Unit-04

History Of Conflict Between Fundamental Rights & Directive Principles,
Process Of Amendment, Concept Of Basic Structure Of Constitution. In Himdi
भारतीय संविधान : मौलिक अधिकारों एवं राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों के मध्य संघर्ष का इतिहास, 
संविधान संशोधन की प्रक्रिया तथा संविधान की मूल संरचना की अवधारणा।

भारतीय संविधान विश्व का सबसे विस्तृत लिखित संविधान होने के साथ-साथ एक जीवंत और गतिशील संविधान भी है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक अधिकारों और जनकल्याण, स्थायित्व और परिवर्तनशीलता तथा संवैधानिक सर्वोच्चता और जन-इच्छा के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया गया है। संविधान निर्माताओं ने यह भली-भाँति समझ लिया था कि स्वतंत्र भारत एक अत्यंत विविधतापूर्ण समाज होगा, जहाँ समय के साथ सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलती रहेंगी। इसलिए संविधान में एक ओर नागरिकों के मौलिक अधिकारों को सुरक्षित किया गया, दूसरी ओर राज्य को नीति-निर्देशक तत्वों के माध्यम से सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन का दायित्व सौंपा गया। साथ ही संविधान में संशोधन की ऐसी व्यवस्था भी की गई जिससे बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप संविधान का विकास हो सके, किंतु उसकी मूल आत्मा और लोकतांत्रिक चरित्र सुरक्षित बना रहे। इसी संदर्भ में मौलिक अधिकारों एवं राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों के मध्य संघर्ष का इतिहास, संविधान संशोधन की प्रक्रिया तथा संविधान की मूल संरचना की अवधारणा भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के अत्यंत महत्वपूर्ण विषय बन जाते हैं।

भारतीय संविधान के भाग III में मौलिक अधिकारों का उल्लेख किया गया है, जबकि भाग IV में राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों का वर्णन है। मौलिक अधिकार न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय हैं और उनका उद्देश्य नागरिकों की स्वतंत्रता, समानता तथा गरिमा की रक्षा करना है। इसके विपरीत राज्य के नीति-निर्देशक तत्व न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं, किंतु वे सरकार को एक ऐसे कल्याणकारी राज्य की स्थापना के लिए दिशा प्रदान करते हैं जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित किया जा सके। संविधान निर्माताओं ने इन दोनों को परस्पर पूरक माना था, क्योंकि उनका विश्वास था कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय दोनों मिलकर ही लोकतंत्र को सफल बना सकते हैं। फिर भी स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अनेक अवसरों पर इन दोनों के बीच व्यावहारिक टकराव की स्थिति उत्पन्न हुई।

इस संघर्ष का मुख्य कारण भूमि सुधार, जमींदारी उन्मूलन तथा आर्थिक समानता स्थापित करने के लिए बनाए गए कानून थे। स्वतंत्रता के समय भारत में भूमि का वितरण अत्यंत असमान था। सरकार ने जमींदारी प्रथा समाप्त करने तथा भूमि का पुनर्वितरण करने के उद्देश्य से अनेक कानून बनाए। इन कानूनों से बड़े भू-स्वामियों के संपत्ति संबंधी अधिकार प्रभावित हुए और उन्होंने यह तर्क दिया कि उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है। अनेक मामलों में उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय ने संपत्ति के अधिकार की रक्षा करते हुए सरकार के कुछ कानूनों को असंवैधानिक घोषित कर दिया। इससे यह प्रश्न उत्पन्न हुआ कि क्या व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा सामाजिक और आर्थिक सुधारों में बाधा बन सकती है।

इस समस्या के समाधान के लिए संसद ने संविधान में पहला संशोधन 1951 में किया। प्रथम संविधान संशोधन द्वारा नौवीं अनुसूची का निर्माण किया गया, जिसमें रखे गए कानूनों को न्यायिक समीक्षा से संरक्षण प्रदान करने का प्रयास किया गया। साथ ही अनुच्छेद 31(क) और 31(ख) जोड़े गए ताकि भूमि सुधार संबंधी कानूनों को न्यायालय में चुनौती देने की संभावना कम हो सके। इस संशोधन ने स्पष्ट संकेत दिया कि सरकार सामाजिक न्याय और आर्थिक सुधारों को प्राथमिकता देना चाहती है। इसके बाद भी मौलिक अधिकारों और नीति-निर्देशक तत्वों के बीच संतुलन का प्रश्न बना रहा।

इस विषय पर सर्वोच्च न्यायालय के अनेक ऐतिहासिक निर्णयों ने भारतीय संवैधानिक कानून को नई दिशा दी। 1951 के शंकर प्रसाद बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि संसद अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है और संविधान संशोधन को अनुच्छेद 13 के अंतर्गत “कानून” नहीं माना जाएगा। इसलिए संसद मौलिक अधिकारों में भी संशोधन कर सकती है। इस निर्णय ने संसद की संशोधन शक्ति को व्यापक रूप से स्वीकार किया।

1965 में सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य मामले में भी न्यायालय ने लगभग यही दृष्टिकोण अपनाया। किंतु 1967 में गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य का निर्णय भारतीय संवैधानिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती क्योंकि मौलिक अधिकार संविधान की मूल भावना का अभिन्न अंग हैं। न्यायालय ने यह भी कहा कि संविधान संशोधन भी अनुच्छेद 13 के अंतर्गत “कानून” है और यदि वह मौलिक अधिकारों का हनन करता है तो वह अमान्य होगा। इस निर्णय से संसद और न्यायपालिका के बीच संवैधानिक शक्ति-संतुलन पर व्यापक बहस प्रारंभ हो गई।

गोलकनाथ निर्णय के बाद संसद ने अपनी संशोधन शक्ति को पुनः स्थापित करने के लिए 24वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 पारित किया। इस संशोधन द्वारा स्पष्ट कर दिया गया कि संसद अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान के किसी भी प्रावधान में संशोधन कर सकती है और राष्ट्रपति के लिए ऐसे संशोधन पर हस्ताक्षर करना अनिवार्य होगा। इसके बाद 25वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 द्वारा नीति-निर्देशक तत्वों, विशेषकर अनुच्छेद 39(ख) और 39(ग), को लागू करने वाले कानूनों को मौलिक अधिकारों पर वरीयता देने का प्रयास किया गया। इससे यह स्पष्ट हो गया कि संसद सामाजिक और आर्थिक न्याय को संवैधानिक प्राथमिकता देना चाहती थी।

इन संशोधनों की संवैधानिक वैधता को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई और 1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य का ऐतिहासिक निर्णय सामने आया। यह निर्णय भारतीय संवैधानिक इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय माना जाता है। तेरह न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह स्वीकार किया कि संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, यहाँ तक कि मौलिक अधिकारों में भी संशोधन संभव है, किंतु संसद संविधान की “मूल संरचना” या “मूल ढाँचे” को नष्ट या परिवर्तित नहीं कर सकती। इसी निर्णय में पहली बार “मूल संरचना सिद्धांत” (Basic Structure Doctrine) का प्रतिपादन किया गया। यह सिद्धांत भारतीय संविधान की सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक देन माना जाता है।

केशवानंद भारती निर्णय के बाद संसद और न्यायपालिका के बीच संवैधानिक संतुलन की नई व्यवस्था स्थापित हुई। संसद को संविधान संशोधन की व्यापक शक्ति प्राप्त रही, किंतु उस शक्ति पर संविधान की मूल संरचना की सीमा भी निर्धारित कर दी गई। इस निर्णय ने संविधान की सर्वोच्चता, लोकतांत्रिक शासन और न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा सुनिश्चित की।

1976 में 42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम पारित किया गया, जिसे कभी-कभी “लघु संविधान” भी कहा जाता है। इस संशोधन द्वारा संसद की शक्ति को अत्यधिक बढ़ाने तथा न्यायिक समीक्षा की सीमा को कम करने का प्रयास किया गया। साथ ही यह प्रावधान किया गया कि नीति-निर्देशक तत्वों को लागू करने वाले किसी भी कानून को मौलिक अधिकारों के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकेगी। किंतु 1980 में मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने 42वें संशोधन के कुछ प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित करते हुए कहा कि मौलिक अधिकार और नीति-निर्देशक तत्व संविधान के दो पूरक स्तंभ हैं। इनमें से किसी एक को पूर्ण प्राथमिकता देना संविधान की मूल संरचना के विपरीत होगा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय दोनों का संतुलन बनाए रखना ही संविधान की वास्तविक भावना है।

इसके बाद वामन राव बनाम भारत संघ (1981), इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राजनारायण (1975), एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994), आई. आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य (2007) तथा अन्य अनेक मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने मूल संरचना सिद्धांत को और अधिक स्पष्ट तथा सुदृढ़ किया। इन निर्णयों ने यह स्थापित किया कि संविधान की सर्वोच्चता, लोकतंत्र, गणराज्य, धर्मनिरपेक्षता, संघीय व्यवस्था, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्यायिक समीक्षा, विधि का शासन, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव, मौलिक अधिकारों की मूल भावना तथा संविधान की प्रस्तावना में निहित आदर्श संविधान की मूल संरचना के अभिन्न अंग हैं। संसद इनमें संशोधन तो कर सकती है, किंतु इन्हें समाप्त या नष्ट नहीं कर सकती।

संविधान संशोधन की प्रक्रिया भारतीय संविधान की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। संविधान निर्माताओं ने ऐसा संविधान नहीं बनाया जिसे कभी बदला ही न जा सके और न ही ऐसा बनाया जिसे साधारण कानून की तरह आसानी से परिवर्तित किया जा सके। उन्होंने कठोरता और लचीलेपन के बीच संतुलन स्थापित किया। संविधान संशोधन की व्यवस्था अनुच्छेद 368 में दी गई है। संविधान के कुछ प्रावधान साधारण बहुमत से संशोधित किए जा सकते हैं, जैसे नए राज्यों का गठन, राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन तथा कुछ प्रशासनिक विषय। कुछ प्रावधानों के संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत आवश्यक होता है, अर्थात उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई तथा कुल सदस्य संख्या के बहुमत का समर्थन आवश्यक होता है। वहीं संघीय व्यवस्था से संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधानों, जैसे राष्ट्रपति के निर्वाचन, सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों, संसद और राज्यों के बीच शक्तियों के विभाजन तथा अनुच्छेद 368 में संशोधन के लिए विशेष बहुमत के अतिरिक्त कम-से-कम आधे राज्यों की विधानसभाओं द्वारा अनुमोदन भी आवश्यक होता है। इस प्रकार भारतीय संविधान न तो पूर्णतः कठोर है और न ही पूर्णतः लचीला, बल्कि दोनों का संतुलित समन्वय प्रस्तुत करता है।

संविधान संशोधन की आवश्यकता समय-समय पर बदलती सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा तकनीकी परिस्थितियों के कारण उत्पन्न होती है। यदि संविधान में संशोधन की व्यवस्था न होती, तो वह बदलते समय के साथ अप्रासंगिक हो सकता था। भूमि सुधार, पंचायती राज, शिक्षा का अधिकार, स्थानीय स्वशासन, वस्तु एवं सेवा कर (GST), सहकारी समितियों को संवैधानिक दर्जा, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण तथा अनेक अन्य परिवर्तन संविधान संशोधनों के माध्यम से ही संभव हुए हैं। इसलिए संविधान संशोधन लोकतांत्रिक विकास का आवश्यक साधन है, किंतु यह संविधान की मूल आत्मा के अनुरूप ही होना चाहिए।

संविधान की मूल संरचना की अवधारणा भारतीय न्यायपालिका की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक उपलब्धियों में से एक मानी जाती है। संविधान में “मूल संरचना” शब्द का कहीं भी प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है, फिर भी सर्वोच्च न्यायालय ने इसकी व्याख्या करते हुए यह सिद्धांत विकसित किया कि संविधान के कुछ मूल तत्व ऐसे हैं जिन्हें संसद भी समाप्त नहीं कर सकती। यह सिद्धांत लोकतंत्र को बहुमत की निरंकुशता से बचाने का प्रभावी माध्यम है। यदि संसद को असीमित संशोधन शक्ति प्राप्त हो, तो वह लोकतंत्र समाप्त कर तानाशाही स्थापित कर सकती है, न्यायपालिका की स्वतंत्रता समाप्त कर सकती है या नागरिकों के मूल अधिकारों को समाप्त कर सकती है। मूल संरचना सिद्धांत ऐसी किसी भी संभावना पर संवैधानिक नियंत्रण स्थापित करता है।

मूल संरचना के अंतर्गत सामान्यतः संविधान की सर्वोच्चता, लोकतांत्रिक एवं गणराज्यात्मक शासन व्यवस्था, धर्मनिरपेक्षता, संघीय ढाँचा, विधि का शासन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्यायिक समीक्षा, शक्तियों का पृथक्करण, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव, संविधान की प्रस्तावना में निहित मूल आदर्श, मौलिक अधिकारों का सार तथा व्यक्ति की गरिमा जैसे तत्व सम्मिलित माने जाते हैं। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय ने कभी भी इनकी एक निश्चित और अंतिम सूची घोषित नहीं की है, बल्कि प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के अनुसार यह निर्धारित किया है कि कौन-सा तत्व संविधान की मूल संरचना का भाग है।

भारतीय संवैधानिक व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि उसने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय, संसद की सर्वोच्चता और न्यायपालिका की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक परिवर्तन और संवैधानिक स्थिरता तथा अधिकारों और दायित्वों के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया है। मौलिक अधिकार और नीति-निर्देशक तत्व एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि समान उद्देश्य की पूर्ति के दो आवश्यक साधन हैं। एक नागरिक की स्वतंत्रता की रक्षा करता है, जबकि दूसरा समाज के कमजोर वर्गों के उत्थान और कल्याणकारी राज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करता है। संविधान संशोधन की प्रक्रिया इस संतुलन को समयानुकूल बनाए रखने का माध्यम है और मूल संरचना सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि परिवर्तन की प्रक्रिया संविधान की मूल पहचान को नष्ट न करे।

इस प्रकार मौलिक अधिकारों एवं राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों के मध्य संघर्ष का इतिहास वास्तव में भारतीय लोकतंत्र में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन स्थापित करने की संवैधानिक यात्रा का इतिहास है। संविधान संशोधन की प्रक्रिया संविधान को जीवंत और प्रगतिशील बनाए रखने का साधन है, जबकि संविधान की मूल संरचना की अवधारणा उसकी आत्मा, पहचान और लोकतांत्रिक चरित्र की सुरक्षा का सबसे प्रभावी संवैधानिक तंत्र है। इन तीनों की संयुक्त भूमिका ने भारतीय संविधान को एक ऐसा गतिशील, उत्तरदायी और स्थायी संविधान बनाया है जो बदलते समय के अनुरूप स्वयं को विकसित करता है, किंतु अपने मूल आदर्शों—न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व, लोकतंत्र और संवैधानिक शासन—से कभी विचलित नहीं होता। यही विशेषता भारतीय संविधान को विश्व के सर्वाधिक सफल और प्रभावशाली लोकतांत्रिक संविधानों में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है।

भाग–A : लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions) (2–5 अंक)
  1. मौलिक अधिकार एवं राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों के मध्य संघर्ष से क्या अभिप्राय है?
  2. मौलिक अधिकार और नीति-निर्देशक तत्वों में मूलभूत अंतर स्पष्ट कीजिए।
  3. स्वतंत्रता के बाद मौलिक अधिकारों और नीति-निर्देशक तत्वों के बीच संघर्ष क्यों उत्पन्न हुआ?
  4. भूमि सुधार कानूनों ने संवैधानिक विवाद क्यों उत्पन्न किया?
  5. जमींदारी उन्मूलन का संवैधानिक महत्व लिखिए।
  6. प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 का उद्देश्य क्या था?
  7. नौवीं अनुसूची (Ninth Schedule) क्या है?
  8. अनुच्छेद 31(क) [31A] का उद्देश्य क्या था?
  9. अनुच्छेद 31(ख) [31B] का महत्व लिखिए।
  10. शंकर प्रसाद बनाम भारत संघ (1951) निर्णय का महत्व बताइए।
  11. सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य (1965) मामले का महत्व स्पष्ट कीजिए।
  12. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967) निर्णय का संवैधानिक महत्व लिखिए।
  13. गोलकनाथ निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने क्या कहा?
  14. 24वें संविधान संशोधन का उद्देश्य क्या था?
  15. 25वें संविधान संशोधन का महत्व स्पष्ट कीजिए।
  16. अनुच्छेद 39(ख) एवं 39(ग) का उद्देश्य क्या है?
  17. केशवानंद भारती वाद (1973) क्यों प्रसिद्ध है?
  18. संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) से क्या अभिप्राय है?
  19. मूल संरचना सिद्धांत का प्रतिपादन किस निर्णय में हुआ?
  20. 42वें संविधान संशोधन को "लघु संविधान" क्यों कहा जाता है?
  21. 42वें संविधान संशोधन की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
  22. मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980) निर्णय का महत्व स्पष्ट कीजिए।
  23. वामन राव बनाम भारत संघ (1981) मामले का महत्व लिखिए।
  24. आई. आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य (2007) निर्णय का महत्व स्पष्ट कीजिए।
  25. न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) से क्या अभिप्राय है?
  26. संविधान संशोधन से क्या अभिप्राय है?
  27. संविधान संशोधन की आवश्यकता क्यों पड़ती है?
  28. भारतीय संविधान को कठोर एवं लचीला दोनों क्यों कहा जाता है?
  29. संविधान संशोधन का प्रावधान किस अनुच्छेद में है?
  30. साधारण बहुमत द्वारा संशोधन क्या है?
  31. विशेष बहुमत द्वारा संशोधन क्या है?
  32. राज्यों की स्वीकृति सहित संशोधन से क्या अभिप्राय है?
  33. संसद की संशोधन शक्ति की सीमा क्या है?
  34. संविधान की सर्वोच्चता का क्या अर्थ है?
  35. लोकतांत्रिक शासन संविधान की मूल संरचना का भाग क्यों है?
  36. न्यायपालिका की स्वतंत्रता का महत्व स्पष्ट कीजिए।
  37. विधि के शासन (Rule of Law) से क्या अभिप्राय है?
  38. संघीय व्यवस्था को मूल संरचना का भाग क्यों माना जाता है?
  39. धर्मनिरपेक्षता का संविधान की मूल संरचना से क्या संबंध है?
  40. स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव का महत्व लिखिए।
  41. संविधान की प्रस्तावना का मूल संरचना से क्या संबंध है?
  42. क्या संसद संविधान की मूल संरचना को समाप्त कर सकती है?
  43. मौलिक अधिकार और नीति-निर्देशक तत्वों के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण क्या है?
  44. संसद और न्यायपालिका के बीच संवैधानिक संतुलन का महत्व लिखिए।
  45. भारतीय संविधान की गतिशीलता से क्या अभिप्राय है?
  46. मूल संरचना सिद्धांत लोकतंत्र की रक्षा कैसे करता है?
  47. संवैधानिक सर्वोच्चता का महत्व स्पष्ट कीजिए।
  48. भारतीय संविधान में सामाजिक न्याय का महत्व लिखिए।
  49. संविधान संशोधन और संवैधानिक विकास में क्या संबंध है?
  50. मूल संरचना सिद्धांत की समकालीन प्रासंगिकता स्पष्ट कीजिए।

भाग–B : दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions) (10–20 अंक)
  1. मौलिक अधिकारों एवं राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों के मध्य संघर्ष के इतिहास का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
  2. स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार कानूनों एवं मौलिक अधिकारों के बीच उत्पन्न विवाद का विश्लेषण कीजिए।
  3. प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
  4. शंकर प्रसाद, सज्जन सिंह एवं गोलकनाथ मामलों का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।
  5. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य निर्णय का संवैधानिक महत्व स्पष्ट कीजिए।
  6. 24वें एवं 25वें संविधान संशोधनों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
  7. केशवानंद भारती वाद (1973) का भारतीय संविधान पर प्रभाव स्पष्ट कीजिए।
  8. संविधान की मूल संरचना सिद्धांत का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
  9. मूल संरचना सिद्धांत के प्रमुख तत्वों का विश्लेषण कीजिए।
  10. 42वें संविधान संशोधन की प्रमुख विशेषताओं एवं प्रभावों का मूल्यांकन कीजिए।
  11. मिनर्वा मिल्स निर्णय का भारतीय संवैधानिक विकास में महत्व स्पष्ट कीजिए।
  12. संविधान संशोधन की प्रक्रिया का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
  13. भारतीय संविधान को कठोर एवं लचीला दोनों क्यों कहा जाता है? स्पष्ट कीजिए।
  14. संसद की संविधान संशोधन शक्ति की सीमाओं का विश्लेषण कीजिए।
  15. संविधान संशोधन एवं न्यायिक समीक्षा के मध्य संबंध का विवेचन कीजिए।
  16. मौलिक अधिकार एवं नीति-निर्देशक तत्वों के पारस्परिक संबंध का आलोचनात्मक अध्ययन कीजिए।
  17. भारतीय लोकतंत्र की रक्षा में मूल संरचना सिद्धांत की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।
  18. संविधान संशोधन की आवश्यकता एवं महत्व पर विस्तारपूर्वक चर्चा कीजिए।
  19. संसद और न्यायपालिका के मध्य संवैधानिक संतुलन का विश्लेषण कीजिए।
  20. भारतीय संविधान की मूल संरचना सिद्धांत की समकालीन प्रासंगिकता पर आलोचनात्मक टिप्पणी कीजिए।

भाग–C : बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) (उत्तर सहित)

1. मौलिक अधिकार और नीति-निर्देशक तत्वों के मध्य संघर्ष का प्रमुख कारण क्या था?
(A) भाषा विवाद
(B) भूमि सुधार एवं जमींदारी उन्मूलन
(C) चुनाव सुधार
(D) शिक्षा नीति
उत्तर – (B)

2. प्रथम संविधान संशोधन कब किया गया था?
(A) 1950
(B) 1951
(C) 1952
(D) 1955
उत्तर – (B)

3. नौवीं अनुसूची किस संविधान संशोधन द्वारा जोड़ी गई?
(A) प्रथम संशोधन
(B) 24वाँ संशोधन
(C) 42वाँ संशोधन
(D) 44वाँ संशोधन
उत्तर – (A)

4. शंकर प्रसाद बनाम भारत संघ का निर्णय किस वर्ष आया?
(A) 1950
(B) 1951
(C) 1965
(D) 1967
उत्तर – (B)

5. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य का निर्णय किस वर्ष दिया गया?
(A) 1962
(B) 1965
(C) 1967
(D) 1973
उत्तर – (C)

6. गोलकनाथ निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि—
(A) संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती।
(B) संसद संविधान समाप्त कर सकती है।
(C) न्यायपालिका समाप्त की जा सकती है।
(D) संसद सर्वोच्च है।
उत्तर – (A)

7. 24वाँ संविधान संशोधन किस वर्ष हुआ?
(A) 1969
(B) 1971
(C) 1976
(D) 1978
उत्तर – (B)

8. 25वाँ संविधान संशोधन मुख्यतः किससे संबंधित था?
(A) नागरिकता
(B) नीति-निर्देशक तत्वों को प्राथमिकता देना
(C) चुनाव सुधार
(D) पंचायत व्यवस्था
उत्तर – (B)

9. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य का निर्णय किस वर्ष दिया गया?
(A) 1967
(B) 1971
(C) 1973
(D) 1975
उत्तर – (C)

10. मूल संरचना सिद्धांत का प्रतिपादन किस मामले में हुआ?
(A) गोलकनाथ मामला
(B) मिनर्वा मिल्स मामला
(C) केशवानंद भारती मामला
(D) शंकर प्रसाद मामला
उत्तर – (C)

11. संविधान की मूल संरचना की अवधारणा किसने विकसित की?
(A) संसद
(B) राष्ट्रपति
(C) सर्वोच्च न्यायालय
(D) निर्वाचन आयोग
उत्तर – (C)

12. 42वाँ संविधान संशोधन किस वर्ष पारित हुआ?
(A) 1971
(B) 1975
(C) 1976
(D) 1978
उत्तर – (C)

13. 42वें संविधान संशोधन को क्या कहा जाता है?
(A) स्वर्ण संशोधन
(B) लघु संविधान
(C) सामाजिक संशोधन
(D) संघीय संशोधन
उत्तर – (B)

14. मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ का निर्णय किस वर्ष आया?
(A) 1978
(B) 1980
(C) 1981
(D) 1985
उत्तर – (B)

15. मिनर्वा मिल्स निर्णय में न्यायालय ने किस बात पर बल दिया?
(A) केवल मौलिक अधिकार सर्वोच्च हैं।
(B) केवल नीति-निर्देशक तत्व सर्वोच्च हैं।
(C) मौलिक अधिकार एवं नीति-निर्देशक तत्व दोनों परस्पर पूरक हैं।
(D) संसद सर्वोच्च है।
उत्तर – (C)

16. संविधान संशोधन का प्रावधान किस अनुच्छेद में है?
(A) अनुच्छेद 32
(B) अनुच्छेद 226
(C) अनुच्छेद 368
(D) अनुच्छेद 356
उत्तर – (C)

17. भारतीय संविधान को कठोर एवं लचीला दोनों कहा जाता है क्योंकि—
(A) इसमें संशोधन की विभिन्न प्रक्रियाएँ हैं।
(B) इसमें संशोधन संभव नहीं है।
(C) केवल संसद संशोधन करती है।
(D) केवल न्यायालय संशोधन करता है।
उत्तर – (A)

18. संविधान की मूल संरचना में कौन-सा तत्व सम्मिलित है?
(A) न्यायपालिका की स्वतंत्रता
(B) लोकतंत्र
(C) धर्मनिरपेक्षता
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर – (D)

19. न्यायिक समीक्षा संविधान की किस अवधारणा से संबंधित है?
(A) मूल संरचना
(B) नागरिकता
(C) पंचायती राज
(D) निर्वाचन आयोग
उत्तर – (A)

20. संसद संविधान की मूल संरचना को—
(A) पूर्णतः समाप्त कर सकती है।
(B) संशोधित कर सकती है, परंतु नष्ट नहीं कर सकती।
(C) राष्ट्रपति की अनुमति से समाप्त कर सकती है।
(D) राज्यों की अनुमति से समाप्त कर सकती है।
उत्तर – (B)

21. वामन राव बनाम भारत संघ का निर्णय किस वर्ष आया?
(A) 1978
(B) 1980
(C) 1981
(D) 1985
उत्तर – (C)

22. आई. आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य का निर्णय किस वर्ष आया?
(A) 1990
(B) 1995
(C) 2000
(D) 2007
उत्तर – (D)

23. संविधान संशोधन का अंतिम उद्देश्य है—
(A) संविधान को समाप्त करना।
(B) बदलती परिस्थितियों के अनुसार संविधान को अद्यतन रखना।
(C) न्यायपालिका को समाप्त करना।
(D) लोकतंत्र समाप्त करना।
उत्तर – (B)

24. संविधान की सर्वोच्चता का अर्थ है—
(A) संसद सर्वोच्च है।
(B) राष्ट्रपति सर्वोच्च है।
(C) संविधान सर्वोच्च विधि है।
(D) न्यायपालिका सर्वोच्च है।
उत्तर – (C)

25. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
(A) संसद असीमित संशोधन शक्ति रखती है।
(B) संसद संविधान की मूल संरचना को समाप्त नहीं कर सकती।
(C) न्यायपालिका संविधान संशोधन नहीं देख सकती।
(D) नीति-निर्देशक तत्व मौलिक अधिकारों को समाप्त कर सकते हैं।
उत्तर – (B)

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