Unit – 4
Judicial System – Supreme Court, Judicial Review, Judicial Activism.
न्यायिक व्यवस्था – सर्वोच्च न्यायालय, न्यायिक पुनर्विलोकन तथा न्यायिक सक्रियता।
भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायपालिका का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण, स्वतंत्र तथा गरिमामय है। लोकतंत्र केवल चुनावों और जनप्रतिनिधियों तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसकी सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने वाली, संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखने वाली तथा शासन के विभिन्न अंगों के बीच संतुलन स्थापित करने वाली एक निष्पक्ष और स्वतंत्र न्यायिक व्यवस्था विद्यमान हो। भारतीय संविधान ने न्यायपालिका को ऐसी ही भूमिका प्रदान की है। न्यायपालिका केवल विवादों का निपटारा करने वाली संस्था नहीं है, बल्कि वह संविधान की संरक्षक, मौलिक अधिकारों की रक्षक, विधि के शासन की संरक्षक तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की संरक्षिका भी है। भारतीय न्यायिक व्यवस्था की केंद्रीय संस्था सर्वोच्च न्यायालय है, जिसे संविधान का अंतिम व्याख्याकार माना गया है। न्यायिक पुनर्विलोकन और न्यायिक सक्रियता जैसी अवधारणाओं ने न्यायपालिका की भूमिका को और अधिक व्यापक तथा प्रभावशाली बनाया है। इन तीनों आयामों—सर्वोच्च न्यायालय, न्यायिक पुनर्विलोकन और न्यायिक सक्रियता—को समझे बिना भारतीय संवैधानिक व्यवस्था की पूर्ण व्याख्या संभव नहीं है।
भारतीय न्यायिक व्यवस्था की संरचना एकीकृत स्वरूप की है। संघीय शासन व्यवस्था होने के बावजूद भारत में संघ और राज्यों के लिए अलग-अलग न्यायिक प्रणालियाँ स्थापित नहीं की गई हैं। सर्वोच्च न्यायालय इस व्यवस्था का सर्वोच्च स्तर है, जिसके अधीन उच्च न्यायालय तथा उनके अधीन अधीनस्थ न्यायालय कार्य करते हैं। इस प्रकार समस्त देश में न्याय का एक समान ढाँचा विकसित किया गया है, जिससे विधि की एकरूपता तथा न्यायिक निर्णयों में समन्वय बना रहता है। इस व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य नागरिकों को निष्पक्ष, समान और प्रभावी न्याय उपलब्ध कराना तथा संविधान की सर्वोच्चता सुनिश्चित करना है।
भारतीय संविधान ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को विशेष महत्व दिया है। लोकतंत्र में न्यायपालिका तभी प्रभावी हो सकती है जब वह कार्यपालिका और विधायिका के अनुचित प्रभाव से मुक्त रहकर निर्णय लेने में सक्षम हो। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए संविधान में अनेक सुरक्षा उपाय किए गए हैं। न्यायाधीशों की नियुक्ति, कार्यकाल, वेतन, सेवा-शर्तें तथा पद से हटाने की प्रक्रिया इस प्रकार निर्धारित की गई है कि वे अपने न्यायिक कर्तव्यों का निर्वहन स्वतंत्र रूप से कर सकें। न्यायपालिका की स्वतंत्रता का उद्देश्य किसी विशेष संस्था को विशेषाधिकार प्रदान करना नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों और संविधान की रक्षा सुनिश्चित करना है।
भारतीय सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना संविधान के लागू होने के साथ 26 जनवरी 1950 को हुई। इससे पूर्व संघीय न्यायालय तथा प्रिवी काउंसिल भारत की सर्वोच्च न्यायिक संस्थाएँ थीं। संविधान लागू होने के पश्चात सर्वोच्च न्यायालय भारत का सर्वोच्च न्यायिक प्राधिकरण बन गया। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है। सर्वोच्च न्यायालय केवल अंतिम अपीलीय न्यायालय ही नहीं, बल्कि संविधान की अंतिम व्याख्या करने वाला तथा संघीय विवादों का समाधान करने वाला सर्वोच्च संवैधानिक न्यायालय भी है।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। समय के साथ न्यायिक स्वतंत्रता को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में न्यायपालिका की प्रमुख भूमिका विकसित हुई। न्यायाधीशों का कार्यकाल निश्चित आयु तक होता है तथा उन्हें केवल संविधान द्वारा निर्धारित विशेष प्रक्रिया के माध्यम से ही पद से हटाया जा सकता है। यह व्यवस्था न्यायपालिका की निष्पक्षता और स्वतंत्रता की रक्षा करती है।
सर्वोच्च न्यायालय की अधिकारिता अत्यंत व्यापक है। इसकी प्रारंभिक अधिकारिता के अंतर्गत संघ और राज्यों अथवा राज्यों के बीच उत्पन्न संवैधानिक विवादों का निपटारा किया जाता है। यह व्यवस्था भारतीय संघवाद की स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है क्योंकि संघीय शासन में केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों के विभाजन को लेकर समय-समय पर विवाद उत्पन्न हो सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय इन विवादों का निष्पक्ष समाधान प्रदान करता है।
सर्वोच्च न्यायालय की अपीलीय अधिकारिता भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध निर्धारित परिस्थितियों में सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। दीवानी, फौजदारी तथा संवैधानिक मामलों में यह अंतिम अपीलीय न्यायालय के रूप में कार्य करता है। इसके निर्णय समस्त न्यायालयों पर बाध्यकारी होते हैं, जिससे देशभर में विधि की एकरूपता बनी रहती है।
संविधान ने सर्वोच्च न्यायालय को परामर्श संबंधी अधिकारिता भी प्रदान की है। यदि किसी महत्वपूर्ण विधिक अथवा संवैधानिक प्रश्न पर राष्ट्रपति को न्यायिक परामर्श की आवश्यकता हो, तो वह सर्वोच्च न्यायालय से राय प्राप्त कर सकते हैं। यद्यपि यह राय सामान्यतः सलाहकारी होती है, फिर भी इसका अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक महत्व होता है क्योंकि इससे जटिल संवैधानिक प्रश्नों पर न्यायिक दृष्टिकोण स्पष्ट होता है।
मौलिक अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च न्यायालय का सबसे महत्वपूर्ण दायित्व है। यदि किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो वह सीधे सर्वोच्च न्यायालय की शरण ले सकता है। न्यायालय विभिन्न प्रकार की संवैधानिक रिट जारी करके नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार केवल सैद्धांतिक न रह जाएँ, बल्कि उनका वास्तविक संरक्षण भी हो।
सर्वोच्च न्यायालय संविधान का अंतिम व्याख्याकार है। संविधान के किसी प्रावधान के अर्थ, सीमा अथवा प्रयोजन को लेकर यदि विवाद उत्पन्न होता है, तो सर्वोच्च न्यायालय उसकी अंतिम व्याख्या करता है। यह अधिकार संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखने तथा शासन के विभिन्न अंगों के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है। न्यायालय की संवैधानिक व्याख्या के आधार पर ही अनेक महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत विकसित हुए हैं।
भारतीय न्यायपालिका की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में न्यायिक पुनर्विलोकन का सिद्धांत प्रमुख है। न्यायिक पुनर्विलोकन का अर्थ है कि न्यायालयों को यह अधिकार प्राप्त है कि वे विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों तथा कार्यपालिका द्वारा किए गए कार्यों की संविधान के संदर्भ में समीक्षा करें और यदि वे संविधान के विपरीत पाए जाएँ तो उन्हें असंवैधानिक घोषित कर दें। यह सिद्धांत संविधान की सर्वोच्चता तथा विधि के शासन का मूल आधार है।
न्यायिक पुनर्विलोकन का उद्देश्य विधायिका अथवा कार्यपालिका की शक्तियों को सीमित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि शासन के सभी अंग संविधान की सीमाओं के भीतर कार्य करें। लोकतंत्र में बहुमत की सरकार को शासन का अधिकार अवश्य प्राप्त होता है, किंतु उसे संविधान के मूल सिद्धांतों और नागरिकों के मौलिक अधिकारों का सम्मान करना अनिवार्य है। न्यायिक पुनर्विलोकन इसी संतुलन को बनाए रखने का प्रभावी माध्यम है।
भारतीय संविधान में न्यायिक पुनर्विलोकन का आधार अनेक संवैधानिक प्रावधानों में निहित है। मौलिक अधिकारों की सुरक्षा, संवैधानिक उपचार का अधिकार, सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों की अधिकारिता और संविधान की सर्वोच्चता संबंधी व्यवस्थाएँ न्यायिक पुनर्विलोकन को प्रभावी बनाती हैं। समय के साथ सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णयों के माध्यम से इस सिद्धांत को और अधिक विकसित किया है।
न्यायिक पुनर्विलोकन के माध्यम से न्यायालय यह सुनिश्चित करता है कि संसद और राज्य विधानमंडल संविधान की सीमाओं का उल्लंघन न करें। यदि कोई कानून मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण करता है अथवा संविधान की मूल भावना के विपरीत होता है, तो न्यायालय उसे निरस्त कर सकता है। इसी प्रकार यदि कार्यपालिका कोई ऐसा निर्णय लेती है जो विधि के विपरीत अथवा मनमाना हो, तो न्यायालय उसे भी असंवैधानिक घोषित कर सकता है।
भारतीय न्यायिक व्यवस्था में मूल संरचना सिद्धांत का विकास न्यायिक पुनर्विलोकन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में माना जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार संसद को संविधान संशोधन का व्यापक अधिकार अवश्य प्राप्त है, किंतु वह संविधान की मूल संरचना या आधारभूत विशेषताओं को नष्ट नहीं कर सकती। लोकतंत्र, गणतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, विधि का शासन, संघीय व्यवस्था तथा मौलिक अधिकारों की मूल भावना जैसी विशेषताओं को संविधान की आधारभूत संरचना माना गया है। इस सिद्धांत ने संविधान की स्थिरता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
न्यायिक पुनर्विलोकन की अनेक विशेषताएँ हैं। यह संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखता है, नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है, शासन के विभिन्न अंगों के बीच शक्ति-संतुलन स्थापित करता है तथा मनमानी और असंवैधानिक कार्यवाहियों पर नियंत्रण रखता है। इसके कारण लोकतांत्रिक शासन अधिक उत्तरदायी तथा संवैधानिक मर्यादाओं के अनुरूप बना रहता है।
इसके साथ ही न्यायिक पुनर्विलोकन की आलोचना भी की जाती है। कुछ विद्वानों का मत है कि अत्यधिक न्यायिक हस्तक्षेप लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित संस्थाओं की भूमिका को सीमित कर सकता है। कुछ आलोचक इसे न्यायिक सर्वोच्चता की ओर बढ़ता हुआ कदम मानते हैं। किंतु इसके समर्थकों का मत है कि यदि न्यायपालिका के पास यह शक्ति न हो, तो संविधान की सर्वोच्चता तथा नागरिक अधिकारों की प्रभावी रक्षा संभव नहीं होगी।
भारतीय न्यायपालिका की भूमिका समय के साथ और अधिक सक्रिय हुई है। इसी विकास को न्यायिक सक्रियता कहा जाता है। न्यायिक सक्रियता का अर्थ है कि न्यायालय केवल परंपरागत विवादों का निपटारा करने तक सीमित न रहकर सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, पर्यावरण संरक्षण, प्रशासनिक उत्तरदायित्व तथा जनहित से संबंधित प्रश्नों पर सक्रिय भूमिका निभाए। न्यायिक सक्रियता का विकास विशेष रूप से उस समय हुआ जब अनेक मामलों में शासन के अन्य अंग अपने संवैधानिक दायित्वों का प्रभावी ढंग से निर्वहन नहीं कर पाए।
न्यायिक सक्रियता का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष जनहित याचिका की व्यवस्था है। इसके माध्यम से कोई भी व्यक्ति अथवा संस्था ऐसे मामलों में न्यायालय का ध्यान आकर्षित कर सकती है जो व्यापक जनहित से संबंधित हों, भले ही वह स्वयं प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित न हो। इस व्यवस्था ने न्याय को समाज के कमजोर, निर्धन तथा वंचित वर्गों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
न्यायिक सक्रियता के माध्यम से न्यायपालिका ने पर्यावरण संरक्षण, बाल श्रम, बंधुआ मजदूरी, कारागार सुधार, महिला अधिकार, श्रमिक अधिकार, प्रदूषण नियंत्रण, शिक्षा के अधिकार, खाद्य सुरक्षा, पारदर्शिता तथा सुशासन जैसे अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। इससे यह स्पष्ट हुआ कि न्यायपालिका केवल विधिक विवादों का समाधान करने वाली संस्था नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की संवैधानिक संरक्षिका भी है।
न्यायिक सक्रियता ने प्रशासनिक उत्तरदायित्व को भी मजबूत किया है। अनेक अवसरों पर न्यायालयों ने प्रशासनिक निष्क्रियता, भ्रष्टाचार तथा अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में प्रभावी हस्तक्षेप करके शासन को संवैधानिक दायित्वों का पालन करने के लिए प्रेरित किया है। इससे नागरिकों का न्यायपालिका पर विश्वास बढ़ा तथा लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को सुदृढ़ आधार प्राप्त हुआ।
यद्यपि न्यायिक सक्रियता के अनेक सकारात्मक परिणाम हुए हैं, फिर भी इसकी सीमाओं पर भी विचार किया जाता है। कुछ विद्वानों का मत है कि न्यायपालिका को नीति-निर्माण अथवा प्रशासनिक निर्णयों में अत्यधिक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए क्योंकि यह कार्य मुख्यतः विधायिका और कार्यपालिका का है। यदि न्यायालय इन क्षेत्रों में अत्यधिक सक्रिय हो जाएँ, तो शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत प्रभावित हो सकता है। दूसरी ओर न्यायिक सक्रियता के समर्थकों का मत है कि जब शासन के अन्य अंग अपने संवैधानिक दायित्वों का पालन करने में असफल हों, तब न्यायपालिका का हस्तक्षेप लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए आवश्यक हो जाता है।
न्यायिक सक्रियता और न्यायिक संयम के बीच संतुलन स्थापित करना आधुनिक संवैधानिक शासन की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। न्यायपालिका को संविधान की रक्षा करते हुए अपने अधिकारों का प्रयोग इस प्रकार करना चाहिए कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच सहयोग और संतुलन बना रहे। इसी संतुलित दृष्टिकोण से न्यायपालिका लोकतंत्र को मजबूत बना सकती है।
समकालीन भारत में न्यायपालिका के समक्ष अनेक नई चुनौतियाँ भी उपस्थित हैं। लंबित मुकदमों की बढ़ती संख्या, न्याय प्राप्त करने में विलंब, न्याय तक समान पहुँच, तकनीकी परिवर्तन, साइबर अपराध, डिजिटल गोपनीयता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, पर्यावरणीय संकट, आर्थिक अपराध तथा अंतरराष्ट्रीय विधिक प्रश्न न्यायिक व्यवस्था के सामने नई परिस्थितियाँ उत्पन्न कर रहे हैं। इन चुनौतियों का समाधान न्यायिक सुधार, आधुनिक तकनीक के उपयोग, न्यायालयों की क्षमता वृद्धि तथा वैकल्पिक विवाद निपटान प्रणालियों के विकास के माध्यम से किया जा रहा है।
भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर अनेक महत्वपूर्ण निर्णयों के माध्यम से लोकतंत्र, मानव गरिमा, सामाजिक न्याय, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, निजता के अधिकार, पर्यावरण संरक्षण, लैंगिक समानता तथा संवैधानिक शासन को नई दिशा प्रदान की है। इन निर्णयों ने यह स्पष्ट किया है कि संविधान एक जीवंत दस्तावेज़ है जिसकी व्याख्या बदलती सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप की जाती है ताकि नागरिकों के अधिकारों की प्रभावी रक्षा हो सके।
समग्र रूप से भारतीय न्यायिक व्यवस्था लोकतांत्रिक शासन की आधारभूत संस्था है। सर्वोच्च न्यायालय संविधान का संरक्षक, नागरिक अधिकारों का रक्षक तथा संघीय संतुलन का संरक्षक है। न्यायिक पुनर्विलोकन संविधान की सर्वोच्चता और विधि के शासन को प्रभावी बनाता है, जबकि न्यायिक सक्रियता न्यायपालिका को सामाजिक न्याय, जनहित और प्रशासनिक उत्तरदायित्व के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर प्रदान करती है। इन तीनों अवधारणाओं का समन्वित स्वरूप भारतीय लोकतंत्र को स्थिरता, वैधता, न्याय तथा संवैधानिक संतुलन प्रदान करता है। यही कारण है कि भारतीय न्यायपालिका केवल न्याय प्रदान करने वाली संस्था नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा, लोकतांत्रिक मूल्यों की संरक्षिका तथा सामाजिक परिवर्तन की एक महत्वपूर्ण संवैधानिक शक्ति के रूप में स्थापित है।
