Unit-02
Policy Evaluation: Concept of Policy Evaluation Survey & Sampling Agencies, Independent Studies Groups Criteria for Policy Evaluation: Problems, Needs, Accountability, Good Governance Major Constraints in Policy Formulation & Implementation
नीति मूल्यांकन की अवधारणा तथा सर्वेक्षण एवं प्रतिदर्श (नमूनाकरण) अभिकरण,स्वतंत्र अध्ययन समूह (Independent Study Groups) तथा नीति मूल्यांकन के मापदण्ड : समस्याएँ (Problems),आवश्यकता,उत्तरदायित्व,सुशासन (Good Governance) तथा नीति निर्माण एवं क्रियान्वयन में प्रमुख बाधाएँ
नीति मूल्यांकन की अवधारणा तथा सर्वेक्षण एवं प्रतिदर्श (नमूनाकरण) अभिकरण
लोक नीति का निर्माण और उसका क्रियान्वयन किसी भी शासन व्यवस्था के दो महत्वपूर्ण चरण हैं, किंतु इन दोनों चरणों के पश्चात यह जानना भी आवश्यक होता है कि बनाई गई नीति अपने निर्धारित उद्देश्यों को किस सीमा तक प्राप्त कर सकी है। यदि किसी नीति के परिणामों का व्यवस्थित परीक्षण न किया जाए, तो यह ज्ञात नहीं हो सकता कि उस नीति से वास्तव में जनता को कितना लाभ मिला, संसाधनों का उपयोग कितना प्रभावी रहा तथा भविष्य में उसमें किस प्रकार के सुधार किए जाने चाहिए। इसी कारण आधुनिक लोक प्रशासन में नीति मूल्यांकन (Policy Evaluation) को लोक नीति चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण चरण माना जाता है।
नीति मूल्यांकन से अभिप्राय उस वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित प्रक्रिया से है जिसके माध्यम से किसी लोक नीति, योजना अथवा कार्यक्रम की प्रभावशीलता, उपयोगिता, दक्षता, प्रासंगिकता तथा उसके सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। इसका उद्देश्य केवल यह देखना नहीं होता कि योजना लागू हुई या नहीं, बल्कि यह भी देखना होता है कि उसने अपने निर्धारित लक्ष्यों को किस सीमा तक प्राप्त किया, उसके लाभ वास्तविक लाभार्थियों तक पहुँचे या नहीं तथा उसके क्रियान्वयन में कौन-कौन सी समस्याएँ उत्पन्न हुईं।
नीति मूल्यांकन का प्रमुख उद्देश्य सरकार को यह जानकारी उपलब्ध कराना है कि कौन-सी नीतियाँ सफल हैं, किन क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता है तथा भविष्य में अधिक प्रभावी नीतियाँ किस प्रकार बनाई जा सकती हैं। इस प्रक्रिया के माध्यम से सरकार अनुभवों से सीखती है, संसाधनों का बेहतर उपयोग करती है तथा जनहित को अधिक प्रभावी ढंग से सुनिश्चित करती है। इसलिए नीति मूल्यांकन को सुशासन, पारदर्शिता तथा उत्तरदायित्व का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।
नीति मूल्यांकन की प्रक्रिया में विभिन्न प्रकार की सूचनाओं का संकलन किया जाता है। इन सूचनाओं में लाभार्थियों की प्रतिक्रिया, प्रशासनिक अभिलेख, वित्तीय व्यय, क्षेत्रीय निरीक्षण, सामाजिक प्रभाव, आर्थिक परिणाम तथा स्वतंत्र अनुसंधान संस्थानों की रिपोर्टें सम्मिलित होती हैं। इन सभी स्रोतों के आधार पर नीति की वास्तविक स्थिति का निष्पक्ष विश्लेषण किया जाता है।
नीति मूल्यांकन में सर्वेक्षण (Survey) का विशेष महत्व है। सर्वेक्षण एक ऐसी वैज्ञानिक अनुसंधान पद्धति है जिसके माध्यम से बड़ी संख्या में व्यक्तियों, परिवारों, संस्थाओं अथवा समुदायों से व्यवस्थित रूप से जानकारी प्राप्त की जाती है। इसके द्वारा यह जाना जाता है कि सरकारी योजनाओं का लाभ लोगों तक पहुँचा या नहीं, नागरिक उन योजनाओं से कितने संतुष्ट हैं तथा क्रियान्वयन के दौरान उन्हें किन समस्याओं का सामना करना पड़ा। सर्वेक्षण के लिए प्रश्नावली, साक्षात्कार, प्रत्यक्ष अवलोकन तथा ऑनलाइन माध्यमों का उपयोग किया जाता है।
नीति मूल्यांकन में प्रतिदर्श या नमूनाकरण (Sampling) की तकनीक भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसी बड़े जनसमूह के प्रत्येक व्यक्ति से जानकारी प्राप्त करना समय, धन और संसाधनों की दृष्टि से कठिन होता है। इसलिए संपूर्ण जनसंख्या में से कुछ प्रतिनिधि व्यक्तियों या इकाइयों का चयन किया जाता है, जिन्हें प्रतिदर्श (Sample) कहा जाता है। यदि प्रतिदर्श वैज्ञानिक ढंग से चुना गया हो, तो उससे प्राप्त निष्कर्ष संपूर्ण जनसंख्या की वास्तविक स्थिति का उचित प्रतिनिधित्व करते हैं। इससे कम समय और कम लागत में विश्वसनीय जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
नीति मूल्यांकन के लिए कार्य करने वाले सर्वेक्षण एवं प्रतिदर्श अभिकरण विभिन्न स्तरों पर सक्रिय रहते हैं। भारत में राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO), नीति आयोग, विभिन्न मंत्रालयों के अनुसंधान प्रकोष्ठ, विश्वविद्यालय, सामाजिक विज्ञान अनुसंधान संस्थान तथा स्वतंत्र शोध संस्थाएँ समय-समय पर विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों का सर्वेक्षण एवं मूल्यांकन करती हैं। इसके अतिरिक्त अनेक निजी अनुसंधान संस्थाएँ तथा गैर-सरकारी संगठन भी स्वतंत्र अध्ययन के माध्यम से सरकार को उपयोगी सुझाव प्रदान करते हैं।
सर्वेक्षण एवं प्रतिदर्श अभिकरणों का प्रमुख कार्य आँकड़ों का संग्रह करना, उनका वैज्ञानिक विश्लेषण करना, नीति के परिणामों का मूल्यांकन करना तथा सरकार को निष्पक्ष प्रतिवेदन प्रस्तुत करना होता है। इन प्रतिवेदनों के आधार पर सरकार यह निर्णय लेती है कि किसी नीति को यथावत जारी रखा जाए, उसमें संशोधन किया जाए अथवा उसे समाप्त करके नई नीति लागू की जाए।
आधुनिक समय में डिजिटल तकनीक ने नीति मूल्यांकन की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बना दिया है। ऑनलाइन सर्वेक्षण, मोबाइल एप्लिकेशन, भू-स्थानिक सूचना प्रणाली (GIS), कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), बिग डेटा विश्लेषण तथा डिजिटल डैशबोर्ड के माध्यम से वास्तविक समय में आँकड़े प्राप्त किए जा रहे हैं। इससे नीति मूल्यांकन अधिक त्वरित, सटीक तथा पारदर्शी हो गया है।
यद्यपि नीति मूल्यांकन अत्यंत उपयोगी प्रक्रिया है, फिर भी इसके समक्ष कुछ चुनौतियाँ हैं। कई बार अपूर्ण आँकड़े, पक्षपातपूर्ण सर्वेक्षण, राजनीतिक हस्तक्षेप, सीमित वित्तीय संसाधन, तकनीकी विशेषज्ञों की कमी तथा दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुँचने में कठिनाइयाँ मूल्यांकन की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं। इसलिए आवश्यक है कि सर्वेक्षण एवं प्रतिदर्श का चयन वैज्ञानिक पद्धति से किया जाए तथा मूल्यांकन निष्पक्ष, पारदर्शी और तथ्यपरक आधार पर किया जाए।
समग्र रूप से देखा जाए तो नीति मूल्यांकन लोक नीति चक्र का एक अनिवार्य चरण है। यह सरकार को अपनी नीतियों की वास्तविक उपलब्धियों, कमियों तथा भविष्य की आवश्यकताओं का वस्तुनिष्ठ ज्ञान प्रदान करता है। सर्वेक्षण एवं प्रतिदर्श अभिकरण इस प्रक्रिया के महत्वपूर्ण आधार हैं, क्योंकि इनके द्वारा एकत्रित वैज्ञानिक आँकड़े नीति निर्माण, नीति सुधार तथा सुशासन को अधिक प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। इस प्रकार नीति मूल्यांकन लोकतांत्रिक शासन, उत्तरदायी प्रशासन और जनकल्याणकारी राज्य की सफलता का एक आवश्यक उपकरण है।
स्वतंत्र अध्ययन समूह (Independent Study Groups) तथा नीति मूल्यांकन के मापदण्ड : समस्याएँ (Problems)
लोक नीति का उद्देश्य समाज की समस्याओं का समाधान करना, जनकल्याण को बढ़ावा देना तथा विकास की प्रक्रिया को गति प्रदान करना है। किंतु किसी भी नीति की वास्तविक सफलता का पता केवल उसके निर्माण या क्रियान्वयन से नहीं चलता, बल्कि उसके व्यवस्थित मूल्यांकन से ज्ञात होता है। नीति मूल्यांकन को निष्पक्ष, वैज्ञानिक तथा विश्वसनीय बनाने के लिए केवल सरकारी संस्थाओं पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होता। इसी कारण आधुनिक लोक प्रशासन में स्वतंत्र अध्ययन समूह (Independent Study Groups) तथा विभिन्न नीति मूल्यांकन मापदण्डों (Criteria for Policy Evaluation) का विशेष महत्व है। ये दोनों मिलकर यह सुनिश्चित करते हैं कि किसी नीति का मूल्यांकन तथ्य, प्रमाण तथा वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर किया जाए।
स्वतंत्र अध्ययन समूह ऐसे स्वायत्त अनुसंधान संगठन, विश्वविद्यालय, शिक्षण संस्थान, नीति अनुसंधान केंद्र (Think Tanks), सामाजिक विज्ञान संस्थान, गैर-सरकारी संगठन तथा विशेषज्ञ समितियाँ होती हैं जो सरकार से स्वतंत्र रहकर विभिन्न लोक नीतियों, योजनाओं और कार्यक्रमों का अध्ययन करती हैं। इनका उद्देश्य किसी नीति की वास्तविक स्थिति का निष्पक्ष विश्लेषण करना, उसके सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभावों का अध्ययन करना तथा भविष्य के लिए उपयोगी सुझाव प्रस्तुत करना होता है। चूँकि ये संस्थाएँ राजनीतिक दबाव से अपेक्षाकृत मुक्त होती हैं, इसलिए इनके निष्कर्ष अधिक विश्वसनीय और वस्तुनिष्ठ माने जाते हैं।
स्वतंत्र अध्ययन समूह विभिन्न अनुसंधान विधियों का उपयोग करते हैं। वे सर्वेक्षण, प्रतिदर्श (Sampling), साक्षात्कार, क्षेत्रीय अध्ययन, प्रकरण अध्ययन (Case Study), सांख्यिकीय विश्लेषण तथा तुलनात्मक अध्ययन के माध्यम से जानकारी एकत्रित करते हैं। इसके बाद प्राप्त आँकड़ों का वैज्ञानिक विश्लेषण करके यह निर्धारित किया जाता है कि नीति अपने उद्देश्यों की प्राप्ति में कितनी सफल रही है तथा किन क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता है।
भारत में नीति आयोग, भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR), विभिन्न विश्वविद्यालय, भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (IIPA), राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO), सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (CPR), ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) तथा अनेक स्वतंत्र अनुसंधान संस्थाएँ समय-समय पर विभिन्न लोक नीतियों का अध्ययन एवं मूल्यांकन करती हैं। इनके अतिरिक्त अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ भी भारत की विकास योजनाओं और सार्वजनिक नीतियों का स्वतंत्र मूल्यांकन करती हैं।
नीति मूल्यांकन के दौरान सबसे पहले यह देखा जाता है कि नीति किस समस्या के समाधान के लिए बनाई गई थी और क्या वह समस्या वास्तव में कम हुई है। इसलिए समस्या (Problems) नीति मूल्यांकन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मापदण्ड है। यदि किसी नीति के लागू होने के बाद भी मूल समस्या पहले जैसी बनी रहती है, तो यह संकेत होता है कि नीति अपेक्षित परिणाम देने में सफल नहीं रही।
समस्याओं के आधार पर नीति का मूल्यांकन करते समय यह विश्लेषण किया जाता है कि नीति द्वारा लक्षित समस्या की प्रकृति क्या थी, उसका वास्तविक कारण क्या था तथा नीति ने उन कारणों को दूर करने में कितनी सफलता प्राप्त की। उदाहरण के लिए यदि किसी रोजगार योजना का उद्देश्य बेरोजगारी कम करना था, तो मूल्यांकन के दौरान यह देखा जाएगा कि बेरोजगारी की दर में कितनी कमी आई, कितने लोगों को स्थायी रोजगार मिला तथा रोजगार की गुणवत्ता में कितना सुधार हुआ।
इसी प्रकार यदि किसी स्वास्थ्य नीति का उद्देश्य शिशु मृत्यु दर को कम करना था, तो यह मूल्यांकन किया जाएगा कि नीति लागू होने के बाद शिशु मृत्यु दर में कितना परिवर्तन आया, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता कितनी बढ़ी तथा नागरिकों को वास्तविक लाभ किस सीमा तक प्राप्त हुआ। यदि समस्या का समाधान आंशिक रूप से हुआ है, तो उसके कारणों की पहचान कर भविष्य के लिए सुधारात्मक सुझाव दिए जाते हैं।
नीति मूल्यांकन में यह भी देखा जाता है कि क्या नई समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं। कई बार किसी नीति से अपेक्षित लाभ तो प्राप्त हो जाता है, किंतु उसके परिणामस्वरूप अन्य सामाजिक, आर्थिक अथवा पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं। इसलिए मूल्यांकन केवल उपलब्धियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि नीति के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभावों का समग्र अध्ययन किया जाता है।
स्वतंत्र अध्ययन समूहों द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन सरकार, विधायिका तथा प्रशासन को यह समझने में सहायता करते हैं कि कौन-सी नीतियाँ प्रभावी हैं, किन कार्यक्रमों में संशोधन आवश्यक है तथा किन क्षेत्रों में अतिरिक्त संसाधनों की आवश्यकता है। इनके सुझावों के आधार पर सरकार अपनी नीतियों में सुधार करती है तथा भविष्य की योजनाओं को अधिक व्यावहारिक और जनोन्मुख बनाती है।
यद्यपि स्वतंत्र अध्ययन समूहों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, फिर भी इनके समक्ष कुछ चुनौतियाँ भी होती हैं। पर्याप्त वित्तीय संसाधनों का अभाव, विश्वसनीय आँकड़ों की कमी, प्रशासनिक सहयोग का अभाव, राजनीतिक दबाव, समय की सीमाएँ तथा तकनीकी कठिनाइयाँ कभी-कभी इनके अध्ययन की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं। इसलिए आवश्यक है कि इन संस्थाओं को पर्याप्त स्वतंत्रता, संसाधन तथा सूचना तक पहुँच उपलब्ध कराई जाए।
समग्र रूप से देखा जाए तो स्वतंत्र अध्ययन समूह आधुनिक लोक नीति मूल्यांकन के महत्वपूर्ण आधार हैं। ये सरकार से स्वतंत्र रहकर नीतियों का वैज्ञानिक, निष्पक्ष तथा प्रमाण-आधारित मूल्यांकन करते हैं। वहीं “समस्याएँ” नीति मूल्यांकन का ऐसा प्रमुख मापदण्ड है जिसके माध्यम से यह निर्धारित किया जाता है कि कोई नीति अपने मूल उद्देश्य की पूर्ति में कितनी सफल रही है। प्रभावी नीति मूल्यांकन के माध्यम से सरकार बेहतर निर्णय लेने, संसाधनों का उचित उपयोग करने तथा जनकल्याणकारी शासन को अधिक सुदृढ़ बनाने में सफल होती है।
आवश्यकता (Needs) : नीति मूल्यांकन का एक प्रमुख मापदण्ड
लोक नीति का मूल उद्देश्य समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करना तथा नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार लाना होता है। प्रत्येक सार्वजनिक नीति किसी न किसी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक अथवा प्रशासनिक आवश्यकता को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। इसलिए नीति मूल्यांकन के समय यह जानना अत्यंत आवश्यक होता है कि संबंधित नीति वास्तव में उन आवश्यकताओं को पूरा कर रही है या नहीं, जिनके समाधान के लिए उसका निर्माण किया गया था। इसी कारण “आवश्यकता (Needs)” को नीति मूल्यांकन (Policy Evaluation) का एक महत्वपूर्ण मापदण्ड माना जाता है।
आवश्यकता से आशय उन वास्तविक समस्याओं, अपेक्षाओं तथा मांगों से है जिनका सामना समाज, किसी विशेष वर्ग या किसी क्षेत्र के लोग करते हैं। जब सरकार किसी आवश्यकता की पहचान करती है, तभी उसके समाधान के लिए लोक नीति का निर्माण किया जाता है। उदाहरण के लिए बेरोजगारी बढ़ने पर रोजगार नीति, शिक्षा के विस्तार के लिए शिक्षा नीति, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए स्वास्थ्य नीति तथा गरीबी उन्मूलन के लिए सामाजिक सुरक्षा संबंधी नीतियाँ बनाई जाती हैं। इन सभी का उद्देश्य समाज की विशिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति करना होता है।
नीति मूल्यांकन के दौरान सबसे पहले यह देखा जाता है कि जिस आवश्यकता के आधार पर नीति बनाई गई थी, क्या वह वास्तव में पूरी हुई है। यदि किसी नीति का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना था, तो मूल्यांकन के समय यह जाँचा जाएगा कि कितने गाँवों तक स्वच्छ जल पहुँचा, लोगों की जल संबंधी समस्याओं में कितनी कमी आई तथा नागरिकों के जीवन स्तर में कितना सुधार हुआ। यदि नीति अपने उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकी, तो उसके कारणों का विश्लेषण किया जाता है।
आवश्यकताओं के आधार पर नीति मूल्यांकन का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि समय के साथ समाज की आवश्यकताएँ बदलती रहती हैं। जो आवश्यकता दस वर्ष पहले महत्वपूर्ण थी, वह वर्तमान समय में बदल सकती है। इसलिए यह देखना भी आवश्यक होता है कि वर्तमान परिस्थितियों में नीति अभी भी प्रासंगिक है या उसमें संशोधन की आवश्यकता है। बदलती सामाजिक, आर्थिक, तकनीकी तथा वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप नीतियों का अद्यतन होना आवश्यक है।
नीति मूल्यांकन में आवश्यकताओं की पहचान विभिन्न माध्यमों से की जाती है। इसके लिए सर्वेक्षण, जनसुनवाई, सामाजिक अंकेक्षण, जनप्रतिनिधियों की राय, विशेषज्ञों के सुझाव, अनुसंधान रिपोर्ट, जनगणना के आँकड़े तथा विभिन्न सरकारी अभिलेखों का उपयोग किया जाता है। इन स्रोतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर यह निर्धारित किया जाता है कि जनता की वास्तविक आवश्यकताएँ क्या हैं और नीति उन आवश्यकताओं को किस सीमा तक पूरा कर रही है।
आवश्यकताओं के आधार पर मूल्यांकन करते समय यह भी देखा जाता है कि नीति का लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से पहुँचा है या नहीं। विशेष रूप से गरीब, ग्रामीण, महिलाएँ, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, दिव्यांगजन तथा अन्य वंचित वर्गों की आवश्यकताओं की पूर्ति पर विशेष ध्यान दिया जाता है। यदि नीति का लाभ केवल सीमित वर्ग तक पहुँचता है, तो उसे पूर्णतः सफल नहीं माना जाता।
भारत में अनेक जनकल्याणकारी योजनाओं का मूल्यांकन नागरिकों की आवश्यकताओं के आधार पर किया जाता है। उदाहरण के लिए आयुष्मान भारत योजना का मूल्यांकन स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, प्रधानमंत्री आवास योजना का मूल्यांकन आवास की आवश्यकता की पूर्ति, जल जीवन मिशन का मूल्यांकन स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मूल्यांकन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की आवश्यकताओं की पूर्ति के आधार पर किया जाता है। इससे सरकार को यह जानकारी मिलती है कि योजनाएँ कितनी प्रभावी हैं और उनमें कहाँ सुधार की आवश्यकता है।
यद्यपि आवश्यकता आधारित मूल्यांकन अत्यंत उपयोगी है, फिर भी इसके समक्ष कुछ चुनौतियाँ होती हैं। अनेक बार वास्तविक आवश्यकताओं का सही आकलन नहीं हो पाता, विभिन्न क्षेत्रों की आवश्यकताएँ भिन्न होती हैं, आँकड़ों की कमी रहती है तथा संसाधनों के अभाव में सभी आवश्यकताओं की पूर्ति एक साथ संभव नहीं होती। इसके अतिरिक्त समय के साथ आवश्यकताओं में होने वाले परिवर्तन भी नीति मूल्यांकन को जटिल बना देते हैं।
इन चुनौतियों के समाधान के लिए सरकार को नियमित सर्वेक्षण, जनसहभागिता, डिजिटल डेटा विश्लेषण, सामाजिक अंकेक्षण तथा स्वतंत्र अनुसंधान संस्थाओं की सहायता लेनी चाहिए। इससे जनता की वास्तविक आवश्यकताओं की सही पहचान हो सकेगी और नीति मूल्यांकन अधिक वैज्ञानिक तथा विश्वसनीय बन सकेगा।
समग्र रूप से देखा जाए तो “आवश्यकता (Needs)” नीति मूल्यांकन का अत्यंत महत्वपूर्ण मापदण्ड है। इसके माध्यम से यह निर्धारित किया जाता है कि कोई लोक नीति समाज की वास्तविक आवश्यकताओं की पूर्ति करने में कितनी सफल रही है। आवश्यकता आधारित मूल्यांकन सरकार को नीतियों में समयानुकूल सुधार करने, संसाधनों का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करने तथा अधिक जनोन्मुख, उत्तरदायी और कल्याणकारी शासन स्थापित करने में महत्वपूर्ण सहायता प्रदान करता है।
उत्तरदायित्व (Accountability) : नीति मूल्यांकन का एक प्रमुख मापदण्ड
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में सरकार की प्रत्येक नीति, योजना और कार्यक्रम का अंतिम उद्देश्य जनहित की पूर्ति करना होता है। सरकार जनता के धन, संसाधनों और अधिकारों का उपयोग करती है, इसलिए यह आवश्यक है कि वह अपने प्रत्येक निर्णय, कार्य और परिणाम के लिए जनता, विधायिका तथा संविधान के प्रति उत्तरदायी रहे। इसी सिद्धांत को उत्तरदायित्व (Accountability) कहा जाता है। आधुनिक लोक प्रशासन और लोक नीति के क्षेत्र में उत्तरदायित्व को नीति मूल्यांकन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मापदण्ड माना जाता है, क्योंकि इसके माध्यम से यह निर्धारित किया जाता है कि नीति के निर्माण, क्रियान्वयन तथा परिणामों के लिए संबंधित संस्थाएँ अपने दायित्वों का कितनी ईमानदारी, पारदर्शिता और दक्षता के साथ निर्वहन कर रही हैं।
उत्तरदायित्व से अभिप्राय उस व्यवस्था से है जिसके अंतर्गत सरकार, प्रशासनिक अधिकारी तथा सार्वजनिक संस्थाएँ अपने कार्यों, निर्णयों और नीतियों के लिए जनता तथा संवैधानिक संस्थाओं के प्रति जवाबदेह होती हैं। इसका अर्थ केवल यह नहीं है कि कार्य पूरे किए जाएँ, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया जाए कि वे कार्य निर्धारित उद्देश्यों, कानूनी प्रावधानों, नैतिक मूल्यों तथा जनहित के अनुरूप संपन्न हुए हैं। यदि किसी नीति के क्रियान्वयन में त्रुटि, भ्रष्टाचार, लापरवाही या संसाधनों का दुरुपयोग पाया जाता है, तो संबंधित अधिकारियों और संस्थाओं से स्पष्टीकरण माँगा जाता है तथा आवश्यक कार्रवाई की जाती है।
नीति मूल्यांकन में उत्तरदायित्व का प्रमुख उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक नीतियों पर व्यय किए गए धन, समय और संसाधनों का उपयोग उचित एवं प्रभावी ढंग से हुआ है या नहीं। यदि किसी योजना के लिए बड़ी मात्रा में सार्वजनिक धन खर्च किया गया हो, तो मूल्यांकन के दौरान यह देखा जाता है कि उस धन का उपयोग निर्धारित उद्देश्यों के अनुसार हुआ या नहीं तथा उससे समाज को अपेक्षित लाभ प्राप्त हुआ या नहीं। इस प्रकार उत्तरदायित्व सार्वजनिक संसाधनों के संरक्षण तथा सुशासन की स्थापना का महत्वपूर्ण आधार है।
उत्तरदायित्व के आधार पर नीति मूल्यांकन करते समय यह भी देखा जाता है कि नीति के निर्माण और क्रियान्वयन में संबंधित अधिकारियों, विभागों तथा संस्थाओं ने अपने दायित्वों का कितनी दक्षता और समयबद्धता के साथ निर्वहन किया। यदि किसी योजना में अनावश्यक विलंब, प्रशासनिक लापरवाही, समन्वय का अभाव अथवा भ्रष्टाचार पाया जाता है, तो यह उत्तरदायित्व की कमी का संकेत माना जाता है। ऐसी स्थिति में नीति में सुधार के साथ-साथ प्रशासनिक सुधारों की भी आवश्यकता होती है।
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने के अनेक संस्थागत माध्यम उपलब्ध हैं। संसद एवं राज्य विधानमंडल सरकार से प्रश्न पूछते हैं, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) सार्वजनिक व्यय का लेखापरीक्षण करते हैं, केंद्रीय सतर्कता आयोग तथा लोकपाल जैसी संस्थाएँ भ्रष्टाचार की जाँच करती हैं, न्यायपालिका संविधान और कानून के अनुसार सरकार के कार्यों की समीक्षा करती है तथा सूचना का अधिकार अधिनियम नागरिकों को सरकारी सूचनाएँ प्राप्त करने का अधिकार प्रदान करता है। ये सभी संस्थाएँ मिलकर शासन को अधिक उत्तरदायी और पारदर्शी बनाती हैं।
नीति मूल्यांकन में सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit), जनसुनवाई, नागरिक अधिकार पत्र (Citizen Charter), ऑनलाइन शिकायत निवारण प्रणाली, डिजिटल डैशबोर्ड तथा ई-गवर्नेंस जैसी व्यवस्थाएँ भी उत्तरदायित्व को सुदृढ़ करती हैं। इन माध्यमों से नागरिक सीधे सरकार की योजनाओं का मूल्यांकन कर सकते हैं, शिकायतें दर्ज कर सकते हैं तथा प्रशासन से जवाब माँग सकते हैं। इससे जनता की भागीदारी बढ़ती है और प्रशासनिक पारदर्शिता को प्रोत्साहन मिलता है।
भारत में अनेक जनकल्याणकारी योजनाओं के मूल्यांकन में उत्तरदायित्व का विशेष महत्व है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), सार्वजनिक वितरण प्रणाली, आयुष्मान भारत, प्रधानमंत्री आवास योजना तथा जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं में समय-समय पर सामाजिक अंकेक्षण, वित्तीय लेखापरीक्षण तथा स्वतंत्र मूल्यांकन के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि योजनाओं का लाभ वास्तविक लाभार्थियों तक पहुँचे और सार्वजनिक धन का दुरुपयोग न हो।
यद्यपि उत्तरदायित्व लोकतांत्रिक प्रशासन का आधार है, फिर भी इसके समक्ष अनेक चुनौतियाँ हैं। भ्रष्टाचार, लालफीताशाही, प्रशासनिक विलंब, राजनीतिक हस्तक्षेप, सूचना की अपारदर्शिता, उत्तरदायित्व तय करने में कठिनाई तथा नागरिक जागरूकता का अभाव कई बार प्रभावी जवाबदेही में बाधा उत्पन्न करते हैं। इसके अतिरिक्त विभिन्न विभागों के मध्य दायित्वों का स्पष्ट विभाजन न होने से भी उत्तरदायित्व निर्धारित करना कठिन हो जाता है।
इन चुनौतियों के समाधान के लिए पारदर्शी प्रशासन, डिजिटल शासन, स्वतंत्र लेखापरीक्षा, सामाजिक अंकेक्षण, सूचना का अधिकार, प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली, नैतिक प्रशासन तथा नागरिक सहभागिता को सुदृढ़ करना आवश्यक है। जब प्रशासनिक संस्थाएँ अपने कार्यों के प्रति उत्तरदायी होती हैं, तब नीतियों की गुणवत्ता, जनविश्वास तथा प्रशासनिक दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
समग्र रूप से देखा जाए तो उत्तरदायित्व (Accountability) नीति मूल्यांकन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मापदण्ड है। इसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि लोक नीतियों का निर्माण और क्रियान्वयन संविधान, कानून, नैतिक मूल्यों तथा जनहित के अनुरूप हुआ है या नहीं। उत्तरदायित्व न केवल सार्वजनिक संसाधनों के उचित उपयोग को सुनिश्चित करता है, बल्कि सुशासन, पारदर्शिता, जनविश्वास तथा लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को भी सुदृढ़ बनाता है। इसलिए प्रभावी नीति मूल्यांकन के लिए उत्तरदायित्व का समुचित पालन अनिवार्य माना जाता है।
सुशासन (Good Governance) तथा नीति निर्माण एवं क्रियान्वयन में प्रमुख बाधाएँ (Major Constraints in Policy Formulation and Implementation)
आधुनिक लोकतांत्रिक एवं कल्याणकारी राज्य में शासन का उद्देश्य केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना या प्रशासनिक कार्यों का संचालन करना नहीं है, बल्कि नागरिकों को गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ प्रदान करना, सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना, आर्थिक विकास को गति देना तथा जनकल्याण को बढ़ावा देना भी है। इन उद्देश्यों की प्रभावी प्राप्ति के लिए केवल अच्छी नीतियाँ बनाना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उनका पारदर्शी, उत्तरदायी, सहभागी तथा प्रभावी क्रियान्वयन भी आवश्यक होता है। इसी विचार ने सुशासन (Good Governance) की अवधारणा को जन्म दिया। वर्तमान समय में सुशासन को नीति निर्माण, नीति क्रियान्वयन तथा नीति मूल्यांकन का आधार माना जाता है।
सुशासन से अभिप्राय ऐसी शासन व्यवस्था से है जिसमें सरकार, प्रशासन और अन्य सार्वजनिक संस्थाएँ संविधान, विधि के शासन तथा लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप कार्य करते हुए नागरिकों के प्रति उत्तरदायी, पारदर्शी, संवेदनशील और निष्पक्ष बनी रहें। सुशासन का उद्देश्य केवल प्रशासन चलाना नहीं, बल्कि जनता की आवश्यकताओं को समय पर, प्रभावी तथा न्यायपूर्ण ढंग से पूरा करना है। ऐसी व्यवस्था में सरकार जनता की भागीदारी को प्रोत्साहित करती है, संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करती है तथा निर्णय प्रक्रिया को अधिक खुला और उत्तरदायी बनाती है।
सुशासन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता पारदर्शिता है। शासन के निर्णय, योजनाएँ, वित्तीय व्यय तथा प्रशासनिक प्रक्रियाएँ नागरिकों के लिए स्पष्ट और सुलभ होनी चाहिए। सूचना का अधिकार अधिनियम, ई-गवर्नेंस, डिजिटल पोर्टल तथा ऑनलाइन सेवाएँ प्रशासन में पारदर्शिता स्थापित करने के प्रभावी माध्यम हैं। पारदर्शिता भ्रष्टाचार को कम करती है तथा जनता का सरकार के प्रति विश्वास बढ़ाती है।
सुशासन का दूसरा प्रमुख आधार उत्तरदायित्व है। सरकार तथा प्रशासनिक अधिकारी अपने निर्णयों और कार्यों के लिए जनता, विधायिका, न्यायपालिका तथा अन्य संवैधानिक संस्थाओं के प्रति जवाबदेह होते हैं। जब उत्तरदायित्व की व्यवस्था प्रभावी होती है, तब सार्वजनिक धन का दुरुपयोग कम होता है और योजनाओं का लाभ वास्तविक लाभार्थियों तक पहुँचता है।
जनसहभागिता भी सुशासन का महत्वपूर्ण तत्व है। लोकतंत्र में जनता केवल मतदाता नहीं होती, बल्कि नीति निर्माण, नीति क्रियान्वयन तथा नीति मूल्यांकन की सक्रिय भागीदार भी होती है। जनसुनवाई, ग्राम सभा, सामाजिक अंकेक्षण, नागरिक परामर्श, गैर-सरकारी संगठनों की भागीदारी तथा डिजिटल माध्यमों से प्राप्त सुझाव शासन को अधिक लोकतांत्रिक और उत्तरदायी बनाते हैं।
सुशासन का एक अन्य महत्वपूर्ण तत्व विधि का शासन (Rule of Law) है। इसका अर्थ है कि शासन का प्रत्येक निर्णय संविधान और कानून के अनुरूप हो तथा सभी नागरिक कानून के समक्ष समान हों। इससे मनमानी, भेदभाव तथा शक्ति के दुरुपयोग पर नियंत्रण रहता है और नागरिकों के अधिकार सुरक्षित रहते हैं।
सुशासन में दक्षता एवं प्रभावशीलता का भी विशेष महत्व है। प्रशासनिक संसाधनों का उचित उपयोग, समयबद्ध निर्णय, गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ तथा न्यूनतम लागत पर अधिकतम परिणाम प्राप्त करना प्रभावी शासन की पहचान है। डिजिटल तकनीक, ई-गवर्नेंस तथा प्रशासनिक सुधारों ने इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
यद्यपि सुशासन की अवधारणा अत्यंत आदर्श मानी जाती है, फिर भी नीति निर्माण एवं नीति क्रियान्वयन के समक्ष अनेक बाधाएँ उपस्थित होती हैं। इन बाधाओं के कारण अनेक बार अच्छी नीतियाँ भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पातीं।
नीति निर्माण की पहली प्रमुख बाधा विश्वसनीय आँकड़ों और सूचनाओं का अभाव है। यदि सरकार के पास सही और अद्यतन जानकारी उपलब्ध नहीं होगी, तो नीति वास्तविक आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं बन सकेगी। अपूर्ण आँकड़े नीति की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।
दूसरी प्रमुख बाधा राजनीतिक हस्तक्षेप है। कई बार नीतियाँ दीर्घकालिक जनहित के स्थान पर अल्पकालिक राजनीतिक लाभ को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। इससे नीति की निष्पक्षता और प्रभावशीलता प्रभावित होती है।
तीसरी बाधा वित्तीय संसाधनों की कमी है। अनेक विकास योजनाएँ पर्याप्त धन के अभाव में अधूरी रह जाती हैं या उनका क्रियान्वयन सीमित स्तर पर हो पाता है। संसाधनों की कमी नीति के उद्देश्यों की प्राप्ति में बड़ी चुनौती बन जाती है।
नीति क्रियान्वयन में लालफीताशाही (Red Tapism) एक गंभीर समस्या है। अनावश्यक प्रशासनिक औपचारिकताएँ, निर्णय लेने में विलंब तथा जटिल प्रक्रियाएँ योजनाओं के समयबद्ध क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न करती हैं।
भ्रष्टाचार भी नीति क्रियान्वयन की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है। सार्वजनिक संसाधनों का दुरुपयोग, रिश्वतखोरी, पक्षपात तथा अनियमितताएँ योजनाओं की गुणवत्ता और जनविश्वास दोनों को प्रभावित करती हैं। इससे वास्तविक लाभार्थियों तक योजनाओं का लाभ नहीं पहुँच पाता।
प्रशासनिक समन्वय का अभाव भी महत्वपूर्ण चुनौती है। जब विभिन्न मंत्रालयों, विभागों और स्थानीय निकायों के बीच उचित समन्वय नहीं होता, तब योजनाओं के क्रियान्वयन में विलंब, भ्रम तथा संसाधनों की पुनरावृत्ति जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
प्रशिक्षित मानव संसाधन की कमी, तकनीकी अवसंरचना का अभाव, जनजागरूकता की कमी, भौगोलिक विषमताएँ, सामाजिक एवं सांस्कृतिक विविधताएँ, प्राकृतिक आपदाएँ तथा डिजिटल असमानता भी नीति निर्माण एवं क्रियान्वयन को प्रभावित करने वाली प्रमुख बाधाएँ हैं। विशेष रूप से दूरदराज़ और ग्रामीण क्षेत्रों में इन चुनौतियों का प्रभाव अधिक दिखाई देता है।
इन बाधाओं को दूर करने के लिए प्रशासनिक सुधार, ई-गवर्नेंस, डिजिटल सेवाओं का विस्तार, पारदर्शिता, सामाजिक अंकेक्षण, जनसहभागिता, प्रभावी वित्तीय प्रबंधन, प्रशिक्षित मानव संसाधन, स्वतंत्र नीति मूल्यांकन तथा उत्तरदायी प्रशासन को सुदृढ़ करना आवश्यक है। साथ ही नीति निर्माण के प्रत्येक चरण में विशेषज्ञों, नागरिकों तथा हितधारकों की सहभागिता सुनिश्चित करनी चाहिए, जिससे नीतियाँ अधिक व्यावहारिक और जनोन्मुख बन सकें।
समग्र रूप से देखा जाए तो सुशासन प्रभावी लोक नीति का आधार है, जबकि नीति निर्माण एवं क्रियान्वयन में आने वाली बाधाओं की पहचान और उनका समयबद्ध समाधान सफल प्रशासन की अनिवार्य शर्त है। जब शासन पारदर्शी, उत्तरदायी, सहभागी, विधि-आधारित तथा दक्ष होता है, तब लोक नीतियाँ अधिक प्रभावी सिद्ध होती हैं और उनके माध्यम से सामाजिक न्याय, आर्थिक विकास तथा जनकल्याण के उद्देश्यों को सफलतापूर्वक प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए आधुनिक लोक प्रशासन में सुशासन को लोकतांत्रिक शासन की सर्वोच्च प्रशासनिक आदर्श अवधारणा माना जाता है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
नीति मूल्यांकन से क्या अभिप्राय है? इसकी अवधारणा एवं महत्व का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
लोक नीति चक्र में नीति मूल्यांकन की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
नीति मूल्यांकन के प्रमुख उद्देश्यों की व्याख्या कीजिए।
नीति मूल्यांकन की प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन कीजिए।
नीति मूल्यांकन में सर्वेक्षण (Survey) का महत्व स्पष्ट कीजिए।
नीति मूल्यांकन में प्रतिदर्श (Sampling) की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
सर्वेक्षण एवं प्रतिदर्श अभिकरणों की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
स्वतंत्र अध्ययन समूह (Independent Study Groups) क्या हैं? लोक नीति मूल्यांकन में उनकी भूमिका का विवेचन कीजिए।
नीति मूल्यांकन के प्रमुख मापदण्डों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
नीति मूल्यांकन में समस्या (Problems) को एक महत्वपूर्ण मापदण्ड क्यों माना जाता है?
नीति मूल्यांकन में आवश्यकता (Needs) की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
उत्तरदायित्व (Accountability) को नीति मूल्यांकन का महत्वपूर्ण आधार सिद्ध कीजिए।
सुशासन (Good Governance) की अवधारणा स्पष्ट करते हुए उसके प्रमुख तत्वों का वर्णन कीजिए।
नीति मूल्यांकन में सुशासन की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
नीति निर्माण एवं क्रियान्वयन की प्रमुख बाधाओं का विस्तृत विश्लेषण कीजिए।
नीति निर्माण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों का वर्णन कीजिए।
नीति क्रियान्वयन में आने वाली प्रशासनिक बाधाओं की विवेचना कीजिए।
नीति निर्माण एवं क्रियान्वयन में राजनीतिक हस्तक्षेप के प्रभावों का मूल्यांकन कीजिए।
नीति मूल्यांकन में डिजिटल तकनीक एवं ई-गवर्नेंस की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
नीति मूल्यांकन को अधिक प्रभावी बनाने के उपायों का वर्णन कीजिए।
सुशासन एवं उत्तरदायित्व के मध्य संबंध स्पष्ट कीजिए।
सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit) नीति मूल्यांकन को किस प्रकार प्रभावी बनाता है?
नीति मूल्यांकन में नागरिक सहभागिता का महत्व स्पष्ट कीजिए।
नीति मूल्यांकन एवं नीति सुधार के मध्य संबंध का विश्लेषण कीजिए।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में नीति मूल्यांकन की वर्तमान स्थिति एवं चुनौतियों का अध्ययन कीजिए।
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
नीति मूल्यांकन क्या है?
नीति मूल्यांकन के दो उद्देश्य लिखिए।
नीति मूल्यांकन का महत्व बताइए।
सर्वेक्षण (Survey) क्या है?
प्रतिदर्श (Sampling) क्या है?
स्वतंत्र अध्ययन समूह से क्या अभिप्राय है?
नीति मूल्यांकन में सर्वेक्षण का महत्व लिखिए।
नीति मूल्यांकन में प्रतिदर्श की उपयोगिता बताइए।
स्वतंत्र अध्ययन समूहों के दो कार्य लिखिए।
नीति मूल्यांकन के चार प्रमुख मापदण्ड लिखिए।
समस्या (Problems) मापदण्ड का अर्थ बताइए।
आवश्यकता (Needs) मापदण्ड का महत्व लिखिए।
उत्तरदायित्व (Accountability) क्या है?
सुशासन (Good Governance) से क्या अभिप्राय है?
सुशासन के चार प्रमुख तत्व लिखिए।
नीति निर्माण की दो प्रमुख बाधाएँ लिखिए।
नीति क्रियान्वयन की दो प्रमुख बाधाएँ लिखिए।
लालफीताशाही (Red Tapism) क्या है?
नीति मूल्यांकन में सामाजिक अंकेक्षण का महत्व बताइए।
नीति मूल्यांकन में ई-गवर्नेंस की भूमिका लिखिए।
नीति मूल्यांकन में जनसहभागिता क्यों आवश्यक है?
नीति मूल्यांकन में उत्तरदायित्व का महत्व लिखिए।
नीति निर्माण में विश्वसनीय आँकड़ों का महत्व बताइए।
नीति निर्माण में विशेषज्ञों की भूमिका लिखिए।
नीति मूल्यांकन में पारदर्शिता क्यों आवश्यक है?
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Questions / MCQs)
1. नीति मूल्यांकन का मुख्य उद्देश्य है—
(A) चुनाव कराना
(B) नीति की प्रभावशीलता का परीक्षण करना
(C) कानून बनाना
(D) न्याय देना
उत्तर – (B)
2. नीति मूल्यांकन लोक नीति चक्र का कौन-सा चरण है?
(A) प्रथम
(B) अंतिम
(C) मध्य
(D) कोई नहीं
उत्तर – (B)
3. Survey का अर्थ है—
(A) जनगणना
(B) सर्वेक्षण
(C) लेखापरीक्षा
(D) नियोजन
उत्तर – (B)
4. Sampling का अर्थ है—
(A) जनमत संग्रह
(B) प्रतिदर्श (नमूनाकरण)
(C) मतदान
(D) कराधान
उत्तर – (B)
5. नीति मूल्यांकन में स्वतंत्र अध्ययन समूह का मुख्य कार्य है—
(A) चुनाव कराना
(B) निष्पक्ष अध्ययन करना
(C) कर वसूलना
(D) कानून बनाना
उत्तर – (B)
6. निम्न में से कौन नीति मूल्यांकन का मापदण्ड है?
(A) Problems
(B) Needs
(C) Accountability
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर – (D)
7. Accountability का अर्थ है—
(A) गोपनीयता
(B) उत्तरदायित्व
(C) नेतृत्व
(D) शक्ति
उत्तर – (B)
8. Good Governance का हिंदी रूप है—
(A) अच्छा शासन
(B) सुशासन
(C) लोक प्रशासन
(D) सार्वजनिक नीति
उत्तर – (B)
9. सुशासन का प्रमुख तत्व है—
(A) पारदर्शिता
(B) उत्तरदायित्व
(C) जनसहभागिता
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर – (D)
10. नीति निर्माण की प्रमुख बाधा है—
(A) विश्वसनीय आँकड़ों का अभाव
(B) भ्रष्टाचार
(C) राजनीतिक हस्तक्षेप
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर – (D)
11. Red Tapism का अर्थ है—
(A) लाल झंडा
(B) लालफीताशाही
(C) लाल स्याही
(D) लाल कानून
उत्तर – (B)
12. नीति मूल्यांकन में जनसहभागिता का उद्देश्य है—
(A) जनता की राय प्राप्त करना
(B) कर वसूलना
(C) चुनाव कराना
(D) न्याय देना
उत्तर – (A)
13. सामाजिक अंकेक्षण का संबंध है—
(A) योजनाओं की सामाजिक समीक्षा से
(B) चुनाव से
(C) न्यायपालिका से
(D) संसद से
उत्तर – (A)
14. नीति मूल्यांकन को अधिक प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक है—
(A) पारदर्शिता
(B) उत्तरदायित्व
(C) स्वतंत्र मूल्यांकन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर – (D)
15. नीति निर्माण एवं क्रियान्वयन का अंतिम उद्देश्य है—
(A) सत्ता परिवर्तन
(B) जनकल्याण
(C) कर वृद्धि
(D) चुनाव
उत्तर – (B)
16. नीति मूल्यांकन में डेटा संग्रह का प्रमुख माध्यम है—
(A) सर्वेक्षण
(B) जनमत संग्रह
(C) चुनाव
(D) न्यायालय
उत्तर – (A)
17. स्वतंत्र अध्ययन समूह सामान्यतः किस प्रकार के होते हैं?
(A) राजनीतिक दल
(B) स्वायत्त एवं निष्पक्ष
(C) न्यायालय
(D) पुलिस विभाग
उत्तर – (B)
18. नीति मूल्यांकन का आधार होना चाहिए—
(A) तथ्य एवं प्रमाण
(B) अफवाह
(C) अनुमान
(D) राजनीतिक दबाव
उत्तर – (A)
19. सुशासन का उद्देश्य है—
(A) भ्रष्टाचार बढ़ाना
(B) पारदर्शी एवं उत्तरदायी शासन
(C) चुनाव रोकना
(D) न्यायपालिका को समाप्त करना
उत्तर – (B)
20. नीति मूल्यांकन का सबसे बड़ा लाभ है—
(A) भविष्य की नीतियों में सुधार
(B) चुनाव कराना
(C) कर बढ़ाना
(D) कानून समाप्त करना
उत्तर – (A)
