Unit – 5
Cold War, (New Cold War) Second Cold War, Détente, Nonaligned Movement,
शीत युद्ध, (नव शीत युद्ध) द्वितीय शीत युद्ध, देतांत (तनाव-शैथिल्य) तथा गुटनिरपेक्ष आंदोलन।
द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद विश्व राजनीति ने एक ऐसे युग में प्रवेश किया जिसने लगभग आधी शताब्दी तक अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दिशा और स्वरूप को गहराई से प्रभावित किया। इस काल में विश्व प्रत्यक्ष विश्वयुद्ध से तो बचा रहा, किंतु दो महाशक्तियों के बीच वैचारिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामरिक और तकनीकी प्रतिस्पर्धा निरंतर चलती रही। इसी स्थिति को शीत युद्ध कहा गया। शीत युद्ध केवल दो देशों के बीच संघर्ष नहीं था, बल्कि यह दो भिन्न राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्थाओं, दो वैचारिक दृष्टिकोणों तथा दो वैश्विक शक्ति-गुटों के बीच व्यापक प्रतिस्पर्धा थी। इस प्रतिस्पर्धा ने विश्व राजनीति, विदेश नीति, सैन्य गठबंधनों, परमाणु हथियारों की दौड़, अंतरिक्ष अनुसंधान, वैश्विक अर्थव्यवस्था, नवस्वतंत्र देशों की विदेश नीति तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भूमिका पर गहरा प्रभाव डाला। समय के साथ शीत युद्ध के स्वरूप में भी परिवर्तन आया। तनाव की तीव्रता में कमी के दौर को देतांत या तनाव-शैथिल्य कहा गया, जबकि बाद के वर्षों में प्रतिस्पर्धा के पुनः तीव्र होने को द्वितीय शीत युद्ध अथवा नव शीत युद्ध के रूप में देखा गया। इसी अवधि में नवस्वतंत्र देशों ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन के माध्यम से दोनों शक्ति-गुटों से दूरी बनाए रखते हुए स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने का प्रयास किया।
शीत युद्ध का सामान्य अर्थ ऐसी अंतरराष्ट्रीय स्थिति से है जिसमें दो या अधिक शक्तिशाली देशों के बीच प्रत्यक्ष युद्ध न हो, किंतु वैचारिक विरोध, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, आर्थिक दबाव, सैन्य तैयारी, हथियारों की होड़, प्रचार युद्ध, जासूसी गतिविधियाँ तथा विभिन्न क्षेत्रों में परोक्ष संघर्ष लगातार चलते रहें। इसमें युद्ध की संभावना बनी रहती है, किंतु प्रत्यक्ष सैन्य टकराव से बचने का प्रयास किया जाता है क्योंकि उसके परिणाम अत्यंत विनाशकारी हो सकते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ दो महाशक्तियों के रूप में उभरे। अमेरिका उदार लोकतंत्र, पूँजीवाद और मुक्त बाजार व्यवस्था का समर्थक था, जबकि सोवियत संघ समाजवाद, साम्यवाद और राज्य-नियंत्रित अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता था। यही वैचारिक विरोध शीत युद्ध का मूल आधार बना।
शीत युद्ध के उद्भव के पीछे अनेक कारण थे। सबसे प्रमुख कारण वैचारिक संघर्ष था। दोनों महाशक्तियाँ अपनी-अपनी राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था को श्रेष्ठ सिद्ध करना चाहती थीं। अमेरिका का उद्देश्य लोकतांत्रिक और पूँजीवादी व्यवस्था का विस्तार करना था, जबकि सोवियत संघ समाजवादी व्यवस्था के प्रसार को प्रोत्साहित कर रहा था। इस वैचारिक प्रतिस्पर्धा ने विश्व के अनेक देशों को प्रभावित किया और अनेक क्षेत्रीय संघर्ष महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता का माध्यम बन गए।
दूसरा महत्वपूर्ण कारण शक्ति का रिक्त स्थान था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यूरोप की पारंपरिक शक्तियाँ कमजोर हो चुकी थीं। इस परिस्थिति में अमेरिका और सोवियत संघ दोनों वैश्विक नेतृत्व स्थापित करना चाहते थे। परिणामस्वरूप विश्व दो प्रमुख शक्ति-गुटों में विभाजित हो गया। पश्चिमी गुट का नेतृत्व अमेरिका ने किया, जबकि पूर्वी गुट का नेतृत्व सोवियत संघ के हाथों में रहा।
तीसरा कारण पारस्परिक अविश्वास और सुरक्षा संबंधी चिंताएँ थीं। दोनों महाशक्तियाँ एक-दूसरे की नीतियों को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानती थीं। इस कारण सैन्य गठबंधनों का निर्माण हुआ। एक ओर उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन की स्थापना हुई, दूसरी ओर उसके उत्तर में वारसा संधि का गठन किया गया। इन गठबंधनों ने विश्व राजनीति को गुटीय प्रतिस्पर्धा की दिशा में आगे बढ़ाया।
शीत युद्ध का एक महत्वपूर्ण पक्ष हथियारों की दौड़ था। परमाणु हथियारों, लंबी दूरी की मिसाइलों, जैविक और रासायनिक हथियारों तथा अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के विकास में दोनों महाशक्तियों ने भारी संसाधन लगाए। इस प्रतिस्पर्धा का उद्देश्य केवल सैन्य श्रेष्ठता प्राप्त करना नहीं था, बल्कि प्रतिरोध की ऐसी क्षमता विकसित करना भी था जिससे विरोधी पक्ष प्रत्यक्ष आक्रमण करने का साहस न कर सके। इसी कारण परमाणु प्रतिरोध का सिद्धांत विकसित हुआ, जिसके अनुसार दोनों पक्षों के पास इतनी विनाशकारी क्षमता थी कि प्रत्यक्ष युद्ध दोनों के लिए आत्मघाती सिद्ध होता।
शीत युद्ध केवल सैन्य प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं था। यह आर्थिक सहायता, सांस्कृतिक प्रभाव, वैज्ञानिक अनुसंधान, खेल प्रतियोगिताओं, अंतरिक्ष अभियान, प्रचार माध्यमों तथा जासूसी गतिविधियों तक विस्तृत था। अनेक विकासशील देशों को आर्थिक सहायता, सैन्य सहयोग और राजनीतिक समर्थन देकर दोनों महाशक्तियाँ अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करना चाहती थीं। इस प्रकार विश्व राजनीति का लगभग प्रत्येक क्षेत्र शीत युद्ध की प्रतिस्पर्धा से प्रभावित हुआ।
शीत युद्ध के दौरान अनेक परोक्ष युद्ध हुए जिनमें महाशक्तियाँ प्रत्यक्ष रूप से नहीं लड़ीं, बल्कि विभिन्न देशों और समूहों को समर्थन प्रदान करती रहीं। इस प्रकार कोरियाई संघर्ष, वियतनाम युद्ध, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अनेक राजनीतिक संकट तथा पश्चिम एशिया के कई संघर्ष महाशक्तियों की अप्रत्यक्ष प्रतिस्पर्धा के उदाहरण माने जाते हैं। इन संघर्षों ने स्थानीय स्तर पर भारी जनहानि और आर्थिक विनाश उत्पन्न किया।
शीत युद्ध का प्रभाव केवल राजनीति तक सीमित नहीं था। इसने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास को भी गति दी। अंतरिक्ष अनुसंधान, उपग्रह प्रक्षेपण, कंप्यूटर तकनीक, संचार प्रणाली तथा रक्षा विज्ञान में उल्लेखनीय प्रगति हुई। यद्यपि इन उपलब्धियों का प्रारंभिक उद्देश्य सामरिक प्रतिस्पर्धा था, परंतु बाद में इनका उपयोग नागरिक जीवन और आर्थिक विकास में भी हुआ।
समय के साथ दोनों महाशक्तियों को यह अनुभव हुआ कि निरंतर तनाव और हथियारों की दौड़ अत्यधिक महँगी और जोखिमपूर्ण है। परमाणु युद्ध की संभावना संपूर्ण मानवता के अस्तित्व के लिए खतरा बन चुकी थी। इसी पृष्ठभूमि में देतांत अथवा तनाव-शैथिल्य की नीति विकसित हुई। देतांत का अर्थ है तनाव में कमी लाना, संवाद बढ़ाना और प्रतिस्पर्धा के बावजूद सहयोग के क्षेत्रों का विकास करना। इसका उद्देश्य वैचारिक मतभेदों को समाप्त करना नहीं था, बल्कि संघर्ष की तीव्रता को कम करके अंतरराष्ट्रीय स्थिरता बनाए रखना था।
देतांत का विकास विशेष रूप से 1960 और 1970 के दशकों में हुआ। इस अवधि में दोनों महाशक्तियों ने अनेक वार्ताएँ प्रारंभ कीं और हथियारों की सीमा निर्धारण संबंधी समझौते किए। परमाणु हथियारों की संख्या और उनके प्रसार को नियंत्रित करने के प्रयास किए गए। वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और आर्थिक सहयोग के क्षेत्र में भी संपर्क बढ़ा। दोनों पक्षों ने यह स्वीकार किया कि वैचारिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद प्रत्यक्ष युद्ध से बचना आवश्यक है।
देतांत की नीति के पीछे कई कारण थे। पहला कारण परमाणु युद्ध का बढ़ता खतरा था। दूसरा कारण हथियारों की दौड़ से उत्पन्न आर्थिक बोझ था। तीसरा कारण यह था कि विश्व के अनेक देश शांति और विकास को प्राथमिकता देना चाहते थे। चौथा कारण यह था कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वैज्ञानिक सहयोग की संभावनाएँ बढ़ रही थीं। इन सभी परिस्थितियों ने महाशक्तियों को अधिक व्यावहारिक और संतुलित दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित किया।
देतांत के परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय तनाव में कुछ कमी आई, संवाद के अवसर बढ़े और परमाणु हथियारों के नियंत्रण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास हुए। यूरोप में सुरक्षा और सहयोग को बढ़ावा मिला तथा अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अपेक्षाकृत स्थिरता दिखाई दी। किंतु यह स्थिति स्थायी नहीं रही क्योंकि वैचारिक मतभेद और सामरिक प्रतिस्पर्धा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी।
1970 के दशक के उत्तरार्ध और 1980 के दशक के प्रारंभ में अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ पुनः तनावपूर्ण होने लगीं। इसी अवधि को द्वितीय शीत युद्ध अथवा नव शीत युद्ध कहा जाता है। इस समय महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा फिर से तीव्र हो गई। रक्षा व्यय में वृद्धि हुई, नई मिसाइल प्रणालियों का विकास हुआ और अनेक क्षेत्रीय संघर्षों में दोनों पक्षों की सक्रियता बढ़ गई। इससे यह स्पष्ट हुआ कि देतांत की प्रक्रिया सीमित थी और उसके आधार पर स्थायी शांति स्थापित नहीं हो सकी।
द्वितीय शीत युद्ध के पीछे अनेक कारण थे। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बढ़ती अविश्वास की भावना, विभिन्न क्षेत्रों में प्रभाव बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा, सैन्य आधुनिकीकरण तथा नई रणनीतिक तकनीकों का विकास इसके प्रमुख कारण थे। दोनों महाशक्तियाँ पुनः शक्ति-संतुलन में अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास करने लगीं। परिणामस्वरूप वैश्विक तनाव में वृद्धि हुई और हथियारों की नई दौड़ प्रारंभ हो गई।
द्वितीय शीत युद्ध की एक विशेषता यह थी कि इसमें तकनीकी प्रतिस्पर्धा का महत्व पहले की अपेक्षा अधिक बढ़ गया। मिसाइल रक्षा प्रणाली, अंतरिक्ष आधारित सुरक्षा योजनाएँ, कंप्यूटर तकनीक और उन्नत संचार प्रणाली अंतरराष्ट्रीय शक्ति का महत्वपूर्ण आधार बन गईं। साथ ही आर्थिक प्रतिस्पर्धा और वैज्ञानिक अनुसंधान भी महाशक्तियों की रणनीति का महत्वपूर्ण भाग बन गए।
1980 के दशक के उत्तरार्ध में सोवियत संघ के भीतर आर्थिक और राजनीतिक सुधारों की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप महाशक्तियों के बीच संबंधों में सुधार आया और अंततः शीत युद्ध का समापन हुआ। सोवियत संघ के विघटन के साथ द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था समाप्त हो गई और अंतरराष्ट्रीय राजनीति ने नए युग में प्रवेश किया।
इक्कीसवीं शताब्दी में अनेक विद्वान अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, प्रौद्योगिकी संघर्ष, व्यापारिक विवाद, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, समुद्री प्रभुत्व तथा भू-राजनीतिक तनाव को नव शीत युद्ध के रूप में व्याख्यायित करते हैं। यद्यपि वर्तमान परिस्थितियाँ पारंपरिक शीत युद्ध से भिन्न हैं क्योंकि आज वैश्विक अर्थव्यवस्था अत्यधिक परस्पर निर्भर है और दोनों देशों के बीच व्यापक व्यापारिक संबंध भी विद्यमान हैं, फिर भी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, तकनीकी नियंत्रण, वैश्विक प्रभाव और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण आधुनिक विश्व में नव शीत युद्ध की चर्चा निरंतर होती रहती है। इस संदर्भ में यह समझना आवश्यक है कि वर्तमान प्रतिस्पर्धा केवल सैन्य क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अर्धचालक उद्योग, आपूर्ति शृंखलाओं, अंतरिक्ष अनुसंधान, समुद्री मार्गों तथा वैश्विक मानकों के निर्माण तक विस्तृत हो चुकी है।
शीत युद्ध के दौरान नवस्वतंत्र देशों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि वे किसी एक शक्ति-गुट का हिस्सा बनें या अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखें। इसी पृष्ठभूमि में गुटनिरपेक्ष आंदोलन का उदय हुआ। गुटनिरपेक्षता का अर्थ किसी भी महाशक्ति के सैन्य गुट का सदस्य न बनते हुए स्वतंत्र विदेश नीति अपनाना है। इसका उद्देश्य तटस्थ रहना नहीं था, बल्कि प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय प्रश्न पर स्वतंत्र रूप से निर्णय लेना और राष्ट्रीय हितों के अनुसार नीति निर्धारित करना था। गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने यह स्पष्ट किया कि विकासशील देशों को महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता का उपकरण नहीं बनना चाहिए।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन का वैचारिक आधार स्वतंत्रता, संप्रभुता, उपनिवेशवाद का विरोध, नस्लवाद का विरोध, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, आर्थिक विकास तथा विश्व शांति की स्थापना था। नवस्वतंत्र देशों ने यह अनुभव किया कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी जब वे अपनी विदेश नीति पर किसी बाहरी शक्ति का नियंत्रण स्वीकार न करें। इसलिए उन्होंने स्वतंत्र निर्णय, बहुपक्षीय सहयोग और वैश्विक न्याय की नीति अपनाने का प्रयास किया।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने विकासशील देशों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक सामूहिक पहचान प्रदान की। इसने उपनिवेशवाद के अंत, नस्लीय भेदभाव के विरोध, नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की माँग, निरस्त्रीकरण, विकास सहयोग तथा संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस आंदोलन ने यह सिद्ध किया कि छोटे और मध्यम आकार के राज्य भी सामूहिक रूप से विश्व राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं।
शीत युद्ध की समाप्ति के बाद भी गुटनिरपेक्ष आंदोलन की प्रासंगिकता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। आज वैश्विक राजनीति में बहुध्रुवीयता, आर्थिक असमानता, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, वैश्विक स्वास्थ्य, आतंकवाद तथा सतत विकास जैसी नई चुनौतियाँ सामने हैं। इन परिस्थितियों में गुटनिरपेक्ष आंदोलन की मूल भावना—स्वतंत्र विदेश नीति, रणनीतिक स्वायत्तता, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, विकासशील देशों के हितों की रक्षा तथा बहुपक्षीय सहयोग—आज भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।
समग्र रूप से शीत युद्ध, देतांत, द्वितीय शीत युद्ध, नव शीत युद्ध तथा गुटनिरपेक्ष आंदोलन आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति के ऐसे परस्पर जुड़े हुए आयाम हैं जिन्होंने विश्व व्यवस्था के विकास को गहराई से प्रभावित किया है। शीत युद्ध ने शक्ति-संतुलन, वैचारिक प्रतिस्पर्धा और वैश्विक गठबंधनों की राजनीति को जन्म दिया। देतांत ने यह सिद्ध किया कि संवाद और सहयोग के माध्यम से तनाव कम किया जा सकता है। द्वितीय शीत युद्ध ने यह स्पष्ट किया कि यदि मूलभूत अविश्वास बना रहे तो तनाव पुनः उभर सकता है। समकालीन नव शीत युद्ध की चर्चा यह दर्शाती है कि बदलती तकनीकी, आर्थिक और भू-राजनीतिक परिस्थितियों में प्रतिस्पर्धा नए रूप धारण कर सकती है। दूसरी ओर गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने यह स्थापित किया कि विकासशील देश अपनी स्वतंत्र विदेश नीति, रणनीतिक स्वायत्तता और बहुपक्षीय सहयोग के आधार पर विश्व राजनीति में रचनात्मक एवं प्रभावशाली भूमिका निभा सकते हैं। इन सभी अवधारणाओं का समग्र अध्ययन यह समझने के लिए अत्यंत आवश्यक है कि आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल शक्ति-संघर्ष का क्षेत्र नहीं, बल्कि सहयोग, संवाद, संतुलन, स्वतंत्रता, विकास और वैश्विक उत्तरदायित्व की निरंतर विकसित होती प्रक्रिया भी है।
