Unit-04
20th Centaury of International relation: World War I & II, Cold War & Post Cold War International Relations.
20वीं शताब्दी के अंतरराष्ट्रीय संबंध: प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध, शीतयुद्ध तथा शीतयुद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय संबंध।
20वीं शताब्दी अंतरराष्ट्रीय संबंधों के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और परिवर्तनकारी काल रही। इस शताब्दी में विश्व राजनीति ने ऐसे अनेक उतार-चढ़ाव देखे, जिन्होंने आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की नींव तैयार की। इस दौर में साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के विरुद्ध राष्ट्रीय आंदोलनों का विस्तार हुआ, दो विश्व युद्ध हुए, समाजवाद और पूँजीवाद के बीच वैचारिक संघर्ष विकसित हुआ, परमाणु हथियारों का आविष्कार हुआ, शीतयुद्ध ने विश्व को दो शक्ति-गुटों में विभाजित किया और अंततः सोवियत संघ के विघटन के साथ शीतयुद्ध समाप्त हुआ। इस प्रकार 20वीं शताब्दी को अंतरराष्ट्रीय संबंधों में शक्ति-संतुलन, युद्ध, शांति, कूटनीति, विचारधारा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के निरंतर परिवर्तन की शताब्दी कहा जा सकता है।
20वीं शताब्दी के आरंभ में अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर यूरोपीय शक्तियों का व्यापक प्रभाव था। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस, ऑस्ट्रिया-हंगरी और इटली जैसी शक्तियाँ अपने राजनीतिक, आर्थिक और साम्राज्यवादी हितों के विस्तार में लगी हुई थीं। औद्योगिक विकास ने आर्थिक प्रतिस्पर्धा को बढ़ाया और उपनिवेशों पर नियंत्रण स्थापित करने की होड़ तेज हो गई। इसके साथ ही यूरोप में उग्र राष्ट्रवाद और सैन्यवाद का प्रभाव बढ़ता गया। विभिन्न देशों ने अपनी सुरक्षा के लिए सैन्य गठबंधन बनाए, जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय वातावरण अत्यधिक तनावपूर्ण हो गया।
इसी तनावपूर्ण परिस्थिति में 1914 में प्रथम विश्व युद्ध आरंभ हुआ। इस युद्ध ने यूरोप की पुरानी राजनीतिक व्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया। युद्ध में भारी जन-धन की हानि हुई और कई पुराने साम्राज्यों का पतन हुआ। जर्मन, ऑटोमन, रूसी और ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्यों की शक्ति-संरचना कमजोर हुई। युद्ध के बाद यह विचार मजबूत हुआ कि भविष्य में अंतरराष्ट्रीय विवादों को युद्ध के बजाय बातचीत और संस्थागत व्यवस्था के माध्यम से हल किया जाना चाहिए।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद 1919 में वर्साय की संधि हुई और अंतरराष्ट्रीय शांति बनाए रखने के उद्देश्य से राष्ट्रसंघ की स्थापना की गई। राष्ट्रसंघ अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सामूहिक सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग था। इसका मूल उद्देश्य यह था कि किसी देश की आक्रामक कार्रवाई को पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के विरुद्ध माना जाए और सामूहिक रूप से उसका विरोध किया जाए। लेकिन राष्ट्रसंघ के पास प्रभावी शक्ति का अभाव था और प्रमुख शक्तियों के राष्ट्रीय हित उसके कार्यों पर प्रभाव डालते थे। परिणामस्वरूप वह आक्रामक राष्ट्रों को रोकने में सफल नहीं हो सका।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अधिक समय तक स्थिर नहीं रह सकी। जर्मनी में नाजीवाद का उदय, इटली में फासीवाद का विस्तार और जापान की सैन्य विस्तारवादी नीति ने विश्व शांति को गंभीर चुनौती दी। वर्साय की संधि से जर्मनी में उत्पन्न असंतोष तथा आर्थिक और राजनीतिक संकट ने हिटलर को मजबूत होने का अवसर दिया। दूसरी ओर राष्ट्रसंघ की कमजोर प्रतिक्रिया ने आक्रामक शक्तियों का मनोबल बढ़ाया। इन परिस्थितियों ने अंततः द्वितीय विश्व युद्ध का मार्ग प्रशस्त किया।
1939 में द्वितीय विश्व युद्ध आरंभ हुआ। यह प्रथम विश्व युद्ध से भी अधिक व्यापक और विनाशकारी था। यूरोप के साथ-साथ एशिया और अन्य क्षेत्र भी इसकी चपेट में आए। इस युद्ध ने न केवल करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित किया, बल्कि विश्व की राजनीतिक और आर्थिक शक्ति-संरचना को भी बदल दिया। युद्ध के अंत तक यूरोप की अधिकांश पुरानी शक्तियाँ कमजोर हो चुकी थीं और अमेरिका तथा सोवियत संघ दो प्रमुख महाशक्तियों के रूप में सामने आए।
द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम चरण में परमाणु हथियारों का प्रयोग हुआ। हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बमों के प्रयोग ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक नए युग का आरंभ किया। अब युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों तक सीमित नहीं रहा। परमाणु हथियारों की विनाशकारी क्षमता ने अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा, शक्ति-संतुलन और युद्ध की अवधारणा को ही बदल दिया। आगे चलकर अमेरिका और सोवियत संघ के बीच परमाणु हथियारों की होड़ अंतरराष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख विषय बनी।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए 1945 में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई। राष्ट्रसंघ की असफलताओं से सीख लेते हुए संयुक्त राष्ट्र को अधिक व्यापक और प्रभावशाली संस्था के रूप में विकसित किया गया। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति बनाए रखना, देशों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध विकसित करना, मानवाधिकारों को बढ़ावा देना और अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के समाधान के लिए सहयोग स्थापित करना था। इस प्रकार 20वीं शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के संस्थागत स्वरूप का विकास हुआ।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत संघ के बीच सहयोग शीघ्र ही प्रतिस्पर्धा में बदल गया। दोनों के बीच पूँजीवाद और समाजवाद को लेकर वैचारिक संघर्ष शुरू हुआ। अमेरिका उदार लोकतंत्र और पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का समर्थक था, जबकि सोवियत संघ समाजवादी व्यवस्था का नेतृत्व कर रहा था। दोनों महाशक्तियाँ अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों का विस्तार करना चाहती थीं। इस स्थिति ने विश्व को दो प्रमुख शक्ति-गुटों में बाँट दिया।
अमेरिका और उसके सहयोगियों ने पश्चिमी सैन्य गठबंधन का निर्माण किया, जबकि सोवियत संघ ने पूर्वी यूरोप के समाजवादी देशों को संगठित किया। इस दौर में सैन्य गठबंधन, आर्थिक सहायता, राजनीतिक प्रभाव और परमाणु हथियारों की प्रतिस्पर्धा अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रमुख विशेषताएँ बन गईं। प्रत्यक्ष युद्ध के स्थान पर अप्रत्यक्ष संघर्ष, प्रतिनिधि युद्ध, कूटनीतिक दबाव और विचारधारात्मक प्रतिस्पर्धा को अधिक महत्व मिला। इसी स्थिति को शीतयुद्ध कहा गया।
शीतयुद्ध के दौरान विश्व राजनीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष परमाणु हथियारों की होड़ थी। अमेरिका और सोवियत संघ ने अपनी परमाणु क्षमता को लगातार बढ़ाया। दोनों के बीच यह धारणा विकसित हुई कि यदि किसी एक पक्ष ने परमाणु युद्ध शुरू किया तो दोनों का विनाश संभव है। इस कारण परमाणु प्रतिरोध अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण सिद्धांत बना। इसी अवधि में हथियार नियंत्रण और निरस्त्रीकरण की आवश्यकता भी महसूस की गई।
शीतयुद्ध केवल अमेरिका और सोवियत संघ के संबंधों तक सीमित नहीं था। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अनेक देश महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा से प्रभावित हुए। कोरिया, वियतनाम और अफगानिस्तान जैसे संघर्षों में महाशक्तियों की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भूमिका दिखाई दी। इससे स्पष्ट हुआ कि शीतयुद्ध वास्तव में एक व्यापक वैश्विक शक्ति-संघर्ष था।
इसी समय एशिया और अफ्रीका में उपनिवेशवाद का तेजी से अंत हुआ। भारत सहित अनेक नए स्वतंत्र देशों ने अपनी विदेश नीति को महाशक्तियों से स्वतंत्र रखने का प्रयास किया। भारत ने गुटनिरपेक्षता के माध्यम से यह विचार प्रस्तुत किया कि नवस्वतंत्र देशों को किसी सैन्य गुट का हिस्सा बनने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों और स्वतंत्र निर्णय-क्षमता के आधार पर विदेश नीति निर्धारित करनी चाहिए। इस प्रकार गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने शीतयुद्ध की द्विध्रुवीय राजनीति के बीच एक वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।
शीतयुद्ध की अवधि पूरी तरह संघर्षपूर्ण नहीं थी। समय-समय पर दोनों महाशक्तियों ने तनाव कम करने के लिए बातचीत और समझौतों का सहारा लिया। विशेष रूप से परमाणु हथियारों की बढ़ती संख्या ने उन्हें यह समझने के लिए मजबूर किया कि प्रत्यक्ष परमाणु युद्ध किसी भी पक्ष के हित में नहीं होगा। इसलिए हथियार नियंत्रण, रणनीतिक समझौते और कूटनीतिक संवाद को भी महत्व मिला।
1980 के दशक में सोवियत संघ गंभीर आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं का सामना करने लगा। मिखाइल गोर्बाचेव ने सुधारवादी नीतियों के माध्यम से सोवियत व्यवस्था को बदलने का प्रयास किया। पूर्वी यूरोप में समाजवादी शासन के विरुद्ध जन आंदोलनों का विस्तार हुआ। 1989 में बर्लिन की दीवार का गिरना शीतयुद्ध के कमजोर पड़ने का महत्वपूर्ण प्रतीक बना। अंततः 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया और लगभग चार दशकों से चली आ रही द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था समाप्त हो गई।
शीतयुद्ध के अंत के बाद अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक नया चरण शुरू हुआ। अमेरिका कुछ समय के लिए विश्व की सबसे प्रभावशाली सैन्य और आर्थिक शक्ति बनकर उभरा। इस स्थिति को कई विद्वानों ने एकध्रुवीयता के रूप में समझा। लेकिन यह स्थिति स्थायी नहीं रही। चीन की आर्थिक एवं सैन्य शक्ति में वृद्धि, रूस की रणनीतिक क्षमता, यूरोपीय संघ की आर्थिक शक्ति और भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव ने अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन को अधिक जटिल बना दिया।
20वीं शताब्दी के अंतिम दशक में वैश्वीकरण ने भी अंतरराष्ट्रीय संबंधों को नई दिशा दी। देशों के बीच व्यापार, निवेश, तकनीक और सूचना का प्रवाह तेजी से बढ़ा। आर्थिक परस्पर निर्भरता ने यह स्पष्ट किया कि कोई भी देश पूरी तरह अलग रहकर वैश्विक समस्याओं का सामना नहीं कर सकता। आर्थिक शक्ति धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय प्रभाव का एक महत्वपूर्ण आधार बन गई।
इस अवधि में सुरक्षा की अवधारणा भी व्यापक हुई। पहले अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा का मुख्य संबंध युद्ध, सैन्य शक्ति और सीमा विवादों से था, लेकिन अब आतंकवाद, पर्यावरणीय संकट, महामारी, ऊर्जा सुरक्षा, साइबर अपराध, खाद्य सुरक्षा और मानव सुरक्षा जैसे मुद्दे भी अंतरराष्ट्रीय संबंधों का हिस्सा बनने लगे। इस प्रकार सुरक्षा का केंद्र केवल राज्य से आगे बढ़कर व्यक्ति और समाज तक पहुँचा।
20वीं शताब्दी के अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और अन्य संस्थाओं ने विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनके माध्यम से आर्थिक सहयोग, विकास, शांति स्थापना और अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के समाधान के प्रयास किए गए।
इस पूरी शताब्दी को देखने पर स्पष्ट होता है कि अंतरराष्ट्रीय संबंध लगातार परिवर्तनशील रहे। शताब्दी की शुरुआत यूरोपीय साम्राज्यवाद और शक्ति-संघर्ष से हुई, जिसके परिणामस्वरूप प्रथम विश्व युद्ध हुआ। इसके बाद सामूहिक सुरक्षा का प्रयास किया गया, लेकिन वह सफल नहीं हो सका और द्वितीय विश्व युद्ध हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत संघ की महाशक्ति प्रतिस्पर्धा ने शीतयुद्ध को जन्म दिया। शीतयुद्ध के अंत के बाद विश्व राजनीति एक नई दिशा में आगे बढ़ी, जिसमें वैश्वीकरण, आर्थिक परस्पर निर्भरता, नई सुरक्षा चुनौतियाँ और बहुध्रुवीयता की प्रवृत्ति दिखाई देने लगी।
अतः 20वीं शताब्दी को अंतरराष्ट्रीय संबंधों में तीव्र परिवर्तन, संघर्ष और पुनर्निर्माण की शताब्दी कहा जा सकता है। इस शताब्दी ने यह सिद्ध किया कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल सैन्य शक्ति से संचालित नहीं होती, बल्कि विचारधारा, अर्थव्यवस्था, कूटनीति, तकनीक, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और जनमत भी विश्व व्यवस्था को प्रभावित करते हैं। 20वीं शताब्दी की घटनाओं ने 21वीं शताब्दी की अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिए वह आधार तैयार किया, जिस पर आज की वैश्विक व्यवस्था विकसित हो रही है।
प्रथम विश्व युद्ध
प्रथम विश्व युद्ध आधुनिक विश्व इतिहास की उन निर्णायक घटनाओं में से एक था जिसने न केवल यूरोप की राजनीतिक व्यवस्था को बदल दिया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दिशा और स्वरूप को भी गहराई से प्रभावित किया। यह युद्ध 1914 से 1918 तक चला और प्रारंभ में यूरोप तक सीमित दिखाई देने के बावजूद धीरे-धीरे विश्व के अनेक देशों और क्षेत्रों को अपने प्रभाव में ले आया। इस युद्ध ने पुराने साम्राज्यों को कमजोर किया, नए राष्ट्रों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया, अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन को बदला और भविष्य में अंतरराष्ट्रीय शांति बनाए रखने के लिए सामूहिक सुरक्षा जैसी अवधारणाओं को जन्म दिया।
20वीं शताब्दी के आरंभ में यूरोप विश्व राजनीति का प्रमुख केंद्र था। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस, ऑस्ट्रिया-हंगरी और इटली जैसी शक्तियाँ राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव के विस्तार के लिए लगातार प्रतिस्पर्धा कर रही थीं। औद्योगिक क्रांति के कारण उत्पादन और व्यापार बढ़ा था, इसलिए कच्चे माल, बाजार और उपनिवेशों पर नियंत्रण की होड़ भी तेज हो गई थी। यूरोपीय शक्तियों के बीच यह प्रतिस्पर्धा धीरे-धीरे राजनीतिक तनाव में बदलने लगी।
प्रथम विश्व युद्ध का एक महत्वपूर्ण कारण साम्राज्यवाद था। यूरोप की शक्तियाँ एशिया और अफ्रीका के विभिन्न क्षेत्रों में अपने उपनिवेशों का विस्तार करना चाहती थीं। ब्रिटेन और फ्रांस के पास पहले से विशाल साम्राज्य थे, जबकि जर्मनी अपेक्षाकृत बाद में साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा में शामिल हुआ। जर्मनी की बढ़ती आर्थिक और सैन्य शक्ति ने ब्रिटेन और फ्रांस के लिए चुनौती पैदा की। उपनिवेशों तथा अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर नियंत्रण की इस प्रतिस्पर्धा ने यूरोपीय देशों के बीच अविश्वास को बढ़ाया।
दूसरा महत्वपूर्ण कारण उग्र राष्ट्रवाद था। यूरोप के विभिन्न देशों में राष्ट्रवादी भावनाएँ तेजी से मजबूत हो रही थीं। विशेष रूप से बाल्कन क्षेत्र में विभिन्न जातीय समूह स्वतंत्र राष्ट्र स्थापित करना चाहते थे। सर्ब राष्ट्रवाद का प्रभाव बढ़ रहा था और वह दक्षिणी स्लाव क्षेत्रों को एकजुट करने की इच्छा रखता था। दूसरी ओर ऑस्ट्रिया-हंगरी अपने साम्राज्य को बनाए रखना चाहता था। इस विरोध ने बाल्कन को यूरोप का अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र बना दिया।
तीसरा कारण सैन्यवाद और हथियारों की होड़ था। यूरोपीय शक्तियों ने अपनी सेनाओं और नौसेनाओं को लगातार मजबूत किया। जर्मनी और ब्रिटेन के बीच नौसैनिक शक्ति की प्रतिस्पर्धा विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी। देशों ने बड़ी सेनाएँ तैयार कीं और युद्ध की स्थिति में शीघ्र सैन्य कार्रवाई के लिए योजनाएँ बनाईं। परिणामस्वरूप यूरोप में ऐसा वातावरण बन गया जिसमें छोटी-सी राजनीतिक घटना भी व्यापक युद्ध का रूप ले सकती थी।
चौथा महत्वपूर्ण कारण सैन्य गुटबंदी थी। यूरोप की शक्तियाँ अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अलग-अलग गठबंधनों में बँट गई थीं। जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और इटली के बीच त्रिगुट बना था, जबकि ब्रिटेन, फ्रांस और रूस के बीच त्रि-राष्ट्रीय समझ विकसित हुई। इन गठबंधनों के कारण यूरोप दो बड़े शक्ति-समूहों में विभाजित हो गया। इससे किसी एक देश के साथ संघर्ष होने पर उसके सहयोगी देश भी युद्ध में शामिल होने के लिए बाध्य हो सकते थे।
इन सभी कारणों के बीच बाल्कन क्षेत्र सबसे अधिक तनावपूर्ण बना हुआ था। ऑटोमन साम्राज्य के कमजोर होने से बाल्कन में शक्ति-संघर्ष बढ़ गया था। सर्बिया अपनी शक्ति और प्रभाव बढ़ाना चाहता था, जबकि ऑस्ट्रिया-हंगरी उसे अपने साम्राज्य के लिए खतरा मानता था। रूस भी स्लाव राष्ट्रवाद और अपने रणनीतिक हितों के कारण सर्बिया के प्रति सहानुभूति रखता था। इस प्रकार बाल्कन की समस्या यूरोप की बड़ी शक्तियों के संघर्ष से जुड़ गई।
प्रथम विश्व युद्ध का तात्कालिक कारण 28 जून 1914 को सारायेवो में ऑस्ट्रिया-हंगरी के युवराज आर्कड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड और उनकी पत्नी की हत्या थी। उनकी हत्या एक सर्ब राष्ट्रवादी युवक गैवरिलो प्रिंसिप ने की। ऑस्ट्रिया-हंगरी ने इस घटना के लिए सर्बिया को जिम्मेदार ठहराया और कठोर शर्तें रखीं। इसके बाद उसने सर्बिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।
सर्बिया को रूस का समर्थन प्राप्त था। रूस के सक्रिय होने पर जर्मनी ऑस्ट्रिया-हंगरी के पक्ष में आया। जर्मनी ने रूस और फिर फ्रांस के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की। जर्मनी द्वारा बेल्जियम में प्रवेश करने के बाद ब्रिटेन भी युद्ध में शामिल हो गया। इस प्रकार एक स्थानीय विवाद तेजी से यूरोप के व्यापक युद्ध में बदल गया।
युद्ध में दो प्रमुख पक्ष बन गए। एक ओर मित्र राष्ट्र थे, जिनमें ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और बाद में अमेरिका सहित कई देश शामिल हुए। दूसरी ओर केंद्रीय शक्तियाँ थीं, जिनमें मुख्यतः जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी, ऑटोमन साम्राज्य और बुल्गारिया शामिल थे। इटली प्रारंभ में त्रिगुट का सदस्य होने के बावजूद बाद में मित्र राष्ट्रों की ओर से युद्ध में शामिल हुआ।
प्रथम विश्व युद्ध में आधुनिक तकनीक और नए प्रकार के हथियारों का व्यापक प्रयोग हुआ। मशीनगन, भारी तोपें, जहरीली गैस, टैंक, पनडुब्बियाँ और सैन्य विमान युद्ध के प्रमुख साधन बने। खाइयों में लंबे समय तक युद्ध चलने के कारण सैनिकों को अत्यंत कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। पश्चिमी मोर्चे पर युद्ध विशेष रूप से लंबा और रक्तरंजित रहा।
युद्ध के दौरान 1917 में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। रूस में क्रांति के बाद नई बोल्शेविक सरकार ने युद्ध से बाहर निकलने का निर्णय लिया। दूसरी ओर उसी वर्ष संयुक्त राज्य अमेरिका मित्र राष्ट्रों की ओर से युद्ध में शामिल हुआ। अमेरिका की आर्थिक और सैन्य सहायता ने मित्र राष्ट्रों की स्थिति मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1918 तक केंद्रीय शक्तियाँ कमजोर होने लगीं। जर्मनी की सैन्य और आर्थिक स्थिति खराब हो गई। अंततः 11 नवंबर 1918 को जर्मनी ने युद्धविराम स्वीकार कर लिया। इसके साथ प्रथम विश्व युद्ध का सक्रिय सैन्य संघर्ष समाप्त हो गया।
युद्ध का परिणाम अत्यंत विनाशकारी था। लाखों सैनिक और नागरिक मारे गए तथा बड़ी संख्या में लोग घायल और विस्थापित हुए। यूरोप की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई। कई शहर और औद्योगिक क्षेत्र नष्ट हुए तथा युद्ध में शामिल देशों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ा। यूरोप की पुरानी राजनीतिक और आर्थिक श्रेष्ठता को भी गंभीर धक्का लगा।
प्रथम विश्व युद्ध के परिणामस्वरूप चार बड़े साम्राज्यों का पतन या विघटन हुआ—जर्मन साम्राज्य, ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य, ऑटोमन साम्राज्य और रूसी साम्राज्य। इनके कमजोर होने से यूरोप तथा पश्चिमी एशिया में राजनीतिक सीमाओं का पुनर्गठन हुआ। कई नए राष्ट्र अस्तित्व में आए और राष्ट्रीय आत्मनिर्णय की भावना को बल मिला।
युद्ध के बाद 1919 में वर्साय की संधि हुई। इस संधि के माध्यम से जर्मनी पर कठोर शर्तें लगाई गईं। उसे युद्ध की जिम्मेदारी स्वीकार करनी पड़ी, क्षेत्रीय क्षति हुई और उस पर भारी आर्थिक दायित्व डाले गए। बाद में जर्मनी में इस संधि के प्रति असंतोष ने नाजीवाद के उभार को मजबूत करने वाली परिस्थितियों में योगदान दिया।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए राष्ट्रसंघ की स्थापना की गई। इसका मूल विचार सामूहिक सुरक्षा पर आधारित था। इसका उद्देश्य यह था कि भविष्य में कोई भी राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के विरुद्ध आक्रामक युद्ध न कर सके। विवादों को बातचीत, मध्यस्थता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से हल करने की कोशिश की जाए।
हालाँकि राष्ट्रसंघ एक महत्वपूर्ण प्रयोग था, लेकिन वह स्थायी शांति स्थापित करने में सफल नहीं हुआ। उसके पास अपनी स्वतंत्र सैन्य शक्ति नहीं थी और प्रमुख देशों के राष्ट्रीय हित उसके निर्णयों को प्रभावित करते थे। अमेरिका का राष्ट्रसंघ से बाहर रहना भी उसकी प्रभावशीलता के लिए एक बड़ी कमजोरी थी। आगे चलकर जापान, इटली और जर्मनी की आक्रामक गतिविधियों को रोकने में उसकी असफलता स्पष्ट हो गई।
प्रथम विश्व युद्ध का अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर व्यापक प्रभाव पड़ा। युद्ध से पहले अंतरराष्ट्रीय राजनीति मुख्यतः शक्ति-संतुलन, साम्राज्यवाद और सैन्य गठबंधनों पर आधारित थी। युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय कानून, सामूहिक सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और शांतिपूर्ण विवाद-समाधान की अवधारणाओं को अधिक महत्व मिला। इस दृष्टि से प्रथम विश्व युद्ध ने आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संस्थागत व्यवस्था के विकास का मार्ग प्रशस्त किया।
भारत पर भी प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव पड़ा। ब्रिटिश शासन के अधीन होने के कारण भारत से बड़ी संख्या में सैनिकों और संसाधनों का उपयोग युद्ध में किया गया। भारतीय सैनिकों ने विभिन्न युद्धक्षेत्रों में भाग लिया। युद्ध के बाद भारत में राजनीतिक जागरूकता और स्वतंत्रता की मांग को नई गति मिली। युद्ध के अनुभवों और ब्रिटिश नीतियों ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को प्रभावित किया।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद विश्व में शांति की इच्छा तो मजबूत हुई, लेकिन युद्ध की समाप्ति के साथ स्थायी शांति स्थापित नहीं हो सकी। वर्साय की कठोर शर्तें, जर्मनी का असंतोष, आर्थिक संकट, फासीवाद और नाजीवाद का उदय तथा राष्ट्रसंघ की कमजोरियाँ आगे चलकर द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि बनाने वाले प्रमुख तत्व बने।
इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध केवल दो सैन्य गुटों के बीच हुआ संघर्ष नहीं था, बल्कि इसने विश्व शक्ति-संतुलन, साम्राज्यवाद, राष्ट्रवाद, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और कूटनीति की दिशा को बदल दिया। इस युद्ध ने यह स्पष्ट किया कि केवल सैन्य शक्ति और गठबंधनों के आधार पर स्थायी अंतरराष्ट्रीय शांति स्थापित नहीं की जा सकती। इसके बाद सामूहिक सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता को अधिक गंभीरता से समझा गया।
अंततः कहा जा सकता है कि प्रथम विश्व युद्ध 20वीं शताब्दी के अंतरराष्ट्रीय संबंधों का एक निर्णायक मोड़ था। इसने पुरानी यूरोपीय शक्ति-व्यवस्था को कमजोर किया, अमेरिका के वैश्विक प्रभाव को बढ़ाया, नए राष्ट्रों के निर्माण को प्रोत्साहित किया और राष्ट्रसंघ के रूप में सामूहिक सुरक्षा का प्रयोग प्रस्तुत किया। यद्यपि यह प्रयोग सफल नहीं हुआ, फिर भी प्रथम विश्व युद्ध के अनुभवों ने आगे चलकर संयुक्त राष्ट्र और आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के निर्माण के लिए महत्वपूर्ण आधार तैयार किया।
द्वितीय विश्व युद्ध
द्वितीय विश्व युद्ध 20वीं शताब्दी की सबसे व्यापक और विनाशकारी घटनाओं में से एक था। यह युद्ध केवल यूरोप तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एशिया, अफ्रीका और विश्व के अनेक हिस्सों को अपने प्रभाव में ले गया। 1939 से 1945 तक चले इस युद्ध ने विश्व की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक संरचना को गहराई से बदल दिया। इसके परिणामस्वरूप यूरोप की पारंपरिक महाशक्तियाँ कमजोर हुईं, अमेरिका और सोवियत संघ दो प्रमुख महाशक्तियों के रूप में उभरे तथा अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नए शक्ति-संतुलन का निर्माण हुआ। इसी युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई और आगे चलकर शीतयुद्ध की पृष्ठभूमि तैयार हुई।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद विश्व के देशों ने स्थायी शांति की आशा की थी। लेकिन युद्ध के बाद बनी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में ऐसी अनेक कमियाँ थीं, जिन्होंने भविष्य के संघर्षों को जन्म दिया। 1919 की वर्साय संधि ने जर्मनी पर कठोर राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक प्रतिबंध लगाए। जर्मनी में इस संधि के प्रति असंतोष बढ़ता गया। आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता ने जर्मनी में कट्टर राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया और अंततः एडोल्फ हिटलर तथा नाजी दल के उदय का मार्ग प्रशस्त किया।
द्वितीय विश्व युद्ध का एक प्रमुख कारण वर्साय की संधि की कठोरता थी। जर्मनी को युद्ध का प्रमुख जिम्मेदार ठहराया गया और उस पर भारी क्षतिपूर्ति का बोझ डाला गया। उसके सैन्य विस्तार पर भी प्रतिबंध लगाए गए। जर्मनी के एक बड़े वर्ग ने इस संधि को राष्ट्रीय अपमान के रूप में देखा। हिटलर ने इसी असंतोष को अपनी राजनीति का आधार बनाया और जर्मनी को पुनः शक्तिशाली बनाने का वादा किया।
दूसरा प्रमुख कारण नाजीवाद और फासीवाद का उदय था। जर्मनी में हिटलर के नेतृत्व में नाजीवाद और इटली में बेनिटो मुसोलिनी के नेतृत्व में फासीवाद का विस्तार हुआ। दोनों विचारधाराओं में उग्र राष्ट्रवाद, सैन्यवाद और विस्तारवादी नीति को महत्व दिया गया। इन शासन व्यवस्थाओं ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग की अपेक्षा शक्ति और सैन्य विस्तार को अधिक महत्व दिया।
तीसरा महत्वपूर्ण कारण जापान की विस्तारवादी नीति थी। जापान एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता था। उसने चीन और पूर्वी एशिया के अन्य क्षेत्रों में सैन्य विस्तार किया। जापान का उद्देश्य एशिया में अपने नेतृत्व में एक व्यापक राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र स्थापित करना था। उसकी विस्तारवादी नीति ने एशिया में अंतरराष्ट्रीय तनाव को बढ़ा दिया।
चौथा कारण इटली की साम्राज्यवादी नीति थी। मुसोलिनी के नेतृत्व में इटली ने अपने पुराने साम्राज्यवादी गौरव को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। उसने अफ्रीका में विस्तारवादी अभियान चलाया। इटली की आक्रामक गतिविधियों के प्रति राष्ट्रसंघ की कमजोर प्रतिक्रिया ने सामूहिक सुरक्षा की व्यवस्था की कमजोरी को उजागर किया।
द्वितीय विश्व युद्ध के पीछे राष्ट्रसंघ की विफलता भी एक महत्वपूर्ण कारण थी। राष्ट्रसंघ का निर्माण प्रथम विश्व युद्ध के बाद शांति बनाए रखने के लिए किया गया था, लेकिन उसके पास अपनी प्रभावी सैन्य शक्ति नहीं थी। जापान द्वारा मंचूरिया पर कब्जे और इटली द्वारा इथियोपिया पर आक्रमण जैसी घटनाओं को रोकने में राष्ट्रसंघ प्रभावी कार्रवाई नहीं कर सका। इससे आक्रामक शक्तियों का मनोबल बढ़ा।
इसके अलावा ब्रिटेन और फ्रांस की तुष्टीकरण की नीति ने भी युद्ध की परिस्थितियों को मजबूत किया। इन देशों ने प्रारंभिक चरण में हिटलर की कुछ विस्तारवादी गतिविधियों का सीधे सामना करने के बजाय समझौते का रास्ता अपनाया। 1938 के म्यूनिख समझौते को इस नीति का प्रमुख उदाहरण माना जाता है। इस नीति से हिटलर को अपनी शक्ति बढ़ाने का अतिरिक्त अवसर मिला।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सैन्यवाद और हथियारों की बढ़ती होड़ भी युद्ध का महत्वपूर्ण कारण बनी। जर्मनी ने वर्साय संधि के प्रतिबंधों की अवहेलना करते हुए अपनी सैन्य शक्ति का विस्तार किया। ब्रिटेन, फ्रांस और अन्य देशों ने भी अपनी सुरक्षा के लिए सैन्य तैयारी बढ़ाई। इस प्रकार यूरोप में फिर से एक तनावपूर्ण शक्ति-संतुलन विकसित हो गया।
द्वितीय विश्व युद्ध का तात्कालिक कारण 1 सितंबर 1939 को जर्मनी द्वारा पोलैंड पर आक्रमण था। जर्मनी ने पोलैंड के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई की। इसके बाद ब्रिटेन और फ्रांस ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इस प्रकार यूरोप में एक स्थानीय सैन्य कार्रवाई व्यापक अंतरराष्ट्रीय युद्ध में बदल गई।
युद्ध के दौरान दो प्रमुख शक्ति-समूह बने। एक ओर धुरी शक्तियाँ थीं, जिनमें मुख्य रूप से जर्मनी, इटली और जापान शामिल थे। दूसरी ओर मित्र राष्ट्र थे, जिनमें ब्रिटेन, फ्रांस, सोवियत संघ, अमेरिका, चीन और अन्य देश शामिल हुए। युद्ध के दौरान विभिन्न देशों की स्थिति और गठबंधन परिस्थितियों के अनुसार बदलते भी रहे।
युद्ध के शुरुआती वर्षों में जर्मनी ने अत्यंत तेजी से सैन्य अभियान चलाए। उसकी ‘ब्लिट्जक्रिग’ या बिजली जैसी तेज युद्ध-रणनीति ने कई यूरोपीय देशों को तेजी से पराजित किया। पोलैंड के बाद डेनमार्क, नॉर्वे, बेल्जियम, नीदरलैंड और फ्रांस पर जर्मन प्रभाव बढ़ा। ब्रिटेन ने जर्मनी के विरुद्ध प्रतिरोध जारी रखा।
1941 में युद्ध ने एक नया मोड़ लिया। जर्मनी ने सोवियत संघ पर आक्रमण किया। इसी वर्ष जापान ने 7 दिसंबर को अमेरिकी नौसैनिक अड्डे पर्ल हार्बर पर हमला किया। इसके बाद अमेरिका सीधे युद्ध में शामिल हो गया। अमेरिका की आर्थिक, औद्योगिक और सैन्य क्षमता ने मित्र राष्ट्रों की स्थिति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
सोवियत मोर्चे पर स्टालिनग्राद का युद्ध भी एक निर्णायक मोड़ माना जाता है। जर्मन सेना को वहाँ भारी क्षति हुई और इसके बाद पूर्वी मोर्चे पर सोवियत सेना ने धीरे-धीरे बढ़त हासिल करनी शुरू कर दी। दूसरी ओर पश्चिमी मोर्चे पर मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी के विरुद्ध अभियान तेज किया।
1944 में मित्र राष्ट्रों ने फ्रांस के नॉर्मंडी तट पर व्यापक सैन्य अभियान शुरू किया, जिसे सामान्यतः डी-डे के नाम से जाना जाता है। इसके बाद पश्चिमी यूरोप में जर्मनी के विरुद्ध मित्र राष्ट्रों की प्रगति तेज हो गई। पूर्व से सोवियत सेना भी जर्मनी की ओर आगे बढ़ रही थी।
1945 तक जर्मनी चारों ओर से घिर गया। अप्रैल 1945 में हिटलर ने आत्महत्या कर ली और मई 1945 में जर्मनी ने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके साथ यूरोप में युद्ध समाप्त हो गया।
लेकिन एशिया में जापान के विरुद्ध युद्ध जारी था। जापान के आत्मसमर्पण को शीघ्र कराने के उद्देश्य से अमेरिका ने अगस्त 1945 में हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए। इसके बाद जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया और सितंबर 1945 तक द्वितीय विश्व युद्ध पूरी तरह समाप्त हो गया।
द्वितीय विश्व युद्ध का मानवीय नुकसान अत्यंत व्यापक था। करोड़ों सैनिकों और नागरिकों की मृत्यु हुई। बड़ी संख्या में लोग घायल, विस्थापित और शरणार्थी बने। अनेक शहर, उद्योग, परिवहन व्यवस्था और आर्थिक संसाधन नष्ट हुए। युद्ध ने यूरोप की अर्थव्यवस्था को विशेष रूप से कमजोर कर दिया।
युद्ध के दौरान होलोकॉस्ट भी मानव इतिहास की अत्यंत दुखद घटनाओं में शामिल रहा। नाजी शासन ने यहूदियों तथा अन्य समूहों के विरुद्ध व्यवस्थित उत्पीड़न और सामूहिक हत्या की नीति अपनाई। इस घटना ने मानवाधिकारों और मानव गरिमा की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक मजबूत व्यवस्था की आवश्यकता को सामने रखा।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व की शक्ति-संरचना में व्यापक परिवर्तन आया। ब्रिटेन और फ्रांस जैसी पुरानी यूरोपीय शक्तियाँ आर्थिक और सैन्य रूप से कमजोर हुईं। इसके विपरीत अमेरिका और सोवियत संघ दो प्रमुख महाशक्तियों के रूप में उभरे। आगे चलकर दोनों के बीच वैचारिक और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा ने शीतयुद्ध का रूप लिया।
द्वितीय विश्व युद्ध का एक महत्वपूर्ण परिणाम उपनिवेशवाद के कमजोर होने के रूप में सामने आया। यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों की आर्थिक और राजनीतिक क्षमता कमजोर हुई। एशिया और अफ्रीका में राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलनों को नई गति मिली। आने वाले दशकों में भारत सहित अनेक देशों ने स्वतंत्रता प्राप्त की और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नए राष्ट्रों का प्रवेश हुआ।
युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय शांति बनाए रखने के लिए 1945 में संयुक्त राष्ट्र संगठन की स्थापना की गई। संयुक्त राष्ट्र का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बनाए रखना, देशों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों को बढ़ावा देना, मानवाधिकारों की रक्षा करना और अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के समाधान के लिए सहयोग को प्रोत्साहित करना था।
द्वितीय विश्व युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकारों के विकास को भी प्रभावित किया। युद्ध के दौरान हुए अत्याचारों और युद्ध अपराधों के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने यह महसूस किया कि मानवाधिकारों की रक्षा केवल किसी एक देश का आंतरिक विषय नहीं हो सकती। आगे चलकर मानवाधिकारों से संबंधित अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और दस्तावेजों का विकास हुआ।
द्वितीय विश्व युद्ध ने परमाणु युग का भी आरंभ किया। हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बमों के प्रयोग ने यह स्पष्ट कर दिया कि भविष्य के युद्ध मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं। इसके बाद अमेरिका और सोवियत संघ के बीच परमाणु हथियारों की प्रतिस्पर्धा शुरू हुई, जिसने शीतयुद्ध की राजनीति को प्रभावित किया।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दृष्टि से द्वितीय विश्व युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव यह था कि विश्व राजनीति का केंद्र यूरोप से हटकर अमेरिका और सोवियत संघ की ओर स्थानांतरित हो गया। इससे शक्ति-संतुलन की पुरानी व्यवस्था समाप्त हुई और द्विध्रुवीय अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का निर्माण हुआ।
द्वितीय विश्व युद्ध के अनुभवों ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल सैन्य गठबंधनों और शक्ति-संतुलन के माध्यम से स्थायी शांति सुनिश्चित नहीं की जा सकती। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, सामूहिक सुरक्षा, कूटनीतिक सहयोग और अंतरराष्ट्रीय कानून की आवश्यकता है। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना इसी आवश्यकता का परिणाम थी।
इस प्रकार द्वितीय विश्व युद्ध केवल 1939 से 1945 के बीच लड़ा गया सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि यह आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के निर्माण का एक निर्णायक मोड़ था। इसने विश्व की राजनीतिक सीमाओं, शक्ति-संतुलन, आर्थिक व्यवस्था और सुरक्षा की अवधारणा को बदल दिया। युद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत संघ के उदय ने शीतयुद्ध की नींव रखी, जबकि उपनिवेशवाद के कमजोर पड़ने से नए स्वतंत्र राष्ट्रों के लिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश का मार्ग खुला।
अंततः कहा जा सकता है कि द्वितीय विश्व युद्ध ने 20वीं शताब्दी के अंतरराष्ट्रीय संबंधों को एक नई दिशा प्रदान की। इस युद्ध ने पुरानी यूरोपीय शक्ति-व्यवस्था को समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, अमेरिका और सोवियत संघ को महाशक्तियों के रूप में स्थापित किया, संयुक्त राष्ट्र को जन्म दिया, परमाणु युग की शुरुआत की और उपनिवेशवाद के पतन को गति दी। साथ ही, इसी युद्ध के बाद उत्पन्न अमेरिका-सोवियत प्रतिस्पर्धा ने विश्व को शीतयुद्ध की ओर अग्रसर किया। इसलिए द्वितीय विश्व युद्ध को आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों की संरचना को समझने के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना माना जाता है।
शीतयुद्ध
शीतयुद्ध 20वीं शताब्दी के अंतरराष्ट्रीय संबंधों की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक था। यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विकसित हुई ऐसी वैश्विक राजनीतिक, वैचारिक, आर्थिक और सैन्य प्रतिस्पर्धा थी, जिसमें मुख्य रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ एक-दूसरे के विरोधी बने रहे। इसे ‘शीतयुद्ध’ इसलिए कहा गया क्योंकि दोनों महाशक्तियों के बीच प्रत्यक्ष और व्यापक युद्ध नहीं हुआ, लेकिन दोनों के बीच लगातार तनाव, शक्ति-संघर्ष, सैन्य तैयारी, हथियारों की होड़, कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा और विभिन्न देशों में प्रभाव स्थापित करने की कोशिश जारी रही। लगभग 1945 से 1991 तक अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर इसका गहरा प्रभाव रहा।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ एक ही पक्ष में होकर जर्मनी और उसके सहयोगियों के विरुद्ध लड़े थे। लेकिन युद्ध समाप्त होते ही दोनों के बीच मौजूद वैचारिक और राजनीतिक मतभेद तेजी से सामने आने लगे। अमेरिका उदार लोकतंत्र और पूँजीवादी आर्थिक व्यवस्था का समर्थक था, जबकि सोवियत संघ साम्यवादी विचारधारा और समाजवादी आर्थिक व्यवस्था का नेतृत्व कर रहा था। दोनों अपने-अपने राजनीतिक और आर्थिक मॉडल को अधिक प्रभावशाली मानते थे और विश्व के विभिन्न देशों में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते थे।
शीतयुद्ध का उदय केवल वैचारिक मतभेदों का परिणाम नहीं था। इसके पीछे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उत्पन्न शक्ति-संतुलन, यूरोप के पुनर्गठन, पूर्वी यूरोप में सोवियत प्रभाव के विस्तार, अमेरिका की आर्थिक और राजनीतिक नीतियों तथा दोनों महाशक्तियों की सुरक्षा संबंधी चिंताओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमजोर हो चुका था। जर्मनी पराजित हो गया था और ब्रिटेन तथा फ्रांस जैसी शक्तियों की क्षमता पहले की तुलना में कमजोर हो गई थी। इस परिस्थिति में अमेरिका और सोवियत संघ दो ऐसी महाशक्तियाँ बनकर सामने आए जिनके पास व्यापक सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक क्षमता थी। परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय राजनीति धीरे-धीरे द्विध्रुवीय शक्ति-संरचना में बदल गई।
शीतयुद्ध का एक प्रमुख कारण पूँजीवाद और साम्यवाद के बीच वैचारिक संघर्ष था। अमेरिका निजी संपत्ति, बाजार अर्थव्यवस्था और उदार लोकतंत्र को महत्व देता था, जबकि सोवियत संघ राज्य-नियंत्रित अर्थव्यवस्था और साम्यवादी राजनीतिक व्यवस्था का समर्थक था। दोनों को आशंका थी कि दूसरे की विचारधारा का विस्तार उनके अपने राजनीतिक और सुरक्षा हितों के लिए खतरा बन सकता है।
पूर्वी यूरोप में सोवियत प्रभाव का विस्तार भी तनाव का प्रमुख कारण बना। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पोलैंड, हंगरी, रोमानिया, बुल्गारिया, चेकोस्लोवाकिया और पूर्वी जर्मनी जैसे देशों में समाजवादी शासन स्थापित हुए या सोवियत प्रभाव बढ़ा। अमेरिका और पश्चिमी यूरोपीय देशों ने इसे सोवियत विस्तारवाद के रूप में देखा। दूसरी ओर सोवियत संघ पश्चिमी देशों की नीतियों को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानता था।
1947 में अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने ट्रूमैन सिद्धांत प्रस्तुत किया। इसका उद्देश्य उन देशों को सहायता देना था जिन्हें अमेरिका साम्यवादी विस्तार के खतरे में मानता था। इसी वर्ष अमेरिका ने यूरोप के आर्थिक पुनर्निर्माण के लिए मार्शल योजना शुरू की। सोवियत संघ ने इसे अमेरिकी आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने का प्रयास माना और अपने प्रभाव क्षेत्र के देशों को इससे दूर रखा।
शीतयुद्ध के दौरान दोनों महाशक्तियों ने अपने-अपने सैन्य गठबंधनों का निर्माण किया। 1949 में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने नाटो की स्थापना की। इसके जवाब में 1955 में सोवियत संघ और उसके सहयोगियों ने वारसा संधि संगठन बनाया। इस प्रकार यूरोप सैन्य दृष्टि से दो प्रमुख गुटों में विभाजित हो गया।
शीतयुद्ध की एक प्रमुख विशेषता हथियारों की होड़ थी। अमेरिका और सोवियत संघ ने पारंपरिक हथियारों के साथ-साथ परमाणु और हाइड्रोजन बम जैसी अत्यधिक विनाशकारी हथियार प्रणालियों का विकास किया। दोनों महाशक्तियों ने अपनी परमाणु क्षमता को इतना बढ़ा लिया कि किसी भी बड़े युद्ध की स्थिति में दोनों पक्षों के विनाश की आशंका उत्पन्न हो गई। इससे परमाणु प्रतिरोध की अवधारणा मजबूत हुई।
शीतयुद्ध के दौरान अंतरिक्ष भी महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र बन गया। सोवियत संघ ने 1957 में स्पुतनिक-1 का प्रक्षेपण करके अंतरिक्ष प्रतिस्पर्धा में बढ़त बनाई। इसके बाद अमेरिका ने अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को और तेज किया। 1969 में अमेरिका ने मानव को चंद्रमा पर उतारकर इस प्रतिस्पर्धा में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की। इस प्रकार विज्ञान और तकनीक भी महाशक्ति संघर्ष का हिस्सा बन गए।
शीतयुद्ध केवल अमेरिका और सोवियत संघ के बीच राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा। दोनों महाशक्तियों ने विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में अपने समर्थक देशों और आंदोलनों को आर्थिक, राजनीतिक तथा सैन्य सहायता प्रदान की। इस कारण कई क्षेत्रीय संघर्ष महाशक्ति प्रतिस्पर्धा से प्रभावित हुए।
कोरियाई युद्ध शीतयुद्ध के शुरुआती महत्वपूर्ण संघर्षों में से एक था। 1950 में उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया पर आक्रमण किया। अमेरिका और उसके सहयोगियों ने दक्षिण कोरिया का समर्थन किया, जबकि चीन ने उत्तर कोरिया का समर्थन किया और सोवियत संघ की भी भूमिका रही। युद्ध अंततः किसी निर्णायक विजय के बिना समाप्त हुआ और कोरियाई प्रायद्वीप विभाजित रहा।
इसी प्रकार वियतनाम युद्ध में भी शीतयुद्ध की प्रतिस्पर्धा स्पष्ट दिखाई दी। अमेरिका ने दक्षिण वियतनाम का समर्थन किया, जबकि उत्तर वियतनाम को सोवियत संघ और चीन से सहायता मिली। लंबे संघर्ष के बाद अमेरिका को अपनी सैन्य भूमिका समाप्त करनी पड़ी और अंततः वियतनाम एकीकृत हुआ।
शीतयुद्ध की सबसे खतरनाक घटनाओं में 1962 का क्यूबा मिसाइल संकट प्रमुख था। सोवियत संघ ने क्यूबा में परमाणु मिसाइलें तैनात करने का प्रयास किया। अमेरिका ने इसका तीव्र विरोध किया। दोनों महाशक्तियाँ परमाणु टकराव के अत्यंत निकट पहुँच गईं। अंततः बातचीत और समझौते के माध्यम से संकट को समाप्त किया गया। इस घटना ने दोनों महाशक्तियों को यह एहसास कराया कि परमाणु युद्ध पूरी मानवता के लिए विनाशकारी हो सकता है।
शीतयुद्ध के दौरान बर्लिन भी महाशक्तियों के संघर्ष का प्रमुख केंद्र बना। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी और बर्लिन विभाजित हो गए थे। पश्चिमी बर्लिन पश्चिमी शक्तियों के प्रभाव में था, जबकि पूर्वी बर्लिन सोवियत प्रभाव वाले क्षेत्र में था। 1961 में बर्लिन की दीवार का निर्माण शीतयुद्ध के विभाजन का प्रमुख प्रतीक बन गया। 1989 में इस दीवार का गिरना शीतयुद्ध के अंत की दिशा में एक महत्वपूर्ण घटना साबित हुआ।
शीतयुद्ध का एक महत्वपूर्ण पक्ष गुटनिरपेक्ष आंदोलन का उदय था। एशिया और अफ्रीका के नवस्वतंत्र देश अमेरिका या सोवियत संघ के किसी सैन्य गुट का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे। वे अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देना चाहते थे। भारत, मिस्र, यूगोस्लाविया, इंडोनेशिया और घाना जैसे देशों ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इसके प्रमुख समर्थकों में थे।
शीतयुद्ध के प्रारंभिक वर्षों में दोनों महाशक्तियों के बीच तनाव लगातार बढ़ता रहा, लेकिन बाद के वर्षों में तनाव कम करने के प्रयास भी हुए। इसे तनाव-शैथिल्य या डिटेंट कहा जाता है। दोनों पक्षों ने यह महसूस किया कि लगातार हथियारों की होड़ आर्थिक रूप से महँगी और राजनीतिक रूप से खतरनाक है। इसलिए परमाणु हथियारों को सीमित करने तथा आपसी संबंधों में स्थिरता लाने के लिए समझौतों की दिशा में कदम उठाए गए।
1970 के दशक में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच रणनीतिक हथियारों को सीमित करने के प्रयास हुए। इसके बावजूद दोनों के बीच अविश्वास पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप के बाद तनाव फिर बढ़ गया। अमेरिका ने अफगान प्रतिरोधी शक्तियों को सहायता दी। इससे शीतयुद्ध का अंतिम चरण फिर से तनावपूर्ण हो गया।
1980 के दशक में सोवियत संघ गंभीर आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं से जूझ रहा था। मिखाइल गोर्बाचेव ने सत्ता में आने के बाद पेरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त जैसी सुधार नीतियाँ अपनाईं। उनका उद्देश्य सोवियत अर्थव्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था में सुधार करना था। साथ ही उन्होंने पश्चिमी देशों के साथ तनाव कम करने की नीति भी अपनाई।
पूर्वी यूरोप में समाजवादी शासन के विरुद्ध आंदोलनों को गति मिली। 1989 में बर्लिन की दीवार गिर गई। इसके बाद पूर्वी यूरोप में सोवियत प्रभाव तेजी से कमजोर हुआ। अंततः दिसंबर 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया। इसके साथ ही शीतयुद्ध की द्विध्रुवीय अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का अंत हो गया।
शीतयुद्ध का अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर अत्यंत व्यापक प्रभाव पड़ा। सबसे पहले, इसने विश्व को दो प्रमुख शक्ति-गुटों में विभाजित किया। दूसरा, परमाणु हथियारों और सैन्य तकनीक की होड़ ने अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा की प्रकृति बदल दी। तीसरा, संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं के कार्यों पर भी महाशक्ति प्रतिस्पर्धा का प्रभाव पड़ा। चौथा, एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अनेक क्षेत्र महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा के केंद्र बने।
शीतयुद्ध ने कूटनीति को भी नई दिशा दी। प्रत्यक्ष युद्ध के स्थान पर वार्ता, सम्मेलन, सैन्य गठबंधन, आर्थिक सहायता, प्रतिबंध, प्रचार और अप्रत्यक्ष संघर्ष का उपयोग किया गया। इस कारण अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति के साथ-साथ कूटनीति और रणनीतिक संतुलन का महत्व बढ़ा।
शीतयुद्ध के कारण हथियारों की होड़ बढ़ी, लेकिन इसी के साथ निरस्त्रीकरण और हथियार नियंत्रण की आवश्यकता भी सामने आई। परमाणु हथियारों के विस्तार ने यह स्पष्ट किया कि यदि महाशक्तियों के बीच सीधा परमाणु युद्ध हुआ तो उसका प्रभाव केवल युद्धरत देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी मानव सभ्यता प्रभावित हो सकती है।
शीतयुद्ध के अंत के बाद विश्व राजनीति में एक नई व्यवस्था का विकास हुआ। सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका कुछ समय के लिए सबसे प्रभावशाली वैश्विक शक्ति के रूप में उभरा। लेकिन बाद में चीन की बढ़ती शक्ति, रूस की रणनीतिक क्षमता, यूरोपीय संघ की आर्थिक भूमिका और भारत के बढ़ते प्रभाव के कारण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अधिक जटिल और बहुध्रुवीय होती गई।
अतः शीतयुद्ध को केवल अमेरिका और सोवियत संघ के बीच संघर्ष के रूप में समझना पर्याप्त नहीं है। यह वास्तव में विचारधारा, शक्ति, सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, तकनीक और वैश्विक प्रभाव के लिए चला एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय संघर्ष था। इसकी विशेषता यह थी कि दोनों महाशक्तियाँ प्रत्यक्ष युद्ध से बचते हुए दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में अपने प्रभाव का विस्तार करती रहीं।
अंततः कहा जा सकता है कि शीतयुद्ध ने 20वीं शताब्दी के अंतरराष्ट्रीय संबंधों को लगभग चार दशकों तक प्रभावित किया। इसने विश्व को द्विध्रुवीय बनाया, परमाणु हथियारों की प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया, सैन्य गठबंधनों को मजबूत किया, अनेक क्षेत्रीय संघर्षों को प्रभावित किया और गुटनिरपेक्ष आंदोलन के लिए परिस्थितियाँ पैदा कीं। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ इसका अंत हुआ, लेकिन शीतयुद्ध के दौरान विकसित शक्ति-संतुलन, परमाणु रणनीति, सैन्य गठबंधन और अंतरराष्ट्रीय संस्थागत राजनीति का प्रभाव आज भी विश्व राजनीति में दिखाई देता है।
शीतयुद्ध का अंत
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद लगभग चार दशकों तक अमेरिका और सोवियत संघ के बीच चला शीतयुद्ध 20वीं शताब्दी की अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सबसे प्रभावशाली घटनाओं में से एक था। दोनों महाशक्तियों के बीच प्रत्यक्ष युद्ध नहीं हुआ, लेकिन राजनीतिक विचारधारा, सैन्य शक्ति, परमाणु हथियार, आर्थिक प्रभाव और वैश्विक प्रभुत्व को लेकर लगातार प्रतिस्पर्धा बनी रही। धीरे-धीरे सोवियत संघ की आंतरिक आर्थिक और राजनीतिक समस्याएँ बढ़ने लगीं और उसकी शक्ति कमजोर होती गई। पूर्वी यूरोप में समाजवादी शासन के विरुद्ध आंदोलनों तथा सोवियत संघ के भीतर सुधारों ने शीतयुद्ध की संरचना को कमजोर कर दिया। अंततः 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ शीतयुद्ध का औपचारिक अंत हो गया।
शीतयुद्ध के अंत को समझने के लिए सबसे पहले सोवियत संघ की आंतरिक स्थिति को समझना आवश्यक है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सोवियत संघ एक महाशक्ति के रूप में उभरा था। उसने सैन्य शक्ति और परमाणु क्षमता के विकास पर बहुत अधिक संसाधन खर्च किए। अमेरिका के साथ हथियारों की प्रतिस्पर्धा बनाए रखना सोवियत अर्थव्यवस्था पर लगातार भारी पड़ता गया। विशाल सैन्य खर्च के कारण नागरिक अर्थव्यवस्था, उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन और सामान्य जीवन से जुड़े क्षेत्रों पर दबाव बढ़ता गया।
सोवियत अर्थव्यवस्था में केंद्रीकृत नियोजन व्यवस्था थी। प्रारंभिक दशकों में इस व्यवस्था ने तीव्र औद्योगिकीकरण और सैन्य विकास में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की, लेकिन समय के साथ आर्थिक व्यवस्था में जड़ता बढ़ने लगी। उत्पादन की गुणवत्ता, तकनीकी नवाचार और उपभोक्ता आवश्यकताओं के क्षेत्र में सोवियत व्यवस्था पश्चिमी देशों से पीछे रहने लगी। आर्थिक समस्याओं ने सरकार के सामने गंभीर चुनौती उत्पन्न कर दी।
सोवियत संघ के सामने केवल आर्थिक समस्या ही नहीं थी। विभिन्न गणराज्यों और क्षेत्रों में राष्ट्रीय पहचान तथा अधिक राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग भी बढ़ने लगी। सोवियत संघ अनेक गणराज्यों का संघ था और समय के साथ इनमें से कई क्षेत्रों में केंद्रीय सत्ता के प्रति असंतोष दिखाई देने लगा। इस आंतरिक असंतोष ने सोवियत संघ की राजनीतिक एकता को कमजोर किया।
1985 में मिखाइल गोर्बाचेव सोवियत संघ के नेता बने। उन्होंने महसूस किया कि पुरानी व्यवस्था को बिना परिवर्तन के लंबे समय तक बनाए रखना संभव नहीं है। उन्होंने सोवियत राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था में सुधार के लिए दो महत्वपूर्ण नीतियाँ अपनाईं—पेरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त।
पेरेस्त्रोइका का अर्थ सामान्यतः पुनर्गठन से लगाया जाता है। इसके माध्यम से गोर्बाचेव सोवियत अर्थव्यवस्था और प्रशासन में सुधार करना चाहते थे। उनका उद्देश्य आर्थिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना और उत्पादन क्षमता को बढ़ाना था। उन्होंने आर्थिक क्षेत्र में कुछ सीमित बाजार-आधारित सुधारों और प्रशासनिक परिवर्तन का प्रयास किया।
ग्लासनोस्त का अर्थ खुलापन था। इसके माध्यम से राजनीतिक और सामाजिक जीवन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा सार्वजनिक चर्चा की गुंजाइश बढ़ाई गई। मीडिया और जनता को पहले की तुलना में सरकार की नीतियों पर अधिक खुलकर चर्चा करने का अवसर मिला। लेकिन इन सुधारों का एक अप्रत्याशित परिणाम यह हुआ कि लंबे समय से दबे राजनीतिक और राष्ट्रीय असंतोष खुले रूप में सामने आने लगे।
गोर्बाचेव ने विदेश नीति में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन किया। उन्होंने अमेरिका और पश्चिमी यूरोपीय देशों के साथ तनाव कम करने का प्रयास किया। सोवियत संघ ने हथियारों की होड़ को सीमित करने और परमाणु हथियारों के संबंध में समझौते करने की दिशा में कदम उठाए। अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के साथ गोर्बाचेव की बातचीत ने महाशक्तियों के बीच तनाव कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सोवियत विदेश नीति में इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि पूर्वी यूरोप के समाजवादी देशों पर सोवियत संघ का कठोर नियंत्रण कमजोर होने लगा। पहले सोवियत संघ इन देशों में समाजवादी शासन को बनाए रखने के लिए आवश्यकता पड़ने पर सैन्य हस्तक्षेप करता था। लेकिन गोर्बाचेव ने ऐसी नीति से दूरी बनाई। इससे पूर्वी यूरोप के देशों को अपनी राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तन करने का अधिक अवसर मिला।
1989 में पूर्वी यूरोप में एक के बाद एक समाजवादी सरकारों के विरुद्ध जन आंदोलन होने लगे। पोलैंड, हंगरी, चेकोस्लोवाकिया, बुल्गारिया और रोमानिया जैसे देशों में राजनीतिक परिवर्तन हुए। इन घटनाओं ने सोवियत प्रभाव को बहुत कमजोर कर दिया।
शीतयुद्ध के अंत का सबसे प्रसिद्ध प्रतीक बर्लिन की दीवार का गिरना था। 1961 में निर्मित बर्लिन की दीवार पश्चिमी और पूर्वी यूरोप के वैचारिक तथा राजनीतिक विभाजन का प्रतीक बन चुकी थी। 9 नवंबर 1989 को बर्लिन की दीवार खुल गई और बाद में उसे गिरा दिया गया। इस घटना ने जर्मनी के विभाजन को समाप्त करने की प्रक्रिया को तेज किया तथा शीतयुद्ध के अंत का प्रतीकात्मक संदेश दिया।
इसके बाद पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के एकीकरण का मार्ग खुला। अक्टूबर 1990 में जर्मनी का पुनः एकीकरण हुआ। यह शीतयुद्ध की द्विध्रुवीय व्यवस्था के कमजोर होने की महत्वपूर्ण घटना थी।
पूर्वी यूरोप में राजनीतिक परिवर्तन के साथ सोवियत संघ के भीतर भी राष्ट्रीय आंदोलनों ने जोर पकड़ लिया। विभिन्न गणराज्यों में स्वतंत्रता की मांग बढ़ने लगी। बाल्टिक गणराज्यों और अन्य क्षेत्रों में केंद्रीय सत्ता से अलग होने की इच्छा मजबूत हुई। इससे सोवियत संघ की राजनीतिक एकता को गंभीर चुनौती मिली।
1991 में सोवियत संघ के भीतर राजनीतिक संकट और गहरा गया। अगस्त 1991 में सोवियत नेतृत्व के कुछ कठोरपंथी तत्वों ने गोर्बाचेव के विरुद्ध तख्तापलट का प्रयास किया। यह प्रयास असफल रहा, लेकिन इसके बाद सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी की शक्ति और केंद्रीय सरकार का प्रभाव तेजी से कमजोर हुआ।
इसके बाद विभिन्न सोवियत गणराज्यों ने स्वतंत्रता की घोषणा करनी शुरू कर दी। रूस के नेता बोरिस येल्तसिन की भूमिका भी इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण रही। दिसंबर 1991 में रूस, यूक्रेन और बेलारूस के नेताओं ने सोवियत संघ के अस्तित्व को समाप्त करने और एक नए संगठन स्वतंत्र राष्ट्रों के राष्ट्रकुल (CIS) के निर्माण की दिशा में समझौता किया।
25 दिसंबर 1991 को मिखाइल गोर्बाचेव ने सोवियत संघ के राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया। इसके अगले दिन सोवियत संघ का औपचारिक विघटन हो गया। इस घटना के साथ विश्व की लगभग चार दशकों पुरानी द्विध्रुवीय शक्ति-संरचना समाप्त हो गई। अमेरिका और सोवियत संघ के बीच चला शीतयुद्ध भी इसी के साथ समाप्त माना गया।
शीतयुद्ध के अंत में अमेरिका की भूमिका भी महत्वपूर्ण थी। अमेरिका ने सोवियत संघ के साथ लंबे समय तक राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य प्रतिस्पर्धा बनाए रखी थी। राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के कार्यकाल में अमेरिका ने सोवियत संघ पर सैन्य और आर्थिक दबाव बढ़ाया। हालांकि शीतयुद्ध का अंत केवल अमेरिकी दबाव का परिणाम नहीं था। सोवियत संघ की आंतरिक आर्थिक समस्याएँ, राजनीतिक सुधार, पूर्वी यूरोप में परिवर्तन और राष्ट्रीय आंदोलनों ने भी इसमें निर्णायक भूमिका निभाई।
शीतयुद्ध के अंत का एक महत्वपूर्ण कारण हथियारों की दौड़ का आर्थिक बोझ था। अमेरिका के साथ बराबरी बनाए रखने के लिए सोवियत संघ को विशाल सैन्य संसाधन खर्च करने पड़ते थे। परमाणु हथियारों, मिसाइलों, पारंपरिक सैन्य शक्ति और अंतरिक्ष कार्यक्रम पर भारी खर्च ने उसकी अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया। आर्थिक समस्याओं के कारण सोवियत नेतृत्व के लिए पुरानी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को लंबे समय तक जारी रखना कठिन हो गया।
अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप ने भी सोवियत संघ पर भारी दबाव डाला। 1979 से शुरू हुए इस संघर्ष में सोवियत सेना को लंबे समय तक सैन्य चुनौती का सामना करना पड़ा। युद्ध आर्थिक रूप से महँगा साबित हुआ और सोवियत समाज में भी इसके प्रति असंतोष बढ़ा। अंततः सोवियत सेना ने 1989 में अफगानिस्तान से अपनी वापसी पूरी की।
शीतयुद्ध के अंत के पीछे विचारधारात्मक परिवर्तन भी महत्वपूर्ण था। सोवियत संघ में यह विश्वास कमजोर पड़ने लगा कि केंद्रीकृत समाजवादी व्यवस्था ही आर्थिक और राजनीतिक विकास का सर्वोत्तम मार्ग है। पश्चिमी देशों की तकनीकी और आर्थिक उपलब्धियों ने भी सोवियत समाज में वैकल्पिक व्यवस्था के प्रति रुचि बढ़ाई।
शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद अंतरराष्ट्रीय संबंधों में व्यापक परिवर्तन हुए। सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन था द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था का अंत। अब विश्व राजनीति अमेरिका और सोवियत संघ के बीच दो गुटों में विभाजित नहीं रही। कुछ समय के लिए अमेरिका विश्व की सबसे प्रभावशाली महाशक्ति बनकर उभरा और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एकध्रुवीयता की स्थिति दिखाई दी।
शीतयुद्ध के अंत के बाद पूर्वी यूरोप में लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था का विस्तार हुआ। अनेक पूर्व समाजवादी देशों ने बहुदलीय लोकतंत्र और बाजार आधारित आर्थिक व्यवस्था को अपनाया। नाटो और यूरोपीय संघ का पूर्वी यूरोप की ओर विस्तार भी आगे चलकर महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम बना।
शीतयुद्ध की समाप्ति ने वैश्वीकरण को भी गति दी। विचारधारात्मक विभाजन कमजोर होने के कारण देशों के बीच व्यापार, निवेश, तकनीक और संचार का विस्तार हुआ। बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का प्रभाव विश्व के अनेक हिस्सों में बढ़ा और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध अधिक घनिष्ठ हुए।
हालाँकि शीतयुद्ध समाप्त होने के बाद विश्व पूरी तरह संघर्षमुक्त नहीं हुआ। बाल्कन क्षेत्र में जातीय संघर्ष, पश्चिम एशिया में तनाव, आतंकवाद, क्षेत्रीय युद्ध और नई सुरक्षा चुनौतियाँ सामने आईं। इससे स्पष्ट हुआ कि शीतयुद्ध का अंत युद्ध और संघर्ष की समाप्ति नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के एक नए चरण की शुरुआत थी।
शीतयुद्ध के अंत ने भारत के विदेश संबंधों को भी प्रभावित किया। सोवियत संघ भारत का महत्वपूर्ण मित्र और रक्षा सहयोगी था। उसके विघटन के बाद भारत को बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुसार अपनी विदेश नीति में नए संतुलन विकसित करने पड़े। भारत ने अमेरिका, रूस, यूरोप और एशिया की उभरती शक्तियों के साथ संबंधों को नए आधार पर विकसित किया। इसी दौर में भारत ने आर्थिक उदारीकरण की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए।
अतः शीतयुद्ध का अंत किसी एक घटना या किसी एक देश की नीति का परिणाम नहीं था। यह सोवियत संघ की आर्थिक कमजोरी, राजनीतिक सुधारों, हथियारों की होड़ के दबाव, पूर्वी यूरोप में लोकतांत्रिक आंदोलनों, राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलनों, गोर्बाचेव की नई विदेश नीति और सोवियत संघ के अंततः विघटन जैसी अनेक परिस्थितियों का संयुक्त परिणाम था।
अंततः कहा जा सकता है कि 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ शीतयुद्ध की समाप्ति ने 20वीं शताब्दी की अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त कर दिया। इसके साथ द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था समाप्त हुई और अंतरराष्ट्रीय राजनीति एक नई दिशा में आगे बढ़ी। शीतयुद्ध के अंत ने वैश्वीकरण, आर्थिक परस्पर निर्भरता और नई अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संरचना के विकास का मार्ग खोला। हालांकि इसके बाद भी विश्व में अनेक संघर्ष और सुरक्षा चुनौतियाँ बनी रहीं, फिर भी 1991 की घटना ने आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ स्थापित किया।
शीतयुद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय संबंध
1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ लगभग चार दशकों से चली आ रही शीतयुद्ध की द्विध्रुवीय व्यवस्था समाप्त हो गई। इसके साथ अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक नए युग का आरंभ हुआ, जिसे सामान्यतः शीतयुद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय संबंध कहा जाता है। इस नए दौर में विश्व राजनीति का स्वरूप पहले की तुलना में अधिक जटिल हो गया। अमेरिका कुछ समय के लिए विश्व की सबसे प्रभावशाली शक्ति के रूप में सामने आया, लेकिन धीरे-धीरे चीन, रूस, भारत और यूरोपीय संघ जैसी शक्तियों के बढ़ते प्रभाव ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बहुआयामी बना दिया। इस काल में सैन्य शक्ति के साथ आर्थिक शक्ति, तकनीकी क्षमता, वैश्वीकरण, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियाँ भी अंतरराष्ट्रीय संबंधों को प्रभावित करने लगीं।
शीतयुद्ध के दौरान विश्व मुख्यतः अमेरिका और सोवियत संघ के नेतृत्व वाले दो शक्ति-गुटों में विभाजित था। सोवियत संघ के विघटन के बाद यह विभाजन समाप्त हो गया। पूर्वी यूरोप के अनेक देशों ने समाजवादी व्यवस्था को छोड़कर बहुदलीय लोकतंत्र और बाजार आधारित अर्थव्यवस्था को अपनाना शुरू किया। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में वैचारिक संघर्ष की तीव्रता कम हुई और देशों के बीच आर्थिक तथा राजनीतिक सहयोग की संभावनाएँ बढ़ीं।
शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद शुरुआती वर्षों में अमेरिका की शक्ति अत्यधिक प्रभावशाली दिखाई दी। सोवियत संघ के समाप्त होने के कारण अमेरिका के सामने तत्काल कोई समान स्तर की महाशक्ति नहीं थी। अमेरिका की सैन्य, आर्थिक और तकनीकी क्षमता ने उसे विश्व राजनीति में अत्यंत प्रभावशाली स्थान प्रदान किया। इसी कारण 1990 के दशक की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अनेक विद्वानों ने एकध्रुवीय व्यवस्था के रूप में समझा।
लेकिन शीतयुद्धोत्तर विश्व को केवल अमेरिकी प्रभुत्व के आधार पर समझना पर्याप्त नहीं है। समय के साथ अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन में नए परिवर्तन दिखाई देने लगे। चीन ने तीव्र आर्थिक विकास के माध्यम से अपनी वैश्विक भूमिका मजबूत की। रूस ने सोवियत संघ के विघटन के बाद अपनी रणनीतिक क्षमता को बनाए रखा और धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका बढ़ाई। यूरोपीय संघ आर्थिक और राजनीतिक सहयोग का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना। भारत की आर्थिक, तकनीकी और कूटनीतिक क्षमता भी बढ़ी। इन परिवर्तनों ने विश्व राजनीति में बहुध्रुवीयता की प्रवृत्ति को मजबूत किया।
शीतयुद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय संबंधों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में वैश्वीकरण का विस्तार शामिल है। संचार क्रांति, इंटरनेट, परिवहन और तकनीकी विकास ने देशों के बीच दूरी को कम किया। व्यापार, निवेश, पूँजी, सूचना और तकनीक का अंतरराष्ट्रीय प्रवाह तेजी से बढ़ा। एक देश की आर्थिक गतिविधियों का प्रभाव दूसरे देशों पर भी पड़ने लगा। इस प्रकार अंतरराष्ट्रीय संबंधों में आर्थिक परस्पर निर्भरता पहले की तुलना में बहुत अधिक बढ़ गई।
वैश्वीकरण ने राष्ट्र-राज्य की भूमिका को समाप्त नहीं किया, बल्कि उसकी प्रकृति को बदल दिया। राज्य अभी भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण अभिनेता बने रहे, लेकिन उन्हें बहुराष्ट्रीय कंपनियों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों, गैर-सरकारी संस्थाओं और वैश्विक नागरिक समाज जैसे नए प्रभावशाली तत्वों के साथ काम करना पड़ा।
शीतयुद्धोत्तर काल में अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हुई। संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन और अन्य संस्थाओं के माध्यम से वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं के समाधान के प्रयास बढ़े। शीतयुद्ध के समय महाशक्तियों के वैचारिक संघर्ष के कारण कई बार अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की कार्यक्षमता प्रभावित होती थी। शीतयुद्ध समाप्त होने के बाद इन संस्थाओं से अधिक प्रभावी भूमिका निभाने की अपेक्षा की जाने लगी।
शीतयुद्धोत्तर विश्व में सुरक्षा की अवधारणा में भी व्यापक परिवर्तन आया। शीतयुद्ध के दौरान सुरक्षा का मुख्य संबंध सैन्य शक्ति और परमाणु हथियारों से था। लेकिन शीतयुद्ध के बाद गैर-पारंपरिक सुरक्षा के मुद्दे तेजी से सामने आए। आतंकवाद, साइबर अपराध, जलवायु परिवर्तन, महामारी, खाद्य संकट, ऊर्जा सुरक्षा, जल संकट, संगठित अपराध और मानव तस्करी जैसे विषय अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा बन गए।
1990 के दशक में क्षेत्रीय संघर्ष भी समाप्त नहीं हुए। सोवियत संघ के विघटन और पूर्वी यूरोप में राजनीतिक परिवर्तन के साथ अनेक क्षेत्रों में जातीय और राष्ट्रीय संघर्ष सामने आए। पूर्व युगोस्लाविया में हुए संघर्ष ने यह दिखाया कि शीतयुद्ध के समाप्त होने के बाद भी जातीय पहचान, राष्ट्रवाद और क्षेत्रीय विवाद अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए चुनौती बन सकते हैं।
इसी प्रकार अफ्रीका और एशिया के विभिन्न क्षेत्रों में गृहयुद्ध, जातीय संघर्ष और राजनीतिक अस्थिरता की समस्याएँ बनी रहीं। इन परिस्थितियों में संयुक्त राष्ट्र के शांति स्थापना अभियानों और मानवीय सहायता की भूमिका बढ़ी।
शीतयुद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय संबंधों में मानवाधिकार का महत्व भी बढ़ा। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने यह विचार अधिक मजबूती से स्वीकार किया कि मानवाधिकारों की रक्षा केवल किसी देश का आंतरिक विषय नहीं है। नरसंहार, जातीय हिंसा और बड़े पैमाने पर मानवाधिकार उल्लंघनों की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका को लेकर बहस तेज हुई।
इसी संदर्भ में मानवीय हस्तक्षेप की अवधारणा को भी महत्व मिला। प्रश्न यह उठा कि यदि किसी देश की सरकार अपने नागरिकों की रक्षा करने में असफल हो या स्वयं उनके विरुद्ध व्यापक हिंसा करे, तो क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय को हस्तक्षेप करना चाहिए? इस विषय ने राज्य की संप्रभुता और मानवाधिकारों के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया।
शीतयुद्धोत्तर काल में आतंकवाद अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा का एक प्रमुख मुद्दा बन गया। विशेष रूप से 11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर हुए आतंकवादी हमलों ने विश्व राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। इसके बाद आतंकवाद के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय अभियान तेज हुआ और अफगानिस्तान तथा इराक जैसे क्षेत्रों में सैन्य हस्तक्षेप हुए। इससे अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता, आतंकवाद और सैन्य हस्तक्षेप से संबंधित अनेक नए प्रश्न सामने आए।
शीतयुद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय संबंधों में परमाणु प्रसार भी एक महत्वपूर्ण समस्या बना रहा। सोवियत संघ के विघटन के बाद परमाणु हथियारों की सुरक्षा और नियंत्रण की चिंता बढ़ी। इसके साथ ही कुछ देशों द्वारा परमाणु क्षमता विकसित करने के प्रयासों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने परमाणु अप्रसार और हथियार नियंत्रण की चुनौती बनाए रखी।
इस दौर में क्षेत्रीय संगठनों का महत्व भी बढ़ा। यूरोप में यूरोपीय संघ का विस्तार हुआ और आर्थिक तथा राजनीतिक एकीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ी। एशिया में आसियान, दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग तथा अन्य क्षेत्रों में क्षेत्रीय संस्थाओं ने सहयोग को बढ़ावा देने का प्रयास किया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि वैश्विक राजनीति के साथ-साथ क्षेत्रीय सहयोग भी अंतरराष्ट्रीय संबंधों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
शीतयुद्धोत्तर विश्व में चीन का उदय अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तनों में से एक रहा। चीन ने आर्थिक सुधारों और वैश्विक व्यापार में सक्रिय भागीदारी के माध्यम से अपनी आर्थिक शक्ति को तेजी से बढ़ाया। आर्थिक शक्ति के साथ उसकी सैन्य और कूटनीतिक क्षमता भी बढ़ी। परिणामस्वरूप विश्व शक्ति-संतुलन में चीन की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती गई।
रूस ने सोवियत संघ के विघटन के बाद अपनी पूर्व वैश्विक स्थिति का एक बड़ा हिस्सा खो दिया, लेकिन वह परमाणु क्षमता और सैन्य शक्ति के कारण महत्वपूर्ण शक्ति बना रहा। समय के साथ रूस ने अपनी विदेश नीति में अधिक सक्रिय दृष्टिकोण अपनाया। इससे अमेरिका और रूस के बीच संबंधों में सहयोग के साथ-साथ प्रतिस्पर्धा भी बनी रही।
भारत की भूमिका भी शीतयुद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय संबंधों में लगातार बढ़ी। 1991 में भारत ने आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू की, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था वैश्विक बाजार से अधिक जुड़ी। भारत ने अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया। इसके साथ ही भारत ने विकासशील देशों के हितों, वैश्विक दक्षिण और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के समर्थन को अपनी विदेश नीति का महत्वपूर्ण पक्ष बनाए रखा।
शीतयुद्धोत्तर काल में आर्थिक शक्ति अंतरराष्ट्रीय प्रभाव का महत्वपूर्ण आधार बन गई। किसी देश की वैश्विक भूमिका केवल उसके सैन्य संसाधनों से निर्धारित नहीं होने लगी। आर्थिक विकास, तकनीकी क्षमता, ऊर्जा संसाधन, व्यापारिक नेटवर्क और वित्तीय संस्थाओं पर प्रभाव भी किसी देश की अंतरराष्ट्रीय शक्ति को निर्धारित करने लगे।
तकनीकी विकास ने भी अंतरराष्ट्रीय संबंधों को पूरी तरह बदल दिया। इंटरनेट, डिजिटल संचार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर तकनीक और अंतरिक्ष तकनीक ने देशों की शक्ति और सुरक्षा की अवधारणा को नया रूप दिया। अब किसी देश की सुरक्षा केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं पर निर्भर नहीं है। साइबर हमले और सूचना युद्ध भी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकते हैं।
शीतयुद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय संबंधों में पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन भी महत्वपूर्ण विषय बन गए। जलवायु परिवर्तन किसी एक देश की समस्या नहीं है, बल्कि इसके प्रभाव पूरे विश्व पर पड़ते हैं। इसलिए जलवायु समझौते, पर्यावरणीय सहयोग, नवीकरणीय ऊर्जा और सतत विकास जैसे मुद्दे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का हिस्सा बने।
इसी प्रकार वैश्विक महामारी ने यह स्पष्ट किया कि स्वास्थ्य भी अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा का विषय हो सकता है। संक्रामक रोगों का प्रसार किसी राजनीतिक सीमा तक सीमित नहीं रहता। इसलिए वैज्ञानिक सहयोग, दवाओं की उपलब्धता, स्वास्थ्य संसाधनों और वैश्विक संस्थाओं की भूमिका अंतरराष्ट्रीय संबंधों में महत्वपूर्ण हो गई।
शीतयुद्धोत्तर विश्व में बहुध्रुवीयता की प्रवृत्ति लगातार मजबूत हुई है। अमेरिका आज भी एक प्रमुख वैश्विक शक्ति है, लेकिन चीन, रूस, भारत, यूरोपीय संघ तथा अन्य उभरती शक्तियाँ विश्व राजनीति को प्रभावित करती हैं। इसके कारण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक जटिल हो गई है। अब विश्व राजनीति को केवल दो महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा के रूप में समझना संभव नहीं है।
शीतयुद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सहयोग और संघर्ष दोनों साथ-साथ दिखाई देते हैं। एक ओर देश व्यापार, जलवायु, स्वास्थ्य, आतंकवाद और वैश्विक विकास जैसे मुद्दों पर सहयोग करते हैं, वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय विवाद, संसाधनों की प्रतिस्पर्धा, शक्ति-संतुलन और रणनीतिक हितों के कारण तनाव भी बना रहता है।
इस पूरे दौर ने यह भी स्पष्ट किया कि वैश्वीकरण और राष्ट्रवाद एक साथ मौजूद रह सकते हैं। जहाँ एक ओर देशों के बीच आर्थिक और तकनीकी संबंध बढ़े, वहीं दूसरी ओर कई देशों में राष्ट्रीय हित और संप्रभुता की भावना भी मजबूत हुई। इससे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सहयोग और प्रतिस्पर्धा का एक मिश्रित स्वरूप विकसित हुआ।
अंततः कहा जा सकता है कि शीतयुद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय संबंध किसी एक निश्चित व्यवस्था का नाम नहीं है, बल्कि यह निरंतर बदलती हुई वैश्विक राजनीतिक प्रक्रिया है। इसकी शुरुआत 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ हुई, जब द्विध्रुवीय व्यवस्था समाप्त हुई। इसके बाद एकध्रुवीयता, वैश्वीकरण और अमेरिकी प्रभाव का दौर आया, लेकिन समय के साथ चीन, रूस, भारत, यूरोपीय संघ और अन्य शक्तियों के उभार ने विश्व राजनीति को बहुध्रुवीय दिशा में आगे बढ़ाया।
निष्कर्षतः, शीतयुद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रमुख विशेषताएँ हैं—द्विध्रुवीयता का अंत, अमेरिकी प्रभाव का विस्तार, वैश्वीकरण, आर्थिक परस्पर निर्भरता, चीन और अन्य शक्तियों का उदय, गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियाँ, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका, मानवाधिकारों का बढ़ता महत्व तथा बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर बढ़ता रुझान। इस प्रकार शीतयुद्धोत्तर काल ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को केवल सैन्य शक्ति की राजनीति से आगे बढ़ाकर आर्थिक, तकनीकी, पर्यावरणीय और मानवीय मुद्दों से जोड़ दिया है। यही इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।
20वीं शताब्दी के अंतरराष्ट्रीय संबंधों का समग्र स्वरूप
20वीं शताब्दी अंतरराष्ट्रीय संबंधों के इतिहास में परिवर्तन और संघर्ष की शताब्दी रही। इस अवधि में विश्व राजनीति ने दो विनाशकारी विश्व युद्धों, साम्राज्यवाद के पतन, राष्ट्रवाद के विस्तार, समाजवाद और पूँजीवाद के वैचारिक संघर्ष, शीतयुद्ध, परमाणु हथियारों के विकास तथा उपनिवेशवाद के अंत जैसी अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं को देखा। इस शताब्दी के आरंभ में अंतरराष्ट्रीय राजनीति मुख्यतः यूरोपीय शक्तियों, साम्राज्यवाद और शक्ति-संतुलन के इर्द-गिर्द घूमती थी, जबकि शताब्दी के अंत तक विश्व राजनीति का स्वरूप कहीं अधिक व्यापक, संस्थागत, आर्थिक और वैश्विक हो चुका था।
20वीं शताब्दी की शुरुआत में यूरोप विश्व राजनीति का प्रमुख केंद्र था। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस, ऑस्ट्रिया-हंगरी और इटली जैसी शक्तियाँ अपने राजनीतिक, आर्थिक और साम्राज्यवादी हितों के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही थीं। औद्योगिक विकास ने इन देशों की आर्थिक और सैन्य क्षमता को बढ़ाया था। कच्चे माल, बाजार और उपनिवेशों की खोज ने साम्राज्यवाद को मजबूत किया। इस समय अंतरराष्ट्रीय संबंधों में राष्ट्रीय हित और शक्ति को सबसे अधिक महत्व दिया जाता था।
यूरोपीय देशों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने सैन्य गठबंधनों और हथियारों की होड़ को जन्म दिया। एक ओर जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और इटली का गुट था, जबकि दूसरी ओर ब्रिटेन, फ्रांस और रूस के बीच सहयोग विकसित हुआ। राष्ट्रवाद, साम्राज्यवाद और सैन्यवाद ने यूरोप में तनाव को बढ़ा दिया। अंततः 1914 में सारायेवो की घटना के बाद प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ।
प्रथम विश्व युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति की पुरानी व्यवस्था को गहरा झटका दिया। 1914 से 1918 तक चले इस युद्ध में अभूतपूर्व जन-धन की हानि हुई। जर्मन, ऑस्ट्रो-हंगेरियन, रूसी और ऑटोमन साम्राज्यों की शक्ति कमजोर या समाप्त हो गई। यूरोप की राजनीतिक सीमाओं में परिवर्तन हुआ और अनेक नए राष्ट्र अस्तित्व में आए। युद्ध के बाद यह विचार मजबूत हुआ कि अंतरराष्ट्रीय विवादों को युद्ध के बजाय संस्थागत माध्यमों से हल किया जाना चाहिए।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद राष्ट्रसंघ की स्थापना सामूहिक सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास था। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति बनाए रखना और भविष्य में युद्धों को रोकना था। लेकिन राष्ट्रसंघ के पास प्रभावी कार्यवाही करने की पर्याप्त शक्ति नहीं थी। प्रमुख शक्तियों के राष्ट्रीय हित, अमेरिका की सदस्यता से बाहर रहना और आक्रामक देशों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई न कर पाना इसकी कमजोरी के प्रमुख कारण बने।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय संबंधों में राष्ट्रवाद और आत्मनिर्णय की भावना का विस्तार हुआ। एशिया और अफ्रीका के देशों में भी राष्ट्रीय चेतना विकसित होने लगी। औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध आंदोलनों ने गति पकड़ी। हालांकि यूरोपीय साम्राज्यवाद तत्काल समाप्त नहीं हुआ, लेकिन उसकी नींव कमजोर होने लगी थी।
1920 और 1930 के दशक में विश्व राजनीति में गंभीर आर्थिक और राजनीतिक संकट पैदा हुए। 1929 की महामंदी ने विश्व अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया। बेरोजगारी, गरीबी और आर्थिक असुरक्षा ने अनेक देशों में राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ावा दिया। जर्मनी में हिटलर के नेतृत्व में नाजीवाद और इटली में मुसोलिनी के नेतृत्व में फासीवाद मजबूत हुआ। इन शक्तियों ने सैन्यवाद, उग्र राष्ट्रवाद और क्षेत्रीय विस्तार को बढ़ावा दिया।
राष्ट्रसंघ की कमजोरी और ब्रिटेन तथा फ्रांस की तुष्टीकरण नीति ने आक्रामक शक्तियों को अपनी शक्ति बढ़ाने का अवसर दिया। जर्मनी ने वर्साय की संधि की सीमाओं को चुनौती दी और यूरोप में विस्तार शुरू किया। जापान ने एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाया और इटली ने अफ्रीका में विस्तारवादी नीति अपनाई। इन परिस्थितियों ने अंततः द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की।
1939 में जर्मनी द्वारा पोलैंड पर आक्रमण के बाद द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ। 1939 से 1945 तक चले इस युद्ध ने पहले विश्व युद्ध से भी अधिक व्यापक विनाश किया। यूरोप, एशिया और अफ्रीका के बड़े क्षेत्र युद्ध की चपेट में आए। परमाणु बम के प्रयोग ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नए परमाणु युग का आरंभ कर दिया।
द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन पूरी तरह बदल गया। ब्रिटेन, फ्रांस और अन्य यूरोपीय शक्तियाँ कमजोर हुईं, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ दो प्रमुख महाशक्तियों के रूप में उभरे। इसी परिवर्तन के कारण 20वीं शताब्दी के मध्य में अंतरराष्ट्रीय राजनीति यूरोपीय शक्ति-संतुलन से हटकर अमेरिकी-सोवियत प्रतिस्पर्धा के केंद्र में आ गई।
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद 1945 में संयुक्त राष्ट्र संगठन की स्थापना हुई। राष्ट्रसंघ की असफलताओं से सीख लेते हुए संयुक्त राष्ट्र को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए अधिक व्यापक संस्थागत आधार दिया गया। सुरक्षा परिषद, महासभा, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय तथा अन्य संस्थाओं के माध्यम से विश्व स्तर पर सहयोग की व्यवस्था विकसित की गई।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय संबंधों की सबसे प्रमुख विशेषता शीतयुद्ध रही। अमेरिका पूँजीवादी और उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था का प्रमुख समर्थक था, जबकि सोवियत संघ साम्यवादी व्यवस्था का नेतृत्व कर रहा था। दोनों महाशक्तियों के बीच प्रत्यक्ष विश्व युद्ध नहीं हुआ, लेकिन राजनीतिक, आर्थिक, सैन्य, तकनीकी और वैचारिक प्रतिस्पर्धा लगातार जारी रही।
शीतयुद्ध के दौरान विश्व मुख्यतः दो शक्ति-गुटों में विभाजित हो गया। अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी गुट और सोवियत संघ के नेतृत्व में समाजवादी गुट सामने आए। नाटो और वारसा संधि जैसे सैन्य गठबंधनों ने इस विभाजन को मजबूत किया। दोनों महाशक्तियों ने परमाणु हथियारों का विशाल भंडार तैयार किया। परिणामस्वरूप परमाणु प्रतिरोध और शक्ति-संतुलन अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के प्रमुख सिद्धांत बन गए।
शीतयुद्ध केवल यूरोप तक सीमित नहीं रहा। कोरिया, वियतनाम, अफगानिस्तान, मध्य-पूर्व, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विभिन्न संघर्षों पर महाशक्ति प्रतिस्पर्धा का प्रभाव पड़ा। अमेरिका और सोवियत संघ ने प्रत्यक्ष युद्ध से बचते हुए विभिन्न देशों और समूहों को आर्थिक, राजनीतिक तथा सैन्य सहायता दी। इस प्रकार स्थानीय संघर्ष कई बार व्यापक अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन गए।
शीतयुद्ध के समानांतर एशिया और अफ्रीका में उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन तेज हुए। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियाँ आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमजोर हो चुकी थीं। भारत, इंडोनेशिया, घाना, नाइजीरिया और अनेक अन्य देशों ने स्वतंत्रता प्राप्त की। इसके परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नए स्वतंत्र राष्ट्रों की संख्या तेजी से बढ़ी।
नवस्वतंत्र देशों ने अपनी विदेश नीति को महाशक्ति गुटों से स्वतंत्र रखने के लिए गुटनिरपेक्ष आंदोलन का विकास किया। भारत के जवाहरलाल नेहरू, यूगोस्लाविया के जोसिप ब्रोज टीटो, मिस्र के गमाल अब्देल नासिर, इंडोनेशिया के सुकर्णो और घाना के क्वामे नक्रूमा जैसे नेताओं ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गुटनिरपेक्षता का उद्देश्य किसी सैन्य गुट में शामिल हुए बिना स्वतंत्र विदेश नीति अपनाना और विश्व शांति को बढ़ावा देना था।
20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अंतरराष्ट्रीय संबंधों में निरस्त्रीकरण और शस्त्र नियंत्रण का महत्व बढ़ा। परमाणु हथियारों की विनाशकारी क्षमता ने महाशक्तियों को यह समझने के लिए मजबूर किया कि परमाणु युद्ध किसी भी पक्ष के हित में नहीं हो सकता। इसलिए परमाणु परीक्षणों और रणनीतिक हथियारों को सीमित करने के लिए विभिन्न अंतरराष्ट्रीय समझौते किए गए।
1970 के दशक में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच तनाव कम करने के प्रयास हुए, जिन्हें देताँत या तनाव-शैथिल्य कहा जाता है। दोनों पक्षों ने हथियार नियंत्रण और कूटनीतिक संवाद को बढ़ावा दिया। हालांकि यह स्थिति स्थायी नहीं रही और बाद में विभिन्न घटनाओं के कारण दोनों के बीच तनाव फिर बढ़ गया।
1980 के दशक के मध्य में सोवियत संघ के नेता मिखाइल गोर्बाचेव ने पेरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त जैसी सुधार नीतियाँ शुरू कीं। आर्थिक कठिनाइयों, राजनीतिक असंतोष और पूर्वी यूरोप में बढ़ते आंदोलनों के कारण सोवियत व्यवस्था कमजोर होने लगी। 1989 में बर्लिन की दीवार का गिरना शीतयुद्ध के अंत का महत्वपूर्ण प्रतीक बना और 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ शीतयुद्ध समाप्त हो गया।
शीतयुद्ध के अंत ने 20वीं शताब्दी के अंतिम दशक में अंतरराष्ट्रीय संबंधों को एक नई दिशा दी। द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था समाप्त हुई और अमेरिका कुछ समय के लिए विश्व की सबसे प्रभावशाली शक्ति के रूप में उभरा। इस समय एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था की चर्चा हुई। लेकिन चीन, भारत, रूस और यूरोपीय संघ जैसी शक्तियों के बढ़ते प्रभाव ने आगे चलकर बहुध्रुवीयता की प्रवृत्ति को मजबूत किया।
20वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में वैश्वीकरण अंतरराष्ट्रीय संबंधों की एक प्रमुख विशेषता बन गया। संचार, परिवहन, सूचना तकनीक और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के विस्तार ने देशों को एक-दूसरे के अधिक निकट ला दिया। आर्थिक संबंधों में परस्पर निर्भरता बढ़ी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों तथा अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं का प्रभाव बढ़ा।
इस अवधि में अंतरराष्ट्रीय संबंधों का स्वरूप केवल सैन्य और राजनीतिक मुद्दों तक सीमित नहीं रहा। मानवाधिकार, पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, गरीबी, आतंकवाद, स्वास्थ्य, ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा और विकास जैसे मुद्दे भी वैश्विक राजनीति के महत्वपूर्ण विषय बन गए। इससे सुरक्षा की पारंपरिक अवधारणा का विस्तार हुआ।
20वीं शताब्दी के अंतरराष्ट्रीय संबंधों की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का विकास थी। संयुक्त राष्ट्र के अलावा विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन और अनेक क्षेत्रीय संगठनों ने वैश्विक सहयोग को संस्थागत आधार प्रदान किया। हालांकि इन संस्थाओं की प्रभावशीलता और उनमें शक्तिशाली देशों के प्रभाव को लेकर बहस भी लगातार बनी रही।
इस पूरी शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति की प्रकृति भी बदलती रही। प्रारंभ में सैन्य शक्ति और औपनिवेशिक नियंत्रण प्रमुख थे। बाद में आर्थिक शक्ति, परमाणु क्षमता, तकनीकी श्रेष्ठता और कूटनीतिक प्रभाव भी राष्ट्रीय शक्ति के महत्वपूर्ण आधार बने। शताब्दी के अंत तक सूचना और तकनीक भी शक्ति के महत्वपूर्ण साधन बन चुके थे।
20वीं शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय कानून का भी विकास हुआ। युद्ध अपराध, मानवाधिकार, शरणार्थी संरक्षण, समुद्री कानून और अंतरराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान जैसे क्षेत्रों में नियम विकसित हुए। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद मानवाधिकारों को अंतरराष्ट्रीय विमर्श में विशेष स्थान मिला।
इस प्रकार 20वीं शताब्दी के अंतरराष्ट्रीय संबंधों को एक निरंतर परिवर्तनशील प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है। शताब्दी के प्रारंभ में जहाँ साम्राज्यवाद, राष्ट्रवाद और शक्ति-संतुलन प्रमुख थे, वहीं प्रथम और द्वितीय विश्व युद्धों ने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और सामूहिक सुरक्षा की आवश्यकता को सामने रखा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शीतयुद्ध और द्विध्रुवीयता ने विश्व राजनीति को प्रभावित किया। इसी दौरान उपनिवेशवाद समाप्त हुआ और नए राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का हिस्सा बने। शीतयुद्ध के अंत के बाद वैश्वीकरण, एकध्रुवीयता और फिर बहुध्रुवीयता की प्रवृत्तियाँ उभरीं।
अंततः कहा जा सकता है कि 20वीं शताब्दी अंतरराष्ट्रीय संबंधों के परिवर्तन की शताब्दी थी। इस शताब्दी ने विश्व को दो विश्व युद्धों की विनाशलीला से लेकर संयुक्त राष्ट्र की स्थापना तक, साम्राज्यवाद के उत्कर्ष से उसके पतन तक, पूँजीवाद और साम्यवाद के संघर्ष से शीतयुद्ध की समाप्ति तक तथा पारंपरिक शक्ति राजनीति से वैश्वीकरण और बहुआयामी सुरक्षा की ओर बढ़ते हुए देखा। इसलिए 20वीं शताब्दी के अंतरराष्ट्रीय संबंधों का समग्र स्वरूप संघर्ष और सहयोग, शक्ति और संस्थागत व्यवस्था, राष्ट्रवाद और वैश्वीकरण, सैन्य सुरक्षा और मानव सुरक्षा तथा एकध्रुवीयता से बहुध्रुवीयता की ओर संक्रमण के रूप में समझा जा सकता है।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)
1. 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में विश्व राजनीति का प्रमुख केंद्र कौन-सा महाद्वीप था?
(A) एशिया
(B) यूरोप
(C) अफ्रीका
(D) दक्षिण अमेरिका
उत्तर — (B) यूरोप
2. प्रथम विश्व युद्ध किस वर्ष प्रारंभ हुआ था?
(A) 1912
(B) 1913
(C) 1914
(D) 1918
उत्तर — (C) 1914
3. प्रथम विश्व युद्ध का तात्कालिक कारण क्या था?
(A) जर्मनी का पोलैंड पर आक्रमण
(B) फ्रांज फर्डिनेंड की हत्या
(C) रूस की क्रांति
(D) वर्साय की संधि
उत्तर — (B) फ्रांज फर्डिनेंड की हत्या
4. प्रथम विश्व युद्ध का अंत किस वर्ष हुआ?
(A) 1916
(B) 1917
(C) 1918
(D) 1919
उत्तर — (C) 1918
5. प्रथम विश्व युद्ध के बाद किस अंतरराष्ट्रीय संस्था की स्थापना की गई?
(A) संयुक्त राष्ट्र
(B) राष्ट्रसंघ
(C) नाटो
(D) यूरोपीय संघ
उत्तर — (B) राष्ट्रसंघ
6. राष्ट्रसंघ की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य क्या था?
(A) व्यापार बढ़ाना
(B) औपनिवेशिक विस्तार करना
(C) अंतरराष्ट्रीय शांति बनाए रखना
(D) सैन्य गठबंधन बनाना
उत्तर — (C) अंतरराष्ट्रीय शांति बनाए रखना
7. वर्साय की संधि मुख्यतः किस देश से संबंधित थी?
(A) रूस
(B) जर्मनी
(C) जापान
(D) इटली
उत्तर — (B) जर्मनी
8. 1929 की महामंदी का सबसे अधिक प्रभाव किस क्षेत्र पर पड़ा?
(A) अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था
(B) धार्मिक व्यवस्था
(C) खेल
(D) शिक्षा
उत्तर — (A) अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था
9. जर्मनी में नाजी दल का नेता कौन था?
(A) मुसोलिनी
(B) हिटलर
(C) स्टालिन
(D) चर्चिल
उत्तर — (B) हिटलर
10. इटली में फासीवाद का प्रमुख नेता कौन था?
(A) हिटलर
(B) लेनिन
(C) मुसोलिनी
(D) गोर्बाचेव
उत्तर — (C) मुसोलिनी
11. द्वितीय विश्व युद्ध किस वर्ष प्रारंभ हुआ?
(A) 1935
(B) 1937
(C) 1939
(D) 1941
उत्तर — (C) 1939
12. द्वितीय विश्व युद्ध का तात्कालिक कारण क्या था?
(A) जापान का पर्ल हार्बर पर हमला
(B) जर्मनी का पोलैंड पर आक्रमण
(C) रूस की क्रांति
(D) बर्लिन की दीवार
उत्तर — (B) जर्मनी का पोलैंड पर आक्रमण
13. द्वितीय विश्व युद्ध का अंत किस वर्ष हुआ?
(A) 1943
(B) 1944
(C) 1945
(D) 1946
उत्तर — (C) 1945
14. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कौन-सी अंतरराष्ट्रीय संस्था अस्तित्व में आई?
(A) राष्ट्रसंघ
(B) संयुक्त राष्ट्र
(C) वारसा संधि
(D) यूरोपीय संघ
उत्तर — (B) संयुक्त राष्ट्र
15. संयुक्त राष्ट्र संगठन की स्थापना किस वर्ष हुई?
(A) 1919
(B) 1939
(C) 1945
(D) 1955
उत्तर — (C) 1945
16. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कौन-से दो देश प्रमुख महाशक्तियों के रूप में उभरे?
(A) ब्रिटेन और फ्रांस
(B) जर्मनी और जापान
(C) अमेरिका और सोवियत संघ
(D) चीन और भारत
उत्तर — (C) अमेरिका और सोवियत संघ
17. शीतयुद्ध मुख्यतः किन दो महाशक्तियों के बीच था?
(A) ब्रिटेन और फ्रांस
(B) अमेरिका और सोवियत संघ
(C) चीन और जापान
(D) भारत और पाकिस्तान
उत्तर — (B) अमेरिका और सोवियत संघ
18. शीतयुद्ध की प्रमुख विशेषता क्या थी?
(A) दोनों महाशक्तियों के बीच प्रत्यक्ष विश्व युद्ध
(B) केवल आर्थिक प्रतिस्पर्धा
(C) प्रत्यक्ष युद्ध के बिना व्यापक प्रतिस्पर्धा
(D) केवल धार्मिक संघर्ष
उत्तर — (C) प्रत्यक्ष युद्ध के बिना व्यापक प्रतिस्पर्धा
19. शीतयुद्ध के दौरान विश्व व्यवस्था मुख्यतः कैसी थी?
(A) एकध्रुवीय
(B) द्विध्रुवीय
(C) त्रिध्रुवीय
(D) अराजक
उत्तर — (B) द्विध्रुवीय
20. अमेरिका के नेतृत्व वाले सैन्य संगठन का नाम क्या था?
(A) वारसा संधि
(B) नाटो
(C) आसियान
(D) सार्क
उत्तर — (B) नाटो
21. नाटो की स्थापना किस वर्ष हुई?
(A) 1945
(B) 1947
(C) 1949
(D) 1955
उत्तर — (C) 1949
22. सोवियत संघ के नेतृत्व वाले सैन्य संगठन का नाम क्या था?
(A) नाटो
(B) वारसा संधि संगठन
(C) सार्क
(D) यूरोपीय संघ
उत्तर — (B) वारसा संधि संगठन
23. वारसा संधि संगठन की स्थापना किस वर्ष हुई?
(A) 1949
(B) 1950
(C) 1955
(D) 1961
उत्तर — (C) 1955
24. शीतयुद्ध के दौरान अमेरिका किस आर्थिक व्यवस्था का समर्थक था?
(A) साम्यवाद
(B) पूँजीवाद
(C) सामंतवाद
(D) उपनिवेशवाद
उत्तर — (B) पूँजीवाद
25. सोवियत संघ किस विचारधारा का प्रमुख समर्थक था?
(A) उदारवाद
(B) साम्यवाद
(C) फासीवाद
(D) राष्ट्रवाद
उत्तर — (B) साम्यवाद
26. शीतयुद्ध के दौरान हथियारों की होड़ का सबसे प्रमुख क्षेत्र कौन-सा था?
(A) परमाणु हथियार
(B) कृषि उपकरण
(C) परिवहन
(D) शिक्षा
उत्तर — (A) परमाणु हथियार
27. क्यूबा मिसाइल संकट किस वर्ष हुआ था?
(A) 1956
(B) 1960
(C) 1962
(D) 1965
उत्तर — (C) 1962
28. क्यूबा मिसाइल संकट किन देशों के बीच तनाव से संबंधित था?
(A) अमेरिका और सोवियत संघ
(B) भारत और चीन
(C) ब्रिटेन और फ्रांस
(D) चीन और जापान
उत्तर — (A) अमेरिका और सोवियत संघ
29. शीतयुद्ध के अंत का महत्वपूर्ण प्रतीक कौन-सी घटना थी?
(A) राष्ट्रसंघ की स्थापना
(B) बर्लिन की दीवार का गिरना
(C) प्रथम विश्व युद्ध
(D) पर्ल हार्बर पर हमला
उत्तर — (B) बर्लिन की दीवार का गिरना
30. बर्लिन की दीवार कब गिरी?
(A) 1985
(B) 1987
(C) 1989
(D) 1991
उत्तर — (C) 1989
31. सोवियत संघ का विघटन किस वर्ष हुआ?
(A) 1989
(B) 1990
(C) 1991
(D) 1995
उत्तर — (C) 1991
32. सोवियत संघ के अंतिम प्रमुख नेता कौन थे?
(A) लेनिन
(B) स्टालिन
(C) मिखाइल गोर्बाचेव
(D) बोरिस येल्तसिन
उत्तर — (C) मिखाइल गोर्बाचेव
33. गोर्बाचेव की ‘पेरेस्त्रोइका’ नीति का अर्थ क्या था?
(A) सैन्य विस्तार
(B) पुनर्गठन
(C) युद्ध नीति
(D) उपनिवेशवाद
उत्तर — (B) पुनर्गठन
34. ‘ग्लासनोस्त’ का संबंध किससे था?
(A) खुलापन और पारदर्शिता
(B) सैन्य विस्तार
(C) आर्थिक प्रतिबंध
(D) उपनिवेश विस्तार
उत्तर — (A) खुलापन और पारदर्शिता
35. शीतयुद्ध का औपचारिक अंत मुख्यतः किस घटना से जोड़ा जाता है?
(A) प्रथम विश्व युद्ध
(B) संयुक्त राष्ट्र की स्थापना
(C) सोवियत संघ का विघटन
(D) नाटो की स्थापना
उत्तर — (C) सोवियत संघ का विघटन
36. शीतयुद्ध के बाद प्रारंभिक दौर में कौन-सा देश सबसे प्रभावशाली वैश्विक शक्ति बना?
(A) भारत
(B) अमेरिका
(C) जापान
(D) ब्राजील
उत्तर — (B) अमेरिका
37. शीतयुद्ध के बाद विश्व व्यवस्था को प्रारंभिक रूप से किस रूप में देखा गया?
(A) द्विध्रुवीय
(B) एकध्रुवीय
(C) साम्राज्यवादी
(D) पूर्णतः अराजक
उत्तर — (B) एकध्रुवीय
38. शीतयुद्धोत्तर काल में कौन-सी प्रक्रिया तेजी से बढ़ी?
(A) वैश्वीकरण
(B) सामंतवाद
(C) उपनिवेशवाद
(D) दास प्रथा
उत्तर — (A) वैश्वीकरण
39. वैश्वीकरण ने देशों के बीच किस प्रकार के संबंधों को बढ़ाया?
(A) आर्थिक परस्पर निर्भरता
(B) केवल सैन्य संघर्ष
(C) राजनीतिक अलगाव
(D) धार्मिक विभाजन
उत्तर — (A) आर्थिक परस्पर निर्भरता
40. शीतयुद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सुरक्षा की अवधारणा का विस्तार किन मुद्दों तक हुआ?
(A) केवल युद्ध
(B) केवल परमाणु हथियार
(C) आतंकवाद, पर्यावरण, स्वास्थ्य और साइबर सुरक्षा
(D) केवल सीमा विवाद
उत्तर — (C) आतंकवाद, पर्यावरण, स्वास्थ्य और साइबर सुरक्षा
41. 20वीं शताब्दी में उपनिवेशवाद के पतन को सबसे अधिक गति किस घटना के बाद मिली?
(A) प्रथम विश्व युद्ध
(B) द्वितीय विश्व युद्ध
(C) शीतयुद्ध
(D) बर्लिन संकट
उत्तर — (B) द्वितीय विश्व युद्ध
42. एशिया और अफ्रीका के नवस्वतंत्र देशों ने किस आंदोलन के माध्यम से महाशक्ति गुटों से स्वतंत्र रहने का प्रयास किया?
(A) नाटो
(B) वारसा संधि
(C) गुटनिरपेक्ष आंदोलन
(D) राष्ट्रसंघ
उत्तर — (C) गुटनिरपेक्ष आंदोलन
43. गुटनिरपेक्ष आंदोलन के प्रमुख नेताओं में कौन शामिल थे?
(A) नेहरू
(B) मुसोलिनी
(C) हिटलर
(D) चर्चिल
उत्तर — (A) नेहरू
44. गुटनिरपेक्षता का मूल उद्देश्य क्या था?
(A) किसी एक महाशक्ति के गुट में शामिल होना
(B) स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखना
(C) सैन्य गठबंधन बनाना
(D) उपनिवेश स्थापित करना
उत्तर — (B) स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखना
45. 20वीं शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों में किस शक्ति का महत्व लगातार बढ़ा?
(A) केवल सैन्य शक्ति
(B) आर्थिक और तकनीकी शक्ति
(C) केवल धार्मिक शक्ति
(D) केवल भौगोलिक शक्ति
उत्तर — (B) आर्थिक और तकनीकी शक्ति
46. परमाणु हथियारों के विकास ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किस अवधारणा को मजबूत किया?
(A) परमाणु प्रतिरोध
(B) सामंतवाद
(C) उपनिवेशवाद
(D) अलगाववाद
उत्तर — (A) परमाणु प्रतिरोध
47. शीतयुद्ध के दौरान ‘देताँत’ का अर्थ क्या था?
(A) तनाव में कमी
(B) युद्ध की शुरुआत
(C) हथियारों की होड़
(D) सैन्य गठबंधन
उत्तर — (A) तनाव में कमी
48. शीतयुद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किस प्रकार की व्यवस्था की प्रवृत्ति बढ़ी?
(A) बहुध्रुवीयता
(B) केवल द्विध्रुवीयता
(C) साम्राज्यवादी व्यवस्था
(D) औपनिवेशिक व्यवस्था
उत्तर — (A) बहुध्रुवीयता
49. शीतयुद्धोत्तर विश्व में किस देश के उदय को महत्वपूर्ण शक्ति-परिवर्तन माना जाता है?
(A) चीन
(B) पुर्तगाल
(C) बेल्जियम
(D) स्विट्जरलैंड
उत्तर — (A) चीन
50. 20वीं शताब्दी के अंत में अंतरराष्ट्रीय संबंधों का स्वरूप किस दिशा में बढ़ रहा था?
(A) केवल सैन्य राजनीति
(B) वैश्वीकरण और बहुध्रुवीयता
(C) पूर्ण उपनिवेशवाद
(D) सामंतवाद
उत्तर — (B) वैश्वीकरण और बहुध्रुवीयता
एक शब्द/एक वाक्य में उत्तर दीजिए
51. प्रथम विश्व युद्ध कब शुरू हुआ?
उत्तर — 1914
52. प्रथम विश्व युद्ध कब समाप्त हुआ?
उत्तर — 1918
53. प्रथम विश्व युद्ध के बाद कौन-सी संस्था बनी?
उत्तर — राष्ट्रसंघ
54. द्वितीय विश्व युद्ध कब शुरू हुआ?
उत्तर — 1939
55. द्वितीय विश्व युद्ध कब समाप्त हुआ?
उत्तर — 1945
56. संयुक्त राष्ट्र की स्थापना कब हुई?
उत्तर — 1945
57. शीतयुद्ध के दो प्रमुख प्रतिद्वंद्वी कौन थे?
उत्तर — अमेरिका और सोवियत संघ
58. नाटो की स्थापना कब हुई?
उत्तर — 1949
59. वारसा संधि कब हुई?
उत्तर — 1955
60. क्यूबा मिसाइल संकट कब हुआ?
उत्तर — 1962
61. बर्लिन की दीवार कब गिरी?
उत्तर — 1989
62. सोवियत संघ का विघटन कब हुआ?
उत्तर — 1991
63. सोवियत संघ के अंतिम नेता कौन थे?
उत्तर — मिखाइल गोर्बाचेव
64. पेरेस्त्रोइका का अर्थ क्या है?
उत्तर — पुनर्गठन
65. ग्लासनोस्त का अर्थ क्या है?
उत्तर — खुलापन
66. शीतयुद्ध के बाद प्रारंभ में कौन-सी शक्ति प्रमुख बनी?
उत्तर — अमेरिका
67. शीतयुद्धोत्तर काल की प्रमुख आर्थिक प्रक्रिया क्या थी?
उत्तर — वैश्वीकरण
68. 20वीं शताब्दी में कौन-सी विचारधाराएँ प्रमुख रूप से संघर्षरत रहीं?
उत्तर — पूँजीवाद और साम्यवाद
69. गुटनिरपेक्ष आंदोलन का प्रमुख भारतीय नेता कौन था?
उत्तर — जवाहरलाल नेहरू
70. 20वीं शताब्दी के अंत में कौन-सी व्यवस्था मजबूत होने लगी?
उत्तर — बहुध्रुवीय व्यवस्था
सही या गलत बताइए
71. प्रथम विश्व युद्ध 1914 में शुरू हुआ था।
उत्तर — सही
72. राष्ट्रसंघ की स्थापना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुई थी।
उत्तर — गलत
73. द्वितीय विश्व युद्ध 1939 में शुरू हुआ था।
उत्तर — सही
74. संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 1945 में हुई थी।
उत्तर — सही
75. शीतयुद्ध अमेरिका और चीन के बीच था।
उत्तर — गलत
76. नाटो की स्थापना 1949 में हुई थी।
उत्तर — सही
77. बर्लिन की दीवार 1989 में गिरी थी।
उत्तर — सही
78. सोवियत संघ का विघटन 1991 में हुआ।
उत्तर — सही
79. वैश्वीकरण शीतयुद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रमुख विशेषता है।
उत्तर — सही
80. गुटनिरपेक्ष आंदोलन का उद्देश्य किसी एक महाशक्ति के सैन्य गुट में शामिल होना था।
उत्तर — गलत
अति लघु उत्तरीय प्रश्न
अंतरराष्ट्रीय संबंध से क्या अभिप्राय है?
20वीं शताब्दी में विश्व राजनीति का प्रमुख केंद्र कौन था?
प्रथम विश्व युद्ध कब शुरू हुआ?
प्रथम विश्व युद्ध का तात्कालिक कारण क्या था?
प्रथम विश्व युद्ध कब समाप्त हुआ?
वर्साय की संधि किस देश से संबंधित थी?
राष्ट्रसंघ की स्थापना क्यों की गई थी?
राष्ट्रसंघ की स्थापना कब हुई?
राष्ट्रसंघ की सबसे बड़ी कमजोरी क्या थी?
साम्राज्यवाद से क्या तात्पर्य है?
उग्र राष्ट्रवाद से क्या अभिप्राय है?
सैन्यवाद क्या है?
शक्ति-संतुलन से क्या समझते हैं?
1929 की महामंदी क्या थी?
फासीवाद का प्रमुख नेता कौन था?
नाजीवाद का प्रमुख नेता कौन था?
द्वितीय विश्व युद्ध कब शुरू हुआ?
द्वितीय विश्व युद्ध का तात्कालिक कारण क्या था?
द्वितीय विश्व युद्ध कब समाप्त हुआ?
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना कब हुई?
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य क्या था?
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कौन-सी दो महाशक्तियाँ उभरीं?
शीतयुद्ध से क्या अभिप्राय है?
शीतयुद्ध की दो प्रमुख महाशक्तियाँ कौन थीं?
द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था क्या है?
नाटो क्या है?
नाटो की स्थापना कब हुई?
वारसा संधि संगठन क्या था?
वारसा संधि की स्थापना कब हुई?
शीतयुद्ध में अमेरिका किस विचारधारा का समर्थक था?
सोवियत संघ किस विचारधारा का समर्थक था?
क्यूबा मिसाइल संकट क्या था?
क्यूबा मिसाइल संकट कब हुआ?
बर्लिन की दीवार कब बनाई गई?
बर्लिन की दीवार कब गिरी?
शीतयुद्ध के अंत का प्रमुख प्रतीक कौन-सी घटना थी?
सोवियत संघ का विघटन कब हुआ?
मिखाइल गोर्बाचेव कौन थे?
पेरेस्त्रोइका का अर्थ क्या है?
ग्लासनोस्त का अर्थ क्या है?
शीतयुद्धोत्तर विश्व व्यवस्था क्या है?
एकध्रुवीयता से क्या अभिप्राय है?
बहुध्रुवीयता क्या है?
वैश्वीकरण क्या है?
आर्थिक परस्पर निर्भरता क्या है?
गुटनिरपेक्ष आंदोलन क्या है?
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के प्रमुख भारतीय नेता कौन थे?
गुटनिरपेक्षता का मुख्य उद्देश्य क्या था?
परमाणु प्रतिरोध क्या है?
शस्त्र नियंत्रण से क्या समझते हैं?
लघु उत्तरीय प्रश्न
- 20वीं शताब्दी के अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रमुख विशेषताओं को समझाइए।
- प्रथम विश्व युद्ध के प्रमुख कारणों की व्याख्या कीजिए।
- प्रथम विश्व युद्ध के अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर प्रभावों का वर्णन कीजिए।
- राष्ट्रसंघ की स्थापना के उद्देश्य बताइए।
- राष्ट्रसंघ की असफलता के कारणों को समझाइए।
- वर्साय की संधि ने द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि कैसे तैयार की?
- फासीवाद और नाजीवाद के उदय के कारण बताइए।
- द्वितीय विश्व युद्ध के प्रमुख कारणों को स्पष्ट कीजिए।
- द्वितीय विश्व युद्ध के प्रमुख परिणामों का वर्णन कीजिए।
- संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की आवश्यकता क्यों पड़ी?
- संयुक्त राष्ट्र की भूमिका का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
- शीतयुद्ध की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
- शीतयुद्ध के प्रमुख कारण क्या थे?
- शीतयुद्ध की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
- अमेरिका की शीतयुद्धकालीन विदेश नीति की विवेचना कीजिए।
- सोवियत संघ की शीतयुद्धकालीन भूमिका स्पष्ट कीजिए।
- नाटो की स्थापना क्यों की गई?
- वारसा संधि संगठन का क्या उद्देश्य था?
- क्यूबा मिसाइल संकट का महत्व स्पष्ट कीजिए।
- शीतयुद्ध में परमाणु हथियारों की भूमिका बताइए।
- गुटनिरपेक्ष आंदोलन के उदय के कारण बताइए।
- गुटनिरपेक्ष आंदोलन में भारत की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
- शीतयुद्ध के अंत के प्रमुख कारणों का वर्णन कीजिए।
- सोवियत संघ के विघटन के प्रमुख कारण क्या थे?
- बर्लिन की दीवार के पतन का ऐतिहासिक महत्व बताइए।
- शीतयुद्धोत्तर विश्व व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
- एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था से क्या अभिप्राय है?
- बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की अवधारणा समझाइए।
- अंतरराष्ट्रीय संबंधों में वैश्वीकरण के प्रभावों का वर्णन कीजिए।
- शीतयुद्धोत्तर काल में चीन के उदय का महत्व बताइए।
- 20वीं शताब्दी में उपनिवेशवाद के पतन की प्रक्रिया समझाइए।
- अंतरराष्ट्रीय संबंधों में परमाणु हथियारों के महत्व की चर्चा कीजिए।
- अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति-संतुलन की भूमिका बताइए।
- 20वीं शताब्दी में राष्ट्रवाद के विकास का अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ा?
- 20वीं शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।
दीर्घ उत्तरीय / निबंधात्मक प्रश्न
- 20वीं शताब्दी के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के समग्र स्वरूप की विस्तार से व्याख्या कीजिए।
- प्रथम विश्व युद्ध से लेकर शीतयुद्ध के अंत तक अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विकास की विवेचना कीजिए।
- प्रथम और द्वितीय विश्व युद्धों ने अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन को किस प्रकार परिवर्तित किया?
- प्रथम विश्व युद्ध के कारणों और परिणामों का अंतरराष्ट्रीय संबंधों के संदर्भ में विश्लेषण कीजिए।
- द्वितीय विश्व युद्ध के कारणों और उसके बाद उत्पन्न नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की विवेचना कीजिए।
- राष्ट्रसंघ और संयुक्त राष्ट्र की तुलना करते हुए उनकी भूमिका एवं सीमाओं का मूल्यांकन कीजिए।
- शीतयुद्ध के उदय, विकास और अंत की क्रमबद्ध व्याख्या कीजिए।
- अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीतयुद्ध ने 20वीं शताब्दी की विश्व राजनीति को किस प्रकार प्रभावित किया?
- शीतयुद्ध की द्विध्रुवीय व्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
- गुटनिरपेक्ष आंदोलन के उदय की परिस्थितियों तथा अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उसके महत्व की विवेचना कीजिए।
- शीतयुद्ध के अंत के कारणों और उसके अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर प्रभावों की व्याख्या कीजिए।
- सोवियत संघ के विघटन ने विश्व राजनीति के स्वरूप को किस प्रकार बदल दिया?
- शीतयुद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एकध्रुवीयता से बहुध्रुवीयता की ओर हुए परिवर्तन की चर्चा कीजिए।
- 20वीं शताब्दी में वैश्वीकरण ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों के स्वरूप को किस प्रकार प्रभावित किया?
- 20वीं शताब्दी में परमाणु हथियारों की होड़ और शस्त्र नियंत्रण के विकास का विश्लेषण कीजिए।
- 20वीं शताब्दी में साम्राज्यवाद के पतन और नए राष्ट्र-राज्यों के उदय की प्रक्रिया की विवेचना कीजिए।
- 20वीं शताब्दी के अंतरराष्ट्रीय संबंधों में युद्ध और शांति की बदलती अवधारणा का विश्लेषण कीजिए।
- 20वीं शताब्दी के अंतरराष्ट्रीय संबंधों में आर्थिक शक्ति और तकनीकी शक्ति के बढ़ते महत्व की चर्चा कीजिए।
- 20वीं शताब्दी के अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।
- 20वीं शताब्दी के अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रमुख प्रवृत्तियों का समग्र मूल्यांकन प्रस्तुत कीजिए।
