का हो सकता है। कुछ हित ऐसे होते हैं जो किसी भी परिस्थिति में राष्ट्र के लिए अनिवार्य रहते हैं, जैसे स्वतंत्रता, संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और राष्ट्रीय सुरक्षा। इन्हें स्थायी राष्ट्रीय हित कहा जाता है। दूसरी ओर कुछ हित समय, परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय वातावरण के अनुसार बदलते रहते हैं। उदाहरण के लिए किसी विशेष व्यापारिक समझौते में भाग लेना, किसी अंतरराष्ट्रीय संगठन की सदस्यता प्राप्त करना, किसी क्षेत्रीय परियोजना में सहयोग करना या किसी विशेष देश के साथ रणनीतिक साझेदारी स्थापित करना अस्थायी अथवा परिवर्तनीय राष्ट्रीय हित हो सकते हैं।

राष्ट्रीय हितों का निर्धारण अनेक कारकों से प्रभावित होता है। किसी राष्ट्र की भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक संसाधन, जनसंख्या, आर्थिक क्षमता, राजनीतिक व्यवस्था, ऐतिहासिक अनुभव, सांस्कृतिक परंपराएँ, वैज्ञानिक विकास, नेतृत्व की दृष्टि तथा अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ राष्ट्रीय हितों के स्वरूप को प्रभावित करती हैं। उदाहरण के लिए समुद्री तट वाले देशों के लिए समुद्री सुरक्षा और व्यापार अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं, जबकि भू-आवेष्ठित देशों के लिए पड़ोसी देशों के साथ स्थिर संबंध और परिवहन मार्गों तक पहुँच विशेष महत्व रख सकती है।

विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों का संबंध अत्यंत घनिष्ठ है। विदेश नीति वह माध्यम है जिसके द्वारा कोई राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करता है। किसी देश के अन्य राष्ट्रों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, व्यापारिक समझौते, रक्षा सहयोग, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भागीदारी तथा कूटनीतिक प्रयास सभी राष्ट्रीय हितों की प्राप्ति के साधन होते हैं। यदि किसी देश की विदेश नीति उसके राष्ट्रीय हितों के अनुरूप नहीं होती, तो वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रभावशीलता खो सकता है। इसलिए विदेश नीति का निर्माण करते समय राष्ट्रीय हितों का संतुलित मूल्यांकन आवश्यक माना जाता है।

राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए विभिन्न साधनों का उपयोग किया जाता है। कूटनीति सबसे महत्वपूर्ण साधन है, जिसके माध्यम से राष्ट्र वार्ता, समझौते और सहयोग द्वारा अपने हितों की रक्षा करते हैं। आर्थिक नीति, व्यापार, विदेशी सहायता, निवेश, सांस्कृतिक संबंध, अंतरराष्ट्रीय कानून तथा आवश्यकता पड़ने पर सैन्य शक्ति भी राष्ट्रीय हितों की रक्षा के साधन बन सकते हैं। आधुनिक समय में सॉफ्ट पावर अर्थात् सांस्कृतिक, शैक्षिक और वैचारिक प्रभाव भी राष्ट्रीय हितों की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई बार विभिन्न राष्ट्रों के राष्ट्रीय हित परस्पर समान होते हैं, जिसके कारण सहयोग की संभावना उत्पन्न होती है। उदाहरण के लिए जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, महामारी, समुद्री सुरक्षा तथा अंतरराष्ट्रीय व्यापार जैसे क्षेत्रों में अनेक देशों के हित समान हो सकते हैं। इसके विपरीत सीमा विवाद, प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार, सामरिक प्रतिस्पर्धा अथवा आर्थिक वर्चस्व जैसे विषयों में राष्ट्रीय हितों का टकराव भी हो सकता है। ऐसी परिस्थितियों में कूटनीति, वार्ता तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

राष्ट्रीय हित की अवधारणा की आलोचना भी की गई है। कुछ विद्वानों का मत है कि कई बार सरकारें अपने राजनीतिक उद्देश्यों को राष्ट्रीय हित का नाम देकर उचित ठहराने का प्रयास करती हैं। राष्ट्रीय हित की कोई एक सार्वभौमिक परिभाषा नहीं है क्योंकि विभिन्न देशों की परिस्थितियाँ, प्राथमिकताएँ और आवश्यकताएँ अलग-अलग होती हैं। इसके अतिरिक्त लोकतांत्रिक समाजों में विभिन्न राजनीतिक दल और सामाजिक समूह भी राष्ट्रीय हित की अलग-अलग व्याख्या कर सकते हैं। इसलिए राष्ट्रीय हित का निर्धारण केवल सत्ता में बैठे शासकों का कार्य नहीं होना चाहिए, बल्कि उसमें व्यापक जनमत, संवैधानिक मूल्यों और दीर्घकालीन राष्ट्रीय कल्याण को भी महत्व दिया जाना चाहिए।

समकालीन विश्व में राष्ट्रीय हित की अवधारणा और अधिक व्यापक हो गई है। पहले जहाँ इसका संबंध मुख्यतः सैन्य सुरक्षा और राजनीतिक स्वतंत्रता से था, वहीं आज इसमें आर्थिक प्रतिस्पर्धा, ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, तकनीकी नवाचार, साइबर सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा तथा वैश्विक सहयोग जैसे अनेक नए आयाम जुड़ गए हैं। वैश्वीकरण के कारण राष्ट्र एक-दूसरे पर अधिक निर्भर हो गए हैं, इसलिए अनेक बार राष्ट्रीय हितों की रक्षा अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से ही संभव होती है।

भारत के संदर्भ में राष्ट्रीय हितों में राष्ट्रीय एकता, संप्रभुता, लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा, आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय, वैज्ञानिक प्रगति, पड़ोसी देशों के साथ शांतिपूर्ण संबंध, समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा तथा वैश्विक मंचों पर सम्मानजनक भूमिका का निर्वहन प्रमुख रूप से सम्मिलित हैं। भारत की विदेश नीति में भी इन उद्देश्यों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इसी प्रकार प्रत्येक राष्ट्र अपनी विशिष्ट परिस्थितियों के अनुसार अपने राष्ट्रीय हितों का निर्धारण करता है।

अंततः कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय हित किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति, अंतरराष्ट्रीय संबंधों तथा राजनीतिक निर्णयों का मूल आधार है। यह राष्ट्र की सुरक्षा, संप्रभुता, आर्थिक समृद्धि, सामाजिक स्थिरता, सांस्कृतिक संरक्षण, वैज्ञानिक विकास और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा की सामूहिक अभिव्यक्ति है। राष्ट्रीय हित स्थिर भी हो सकते हैं और समय के अनुसार परिवर्तित भी हो सकते हैं, किंतु उनका अंतिम उद्देश्य राष्ट्र और उसके नागरिकों का दीर्घकालीन कल्याण सुनिश्चित करना होता है। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी भी राष्ट्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों की स्पष्ट पहचान करे, उन्हें संतुलित ढंग से परिभाषित करे तथा कूटनीति, आर्थिक विकास, वैज्ञानिक प्रगति और प्रभावी शासन के माध्यम से उनकी सफलतापूर्वक रक्षा और उन्नति कर सके।

Collective Security. (सामूहिक सुरक्षा)

सामूहिक सुरक्षा अंतरराष्ट्रीय राजनीति की एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है, जिसका मूल उद्देश्य विश्व में शांति, स्थिरता और सुरक्षा बनाए रखना है। इस सिद्धांत का आधार यह विचार है कि किसी एक राष्ट्र पर होने वाला आक्रमण केवल उसी राष्ट्र पर आक्रमण नहीं माना जाएगा, बल्कि उसे संपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर आक्रमण के रूप में देखा जाएगा। ऐसी स्थिति में सभी राष्ट्र मिलकर आक्रमणकारी राज्य का विरोध करेंगे और पीड़ित राज्य की सहायता करेंगे। इस प्रकार सामूहिक सुरक्षा का उद्देश्य किसी भी राष्ट्र को बल प्रयोग द्वारा दूसरे राष्ट्र की स्वतंत्रता और संप्रभुता का उल्लंघन करने से रोकना है। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों में यह विचार इस विश्वास पर आधारित है कि विश्व शांति केवल व्यक्तिगत सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि सभी राष्ट्रों के संयुक्त प्रयासों से अधिक प्रभावी ढंग से सुरक्षित की जा सकती है।

सामूहिक सुरक्षा की अवधारणा का विकास विशेष रूप से प्रथम विश्व युद्ध के बाद हुआ। प्रथम विश्व युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि राष्ट्र केवल अपनी सैन्य शक्ति और सामरिक गठबंधनों पर निर्भर रहेंगे, तो बड़े युद्धों को रोकना कठिन होगा। लाखों लोगों की मृत्यु, व्यापक आर्थिक विनाश और राजनीतिक अस्थिरता ने विश्व के नेताओं और विचारकों को यह सोचने के लिए प्रेरित किया कि ऐसी व्यवस्था विकसित की जाए जिसमें युद्ध की संभावना को सामूहिक प्रयासों के माध्यम से कम किया जा सके। इसी विचार के परिणामस्वरूप राष्ट्र संघ की स्थापना की गई। यद्यपि राष्ट्र संघ अपने उद्देश्य में पूर्णतः सफल नहीं हो सका, फिर भी उसने सामूहिक सुरक्षा के सिद्धांत को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थापित करने का महत्वपूर्ण प्रयास किया।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र की स्थापना भी इसी व्यापक उद्देश्य को ध्यान में रखकर की गई। संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में स्पष्ट रूप से यह व्यवस्था की गई कि अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना उसका प्रमुख उद्देश्य होगा। यदि किसी राष्ट्र द्वारा आक्रमण किया जाता है अथवा विश्व शांति को खतरा उत्पन्न होता है, तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद आवश्यक कदम उठा सकती है। इसमें आर्थिक प्रतिबंध, कूटनीतिक दबाव, शांति स्थापना मिशन अथवा आवश्यकता पड़ने पर सामूहिक सैन्य कार्रवाई भी सम्मिलित हो सकती है। इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र आधुनिक सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत आधार माना जाता है।

सामूहिक सुरक्षा का मूल सिद्धांत यह है कि सुरक्षा अविभाज्य होती है। इसका अर्थ यह है कि किसी एक राष्ट्र की असुरक्षा अंततः अन्य राष्ट्रों की सुरक्षा को भी प्रभावित कर सकती है। यदि किसी आक्रमणकारी राज्य को समय रहते नहीं रोका जाए, तो वह भविष्य में अन्य देशों के लिए भी खतरा बन सकता है। इसलिए सभी राष्ट्रों का यह सामूहिक दायित्व है कि वे अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और शांति की रक्षा के लिए एकजुट होकर कार्य करें। इस दृष्टिकोण में व्यक्तिगत सुरक्षा और सामूहिक सुरक्षा एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई मानी जाती हैं।

सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था का आधार अंतरराष्ट्रीय सहयोग है। इसमें यह अपेक्षा की जाती है कि सभी राष्ट्र अपने संकीर्ण हितों से ऊपर उठकर वैश्विक शांति और स्थिरता को महत्व देंगे। यदि किसी राष्ट्र पर आक्रमण होता है, तो अन्य राष्ट्र उसकी सहायता केवल मित्रता या राजनीतिक लाभ के आधार पर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की रक्षा के उद्देश्य से करेंगे। इस प्रकार सामूहिक सुरक्षा किसी विशेष सैन्य गठबंधन पर आधारित नहीं होती, बल्कि व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर आधारित होती है।

सामूहिक सुरक्षा और शक्ति संतुलन के बीच महत्वपूर्ण अंतर है। शक्ति संतुलन की व्यवस्था में विभिन्न राष्ट्र या राष्ट्रों के समूह एक-दूसरे की शक्ति को संतुलित करने का प्रयास करते हैं ताकि कोई एक राष्ट्र अत्यधिक शक्तिशाली न बन सके। इसके विपरीत सामूहिक सुरक्षा में सभी राष्ट्र मिलकर किसी भी आक्रमणकारी राज्य का विरोध करते हैं। शक्ति संतुलन प्रतिस्पर्धा और सामरिक संतुलन पर आधारित होता है, जबकि सामूहिक सुरक्षा सहयोग, अंतरराष्ट्रीय कानून और सामूहिक उत्तरदायित्व पर आधारित होती है। इसलिए सामूहिक सुरक्षा को अधिक नैतिक और व्यापक दृष्टिकोण माना जाता है।

सामूहिक सुरक्षा की सफलता के लिए कुछ आवश्यक शर्तें मानी जाती हैं। सबसे पहले सभी राष्ट्रों का अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त निर्णयों के प्रति सम्मान होना चाहिए। यदि राष्ट्र अपने संकीर्ण राष्ट्रीय हितों को सामूहिक निर्णयों से ऊपर रखेंगे, तो सामूहिक सुरक्षा प्रभावी नहीं रह सकती। दूसरी महत्वपूर्ण शर्त यह है कि सभी राष्ट्र आक्रमणकारी की पहचान पर सहमत हों। यदि विभिन्न राष्ट्र किसी घटना को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखते हैं, तो संयुक्त कार्रवाई कठिन हो जाती है। तीसरी शर्त यह है कि सामूहिक कार्रवाई समय पर और प्रभावी हो। यदि निर्णय लेने में अत्यधिक विलंब हो जाए, तो आक्रमणकारी राष्ट्र को लाभ मिल सकता है और पीड़ित राष्ट्र को गंभीर क्षति पहुँच सकती है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था में केंद्रीय भूमिका निभाती है। सुरक्षा परिषद के पास यह अधिकार है कि वह अंतरराष्ट्रीय शांति को खतरे की स्थिति में आवश्यक कदम उठाए। वह संघर्षरत पक्षों से युद्धविराम की अपील कर सकती है, आर्थिक प्रतिबंध लगा सकती है, शांति सेना भेज सकती है अथवा सामूहिक सैन्य कार्रवाई की अनुमति दे सकती है। सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के विशेष अधिकार तथा वीटो शक्ति के कारण अनेक बार निर्णय प्रक्रिया जटिल हो जाती है, फिर भी अंतरराष्ट्रीय शांति बनाए रखने में इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण बनी हुई है।

सामूहिक सुरक्षा के अनेक लाभ हैं। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह आक्रमण की संभावना को कम करने का प्रयास करती है। यदि किसी आक्रमणकारी राष्ट्र को यह ज्ञात हो कि उसके विरुद्ध संपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समुदाय एकजुट होकर कार्रवाई करेगा, तो वह युद्ध प्रारंभ करने से पहले कई बार विचार करेगा। यह व्यवस्था छोटे और कमजोर राष्ट्रों को भी सुरक्षा की भावना प्रदान करती है क्योंकि वे केवल अपनी सीमित सैन्य शक्ति पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहयोग की अपेक्षा कर सकते हैं। सामूहिक सुरक्षा अंतरराष्ट्रीय कानून की प्रतिष्ठा को भी मजबूत करती है और विश्व में शांति तथा स्थिरता बनाए रखने में सहायता करती है।

सामूहिक सुरक्षा का एक अन्य महत्वपूर्ण लाभ यह है कि यह कूटनीतिक समाधान को प्रोत्साहित करती है। यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय किसी विवाद को प्रारंभिक अवस्था में ही वार्ता, मध्यस्थता और समझौते के माध्यम से हल करने का प्रयास करे, तो युद्ध की संभावना कम हो जाती है। इसके अतिरिक्त यह व्यवस्था मानवाधिकारों की रक्षा, मानवीय सहायता तथा संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्निर्माण के प्रयासों को भी प्रोत्साहित करती है।

यद्यपि सामूहिक सुरक्षा का सिद्धांत अत्यंत आदर्श और उपयोगी माना जाता है, फिर भी व्यवहार में इसके सामने अनेक चुनौतियाँ आती हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि सभी राष्ट्रों के राष्ट्रीय हित समान नहीं होते। कई बार शक्तिशाली राष्ट्र अपने राजनीतिक, आर्थिक या सामरिक हितों के कारण सामूहिक कार्रवाई का समर्थन नहीं करते। सुरक्षा परिषद में वीटो शक्ति के कारण भी कई महत्वपूर्ण मामलों में प्रभावी निर्णय नहीं लिए जा सके हैं। इसके अतिरिक्त कई बार किसी संघर्ष में आक्रमणकारी और पीड़ित की पहचान करना भी जटिल हो जाता है।

कुछ आलोचकों का मत है कि सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था व्यवहार में अक्सर महाशक्तियों की राजनीति से प्रभावित होती है। यदि किसी संकट में शक्तिशाली राष्ट्रों के हित जुड़े हों, तो सामूहिक कार्रवाई कठिन हो जाती है। इसी कारण कुछ संघर्षों में संयुक्त राष्ट्र प्रभावी भूमिका निभाने में सफल रहा है, जबकि कुछ अन्य मामलों में उसकी सीमाएँ स्पष्ट दिखाई दी हैं। इसके बावजूद सामूहिक सुरक्षा की अवधारणा आज भी अंतरराष्ट्रीय शांति व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण नैतिक और संस्थागत आधार मानी जाती है।

आधुनिक विश्व में सामूहिक सुरक्षा की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है। आतंकवाद, समुद्री डकैती, साइबर हमले, परमाणु प्रसार, जलवायु परिवर्तन, महामारी तथा अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध जैसी समस्याएँ किसी एक देश तक सीमित नहीं रहतीं। इनका समाधान केवल व्यक्तिगत राष्ट्रीय प्रयासों से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सामूहिक उत्तरदायित्व आवश्यक है। इसी कारण सामूहिक सुरक्षा की अवधारणा का महत्व निरंतर बढ़ रहा है।

भारत सामूहिक सुरक्षा की अवधारणा का समर्थक रहा है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के उद्देश्यों का निरंतर समर्थन किया है और अनेक संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना अभियानों में सक्रिय योगदान दिया है। भारतीय सैनिकों ने विभिन्न देशों में शांति स्थापना, मानवीय सहायता और संघर्ष नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत का मत है कि अंतरराष्ट्रीय विवादों का समाधान वार्ता, शांतिपूर्ण उपायों और संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों के अनुसार होना चाहिए।

सामूहिक सुरक्षा और सामूहिक रक्षा में भी अंतर समझना आवश्यक है। सामूहिक रक्षा किसी विशेष सैन्य गठबंधन के सदस्य देशों के बीच होती है, जहाँ यदि किसी एक सदस्य पर हमला होता है तो अन्य सदस्य उसकी रक्षा करते हैं। इसके विपरीत सामूहिक सुरक्षा का उद्देश्य किसी विशेष समूह की रक्षा नहीं, बल्कि संपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इसमें सिद्धांततः सभी राष्ट्र शामिल माने जाते हैं और किसी भी आक्रमणकारी के विरुद्ध सामूहिक कार्रवाई की जाती है।

अंततः कहा जा सकता है कि सामूहिक सुरक्षा आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जिसका मूल उद्देश्य विश्व में शांति, न्याय और स्थिरता बनाए रखना है। यह सिद्धांत इस विश्वास पर आधारित है कि किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा संपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समुदाय की सुरक्षा से जुड़ी हुई है और शांति की रक्षा सामूहिक उत्तरदायित्व के माध्यम से ही अधिक प्रभावी ढंग से की जा सकती है। यद्यपि व्यवहार में इसकी अनेक सीमाएँ और चुनौतियाँ हैं, फिर भी अंतरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था, वैश्विक सहयोग तथा युद्ध की रोकथाम के क्षेत्र में इसका महत्व अत्यंत व्यापक और स्थायी है। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में जब विश्व अनेक साझा चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब सामूहिक सुरक्षा की भावना ही अंतरराष्ट्रीय शांति और मानवता के दीर्घकालीन कल्याण का सबसे महत्वपूर्ण आधार मानी जाती है।

Balance of Power. (शक्ति संतुलन)

शक्ति संतुलन अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सबसे प्राचीन, प्रभावशाली और व्यापक रूप से स्वीकृत अवधारणाओं में से एक है। यह सिद्धांत इस विचार पर आधारित है कि यदि विश्व में किसी एक राष्ट्र या राष्ट्रों के समूह की शक्ति अत्यधिक बढ़ जाए और उस पर कोई नियंत्रण न रहे, तो वह अन्य राष्ट्रों की स्वतंत्रता, संप्रभुता और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। ऐसी स्थिति को रोकने के लिए विभिन्न राष्ट्र अपनी शक्ति का विकास करते हैं, नए सहयोगी बनाते हैं, कूटनीतिक प्रयास करते हैं तथा आवश्यक होने पर सैन्य और आर्थिक साधनों का उपयोग करके शक्ति का ऐसा संतुलन बनाए रखने का प्रयास करते हैं जिससे कोई भी राष्ट्र इतना शक्तिशाली न बन सके कि वह पूरे अंतरराष्ट्रीय तंत्र पर प्रभुत्व स्थापित कर ले। इस प्रकार शक्ति संतुलन का मूल उद्देश्य किसी एक शक्ति के वर्चस्व को रोकना तथा विश्व व्यवस्था में स्थिरता और शांति बनाए रखना है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति संतुलन का विकास कई शताब्दियों की ऐतिहासिक प्रक्रियाओं का परिणाम है। यूरोप में मध्यकाल के बाद जब अनेक स्वतंत्र राज्यों का उदय हुआ, तब उनके बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और सामरिक संघर्ष भी बढ़ने लगे। उस समय किसी एक राज्य द्वारा पूरे यूरोप पर प्रभुत्व स्थापित करने की संभावना ने अन्य राज्यों को एक-दूसरे के साथ सहयोग करने के लिए प्रेरित किया। धीरे-धीरे यह विचार विकसित हुआ कि यदि विभिन्न राज्य मिलकर शक्तिशाली राष्ट्र का संतुलन बनाए रखें, तो किसी भी प्रकार के साम्राज्यवादी विस्तार को रोका जा सकता है। इसी ऐतिहासिक अनुभव ने शक्ति संतुलन को अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक व्यावहारिक सिद्धांत बना दिया।

शक्ति संतुलन का आधार यह मान्यता है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में कोई सर्वोच्च विश्व सरकार नहीं होती जो सभी राज्यों को नियंत्रित कर सके। प्रत्येक राज्य अपनी सुरक्षा के लिए स्वयं उत्तरदायी होता है। ऐसी स्थिति में यदि कोई राष्ट्र अत्यधिक शक्तिशाली हो जाए, तो अन्य राष्ट्र उसकी शक्ति का संतुलन स्थापित करने के लिए अपने सैन्य, आर्थिक, राजनीतिक और कूटनीतिक संसाधनों को सुदृढ़ करते हैं। इस प्रक्रिया में कभी-कभी नए सैन्य गठबंधनों का निर्माण होता है, रक्षा सहयोग बढ़ाया जाता है, हथियारों का विकास किया जाता है या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है।

शक्ति संतुलन का संबंध केवल सैन्य शक्ति से नहीं है। आधुनिक युग में किसी राष्ट्र की शक्ति का निर्धारण उसकी आर्थिक क्षमता, वैज्ञानिक और तकनीकी विकास, औद्योगिक उत्पादन, जनसंख्या, प्राकृतिक संसाधन, राजनीतिक स्थिरता, प्रशासनिक दक्षता, कूटनीतिक प्रभाव तथा सांस्कृतिक प्रतिष्ठा से भी होता है। इसलिए शक्ति संतुलन का अर्थ इन सभी तत्वों के सामूहिक प्रभाव से है। आज किसी राष्ट्र की आर्थिक शक्ति कई बार उसकी सैन्य शक्ति जितनी ही महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि आर्थिक रूप से सशक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय निर्णयों को प्रभावित करने की अधिक क्षमता रखते हैं।

शक्ति संतुलन का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति बनाए रखना माना जाता है। यदि दो या अधिक प्रमुख शक्तियाँ लगभग समान स्तर पर हों, तो उनमें से कोई भी युद्ध प्रारंभ करने से पहले अनेक बार विचार करेगा क्योंकि उसे अपनी हार अथवा भारी क्षति की संभावना का भी अनुमान रहेगा। इस प्रकार शक्ति का संतुलन संभावित आक्रमण को रोकने का कार्य करता है। इसी कारण अनेक विद्वान इसे प्रतिरोध की प्रभावी व्यवस्था मानते हैं। उनका मत है कि जब सभी प्रमुख शक्तियाँ एक-दूसरे की क्षमता से परिचित होती हैं, तब युद्ध की संभावना अपेक्षाकृत कम हो जाती है।

शक्ति संतुलन की व्यवस्था कई प्रकार से स्थापित की जा सकती है। पहला माध्यम स्वयं की शक्ति में वृद्धि करना है। कोई राष्ट्र अपनी सेना को आधुनिक बनाकर, रक्षा उत्पादन बढ़ाकर, आर्थिक विकास करके तथा वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रोत्साहित करके अपनी शक्ति को मजबूत बना सकता है। दूसरा माध्यम मित्र राष्ट्रों के साथ गठबंधन करना है। जब कई राष्ट्र मिलकर किसी अत्यधिक शक्तिशाली राष्ट्र के विरुद्ध सहयोग करते हैं, तो उनकी संयुक्त शक्ति संतुलन स्थापित करने में सहायता करती है। तीसरा माध्यम कूटनीतिक नीति है, जिसके अंतर्गत राष्ट्र अपने संबंधों को इस प्रकार विकसित करते हैं कि किसी एक शक्ति का अत्यधिक विस्तार रोका जा सके। चौथा माध्यम अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं तथा समझौतों के माध्यम से सहयोग बढ़ाना भी हो सकता है।

इतिहास में शक्ति संतुलन के अनेक उदाहरण मिलते हैं। यूरोप में नेपोलियन बोनापार्ट के विस्तारवादी प्रयासों के विरुद्ध विभिन्न देशों ने संयुक्त रूप से संघर्ष किया। इसी प्रकार उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोप के प्रमुख देशों ने आपसी समझौतों और सहयोग के माध्यम से शक्ति संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया। बीसवीं शताब्दी में शीत युद्ध के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ दो महाशक्तियों के रूप में उभरे। दोनों के बीच परमाणु शक्ति, सैन्य गठबंधनों और वैचारिक प्रतिस्पर्धा का ऐसा संतुलन बना जिसमें प्रत्यक्ष युद्ध नहीं हुआ, किंतु वैश्विक स्तर पर व्यापक प्रतिस्पर्धा जारी रही। इस स्थिति को भी शक्ति संतुलन के आधुनिक उदाहरण के रूप में देखा जाता है।

शक्ति संतुलन और राष्ट्रीय हित का संबंध अत्यंत घनिष्ठ है। प्रत्येक राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए शक्ति संतुलन की नीति अपनाता है। यदि किसी राष्ट्र को यह अनुभव होता है कि किसी अन्य देश की शक्ति उसके हितों के लिए खतरा बन रही है, तो वह अपने संसाधनों को सुदृढ़ करने अथवा अन्य राष्ट्रों के साथ सहयोग बढ़ाने का प्रयास करता है। इस प्रकार शक्ति संतुलन राष्ट्रीय सुरक्षा तथा विदेश नीति का महत्वपूर्ण आधार बन जाता है।

शक्ति संतुलन की व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि इसमें मित्र और प्रतिद्वंद्वी स्थायी नहीं होते। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में परिस्थितियों के अनुसार राष्ट्र अपने संबंधों में परिवर्तन कर सकते हैं। जो राष्ट्र किसी समय सहयोगी होते हैं, वे भविष्य में प्रतिस्पर्धी भी बन सकते हैं और जो राष्ट्र पहले प्रतिद्वंद्वी थे, वे बाद में साझेदार भी बन सकते हैं। इसलिए शक्ति संतुलन की नीति में लचीलापन और व्यावहारिकता को विशेष महत्व दिया जाता है।

आधुनिक युग में शक्ति संतुलन केवल सैन्य क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा है। आर्थिक शक्ति संतुलन भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। विश्व व्यापार, ऊर्जा संसाधनों, प्रौद्योगिकी, वित्तीय संस्थाओं तथा वैश्विक निवेश के क्षेत्र में भी विभिन्न राष्ट्र अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास करते हैं। इसी प्रकार विज्ञान और तकनीक, अंतरिक्ष अनुसंधान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा साइबर सुरक्षा जैसे नए क्षेत्रों में भी शक्ति संतुलन की प्रतिस्पर्धा दिखाई देती है। इससे स्पष्ट होता है कि आधुनिक शक्ति संतुलन बहुआयामी स्वरूप ग्रहण कर चुका है।

शक्ति संतुलन के अनेक लाभ बताए जाते हैं। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह किसी एक राष्ट्र के अत्यधिक प्रभुत्व को रोकने का प्रयास करता है। इससे छोटे और मध्यम आकार के देशों की स्वतंत्रता और संप्रभुता की रक्षा संभव होती है। शक्ति संतुलन संभावित आक्रमण को हतोत्साहित करता है क्योंकि आक्रमणकारी राष्ट्र को अन्य शक्तियों के संयुक्त विरोध का सामना करना पड़ सकता है। यह व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थिरता बनाए रखने तथा विभिन्न राष्ट्रों के बीच सहयोग और सावधानीपूर्ण व्यवहार को प्रोत्साहित करती है।

इसके बावजूद शक्ति संतुलन की अनेक सीमाएँ भी हैं। कई बार शक्ति संतुलन बनाए रखने की प्रतिस्पर्धा हथियारों की दौड़ को जन्म देती है। जब प्रत्येक राष्ट्र अपनी शक्ति बढ़ाने का प्रयास करता है, तब सैन्य व्यय अत्यधिक बढ़ जाता है और संसाधनों का बड़ा भाग रक्षा पर खर्च होने लगता है। इससे विकास संबंधी योजनाएँ प्रभावित हो सकती हैं। कई बार शक्ति संतुलन की नीति अविश्वास और संदेह की भावना भी उत्पन्न करती है क्योंकि प्रत्येक राष्ट्र दूसरे की शक्ति को संभावित खतरे के रूप में देखता है। ऐसी परिस्थितियों में तनाव और संघर्ष की संभावना बढ़ सकती है।

कुछ विद्वानों का मत है कि शक्ति संतुलन युद्ध को रोकने के बजाय कई बार उसे प्रोत्साहित भी कर सकता है। यदि कोई राष्ट्र यह समझे कि शक्ति संतुलन उसके पक्ष में है, तो वह अधिक आक्रामक नीति भी अपना सकता है। इसी प्रकार यदि गठबंधन की राजनीति अत्यधिक जटिल हो जाए, तो किसी छोटे क्षेत्रीय विवाद के कारण भी व्यापक युद्ध की संभावना उत्पन्न हो सकती है। प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व यूरोप में बने सैन्य गठबंधनों को इस दृष्टि से देखा जाता है कि उन्होंने संघर्ष को सीमित करने के बजाय व्यापक युद्ध का रूप दे दिया।

शक्ति संतुलन और सामूहिक सुरक्षा में भी महत्वपूर्ण अंतर है। शक्ति संतुलन का आधार प्रतिस्पर्धी शक्तियों के बीच संतुलन बनाए रखना है, जबकि सामूहिक सुरक्षा का उद्देश्य सभी राष्ट्रों द्वारा मिलकर किसी भी आक्रमणकारी का विरोध करना है। शक्ति संतुलन राष्ट्रीय हितों और व्यावहारिक राजनीति पर आधारित होता है, जबकि सामूहिक सुरक्षा अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सामूहिक उत्तरदायित्व पर अधिक बल देती है। दोनों का अंतिम उद्देश्य शांति बनाए रखना है, किंतु उनकी कार्यप्रणाली और दृष्टिकोण अलग-अलग हैं।

वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में शक्ति संतुलन का स्वरूप निरंतर परिवर्तित हो रहा है। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद कुछ समय तक एकध्रुवीय व्यवस्था की चर्चा हुई, किंतु बाद में अनेक उभरती शक्तियों के विकास ने बहुध्रुवीय विश्व की संभावना को मजबूत किया। आज संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, यूरोपीय संघ, भारत, रूस तथा अन्य प्रमुख शक्तियाँ विभिन्न क्षेत्रों में अपनी भूमिका का विस्तार कर रही हैं। आर्थिक प्रतिस्पर्धा, तकनीकी नवाचार, समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा संसाधन और क्षेत्रीय प्रभाव के क्षेत्रों में शक्ति संतुलन की नई परिस्थितियाँ विकसित हो रही हैं।

भारत की विदेश नीति में भी शक्ति संतुलन का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति, रणनीतिक स्वायत्तता, रक्षा क्षमता, आर्थिक विकास तथा विभिन्न देशों के साथ संतुलित संबंधों के माध्यम से अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने का प्रयास किया है। भारत एक ओर प्रमुख शक्तियों के साथ सहयोग बढ़ाता है, तो दूसरी ओर अपनी स्वतंत्र नीति और बहुपक्षीय सहयोग को भी महत्व देता है। यह दृष्टिकोण आधुनिक शक्ति संतुलन की व्यावहारिक अभिव्यक्ति माना जा सकता है।

अंततः कहा जा सकता है कि शक्ति संतुलन अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यावहारिक सिद्धांत है, जिसका उद्देश्य किसी एक राष्ट्र या शक्ति समूह के अत्यधिक प्रभुत्व को रोकना तथा विश्व व्यवस्था में स्थिरता बनाए रखना है। यह सिद्धांत इस विचार पर आधारित है कि जब विभिन्न शक्तियाँ एक-दूसरे के प्रभाव को संतुलित करती हैं, तब अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की संभावना बढ़ जाती है। यद्यपि इसके सामने हथियारों की दौड़, अविश्वास, गठबंधन की राजनीति और संघर्ष जैसी अनेक चुनौतियाँ हैं, फिर भी आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों को समझने के लिए शक्ति संतुलन की अवधारणा आज भी अत्यंत प्रासंगिक और प्रभावशाली मानी जाती है। यह केवल सैन्य शक्ति का सिद्धांत नहीं है, बल्कि राजनीतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, कूटनीतिक और सामरिक क्षमताओं के समन्वित उपयोग के माध्यम से विश्व राजनीति की गतिशील प्रकृति को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।

Unit-03

Diplomacy Disarmament & Arms Control & Nuclear Proliferation. (कूटनीति, निरस्त्रीकरण, शस्त्र नियंत्रण एवं परमाणु प्रसार)

कूटनीति, निरस्त्रीकरण, शस्त्र नियंत्रण तथा परमाणु प्रसार अंतरराष्ट्रीय राजनीति के ऐसे महत्वपूर्ण विषय हैं जो विश्व शांति, सुरक्षा, सहयोग और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रकृति को गहराई से प्रभावित करते हैं। आधुनिक विश्व में राष्ट्र केवल सैन्य शक्ति के आधार पर ही अपने हितों की रक्षा नहीं करते, बल्कि वार्ता, समझौते, सहयोग, विश्वास निर्माण तथा अंतरराष्ट्रीय कानून के माध्यम से भी अपने उद्देश्यों की पूर्ति का प्रयास करते हैं। इसी कारण कूटनीति को अंतरराष्ट्रीय संबंधों का सबसे महत्वपूर्ण साधन माना जाता है, जबकि निरस्त्रीकरण और शस्त्र नियंत्रण विश्व में हथियारों की होड़ को सीमित करने तथा युद्ध की संभावना को कम करने के उपाय हैं। दूसरी ओर परमाणु प्रसार का संबंध उन परिस्थितियों से है जिनमें परमाणु हथियारों अथवा परमाणु तकनीक का विस्तार विभिन्न देशों तक होता है और इससे वैश्विक सुरक्षा के सामने नई चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं। इन चारों अवधारणाओं का आपस में घनिष्ठ संबंध है क्योंकि इनका अंतिम उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति और स्थिरता को बनाए रखना है।

कूटनीति का अर्थ उन सभी शांतिपूर्ण उपायों से है जिनके माध्यम से एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्रों के साथ अपने संबंध स्थापित करता है, वार्ता करता है, विवादों का समाधान खोजता है तथा अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करता है। यह केवल राजदूतों और विदेश मंत्रालयों की गतिविधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, सामरिक तथा मानवीय संबंधों का भी समावेश होता है। कूटनीति का आधार संवाद, समझ, विश्वास और सहयोग है। इसका उद्देश्य युद्ध के स्थान पर वार्ता को प्राथमिकता देना तथा विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाना है। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में कूटनीति को युद्ध का विकल्प माना जाता है क्योंकि इसके माध्यम से अनेक जटिल समस्याओं का समाधान बिना हिंसा के संभव हो सकता है।

प्राचीन काल से ही विभिन्न राज्यों के बीच दूत भेजने और वार्ता करने की परंपरा रही है, किंतु आधुनिक कूटनीति का विकास संप्रभु राष्ट्र-राज्यों के उदय के साथ हुआ। स्थायी दूतावासों की स्थापना, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का आयोजन, बहुपक्षीय वार्ताएँ तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भूमिका ने कूटनीति को अधिक संगठित और प्रभावशाली बनाया। आज प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्र अन्य देशों में अपने राजदूत नियुक्त करता है जो अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हुए दोनों देशों के संबंधों को मजबूत बनाने का कार्य करते हैं। राजनयिक केवल राजनीतिक विषयों पर ही नहीं, बल्कि व्यापार, शिक्षा, संस्कृति, पर्यटन, विज्ञान और निवेश जैसे अनेक क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाने का प्रयास करते हैं।

कूटनीति के अनेक उद्देश्य होते हैं। इसका प्रमुख उद्देश्य राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना है। इसके अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय शांति बनाए रखना, आर्थिक सहयोग बढ़ाना, सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करना, विदेशों में अपने नागरिकों के हितों की रक्षा करना तथा वैश्विक समस्याओं के समाधान में योगदान देना भी इसके महत्वपूर्ण उद्देश्य हैं। आधुनिक युग में जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, महामारी, साइबर सुरक्षा, ऊर्जा संकट तथा समुद्री सुरक्षा जैसी चुनौतियों के समाधान के लिए प्रभावी कूटनीति अत्यंत आवश्यक हो गई है। बहुपक्षीय कूटनीति के माध्यम से विभिन्न देश संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन, विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में मिलकर वैश्विक समस्याओं पर विचार करते हैं।

कूटनीति की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि संबंधित राष्ट्रों के बीच विश्वास, संवाद और पारस्परिक सम्मान कितना है। प्रभावी कूटनीति के लिए योग्य नेतृत्व, कुशल राजनयिक, सही सूचना, धैर्य, दूरदर्शिता तथा परिस्थितियों का संतुलित मूल्यांकन आवश्यक होता है। यदि कूटनीति सफल रहती है, तो युद्ध की संभावना कम हो जाती है, व्यापार और सहयोग बढ़ता है तथा अंतरराष्ट्रीय संबंध अधिक स्थिर बनते हैं।

निरस्त्रीकरण का अर्थ है हथियारों, विशेषकर विनाशकारी हथियारों को समाप्त करना या उनकी संख्या में व्यापक कमी लाना। इसका मूल उद्देश्य विश्व में स्थायी शांति स्थापित करना तथा युद्ध की विनाशकारी संभावनाओं को कम करना है। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध की भयानक तबाही ने यह स्पष्ट कर दिया कि अत्यधिक सैन्य शक्ति और हथियारों की दौड़ मानवता के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। इसी अनुभव के आधार पर निरस्त्रीकरण की अवधारणा को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में विशेष महत्व प्राप्त हुआ। निरस्त्रीकरण केवल परमाणु हथियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें रासायनिक, जैविक, पारंपरिक तथा अन्य घातक हथियारों को भी सम्मिलित किया जाता है।

निरस्त्रीकरण की अवधारणा इस विश्वास पर आधारित है कि यदि राष्ट्रों के पास अत्यधिक हथियार नहीं होंगे, तो युद्ध की संभावना भी कम होगी। इसके माध्यम से रक्षा व्यय में कमी लाई जा सकती है और बचाए गए संसाधनों का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान, पर्यावरण संरक्षण तथा आर्थिक विकास जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है। निरस्त्रीकरण मानवता के लिए अधिक सुरक्षित और शांतिपूर्ण विश्व व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास है। अनेक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और संधियों के माध्यम से विभिन्न प्रकार के हथियारों को सीमित अथवा समाप्त करने के प्रयास किए गए हैं।

यद्यपि निरस्त्रीकरण का उद्देश्य अत्यंत आदर्श माना जाता है, फिर भी व्यवहार में इसे लागू करना कठिन रहा है। प्रत्येक राष्ट्र अपनी सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है और उसे यह आशंका रहती है कि यदि उसने अपने हथियार कम कर दिए तथा अन्य देशों ने ऐसा नहीं किया, तो उसकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। इसी कारण निरस्त्रीकरण की प्रक्रिया में पारदर्शिता, विश्वास और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण की व्यवस्था को अत्यंत आवश्यक माना जाता है।

शस्त्र नियंत्रण निरस्त्रीकरण से भिन्न अवधारणा है। निरस्त्रीकरण का उद्देश्य हथियारों को समाप्त करना या उनकी संख्या में व्यापक कमी लाना है, जबकि शस्त्र नियंत्रण का उद्देश्य हथियारों की संख्या, प्रकार, गुणवत्ता, उत्पादन, परीक्षण तथा उपयोग को नियंत्रित करना है। इसमें यह स्वीकार किया जाता है कि वर्तमान परिस्थितियों में सभी हथियारों को समाप्त करना संभव नहीं है, इसलिए कम-से-कम उनकी होड़ और अनियंत्रित वृद्धि को रोका जाए। शस्त्र नियंत्रण का लक्ष्य सैन्य प्रतिस्पर्धा को सीमित करना, विश्वास निर्माण करना तथा आकस्मिक युद्ध की संभावना को कम करना है।

शस्त्र नियंत्रण के अंतर्गत विभिन्न राष्ट्र आपसी समझौतों के माध्यम से यह निर्धारित करते हैं कि वे कितने हथियार रखेंगे, किस प्रकार के हथियारों का परीक्षण करेंगे या किन हथियारों का विकास नहीं करेंगे। इसके लिए निरीक्षण, सत्यापन तथा सूचना के आदान-प्रदान जैसी व्यवस्थाएँ भी विकसित की जाती हैं ताकि प्रत्येक पक्ष समझौते का पालन करे। शीत युद्ध के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के बीच हुए अनेक समझौते शस्त्र नियंत्रण के महत्वपूर्ण उदाहरण माने जाते हैं। इन समझौतों का उद्देश्य परमाणु हथियारों की होड़ को सीमित करना तथा वैश्विक तनाव को कम करना था।

शस्त्र नियंत्रण की आवश्यकता इसलिए भी है क्योंकि आधुनिक हथियार अत्यधिक विनाशकारी हैं। परमाणु, रासायनिक और जैविक हथियारों का उपयोग केवल सैनिकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लाखों निर्दोष नागरिकों, पर्यावरण तथा आने वाली पीढ़ियों पर भी गंभीर प्रभाव डाल सकता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इन हथियारों के विकास और उपयोग को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न समझौतों का समर्थन किया है।

परमाणु प्रसार का अर्थ है परमाणु हथियारों, परमाणु तकनीक अथवा परमाणु सामग्री का उन देशों तक फैलना जो पहले इनके स्वामी नहीं थे। द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में परमाणु हथियारों के उपयोग ने यह स्पष्ट कर दिया कि इनकी विनाशकारी क्षमता पारंपरिक हथियारों की तुलना में कहीं अधिक है। इसके बाद विभिन्न देशों ने परमाणु हथियारों का विकास प्रारंभ किया और धीरे-धीरे यह आशंका बढ़ने लगी कि यदि अधिक देशों के पास परमाणु हथियार पहुँच गए, तो विश्व शांति के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है। इसी स्थिति को परमाणु प्रसार कहा जाता है।

परमाणु प्रसार के अनेक कारण हैं। कुछ राष्ट्र अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए परमाणु हथियार विकसित करना चाहते हैं। कुछ देशों का मानना है कि परमाणु शक्ति उन्हें बाहरी आक्रमण से सुरक्षा प्रदान कर सकती है। कुछ राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और सामरिक प्रभाव बढ़ाने के उद्देश्य से भी परमाणु क्षमता प्राप्त करना चाहते हैं। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक और तकनीकी विकास तथा परमाणु तकनीक की उपलब्धता ने भी परमाणु प्रसार की संभावना को बढ़ाया है।

परमाणु प्रसार से अनेक गंभीर चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं। यदि अधिक देशों के पास परमाणु हथियार होंगे, तो क्षेत्रीय संघर्ष भी वैश्विक संकट का रूप ले सकते हैं। आकस्मिक युद्ध, तकनीकी त्रुटि, आतंकवादी संगठनों द्वारा परमाणु सामग्री की प्राप्ति अथवा गलत निर्णय जैसी परिस्थितियाँ मानवता के लिए अत्यंत विनाशकारी सिद्ध हो सकती हैं। परमाणु युद्ध का प्रभाव केवल युद्धरत देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि संपूर्ण विश्व के पर्यावरण, जलवायु, कृषि, स्वास्थ्य तथा मानव जीवन पर पड़ेगा। इसी कारण परमाणु प्रसार को रोकना आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य माना जाता है।

परमाणु प्रसार को नियंत्रित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक प्रयास किए गए हैं। विभिन्न संधियों, निरीक्षण व्यवस्थाओं तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाता है कि परमाणु तकनीक का उपयोग मुख्यतः शांतिपूर्ण उद्देश्यों, जैसे ऊर्जा उत्पादन, चिकित्सा, कृषि तथा वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए हो, न कि विनाशकारी हथियारों के निर्माण के लिए। अनेक देश परमाणु अप्रसार की नीति का समर्थन करते हैं और विश्व को परमाणु हथियारों से मुक्त बनाने की दिशा में कार्य करने की आवश्यकता पर बल देते हैं।

कूटनीति, निरस्त्रीकरण, शस्त्र नियंत्रण तथा परमाणु प्रसार परस्पर जुड़े हुए विषय हैं। प्रभावी कूटनीति के बिना निरस्त्रीकरण अथवा शस्त्र नियंत्रण संबंधी समझौते संभव नहीं हो सकते। इसी प्रकार यदि शस्त्र नियंत्रण की व्यवस्था प्रभावी होगी, तो परमाणु प्रसार की संभावना भी कम होगी। अंतरराष्ट्रीय सहयोग, विश्वास निर्माण तथा पारदर्शिता इन सभी प्रयासों की सफलता के लिए आवश्यक हैं। विश्व के विभिन्न राष्ट्र जब वार्ता और समझौते के माध्यम से अपने मतभेदों का समाधान खोजते हैं, तब वैश्विक शांति और सुरक्षा को अधिक मजबूती मिलती है।

भारत ने सदैव विश्व शांति, निरस्त्रीकरण तथा परमाणु हथियारों के नियंत्रण का समर्थन किया है। भारत का मत रहा है कि परमाणु हथियारों से मुक्त विश्व व्यवस्था मानवता के हित में है। साथ ही भारत यह भी मानता है कि प्रत्येक राष्ट्र को अपनी वैध सुरक्षा आवश्यकताओं का ध्यान रखने का अधिकार है। इसलिए भारत ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक शांति दोनों के महत्व पर बल दिया है। भारत ने अनेक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सार्वभौमिक, न्यायसंगत और भेदभावरहित निरस्त्रीकरण की आवश्यकता का समर्थन किया है।

समकालीन विश्व में जब नई प्रौद्योगिकियाँ, साइबर युद्ध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष सुरक्षा तथा सामरिक प्रतिस्पर्धा तेजी से बढ़ रही हैं, तब कूटनीति, निरस्त्रीकरण और शस्त्र नियंत्रण का महत्व पहले की तुलना में और अधिक बढ़ गया है। विश्व की स्थायी शांति केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि पारस्परिक विश्वास, संवाद, सहयोग, न्यायपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था तथा जिम्मेदार वैश्विक नेतृत्व से ही सुनिश्चित की जा सकती है। परमाणु हथियारों और अन्य विनाशकारी हथियारों के अनियंत्रित प्रसार को रोकना संपूर्ण मानवता की साझा जिम्मेदारी है।

अंततः कहा जा सकता है कि कूटनीति, निरस्त्रीकरण, शस्त्र नियंत्रण तथा परमाणु प्रसार आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति के ऐसे मूलभूत विषय हैं जिनका संबंध सीधे विश्व शांति, मानव सुरक्षा और वैश्विक स्थिरता से है। कूटनीति राष्ट्रों के बीच संवाद और सहयोग का माध्यम है, निरस्त्रीकरण हथियारों की समाप्ति की दिशा में प्रयास है, शस्त्र नियंत्रण हथियारों की अनियंत्रित वृद्धि को सीमित करने की व्यवस्था है तथा परमाणु प्रसार उस चुनौती का प्रतिनिधित्व करता है जिसे नियंत्रित करना विश्व समुदाय के लिए अत्यंत आवश्यक है। इन चारों अवधारणाओं का समन्वित अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि आधुनिक विश्व में स्थायी शांति केवल शक्ति के प्रदर्शन से नहीं, बल्कि सहयोग, विश्वास, संतुलित सुरक्षा और जिम्मेदार अंतरराष्ट्रीय व्यवहार से ही संभव है।

United Nations. (संयुक्त राष्ट्र)

संयुक्त राष्ट्र आधुनिक विश्व व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संस्था है, जिसका उद्देश्य विश्व में शांति, सुरक्षा, सहयोग, विकास तथा मानव कल्याण को बढ़ावा देना है। यह एक ऐसा वैश्विक संगठन है जिसमें विश्व के अधिकांश स्वतंत्र राष्ट्र सदस्य हैं और जो अंतरराष्ट्रीय विवादों का शांतिपूर्ण समाधान खोजने, राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने तथा आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय क्षेत्रों में सहयोग को प्रोत्साहित करने का कार्य करता है। संयुक्त राष्ट्र केवल एक राजनीतिक संगठन नहीं है, बल्कि यह विश्व समुदाय की सामूहिक इच्छाशक्ति का प्रतीक है, जिसके माध्यम से विभिन्न देश साझा समस्याओं का समाधान खोजने का प्रयास करते हैं। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों में इसकी भूमिका अत्यंत व्यापक और बहुआयामी है।

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना द्वितीय विश्व युद्ध की भीषण त्रासदी के बाद हुई। इस युद्ध में करोड़ों लोगों की मृत्यु, व्यापक आर्थिक विनाश, मानवाधिकारों का हनन तथा परमाणु हथियारों के उपयोग ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि भविष्य में ऐसे युद्धों को रोकने के लिए कोई प्रभावी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था स्थापित नहीं की गई, तो मानव सभ्यता के अस्तित्व पर गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है। इसी पृष्ठभूमि में विभिन्न देशों ने मिलकर एक ऐसे संगठन की स्थापना का निर्णय लिया जो विश्व शांति और सुरक्षा की रक्षा के लिए कार्य करे। 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र अस्तित्व में आया और तभी से यह तिथि प्रतिवर्ष संयुक्त राष्ट्र दिवस के रूप में मनाई जाती है। इस संगठन का मुख्यालय न्यूयॉर्क में स्थित है और समय के साथ इसकी सदस्य संख्या बढ़कर लगभग पूरे विश्व का प्रतिनिधित्व करने लगी है।

संयुक्त राष्ट्र का मूल उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों का विकास, अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना, आर्थिक और सामाजिक समस्याओं के समाधान में सहायता करना, मानवाधिकारों की रक्षा करना, समानता और न्याय के सिद्धांतों को प्रोत्साहित करना तथा विश्व में सतत विकास को बढ़ावा देना भी इसके प्रमुख उद्देश्य हैं। संयुक्त राष्ट्र इस विश्वास पर आधारित है कि विश्व की जटिल समस्याओं का समाधान किसी एक राष्ट्र द्वारा नहीं, बल्कि सभी देशों के सहयोग से ही संभव है।

संयुक्त राष्ट्र के कार्यों का आधार उसका चार्टर है, जिसमें संगठन के सिद्धांत, उद्देश्य, अधिकार और दायित्व निर्धारित किए गए हैं। चार्टर के अनुसार सभी सदस्य राष्ट्र संप्रभु समानता के सिद्धांत का सम्मान करेंगे, अंतरराष्ट्रीय विवादों का समाधान शांतिपूर्ण साधनों से करेंगे, बल प्रयोग से बचेंगे तथा संयुक्त राष्ट्र के निर्णयों का सम्मान करेंगे। यह व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय कानून और सहयोग की भावना को मजबूत करने का प्रयास करती है।

संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली विभिन्न प्रमुख अंगों के माध्यम से संचालित होती है। महासभा संगठन का सबसे व्यापक प्रतिनिधिक अंग है जिसमें सभी सदस्य देशों को समान मताधिकार प्राप्त होता है। प्रत्येक सदस्य राष्ट्र महासभा में अपनी बात रख सकता है तथा विभिन्न अंतरराष्ट्रीय विषयों पर विचार-विमर्श में भाग ले सकता है। महासभा विश्व समुदाय की सामूहिक राय व्यक्त करने का महत्वपूर्ण मंच है। यद्यपि इसके अधिकांश निर्णय सिफारिशात्मक होते हैं, फिर भी इनका नैतिक और राजनीतिक महत्व अत्यंत अधिक होता है।

सुरक्षा परिषद संयुक्त राष्ट्र का सबसे प्रभावशाली अंग माना जाता है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने की प्राथमिक जिम्मेदारी उसी पर होती है। यदि किसी क्षेत्र में युद्ध, आक्रमण अथवा शांति के लिए खतरा उत्पन्न होता है, तो सुरक्षा परिषद उस स्थिति पर विचार करती है और आवश्यक कदम उठाने का अधिकार रखती है। वह युद्धविराम की अपील कर सकती है, आर्थिक प्रतिबंध लगा सकती है, शांति सेना भेज सकती है अथवा आवश्यकता पड़ने पर सामूहिक कार्रवाई की अनुमति दे सकती है। सुरक्षा परिषद में स्थायी और अस्थायी सदस्य होते हैं। स्थायी सदस्यों को विशेष वीटो अधिकार प्राप्त है, जिसके कारण कई बार महत्वपूर्ण निर्णयों में कठिनाई भी उत्पन्न हो जाती है।

आर्थिक और सामाजिक परिषद संयुक्त राष्ट्र का वह अंग है जो आर्थिक विकास, सामाजिक प्रगति, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पर्यावरण, विज्ञान, संस्कृति तथा मानव कल्याण से संबंधित विषयों पर कार्य करता है। इसके माध्यम से अनेक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं जिनका उद्देश्य विभिन्न देशों के जीवन स्तर को बेहतर बनाना तथा वैश्विक असमानताओं को कम करना है। विकासशील देशों के लिए तकनीकी सहायता, अनुसंधान तथा नीति निर्माण में भी यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय संयुक्त राष्ट्र का प्रमुख न्यायिक अंग है। इसका मुख्यालय हेग में स्थित है। यह विभिन्न देशों के बीच उत्पन्न कानूनी विवादों का अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर समाधान करता है तथा आवश्यकता पड़ने पर संयुक्त राष्ट्र के अन्य अंगों को कानूनी परामर्श भी प्रदान करता है। इसका उद्देश्य न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण ढंग से अंतरराष्ट्रीय विवादों का निपटारा करना है।

संयुक्त राष्ट्र सचिवालय संगठन का प्रशासनिक अंग है, जिसका नेतृत्व महासचिव करते हैं। महासचिव संगठन की विभिन्न गतिविधियों का समन्वय करते हैं, अंतरराष्ट्रीय संकटों पर ध्यान आकर्षित करते हैं तथा सदस्य देशों के बीच संवाद और सहयोग को बढ़ावा देते हैं। उन्हें कई बार विश्व समुदाय का नैतिक प्रतिनिधि भी माना जाता है क्योंकि वे शांति, मानवाधिकार और वैश्विक सहयोग के पक्ष में निरंतर कार्य करते हैं।

संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत अनेक विशिष्ट संस्थाएँ और कार्यक्रम भी कार्य करते हैं, जो शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, बाल कल्याण, श्रम, कृषि, विज्ञान, संस्कृति, पर्यावरण तथा विकास जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। इन संस्थाओं के माध्यम से विश्व के विभिन्न भागों में शिक्षा का प्रसार, रोगों की रोकथाम, खाद्य सहायता, टीकाकरण कार्यक्रम, सांस्कृतिक धरोहरों का संरक्षण, श्रमिक अधिकारों की रक्षा तथा सतत विकास के अनेक कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं। इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र केवल राजनीतिक संस्था नहीं, बल्कि मानव विकास का भी प्रमुख वैश्विक मंच है।

संयुक्त राष्ट्र ने विश्व शांति बनाए रखने के लिए शांति स्थापना अभियानों की परंपरा विकसित की है। जब किसी क्षेत्र में संघर्ष उत्पन्न होता है और संबंधित पक्ष युद्धविराम पर सहमत हो जाते हैं, तब संयुक्त राष्ट्र शांति सेना भेजकर स्थिति को सामान्य बनाने का प्रयास करता है। इन अभियानों का उद्देश्य संघर्ष को दोबारा भड़कने से रोकना, नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना, मानवीय सहायता उपलब्ध कराना तथा स्थायी शांति स्थापित करने में सहायता करना होता है। अनेक देशों के सैनिक इन अभियानों में भाग लेते हैं और भारत भी लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना अभियानों में महत्वपूर्ण योगदान देता रहा है।

मानवाधिकारों की रक्षा संयुक्त राष्ट्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह अनुभव किया गया कि मानव गरिमा, स्वतंत्रता और समानता की रक्षा के बिना विश्व शांति संभव नहीं है। इसी उद्देश्य से मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा स्वीकार की गई, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, शिक्षा, समान अवसर, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा सम्मानजनक जीवन के अधिकार को मान्यता दी गई। संयुक्त राष्ट्र विभिन्न देशों को मानवाधिकारों की रक्षा के लिए प्रेरित करता है तथा आवश्यक होने पर संबंधित मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय ध्यान भी आकर्षित करता है।

संयुक्त राष्ट्र ने सतत विकास के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। गरीबी उन्मूलन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, लैंगिक समानता, स्वच्छ जल, स्वास्थ्य सेवाएँ, पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा, आर्थिक विकास तथा जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों के समाधान के लिए वैश्विक स्तर पर साझा लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। इन लक्ष्यों के माध्यम से सभी देशों को सहयोगपूर्वक विकास की दिशा में कार्य करने के लिए प्रेरित किया जाता है।

संयुक्त राष्ट्र की अनेक उपलब्धियाँ रही हैं। इसने कई अंतरराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान में सहायता की है, उपनिवेशवाद के अंत की प्रक्रिया को प्रोत्साहित किया है, मानवाधिकारों की रक्षा के लिए वैश्विक मानक स्थापित किए हैं, शांति स्थापना अभियानों के माध्यम से अनेक संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में स्थिरता लाने का प्रयास किया है तथा शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है। महामारी नियंत्रण, टीकाकरण कार्यक्रम, शरणार्थियों की सहायता तथा प्राकृतिक आपदाओं के समय मानवीय सहयोग में भी इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।

इसके बावजूद संयुक्त राष्ट्र अनेक चुनौतियों और आलोचनाओं का सामना भी करता है। सुरक्षा परिषद की संरचना को लेकर लंबे समय से सुधार की मांग की जाती रही है क्योंकि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों की तुलना में इसका ढाँचा पुराना माना जाता है। वीटो अधिकार के कारण कई बार महत्वपूर्ण निर्णय नहीं लिए जा पाते और महाशक्तियों के राजनीतिक मतभेद संगठन की प्रभावशीलता को प्रभावित करते हैं। कुछ आलोचकों का मत है कि संयुक्त राष्ट्र कई बार बड़े देशों के प्रभाव से मुक्त होकर स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर पाता। वित्तीय संसाधनों की कमी, सदस्य देशों के बीच मतभेद तथा जटिल अंतरराष्ट्रीय संकट भी इसकी कार्यक्षमता को प्रभावित करते हैं।

भारत संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य है और उसने सदैव इस संगठन के उद्देश्यों और सिद्धांतों का समर्थन किया है। भारत ने शांति स्थापना अभियानों में सक्रिय भागीदारी की है, उपनिवेशवाद के विरोध, नस्लभेद के उन्मूलन, विकासशील देशों के अधिकारों तथा वैश्विक न्याय के पक्ष में निरंतर आवाज उठाई है। भारत यह भी मानता है कि संयुक्त राष्ट्र को अधिक लोकतांत्रिक, प्रतिनिधिक और प्रभावी बनाने के लिए सुरक्षा परिषद सहित विभिन्न संस्थागत सुधार आवश्यक हैं।

वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में संयुक्त राष्ट्र का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, महामारी, साइबर अपराध, परमाणु हथियारों का प्रसार, शरणार्थी संकट, खाद्य असुरक्षा तथा आर्थिक असमानता जैसी समस्याएँ किसी एक देश तक सीमित नहीं रहतीं। इनका समाधान केवल अंतरराष्ट्रीय सहयोग से ही संभव है। संयुक्त राष्ट्र ऐसा मंच उपलब्ध कराता है जहाँ सभी देश समान रूप से संवाद कर सकते हैं, अपने मतभेदों को शांतिपूर्ण ढंग से व्यक्त कर सकते हैं तथा साझा चुनौतियों के समाधान के लिए सामूहिक प्रयास कर सकते हैं।

अंततः कहा जा सकता है कि संयुक्त राष्ट्र आधुनिक विश्व व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जिसने विश्व शांति, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, मानवाधिकारों की रक्षा, आर्थिक और सामाजिक विकास तथा वैश्विक स्थिरता की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यद्यपि इसकी संरचना और कार्यप्रणाली में सुधार की आवश्यकता समय-समय पर अनुभव की जाती रही है, फिर भी आज भी यह विश्व समुदाय की सामूहिक आशा, सहयोग और उत्तरदायित्व का सबसे व्यापक प्रतीक बना हुआ है। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति को समझने के लिए संयुक्त राष्ट्र की भूमिका, उसके उद्देश्य, उपलब्धियाँ, सीमाएँ तथा वैश्विक महत्व का अध्ययन अत्यंत आवश्यक माना जाता है क्योंकि यही संस्था विश्व को संघर्ष के स्थान पर सहयोग और शांति की दिशा में आगे बढ़ाने का सतत प्रयास करती है।

New World Order. ( नई विश्व व्यवस्था)

नई विश्व व्यवस्था आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति की एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जिसका संबंध शीत युद्ध की समाप्ति के बाद विश्व राजनीति में उत्पन्न हुए व्यापक परिवर्तनों से है। यह अवधारणा उस नई अंतरराष्ट्रीय संरचना को व्यक्त करती है जिसमें वैश्विक शक्ति संतुलन, अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रकृति, आर्थिक सहयोग, सुरक्षा की अवधारणा, वैश्वीकरण, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका तथा राष्ट्रों के पारस्परिक संबंधों में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिले। नई विश्व व्यवस्था का विचार इस विश्वास पर आधारित है कि विश्व में संघर्ष और वैचारिक प्रतिस्पर्धा के स्थान पर सहयोग, संवाद, आर्थिक विकास, लोकतंत्र, मानवाधिकार तथा अंतरराष्ट्रीय कानून को अधिक महत्व दिया जाएगा। यद्यपि व्यवहार में इस व्यवस्था ने अनेक उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं, फिर भी इसके सामने अनेक चुनौतियाँ और विवाद भी उत्पन्न हुए हैं।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व दो प्रमुख वैचारिक और राजनीतिक गुटों में विभाजित हो गया था। एक ओर संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में पूँजीवादी और उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था थी, जबकि दूसरी ओर सोवियत संघ के नेतृत्व में समाजवादी व्यवस्था विकसित हुई। इस वैचारिक प्रतिस्पर्धा को शीत युद्ध कहा गया। लगभग चार दशकों तक विश्व राजनीति इसी द्विध्रुवीय व्यवस्था के अंतर्गत संचालित होती रही। दोनों महाशक्तियाँ सैन्य शक्ति, परमाणु हथियारों, तकनीकी विकास, आर्थिक प्रभाव तथा वैचारिक विस्तार के माध्यम से एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करती रहीं। अनेक क्षेत्रीय संघर्ष, सैन्य गठबंधन तथा हथियारों की दौड़ इसी पृष्ठभूमि में विकसित हुए।

उन्नीस सौ नवासी से उन्नीस सौ इक्यानवे के बीच विश्व राजनीति में तीव्र परिवर्तन हुए। पूर्वी यूरोप में समाजवादी शासन समाप्त होने लगे, बर्लिन की दीवार का पतन हुआ और अंततः सोवियत संघ का विघटन हो गया। इसके साथ ही शीत युद्ध का अंत हुआ और द्विध्रुवीय शक्ति संरचना समाप्त हो गई। इन घटनाओं के बाद यह धारणा विकसित हुई कि विश्व अब एक नए युग में प्रवेश कर रहा है, जहाँ वैचारिक संघर्ष की तीव्रता कम होगी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की संभावनाएँ बढ़ेंगी। इसी परिवर्तित स्थिति को नई विश्व व्यवस्था कहा गया।

नई विश्व व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि कुछ समय के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व की एकमात्र महाशक्ति के रूप में उभरा। सोवियत संघ के विघटन के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति का संतुलन बदल गया और अमेरिका की राजनीतिक, आर्थिक तथा सैन्य क्षमता अन्य देशों की तुलना में अधिक प्रभावशाली दिखाई देने लगी। इस कारण अनेक विद्वानों ने इस अवधि को एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था कहा। इस समय वैश्विक स्तर पर अमेरिका का प्रभाव अंतरराष्ट्रीय संगठनों, आर्थिक संस्थाओं, सुरक्षा मामलों तथा वैश्विक नीति निर्माण में स्पष्ट रूप से दिखाई देता था।

नई विश्व व्यवस्था की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता वैश्वीकरण का तीव्र विस्तार था। संचार क्रांति, सूचना प्रौद्योगिकी, परिवहन के आधुनिक साधनों तथा मुक्त व्यापार की नीतियों ने विभिन्न देशों को पहले की तुलना में अधिक निकट ला दिया। वस्तुओं, सेवाओं, पूँजी, तकनीक, विचारों और सूचनाओं का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीव्र आदान-प्रदान प्रारंभ हुआ। बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विस्तार हुआ, विदेशी निवेश बढ़ा तथा विश्व अर्थव्यवस्था अधिक परस्पर निर्भर बन गई। इससे अनेक देशों को आर्थिक विकास के नए अवसर प्राप्त हुए, किंतु साथ ही आर्थिक असमानता, सांस्कृतिक प्रभाव तथा स्थानीय उद्योगों पर दबाव जैसी नई समस्याएँ भी सामने आईं।

नई विश्व व्यवस्था में लोकतंत्र और मानवाधिकारों को विशेष महत्व दिया जाने लगा। अनेक देशों में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्थाओं का विस्तार हुआ और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों की रक्षा को वैश्विक दायित्व के रूप में देखा जाने लगा। संयुक्त राष्ट्र तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने मानवाधिकार, महिला सशक्तिकरण, बाल संरक्षण, सामाजिक न्याय तथा लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए अनेक कार्यक्रम प्रारंभ किए। यह विचार भी मजबूत हुआ कि राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक विकास के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं का सुदृढ़ होना आवश्यक है।

अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भूमिका भी नई विश्व व्यवस्था में अधिक महत्वपूर्ण हो गई। संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक तथा अनेक क्षेत्रीय संगठनों ने वैश्विक सहयोग को बढ़ाने का प्रयास किया। अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान, शांति स्थापना, विकास सहायता, व्यापारिक नियमों के निर्माण, पर्यावरण संरक्षण तथा वैश्विक स्वास्थ्य संबंधी कार्यक्रमों में इन संस्थाओं की भूमिका बढ़ी। यह माना गया कि विश्व की अनेक समस्याओं का समाधान केवल किसी एक राष्ट्र द्वारा नहीं, बल्कि बहुपक्षीय सहयोग के माध्यम से ही संभव है।

नई विश्व व्यवस्था में सुरक्षा की अवधारणा भी व्यापक हुई। पहले सुरक्षा का अर्थ मुख्यतः बाहरी सैन्य आक्रमण से रक्षा करना माना जाता था, किंतु बाद में यह स्पष्ट हुआ कि आतंकवाद, साइबर अपराध, जलवायु परिवर्तन, महामारी, ऊर्जा संकट, खाद्य असुरक्षा तथा पर्यावरणीय समस्याएँ भी वैश्विक सुरक्षा को प्रभावित करती हैं। इस कारण मानव सुरक्षा की अवधारणा विकसित हुई, जिसमें व्यक्ति के जीवन, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, पर्यावरण तथा सम्मानजनक जीवन को भी सुरक्षा का महत्वपूर्ण भाग माना गया। इस परिवर्तन ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा और प्राथमिकताओं दोनों को प्रभावित किया।

आर्थिक उदारीकरण नई विश्व व्यवस्था का एक प्रमुख तत्व था। अनेक देशों ने सरकारी नियंत्रण को कम करते हुए निजी क्षेत्र, विदेशी निवेश तथा मुक्त व्यापार को प्रोत्साहित किया। इससे वैश्विक बाजारों का विस्तार हुआ, उत्पादन क्षमता बढ़ी तथा तकनीकी नवाचार को गति मिली। विकासशील देशों ने भी अपनी अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक व्यापार से जोड़ने का प्रयास किया। भारत में उन्नीस सौ इक्यानवे के आर्थिक सुधार इसी व्यापक वैश्विक परिवर्तन की पृष्ठभूमि में प्रारंभ हुए, जिनके माध्यम से उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों को अपनाया गया।

नई विश्व व्यवस्था के सकारात्मक परिणामों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग की वृद्धि, आर्थिक विकास के अवसरों का विस्तार, वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति, वैश्विक संचार का विकास, लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रसार तथा अनेक क्षेत्रों में जीवन स्तर में सुधार को शामिल किया जा सकता है। सूचना प्रौद्योगिकी, चिकित्सा विज्ञान, शिक्षा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान के क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति हुई। अनेक देशों ने गरीबी कम करने, औद्योगिक विकास बढ़ाने तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी भागीदारी को मजबूत करने का प्रयास किया।

इसके बावजूद नई विश्व व्यवस्था अनेक आलोचनाओं और चुनौतियों से भी घिरी रही। कुछ विद्वानों का मत है कि यह व्यवस्था वास्तविक समानता पर आधारित नहीं थी, बल्कि इसमें शक्तिशाली देशों का प्रभाव अधिक था। अनेक अंतरराष्ट्रीय निर्णयों में महाशक्तियों का वर्चस्व स्पष्ट दिखाई देता रहा। कुछ मामलों में सैन्य हस्तक्षेप, आर्थिक प्रतिबंध तथा राजनीतिक दबाव को लेकर भी विवाद उत्पन्न हुए। आलोचकों का यह भी मत है कि वैश्वीकरण के लाभ सभी देशों और समाजों तक समान रूप से नहीं पहुँच पाए। विकसित और विकासशील देशों के बीच आर्थिक असमानता बनी रही तथा कई गरीब देशों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना करने में कठिनाइयाँ हुईं।

नई विश्व व्यवस्था के सामने आतंकवाद सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक बनकर उभरा। विशेष रूप से इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में हुए बड़े आतंकवादी हमलों ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल पारंपरिक सैन्य शक्ति के माध्यम से सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद विरोधी सहयोग, खुफिया जानकारी के आदान-प्रदान तथा सामूहिक सुरक्षा पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा। इसी प्रकार साइबर सुरक्षा, जैविक खतरे तथा अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध जैसी नई चुनौतियों ने भी वैश्विक सहयोग की आवश्यकता को और अधिक बढ़ाया।

जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट भी नई विश्व व्यवस्था की महत्वपूर्ण चुनौतियों में शामिल हैं। औद्योगिकीकरण, प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन तथा वैश्विक तापवृद्धि ने यह स्पष्ट कर दिया कि पर्यावरण संरक्षण केवल किसी एक देश का विषय नहीं है। इसलिए विभिन्न देशों ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता को स्वीकार किया। सतत विकास, स्वच्छ ऊर्जा, जैव विविधता संरक्षण तथा पर्यावरणीय संतुलन जैसे विषय वैश्विक नीति निर्माण के केंद्र में आए।

इक्कीसवीं शताब्दी में नई विश्व व्यवस्था का स्वरूप भी बदलने लगा। चीन के तीव्र आर्थिक और सामरिक विकास, भारत जैसी उभरती शक्तियों की बढ़ती भूमिका, रूस के पुनः सक्रिय होने तथा क्षेत्रीय संगठनों के प्रभाव में वृद्धि के कारण विश्व धीरे-धीरे बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। अब वैश्विक राजनीति केवल एक महाशक्ति के प्रभाव तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि विभिन्न शक्तियाँ अलग-अलग क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इससे नई विश्व व्यवस्था और अधिक जटिल तथा बहुआयामी बन गई है।

भारत के लिए नई विश्व व्यवस्था अनेक अवसर और चुनौतियाँ दोनों लेकर आई। आर्थिक उदारीकरण के माध्यम से भारत ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी भागीदारी बढ़ाई, विदेशी निवेश आकर्षित किया तथा सूचना प्रौद्योगिकी, सेवा क्षेत्र और उद्योग में उल्लेखनीय प्रगति की। साथ ही भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को बनाए रखते हुए विभिन्न प्रमुख शक्तियों के साथ संतुलित संबंध स्थापित करने का प्रयास किया। संयुक्त राष्ट्र, जी-20, ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की सक्रिय भूमिका इस बात का संकेत है कि वह नई वैश्विक व्यवस्था में अपनी महत्वपूर्ण भागीदारी सुनिश्चित करना चाहता है।

नई विश्व व्यवस्था का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति निरंतर परिवर्तनशील है। शक्ति संतुलन, आर्थिक प्रतिस्पर्धा, वैश्विक सहयोग, तकनीकी विकास तथा मानवीय चुनौतियाँ सभी मिलकर विश्व व्यवस्था को प्रभावित करती हैं। इसलिए किसी भी राष्ट्र के लिए केवल सैन्य शक्ति पर्याप्त नहीं है, बल्कि आर्थिक विकास, वैज्ञानिक प्रगति, प्रभावी कूटनीति, लोकतांत्रिक संस्थाएँ तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी समान रूप से आवश्यक हैं।

अंततः कहा जा सकता है कि नई विश्व व्यवस्था शीत युद्ध की समाप्ति के बाद विकसित हुई ऐसी अंतरराष्ट्रीय संरचना है जिसमें वैश्विक सहयोग, आर्थिक वैश्वीकरण, लोकतंत्र, मानवाधिकार, बहुपक्षीय संस्थाओं की भूमिका तथा नई सुरक्षा चुनौतियों को विशेष महत्व प्राप्त हुआ। यद्यपि इस व्यवस्था ने विकास, तकनीकी प्रगति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए अवसर प्रदान किए, फिर भी आर्थिक असमानता, आतंकवाद, पर्यावरणीय संकट, क्षेत्रीय संघर्ष तथा शक्ति प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियाँ आज भी विद्यमान हैं। इसलिए नई विश्व व्यवस्था को एक स्थिर और पूर्ण व्यवस्था के रूप में नहीं, बल्कि निरंतर विकसित होती अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया के रूप में समझना अधिक उपयुक्त है, जिसमें विश्व शांति, न्याय, सहयोग और संतुलित विकास की खोज आज भी जारी है।

Unit-04

20th Centaury of International relation: World War I & II. (बीसवीं शताब्दी के अंतरराष्ट्रीय संबंध : प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध)

बीसवीं शताब्दी अंतरराष्ट्रीय संबंधों के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक काल मानी जाती है। इस शताब्दी ने विश्व राजनीति, अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन, कूटनीति, सैन्य रणनीति, वैश्विक अर्थव्यवस्था तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के विकास को गहराई से प्रभावित किया। विशेष रूप से प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध ने विश्व व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया। इन दोनों युद्धों ने न केवल करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित किया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रकृति, राष्ट्रों के पारस्परिक व्यवहार, वैश्विक शक्ति संरचना तथा शांति और सुरक्षा की अवधारणाओं को भी नया स्वरूप प्रदान किया। इसी कारण बीसवीं शताब्दी का अध्ययन अंतरराष्ट्रीय राजनीति की समझ के लिए अत्यंत आवश्यक माना जाता है।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक यूरोप विश्व राजनीति का केंद्र था। औद्योगिक क्रांति के कारण यूरोपीय देशों की आर्थिक और सैन्य शक्ति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस, ऑस्ट्रिया-हंगरी और इटली जैसे राष्ट्र विश्व के विभिन्न भागों में अपने उपनिवेशों का विस्तार कर रहे थे। साम्राज्यवाद, राष्ट्रवाद, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और सैन्य शक्ति की दौड़ ने यूरोप के प्रमुख देशों के बीच अविश्वास और तनाव को बढ़ा दिया। विभिन्न देशों ने अपनी सुरक्षा के लिए सैन्य गठबंधन बनाए, जिससे पूरा महाद्वीप दो विरोधी गुटों में विभाजित हो गया। यह वातावरण धीरे-धीरे ऐसे संकट की ओर बढ़ा जिसने अंततः प्रथम विश्व युद्ध का रूप धारण किया।

प्रथम विश्व युद्ध का तत्काल कारण ऑस्ट्रिया-हंगरी के युवराज आर्कड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड की 1914 में सारायेवो में हत्या थी, किंतु इसके पीछे अनेक गहरे राजनीतिक और आर्थिक कारण पहले से मौजूद थे। राष्ट्रवाद की तीव्र भावना, साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा, सैन्यवाद, हथियारों की दौड़ तथा जटिल सैन्य गठबंधनों ने युद्ध की संभावना को पहले ही बढ़ा दिया था। हत्या की घटना ने केवल उस तनाव को विस्फोटक रूप दे दिया जो वर्षों से बढ़ रहा था। युद्ध प्रारंभ होते ही अनेक देश अपने-अपने गठबंधनों के अनुसार संघर्ष में शामिल हो गए और देखते ही देखते यह संघर्ष यूरोप तक सीमित न रहकर विश्वव्यापी युद्ध बन गया।

प्रथम विश्व युद्ध में एक ओर मित्र राष्ट्र थे, जिनमें ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और बाद में संयुक्त राज्य अमेरिका शामिल हुए, जबकि दूसरी ओर केंद्रीय शक्तियाँ थीं, जिनमें जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी, उस्मानी साम्राज्य और बुल्गारिया प्रमुख थे। युद्ध चार वर्षों तक चला और इसमें आधुनिक हथियारों, मशीनगनों, टैंकों, पनडुब्बियों तथा रासायनिक हथियारों का व्यापक उपयोग हुआ। इस युद्ध ने यह सिद्ध कर दिया कि औद्योगिक युग का युद्ध पहले की तुलना में कहीं अधिक विनाशकारी हो सकता है। लाखों सैनिकों और नागरिकों की मृत्यु हुई, अनेक नगर नष्ट हो गए तथा यूरोप की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में पड़ गई।

प्रथम विश्व युद्ध का अंत 1918 में मित्र राष्ट्रों की विजय के साथ हुआ। इसके बाद 1919 में वर्साय की संधि संपन्न हुई, जिसके अंतर्गत जर्मनी पर कठोर शर्तें लगाई गईं। उसे भारी क्षतिपूर्ति देने, अपनी सेना सीमित करने तथा कुछ क्षेत्रों को छोड़ने के लिए बाध्य किया गया। यद्यपि इस संधि का उद्देश्य भविष्य के युद्धों को रोकना था, किंतु इसकी कठोर शर्तों ने जर्मनी में असंतोष, आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता को जन्म दिया। बाद के वर्षों में यही परिस्थितियाँ नाजीवाद के उदय तथा द्वितीय विश्व युद्ध के प्रमुख कारणों में शामिल हुईं।

प्रथम विश्व युद्ध का अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर गहरा प्रभाव पड़ा। यूरोप के कई बड़े साम्राज्य, जैसे ऑस्ट्रिया-हंगरी, उस्मानी साम्राज्य और रूस का जारवादी शासन समाप्त हो गया। अनेक नए राष्ट्र अस्तित्व में आए। राष्ट्रों के बीच सहयोग और शांति बनाए रखने के उद्देश्य से राष्ट्र संघ की स्थापना की गई, जिससे आशा की गई कि भविष्य में युद्धों को रोका जा सकेगा। अंतरराष्ट्रीय कानून, सामूहिक सुरक्षा तथा बहुपक्षीय सहयोग की अवधारणाओं को भी इस अवधि में अधिक महत्व मिलने लगा।

यद्यपि राष्ट्र संघ की स्थापना विश्व शांति के उद्देश्य से हुई थी, फिर भी वह अपने लक्ष्यों को पूरी तरह प्राप्त नहीं कर सका। उसके पास प्रभावी सैन्य शक्ति का अभाव था तथा प्रमुख देशों के सहयोग में भी कमी थी। संयुक्त राज्य अमेरिका स्वयं उसका सदस्य नहीं बना। इसी बीच विश्व आर्थिक मंदी, राजनीतिक अस्थिरता तथा तानाशाही विचारधाराओं के उदय ने अंतरराष्ट्रीय स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया। जर्मनी में एडॉल्फ हिटलर, इटली में मुसोलिनी और जापान में सैन्यवाद के बढ़ते प्रभाव ने विश्व शांति के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न किया।

द्वितीय विश्व युद्ध के पीछे अनेक कारण थे। वर्साय संधि से उत्पन्न असंतोष, आर्थिक महामंदी, राष्ट्र संघ की कमजोरी, तुष्टिकरण की नीति, आक्रामक राष्ट्रवाद तथा विस्तारवादी महत्वाकांक्षाएँ प्रमुख कारण थे। जर्मनी ने हिटलर के नेतृत्व में पुनः सैन्य शक्ति का विकास किया और अपने खोए हुए क्षेत्रों को वापस लेने के साथ-साथ यूरोप में प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास किया। इटली और जापान ने भी विस्तारवादी नीतियाँ अपनाईं। इन परिस्थितियों में सितंबर 1939 में जर्मनी द्वारा पोलैंड पर आक्रमण के साथ द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ हुआ।

द्वितीय विश्व युद्ध में एक ओर मित्र राष्ट्र थे, जिनमें ब्रिटेन, फ्रांस, सोवियत संघ, संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन प्रमुख थे, जबकि दूसरी ओर धुरी राष्ट्र थे, जिनमें जर्मनी, इटली और जापान शामिल थे। यह युद्ध छह वर्षों तक चला और मानव इतिहास का सबसे व्यापक तथा विनाशकारी युद्ध सिद्ध हुआ। इस युद्ध में वायु सेना, नौसेना, आधुनिक टैंक, रॉकेट, रडार तथा वैज्ञानिक तकनीकों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया। युद्ध के अंतिम चरण में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए गए, जिसने युद्ध की दिशा बदल दी और विश्व को परमाणु युग में प्रवेश करा दिया।

द्वितीय विश्व युद्ध में करोड़ों लोगों की मृत्यु हुई। अनेक शहर पूर्णतः नष्ट हो गए, उद्योग ध्वस्त हो गए और वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी क्षति पहुँची। यह युद्ध केवल सैनिकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नागरिक समाज भी बड़े पैमाने पर इसका शिकार बना। मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन, नरसंहार, विस्थापन तथा शरणार्थी संकट ने पूरी मानवता को झकझोर दिया। इन घटनाओं ने विश्व समुदाय को यह सोचने पर विवश किया कि भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोकने के लिए अधिक प्रभावी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था आवश्यक है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय संबंधों में व्यापक परिवर्तन हुए। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई ताकि अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को अधिक प्रभावी ढंग से बनाए रखा जा सके। संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ दो महाशक्तियों के रूप में उभरे तथा विश्व धीरे-धीरे शीत युद्ध की द्विध्रुवीय व्यवस्था में विभाजित हो गया। उपनिवेशवाद का पतन प्रारंभ हुआ और एशिया तथा अफ्रीका के अनेक देशों ने स्वतंत्रता प्राप्त की। अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के लिए विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा अन्य संस्थाओं की स्थापना की गई।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद मानवाधिकारों को विशेष महत्व प्राप्त हुआ। संयुक्त राष्ट्र ने मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा स्वीकार की और यह विचार विकसित हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान, स्वतंत्रता और समान अवसर प्राप्त होना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय कानून का विकास हुआ तथा युद्ध अपराधों के लिए व्यक्तियों को उत्तरदायी ठहराने की परंपरा प्रारंभ हुई। नूर्नबर्ग और टोक्यो न्यायाधिकरणों ने यह सिद्ध किया कि अंतरराष्ट्रीय अपराधों के लिए राजनीतिक नेताओं और सैन्य अधिकारियों को भी उत्तरदायी बनाया जा सकता है।

बीसवीं शताब्दी के इन दोनों विश्व युद्धों ने शक्ति संतुलन की अवधारणा को भी प्रभावित किया। प्रथम विश्व युद्ध से पहले शक्ति संतुलन मुख्यतः यूरोपीय राष्ट्रों के बीच प्रतिस्पर्धा पर आधारित था, जबकि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वैश्विक स्तर पर महाशक्तियों के बीच सामरिक संतुलन स्थापित हुआ। परमाणु हथियारों के विकास ने शक्ति संतुलन को नया स्वरूप दिया क्योंकि अब किसी भी बड़े युद्ध के परिणाम पूरे विश्व के लिए विनाशकारी हो सकते थे। इसी कारण शीत युद्ध के दौरान प्रत्यक्ष युद्ध की अपेक्षा अप्रत्यक्ष प्रतिस्पर्धा, कूटनीति और निरोध की नीति को अधिक महत्व मिला।

बीसवीं शताब्दी के युद्धों ने यह भी स्पष्ट किया कि आर्थिक शक्ति, वैज्ञानिक प्रगति, तकनीकी विकास तथा औद्योगिक क्षमता अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। केवल सैनिक संख्या ही किसी राष्ट्र की शक्ति का निर्धारण नहीं करती, बल्कि उसकी उत्पादन क्षमता, अनुसंधान, परिवहन व्यवस्था, ऊर्जा संसाधन और आर्थिक संगठन भी युद्ध और शांति दोनों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इस कारण आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों में आर्थिक सहयोग और विकास को विशेष महत्व प्राप्त हुआ।

इन युद्धों का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह भी रहा कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता को अधिक गंभीरता से स्वीकार किया गया। सामूहिक सुरक्षा, बहुपक्षीय कूटनीति, निरस्त्रीकरण, शस्त्र नियंत्रण तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका पहले की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो गई। विश्व के विभिन्न देशों ने यह अनुभव किया कि आधुनिक समस्याओं का समाधान केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि सहयोग, संवाद और साझा उत्तरदायित्व से ही संभव है।

भारत पर भी इन दोनों युद्धों का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश सेना के साथ विभिन्न मोर्चों पर भाग लिया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी लाखों भारतीय सैनिकों ने युद्ध में भाग लिया। इन अनुभवों ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को भी प्रभावित किया। युद्धों के बाद ब्रिटिश साम्राज्य आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमजोर हुआ, जिससे भारत सहित अनेक उपनिवेशों की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस प्रकार विश्व युद्धों ने अप्रत्यक्ष रूप से उपनिवेशवाद के अंत की प्रक्रिया को भी गति प्रदान की।

बीसवीं शताब्दी के अंतरराष्ट्रीय संबंधों का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि युद्ध केवल सैन्य संघर्ष नहीं होते, बल्कि वे राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन भी लाते हैं। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्धों ने विश्व व्यवस्था को कई बार पुनर्गठित किया, नई संस्थाओं को जन्म दिया, नई विचारधाराओं को विकसित किया और अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा को बदल दिया। इन युद्धों से प्राप्त अनुभवों ने यह शिक्षा दी कि स्थायी शांति केवल शक्ति के संतुलन से नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, प्रभावी कूटनीति, आर्थिक सहयोग, मानवाधिकारों की रक्षा तथा वैश्विक उत्तरदायित्व की भावना से ही संभव है।

अंततः कहा जा सकता है कि बीसवीं शताब्दी के अंतरराष्ट्रीय संबंधों को समझने के लिए प्रथम और द्वितीय विश्व युद्धों का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है। इन दोनों युद्धों ने विश्व की राजनीतिक संरचना, शक्ति संतुलन, कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय कानून, वैश्विक अर्थव्यवस्था, मानवाधिकारों तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के विकास को गहराई से प्रभावित किया। आधुनिक विश्व व्यवस्था, संयुक्त राष्ट्र की स्थापना, शीत युद्ध, उपनिवेशवाद का अंत, वैश्विक सहयोग की अवधारणा तथा समकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति की अनेक विशेषताएँ इन्हीं ऐतिहासिक घटनाओं की देन हैं। इसलिए बीसवीं शताब्दी के विश्व युद्ध केवल इतिहास की घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों की आधारशिला भी हैं।

Cold War & Post Cold War International Relations. (शीत युद्ध एवं शीत युद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय संबंध)

शीत युद्ध तथा शीत युद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय संबंध आधुनिक विश्व राजनीति की दो अत्यंत महत्वपूर्ण अवस्थाएँ हैं, जिन्होंने बीसवीं और इक्कीसवीं शताब्दी की वैश्विक व्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद विश्व की शक्ति संरचना में व्यापक परिवर्तन हुआ और दो महाशक्तियाँ—संयुक्त राज्य अमेरिका तथा सोवियत संघ—विश्व राजनीति के केंद्र में आ गईं। दोनों देशों की राजनीतिक विचारधाराएँ, आर्थिक व्यवस्थाएँ, सुरक्षा संबंधी दृष्टिकोण तथा वैश्विक प्रभाव स्थापित करने की नीतियाँ एक-दूसरे से भिन्न थीं। इसी वैचारिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा सामरिक प्रतिस्पर्धा ने शीत युद्ध को जन्म दिया। यह ऐसा संघर्ष था जिसमें दोनों महाशक्तियाँ प्रत्यक्ष रूप से आमने-सामने युद्ध नहीं लड़ती थीं, किंतु विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में अपने प्रभाव का विस्तार करने, सैन्य शक्ति बढ़ाने, कूटनीतिक दबाव बनाने तथा वैचारिक श्रेष्ठता सिद्ध करने का निरंतर प्रयास करती थीं। इसलिए इसे “शीत” युद्ध कहा गया, क्योंकि इसमें व्यापक प्रतिस्पर्धा तो थी, परंतु दोनों महाशक्तियों के बीच प्रत्यक्ष सैन्य युद्ध नहीं हुआ।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप का अधिकांश भाग आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमजोर हो चुका था। इस स्थिति में संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ विश्व की सबसे शक्तिशाली सैन्य तथा राजनीतिक शक्तियों के रूप में उभरे। अमेरिका उदार लोकतंत्र, पूँजीवादी अर्थव्यवस्था, निजी उद्यम तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता का समर्थक था, जबकि सोवियत संघ समाजवादी व्यवस्था, राज्य नियंत्रित अर्थव्यवस्था तथा साम्यवादी विचारधारा को बढ़ावा देता था। दोनों का उद्देश्य अपनी-अपनी विचारधारा का विस्तार करना था। इसी कारण विश्व धीरे-धीरे दो प्रमुख गुटों में विभाजित हो गया। यह वैचारिक विभाजन केवल यूरोप तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अनेक देशों की राजनीति को भी प्रभावित करने लगा।

शीत युद्ध का प्रारंभ सामान्यतः 1945 के बाद माना जाता है। प्रारंभिक वर्षों में दोनों महाशक्तियों के बीच अविश्वास तेजी से बढ़ा। सोवियत संघ ने पूर्वी यूरोप के अनेक देशों में समाजवादी शासन स्थापित किया, जबकि अमेरिका ने पश्चिमी यूरोप के पुनर्निर्माण के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की और लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने का प्रयास किया। यूरोप का विभाजन इस प्रतिस्पर्धा का सबसे स्पष्ट उदाहरण था। जर्मनी दो भागों में विभाजित हो गया और बर्लिन भी पूर्वी तथा पश्चिमी क्षेत्रों में बँट गया। बाद में बर्लिन की दीवार इस वैचारिक विभाजन का प्रतीक बन गई।

शीत युद्ध के दौरान दोनों महाशक्तियों ने अपने-अपने सैन्य गठबंधनों का निर्माण किया। अमेरिका के नेतृत्व में उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन अर्थात नाटो की स्थापना हुई, जबकि सोवियत संघ के नेतृत्व में वारसा संधि का गठन किया गया। इन सैन्य गठबंधनों का उद्देश्य अपने सदस्य देशों की सामूहिक सुरक्षा सुनिश्चित करना तथा विरोधी गुट के प्रभाव को सीमित करना था। इससे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सैन्य प्रतिस्पर्धा और अधिक तीव्र हो गई।

शीत युद्ध की एक प्रमुख विशेषता हथियारों की दौड़ थी। दोनों महाशक्तियों ने परमाणु हथियारों, लंबी दूरी की मिसाइलों, पनडुब्बियों, बमवर्षक विमानों तथा आधुनिक सैन्य तकनीकों के विकास में अत्यधिक संसाधन लगाए। परमाणु हथियारों की संख्या लगातार बढ़ती गई। यद्यपि यह स्थिति अत्यंत खतरनाक थी, फिर भी दोनों पक्ष इस तथ्य से परिचित थे कि परमाणु युद्ध की स्थिति में दोनों का विनाश निश्चित है। इसी कारण प्रतिरोध की नीति विकसित हुई, जिसके अनुसार अत्यधिक विनाश की संभावना ही युद्ध को रोकने का माध्यम बन गई। इस स्थिति को पारस्परिक सुनिश्चित विनाश का सिद्धांत भी कहा जाता है।

शीत युद्ध केवल सैन्य प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं था। यह आर्थिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक, तकनीकी तथा सांस्कृतिक क्षेत्रों में भी दिखाई देता था। अंतरिक्ष अनुसंधान में दोनों देशों के बीच तीव्र प्रतिस्पर्धा हुई। कृत्रिम उपग्रहों का प्रक्षेपण, मानव को अंतरिक्ष में भेजना तथा चंद्रमा पर पहुँचने जैसी उपलब्धियाँ इस प्रतिस्पर्धा का परिणाम थीं। विज्ञान और तकनीक का विकास राष्ट्रीय प्रतिष्ठा तथा सामरिक शक्ति का महत्वपूर्ण आधार बन गया।

शीत युद्ध के दौरान अनेक क्षेत्रीय संघर्ष भी हुए, जिन्हें प्रायः प्रतिनिधि युद्ध कहा जाता है। इन संघर्षों में दोनों महाशक्तियाँ प्रत्यक्ष रूप से युद्ध नहीं लड़ती थीं, बल्कि विभिन्न देशों या समूहों को राजनीतिक, आर्थिक अथवा सैन्य सहायता देकर अपने हितों की रक्षा करती थीं। कोरिया, वियतनाम, अफगानिस्तान, मध्य पूर्व तथा अफ्रीका के अनेक क्षेत्रों में ऐसे संघर्ष देखने को मिले। इन युद्धों ने संबंधित देशों की राजनीति, अर्थव्यवस्था तथा समाज पर गहरा प्रभाव डाला।

शीत युद्ध के समय गुटनिरपेक्ष आंदोलन का भी विकास हुआ। अनेक नवस्वतंत्र देशों ने यह निर्णय लिया कि वे किसी भी महाशक्ति के सैन्य गुट में शामिल नहीं होंगे तथा अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखेंगे। भारत, मिस्र, यूगोस्लाविया, इंडोनेशिया और घाना जैसे देशों ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन को आगे बढ़ाया। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता बनाए रखना तथा विश्व शांति को प्रोत्साहित करना था। इस आंदोलन ने विकासशील देशों को एक साझा मंच प्रदान किया।

शीत युद्ध के अंतिम चरण में दोनों महाशक्तियों ने तनाव कम करने के प्रयास भी किए। इसे तनाव शैथिल्य की नीति कहा गया। इस अवधि में शस्त्र नियंत्रण संबंधी अनेक समझौते हुए, कूटनीतिक संवाद बढ़ा तथा परमाणु हथियारों की होड़ को सीमित करने का प्रयास किया गया। फिर भी वैचारिक प्रतिस्पर्धा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।

उन्नीस सौ अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में सोवियत संघ गंभीर आर्थिक और राजनीतिक संकट का सामना करने लगा। मिखाइल गोर्बाच्योव ने सुधारों की नीति अपनाई, जिसके अंतर्गत राजनीतिक खुलापन और आर्थिक पुनर्गठन के प्रयास किए गए। इन सुधारों ने समाज में व्यापक परिवर्तन उत्पन्न किए। पूर्वी यूरोप के समाजवादी शासन धीरे-धीरे समाप्त होने लगे, बर्लिन की दीवार गिर गई और अंततः 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया। इसी घटना के साथ शीत युद्ध का औपचारिक अंत माना जाता है।

शीत युद्ध की समाप्ति के बाद अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक नया चरण प्रारंभ हुआ, जिसे शीत युद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था कहा जाता है। प्रारंभिक वर्षों में संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व की एकमात्र महाशक्ति के रूप में उभरा। इस कारण विश्व व्यवस्था को कुछ समय के लिए एकध्रुवीय व्यवस्था कहा गया। अमेरिका की राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य शक्ति वैश्विक स्तर पर अत्यंत प्रभावशाली बन गई। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, वैश्विक आर्थिक नीतियों तथा सुरक्षा संबंधी निर्णयों में उसका प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा।

शीत युद्धोत्तर काल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में वैश्वीकरण का तीव्र विस्तार था। सूचना प्रौद्योगिकी, इंटरनेट, संचार क्रांति, मुक्त व्यापार तथा विदेशी निवेश ने विश्व को पहले की तुलना में अधिक परस्पर जुड़ा हुआ बना दिया। विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाएँ एक-दूसरे पर अधिक निर्भर होने लगीं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विस्तार हुआ तथा अंतरराष्ट्रीय व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इससे आर्थिक विकास के नए अवसर उत्पन्न हुए, किंतु आर्थिक असमानता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियाँ भी सामने आईं।

शीत युद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय संबंधों में मानवाधिकार, लोकतंत्र, पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास तथा मानव सुरक्षा जैसे विषयों को विशेष महत्व मिला। संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भूमिका भी अधिक व्यापक हुई। शांति स्थापना, मानवीय सहायता, जलवायु परिवर्तन, वैश्विक स्वास्थ्य तथा गरीबी उन्मूलन जैसे क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ा।

हालाँकि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद विश्व पूरी तरह शांत नहीं हुआ। अनेक नई चुनौतियाँ सामने आईं। अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद वैश्विक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी समस्याओं में से एक बन गया। धार्मिक उग्रवाद, सीमा पार आतंकवाद तथा अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों की गतिविधियों ने विश्व राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। विशेष रूप से इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में हुए बड़े आतंकवादी हमलों ने सुरक्षा की अवधारणा को नया स्वरूप दिया। इसके बाद अनेक देशों ने आतंकवाद विरोधी सहयोग तथा सुरक्षा नीतियों को मजबूत किया।

शीत युद्धोत्तर काल में क्षेत्रीय संघर्ष भी जारी रहे। जातीय हिंसा, गृहयुद्ध, सीमा विवाद तथा संसाधनों पर नियंत्रण को लेकर अनेक क्षेत्रों में तनाव उत्पन्न हुआ। बाल्कन क्षेत्र, पश्चिम एशिया, अफ्रीका तथा एशिया के कुछ भागों में संघर्षों ने यह स्पष्ट किया कि शीत युद्ध की समाप्ति से सभी राजनीतिक समस्याओं का समाधान नहीं हुआ।

इक्कीसवीं शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन पुनः परिवर्तित होने लगा। चीन के तीव्र आर्थिक विकास, भारत जैसी उभरती शक्तियों की बढ़ती भूमिका, रूस की पुनः सक्रियता तथा यूरोपीय संघ के प्रभाव ने विश्व राजनीति को अधिक बहुध्रुवीय स्वरूप प्रदान करना प्रारंभ किया। अब अंतरराष्ट्रीय संबंध केवल एक महाशक्ति के प्रभाव तक सीमित नहीं रहे, बल्कि अनेक शक्तियाँ विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगीं। इससे वैश्विक राजनीति अधिक जटिल और बहुआयामी हो गई।

शीत युद्धोत्तर काल में आर्थिक सुरक्षा और तकनीकी प्रतिस्पर्धा भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष अनुसंधान, ऊर्जा संसाधन, सेमीकंडक्टर तकनीक तथा डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में विभिन्न देशों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी। इससे यह स्पष्ट हुआ कि आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंध केवल सैन्य शक्ति पर आधारित नहीं हैं, बल्कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी, नवाचार तथा आर्थिक क्षमता भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

भारत ने शीत युद्धोत्तर काल में अपनी विदेश नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। आर्थिक उदारीकरण अपनाने के साथ-साथ भारत ने विभिन्न प्रमुख शक्तियों के साथ संतुलित संबंध विकसित किए। अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान, आसियान देशों तथा अन्य साझेदारों के साथ सहयोग बढ़ाया गया। भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए बहुपक्षीय मंचों पर सक्रिय भूमिका निभाई। संयुक्त राष्ट्र, जी-20, ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में भारत की भूमिका निरंतर मजबूत हुई।

शीत युद्ध और शीत युद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय संबंधों का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि विश्व राजनीति निरंतर परिवर्तनशील है। शक्ति संतुलन, वैचारिक प्रतिस्पर्धा, आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति, वैश्विक सहयोग तथा नई सुरक्षा चुनौतियाँ समय के अनुसार बदलती रहती हैं। इसलिए किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति को भी परिस्थितियों के अनुसार लचीला और व्यावहारिक होना आवश्यक है।

अंततः कहा जा सकता है कि शीत युद्ध ने विश्व को वैचारिक प्रतिस्पर्धा, सैन्य गठबंधनों, हथियारों की दौड़ और वैश्विक तनाव का अनुभव कराया, जबकि शीत युद्धोत्तर काल ने वैश्वीकरण, आर्थिक सहयोग, मानवाधिकार, नई सुरक्षा चुनौतियों तथा बहुध्रुवीय शक्ति संरचना की दिशा में विश्व राजनीति को आगे बढ़ाया। दोनों कालखंड आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इन्होंने वैश्विक शक्ति संतुलन, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका, विदेश नीति की प्रकृति तथा विश्व व्यवस्था के स्वरूप को गहराई से प्रभावित किया। इनका अध्ययन यह समझने में सहायता करता है कि विश्व राजनीति केवल युद्ध और शक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि सहयोग, प्रतिस्पर्धा, परिवर्तन और साझा वैश्विक उत्तरदायित्व की भी सतत प्रक्रिया है।

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