Unit-03
The State : What of the State, Meaning & Definition
राज्य : राज्य की अवधारणा, अर्थ एवं परिभाषा
राज्य : राज्य की अवधारणा
राजनीति विज्ञान के अध्ययन का प्रारंभ राज्य की अवधारणा को समझने से होता है। राजनीति विज्ञान में राज्य को सबसे महत्वपूर्ण और केंद्रीय संस्था माना जाता है, क्योंकि राजनीतिक जीवन का अधिकांश भाग किसी न किसी रूप में राज्य से जुड़ा हुआ होता है। मनुष्य अपने सामाजिक जीवन को व्यवस्थित करने के लिए अनेक संस्थाओं का निर्माण करता है, जैसे परिवार, समुदाय, धार्मिक संस्थाएँ, आर्थिक संगठन, राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन, लेकिन इन सभी से राज्य की प्रकृति अलग होती है। राज्य ऐसी राजनीतिक संस्था है जिसके पास एक निश्चित भू-भाग पर रहने वाले लोगों के लिए कानून बनाने, उन्हें लागू करने तथा आवश्यकता पड़ने पर बल प्रयोग के माध्यम से उनका पालन सुनिश्चित करने की वैध शक्ति होती है। इसी कारण राज्य को राजनीतिक संगठन की सर्वोच्च संस्था के रूप में देखा जाता है।
राज्य की अवधारणा अत्यंत प्राचीन है। मानव सभ्यता के प्रारंभिक दौर में मनुष्य छोटे-छोटे समूहों और कबीलों में रहता था। उस समय आधुनिक राज्य जैसी कोई विकसित राजनीतिक संस्था नहीं थी। धीरे-धीरे जनसंख्या में वृद्धि हुई, कृषि का विकास हुआ, स्थायी बस्तियाँ बनने लगीं, संपत्ति की अवधारणा विकसित हुई और सामाजिक जीवन अधिक जटिल होता गया। इन परिस्थितियों में सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने, बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा करने, विवादों का समाधान करने तथा सामूहिक हितों की रक्षा करने के लिए एक संगठित राजनीतिक संस्था की आवश्यकता महसूस हुई। इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया से राज्य के विकास की पृष्ठभूमि तैयार हुई।
राज्य शब्द का सामान्य अर्थ किसी संगठित राजनीतिक समुदाय से लिया जाता है। लेकिन राजनीति विज्ञान में राज्य का अर्थ केवल देश या भू-भाग नहीं है। उदाहरण के लिए हम भारत, फ्रांस या जापान को राज्य कहते हैं, लेकिन राज्य की अवधारणा केवल उस भू-भाग तक सीमित नहीं है। राज्य के निर्माण के लिए कुछ निश्चित तत्वों का होना आवश्यक माना जाता है। पारंपरिक राजनीति विज्ञान में सामान्यतः राज्य के चार प्रमुख तत्व बताए जाते हैं—जनसंख्या, निश्चित भू-भाग, सरकार और संप्रभुता। इन चारों तत्वों के बिना आधुनिक अर्थ में राज्य की कल्पना अधूरी मानी जाती है।
सबसे पहला तत्व जनसंख्या है। राज्य के लिए लोगों का होना अनिवार्य है। बिना जनसंख्या के किसी राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती। राज्य वास्तव में लोगों का राजनीतिक संगठन है। किसी राज्य की जनसंख्या बहुत कम भी हो सकती है और बहुत अधिक भी। जनसंख्या की संख्या अपने आप में राज्य के अस्तित्व का निर्धारण नहीं करती। महत्वपूर्ण यह है कि लोग एक निश्चित राजनीतिक व्यवस्था के अधीन संगठित हों और राज्य के कानूनों का पालन करते हों। नागरिक राज्य के राजनीतिक जीवन में भाग लेते हैं तथा राज्य उन्हें अधिकार और सुरक्षा प्रदान करता है।
राज्य का दूसरा आवश्यक तत्व निश्चित भू-भाग है। राज्य की अपनी निश्चित भौगोलिक सीमा होनी चाहिए। उस सीमा के भीतर भूमि, जल-क्षेत्र और निर्धारित परिस्थितियों में उससे संबंधित अन्य क्षेत्र आते हैं। राज्य की राजनीतिक सत्ता सामान्यतः अपने निश्चित क्षेत्र के भीतर सर्वोच्च मानी जाती है। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में किसी राज्य की पहचान उसकी निर्धारित सीमाओं और क्षेत्रीय संप्रभुता से भी होती है। इसीलिए ऐसी राजनीतिक सत्ता जिसका कोई निश्चित क्षेत्र नहीं है, उसे सामान्यतः पूर्ण राज्य नहीं माना जाता।
तीसरा तत्व सरकार है। केवल जनसंख्या और भू-भाग के होने से राज्य का निर्माण नहीं हो जाता। इन दोनों को संगठित करने और प्रशासन चलाने के लिए सरकार की आवश्यकता होती है। सरकार राज्य की इच्छा को व्यवहार में लागू करने वाली संस्था है। सरकार कानून बनाती है, प्रशासन चलाती है, न्याय की व्यवस्था करती है तथा राज्य की नीतियों को लागू करती है। सरकार का स्वरूप अलग-अलग राज्यों में अलग हो सकता है। कहीं लोकतांत्रिक सरकार होती है, कहीं राजतंत्र और कहीं अन्य प्रकार की शासन व्यवस्था। सरकार बदल सकती है, लेकिन राज्य सामान्यतः बना रहता है। यही कारण है कि सरकार और राज्य को एक-दूसरे का पर्याय नहीं माना जाता।
राज्य का चौथा और सबसे महत्वपूर्ण तत्व संप्रभुता है। संप्रभुता का अर्थ है राज्य की सर्वोच्च और अंतिम राजनीतिक सत्ता। राज्य के भीतर कोई अन्य संस्था उसकी तुलना में सर्वोच्च नहीं होती और बाहरी रूप से भी राज्य किसी अन्य राज्य के अधीन नहीं माना जाता। संप्रभुता के दो पक्ष माने जाते हैं—आंतरिक संप्रभुता और बाह्य संप्रभुता। आंतरिक संप्रभुता का अर्थ है कि राज्य अपने क्षेत्र के भीतर कानून बनाने और उन्हें लागू करने की सर्वोच्च सत्ता रखता है। बाह्य संप्रभुता का अर्थ है कि राज्य बाहरी नियंत्रण से स्वतंत्र रहता है और अन्य राज्यों के साथ स्वतंत्र रूप से संबंध स्थापित करता है।
राज्य की अवधारणा को समझने के लिए राज्य और सरकार के बीच अंतर को समझना आवश्यक है। राज्य एक स्थायी राजनीतिक संस्था है, जबकि सरकार राज्य को संचालित करने वाली संस्था है। सरकार में परिवर्तन होता रहता है, लेकिन राज्य की निरंतरता बनी रहती है। उदाहरण के लिए भारत में विभिन्न राजनीतिक दलों की सरकारें सत्ता में आती-जाती रही हैं, लेकिन भारत राज्य के रूप में बना रहता है। इसलिए सरकार को राज्य का केवल एक अंग माना जाता है, स्वयं राज्य नहीं।
इसी प्रकार राज्य और राष्ट्र में भी अंतर है। राष्ट्र मुख्यतः लोगों की साझा ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, भाषाई या भावनात्मक चेतना से संबंधित अवधारणा है, जबकि राज्य एक राजनीतिक और कानूनी संस्था है। एक राष्ट्र के पास अपना स्वतंत्र राज्य हो सकता है, लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक राष्ट्र का अपना अलग राज्य हो। इसी प्रकार एक राज्य के भीतर अनेक राष्ट्रीय, भाषाई या सांस्कृतिक समुदाय हो सकते हैं। आधुनिक राजनीति में राष्ट्रवाद और राज्य की अवधारणाएँ एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं, लेकिन दोनों को समान मानना उचित नहीं है।
राज्य और समाज में भी स्पष्ट अंतर है। समाज राज्य से कहीं अधिक व्यापक अवधारणा है। परिवार, धर्म, शिक्षा, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संगठन सभी समाज के अंग हैं। राज्य समाज की एक राजनीतिक संस्था है। समाज में संबंध स्वाभाविक और सामाजिक प्रक्रियाओं से विकसित होते हैं, जबकि राज्य कानूनी और राजनीतिक शक्ति के माध्यम से व्यवस्था को संचालित करता है। इस प्रकार राज्य समाज का एक महत्वपूर्ण भाग है, लेकिन पूरा समाज राज्य नहीं है।
राज्य की अवधारणा को लेकर विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं ने अलग-अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किए हैं। उदारवादी विचारधारा राज्य को व्यक्ति के अधिकारों और स्वतंत्रताओं की रक्षा करने वाली संस्था के रूप में देखती है। प्रारंभिक उदारवादियों ने सीमित सरकार की धारणा पर बल दिया। उनके अनुसार राज्य की शक्ति को कानून और संविधान द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए ताकि व्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रह सके। बाद के उदारवादी विचारकों ने राज्य की भूमिका को व्यापक करते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक अवसरों की व्यवस्था में भी राज्य की भूमिका को स्वीकार किया।
इसके विपरीत मार्क्सवादी दृष्टिकोण राज्य को वर्गीय समाज की संरचना से जोड़कर देखता है। कार्ल मार्क्स के अनुसार समाज में जब आर्थिक वर्गों के बीच संघर्ष विकसित हुआ, तब राज्य एक ऐसी संस्था के रूप में उभरा जिसने प्रभावशाली आर्थिक वर्ग के हितों की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मार्क्सवादी दृष्टिकोण में राज्य को सामान्यतः वर्ग-संघर्ष से अलग कोई तटस्थ संस्था नहीं माना जाता। पूँजीवादी समाज में राज्य की संस्थाएँ अक्सर उस वर्गीय संरचना से प्रभावित होती हैं जिसमें आर्थिक शक्ति कुछ वर्गों के हाथ में केंद्रित होती है।
आदर्शवादी दृष्टिकोण राज्य को नैतिक संस्था के रूप में देखता है। जॉर्ज विल्हेम फ्रेडरिक हेगेल के विचारों में राज्य केवल कानून और प्रशासन चलाने वाली संस्था नहीं है, बल्कि वह नैतिक जीवन की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है। व्यक्ति की स्वतंत्रता का वास्तविक विकास राज्य के नैतिक और संस्थागत ढाँचे के भीतर संभव माना जाता है। इस दृष्टिकोण में राज्य को समाज के विभिन्न हितों के बीच समन्वय स्थापित करने वाली संस्था के रूप में देखा जाता है।
बहुलवादी दृष्टिकोण राज्य को समाज के विभिन्न समूहों और हितों के बीच संतुलन स्थापित करने वाली व्यवस्था के रूप में देखता है। आधुनिक समाज में अनेक राजनीतिक दल, दबाव समूह, व्यावसायिक संगठन, श्रमिक संगठन और सामाजिक संगठन सक्रिय होते हैं। इन सभी के हित अलग-अलग हो सकते हैं। राज्य और उसकी संस्थाएँ इन विभिन्न हितों के बीच संघर्ष को नियंत्रित करने तथा समझौते की परिस्थितियाँ पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इस दृष्टिकोण में राजनीतिक सत्ता को केवल एक व्यक्ति या एक वर्ग के हाथों में केंद्रित मानने के बजाय विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच वितरित शक्ति के रूप में देखा जाता है।
राज्य की अवधारणा समय के साथ बदलती रही है। प्राचीन काल में राज्य का उद्देश्य मुख्यतः सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और राजनीतिक संगठन से जुड़ा हुआ था। मध्यकाल में राज्य पर धार्मिक और राजकीय शक्तियों का प्रभाव रहा। आधुनिक युग में राष्ट्र-राज्य का विकास हुआ और संप्रभुता, नागरिकता तथा राष्ट्रीय पहचान को अधिक महत्व मिला। लोकतांत्रिक विचारों के विकास के साथ राज्य की वैधता को जनता की सहमति से जोड़ दिया गया। आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य में सरकार से अपेक्षा की जाती है कि वह नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करे, कानून के शासन को बनाए रखे और जनता के प्रति उत्तरदायी रहे।
कल्याणकारी राज्य के विकास के साथ राज्य की भूमिका और व्यापक हुई। अब राज्य केवल पुलिस, न्याय और सुरक्षा तक सीमित नहीं रहा। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, गरीबी उन्मूलन, कमजोर वर्गों का संरक्षण, आर्थिक विकास और सार्वजनिक कल्याण भी राज्य के महत्वपूर्ण कार्यों में शामिल हो गए। आधुनिक राज्य नागरिकों के जीवन के अनेक क्षेत्रों को प्रभावित करता है। इस कारण आज राज्य को केवल नियंत्रण करने वाली संस्था के रूप में नहीं, बल्कि सार्वजनिक कल्याण और सामाजिक विकास की महत्वपूर्ण संस्था के रूप में भी देखा जाता है।
वैश्वीकरण और तकनीकी परिवर्तन ने भी राज्य की पारंपरिक अवधारणा को प्रभावित किया है। आज पूँजी, सूचना, तकनीक और व्यापार राष्ट्रीय सीमाओं से परे तेजी से संचालित होते हैं। अंतरराष्ट्रीय संगठन, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और वैश्विक संस्थाएँ भी राज्य के निर्णयों को प्रभावित करती हैं। इसके बावजूद राज्य की भूमिका समाप्त नहीं हुई है। सुरक्षा, कानून, नागरिकता, सामाजिक नीति, आर्थिक नियमन और सार्वजनिक व्यवस्था के क्षेत्र में राज्य आज भी केंद्रीय भूमिका निभाता है। इसलिए आधुनिक युग में राज्य की शक्ति को समाप्त होने के बजाय बदलते हुए संदर्भ में समझना अधिक उचित है।
भारतीय संदर्भ में राज्य की अवधारणा को संविधान के संदर्भ में समझा जा सकता है। भारत का संविधान राज्य की राजनीतिक और कानूनी संरचना को निर्धारित करता है। भारत एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य है तथा यहाँ संसदीय शासन व्यवस्था अपनाई गई है। संविधान नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करता है और राज्य के लिए नीति-निर्देशक सिद्धांतों के माध्यम से सामाजिक तथा आर्थिक न्याय की दिशा निर्धारित करता है। इससे स्पष्ट होता है कि आधुनिक भारतीय राज्य केवल कानून और व्यवस्था बनाए रखने वाली संस्था नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय, समानता और कल्याण को भी अपने उद्देश्यों में शामिल करता है।
अंततः कहा जा सकता है कि राज्य एक जटिल और बहुआयामी राजनीतिक संस्था है। इसे केवल सरकार, भू-भाग या सत्ता के रूप में समझना पर्याप्त नहीं है। राज्य एक संगठित राजनीतिक समुदाय है, जिसके प्रमुख तत्व जनसंख्या, निश्चित भू-भाग, सरकार और संप्रभुता हैं। इसकी प्रकृति को समझने के लिए इतिहास, कानून, राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज सभी को ध्यान में रखना आवश्यक है। राज्य व्यक्ति और समाज के बीच राजनीतिक संबंधों को व्यवस्थित करता है तथा कानून, अधिकार, कर्तव्य और राजनीतिक सत्ता के माध्यम से सामूहिक जीवन को दिशा देता है।
इस प्रकार राज्य की अवधारणा राजनीति विज्ञान की आधारभूत अवधारणाओं में से एक है। प्राचीन काल के नगर-राज्य से लेकर आधुनिक राष्ट्र-राज्य और कल्याणकारी लोकतांत्रिक राज्य तक इसकी प्रकृति में निरंतर परिवर्तन हुआ है। आज राज्य से केवल सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की अपेक्षा नहीं की जाती, बल्कि न्याय, स्वतंत्रता, समानता, विकास, सामाजिक सुरक्षा, नागरिक अधिकार और जनकल्याण सुनिश्चित करने की भी अपेक्षा की जाती है। इसलिए आधुनिक राज्य को एक ऐसी राजनीतिक संस्था के रूप में समझना चाहिए जो अपने निश्चित क्षेत्र में संप्रभु सत्ता का प्रयोग करते हुए समाज के सामूहिक जीवन को व्यवस्थित करती है और बदलती सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप अपनी भूमिका का विस्तार करती रहती है।
राज्य : अर्थ एवं परिभाषा, राज्य की अवधारणा, तीन-विश्व एवं शास्त्रीय वर्गीकरण
राजनीति विज्ञान के अध्ययन में ‘राज्य’ सबसे महत्वपूर्ण और आधारभूत अवधारणाओं में से एक है। राजनीतिक जीवन की लगभग सभी प्रमुख संस्थाएँ, प्रक्रियाएँ और गतिविधियाँ किसी न किसी रूप में राज्य से जुड़ी होती हैं। व्यक्ति अपने सामाजिक जीवन में अनेक संस्थाओं से संबंधित रहता है, जैसे परिवार, धर्म, समुदाय, आर्थिक संगठन, राजनीतिक दल, दबाव समूह आदि, लेकिन इन सभी से राज्य की प्रकृति अलग होती है। राज्य एक ऐसी संगठित राजनीतिक संस्था है जिसके पास निश्चित भू-भाग में रहने वाली जनसंख्या पर शासन करने तथा कानूनों को लागू करने की वैध और सर्वोच्च शक्ति होती है। आधुनिक युग में व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा, कानून-व्यवस्था की स्थापना, आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा लोककल्याण जैसे कार्यों का प्रमुख दायित्व राज्य के ऊपर ही होता है।
‘राज्य’ शब्द का प्रयोग सामान्य जीवन में प्रायः देश, सरकार, राष्ट्र अथवा शासन के अर्थ में कर लिया जाता है, लेकिन राजनीति विज्ञान की दृष्टि से इन सभी शब्दों के अर्थ समान नहीं हैं। राज्य एक निश्चित राजनीतिक संगठन है, जबकि सरकार राज्य के संचालन का माध्यम है। इसी प्रकार राष्ट्र मुख्यतः लोगों में विद्यमान ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, भाषायी अथवा भावनात्मक एकता को व्यक्त करता है, जबकि राज्य एक कानूनी और राजनीतिक संगठन है। इसलिए राज्य की अवधारणा को समझने के लिए उसके अर्थ, स्वरूप, आवश्यक तत्वों और उसके विभिन्न वर्गीकरणों को समझना आवश्यक है।
राज्य का अंग्रेजी शब्द ‘State’ लैटिन भाषा के ‘Status’ शब्द से विकसित हुआ माना जाता है, जिसका सामान्य अर्थ स्थिति या अवस्था से संबंधित था। समय के साथ इसका प्रयोग एक संगठित राजनीतिक समुदाय के लिए होने लगा। प्राचीन यूनान में राज्य के लिए ‘Polis’ शब्द का प्रयोग किया जाता था। यूनानी विचारकों के लिए नगर-राज्य केवल शासन की संस्था नहीं था, बल्कि नागरिकों के सामूहिक राजनीतिक जीवन की संपूर्ण व्यवस्था था। आधुनिक काल में राज्य की अवधारणा अधिक व्यापक और व्यवस्थित रूप में विकसित हुई। आधुनिक राज्य कानून, प्रशासन, नागरिकता, संप्रभुता और निश्चित सीमाओं पर आधारित राजनीतिक संगठन है।
राज्य की कोई एक सर्वमान्य परिभाषा नहीं है, क्योंकि अलग-अलग राजनीतिक विचारकों ने राज्य को अलग-अलग दृष्टिकोणों से समझाया है। परंपरागत राजनीतिक विचार में राज्य को एक निश्चित भू-भाग में रहने वाले लोगों का ऐसा राजनीतिक संगठन माना गया है, जिसके पास शासन करने वाली संस्था तथा सर्वोच्च सत्ता होती है। अरस्तू ने राज्य को मनुष्य के राजनीतिक जीवन की स्वाभाविक संस्था के रूप में देखा। उनके अनुसार मनुष्य स्वभाव से राजनीतिक प्राणी है और उसका पूर्ण विकास राज्य के भीतर ही संभव है। इस दृष्टिकोण में राज्य केवल कानून और प्रशासन की व्यवस्था नहीं है, बल्कि अच्छे जीवन की प्राप्ति का साधन भी है।
आधुनिक दृष्टिकोण से राज्य की परिभाषा को समझने के लिए चार मूलभूत तत्वों को विशेष महत्व दिया जाता है—जनसंख्या, निश्चित भू-भाग, सरकार और संप्रभुता। किसी राजनीतिक संगठन को राज्य कहने के लिए इन चारों तत्वों का होना आवश्यक है। सबसे पहले राज्य के लिए जनसंख्या आवश्यक है, क्योंकि बिना लोगों के राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती। जनसंख्या कम या अधिक हो सकती है, लेकिन राज्य के अस्तित्व के लिए किसी न किसी स्थायी मानव समुदाय का होना आवश्यक है। दूसरा तत्व निश्चित भू-भाग है। राज्य की अपनी निश्चित भौगोलिक सीमा होनी चाहिए, जिसके भीतर उसकी राजनीतिक सत्ता प्रभावी होती है। तीसरा तत्व सरकार है, जो राज्य की इच्छा को व्यवहार में लागू करती है। सरकार के माध्यम से कानून बनाए जाते हैं, प्रशासन चलाया जाता है तथा राज्य की नीतियों को लागू किया जाता है। चौथा और सबसे महत्वपूर्ण तत्व संप्रभुता है। संप्रभुता का अर्थ राज्य की सर्वोच्च और स्वतंत्र सत्ता से है। राज्य अपने आंतरिक क्षेत्र में सर्वोच्च होता है और बाहरी रूप से किसी अन्य राज्य के अधीन नहीं होता।
इस प्रकार राज्य का अर्थ केवल भूमि और जनसंख्या से नहीं है। यदि किसी भू-भाग पर लोग रहते हैं लेकिन वहाँ कोई संगठित राजनीतिक सत्ता नहीं है, तो उसे पूर्ण अर्थ में राज्य नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार सरकार होने मात्र से भी राज्य का निर्माण नहीं होता। राज्य की वास्तविक पहचान उसकी संप्रभु राजनीतिक सत्ता से होती है। संप्रभुता राज्य को अन्य सामाजिक संस्थाओं से अलग करती है। परिवार, धार्मिक संगठन, सामाजिक संस्था अथवा राजनीतिक दल अपने सदस्यों पर प्रभाव डाल सकते हैं, लेकिन उनके पास राज्य जैसी सर्वोच्च वैधानिक शक्ति नहीं होती।
राज्य और सरकार के बीच अंतर करना भी अत्यंत आवश्यक है। राज्य एक स्थायी राजनीतिक संगठन है, जबकि सरकार राज्य के संचालन की अस्थायी व्यवस्था है। सरकार में परिवर्तन हो सकता है, लेकिन सरकार बदल जाने से राज्य समाप्त नहीं होता। चुनाव के बाद एक राजनीतिक दल सत्ता से बाहर हो सकता है और दूसरा दल सरकार बना सकता है, लेकिन राज्य बना रहता है। इसी प्रकार राज्य और राष्ट्र भी समान नहीं हैं। राष्ट्र लोगों की साझा ऐतिहासिक स्मृतियों, संस्कृति, भाषा, परंपराओं और भावनात्मक एकता से निर्मित हो सकता है, जबकि राज्य का आधार राजनीतिक एवं कानूनी संगठन है। कई बार एक राष्ट्र का अपना राज्य होता है और कई बार एक राज्य में अनेक राष्ट्रीय अथवा सांस्कृतिक समुदाय निवास करते हैं।
राज्य की अवधारणा स्थिर नहीं रही है। प्राचीन काल में राज्य का स्वरूप सीमित था और उसका प्रमुख उद्देश्य सुरक्षा, कानून-व्यवस्था तथा राजनीतिक नियंत्रण बनाए रखना था। मध्यकाल में राज्य की सत्ता पर धर्म, सामंती शक्तियों और राजवंशों का प्रभाव दिखाई देता है। आधुनिक युग में राष्ट्रीय संप्रभुता, नागरिकता, संवैधानिक शासन और कानून के शासन ने राज्य की प्रकृति को नया स्वरूप प्रदान किया। विशेष रूप से आधुनिक राष्ट्र-राज्य के विकास के साथ राज्य की सीमाएँ, नागरिकता और संप्रभुता अधिक स्पष्ट हुईं।
उदारवादी विचारधारा राज्य को व्यक्ति के अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा करने वाली संस्था के रूप में देखती है। शास्त्रीय उदारवाद सीमित सरकार तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर जोर देता था। बाद में कल्याणकारी उदारवाद ने राज्य की भूमिका को विस्तृत किया और यह विचार विकसित हुआ कि राज्य को केवल सुरक्षा और कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक अवसरों की व्यवस्था में भी सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
मार्क्सवादी दृष्टिकोण राज्य को वर्गीय समाज की संरचना से जोड़कर देखता है। मार्क्सवादी विचार के अनुसार जिस समाज में आर्थिक वर्गों के बीच संघर्ष मौजूद होता है, वहाँ राज्य पूर्णतः निष्पक्ष संस्था नहीं होता, बल्कि वह प्रायः प्रभावशाली आर्थिक वर्ग के हितों की रक्षा करने का कार्य करता है। इस दृष्टिकोण ने राज्य के आर्थिक और वर्गीय चरित्र को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। दूसरी ओर आदर्शवादी विचारकों ने राज्य को नैतिक संस्था के रूप में समझने का प्रयास किया। उनके लिए राज्य केवल बल या दमन की व्यवस्था नहीं बल्कि नैतिक और सामाजिक जीवन को व्यवस्थित करने वाली संस्था भी है।
राज्य की भूमिका को समझने के बाद राजनीतिक व्यवस्थाओं के वर्गीकरण को समझना भी आवश्यक हो जाता है। अलग-अलग राज्यों में शासन करने की पद्धति, राजनीतिक संस्थाओं की प्रकृति, आर्थिक व्यवस्था, सामाजिक संरचना, नागरिक स्वतंत्रता तथा सत्ता के वितरण में पर्याप्त अंतर पाया जाता है। इन्हीं अंतर को व्यवस्थित रूप से समझने के लिए राजनीतिक वैज्ञानिकों ने राजनीतिक व्यवस्थाओं के विभिन्न वर्गीकरण विकसित किए। इन वर्गीकरणों में शास्त्रीय वर्गीकरण तथा तीन-विश्व वर्गीकरण विशेष रूप से उल्लेखनीय रहे हैं।
शास्त्रीय वर्गीकरण राजनीतिक व्यवस्थाओं के अध्ययन की प्राचीन और महत्वपूर्ण पद्धति है। इसका प्रारंभ यूनानी राजनीतिक चिंतन में दिखाई देता है। विशेष रूप से प्लेटो और अरस्तू ने राजनीतिक व्यवस्थाओं को अलग-अलग प्रकारों में विभाजित करके उनके गुण-दोषों का विश्लेषण किया। प्लेटो ने शासन के विभिन्न रूपों को उनके नैतिक और राजनीतिक चरित्र के आधार पर समझाया। उनके विचार में आदर्श शासन वह है जिसमें शासन बुद्धि, ज्ञान और न्याय के आधार पर संचालित हो। इसके विपरीत जब शासन व्यक्तिगत स्वार्थ, धन अथवा सत्ता की लालसा से प्रभावित होने लगता है तो राजनीतिक व्यवस्था में पतन की स्थिति उत्पन्न होती है।
अरस्तू ने राजनीतिक व्यवस्थाओं के वर्गीकरण को अधिक व्यवस्थित रूप प्रदान किया। उन्होंने शासन को इस आधार पर देखा कि शासन करने वाले कितने लोग हैं और वे शासन किस उद्देश्य से कर रहे हैं। यदि शासन सार्वजनिक हित के लिए किया जाता है तो वह शासन का शुद्ध रूप है, जबकि यदि शासक अपने निजी हित के लिए सत्ता का प्रयोग करते हैं तो वह विकृत रूप बन जाता है। इस आधार पर उन्होंने राजतंत्र, अभिजाततंत्र और ‘पॉलिटी’ को अपेक्षाकृत शुद्ध रूप माना तथा उनके विकृत रूपों के रूप में निरंकुशता, कुलीनतंत्र और लोकतंत्र की चर्चा की। यहाँ अरस्तू का ‘लोकतंत्र’ आधुनिक लोकतंत्र से पूरी तरह समान नहीं था; इसलिए उनके वर्गीकरण को उनके ऐतिहासिक संदर्भ में समझना आवश्यक है।
अरस्तू का वर्गीकरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने केवल शासन के रूपों की संख्या नहीं गिनाई, बल्कि यह भी देखा कि सत्ता किसके हाथ में है और सत्ता का उपयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा है। इससे राजनीतिक व्यवस्था के नैतिक और सामाजिक पक्ष को समझने का अवसर मिलता है। बाद के विचारकों ने भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाया। पॉलीबियस ने शासन-व्यवस्थाओं के चक्रीय परिवर्तन का विचार प्रस्तुत किया। उनके अनुसार शासन का एक रूप समय के साथ अपने विकृत रूप में बदल सकता है और फिर उससे एक नई व्यवस्था जन्म ले सकती है। इस प्रकार राजनीतिक व्यवस्थाएँ स्थिर नहीं रहतीं बल्कि परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तनशील होती हैं।
आधुनिक काल में मोंतेस्क्यू ने राजनीतिक व्यवस्था को समझने में शासन के स्वरूप के साथ-साथ संस्थागत शक्तियों के वितरण को महत्व दिया। उन्होंने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों के विभाजन की अवधारणा को विकसित किया। इस दृष्टिकोण ने आधुनिक संवैधानिक शासन तथा सत्ता के नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस प्रकार शास्त्रीय वर्गीकरण केवल प्राचीन इतिहास का विषय नहीं है, बल्कि आधुनिक राजनीतिक संस्थाओं के अध्ययन की बौद्धिक पृष्ठभूमि भी तैयार करता है।
शास्त्रीय वर्गीकरण की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह राजनीतिक व्यवस्थाओं को उनके शासन-रूप और सत्ता के संगठन के आधार पर समझने का प्रयास करता है। इससे राजतंत्र, अभिजाततंत्र, लोकतंत्र तथा मिश्रित शासन जैसी व्यवस्थाओं के बीच अंतर स्पष्ट होता है। लेकिन इसकी सीमाएँ भी हैं। प्राचीन वर्गीकरण आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था की जटिलता को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकता। आधुनिक राज्य में राजनीतिक दल, दबाव समूह, जनमत, मीडिया, नौकरशाही, न्यायपालिका, चुनाव, नागरिक समाज और आर्थिक संस्थाएँ भी राजनीतिक प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं। इसलिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं है कि सत्ता कितने लोगों के हाथ में है; यह भी जानना आवश्यक है कि सत्ता का प्रयोग किस प्रकार होता है और समाज के विभिन्न वर्गों की राजनीतिक भागीदारी कितनी है।
राजनीतिक व्यवस्थाओं के वर्गीकरण का एक अन्य प्रसिद्ध रूप ‘तीन-विश्व वर्गीकरण’ है। यह वर्गीकरण विशेष रूप से शीत युद्ध के दौर में लोकप्रिय हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व राजनीति मुख्यतः दो बड़ी शक्ति-प्रतिस्पर्धाओं में विभाजित दिखाई दी। एक ओर संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में पूँजीवादी और उदार लोकतांत्रिक देशों का समूह था, जिसे सामान्यतः ‘प्रथम विश्व’ कहा गया। दूसरी ओर सोवियत संघ के नेतृत्व में समाजवादी या साम्यवादी देशों का समूह था, जिसे ‘द्वितीय विश्व’ कहा गया। इन दोनों शक्ति-गुटों से अलग अथवा औपचारिक रूप से किसी भी गुट के साथ न रहने वाले एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अनेक विकासशील देशों को ‘तृतीय विश्व’ कहा गया।
प्रथम विश्व की अवधारणा मुख्यतः विकसित पूँजीवादी औद्योगिक देशों के लिए प्रयुक्त हुई। इन देशों में अपेक्षाकृत विकसित औद्योगिक अर्थव्यवस्था, उच्च आय, तकनीकी विकास और मजबूत राजनीतिक संस्थाएँ थीं। संयुक्त राज्य अमेरिका तथा पश्चिमी यूरोप के अनेक देश इसके प्रमुख उदाहरण माने जाते थे। द्वितीय विश्व में सोवियत संघ तथा उसके प्रभाव वाले समाजवादी देश शामिल किए जाते थे। इन देशों की आर्थिक व्यवस्था में राज्य की महत्वपूर्ण भूमिका थी और उत्पादन के साधनों पर सार्वजनिक या सामूहिक नियंत्रण को विशेष महत्व दिया जाता था।
तीसरे विश्व की अवधारणा उन देशों के संदर्भ में सामने आई जो औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्र होने के बाद आर्थिक विकास, राजनीतिक स्थिरता और सामाजिक परिवर्तन की चुनौतियों से जूझ रहे थे। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अनेक देश इस श्रेणी में रखे गए। इन देशों की विशेषता यह थी कि वे औपनिवेशिक शोषण की विरासत, गरीबी, अशिक्षा, कमजोर औद्योगिक आधार, सामाजिक असमानता और विकास की समस्याओं से प्रभावित थे। भारत सहित अनेक नवस्वतंत्र देशों ने शीत युद्ध की दोनों महाशक्तियों से दूरी बनाए रखने और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति विकसित करने का प्रयास किया। इसी संदर्भ में गुटनिरपेक्ष आंदोलन का महत्व बढ़ा।
तीन-विश्व वर्गीकरण केवल आर्थिक अंतर को व्यक्त करने वाला वर्गीकरण नहीं था। इसके पीछे शीत युद्ध की अंतरराष्ट्रीय राजनीति, वैचारिक संघर्ष और औपनिवेशिक इतिहास भी महत्वपूर्ण थे। प्रथम और द्वितीय विश्व के बीच संघर्ष मुख्यतः पूँजीवाद और समाजवाद की वैचारिक प्रतिस्पर्धा से जुड़ा था, जबकि तीसरे विश्व के देशों के सामने राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद आर्थिक विकास और राष्ट्रीय संप्रभुता को मजबूत करने की चुनौती थी।
हालाँकि समय के साथ तीन-विश्व वर्गीकरण की उपयोगिता कम होती गई। सोवियत संघ के विघटन और शीत युद्ध की समाप्ति के बाद प्रथम, द्वितीय और तृतीय विश्व के बीच पारंपरिक विभाजन कमजोर पड़ गया। वैश्वीकरण, आर्थिक उदारीकरण, तकनीकी विकास और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं के विस्तार ने विश्व राजनीति की प्रकृति को बदल दिया। आज अनेक देश आर्थिक विकास, लोकतांत्रिक संस्थाओं, तकनीकी क्षमता और वैश्विक प्रभाव के आधार पर एक-दूसरे से काफी अलग दिखाई देते हैं। इसलिए वर्तमान विश्व को केवल तीन निश्चित श्रेणियों में बाँटना पर्याप्त नहीं माना जाता।
फिर भी तीन-विश्व वर्गीकरण का ऐतिहासिक महत्व समाप्त नहीं हुआ है। यह हमें शीत युद्ध के दौर की विश्व राजनीति, औपनिवेशिक विरासत, विकासशील देशों की समस्याओं और अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन को समझने में सहायता करता है। इसी प्रकार शास्त्रीय वर्गीकरण भी आधुनिक राजनीतिक विज्ञान में ऐतिहासिक और सैद्धांतिक आधार प्रदान करता है। दोनों वर्गीकरणों में अंतर यह है कि शास्त्रीय वर्गीकरण मुख्यतः शासन के स्वरूप और सत्ता के संगठन पर ध्यान देता है, जबकि तीन-विश्व वर्गीकरण अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संरचना, आर्थिक विकास और वैचारिक गुटबंदी की पृष्ठभूमि में देशों को समझने का प्रयास करता है।
राज्य की अवधारणा और राजनीतिक व्यवस्थाओं के इन वर्गीकरणों को एक साथ देखने पर यह स्पष्ट होता है कि राज्य केवल एक प्रशासनिक संस्था नहीं है। राज्य एक व्यापक राजनीतिक संरचना है, जिसमें समाज, अर्थव्यवस्था, कानून, सरकार, नागरिकता, सत्ता और संप्रभुता के बीच निरंतर संबंध स्थापित होते हैं। किसी राज्य की वास्तविक प्रकृति को समझने के लिए केवल उसके संविधान को देखना पर्याप्त नहीं है; उसके राजनीतिक व्यवहार, संस्थागत संरचना, आर्थिक व्यवस्था, सामाजिक संबंधों और नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी का अध्ययन भी आवश्यक है।
आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य में राज्य की शक्ति संविधान और कानून द्वारा नियंत्रित की जाती है। नागरिकों को मौलिक अधिकार प्राप्त होते हैं और सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी होती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव, राजनीतिक दल, स्वतंत्र न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका, स्वतंत्र मीडिया तथा नागरिक समाज राज्य की राजनीतिक संरचना को प्रभावित करते हैं। इस प्रकार आधुनिक राज्य का स्वरूप प्राचीन राज्य की तुलना में अधिक जटिल और बहुआयामी हो गया है।
भारतीय संदर्भ में राज्य की अवधारणा को संविधान के माध्यम से विशेष रूप से समझा जा सकता है। भारत एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य है और यहाँ संसदीय शासन प्रणाली अपनाई गई है। भारतीय राज्य केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली संस्था नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता, स्वतंत्रता, समान अवसर और लोककल्याण के लक्ष्यों को प्राप्त करने का भी प्रयास करता है। मौलिक अधिकार नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं, जबकि राज्य के नीति-निर्देशक तत्व राज्य को सामाजिक और आर्थिक न्याय की दिशा में कार्य करने की प्रेरणा देते हैं।
इस प्रकार राज्य की अवधारणा राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन का केंद्रीय आधार है। राज्य का निर्माण जनसंख्या, निश्चित भू-भाग, सरकार और संप्रभुता जैसे मूलभूत तत्वों के आधार पर होता है, लेकिन आधुनिक समय में उसकी भूमिका इन तत्वों से कहीं अधिक व्यापक हो चुकी है। राज्य व्यक्ति और समाज के बीच राजनीतिक संबंधों को व्यवस्थित करता है, कानून बनाता है, अधिकारों की रक्षा करता है और सार्वजनिक हित के लिए नीतियाँ निर्धारित करता है। शास्त्रीय वर्गीकरण हमें शासन के प्राचीन रूपों और उनके विकास को समझने में सहायता करता है, जबकि तीन-विश्व वर्गीकरण हमें शीत युद्ध, औपनिवेशिक विरासत और विश्व राजनीति के शक्ति-संतुलन को समझने का ऐतिहासिक दृष्टिकोण प्रदान करता है।
अंततः कहा जा सकता है कि राज्य एक जीवंत और परिवर्तनशील राजनीतिक संस्था है। इसका स्वरूप समय, समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहा है। प्राचीन नगर-राज्य से आधुनिक राष्ट्र-राज्य, सीमित सरकार से कल्याणकारी राज्य और राष्ट्रीय संप्रभुता से वैश्विक परस्पर निर्भरता तक राज्य ने अनेक परिवर्तन देखे हैं। इसलिए राज्य को केवल शासन करने वाली संस्था के रूप में देखना उसके वास्तविक स्वरूप को सीमित कर देना होगा। राज्य आधुनिक राजनीतिक जीवन का वह संगठित आधार है जिसके माध्यम से समाज में व्यवस्था, अधिकार, न्याय, सुरक्षा, विकास और सामूहिक हितों को संस्थागत रूप प्रदान किया जाता है।
राज्य की अवधारणा : अर्थ एवं परिभाषा
राजनीति विज्ञान का अध्ययन मूलतः राज्य, सरकार, सत्ता, अधिकार, कानून तथा नागरिकों के पारस्परिक संबंधों के अध्ययन से संबंधित है। इनमें राज्य की अवधारणा को सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि राज्य ही वह राजनीतिक संस्था है जिसके माध्यम से समाज में व्यवस्था स्थापित की जाती है, कानून बनाए जाते हैं, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की जाती है तथा सामूहिक जीवन को संगठित रूप प्रदान किया जाता है। यदि राजनीति विज्ञान को राज्य के अध्ययन का विज्ञान कहा जाए तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी, क्योंकि राजनीतिक जीवन की लगभग सभी प्रक्रियाएँ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से राज्य से जुड़ी होती हैं।
मानव समाज के प्रारम्भिक विकास में आधुनिक राज्य जैसी कोई संस्था विद्यमान नहीं थी। मनुष्य छोटे-छोटे परिवारों, कबीलाई समूहों तथा समुदायों में जीवन व्यतीत करता था। जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ी, आर्थिक गतिविधियों का विस्तार हुआ, स्थायी निवास का विकास हुआ और सामाजिक संबंध अधिक जटिल होते गए, वैसे-वैसे एक ऐसी राजनीतिक संस्था की आवश्यकता अनुभव की गई जो समाज में शांति, सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रख सके। इसी ऐतिहासिक विकास की प्रक्रिया में राज्य का उदय हुआ। इसलिए राज्य को मानव सभ्यता के दीर्घकालीन सामाजिक और राजनीतिक विकास का परिणाम माना जाता है।
सामान्य भाषा में राज्य शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में किया जाता है। कई बार इसे सरकार, देश, राष्ट्र या प्रशासन के समान समझ लिया जाता है, लेकिन राजनीति विज्ञान में इन सभी शब्दों के अर्थ भिन्न हैं। राज्य केवल भूमि का टुकड़ा नहीं है और न ही केवल सरकार का नाम है। राज्य एक संगठित राजनीतिक समुदाय है, जिसके पास एक निश्चित भू-भाग, जनसंख्या, सरकार और सर्वोच्च सत्ता होती है। यही कारण है कि राज्य को समाज की सर्वोच्च राजनीतिक संस्था माना जाता है।
अंग्रेज़ी का “State” शब्द लैटिन भाषा के “Status” शब्द से विकसित हुआ है, जिसका अर्थ स्थिति, व्यवस्था अथवा संगठित अवस्था से संबंधित है। प्राचीन यूनान में राज्य के लिए “पोलिस” शब्द का प्रयोग किया जाता था। यूनानी नगर-राज्य केवल प्रशासनिक इकाइयाँ नहीं थे, बल्कि वे नागरिकों के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन के केंद्र थे। आधुनिक काल में राज्य की अवधारणा अधिक स्पष्ट और व्यवस्थित रूप में विकसित हुई, जिसमें निश्चित सीमाएँ, नागरिकता, संप्रभुता और विधिक व्यवस्था को विशेष महत्व दिया गया।
राज्य की परिभाषा को लेकर विभिन्न राजनीतिक विचारकों ने अपने-अपने दृष्टिकोण प्रस्तुत किए हैं। प्राचीन यूनानी दार्शनिक अरस्तू ने राज्य को मानव जीवन की स्वाभाविक संस्था माना। उनके अनुसार मनुष्य स्वभाव से एक राजनीतिक प्राणी है और उसका पूर्ण विकास राज्य के भीतर ही संभव है। अरस्तू के लिए राज्य केवल शासन की व्यवस्था नहीं था, बल्कि वह श्रेष्ठ और नैतिक जीवन की प्राप्ति का साधन था। इस दृष्टिकोण में राज्य को सामाजिक और नैतिक संस्था के रूप में देखा गया।
आधुनिक विचारकों ने राज्य को अधिक कानूनी और राजनीतिक दृष्टि से परिभाषित किया। उनके अनुसार राज्य एक ऐसा राजनीतिक संगठन है, जिसमें एक निश्चित भू-भाग पर रहने वाली जनसंख्या एक सरकार के अधीन रहती है और उस सरकार के पास सर्वोच्च सत्ता होती है। इस परिभाषा से स्पष्ट होता है कि राज्य का निर्माण चार मूलभूत तत्वों—जनसंख्या, निश्चित भू-भाग, सरकार और संप्रभुता—से होता है।
राज्य का पहला आवश्यक तत्व जनसंख्या है। बिना जनसंख्या के राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती। जनसंख्या राज्य की आधारशिला है, क्योंकि राज्य वास्तव में लोगों का राजनीतिक संगठन है। जनसंख्या कम या अधिक हो सकती है, लेकिन लोगों के बिना कोई राजनीतिक समुदाय राज्य का स्वरूप ग्रहण नहीं कर सकता। नागरिक राज्य की राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेते हैं, सरकार का निर्माण करते हैं और राज्य के कानूनों का पालन करते हैं।
दूसरा आवश्यक तत्व निश्चित भू-भाग है। राज्य का अपना निश्चित क्षेत्र होना चाहिए, जिसके भीतर उसकी राजनीतिक सत्ता प्रभावी होती है। भू-भाग में भूमि, जल-क्षेत्र तथा निर्धारित सीमा के अंतर्गत आने वाले अन्य क्षेत्र शामिल होते हैं। किसी राजनीतिक संगठन की सीमाएँ स्पष्ट होना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि उसी सीमा के भीतर उसके कानून लागू होते हैं और उसकी संप्रभुता कार्य करती है।
तीसरा तत्व सरकार है। सरकार राज्य की कार्यकारी संस्था है, जो राज्य की इच्छा को व्यवहार में लागू करती है। सरकार कानून बनाती है, प्रशासन चलाती है, न्याय प्रदान करती है तथा सार्वजनिक नीतियों का निर्माण करती है। सरकार बदल सकती है, लेकिन राज्य बना रहता है। यही कारण है कि सरकार और राज्य को एक-दूसरे का पर्याय नहीं माना जाता।
चौथा और सबसे महत्वपूर्ण तत्व संप्रभुता है। संप्रभुता का अर्थ राज्य की सर्वोच्च और अंतिम सत्ता से है। राज्य के भीतर कोई अन्य संस्था उसकी तुलना में सर्वोच्च नहीं होती और बाहरी रूप से भी वह स्वतंत्र रहता है। संप्रभुता ही राज्य को अन्य सामाजिक संस्थाओं से अलग करती है। परिवार, धार्मिक संगठन, आर्थिक संस्थाएँ अथवा सामाजिक समूह अपने सदस्यों को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन उनके पास राज्य जैसी सर्वोच्च वैधानिक शक्ति नहीं होती।
राज्य की अवधारणा को समझने के लिए राज्य और सरकार, राज्य और राष्ट्र तथा राज्य और समाज के बीच अंतर को समझना भी आवश्यक है। सरकार राज्य का एक अंग है, जबकि राज्य व्यापक राजनीतिक संगठन है। राष्ट्र भावनात्मक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है, जबकि राज्य कानूनी और राजनीतिक संगठन है। समाज राज्य से अधिक व्यापक है, क्योंकि समाज में अनेक संस्थाएँ शामिल होती हैं, जबकि राज्य उनमें से केवल एक राजनीतिक संस्था है।
इतिहास के विभिन्न चरणों में राज्य की प्रकृति बदलती रही है। प्राचीन काल में राज्य का कार्य मुख्यतः सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखना था। मध्यकाल में राज्य पर धार्मिक और सामंती शक्तियों का प्रभाव था। आधुनिक युग में राष्ट्रवाद, लोकतंत्र, संवैधानिक शासन और नागरिक अधिकारों के विकास ने राज्य की प्रकृति को बदल दिया। आज राज्य केवल कानून और व्यवस्था बनाए रखने वाली संस्था नहीं है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय और लोककल्याण से भी जुड़ा हुआ है।
उदारवादी विचारधारा राज्य को व्यक्ति के अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा करने वाली संस्था मानती है। मार्क्सवादी विचारधारा राज्य को वर्गीय संबंधों के संदर्भ में समझती है और यह मानती है कि राज्य आर्थिक संरचना से प्रभावित होता है। आदर्शवादी विचारधारा राज्य को नैतिक संस्था मानती है, जबकि बहुलवादी दृष्टिकोण राज्य को समाज के विभिन्न हित समूहों के बीच समन्वय स्थापित करने वाली संस्था के रूप में देखता है। इन सभी दृष्टिकोणों से यह स्पष्ट होता है कि राज्य की अवधारणा बहुआयामी है और इसे केवल एक ही दृष्टिकोण से नहीं समझा जा सकता।
आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य में नागरिकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। राज्य की वैधता अब केवल शक्ति पर आधारित नहीं होती, बल्कि जनता की सहमति, संविधान, कानून और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर आधारित होती है। नागरिक अधिकार, स्वतंत्र न्यायपालिका, प्रतिनिधि संस्थाएँ, राजनीतिक दल, स्वतंत्र चुनाव और उत्तरदायी सरकार आधुनिक राज्य की महत्वपूर्ण विशेषताएँ हैं।
वैश्वीकरण, तकनीकी विकास और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रभाव ने भी राज्य की पारंपरिक अवधारणा को प्रभावित किया है। आज विश्व के राष्ट्र आर्थिक, राजनीतिक और तकनीकी रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसके बावजूद राज्य की केंद्रीय भूमिका समाप्त नहीं हुई है। सुरक्षा, कानून, नागरिकता, सामाजिक नीति और विकास के क्षेत्र में राज्य आज भी सबसे महत्वपूर्ण संस्था बना हुआ है।
भारतीय संदर्भ में राज्य की अवधारणा को संविधान के माध्यम से समझा जा सकता है। भारत एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य है। भारतीय राज्य का उद्देश्य केवल शासन चलाना नहीं है, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की स्थापना करना भी है। संविधान नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करता है और राज्य को जनकल्याण की दिशा में कार्य करने का मार्ग दिखाता है।
इस प्रकार राज्य एक संगठित राजनीतिक समुदाय है, जो जनसंख्या, निश्चित भू-भाग, सरकार और संप्रभुता जैसे तत्वों पर आधारित होता है। राज्य समाज में व्यवस्था, सुरक्षा, न्याय और विकास सुनिश्चित करने का कार्य करता है। समय के साथ उसकी भूमिका और कार्यक्षेत्र में विस्तार हुआ है। आधुनिक युग में राज्य केवल शक्ति का केंद्र नहीं, बल्कि जनकल्याण, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और विकास का भी प्रमुख माध्यम बन गया है।
अंततः कहा जा सकता है कि राज्य की अवधारणा राजनीति विज्ञान की सबसे आधारभूत और महत्वपूर्ण अवधारणाओं में से एक है। राज्य व्यक्ति और समाज के बीच राजनीतिक संबंधों को संगठित करता है, अधिकारों और कर्तव्यों का निर्धारण करता है तथा सामूहिक जीवन को दिशा प्रदान करता है। इसलिए राज्य का अध्ययन केवल राजनीतिक संस्था के रूप में नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के विकास, सामाजिक संगठन और सार्वजनिक जीवन की व्यापक व्यवस्था के रूप में किया जाना चाहिए।
राज्य की अवधारणा — आगे का विस्तृत लेखन
राज्य की अवधारणा को और गहराई से समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि राज्य केवल एक राजनीतिक संगठन के रूप में कैसे कार्य करता है और उसके अस्तित्व का वास्तविक आधार क्या है। राज्य का निर्माण मनुष्य की उन आवश्यकताओं से जुड़ा हुआ है जिनकी पूर्ति व्यक्ति अकेले नहीं कर सकता। मनुष्य सामाजिक जीवन में अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करता है। सुरक्षा की आवश्यकता, विवादों का समाधान, संपत्ति की रक्षा, सामाजिक व्यवस्था, न्याय की स्थापना और सामूहिक विकास जैसे कार्यों के लिए ऐसी संस्था की आवश्यकता होती है जिसके निर्णय को समाज के सभी सदस्यों पर लागू किया जा सके। राज्य इसी आवश्यकता को पूरा करने वाली सबसे संगठित राजनीतिक संस्था है।
राज्य की शक्ति का मूल आधार उसकी वैधता होती है। केवल किसी व्यक्ति या समूह के पास बल या हथियार होने से वह राज्य नहीं बन जाता। राज्य की सत्ता को कानून और राजनीतिक व्यवस्था के माध्यम से वैध स्वरूप प्राप्त होता है। आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य में सरकार जनता की सहमति से सत्ता प्राप्त करती है और संविधान तथा कानूनों के अधीन कार्य करती है। इसलिए आधुनिक राज्य की शक्ति मनमानी शक्ति न होकर संवैधानिक और वैधानिक शक्ति मानी जाती है। यही कारण है कि आधुनिक राजनीतिक चिंतन में ‘कानून का शासन’ राज्य की महत्वपूर्ण विशेषता माना जाता है।
राज्य की प्रकृति को समझने के लिए उसके अधिकार क्षेत्र पर ध्यान देना आवश्यक है। राज्य अपने निश्चित भू-भाग के भीतर कानून बनाता है और उन्हें लागू करता है। राज्य की न्यायिक व्यवस्था नागरिकों के बीच होने वाले विवादों का समाधान करती है। प्रशासनिक संस्थाएँ सरकारी नीतियों को लागू करती हैं। पुलिस और सुरक्षा संस्थाएँ कानून-व्यवस्था बनाए रखने का कार्य करती हैं। इस प्रकार राज्य की सत्ता केवल राजनीतिक निर्णय लेने तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह समाज के दैनिक जीवन को भी प्रभावित करती है।
राज्य की शक्ति के दो प्रमुख पक्ष माने जाते हैं—आंतरिक और बाहरी। आंतरिक दृष्टि से राज्य अपने क्षेत्र में सर्वोच्च राजनीतिक सत्ता रखता है। कोई अन्य सामाजिक संस्था राज्य से ऊपर नहीं होती। बाहरी दृष्टि से राज्य स्वतंत्र होता है और किसी दूसरे राज्य की अधीनता स्वीकार नहीं करता। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में प्रत्येक संप्रभु राज्य को समान राजनीतिक स्वतंत्रता का सिद्धांत प्राप्त है, यद्यपि व्यवहार में सभी राज्यों की आर्थिक और सैन्य शक्ति समान नहीं होती।
राज्य की अवधारणा में नागरिकता का भी महत्वपूर्ण स्थान है। आधुनिक राज्य और व्यक्ति के बीच संबंध केवल शासक और शासित का संबंध नहीं है। नागरिक राज्य के सदस्य होते हैं और उन्हें कुछ अधिकार प्राप्त होते हैं। साथ ही उनसे कुछ कर्तव्यों की अपेक्षा भी की जाती है। नागरिकों को कानून का पालन करना, सार्वजनिक व्यवस्था में सहयोग करना और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेना चाहिए। दूसरी ओर राज्य का दायित्व है कि वह नागरिकों के अधिकारों और स्वतंत्रताओं की रक्षा करे। इस प्रकार आधुनिक राज्य में अधिकार और कर्तव्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
राज्य की अवधारणा में ‘शक्ति’ का विशेष महत्व है। राज्य के पास कानून बनाने और कानून लागू करने की शक्ति होती है। लेकिन आधुनिक लोकतंत्र में शक्ति को निरंकुश नहीं माना जाता। राज्य की राजनीतिक शक्ति संविधान, कानून, न्यायपालिका, चुनाव, जनमत और नागरिक अधिकारों द्वारा नियंत्रित की जाती है। सत्ता के इन नियंत्रणों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राज्य नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन न करे और शासन मनमाना न बन जाए।
राज्य और शक्ति के संबंध को अलग-अलग विचारधाराओं ने अलग-अलग ढंग से समझाया है। यथार्थवादी विचारधारा राज्य को मुख्यतः शक्ति और राष्ट्रीय हित की दृष्टि से देखती है। इसके अनुसार अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रत्येक राज्य अपनी सुरक्षा और हितों की रक्षा करने का प्रयास करता है। उदारवादी विचारधारा इसके विपरीत राज्य के भीतर कानून, अधिकार, लोकतंत्र और संस्थागत नियंत्रण के महत्व पर जोर देती है। मार्क्सवादी दृष्टिकोण राज्य की शक्ति को आर्थिक संरचना और वर्ग संबंधों से जोड़कर समझता है। इस प्रकार राज्य की अवधारणा को समझने के लिए केवल कानूनी परिभाषा पर्याप्त नहीं है; उसके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संबंधों का अध्ययन भी आवश्यक है।
राज्य के विकास में संप्रभुता की अवधारणा का विशेष महत्व रहा है। आधुनिक राज्य के विकास के साथ यह विचार मजबूत हुआ कि राज्य अपने क्षेत्र के भीतर सर्वोच्च सत्ता रखता है। जीन बॉडिन ने संप्रभुता को राज्य की सर्वोच्च और स्थायी शक्ति के रूप में समझाया। बाद में थॉमस हॉब्स, जॉन लॉक और ज्यां-जाक रूसो जैसे विचारकों ने राज्य और संप्रभुता की अवधारणा को अलग-अलग आधारों पर विकसित किया। हॉब्स ने मजबूत संप्रभु सत्ता को सामाजिक शांति के लिए आवश्यक माना, जबकि लॉक ने सीमित सरकार और प्राकृतिक अधिकारों पर जोर दिया। रूसो ने जनसत्ता की अवधारणा को प्रमुखता दी।
राज्य की अवधारणा को समझते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि राज्य और सरकार को एक ही मान लेना एक सामान्य भूल है। सरकार राज्य का एक अंग या संचालन तंत्र है। सरकार में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद, संसद, प्रशासन और अन्य संस्थाएँ शामिल हो सकती हैं। सरकार की संरचना देश की शासन प्रणाली पर निर्भर करती है। किसी देश में सरकार का परिवर्तन हो सकता है, लेकिन राज्य की निरंतरता बनी रहती है। यही कारण है कि चुनाव के बाद सरकार बदलने पर देश या राज्य समाप्त नहीं हो जाता।
राज्य और राष्ट्र के बीच भी स्पष्ट अंतर किया जाना चाहिए। राष्ट्र मुख्यतः एक ऐसे मानव समुदाय को व्यक्त करता है जिसमें साझा इतिहास, संस्कृति, भाषा, परंपरा या सामूहिक पहचान की भावना हो सकती है। राज्य इसके विपरीत कानूनी और राजनीतिक संगठन है। राष्ट्र की भावना लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़ सकती है, जबकि राज्य कानून और संस्थाओं के माध्यम से राजनीतिक संबंधों को व्यवस्थित करता है। आधुनिक काल में ‘राष्ट्र-राज्य’ की अवधारणा इसलिए महत्वपूर्ण हुई क्योंकि कई स्थानों पर राष्ट्रीय पहचान और राजनीतिक राज्य एक-दूसरे से जुड़ गए।
राज्य की अवधारणा में ‘लोककल्याण’ के प्रवेश ने आधुनिक राज्य के स्वरूप को बहुत बदल दिया। प्रारंभिक उदारवादी राज्य को मुख्यतः कानून-व्यवस्था, सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा तक सीमित रखना चाहते थे। लेकिन औद्योगिक क्रांति के बाद समाज में आर्थिक असमानता, श्रमिक समस्याएँ, गरीबी और सामाजिक शोषण की समस्याएँ सामने आईं। इसके परिणामस्वरूप यह विचार विकसित हुआ कि राज्य को समाज के कमजोर वर्गों के लिए भी सक्रिय रूप से कार्य करना चाहिए। इसी से कल्याणकारी राज्य की अवधारणा विकसित हुई।
कल्याणकारी राज्य का उद्देश्य केवल अपराध रोकना या बाहरी आक्रमण से रक्षा करना नहीं है। वह शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, गरीबी उन्मूलन, महिला एवं बाल कल्याण, वृद्धावस्था सहायता तथा आर्थिक अवसरों के विस्तार के लिए भी नीतियाँ बनाता है। इस प्रकार आधुनिक राज्य नागरिक के जीवन से बहुत अधिक निकटता से जुड़ गया है। आज नागरिक का जीवन जन्म से लेकर शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा और वृद्धावस्था तक किसी न किसी रूप में राज्य की नीतियों से प्रभावित होता है।
लोकतांत्रिक राज्य की अवधारणा में जनता को सत्ता का अंतिम स्रोत माना जाता है। जनता चुनाव के माध्यम से अपने प्रतिनिधियों का चयन करती है। चुने हुए प्रतिनिधि सरकार का निर्माण करते हैं और संविधान तथा कानून के अनुसार शासन करते हैं। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ केवल चुनाव कराना नहीं है। लोकतांत्रिक राज्य में नागरिक स्वतंत्रता, राजनीतिक समानता, कानून का शासन, स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव, उत्तरदायी सरकार और असहमति के अधिकार को भी महत्व दिया जाता है।
राज्य की आधुनिक अवधारणा में मानव अधिकारों का महत्व भी बढ़ गया है। पहले राज्य को अपने नागरिकों के प्रति लगभग असीमित शक्ति प्राप्त संस्था के रूप में देखा जाता था, लेकिन आधुनिक संवैधानिक व्यवस्था में राज्य की शक्ति पर अनेक सीमाएँ लगाई गई हैं। नागरिकों को जीवन, स्वतंत्रता, समानता, अभिव्यक्ति और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे अधिकार प्रदान किए जाते हैं। इन अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाएँ कार्य करती हैं।
भारत में राज्य की अवधारणा विशेष रूप से संविधान के माध्यम से व्यक्त होती है। भारतीय संविधान राज्य की राजनीतिक शक्ति को निश्चित संवैधानिक सीमाओं में रखता है। भारत में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, संसदीय लोकतंत्र, संघीय व्यवस्था, स्वतंत्र न्यायपालिका और मौलिक अधिकारों की व्यवस्था राज्य को लोकतांत्रिक और संवैधानिक स्वरूप प्रदान करती है। भारतीय राज्य का उद्देश्य केवल राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय की स्थापना करना भी है।
भारतीय राज्य की अवधारणा में विविधता का प्रबंधन भी महत्वपूर्ण है। भारत में अनेक भाषाएँ, धर्म, संस्कृतियाँ, क्षेत्रीय पहचान और सामाजिक समूह हैं। ऐसी परिस्थितियों में राज्य का कार्य केवल शासन करना नहीं बल्कि विभिन्न समुदायों के बीच राजनीतिक और सामाजिक समन्वय स्थापित करना भी है। संघीय व्यवस्था, स्थानीय स्वशासन, मौलिक अधिकार और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व जैसी व्यवस्थाएँ इस विविधता को राजनीतिक प्रक्रिया में स्थान प्रदान करती हैं।
राज्य की अवधारणा में परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण कारण वैश्वीकरण भी है। वैश्वीकरण के कारण आर्थिक गतिविधियाँ राष्ट्रीय सीमाओं से बाहर तक फैल गई हैं। व्यापार, पूँजी, तकनीक, संचार और सूचना का अंतरराष्ट्रीय प्रवाह बढ़ा है। इसके कारण राज्य की पारंपरिक भूमिका में परिवर्तन आया है। फिर भी यह कहना उचित नहीं होगा कि राज्य समाप्त हो गया है। महामारी, युद्ध, आर्थिक संकट, प्राकृतिक आपदा, सीमा सुरक्षा और नागरिक अधिकारों जैसे मामलों में राज्य की भूमिका आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इक्कीसवीं सदी में राज्य के सामने नई चुनौतियाँ भी दिखाई दे रही हैं। आतंकवाद, साइबर अपराध, जलवायु परिवर्तन, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, प्रवासन, महामारी और तकनीकी परिवर्तन जैसी समस्याएँ किसी एक राज्य की सीमाओं तक सीमित नहीं हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए राज्यों को अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। इससे राज्य की संप्रभुता समाप्त नहीं होती, बल्कि उसकी प्रकृति अधिक सहयोगात्मक और परस्पर निर्भर होती जा रही है।
इस प्रकार राज्य की अवधारणा को एक स्थिर और अपरिवर्तनीय विचार के रूप में नहीं देखा जा सकता। राज्य का स्वरूप मानव समाज के विकास के साथ निरंतर बदलता रहा है। प्राचीन काल में राज्य का उद्देश्य मुख्यतः सुरक्षा और राजनीतिक संगठन था। आधुनिक काल में संवैधानिक शासन, नागरिक अधिकार और राष्ट्रीय संप्रभुता महत्वपूर्ण बने। वर्तमान समय में राज्य से सामाजिक न्याय, आर्थिक विकास, मानव अधिकार, पर्यावरण संरक्षण और लोककल्याण की अपेक्षा भी की जाती है।
अतः राज्य को समझने का सबसे उपयुक्त तरीका यह है कि उसे एक ऐसी संगठित राजनीतिक संस्था माना जाए जो निश्चित भू-भाग में रहने वाली जनसंख्या पर वैध और सर्वोच्च राजनीतिक सत्ता का प्रयोग करती है तथा कानून और संस्थाओं के माध्यम से सामूहिक जीवन को व्यवस्थित करती है। इसकी शक्ति सरकार के माध्यम से संचालित होती है, लेकिन राज्य सरकार से व्यापक और स्थायी संस्था है। राज्य की वास्तविक शक्ति उसकी संप्रभुता में निहित होती है, जबकि उसकी आधुनिक वैधता संविधान, कानून, जनता की स्वीकृति और नागरिक अधिकारों की रक्षा से जुड़ी होती है।
इस दृष्टि से राज्य मानव सभ्यता की एक ऐसी राजनीतिक उपलब्धि है जिसने असंगठित सामाजिक जीवन को संगठित राजनीतिक व्यवस्था में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। राज्य के बिना आधुनिक समाज में कानून, प्रशासन, सुरक्षा, नागरिकता और सार्वजनिक नीतियों की कल्पना कठिन है। हालांकि राज्य की शक्ति का उपयोग किस उद्देश्य से किया जाता है, यह उसके राजनीतिक स्वरूप पर निर्भर करता है। लोकतांत्रिक और संवैधानिक राज्य में शक्ति का उद्देश्य नागरिक स्वतंत्रता, न्याय और कल्याण की रक्षा करना होता है, जबकि निरंकुश व्यवस्था में यही शक्ति नियंत्रण और दमन का साधन बन सकती है। इसलिए राज्य की अवधारणा को समझते समय उसकी शक्ति के साथ-साथ उसकी वैधता, उत्तरदायित्व और लोककल्याणकारी उद्देश्य को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
राज्य के आवश्यक तत्व : जनसंख्या, निश्चित भू-भाग, सरकार और संप्रभुता
राज्य की अवधारणा को ठीक प्रकार से समझने के बाद यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से सामने आता है कि किसी राजनीतिक संगठन को राज्य का स्वरूप प्रदान करने वाली आवश्यक परिस्थितियाँ क्या हैं। केवल लोगों का एक समूह, केवल भूमि का कोई टुकड़ा या केवल शासन करने वाली संस्था अपने आप में राज्य का निर्माण नहीं करती। राज्य एक सुव्यवस्थित राजनीतिक संगठन है और इसके अस्तित्व के लिए कुछ मूलभूत तत्वों का होना अनिवार्य माना जाता है। राजनीतिक विज्ञान के परंपरागत अध्ययन में राज्य के चार आवश्यक तत्व स्वीकार किए गए हैं—जनसंख्या, निश्चित भू-भाग, सरकार और संप्रभुता। इन चारों में से किसी एक के अभाव में राज्य का पूर्ण स्वरूप स्थापित नहीं हो सकता।
राज्य का पहला और सबसे स्वाभाविक तत्व जनसंख्या है। राज्य मनुष्यों का राजनीतिक संगठन है, इसलिए मनुष्यों के बिना राज्य की कल्पना असंभव है। कोई भी राज्य तभी अस्तित्व में आ सकता है जब उसके निश्चित क्षेत्र में लोगों का स्थायी या संगठित समुदाय निवास करता हो। जनसंख्या राज्य का मानवीय आधार प्रदान करती है। राज्य लोगों के लिए बनाया जाता है और उन्हीं लोगों के माध्यम से राज्य की संस्थाएँ संचालित होती हैं। इसलिए राज्य और उसकी जनसंख्या के बीच अत्यंत गहरा संबंध होता है।
राज्य की जनसंख्या के लिए कोई निश्चित संख्या निर्धारित नहीं की जा सकती। विश्व में कुछ ऐसे राज्य हैं जिनकी जनसंख्या बहुत अधिक है, जबकि कुछ राज्यों की जनसंख्या बहुत कम है। इसके बावजूद दोनों को राज्य का दर्जा प्राप्त है। इससे स्पष्ट होता है कि राज्य बनने के लिए जनसंख्या की कोई निश्चित न्यूनतम या अधिकतम सीमा आवश्यक नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि वहाँ एक संगठित मानव समुदाय हो और उस समुदाय पर एक राजनीतिक सत्ता प्रभावी हो।
जनसंख्या की संख्या के साथ उसकी प्रकृति भी महत्वपूर्ण होती है। किसी राज्य की राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक क्षमता और प्रशासनिक व्यवस्था पर उसकी जनसंख्या की सामाजिक संरचना, शिक्षा, कौशल, स्वास्थ्य और राजनीतिक चेतना का प्रभाव पड़ता है। शिक्षित और जागरूक नागरिक लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके विपरीत अत्यधिक सामाजिक विभाजन, आर्थिक असमानता और राजनीतिक असंतोष राज्य की स्थिरता के सामने चुनौती उत्पन्न कर सकते हैं।
राज्य की जनसंख्या में केवल एक ही भाषा, धर्म या संस्कृति के लोग हों, यह आवश्यक नहीं है। आधुनिक राज्यों में विभिन्न भाषायी, धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक समुदाय एक साथ रहते हैं। भारत इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। विविधताओं के बावजूद यदि लोग एक राजनीतिक और संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत संगठित हों तो वे एक ही राज्य के नागरिक हो सकते हैं। इसलिए आधुनिक राज्य की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वह विविधताओं के बीच राजनीतिक एकता स्थापित करने का प्रयास करता है।
जनसंख्या के साथ राज्य का दूसरा आवश्यक तत्व निश्चित भू-भाग है। किसी राज्य की अपनी निश्चित भौगोलिक सीमा होनी चाहिए। राज्य की राजनीतिक सत्ता किसी निश्चित क्षेत्र में प्रभावी होती है और उस क्षेत्र की सीमाएँ अन्य राज्यों से उसे अलग करती हैं। भू-भाग राज्य की भौतिक आधारभूमि है। बिना निश्चित क्षेत्र के किसी राजनीतिक संगठन को आधुनिक अर्थ में राज्य नहीं माना जा सकता।
निश्चित भू-भाग में केवल भूमि ही शामिल नहीं होती। सामान्य रूप से राज्य के भू-भाग में उसकी स्थलीय सीमा, आंतरिक जल क्षेत्र तथा अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार उससे संबंधित समुद्री क्षेत्र और वायु-क्षेत्र भी शामिल हो सकते हैं। राज्य की सीमाएँ उसकी राजनीतिक सत्ता के अधिकार क्षेत्र को निर्धारित करती हैं। राज्य का कानून सामान्यतः उसी क्षेत्र में लागू होता है जहाँ उसकी संप्रभु सत्ता मान्य है।
राज्य के भू-भाग का आकार भी निश्चित नहीं होता। रूस जैसे विशाल भू-भाग वाले राज्य भी हैं और ऐसे छोटे राज्य भी हैं जिनका क्षेत्रफल बहुत कम है। इससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य बनने के लिए भू-भाग का बड़ा होना आवश्यक नहीं है। आवश्यक यह है कि उसकी सीमाएँ पर्याप्त रूप से निर्धारित हों और उस क्षेत्र पर राज्य का प्रभावी नियंत्रण हो।
भू-भाग केवल राज्य के अस्तित्व का भौतिक आधार नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय जीवन से भी जुड़ा हुआ है। लोग अपनी भूमि, प्राकृतिक संसाधनों, ऐतिहासिक स्थलों और सांस्कृतिक परंपराओं से भावनात्मक संबंध स्थापित करते हैं। आधुनिक राष्ट्र-राज्य में भू-भाग राष्ट्रीय पहचान का भी महत्वपूर्ण आधार बन गया है। इसी कारण राज्य अपनी क्षेत्रीय अखंडता और सीमाओं की रक्षा को अत्यधिक महत्व देता है।
राज्य का तीसरा आवश्यक तत्व सरकार है। जनसंख्या और भू-भाग के होने के बाद भी तब तक राज्य की राजनीतिक व्यवस्था प्रभावी रूप से संचालित नहीं हो सकती जब तक कोई संगठित सरकार न हो। सरकार वह माध्यम है जिसके द्वारा राज्य अपनी इच्छा को कानून, नीतियों और प्रशासनिक निर्णयों के रूप में व्यवहार में लागू करता है।
सरकार राज्य की ओर से कानून बनाती है, उनका पालन करवाती है, न्यायिक व्यवस्था संचालित करती है, सार्वजनिक सेवाएँ प्रदान करती है तथा आंतरिक और बाहरी सुरक्षा की व्यवस्था करती है। आधुनिक लोकतांत्रिक राज्यों में सरकार जनता के प्रतिनिधियों के माध्यम से गठित होती है और संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर कार्य करती है।
सरकार और राज्य में अंतर करना यहाँ विशेष रूप से आवश्यक है। राज्य एक स्थायी और व्यापक राजनीतिक संगठन है, जबकि सरकार राज्य का संचालन करने वाली संस्था है। सरकार में परिवर्तन संभव है, लेकिन सरकार के बदलने से राज्य समाप्त नहीं होता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव के माध्यम से एक सरकार सत्ता से हट सकती है और दूसरी सरकार सत्ता में आ सकती है। राज्य की निरंतरता बनी रहती है।
सरकार के स्वरूप अलग-अलग हो सकते हैं। कहीं संसदीय शासन व्यवस्था होती है, कहीं राष्ट्रपति प्रणाली होती है, कहीं संघीय व्यवस्था होती है और कहीं एकात्मक व्यवस्था। शासन के इन अलग-अलग रूपों के बावजूद सरकार राज्य के संचालन का प्रमुख साधन रहती है। सरकार की प्रकृति राज्य की राजनीतिक व्यवस्था और संविधान से प्रभावित होती है।
लोकतांत्रिक राज्य में सरकार की वैधता जनता की सहमति पर आधारित होती है। जनता चुनाव के माध्यम से अपने प्रतिनिधियों का चयन करती है और सरकार से उत्तरदायित्व की अपेक्षा करती है। इसलिए आधुनिक लोकतांत्रिक सरकार का उद्देश्य केवल आदेश देना नहीं बल्कि जनता की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं के अनुसार शासन करना भी है।
राज्य का चौथा और सबसे महत्वपूर्ण तत्व संप्रभुता है। संप्रभुता राज्य की सर्वोच्च राजनीतिक शक्ति को व्यक्त करती है। यदि किसी राजनीतिक संगठन के पास अपनी सर्वोच्च और स्वतंत्र सत्ता नहीं है तो उसे पूर्ण अर्थ में संप्रभु राज्य नहीं कहा जा सकता। संप्रभुता राज्य को अन्य सभी सामाजिक और राजनीतिक संगठनों से विशिष्ट बनाती है।
संप्रभुता का सामान्य अर्थ सर्वोच्चता और स्वतंत्रता है। राज्य अपने निश्चित क्षेत्र के भीतर सर्वोच्च सत्ता का प्रयोग करता है और बाहरी रूप से किसी अन्य राज्य के अधीन नहीं होता। संप्रभुता के दो प्रमुख पक्ष माने जाते हैं—आंतरिक संप्रभुता और बाहरी संप्रभुता।
आंतरिक संप्रभुता का अर्थ है कि राज्य अपने क्षेत्र के भीतर सर्वोच्च राजनीतिक सत्ता रखता है। राज्य कानून बनाता है और उन्हें लागू करता है। उसके क्षेत्र में रहने वाले व्यक्ति तथा संस्थाएँ राज्य के कानूनों का पालन करने के लिए बाध्य होते हैं। कोई निजी संगठन राज्य से ऊपर नहीं हो सकता।
बाहरी संप्रभुता का अर्थ है कि राज्य बाहरी नियंत्रण से स्वतंत्र होता है। कोई अन्य राज्य उसके आंतरिक मामलों में अपनी इच्छा के अनुसार हस्तक्षेप नहीं कर सकता। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में राज्यों की राजनीतिक स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता का सिद्धांत इसी विचार से जुड़ा हुआ है।
संप्रभुता की अवधारणा के विकास में जीन बॉडिन का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। उन्होंने संप्रभुता को राज्य की सर्वोच्च और स्थायी शक्ति के रूप में समझाया। बाद में थॉमस हॉब्स ने भी मजबूत सर्वोच्च सत्ता को राजनीतिक व्यवस्था और शांति के लिए आवश्यक माना। दूसरी ओर जॉन लॉक ने राज्य की शक्ति को व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारों और सीमित सरकार के सिद्धांत से जोड़ा। ज्यां-जाक रूसो ने जनसत्ता को महत्व देते हुए यह विचार प्रस्तुत किया कि संप्रभुता का वास्तविक आधार जनता की सामान्य इच्छा में निहित है।
संप्रभुता की अवधारणा आधुनिक राज्य व्यवस्था में अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन वर्तमान समय में इसकी प्रकृति में परिवर्तन भी दिखाई देता है। वैश्वीकरण, अंतरराष्ट्रीय संगठनों, अंतरराष्ट्रीय कानून, आर्थिक परस्पर निर्भरता और वैश्विक समस्याओं के कारण राज्य अनेक मामलों में दूसरे राज्यों के साथ सहयोग करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि राज्य की संप्रभुता पूरी तरह समाप्त हो गई है। बल्कि आधुनिक समय में संप्रभुता का प्रयोग अनेक बार सहयोग, समझौतों और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के साथ किया जाता है।
इन चार तत्वों को एक साथ देखने पर राज्य की वास्तविक संरचना स्पष्ट होती है। जनसंख्या राज्य को मानवीय आधार देती है, निश्चित भू-भाग उसे भौगोलिक आधार देता है, सरकार उसे राजनीतिक संचालन की क्षमता प्रदान करती है और संप्रभुता उसे सर्वोच्च एवं स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता प्रदान करती है। इन चारों के बीच गहरा पारस्परिक संबंध है। यदि जनसंख्या नहीं होगी तो राज्य का सामाजिक आधार समाप्त हो जाएगा। यदि निश्चित भू-भाग नहीं होगा तो राज्य की क्षेत्रीय सत्ता निर्धारित नहीं हो सकेगी। यदि सरकार नहीं होगी तो राज्य की राजनीतिक इच्छा को कार्यरूप नहीं दिया जा सकेगा और यदि संप्रभुता नहीं होगी तो वह राजनीतिक संगठन स्वतंत्र राज्य का स्वरूप प्राप्त नहीं कर सकेगा।
इन चार तत्वों में संप्रभुता को अक्सर राज्य का सबसे विशिष्ट तत्व माना जाता है। जनसंख्या अन्य सामाजिक संगठनों में भी हो सकती है। भू-भाग का अस्तित्व राज्य के बाहर भी होता है। सरकार जैसी संगठनात्मक व्यवस्था अन्य संस्थाओं में भी किसी न किसी रूप में देखी जा सकती है। लेकिन सर्वोच्च और स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता राज्य की विशिष्ट पहचान है।
फिर भी केवल इन चार तत्वों से राज्य की संपूर्ण आधुनिक अवधारणा को समझना पर्याप्त नहीं है। आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य में संविधान, कानून का शासन, नागरिकता, मानवाधिकार, राजनीतिक भागीदारी, जनमत और उत्तरदायी शासन भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए समकालीन राजनीति विज्ञान राज्य को केवल शक्ति और संप्रभुता के आधार पर नहीं बल्कि वैधता और जनसहमति के आधार पर भी समझता है।
राज्य की वैधता का प्रश्न विशेष रूप से लोकतांत्रिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण है। कोई सरकार कानूनी रूप से सत्ता में हो सकती है, लेकिन यदि वह जनता के अधिकारों का लगातार उल्लंघन करे और संविधान की मर्यादाओं को न माने तो उसकी वैधता पर प्रश्न उठ सकते हैं। इसलिए आधुनिक राज्य की शक्ति को संविधान, कानून, न्यायपालिका, चुनाव और नागरिक अधिकारों जैसी संस्थाओं द्वारा नियंत्रित किया जाता है।
राज्य के इन आवश्यक तत्वों को समझने से यह भी स्पष्ट होता है कि राज्य केवल दमन या नियंत्रण का उपकरण नहीं है। आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य में शक्ति का उद्देश्य सामाजिक व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करना है। राज्य नागरिकों को सुरक्षा देता है, लेकिन साथ ही नागरिकों से कानून का पालन करने की अपेक्षा भी करता है। राज्य अधिकार प्रदान करता है, लेकिन नागरिकों से कुछ कर्तव्यों के निर्वहन की अपेक्षा भी करता है। इस प्रकार राज्य और नागरिकों के बीच संबंध एकतरफा न होकर पारस्परिक होता है।
राज्य की शक्ति और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक है। यदि राज्य अत्यधिक कमजोर हो जाए तो कानून-व्यवस्था और सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर यदि राज्य की शक्ति पर कोई नियंत्रण न हो तो वह निरंकुशता और दमन का रूप ले सकती है। इसलिए आधुनिक संवैधानिक राज्य का उद्देश्य ऐसी व्यवस्था स्थापित करना है जिसमें राज्य पर्याप्त रूप से शक्तिशाली हो ताकि सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा बनाए रख सके, लेकिन इतना निरंकुश न हो कि नागरिक स्वतंत्रता समाप्त हो जाए।
भारतीय राज्य के संदर्भ में इन चारों तत्वों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। भारत में विशाल और विविध जनसंख्या है, निश्चित भौगोलिक क्षेत्र है, संविधान के अनुसार संगठित सरकार है और देश एक संप्रभु राज्य है। भारतीय संविधान राज्य की संस्थाओं की शक्तियों तथा उनकी सीमाओं को निर्धारित करता है। नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए मौलिक अधिकारों की व्यवस्था की गई है और शासन को लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत से जोड़ा गया है।
इस प्रकार राज्य के चार आवश्यक तत्व राज्य की पारंपरिक अवधारणा को समझने का मूल आधार हैं। जनसंख्या के बिना राज्य का मानवीय अस्तित्व नहीं हो सकता, निश्चित भू-भाग के बिना उसका क्षेत्रीय अस्तित्व निर्धारित नहीं किया जा सकता, सरकार के बिना उसकी राजनीतिक व्यवस्था संचालित नहीं हो सकती और संप्रभुता के बिना उसकी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान अधूरी रहती है। इन चारों तत्वों का समन्वय ही राज्य को एक पूर्ण राजनीतिक संगठन बनाता है।
अंततः कहा जा सकता है कि राज्य एक ऐसी संगठित राजनीतिक संस्था है जो निश्चित भू-भाग में निवास करने वाली जनसंख्या को सरकार और संप्रभु सत्ता के माध्यम से राजनीतिक रूप से संगठित करती है। राज्य का पारंपरिक आधार चार तत्वों पर टिका है, लेकिन आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य की वास्तविक शक्ति उसकी संवैधानिक वैधता, जनसहमति, कानून के शासन और नागरिक अधिकारों की रक्षा में भी निहित है। इसलिए राज्य को केवल शासन और शक्ति की संस्था मानना पर्याप्त नहीं है; उसे समाज के सामूहिक जीवन को व्यवस्थित करने वाली एक गतिशील, वैधानिक और लोककल्याणकारी राजनीतिक संस्था के रूप में समझना अधिक उचित है।
तीन-विश्व एवं शास्त्रीय वर्गीकरण : अर्थ, अवधारणा और राजनीतिक महत्व
राजनीति विज्ञान में विभिन्न राज्यों और राजनीतिक व्यवस्थाओं को समझने के लिए उनका वर्गीकरण किया जाता है। विश्व में विद्यमान सभी राज्यों की राजनीतिक संस्थाएँ, शासन-पद्धतियाँ, आर्थिक व्यवस्थाएँ, सामाजिक संरचनाएँ और ऐतिहासिक परिस्थितियाँ समान नहीं हैं। किसी देश में लोकतांत्रिक शासन हो सकता है, तो किसी दूसरे देश में राजतंत्र या अधिनायकवादी शासन हो सकता है। कुछ देश आर्थिक रूप से अत्यधिक विकसित रहे हैं, जबकि कुछ देशों को विकास, गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और सामाजिक असमानता जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा है। इसी विविधता को व्यवस्थित रूप से समझने के लिए राजनीतिक वैज्ञानिकों ने विभिन्न प्रकार के वर्गीकरण विकसित किए। इनमें शास्त्रीय वर्गीकरण और तीन-विश्व वर्गीकरण विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहे हैं।
राजनीतिक वर्गीकरण का सामान्य अर्थ विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं या राज्यों को उनकी समानताओं और असमानताओं के आधार पर अलग-अलग समूहों में बाँटना है। इसका उद्देश्य केवल राज्यों की सूची तैयार करना नहीं है, बल्कि उनके बीच पाए जाने वाले राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और ऐतिहासिक अंतर को समझना है। जब राजनीतिक वैज्ञानिक किसी व्यवस्था को लोकतांत्रिक, राजतंत्रीय, अधिनायकवादी, संघात्मक, एकात्मक, विकसित, विकासशील अथवा किसी अन्य श्रेणी में रखते हैं, तो वे वास्तव में उस व्यवस्था की कुछ प्रमुख विशेषताओं को पहचानने का प्रयास करते हैं। इसलिए वर्गीकरण राजनीतिक व्यवस्था के तुलनात्मक अध्ययन को सरल और व्यवस्थित बनाने का एक महत्वपूर्ण साधन है।
राजनीतिक व्यवस्थाओं के वर्गीकरण की परंपरा बहुत पुरानी है। प्राचीन यूनानी राजनीतिक चिंतकों ने भी अपने समय की शासन व्यवस्थाओं को अलग-अलग रूपों में बाँटने का प्रयास किया था। उस समय राजनीतिक चिंतन मुख्यतः इस प्रश्न पर केंद्रित था कि राज्य में शासन की शक्ति किसके हाथों में होनी चाहिए और शासक सत्ता का उपयोग किस उद्देश्य से करते हैं। इसी संदर्भ में प्लेटो और अरस्तू के वर्गीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। आधुनिक युग में राजनीतिक व्यवस्थाओं का वर्गीकरण अधिक व्यापक हो गया और इसमें शासन के साथ-साथ आर्थिक व्यवस्था, राजनीतिक संस्कृति, सामाजिक संरचना, विकास का स्तर और अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन जैसे तत्वों को भी शामिल किया जाने लगा।
शास्त्रीय वर्गीकरण को राजनीतिक व्यवस्थाओं के वर्गीकरण की प्रारंभिक और बुनियादी पद्धति कहा जा सकता है। इसका विकास मुख्यतः प्राचीन यूनानी राजनीतिक चिंतन में हुआ। प्लेटो ने राजनीतिक व्यवस्थाओं को उनके नैतिक चरित्र और शासन के उद्देश्य के आधार पर समझने का प्रयास किया। उनके अनुसार आदर्श शासन वह है जिसमें ज्ञान और विवेक रखने वाले लोग न्यायपूर्ण ढंग से शासन करें। जब शासन का उद्देश्य सार्वजनिक हित से हटकर व्यक्तिगत स्वार्थ, धन या सत्ता की लालसा बन जाता है, तब शासन व्यवस्था अपने श्रेष्ठ स्वरूप से विकृत स्वरूप की ओर बढ़ने लगती है।
अरस्तू ने शास्त्रीय वर्गीकरण को अधिक व्यवस्थित और विश्लेषणात्मक रूप दिया। उन्होंने राजनीतिक व्यवस्थाओं का वर्गीकरण मुख्यतः दो आधारों पर किया—पहला, शासन करने वाले व्यक्तियों की संख्या और दूसरा, शासन का उद्देश्य। यदि शासन करने वाले लोग सामान्य या सार्वजनिक हित में सत्ता का प्रयोग करते हैं तो शासन का वह रूप उचित माना जाता है। इसके विपरीत यदि शासक अपने निजी हित को प्राथमिकता देते हैं तो वही व्यवस्था विकृत रूप ग्रहण कर लेती है।
अरस्तू के अनुसार जब एक व्यक्ति सार्वजनिक हित में शासन करता है तो उसे राजतंत्र कहा जाता है। जब कुछ योग्य और श्रेष्ठ लोग सार्वजनिक हित में शासन करते हैं तो वह अभिजाततंत्र होता है। जब अनेक लोग संविधान और सार्वजनिक हित के आधार पर शासन करते हैं तो अरस्तू ने उसे ‘पॉलिटी’ कहा। इसके विपरीत जब एक व्यक्ति निजी स्वार्थ में शासन करता है तो वह निरंकुशता या अत्याचार का रूप ले लेता है; जब कुछ लोगों का शासन अपने वर्गीय हित के लिए होता है तो वह कुलीनतंत्र बन जाता है; और जब बहुसंख्यक वर्ग अपने विशेष हित को सार्वजनिक हित से ऊपर रखता है तो अरस्तू उसे लोकतंत्र के रूप में वर्गीकृत करते हैं। यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि अरस्तू के समय ‘लोकतंत्र’ का अर्थ आज के आधुनिक उदार लोकतंत्र से अलग था। इसलिए उनके वर्गीकरण को उनके ऐतिहासिक संदर्भ में ही समझना चाहिए।
शास्त्रीय वर्गीकरण का महत्व इस बात में है कि इसने पहली बार राजनीतिक व्यवस्थाओं को व्यवस्थित ढंग से समझने का प्रयास किया। इससे यह विचार सामने आया कि शासन का केवल बाहरी स्वरूप ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि सत्ता का प्रयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा है। यदि सत्ता सार्वजनिक हित में प्रयोग की जाती है तो राजनीतिक व्यवस्था अपेक्षाकृत स्वस्थ मानी जाती है, जबकि सत्ता निजी हित, वर्गीय हित या स्वार्थ के लिए प्रयोग होने लगे तो व्यवस्था में विकृति उत्पन्न हो सकती है।
बाद में पॉलीबियस ने राजनीतिक व्यवस्थाओं के विकास को एक चक्रीय प्रक्रिया के रूप में देखने का प्रयास किया। उनके अनुसार शासन का एक रूप समय के साथ अपने विकृत रूप में बदल सकता है और फिर उससे दूसरी व्यवस्था उत्पन्न हो सकती है। इस विचार में यह धारणा दिखाई देती है कि राजनीतिक संस्थाएँ स्थिर नहीं होतीं। परिस्थितियों, शासकों के चरित्र और सामाजिक शक्तियों के परिवर्तन के साथ शासन व्यवस्था भी बदलती रहती है। पॉलीबियस ने मिश्रित शासन व्यवस्था को भी महत्व दिया क्योंकि उनके विचार में विभिन्न शासन रूपों के संतुलन से राजनीतिक स्थिरता प्राप्त की जा सकती है।
आधुनिक काल में मोंतेस्क्यू ने राजनीतिक व्यवस्था के अध्ययन को एक नया आयाम प्रदान किया। उन्होंने राजनीतिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सत्ता के विभाजन और संतुलन को आवश्यक माना। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का विभाजन आधुनिक संवैधानिक शासन की एक महत्वपूर्ण विशेषता बन गया। इससे राजनीतिक वर्गीकरण केवल यह जानने तक सीमित नहीं रहा कि शासन किसके हाथ में है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण हो गया कि शासन की संस्थाओं के बीच शक्तियों का वितरण किस प्रकार किया गया है।
शास्त्रीय वर्गीकरण की उपयोगिता आज भी बनी हुई है, क्योंकि आधुनिक राजनीतिक संस्थाओं की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए इसकी जानकारी आवश्यक है। हालांकि इसकी सीमा यह है कि प्राचीन वर्गीकरण आधुनिक राजनीतिक जीवन की जटिलता को पूरी तरह नहीं समझा सकता। आज राजनीतिक व्यवस्था केवल राजा, कुछ कुलीन व्यक्तियों या बहुसंख्यक जनता के शासन से निर्धारित नहीं होती। राजनीतिक दल, चुनाव, नौकरशाही, न्यायपालिका, मीडिया, दबाव समूह, नागरिक समाज, राजनीतिक संस्कृति और आर्थिक शक्तियाँ भी राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करती हैं। इसलिए आधुनिक राजनीतिक विज्ञान ने वर्गीकरण के अधिक व्यापक आधार विकसित किए।
इसी क्रम में अंतरराष्ट्रीय राजनीति और विश्व व्यवस्था को समझने के लिए तीन-विश्व वर्गीकरण का विकास हुआ। तीन-विश्व वर्गीकरण विशेष रूप से द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की अंतरराष्ट्रीय राजनीति और शीत युद्ध के संदर्भ में महत्वपूर्ण रहा। इस वर्गीकरण में विश्व के देशों को मुख्यतः तीन व्यापक समूहों—प्रथम विश्व, द्वितीय विश्व और तृतीय विश्व—में बाँटकर समझने का प्रयास किया गया।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दो महाशक्तियों का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया। एक ओर संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में पूँजीवादी और उदार लोकतांत्रिक देशों का समूह था और दूसरी ओर सोवियत संघ के नेतृत्व में समाजवादी देशों का समूह। इन दोनों के बीच राजनीतिक, आर्थिक, सैन्य और वैचारिक प्रतिस्पर्धा को शीत युद्ध कहा गया। इसी वैश्विक शक्ति-संघर्ष के संदर्भ में ‘प्रथम विश्व’ और ‘द्वितीय विश्व’ जैसी संज्ञाएँ प्रचलित हुईं।
‘प्रथम विश्व’ शब्द का प्रयोग सामान्यतः उन विकसित पूँजीवादी देशों के लिए किया गया जो पश्चिमी राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था से जुड़े हुए थे। इन देशों में औद्योगिक विकास, तकनीकी प्रगति, उच्च प्रति व्यक्ति आय और अपेक्षाकृत विकसित संस्थागत व्यवस्थाएँ थीं। संयुक्त राज्य अमेरिका, पश्चिमी यूरोप के अनेक देश तथा कुछ अन्य विकसित देश इस श्रेणी में रखे जाते थे। इनके राजनीतिक जीवन में उदार लोकतंत्र और बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण स्थान था।
‘द्वितीय विश्व’ शब्द मुख्यतः सोवियत संघ तथा उसके प्रभाव वाले समाजवादी देशों के लिए प्रयोग किया गया। इन देशों की आर्थिक व्यवस्था में राज्य की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण थी और उत्पादन तथा वितरण की व्यवस्था पर राज्य का व्यापक नियंत्रण था। राजनीतिक रूप से इनमें एक-दलीय अथवा साम्यवादी पार्टी के नेतृत्व वाली व्यवस्थाएँ प्रमुख थीं। सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के अनेक समाजवादी देश इसके प्रमुख उदाहरण माने जाते थे।
‘तृतीय विश्व’ की अवधारणा का संबंध मुख्यतः एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के उन देशों से था जो औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्र हुए थे या विकास की प्रक्रिया में पीछे थे और जो शीत युद्ध के दोनों प्रमुख शक्ति-गुटों से स्वयं को अलग रखना चाहते थे। इन देशों के सामने राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ आर्थिक विकास, सामाजिक परिवर्तन, राष्ट्रीय एकता और गरीबी समाप्त करने जैसी बड़ी चुनौतियाँ थीं।
तृतीय विश्व शब्द का अर्थ केवल गरीब देश नहीं था। इसका प्रारंभिक राजनीतिक अर्थ उन देशों से भी जुड़ा था जो शीत युद्ध की दो महाशक्तियों के गुटों में शामिल होने के बजाय अपनी स्वतंत्र विदेश नीति अपनाना चाहते थे। इस संदर्भ में गुटनिरपेक्ष आंदोलन का महत्व बहुत अधिक था। भारत, मिस्र, यूगोस्लाविया, इंडोनेशिया और घाना जैसे देशों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ऐसी नीति को बढ़ावा दिया जिसमें वे किसी महाशक्ति के सैन्य गुट का हिस्सा बने बिना अपने राष्ट्रीय हितों और स्वतंत्र विदेश नीति को बनाए रखना चाहते थे।
भारत का तीन-विश्व वर्गीकरण के संदर्भ में विशेष महत्व है। स्वतंत्रता के बाद भारत ने शीत युद्ध की प्रतिस्पर्धा में किसी एक शक्ति-गुट का स्थायी सदस्य बनने के बजाय गुटनिरपेक्षता की नीति को अपनाया। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता बनाए रखना, औपनिवेशिकता और साम्राज्यवाद का विरोध करना तथा विकासशील देशों के हितों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाना था। इस प्रकार तृतीय विश्व की राजनीति केवल आर्थिक पिछड़ेपन की राजनीति नहीं थी, बल्कि राजनीतिक स्वतंत्रता और अंतरराष्ट्रीय स्वायत्तता की भी राजनीति थी।
तीन-विश्व वर्गीकरण में आर्थिक पक्ष भी महत्वपूर्ण था। प्रथम विश्व के देशों को सामान्यतः विकसित औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं के रूप में देखा गया, जबकि तृतीय विश्व के अनेक देश औपनिवेशिक शोषण से निकलकर आर्थिक विकास की कठिन प्रक्रिया से गुजर रहे थे। औपनिवेशिक शासन ने इन देशों की अर्थव्यवस्था को इस प्रकार प्रभावित किया था कि स्वतंत्रता के बाद उन्हें गरीबी, बेरोजगारी, कमजोर औद्योगिक आधार, कम पूँजी, अशिक्षा और सामाजिक असमानता जैसी समस्याओं से जूझना पड़ा।
तृतीय विश्व की अवधारणा ने विकास की राजनीति को भी जन्म दिया। इन देशों ने यह प्रश्न उठाया कि राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद वास्तविक आर्थिक स्वतंत्रता कैसे प्राप्त की जाए। उनके लिए केवल औपनिवेशिक शासन का अंत पर्याप्त नहीं था; उन्हें ऐसी आर्थिक व्यवस्था की आवश्यकता थी जिसमें प्राकृतिक संसाधनों पर राष्ट्रीय नियंत्रण, औद्योगिकीकरण, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसरों का विस्तार हो। इसी कारण विकासशील देशों की राजनीति में आर्थिक आत्मनिर्भरता का विचार महत्वपूर्ण बना।
तीन-विश्व वर्गीकरण का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी था कि उसने विश्व राजनीति में असमानता की ओर ध्यान आकर्षित किया। विश्व की आर्थिक और राजनीतिक शक्ति कुछ विकसित देशों में अधिक केंद्रित थी, जबकि अनेक विकासशील देश अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तकनीक, पूँजी और वित्तीय सहायता के लिए विकसित देशों पर निर्भर थे। इस स्थिति ने वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की असमानताओं पर बहस को जन्म दिया।
लेकिन तीन-विश्व वर्गीकरण की कुछ सीमाएँ भी हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि प्रथम, द्वितीय और तृतीय विश्व की श्रेणियाँ बहुत व्यापक थीं और इनके भीतर शामिल देशों की परिस्थितियाँ एक जैसी नहीं थीं। सभी तृतीय विश्व देशों की राजनीतिक व्यवस्था, आर्थिक क्षमता और सामाजिक संरचना समान नहीं थी। इसी प्रकार प्रथम विश्व के देशों के बीच भी पर्याप्त अंतर था। इसलिए तीन श्रेणियों में पूरी दुनिया को बाँटना वास्तविक राजनीतिक विविधता को कभी-कभी अत्यधिक सरल बना देता था।
दूसरी महत्वपूर्ण सीमा यह है कि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद इसका पारंपरिक अर्थ कमजोर पड़ गया। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद वह अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संरचना समाप्त हो गई जिसके आधार पर प्रथम और द्वितीय विश्व का विभाजन किया गया था। इसके बाद विश्व राजनीति में नई आर्थिक और राजनीतिक शक्तियाँ उभरीं और देशों के बीच संबंधों को केवल पूँजीवाद और समाजवाद के आधार पर समझना पर्याप्त नहीं रहा।
वैश्वीकरण ने भी तीन-विश्व वर्गीकरण को चुनौती दी। आर्थिक उदारीकरण, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तकनीकी विकास और वैश्विक संचार के कारण अनेक विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था में परिवर्तन आया। कुछ देशों ने तीव्र औद्योगिक और तकनीकी विकास किया, जबकि कुछ अन्य देश अब भी गंभीर गरीबी और असमानता से जूझ रहे हैं। इस कारण विकसित और विकासशील देशों के बीच अंतर को केवल एक स्थायी तीन-स्तरीय विभाजन के रूप में देखना उचित नहीं रह गया।
आज राजनीतिक वैज्ञानिक राज्यों को समझने के लिए अनेक प्रकार के वर्गीकरणों का प्रयोग करते हैं। लोकतांत्रिक और अधिनायकवादी व्यवस्था, विकसित और विकासशील देश, संघात्मक और एकात्मक राज्य, संसदीय और अध्यक्षात्मक शासन तथा उदार लोकतंत्र और गैर-लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ आधुनिक वर्गीकरण के कुछ प्रमुख उदाहरण हैं। इनके माध्यम से राजनीतिक व्यवस्था की संस्थागत प्रकृति, आर्थिक स्थिति और राजनीतिक भागीदारी को अधिक विशिष्ट रूप से समझने का प्रयास किया जाता है।
शास्त्रीय और तीन-विश्व वर्गीकरण में मूलभूत अंतर भी स्पष्ट है। शास्त्रीय वर्गीकरण मुख्यतः इस बात पर केंद्रित था कि सत्ता किसके हाथ में है और उसका प्रयोग किस प्रकार किया जा रहा है। इसके विपरीत तीन-विश्व वर्गीकरण मुख्यतः अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन, आर्थिक विकास, वैचारिक गुटबंदी और ऐतिहासिक परिस्थितियों से संबंधित था। शास्त्रीय वर्गीकरण का आधार राजनीतिक शासन-रूप था, जबकि तीन-विश्व वर्गीकरण का आधार व्यापक अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक और आर्थिक संरचना थी।
फिर भी दोनों वर्गीकरणों में एक समानता दिखाई देती है। दोनों का उद्देश्य जटिल राजनीतिक वास्तविकता को कुछ व्यापक श्रेणियों के माध्यम से समझना था। दोनों ही यह स्वीकार करते हैं कि विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण अंतर होते हैं और इन अंतरों को समझे बिना राजनीति का तुलनात्मक अध्ययन अधूरा रह जाता है।
राजनीतिक वर्गीकरण का वास्तविक महत्व इसी में है कि यह हमें विभिन्न व्यवस्थाओं की तुलना करने की सुविधा देता है। यदि राजनीतिक व्यवस्थाओं को किसी व्यवस्थित आधार पर वर्गीकृत न किया जाए तो विश्व की राजनीतिक विविधता को समझना कठिन हो जाएगा। वर्गीकरण के माध्यम से विद्यार्थी यह समझ सकते हैं कि राजतंत्र और लोकतंत्र में क्या अंतर है, लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के अलग-अलग रूप कैसे होते हैं, विकसित और विकासशील राज्यों की समस्याएँ क्यों अलग हो सकती हैं तथा अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन किस प्रकार राजनीतिक व्यवस्थाओं को प्रभावित करता है।
हालाँकि वर्गीकरण करते समय सावधानी आवश्यक है। किसी भी देश को केवल एक श्रेणी में रखकर उसकी संपूर्ण राजनीतिक वास्तविकता को समझ लेना उचित नहीं है। एक देश लोकतांत्रिक होने के साथ-साथ आर्थिक रूप से विकासशील हो सकता है; कोई देश संघात्मक होने के साथ संसदीय व्यवस्था अपना सकता है; कोई देश आर्थिक रूप से विकसित होने के बावजूद राजनीतिक स्वतंत्रता के मामले में अलग स्वरूप रख सकता है। इसलिए आधुनिक राजनीतिक अध्ययन में बहुआयामी वर्गीकरण को अधिक उपयोगी माना जाता है।
अंततः कहा जा सकता है कि शास्त्रीय वर्गीकरण और तीन-विश्व वर्गीकरण राजनीतिक विज्ञान के विकास में महत्वपूर्ण बौद्धिक पड़ाव हैं। शास्त्रीय वर्गीकरण ने शासन के विभिन्न रूपों को समझने की आधारभूत पद्धति प्रदान की और यह बताया कि सत्ता का स्वरूप तथा उसका उद्देश्य राजनीतिक व्यवस्था के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण हैं। दूसरी ओर तीन-विश्व वर्गीकरण ने शीत युद्ध की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, पूँजीवादी और समाजवादी गुटों की प्रतिस्पर्धा तथा विकासशील देशों की राजनीतिक और आर्थिक स्थिति को समझने का एक व्यापक ढाँचा प्रस्तुत किया।
आज तीन-विश्व वर्गीकरण अपने मूल शीतयुद्धकालीन अर्थ में उतना उपयोगी नहीं है, फिर भी इसका ऐतिहासिक महत्व बना हुआ है। इसी प्रकार शास्त्रीय वर्गीकरण आधुनिक राजनीतिक विज्ञान का पूर्ण विकल्प नहीं है, लेकिन राजनीतिक शासन के प्रारंभिक व्यवस्थित अध्ययन की आधारभूमि के रूप में इसका महत्व स्थायी है। इन दोनों वर्गीकरणों का अध्ययन हमें यह समझने में सहायता करता है कि राजनीतिक व्यवस्थाएँ समय, समाज, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के साथ किस प्रकार बदलती हैं।
इस प्रकार राजनीतिक वर्गीकरण का उद्देश्य दुनिया को कृत्रिम रूप से कुछ खाँचों में बाँटना नहीं, बल्कि राजनीतिक वास्तविकताओं को समझने के लिए एक विश्लेषणात्मक ढाँचा उपलब्ध कराना है। शास्त्रीय वर्गीकरण हमें शासन के स्वरूप और सत्ता के संगठन को समझने में सहायता करता है, जबकि तीन-विश्व वर्गीकरण हमें शीत युद्ध, विकास, औपनिवेशिक विरासत और अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संबंधों को समझने का अवसर देता है। इसलिए दोनों का अध्ययन बी.ए. स्तर पर राजनीति विज्ञान की मूलभूत अवधारणाओं को समझने के लिए अत्यंत उपयोगी है।
The State : What of the State, Meaning & Definition
राज्य : राज्य की अवधारणा, अर्थ एवं परिभाषा
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions) (2–5 अंक)
राज्य से क्या अभिप्राय है?
राजनीति विज्ञान में राज्य का क्या महत्व है?
राज्य की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।
राज्य की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
राज्य की कोई दो परिभाषाएँ दीजिए।
गार्नर के अनुसार राज्य की परिभाषा लिखिए।
ब्लंटश्ली के अनुसार राज्य क्या है?
मैक्स वेबर के अनुसार राज्य की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
लास्की के अनुसार राज्य क्या है?
वुडरो विल्सन द्वारा राज्य की परिभाषा लिखिए।
राज्य के चार आवश्यक तत्वों के नाम लिखिए।
जनसंख्या राज्य का आवश्यक तत्व क्यों है?
निश्चित भू-भाग से क्या अभिप्राय है?
सरकार राज्य का आवश्यक तत्व क्यों मानी जाती है?
संप्रभुता (Sovereignty) क्या है?
आंतरिक संप्रभुता से क्या अभिप्राय है?
बाह्य संप्रभुता का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
राज्य और सरकार में दो अंतर लिखिए।
राज्य और समाज में दो अंतर लिखिए।
राज्य और राष्ट्र में दो अंतर लिखिए।
नगर-राज्य (City State) क्या था?
प्राचीन यूनान में राज्य की अवधारणा कैसी थी?
अरस्तू ने राज्य को किस प्रकार परिभाषित किया?
प्लेटो की राज्य संबंधी अवधारणा क्या थी?
मध्यकाल में राज्य की अवधारणा किन आधारों पर विकसित हुई?
आधुनिक राज्य की दो विशेषताएँ लिखिए।
कल्याणकारी राज्य (Welfare State) से क्या अभिप्राय है?
उदारवादी राज्य की अवधारणा क्या है?
आधुनिक राज्य के चार प्रमुख कार्य लिखिए।
राज्य और सरकार में कौन स्थायी है?
क्या बिना सरकार के राज्य संभव है? स्पष्ट कीजिए।
क्या बिना संप्रभुता के राज्य संभव है? स्पष्ट कीजिए।
आधुनिक राज्य की भूमिका में क्या परिवर्तन आया है?
वैश्वीकरण का राज्य पर क्या प्रभाव पड़ा है?
लोकतांत्रिक राज्य की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
राज्य का मुख्य उद्देश्य क्या है?
नागरिक और राज्य का संबंध स्पष्ट कीजिए।
राज्य की वैध शक्ति (Legitimate Power) से क्या अभिप्राय है?
राज्य की स्थायित्व की विशेषता स्पष्ट कीजिए।
आधुनिक राजनीति विज्ञान में राज्य का क्या महत्व है?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions) (10–20 अंक)
राज्य की अवधारणा, अर्थ एवं परिभाषा का विस्तारपूर्वक विवेचन कीजिए।
राज्य के आवश्यक तत्वों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
राज्य और सरकार में अंतर स्पष्ट कीजिए।
राज्य और समाज का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।
राज्य और राष्ट्र में अंतर स्पष्ट कीजिए।
प्राचीन काल से आधुनिक काल तक राज्य की अवधारणा के विकास का वर्णन कीजिए।
गार्नर, ब्लंटश्ली, लास्की एवं मैक्स वेबर की राज्य संबंधी परिभाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।
आधुनिक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का विश्लेषण कीजिए।
आधुनिक युग में राज्य की बदलती भूमिका का आलोचनात्मक विवेचन कीजिए।
राज्य की संप्रभुता की अवधारणा का विस्तृत अध्ययन कीजिए।
राज्य के आवश्यक तत्वों में संप्रभुता का विशेष महत्व स्पष्ट कीजिए।
राज्य की विशेषताओं का विस्तार से वर्णन कीजिए।
राज्य और सरकार के संबंधों का विश्लेषण कीजिए।
राज्य की अवधारणा पर वैश्वीकरण के प्रभाव का मूल्यांकन कीजिए।
राजनीति विज्ञान के अध्ययन में राज्य का महत्व स्पष्ट कीजिए।
राज्य के पारंपरिक एवं आधुनिक स्वरूप का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।
आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य की विशेषताओं का विश्लेषण कीजिए।
राज्य के कार्यों में हुए ऐतिहासिक परिवर्तनों का वर्णन कीजिए।
राज्य की अवधारणा पर अरस्तू एवं आधुनिक विचारकों के विचारों की तुलना कीजिए।
आधुनिक राज्य के समक्ष उपस्थित प्रमुख चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) (उत्तर सहित)
1. राजनीति विज्ञान का मुख्य विषय है—
(A) समाज
(B) राज्य
(C) परिवार
(D) धर्म
उत्तर – (B)
2. राज्य का सबसे महत्वपूर्ण तत्व कौन-सा है?
(A) सरकार
(B) संप्रभुता
(C) जनसंख्या
(D) भू-भाग
उत्तर – (B)
3. आधुनिक राज्य के कितने आवश्यक तत्व माने जाते हैं?
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच
उत्तर – (C)
4. निम्नलिखित में से कौन राज्य का आवश्यक तत्व नहीं है?
(A) जनसंख्या
(B) सरकार
(C) संप्रभुता
(D) राजनीतिक दल
उत्तर – (D)
5. गार्नर के अनुसार राज्य का आवश्यक तत्व नहीं है—
(A) निश्चित भू-भाग
(B) सरकार
(C) संप्रभुता
(D) धर्म
उत्तर – (D)
6. "मनुष्य स्वभाव से राजनीतिक प्राणी है" यह कथन किसका है?
(A) प्लेटो
(B) अरस्तू
(C) हॉब्स
(D) लॉक
उत्तर – (B)
7. मैक्स वेबर ने राज्य का आधार किसे माना?
(A) नैतिकता
(B) वैध बल प्रयोग का एकाधिकार
(C) धर्म
(D) संस्कृति
उत्तर – (B)
8. राज्य और सरकार में कौन-सा स्थायी होता है?
(A) सरकार
(B) राज्य
(C) संसद
(D) मंत्रिमंडल
उत्तर – (B)
9. निम्नलिखित में से कौन राज्य का मानवीय तत्व है?
(A) सरकार
(B) जनसंख्या
(C) संप्रभुता
(D) भू-भाग
उत्तर – (B)
10. राज्य का भौतिक आधार है—
(A) जनसंख्या
(B) सरकार
(C) निश्चित भू-भाग
(D) संविधान
उत्तर – (C)
11. संप्रभुता का अर्थ है—
(A) न्यायपालिका
(B) सर्वोच्च सत्ता
(C) चुनाव
(D) प्रशासन
उत्तर – (B)
12. आंतरिक संप्रभुता का संबंध किससे है?
(A) विदेश नीति
(B) राज्य के भीतर सर्वोच्च सत्ता
(C) युद्ध
(D) व्यापार
उत्तर – (B)
13. बाह्य संप्रभुता का संबंध है—
(A) स्थानीय प्रशासन
(B) अंतरराष्ट्रीय स्वतंत्रता
(C) पंचायत
(D) चुनाव आयोग
उत्तर – (B)
14. ब्लंटश्ली किस विषय से संबंधित हैं?
(A) राज्य की परिभाषा
(B) सामाजिक अनुबंध
(C) लोकतंत्र
(D) चुनाव प्रणाली
उत्तर – (A)
15. आधुनिक राज्य का प्रमुख उद्देश्य है—
(A) केवल कर वसूलना
(B) केवल युद्ध करना
(C) जनकल्याण एवं विकास
(D) केवल कानून बनाना
उत्तर – (C)
16. कल्याणकारी राज्य का मुख्य उद्देश्य है—
(A) जनता का शोषण
(B) सामाजिक एवं आर्थिक कल्याण
(C) केवल सैन्य शक्ति बढ़ाना
(D) केवल व्यापार करना
उत्तर – (B)
17. निम्नलिखित में से कौन राज्य और राष्ट्र के बीच अंतर का आधार है?
(A) संप्रभुता
(B) संस्कृति
(C) राजनीतिक संगठन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर – (D)
18. राज्य की इच्छा को क्रियान्वित करने वाली संस्था है—
(A) समाज
(B) सरकार
(C) राष्ट्र
(D) परिवार
उत्तर – (B)
19. नगर-राज्य की अवधारणा किस सभ्यता से संबंधित है?
(A) रोमन
(B) यूनानी
(C) मिस्र
(D) भारतीय
उत्तर – (B)
20. आधुनिक राजनीति विज्ञान में राज्य को माना जाता है—
(A) केवल दमनकारी संस्था
(B) सर्वोच्च राजनीतिक संगठन
(C) धार्मिक संस्था
(D) आर्थिक संस्था
उत्तर – (B)
21. राज्य का कौन-सा तत्व उसे अन्य सभी संगठनों से अलग पहचान देता है?
(A) जनसंख्या
(B) सरकार
(C) संप्रभुता
(D) संविधान
उत्तर – (C)
22. राज्य की परिभाषा देते समय गार्नर ने कितने आवश्यक तत्वों पर बल दिया?
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच
उत्तर – (C)
23. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
(A) सरकार राज्य से बड़ी है।
(B) राज्य सरकार का एक भाग है।
(C) सरकार राज्य का एक अंग है।
(D) राज्य और सरकार समान हैं।
उत्तर – (C)
24. आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य की प्रमुख विशेषता है—
(A) निरंकुश शासन
(B) नागरिक अधिकारों का संरक्षण
(C) वंशानुगत शासन
(D) धार्मिक शासन
उत्तर – (B)
25. वैश्वीकरण के बावजूद राज्य की कौन-सी विशेषता बनी हुई है?
(A) संप्रभुता का पूर्ण लोप
(B) राष्ट्रीय शासन की आवश्यकता
(C) सरकार का अंत
(D) कानून का अभाव
उत्तर – (B)
