Unit-02
Quasi- Federalism ,Coalition, Political parties &Party System In India,
अर्द्ध-संघवाद (अर्ध-संघीय व्यवस्था), गठबंधन, भारत में राजनीतिक दल एवं दलीय व्यवस्था।
भाग–1 : भारतीय संघवाद की अवधारणा और अर्द्ध-संघवाद
आधुनिक विश्व में शासन-व्यवस्था का स्वरूप प्रत्येक देश की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, सामाजिक संरचना, भौगोलिक परिस्थितियों और राजनीतिक आवश्यकताओं के अनुसार विकसित हुआ है। कुछ देशों ने एकात्मक शासन व्यवस्था को अपनाया, जहाँ समस्त शासन शक्ति एक केंद्रीय सरकार के हाथों में केंद्रित रहती है, जबकि कुछ देशों ने संघीय शासन व्यवस्था को स्वीकार किया, जिसमें शासन की शक्तियाँ केंद्र और राज्यों के बीच संविधान द्वारा विभाजित होती हैं। भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद जिस शासन व्यवस्था को अपनाया, वह न तो पूर्णतः संघीय है और न ही पूर्णतः एकात्मक। भारतीय संविधान निर्माताओं ने देश की विशालता, विविधता और राष्ट्रीय एकता को ध्यान में रखते हुए ऐसी व्यवस्था विकसित की जिसमें संघीय और एकात्मक दोनों प्रकार की विशेषताएँ सम्मिलित हैं। इसी कारण भारत की शासन व्यवस्था को प्रायः अर्द्ध-संघीय (Quasi-Federal) या संघात्मक प्रवृत्ति वाली एकात्मक व्यवस्था कहा जाता है।
भारत एक ऐसा देश है जहाँ अनेक भाषाएँ, धर्म, संस्कृतियाँ, जातीय समूह और क्षेत्रीय परंपराएँ विद्यमान हैं। यदि इतने विशाल और विविध समाज का शासन केवल एक केंद्रीय संस्था द्वारा संचालित किया जाता, तो स्थानीय आवश्यकताओं और क्षेत्रीय आकांक्षाओं की उपेक्षा होने की संभावना रहती। दूसरी ओर यदि राज्यों को अत्यधिक स्वतंत्रता प्रदान कर दी जाती, तो राष्ट्रीय एकता और अखंडता पर भी प्रभाव पड़ सकता था। इसलिए संविधान निर्माताओं ने दोनों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया। यही संतुलन भारतीय संघवाद की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 में भारत को “राज्यों का संघ” कहा गया है। यह शब्दावली अत्यंत विचारपूर्ण है। संविधान निर्माताओं ने “संघीय राज्य” (Federation) के स्थान पर “राज्यों का संघ” (Union of States) शब्द का प्रयोग इसलिए किया ताकि यह स्पष्ट हो सके कि भारतीय संघ राज्यों के किसी समझौते का परिणाम नहीं है और कोई भी राज्य अपनी इच्छा से संघ से अलग नहीं हो सकता। इस व्यवस्था का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता को सर्वोच्च महत्व देना था।
संघवाद का मूल सिद्धांत यह है कि शासन की शक्तियों का विभाजन संविधान द्वारा किया जाए। भारत में भी संविधान ने केंद्र और राज्यों के बीच विधायी, प्रशासनिक तथा वित्तीय शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया है। सातवीं अनुसूची में संघ सूची, राज्य सूची तथा समवर्ती सूची के माध्यम से यह निर्धारित किया गया है कि कौन-से विषय केंद्र के अधिकार क्षेत्र में होंगे, कौन-से विषय राज्यों के अधिकार में रहेंगे तथा किन विषयों पर दोनों स्तर की सरकारें कानून बना सकेंगी। यह व्यवस्था संघवाद का प्रमुख आधार है।
यद्यपि भारतीय संविधान संघीय तत्वों को स्वीकार करता है, फिर भी इसमें अनेक ऐसे प्रावधान हैं जो केंद्र सरकार को विशेष परिस्थितियों में अधिक शक्तिशाली बनाते हैं। उदाहरण के लिए राष्ट्रीय आपातकाल, राष्ट्रपति शासन, वित्तीय आपातकाल, अवशिष्ट शक्तियों का केंद्र में निहित होना, राज्यों के राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा किया जाना तथा अखिल भारतीय सेवाओं की व्यवस्था ऐसे तत्व हैं जो भारतीय संघवाद को विशिष्ट स्वरूप प्रदान करते हैं। यही कारण है कि अनेक संवैधानिक विद्वानों ने भारत को पूर्ण संघीय राज्य के बजाय अर्द्ध-संघीय व्यवस्था की संज्ञा दी है।
अर्द्ध-संघवाद का अर्थ यह नहीं है कि भारत का संघवाद कमजोर है। इसका वास्तविक अर्थ यह है कि भारतीय संघवाद परिस्थितियों के अनुसार लचीला है। सामान्य परिस्थितियों में केंद्र और राज्य अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं, किंतु राष्ट्रीय संकट, युद्ध, बाहरी आक्रमण अथवा गंभीर आंतरिक अस्थिरता की स्थिति में केंद्र सरकार को अतिरिक्त अधिकार प्राप्त हो जाते हैं ताकि पूरे देश में प्रशासनिक एकरूपता और राष्ट्रीय सुरक्षा बनाए रखी जा सके।
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत अनेक जटिल चुनौतियों का सामना कर रहा था। देश का विभाजन हुआ था, बड़ी संख्या में रियासतों का विलय किया जाना था, आर्थिक स्थिति कमजोर थी और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना अत्यंत आवश्यक था। इन परिस्थितियों में संविधान निर्माताओं ने ऐसी शासन व्यवस्था को प्राथमिकता दी जो एक ओर राज्यों को पर्याप्त स्वायत्तता प्रदान करे और दूसरी ओर राष्ट्र की एकता तथा अखंडता को भी सुरक्षित रख सके। इस ऐतिहासिक आवश्यकता ने भारतीय संघवाद को विशेष स्वरूप प्रदान किया।
समय के साथ भारतीय संघवाद का स्वरूप भी विकसित हुआ है। प्रारंभिक दशकों में केंद्र सरकार अपेक्षाकृत अधिक प्रभावशाली रही, किंतु बाद के वर्षों में क्षेत्रीय दलों के उदय, गठबंधन सरकारों के गठन, आर्थिक उदारीकरण तथा पंचायती राज संस्थाओं के सशक्तिकरण ने संघीय व्यवस्था को अधिक सहभागी बनाया। आज केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग, समन्वय और साझा उत्तरदायित्व की भावना को सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) के रूप में देखा जाता है। इसके साथ-साथ नीति आयोग, जीएसटी परिषद तथा अंतर-राज्यीय परिषद जैसी संस्थाओं ने सहयोगात्मक संघवाद को नई दिशा प्रदान की है।
वर्तमान समय में भारतीय संघवाद केवल संवैधानिक प्रावधानों तक सीमित नहीं है। यह एक जीवंत राजनीतिक प्रक्रिया है जिसमें केंद्र और राज्य निरंतर संवाद, सहयोग और समन्वय के माध्यम से शासन का संचालन करते हैं। प्राकृतिक आपदाएँ, महामारी, आर्थिक सुधार, डिजिटल प्रशासन, पर्यावरण संरक्षण तथा राष्ट्रीय विकास जैसी अनेक चुनौतियों का समाधान केंद्र और राज्यों के संयुक्त प्रयासों से ही संभव है। इस कारण भारतीय संघवाद निरंतर विकसित होने वाली व्यवस्था के रूप में सामने आया है।
राजनीति विज्ञान की दृष्टि से भारतीय अर्द्ध-संघवाद एक ऐसा संवैधानिक प्रयोग है जिसने राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय स्वायत्तता के बीच संतुलन स्थापित करने का सफल प्रयास किया है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह कठोर संघवाद के स्थान पर व्यावहारिक संघवाद को अपनाता है। यही कारण है कि भारत जैसे विशाल, बहुभाषी, बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश में लोकतंत्र सात दशकों से अधिक समय तक स्थिर और प्रभावी रूप से संचालित हो सका है।
इस प्रकार भारतीय अर्द्ध-संघवाद को समझे बिना भारतीय राजनीतिक व्यवस्था की वास्तविक प्रकृति को समझना संभव नहीं है। यह केवल शासन की संरचना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता, लोकतांत्रिक भागीदारी और प्रशासनिक संतुलन का आधार भी है। भारतीय संविधान ने जिस लचीली संघीय व्यवस्था का निर्माण किया, उसी ने देश की विविधताओं को एक सूत्र में बाँधने और लोकतांत्रिक शासन को स्थायित्व प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अर्द्ध-संघवाद की मूल अवधारणा को समझने के बाद अब यह जानना आवश्यक है कि संघीय शासन व्यवस्था की वास्तविक विशेषताएँ क्या होती हैं और किन आधारों पर किसी राज्य को संघीय कहा जाता है। इन्हीं आधारों की तुलना करके यह स्पष्ट होगा कि भारत को पूर्ण संघीय राज्य के बजाय अर्द्ध-संघीय व्यवस्था क्यों कहा जाता है
भाग–1 : वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs)
1. भारत को संविधान में किस रूप में वर्णित किया गया है?
(अ) राज्यों का संघ
(ब) परिसंघ
(स) राजतंत्र
(द) एकात्मक राज्य
उत्तर – (अ)
2. भारत की शासन व्यवस्था को सामान्यतः क्या कहा जाता है?
(अ) पूर्ण संघीय
(ब) पूर्ण एकात्मक
(स) अर्द्ध-संघीय
(द) निरंकुश
उत्तर – (स)
3. भारतीय संविधान का कौन-सा अनुच्छेद भारत को “राज्यों का संघ” घोषित करता है?
(अ) अनुच्छेद 1
(ब) अनुच्छेद 14
(स) अनुच्छेद 32
(द) अनुच्छेद 356
उत्तर – (अ)
4. संघीय व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण आधार क्या है?
(अ) शक्तियों का संवैधानिक विभाजन
(ब) सैन्य शासन
(स) राष्ट्रपति शासन
(द) राजतंत्र
उत्तर – (अ)
5. भारत में अवशिष्ट शक्तियाँ किसके पास हैं?
(अ) राज्यों के पास
(ब) केंद्र के पास
(स) न्यायपालिका
(द) पंचायतें
उत्तर – (ब)
6. भारत में राज्यपाल की नियुक्ति कौन करता है?
(अ) मुख्यमंत्री
(ब) राष्ट्रपति
(स) संसद
(द) राज्य विधानसभा
उत्तर – (ब)
7. भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में कितनी सूचियाँ हैं?
(अ) दो
(ब) तीन
(स) चार
(द) पाँच
उत्तर – (ब)
8. निम्नलिखित में से कौन संघ सूची का विषय है?
(अ) पुलिस
(ब) रक्षा
(स) कृषि
(द) स्थानीय शासन
उत्तर – (ब)
9. राज्य सूची का प्रमुख विषय कौन-सा है?
(अ) विदेश नीति
(ब) रक्षा
(स) पुलिस
(द) मुद्रा
उत्तर – (स)
10. समवर्ती सूची पर कानून बनाने का अधिकार किसे है?
(अ) केवल केंद्र
(ब) केवल राज्य
(स) केंद्र एवं राज्य दोनों
(द) न्यायपालिका
उत्तर – (स)
11. गठबंधन सरकार का अर्थ क्या है?
(अ) एक दल की सरकार
(ब) अनेक दलों द्वारा मिलकर बनाई गई सरकार
(स) राष्ट्रपति शासन
(द) सैन्य शासन
उत्तर – (ब)
12. भारत में पहली गैर-कांग्रेसी गठबंधन सरकार केंद्र में किस वर्ष बनी?
(अ) 1952
(ब) 1977
(स) 1984
(द) 1999
उत्तर – (ब)
13. भारत में बहुदलीय व्यवस्था पाई जाती है।
(अ) सत्य
(ब) असत्य
उत्तर – (अ)
14. राष्ट्रीय राजनीतिक दल का दर्जा कौन प्रदान करता है?
(अ) संसद
(ब) राष्ट्रपति
(स) निर्वाचन आयोग
(द) सर्वोच्च न्यायालय
उत्तर – (स)
15. निम्नलिखित में से कौन क्षेत्रीय दल का उदाहरण है?
(अ) द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK)
(ब) भारतीय जनता पार्टी
(स) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
(द) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
उत्तर – (अ)
16. भारत में दलीय व्यवस्था का प्रमुख स्वरूप क्या है?
(अ) द्विदलीय
(ब) बहुदलीय
(स) एकदलीय
(द) दलविहीन
उत्तर – (ब)
17. भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का मुख्य कार्य क्या है?
(अ) चुनाव लड़ना और सरकार बनाना
(ब) न्याय देना
(स) कानून की व्याख्या करना
(द) सेना का संचालन करना
उत्तर – (अ)
18. गठबंधन राजनीति का प्रमुख कारण क्या है?
(अ) बहुदलीय व्यवस्था
(ब) राजतंत्र
(स) सैन्य शासन
(द) एकदलीय शासन
उत्तर – (अ)
19. सहकारी संघवाद का उद्देश्य क्या है?
(अ) केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग
(ब) राज्यों को समाप्त करना
(स) केंद्र को समाप्त करना
(द) न्यायपालिका को समाप्त करना
उत्तर – (अ)
20. भारत में राजनीतिक दल किस सिद्धांत पर कार्य करते हैं?
(अ) लोकतांत्रिक प्रक्रिया
(ब) सैन्य अनुशासन
(स) राजशाही
(द) निरंकुश शासन
उत्तर – (अ)
भाग–2 : अति लघु उत्तरीय प्रश्न
अर्द्ध-संघवाद क्या है?
भारत को अर्द्ध-संघीय क्यों कहा जाता है?
संघ सूची क्या है?
राज्य सूची क्या है?
समवर्ती सूची क्या है?
अवशिष्ट शक्तियाँ किसे प्राप्त हैं?
गठबंधन सरकार क्या है?
राजनीतिक दल से क्या अभिप्राय है?
दलीय व्यवस्था क्या है?
राष्ट्रीय दल किसे कहते हैं?
क्षेत्रीय दल क्या है?
सहकारी संघवाद क्या है?
राज्यपाल की नियुक्ति कौन करता है?
अनुच्छेद 1 क्या कहता है?
भारतीय दलीय व्यवस्था की दो विशेषताएँ लिखिए।
गठबंधन राजनीति का एक लाभ लिखिए।
गठबंधन राजनीति का एक दोष लिखिए।
निर्वाचन आयोग की भूमिका लिखिए।
बहुदलीय व्यवस्था क्या है?
भारत में संघवाद का उद्देश्य क्या है?
भाग–3 : लघु उत्तरीय प्रश्न
अर्द्ध-संघवाद का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
भारत को अर्द्ध-संघीय राज्य क्यों कहा जाता है?
भारतीय संघवाद की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
भारतीय संघवाद की एकात्मक विशेषताएँ बताइए।
गठबंधन सरकार का अर्थ एवं विशेषताएँ लिखिए।
भारत में गठबंधन राजनीति के विकास का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
राजनीतिक दलों के प्रमुख कार्य लिखिए।
राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दलों में अंतर स्पष्ट कीजिए।
भारत की दलीय व्यवस्था की विशेषताएँ लिखिए।
भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का महत्व स्पष्ट कीजिए।
सहकारी संघवाद का महत्व बताइए।
भारतीय संघवाद की प्रमुख चुनौतियों का उल्लेख कीजिए।
बहुदलीय व्यवस्था के लाभ लिखिए।
गठबंधन सरकार के लाभ एवं हानियाँ लिखिए।
भारतीय राजनीतिक दलों की प्रमुख समस्याएँ लिखिए।
भाग–4 : दीर्घ उत्तरीय / निबंधात्मक प्रश्न
भारतीय अर्द्ध-संघवाद की अवधारणा का विस्तृत विवेचन कीजिए।
भारतीय संघवाद की संघीय एवं एकात्मक विशेषताओं का आलोचनात्मक अध्ययन कीजिए।
“भारत एक अर्द्ध-संघीय राज्य है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
भारत में गठबंधन राजनीति के विकास एवं प्रभाव का विश्लेषण कीजिए।
भारत में राजनीतिक दलों की भूमिका एवं महत्व का विस्तृत अध्ययन कीजिए।
भारत की दलीय व्यवस्था के विकास का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।
भारतीय लोकतंत्र में बहुदलीय व्यवस्था के गुण एवं दोषों का विश्लेषण कीजिए।
भारतीय संघवाद के समक्ष वर्तमान चुनौतियों की विवेचना कीजिए।
भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में गठबंधन सरकारों की उपयोगिता का मूल्यांकन कीजिए।
भाग–5 : परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न
अर्द्ध-संघवाद की अवधारणा स्पष्ट करते हुए भारतीय संविधान की प्रकृति का विश्लेषण कीजिए।
भारत में संघवाद को प्रभावित करने वाले प्रमुख संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या कीजिए।
भारत में गठबंधन राजनीति के उदय के कारणों और परिणामों का वर्णन कीजिए।
भारत में राजनीतिक दलों के संगठन, कार्य एवं महत्व का विश्लेषण कीजिए।
भारतीय दलीय व्यवस्था के विकास का स्वतंत्रता के बाद के संदर्भ में अध्ययन कीजिए।
भारतीय संघवाद और सहकारी संघवाद में क्या संबंध है?
गठबंधन सरकारें भारतीय लोकतंत्र को कैसे प्रभावित करती हैं?
राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों की भूमिका का तुलनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए।
“भारतीय दलीय व्यवस्था निरंतर परिवर्तनशील है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
