Unit – 2
Legislature :Structure, Functions and Role.
विधायिका : संरचना, कार्य एवं भूमिका
विधायिका को सामान्यतः कानून बनाने वाली संस्था कहा जाता है, लेकिन वास्तव में इसका महत्व इससे कहीं अधिक व्यापक है। किसी भी लोकतांत्रिक राज्य में विधायिका जनता की राजनीतिक संप्रभुता का संस्थागत रूप होती है। जनता स्वयं शासन नहीं कर सकती, इसलिए वह अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है और वे प्रतिनिधि विधायिका के माध्यम से जनता की इच्छाओं, अपेक्षाओं और हितों को शासन की नीतियों तथा कानूनों में परिवर्तित करते हैं। इस दृष्टि से विधायिका केवल विधि-निर्माण की संस्था नहीं, बल्कि जनमत को राज्य की शक्ति में रूपांतरित करने वाली संस्था है।
राजनीतिक सिद्धांत के विकासक्रम में विधायिका का महत्व निरंकुश शासन के विरुद्ध संघर्ष से जुड़ा हुआ है। इतिहास में राजा स्वयं कानून बनाता था और स्वयं उसका पालन भी करवाता था। लोकतांत्रिक विकास के साथ यह विचार उभरा कि कानून बनाने का अधिकार जनता के प्रतिनिधियों के हाथ में होना चाहिए। इसी विचार ने आधुनिक विधायिकाओं को जन्म दिया। इसलिए विधायिका का इतिहास वास्तव में जनप्रतिनिधित्व और लोकतंत्र के विकास का इतिहास भी है।
विधायिका का वास्तविक महत्व इस तथ्य में निहित है कि यह शासन को वैधता प्रदान करती है। सरकार चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, यदि उसके कार्यों को विधायिका की स्वीकृति प्राप्त नहीं है, तो उसकी लोकतांत्रिक वैधता संदिग्ध हो जाती है। बजट, कराधान, सार्वजनिक व्यय और राष्ट्रीय नीतियों के लिए विधायिका की मंजूरी आवश्यक होती है। इस प्रकार विधायिका राज्य शक्ति पर लोकतांत्रिक नियंत्रण का माध्यम बनती है।
भारतीय संदर्भ में विधायिका का स्वरूप विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। संविधान ने संसद को केवल दो सदनों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि राष्ट्रपति को भी उसका अंग माना है। इसका कारण यह है कि कानून निर्माण केवल बहस और मतदान से पूरा नहीं होता; उसे संवैधानिक स्वीकृति भी प्राप्त करनी होती है। इसी प्रकार राज्यों में राज्यपाल भी विधानमंडल का हिस्सा होते हैं। यह व्यवस्था दर्शाती है कि भारतीय विधायिका केवल प्रतिनिधित्व की संस्था नहीं, बल्कि संवैधानिक संतुलन और वैधानिक प्रक्रिया का भी केंद्र है।
आधुनिक युग में विधायिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती कार्यपालिका की बढ़ती शक्ति है। कल्याणकारी राज्य, प्रशासनिक विस्तार और तकनीकी जटिलताओं के कारण कई बार नीति निर्माण का वास्तविक केंद्र कार्यपालिका बन जाती है। ऐसी स्थिति में विधायिका का दायित्व केवल कानून पारित करना नहीं, बल्कि सरकार की निरंतर निगरानी करना भी है। यदि विधायिका अपनी नियंत्रणकारी भूमिका को प्रभावी ढंग से नहीं निभाती, तो लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित होकर रह सकता है।
विधायिका का एक गहरा सामाजिक पक्ष भी है। यह समाज की विविधताओं को राजनीतिक अभिव्यक्ति प्रदान करती है। विभिन्न जातीय, भाषाई, धार्मिक, क्षेत्रीय और आर्थिक समूह अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से अपनी समस्याएँ और आकांक्षाएँ विधायिका तक पहुँचाते हैं। इस प्रकार विधायिका सामाजिक संघर्षों को लोकतांत्रिक विमर्श में परिवर्तित करती है और राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने में सहायता करती है।
राजनीतिक दर्शन की दृष्टि से विधायिका केवल संस्थागत संरचना नहीं, बल्कि जनता की सामूहिक बुद्धि और सामूहिक इच्छा का प्रतीक है। आदर्श रूप में यह वह मंच है जहाँ विभिन्न विचारों का संवाद होता है, मतभेदों का समाधान होता है और सार्वजनिक हित की खोज की जाती है। इसलिए किसी देश की लोकतांत्रिक गुणवत्ता का आकलन उसकी विधायिका की सक्रियता, स्वतंत्रता, उत्तरदायित्व और प्रतिनिधित्व क्षमता से किया जा सकता है।
इस प्रकार विधायिका को केवल “कानून बनाने वाली संस्था” कहना उसके महत्व को सीमित कर देना होगा। वास्तव में यह लोकतंत्र की आत्मा, जनप्रतिनिधित्व का आधार, शासन की वैधता का स्रोत, कार्यपालिका पर नियंत्रण का साधन और समाज की विविध आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का सर्वोच्च मंच है। यही कारण है कि आधुनिक राजनीतिक विज्ञान में विधायिका को लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का केंद्रीय स्तंभ माना जाता है।
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में विधायिका को राज्य का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग माना जाता है। आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था में यह केवल कानून बनाने वाली संस्था नहीं है, बल्कि जनसत्ता की अभिव्यक्ति, सार्वजनिक नीतियों के निर्माण, कार्यपालिका पर नियंत्रण तथा जनता और सरकार के बीच संवाद स्थापित करने का प्रमुख माध्यम भी है। राज्य के तीन प्रमुख अंगों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—में विधायिका का विशेष स्थान है क्योंकि लोकतांत्रिक शासन का आधार जनता की संप्रभुता और प्रतिनिधित्व की अवधारणा पर टिका हुआ है। विधायिका उसी प्रतिनिधित्व के सिद्धांत को व्यवहारिक रूप प्रदान करती है। इसलिए राजनीतिक विज्ञान में विधायिका की संरचना, कार्य तथा भूमिका का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
इतिहास की दृष्टि से देखा जाए तो विधायिका का विकास निरंकुश शासन से लोकतांत्रिक शासन की ओर संक्रमण की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। प्राचीन और मध्यकालीन युग में शासन की अधिकांश शक्तियाँ राजा या शासक के हाथों में केंद्रित रहती थीं। जनता की राजनीतिक भागीदारी सीमित थी और कानून निर्माण का अधिकार भी मुख्यतः शासक वर्ग के पास होता था। समय के साथ नागरिक अधिकारों, प्रतिनिधि शासन और लोकतांत्रिक मूल्यों के विकास ने ऐसी संस्थाओं की आवश्यकता उत्पन्न की जो जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व कर सकें। इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया के परिणामस्वरूप आधुनिक विधायिकाओं का विकास हुआ।
विधायिका की संगठनात्मक संरचना विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकती है। सामान्यतः विधायिका एकसदनीय अथवा द्विसदनीय स्वरूप में पाई जाती है। एकसदनीय व्यवस्था में केवल एक ही सदन होता है जो कानून निर्माण और अन्य विधायी कार्यों का निर्वहन करता है। दूसरी ओर द्विसदनीय व्यवस्था में दो सदन होते हैं। प्रायः एक सदन जनता का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करता है जबकि दूसरा सदन राज्यों, प्रांतों अथवा विशिष्ट हितों का प्रतिनिधित्व करता है। द्विसदनीय व्यवस्था का उद्देश्य विधायी प्रक्रिया को अधिक संतुलित, विचारपूर्ण और प्रभावी बनाना होता है।
आधुनिक लोकतांत्रिक राज्यों में विधायिका की संरचना प्रतिनिधित्व के सिद्धांत पर आधारित होती है। इसके सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित किए जाते हैं। यह व्यवस्था इस धारणा पर आधारित है कि राज्य की नीतियाँ और कानून जनता की इच्छा तथा हितों के अनुरूप होने चाहिए। विधायिका के सदस्य विभिन्न सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस प्रकार विधायिका समाज की विविधताओं को राजनीतिक प्रक्रिया में स्थान प्रदान करती है।
विधायिका का सबसे महत्वपूर्ण कार्य कानून निर्माण है। किसी भी आधुनिक राज्य में सामाजिक जीवन को व्यवस्थित करने के लिए कानूनों की आवश्यकता होती है। विधायिका विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए कानूनों का निर्माण करती है। कानून निर्माण की प्रक्रिया केवल नियम बनाने तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसमें व्यापक चर्चा, विचार-विमर्श, संशोधन और समीक्षा भी शामिल होती है। इस प्रक्रिया के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि कानून जनहित के अनुरूप हों और समाज की आवश्यकताओं को पूरा कर सकें।
विधायिका का दूसरा महत्वपूर्ण कार्य कार्यपालिका पर नियंत्रण स्थापित करना है। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में सरकार को जनता के प्रति उत्तरदायी बनाए रखना आवश्यक होता है। विधायिका विभिन्न संसदीय प्रक्रियाओं के माध्यम से कार्यपालिका की गतिविधियों की समीक्षा करती है। प्रश्नकाल, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, चर्चा, अविश्वास प्रस्ताव तथा संसदीय समितियाँ ऐसे महत्वपूर्ण साधन हैं जिनके माध्यम से कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित की जाती है। इस प्रकार विधायिका शासन में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
वित्तीय नियंत्रण भी विधायिका का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है। आधुनिक राज्य की सभी विकासात्मक और प्रशासनिक गतिविधियाँ वित्तीय संसाधनों पर आधारित होती हैं। इसलिए यह आवश्यक माना जाता है कि सार्वजनिक धन के उपयोग पर जनता के प्रतिनिधियों का नियंत्रण हो। राष्ट्रीय बजट, कराधान और सरकारी व्यय संबंधी प्रस्तावों को विधायिका की स्वीकृति प्राप्त करनी होती है। इस प्रक्रिया के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि सरकारी संसाधनों का उपयोग जनहित में और विधिक ढंग से किया जाए।
विधायिका की भूमिका केवल कानून निर्माण और नियंत्रण तक सीमित नहीं है। वह सार्वजनिक नीति निर्माण में भी सक्रिय योगदान देती है। आधुनिक शासन में अनेक जटिल समस्याएँ उत्पन्न होती हैं जिनके समाधान के लिए व्यापक राजनीतिक विचार-विमर्श आवश्यक होता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास जैसे विषयों पर विधायिका महत्वपूर्ण बहसों का मंच प्रदान करती है। इन चर्चाओं के माध्यम से सरकार की नीतियों को दिशा मिलती है और विभिन्न दृष्टिकोणों को अभिव्यक्ति प्राप्त होती है।
विधायिका जनमत की अभिव्यक्ति का भी प्रमुख माध्यम है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता अपनी समस्याओं, अपेक्षाओं और आकांक्षाओं को अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन तक पहुँचाती है। विधायिका समाज और सरकार के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु का कार्य करती है। विभिन्न क्षेत्रों और वर्गों के प्रतिनिधि अपने निर्वाचन क्षेत्रों की समस्याओं को विधायिका के समक्ष प्रस्तुत करते हैं और उनके समाधान के लिए प्रयास करते हैं। इस प्रकार विधायिका राजनीतिक सहभागिता और लोकतांत्रिक संवाद को प्रोत्साहित करती है।
विधायिका का एक अन्य महत्वपूर्ण कार्य राजनीतिक शिक्षा प्रदान करना भी है। संसदीय बहसों, चर्चाओं और सार्वजनिक नीतियों पर होने वाले विमर्शों के माध्यम से नागरिकों को राजनीतिक प्रक्रियाओं और राष्ट्रीय मुद्दों की जानकारी प्राप्त होती है। इससे राजनीतिक जागरूकता और लोकतांत्रिक चेतना का विकास होता है। एक सशक्त विधायिका नागरिकों को शासन के प्रति अधिक जागरूक और उत्तरदायी बनाती है।
आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में विधायिका की भूमिका निरंतर विकसित होती रही है। प्रारंभिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में उसका मुख्य कार्य कानून निर्माण तक सीमित था, किंतु कल्याणकारी राज्य के उदय के साथ उसकी जिम्मेदारियाँ बढ़ गईं। अब उसे सामाजिक न्याय, आर्थिक विकास, मानवाधिकार संरक्षण और जनकल्याण से संबंधित अनेक जटिल प्रश्नों पर विचार करना पड़ता है। इसलिए आधुनिक विधायिका केवल विधायी संस्था नहीं रह गई है, बल्कि वह नीति निर्माण और लोकतांत्रिक शासन की केंद्रीय संस्था बन चुकी है।
हालाँकि विधायिका के महत्व के बावजूद उसके सामने अनेक चुनौतियाँ भी विद्यमान हैं। राजनीतिक दलों का बढ़ता प्रभाव, दलगत अनुशासन, जटिल प्रशासनिक व्यवस्थाएँ और विशेषज्ञता की आवश्यकता ने कई बार विधायिका की प्रभावशीलता को सीमित किया है। कुछ आलोचकों का मत है कि आधुनिक शासन में कार्यपालिका की शक्ति बढ़ने के कारण विधायिका अपेक्षाकृत कमजोर हुई है। फिर भी लोकतांत्रिक शासन में उसकी भूमिका अपरिहार्य बनी हुई है क्योंकि वही जनता की संप्रभुता का संस्थागत रूप है।
वैश्वीकरण और तकनीकी विकास के वर्तमान युग में विधायिका की भूमिका और भी जटिल हो गई है। अब उसे केवल राष्ट्रीय समस्याओं पर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार, पर्यावरणीय संकट, साइबर सुरक्षा, डिजिटल शासन और वैश्विक सहयोग जैसे विषयों पर भी विचार करना पड़ता है। इन चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना करने के लिए विधायिका को अधिक सक्षम, सूचनासंपन्न और उत्तरदायी बनाना आवश्यक है।
लोकतंत्र की सफलता काफी हद तक विधायिका की गुणवत्ता और प्रभावशीलता पर निर्भर करती है। यदि विधायिका स्वतंत्र, सक्रिय और उत्तरदायी होगी तो शासन अधिक पारदर्शी और जनोन्मुखी बनेगा। इसके विपरीत यदि विधायिका कमजोर हो जाए या केवल औपचारिक संस्था बनकर रह जाए, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था का वास्तविक स्वरूप प्रभावित हो सकता है। इसलिए लोकतांत्रिक शासन में विधायिका को केवल संवैधानिक संस्था नहीं, बल्कि जनसत्ता और राजनीतिक उत्तरदायित्व के आधारस्तंभ के रूप में देखा जाता है।
समग्र रूप से कहा जा सकता है कि विधायिका आधुनिक राज्य की एक केंद्रीय संस्था है जिसकी संगठनात्मक संरचना प्रतिनिधित्व के सिद्धांत पर आधारित होती है। कानून निर्माण, कार्यपालिका पर नियंत्रण, वित्तीय निगरानी, नीति निर्माण, जनमत की अभिव्यक्ति और राजनीतिक शिक्षा जैसे विविध कार्यों के माध्यम से वह लोकतांत्रिक शासन को प्रभावी और उत्तरदायी बनाती है। बदलती राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों के बावजूद विधायिका का महत्व कम नहीं हुआ है, बल्कि आधुनिक लोकतंत्रों में उसकी भूमिका और अधिक व्यापक तथा जटिल हो गई है। इसलिए विधायिका की संरचना, कार्य और भूमिका का अध्ययन न केवल राजनीतिक विज्ञान के लिए बल्कि लोकतांत्रिक शासन की प्रकृति और कार्यप्रणाली को समझने के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।
Legislature :Structure, Functions and Role.
विधायिका : संरचना, कार्य एवं भूमिका
भाग – C : अति लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)
विधायिका क्या है?
जनप्रतिनिधित्व से क्या अभिप्राय है?
एकसदनीय विधायिका क्या है?
द्विसदनीय विधायिका क्या है?
भारतीय संसद के अंगों के नाम लिखिए।
विधायिका का सबसे प्रमुख कार्य क्या है?
प्रश्नकाल क्या है?
अविश्वास प्रस्ताव क्या है?
वित्तीय नियंत्रण से क्या अभिप्राय है?
विधायिका को लोकतंत्र की आत्मा क्यों कहा जाता है?
जनमत की अभिव्यक्ति में विधायिका की भूमिका क्या है?
राजनीतिक शिक्षा से क्या अभिप्राय है?
विधायिका और कार्यपालिका में एक अंतर लिखिए।
संसद में राष्ट्रपति को क्यों शामिल किया गया है?
विधायिका की लोकतांत्रिक वैधता का आधार क्या है?
भाग – C : लघु उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)
विधायिका की अवधारणा एवं महत्व स्पष्ट कीजिए।
एकसदनीय एवं द्विसदनीय विधायिका में अंतर स्पष्ट कीजिए।
विधायिका के प्रमुख कार्यों का वर्णन कीजिए।
कार्यपालिका पर विधायिका का नियंत्रण कैसे स्थापित होता है?
वित्तीय नियंत्रण में विधायिका की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
विधायिका जनमत की अभिव्यक्ति का माध्यम कैसे है?
राजनीतिक शिक्षा में विधायिका की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
आधुनिक लोकतंत्र में विधायिका का महत्व स्पष्ट कीजिए।
भारतीय संसद की संरचना का वर्णन कीजिए।
आधुनिक युग में विधायिका के समक्ष प्रमुख चुनौतियों का वर्णन कीजिए।
भाग – D : दीर्घ उत्तरीय / निबंधात्मक प्रश्न (10–15 अंक)
विधायिका की संरचना, कार्य एवं भूमिका का विस्तृत विवेचन कीजिए।
आधुनिक लोकतंत्र में विधायिका के महत्व का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
विधायिका को लोकतंत्र की आत्मा क्यों कहा जाता है? स्पष्ट कीजिए।
विधायिका के कानून निर्माण, वित्तीय नियंत्रण एवं कार्यपालिका पर नियंत्रण संबंधी कार्यों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
भारतीय संसद की संरचना एवं शक्तियों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
एकसदनीय एवं द्विसदनीय विधायिका का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।
आधुनिक कल्याणकारी राज्य में विधायिका की बदलती भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
वैश्वीकरण एवं डिजिटल युग में विधायिका के समक्ष उत्पन्न चुनौतियों का मूल्यांकन कीजिए।
विधायिका और कार्यपालिका के संबंधों का आलोचनात्मक विवेचन कीजिए।
लोकतांत्रिक शासन की सफलता में विधायिका की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।
1. लोकतांत्रिक शासन में विधायिका का प्रमुख कार्य क्या है?
(A) न्याय प्रदान करना
(B) कानून बनाना
(C) चुनाव कराना
(D) प्रशासन चलाना
उत्तर – (B)
2. विधायिका किसका संस्थागत रूप मानी जाती है?
(A) न्यायपालिका
(B) जनसंप्रभुता
(C) कार्यपालिका
(D) नौकरशाही
उत्तर – (B)
3. लोकतांत्रिक शासन में जनता अपनी संप्रभुता का प्रयोग किसके माध्यम से करती है?
(A) न्यायालय
(B) सेना
(C) निर्वाचित प्रतिनिधियों
(D) राष्ट्रपति
उत्तर – (C)
4. भारतीय संसद का अंग कौन है?
(A) केवल लोकसभा
(B) केवल राज्यसभा
(C) राष्ट्रपति, लोकसभा एवं राज्यसभा
(D) प्रधानमंत्री
उत्तर – (C)
5. राज्यों में विधानमंडल का संवैधानिक अंग कौन होता है?
(A) मुख्यमंत्री
(B) राज्यपाल
(C) मुख्य सचिव
(D) विधानसभा अध्यक्ष
उत्तर – (B)
6. द्विसदनीय विधायिका का प्रमुख उद्देश्य क्या है?
(A) प्रशासन चलाना
(B) विधायी प्रक्रिया को संतुलित बनाना
(C) न्याय देना
(D) कर वसूलना
उत्तर – (B)
7. एकसदनीय व्यवस्था में कितने सदन होते हैं?
(A) एक
(B) दो
(C) तीन
(D) चार
उत्तर – (A)
8. कार्यपालिका पर नियंत्रण का प्रमुख साधन कौन-सा है?
(A) प्रश्नकाल
(B) खेलकूद
(C) जनगणना
(D) जनमत संग्रह
उत्तर – (A)
9. अविश्वास प्रस्ताव का संबंध किससे है?
(A) न्यायपालिका
(B) कार्यपालिका की उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने से
(C) चुनाव आयोग
(D) राष्ट्रपति चुनाव
उत्तर – (B)
10. सार्वजनिक धन पर अंतिम नियंत्रण किसका होता है?
(A) कार्यपालिका
(B) विधायिका
(C) न्यायपालिका
(D) निर्वाचन आयोग
उत्तर – (B)
11. राष्ट्रीय बजट को स्वीकृति कौन देता है?
(A) सर्वोच्च न्यायालय
(B) विधायिका
(C) राष्ट्रपति अकेले
(D) प्रधानमंत्री
उत्तर – (B)
12. विधायिका का कौन-सा कार्य सरकार को उत्तरदायी बनाता है?
(A) नीति निर्माण
(B) वित्तीय नियंत्रण
(C) कार्यपालिका पर नियंत्रण
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर – (D)
13. विधायिका समाज और सरकार के बीच क्या कार्य करती है?
(A) दूरी बढ़ाती है
(B) सेतु का कार्य करती है
(C) न्याय देती है
(D) कर वसूलती है
उत्तर – (B)
14. राजनीतिक शिक्षा का माध्यम कौन-सी संस्था है?
(A) विधायिका
(B) सेना
(C) पुलिस
(D) निर्वाचन आयोग
उत्तर – (A)
15. आधुनिक कल्याणकारी राज्य में विधायिका की भूमिका कैसी हो गई है?
(A) सीमित
(B) समाप्त
(C) अधिक व्यापक एवं जटिल
(D) केवल औपचारिक
उत्तर – (C)
16. विधायिका का आधार किस सिद्धांत पर है?
(A) शक्ति सिद्धांत
(B) प्रतिनिधित्व सिद्धांत
(C) युद्ध सिद्धांत
(D) बल सिद्धांत
उत्तर – (B)
17. लोकतंत्र की सफलता किस पर निर्भर करती है?
(A) केवल न्यायपालिका
(B) केवल सेना
(C) विधायिका की गुणवत्ता एवं प्रभावशीलता
(D) केवल चुनाव आयोग
उत्तर – (C)
18. निम्नलिखित में से कौन विधायिका का वित्तीय कार्य है?
(A) न्याय देना
(B) बजट पारित करना
(C) युद्ध करना
(D) पुलिस नियुक्त करना
उत्तर – (B)
19. विधायिका का कौन-सा कार्य जनमत को अभिव्यक्ति देता है?
(A) नीति निर्माण
(B) जनप्रतिनिधित्व
(C) न्याय
(D) प्रशासन
उत्तर – (B)
20. आधुनिक राजनीतिक विज्ञान में विधायिका को क्या माना जाता है?
(A) गौण संस्था
(B) लोकतांत्रिक शासन का केंद्रीय स्तंभ
(C) केवल औपचारिक संस्था
(D) प्रशासनिक विभाग
उत्तर – (B)
