Paper 1 – Indian Foreign Policy

भारतीय विदेश नीति

भारतीय विदेश नीति स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता, आर्थिक विकास, अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा तथा वैश्विक सहयोग की आधारशिला है। किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति उसके राष्ट्रीय हितों, ऐतिहासिक अनुभवों, भौगोलिक स्थिति, सांस्कृतिक विरासत, आर्थिक आवश्यकताओं, सुरक्षा संबंधी चुनौतियों तथा अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन के आधार पर निर्मित होती है। भारत की विदेश नीति भी इन सभी तत्वों के समन्वित प्रभाव का परिणाम है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के समक्ष एक ओर विभाजन की त्रासदी, सीमाई असुरक्षा, आर्थिक पिछड़ापन और विकास की चुनौतियाँ थीं, तो दूसरी ओर शीत युद्ध की द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था, उपनिवेशवाद का अंत, नवस्वतंत्र राष्ट्रों का उदय तथा वैश्विक शक्ति-संघर्ष जैसी जटिल परिस्थितियाँ भी उपस्थित थीं। इन परिस्थितियों में भारत ने ऐसी विदेश नीति विकसित करने का प्रयास किया जो राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के साथ-साथ विश्व शांति, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, उपनिवेशवाद के विरोध, नस्लवाद के उन्मूलन तथा विकासशील देशों के हितों को भी प्रोत्साहित कर सके। यही कारण है कि भारतीय विदेश नीति को आदर्शवाद और यथार्थवाद के संतुलित समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।

भारतीय विदेश नीति की वैचारिक पृष्ठभूमि भारतीय सभ्यता की प्राचीन परंपराओं में निहित है। भारतीय संस्कृति ने सदैव “वसुधैव कुटुम्बकम्”, “सर्वे भवन्तु सुखिनः” तथा शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व जैसी मान्यताओं पर बल दिया। बौद्ध, जैन और वैदिक परंपराओं ने अहिंसा, सहिष्णुता, संवाद और नैतिक आचरण को महत्व दिया। आधुनिक काल में महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा और नैतिक राजनीति के सिद्धांतों तथा जवाहरलाल नेहरू के अंतरराष्ट्रीयतावाद, उपनिवेशवाद-विरोध और गुटनिरपेक्ष दृष्टिकोण ने स्वतंत्र भारत की विदेश नीति को महत्वपूर्ण वैचारिक आधार प्रदान किया। इसके साथ-साथ कौटिल्य के यथार्थवादी कूटनीतिक सिद्धांत, राष्ट्रीय सुरक्षा और शक्ति संतुलन संबंधी विचार भी भारतीय विदेश नीति की व्यावहारिक सोच में परोक्ष रूप से परिलक्षित होते हैं।

भारतीय विदेश नीति का प्रमुख उद्देश्य राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करना है। प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्र के लिए अपनी सीमाओं, राजनीतिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होती है। भारत ने स्वतंत्रता के बाद अनेक बाहरी चुनौतियों का सामना किया, जिनमें सीमाई विवाद, युद्ध, आतंकवाद तथा सामरिक प्रतिस्पर्धा प्रमुख रहे हैं। इन परिस्थितियों में विदेश नीति का मूल लक्ष्य भारत की सुरक्षा को सुदृढ़ बनाना तथा राष्ट्रीय हितों की प्रभावी रक्षा करना रहा है।

भारतीय विदेश नीति का दूसरा प्रमुख उद्देश्य आर्थिक विकास के लिए अनुकूल अंतरराष्ट्रीय वातावरण तैयार करना है। स्वतंत्रता के समय भारत एक कृषि प्रधान, सीमित औद्योगिक क्षमता वाला तथा संसाधनों की कमी से जूझता हुआ देश था। आर्थिक विकास के लिए विदेशी निवेश, तकनीकी सहयोग, व्यापारिक संबंध, ऊर्जा सुरक्षा तथा वैज्ञानिक प्रगति आवश्यक थे। समय के साथ भारतीय विदेश नीति ने आर्थिक कूटनीति को विशेष महत्व दिया। वैश्वीकरण, उदारीकरण और मुक्त व्यापार के युग में विदेश नीति केवल राजनीतिक संबंधों तक सीमित नहीं रही, बल्कि व्यापार, निवेश, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन तथा डिजिटल सहयोग जैसे क्षेत्रों तक विस्तृत हो गई।

विश्व शांति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग भारतीय विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण आधार रहा है। भारत ने सदैव विवादों के शांतिपूर्ण समाधान, संवाद, पंचनिर्णय तथा अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान पर बल दिया है। भारत का मानना रहा है कि युद्ध मानवता के लिए विनाशकारी होता है और स्थायी शांति केवल सहयोग, विश्वास तथा न्यायपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से ही स्थापित की जा सकती है। इसी कारण भारत ने संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों का समर्थन किया तथा अनेक अंतरराष्ट्रीय शांति अभियानों में सक्रिय भागीदारी निभाई।

भारतीय विदेश नीति का एक अन्य महत्वपूर्ण उद्देश्य उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद तथा नस्लीय भेदभाव का विरोध रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने एशिया और अफ्रीका के नवस्वतंत्र देशों के स्वतंत्रता आंदोलनों का समर्थन किया तथा दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की नीति का निरंतर विरोध किया। भारत का विश्वास रहा कि सभी राष्ट्र समान संप्रभुता और सम्मान के अधिकारी हैं तथा किसी भी प्रकार का औपनिवेशिक या नस्लीय शोषण अंतरराष्ट्रीय न्याय के विरुद्ध है।

भारतीय विदेश नीति के मूल सिद्धांतों में पंचशील का विशेष स्थान है। पंचशील के सिद्धांतों में एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान, परस्पर आक्रमण न करना, आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना, समानता और पारस्परिक लाभ तथा शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व सम्मिलित हैं। इन सिद्धांतों का उद्देश्य राष्ट्रों के बीच विश्वास, सहयोग और स्थिरता स्थापित करना था। यद्यपि व्यवहार में अनेक चुनौतियाँ सामने आईं, फिर भी पंचशील आज भी भारत की कूटनीतिक सोच का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।

गुटनिरपेक्षता स्वतंत्र भारत की विदेश नीति की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में रही। शीत युद्ध के दौरान विश्व दो प्रमुख शक्ति गुटों में विभाजित था। भारत ने किसी भी सैन्य गुट में शामिल होने के बजाय स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने का निर्णय लिया। गुटनिरपेक्षता का अर्थ तटस्थता या निष्क्रियता नहीं था, बल्कि प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय प्रश्न पर स्वतंत्र रूप से राष्ट्रीय हितों और नैतिक मूल्यों के आधार पर निर्णय लेना था। इस नीति ने भारत को विकासशील देशों के नेतृत्व की भूमिका प्रदान की तथा उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को बढ़ाया।

भारतीय विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण आधार रणनीतिक स्वायत्तता भी है। बदलते वैश्विक परिवेश में भारत ने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि वह किसी एक महाशक्ति पर पूर्ण निर्भर न रहे, बल्कि विभिन्न देशों के साथ संतुलित और बहुआयामी संबंध स्थापित करे। इसी कारण भारत ने समय-समय पर विभिन्न देशों के साथ रक्षा, व्यापार, विज्ञान, ऊर्जा, अंतरिक्ष, डिजिटल प्रौद्योगिकी तथा समुद्री सुरक्षा के क्षेत्रों में सहयोग विकसित किया, किंतु अपनी स्वतंत्र निर्णय-निर्माण क्षमता को बनाए रखा।

भारतीय विदेश नीति के निर्माण में अनेक कारकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भारत की भौगोलिक स्थिति एशिया के केंद्र में है और इसकी सीमाएँ अनेक देशों से मिलती हैं। विशाल समुद्री तट, हिंद महासागर में रणनीतिक स्थिति, हिमालयी सीमाएँ तथा दक्षिण एशिया में केंद्रीय स्थान भारत की विदेश नीति को विशेष महत्व प्रदान करते हैं। भौगोलिक परिस्थितियाँ भारत की सुरक्षा, व्यापार, समुद्री नीति तथा पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं।

भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत भी विदेश नीति का महत्वपूर्ण आधार है। भारत का एशिया, अफ्रीका तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक देशों के साथ प्राचीन सांस्कृतिक, धार्मिक और व्यापारिक संबंध रहे हैं। बौद्ध धर्म, भारतीय दर्शन, योग, आयुर्वेद तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने भारत की सॉफ्ट पावर को सुदृढ़ बनाया है। वर्तमान समय में सांस्कृतिक कूटनीति भारतीय विदेश नीति का प्रभावशाली माध्यम बन चुकी है।

आर्थिक हित विदेश नीति के प्रमुख निर्धारकों में सम्मिलित हैं। ऊर्जा सुरक्षा, विदेशी निवेश, निर्यात, आयात, तकनीकी सहयोग, समुद्री व्यापार मार्ग तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भागीदारी भारतीय विदेश नीति की प्राथमिकताओं में शामिल हैं। भारत ने बहुपक्षीय आर्थिक संगठनों तथा क्षेत्रीय सहयोग व्यवस्थाओं में सक्रिय भूमिका निभाकर अपने आर्थिक हितों को सुदृढ़ करने का प्रयास किया है।

राष्ट्रीय सुरक्षा विदेश नीति का अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष है। सीमाई विवाद, सीमा पार आतंकवाद, समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष सुरक्षा तथा सामरिक प्रतिस्पर्धा ने भारत को अपनी सुरक्षा नीति और विदेश नीति के बीच घनिष्ठ समन्वय स्थापित करने के लिए प्रेरित किया है। रक्षा सहयोग, सामरिक साझेदारी, आधुनिक सैन्य तकनीक तथा समुद्री सहयोग वर्तमान भारतीय विदेश नीति के महत्वपूर्ण आयाम बन चुके हैं।

भारतीय विदेश नीति के निर्माण और संचालन में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद, विदेश मंत्रालय, राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र, संसद तथा विभिन्न विशेषज्ञ संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। राष्ट्रपति संवैधानिक रूप से भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि प्रधानमंत्री विदेश नीति के प्रमुख निर्माता और प्रवक्ता होते हैं। विदेश मंत्रालय कूटनीतिक संबंधों, दूतावासों, अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं तथा विदेश नीति के क्रियान्वयन का प्रमुख प्रशासनिक केंद्र है। संसद विदेश नीति पर चर्चा, समीक्षा तथा लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने का कार्य करती है।

स्वतंत्रता के बाद भारतीय विदेश नीति विभिन्न चरणों से गुजरी है। प्रारंभिक वर्षों में गुटनिरपेक्षता, उपनिवेशवाद-विरोध, एशियाई एकता तथा विश्व शांति पर विशेष बल दिया गया। बाद के वर्षों में राष्ट्रीय सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता, आर्थिक विकास तथा तकनीकी सहयोग को अधिक महत्व मिला। आर्थिक उदारीकरण के पश्चात विदेश नीति में व्यापार, निवेश, वैश्विक आर्थिक साझेदारी तथा प्रौद्योगिकी सहयोग प्रमुख तत्व बन गए। इक्कीसवीं शताब्दी में भारत ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र, समुद्री सुरक्षा, डिजिटल सहयोग, जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद विरोध, ऊर्जा सुरक्षा तथा वैश्विक शासन सुधार जैसे विषयों पर सक्रिय भूमिका अपनाई है।

भारत ने अपने पड़ोसी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध विकसित करने का निरंतर प्रयास किया है। पड़ोसी देशों के साथ सहयोग, संपर्क, व्यापार, ऊर्जा साझेदारी, सीमा प्रबंधन तथा विकास सहयोग भारतीय विदेश नीति की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल रहे हैं। साथ ही भारत ने क्षेत्रीय संगठनों के माध्यम से दक्षिण एशिया में आर्थिक सहयोग, संपर्क तथा स्थिरता को बढ़ावा देने का प्रयास किया है।

भारत की विदेश नीति में प्रमुख वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने पर भी विशेष बल दिया गया है। भारत ने विभिन्न देशों के साथ रक्षा, विज्ञान, अंतरिक्ष, शिक्षा, व्यापार, ऊर्जा तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में बहुआयामी सहयोग विकसित किया है। इस संतुलित नीति का उद्देश्य राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना है।

संयुक्त राष्ट्र के प्रति भारत का दृष्टिकोण सदैव सकारात्मक रहा है। भारत संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों, अंतरराष्ट्रीय कानून, शांति स्थापना, सतत विकास, मानवाधिकार तथा वैश्विक सहयोग का समर्थक रहा है। भारत ने अनेक शांति अभियानों में सक्रिय योगदान दिया है तथा वैश्विक शासन संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता पर भी बल दिया है ताकि विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व अधिक प्रभावी हो सके।

भारतीय विदेश नीति में प्रवासी भारतीयों का महत्व भी निरंतर बढ़ा है। विश्व के विभिन्न देशों में बसे भारतीय मूल के लोग आर्थिक, तकनीकी, सांस्कृतिक तथा कूटनीतिक दृष्टि से भारत की महत्वपूर्ण शक्ति बन चुके हैं। विदेश नीति के माध्यम से उनके हितों की रक्षा, सांस्कृतिक संबंधों का सुदृढ़ीकरण तथा निवेश और ज्ञान के आदान-प्रदान को प्रोत्साहित किया जाता है।

वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में भारतीय विदेश नीति नई चुनौतियों और अवसरों दोनों का सामना कर रही है। जलवायु परिवर्तन, महामारी, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ऊर्जा संकट, वैश्विक आर्थिक अस्थिरता, समुद्री सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद तथा बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था जैसे विषय विदेश नीति के नए आयाम बन चुके हैं। भारत इन चुनौतियों का समाधान बहुपक्षीय सहयोग, तकनीकी नवाचार, रणनीतिक साझेदारी तथा सतत विकास के माध्यम से खोजने का प्रयास कर रहा है।

भारतीय विदेश नीति की अनेक उपलब्धियाँ रही हैं। भारत आज विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सम्मिलित है, उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा निरंतर बढ़ी है, वैज्ञानिक एवं तकनीकी क्षमता का विस्तार हुआ है, अंतरिक्ष, सूचना प्रौद्योगिकी, औषधि निर्माण तथा डिजिटल नवाचार के क्षेत्र में भारत ने वैश्विक पहचान बनाई है। साथ ही भारत ने वैश्विक दक्षिण के देशों की आवाज़ को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।

इसके साथ ही भारतीय विदेश नीति के समक्ष कुछ चुनौतियाँ भी बनी हुई हैं। सीमाई विवाद, आतंकवाद, समुद्री प्रतिस्पर्धा, वैश्विक शक्ति-संतुलन में परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक प्रतिस्पर्धा तथा नई प्रौद्योगिकियों से जुड़ी चुनौतियाँ विदेश नीति को निरंतर जटिल बनाती हैं। इन परिस्थितियों में भारत को आदर्शवाद और यथार्थवाद के बीच संतुलन बनाए रखते हुए राष्ट्रीय हितों की रक्षा करनी होती है।

समग्र रूप से देखा जाए तो भारतीय विदेश नीति एक गतिशील, संतुलित, व्यावहारिक तथा मूल्य-आधारित नीति है, जिसका उद्देश्य केवल अंतरराष्ट्रीय संबंधों का संचालन करना नहीं, बल्कि भारत की संप्रभुता, सुरक्षा, आर्थिक समृद्धि, वैश्विक प्रतिष्ठा तथा विश्व शांति को एक साथ आगे बढ़ाना है। यह नीति भारतीय सभ्यता के नैतिक आदर्शों, संवैधानिक मूल्यों, लोकतांत्रिक परंपराओं तथा समकालीन अंतरराष्ट्रीय यथार्थ का समन्वित रूप प्रस्तुत करती है। बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप भारतीय विदेश नीति निरंतर विकसित हो रही है और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के साथ-साथ अधिक न्यायपूर्ण, सहयोगात्मक तथा बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के निर्माण में रचनात्मक योगदान देने का प्रयास कर रही है।

Unit – 1

Indian National Congress and International Issues.

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्दे।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्दों का संबंध केवल भारत के स्वतंत्रता आंदोलन तक सीमित नहीं था, बल्कि यह आधुनिक भारत की विदेश नीति, अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण तथा वैश्विक न्याय संबंधी चिंतन की आधारशिला भी बना। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने प्रारंभिक चरण से ही यह समझ लिया था कि भारत की स्वतंत्रता केवल एक राष्ट्रीय प्रश्न नहीं है, बल्कि यह विश्व राजनीति, साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, नस्लवाद, मानवाधिकार तथा अंतरराष्ट्रीय न्याय से जुड़ा हुआ विषय है। इसी कारण कांग्रेस ने समय के साथ अपने राजनीतिक कार्यक्रम का विस्तार करते हुए अंतरराष्ट्रीय घटनाओं, वैश्विक शक्ति-संतुलन, विश्व युद्धों, उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलनों तथा विश्व शांति जैसे विषयों पर स्पष्ट और सुसंगत दृष्टिकोण विकसित किया। यही दृष्टिकोण आगे चलकर स्वतंत्र भारत की विदेश नीति के मूल सिद्धांतों का आधार बना।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में उस समय हुई जब विश्व में यूरोपीय साम्राज्यवाद अपने चरम पर था। एशिया और अफ्रीका के अधिकांश देश विदेशी शासन के अधीन थे तथा औपनिवेशिक शक्तियाँ आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य विस्तार की नीति का अनुसरण कर रही थीं। प्रारंभिक वर्षों में कांग्रेस का मुख्य उद्देश्य भारतीयों को प्रशासन में अधिक भागीदारी दिलाना और संवैधानिक सुधारों की माँग करना था, किंतु धीरे-धीरे कांग्रेस के नेताओं ने यह अनुभव किया कि भारत की राजनीतिक स्थिति विश्व साम्राज्यवादी व्यवस्था से गहराई से जुड़ी हुई है। इस समझ ने कांग्रेस को अंतरराष्ट्रीय विषयों पर विचार करने के लिए प्रेरित किया।

कांग्रेस के प्रारंभिक नेताओं का मानना था कि भारत के हितों की रक्षा तभी संभव है जब ब्रिटिश साम्राज्य की औपनिवेशिक नीतियों की आलोचना की जाए और विश्व के अन्य उपनिवेशित देशों के संघर्षों को समझा जाए। उन्होंने यह तर्क दिया कि भारत की आर्थिक दरिद्रता, औद्योगिक पिछड़ापन तथा राजनीतिक अधीनता केवल आंतरिक कारणों का परिणाम नहीं है, बल्कि साम्राज्यवादी शोषण की व्यापक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का हिस्सा है। इस प्रकार कांग्रेस ने राष्ट्रीय आंदोलन को वैश्विक औपनिवेशिक व्यवस्था के संदर्भ में समझना प्रारंभ किया।

बीसवीं शताब्दी के आरंभ में विश्व राजनीति में तीव्र परिवर्तन होने लगे। जापान की रूस पर विजय, चीन में राजनीतिक परिवर्तन, तुर्की में सुधार आंदोलन तथा एशिया और अफ्रीका में राष्ट्रीय चेतना के विकास ने भारतीय नेताओं को गहराई से प्रभावित किया। कांग्रेस ने इन घटनाओं को इस दृष्टि से देखा कि एशियाई और अफ्रीकी समाज भी स्वतंत्रता तथा आत्मनिर्णय के अधिकार के लिए संघर्ष कर सकते हैं। इससे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में आत्मविश्वास तथा अंतरराष्ट्रीय दृष्टि दोनों का विस्तार हुआ।

प्रथम विश्व युद्ध ने कांग्रेस की अंतरराष्ट्रीय सोच को नया आयाम प्रदान किया। युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने लोकतंत्र, स्वतंत्रता और न्याय की रक्षा का दावा किया, किंतु भारत सहित अनेक उपनिवेशों को राजनीतिक अधिकार देने से इंकार किया। कांग्रेस के नेताओं ने इस विरोधाभास को उजागर किया और कहा कि यदि लोकतंत्र तथा आत्मनिर्णय के सिद्धांत वास्तव में सार्वभौमिक हैं, तो उनका लाभ भारत सहित सभी उपनिवेशों को मिलना चाहिए। अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा आत्मनिर्णय के सिद्धांत को महत्व दिए जाने के बाद भारतीय नेताओं ने भी इस सिद्धांत को भारत की स्वतंत्रता की माँग के समर्थन में प्रस्तुत किया।

महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस का अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण और अधिक व्यापक हुआ। गांधीजी ने सत्य, अहिंसा, नैतिक राजनीति तथा मानव गरिमा को केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्व के लिए उपयोगी सिद्धांत माना। उनका विश्वास था कि स्थायी विश्व शांति शक्ति संतुलन या सैन्य प्रभुत्व से नहीं, बल्कि न्याय, सहयोग, अहिंसा और नैतिक आचरण से स्थापित हो सकती है। गांधीजी ने साम्राज्यवाद, नस्लवाद तथा युद्ध की आलोचना करते हुए यह प्रतिपादित किया कि मानवता की समस्याओं का समाधान हिंसा के बजाय संवाद और नैतिक शक्ति के माध्यम से होना चाहिए। इस दृष्टिकोण ने कांग्रेस की अंतरराष्ट्रीय नीति को विशिष्ट नैतिक आधार प्रदान किया।

जवाहरलाल नेहरू ने कांग्रेस की अंतरराष्ट्रीय नीति के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे विश्व राजनीति, समाजवाद, उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलनों तथा अंतरराष्ट्रीय संबंधों के गहरे अध्येता थे। उनका मत था कि भारत का स्वतंत्रता आंदोलन विश्व के अन्य स्वतंत्रता आंदोलनों से अलग नहीं है, बल्कि वह वैश्विक स्तर पर चल रहे स्वतंत्रता और समानता के संघर्ष का अभिन्न अंग है। उन्होंने कांग्रेस के भीतर अंतरराष्ट्रीय विषयों के अध्ययन और विश्लेषण को प्रोत्साहित किया तथा विश्व की घटनाओं पर नियमित विचार-विमर्श की परंपरा विकसित की।

नेहरू के प्रभाव से कांग्रेस ने स्पष्ट रूप से साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोध किया। उसने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के उन देशों का समर्थन किया जो विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे। कांग्रेस का मत था कि प्रत्येक राष्ट्र को स्वतंत्रता, समानता और आत्मनिर्णय का अधिकार प्राप्त होना चाहिए। इस दृष्टिकोण ने भारत को विकासशील देशों के स्वाभाविक सहयोगी के रूप में स्थापित किया और आगे चलकर स्वतंत्र भारत की विदेश नीति में भी यही भावना प्रमुख रूप से दिखाई दी।

कांग्रेस ने नस्लीय भेदभाव का भी निरंतर विरोध किया। विशेष रूप से दक्षिण अफ्रीका में भारतीय मूल के लोगों के साथ होने वाले भेदभाव तथा रंगभेद की नीतियों की कांग्रेस ने तीव्र आलोचना की। महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका के अनुभवों ने इस विषय को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का महत्वपूर्ण भाग बना दिया। कांग्रेस ने स्पष्ट किया कि किसी भी प्रकार का नस्लीय भेदभाव मानव गरिमा और समानता के सिद्धांतों के विरुद्ध है। यही कारण है कि स्वतंत्रता के बाद भारत रंगभेद विरोधी अंतरराष्ट्रीय आंदोलन का अग्रणी समर्थक बना।

द्वितीय विश्व युद्ध के समय कांग्रेस ने युद्ध और साम्राज्यवाद के संबंध में संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। कांग्रेस ने फासीवाद और नाजीवाद जैसी अधिनायकवादी विचारधाराओं का विरोध किया, किंतु साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि ब्रिटिश सरकार भारत को स्वतंत्र किए बिना लोकतंत्र की रक्षा का नैतिक दावा नहीं कर सकती। कांग्रेस का मत था कि किसी भी राष्ट्र से स्वतंत्रता छीनकर विश्व में स्वतंत्रता की रक्षा नहीं की जा सकती। इस प्रकार कांग्रेस ने लोकतंत्र और राष्ट्रीय स्वतंत्रता के बीच घनिष्ठ संबंध स्थापित किया।

कांग्रेस की अंतरराष्ट्रीय सोच का एक महत्वपूर्ण पक्ष विश्व शांति था। उसका विश्वास था कि युद्ध मानव सभ्यता के लिए विनाशकारी है और स्थायी शांति केवल अंतरराष्ट्रीय सहयोग, न्यायपूर्ण संबंधों तथा संवाद से ही स्थापित की जा सकती है। कांग्रेस ने हथियारों की होड़, आक्रामक सैन्यवाद तथा साम्राज्यवादी विस्तारवाद का विरोध किया। इस विचारधारा ने आगे चलकर भारत की शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व तथा पंचशील आधारित विदेश नीति को वैचारिक आधार प्रदान किया।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एशियाई एकता और अफ्रीकी देशों के सहयोग का भी समर्थन किया। उसका मत था कि उपनिवेशवाद से मुक्त हो रहे देशों को एक-दूसरे के साथ सहयोग करना चाहिए ताकि वे आर्थिक विकास, राजनीतिक स्थिरता तथा सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में संयुक्त रूप से आगे बढ़ सकें। इस दृष्टिकोण ने बाद में एशिया-अफ्रीका सहयोग तथा विकासशील देशों के बीच एकजुटता की भावना को प्रोत्साहित किया।

कांग्रेस का अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था। उसने आर्थिक न्याय, सामाजिक समानता, श्रमिक अधिकारों तथा मानव विकास के प्रश्नों को भी वैश्विक महत्व का विषय माना। कांग्रेस के अनेक नेताओं का मत था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक पूर्ण नहीं हो सकती जब तक आर्थिक शोषण, गरीबी तथा सामाजिक असमानता का समाधान न किया जाए। इसलिए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग, विकास तथा सामाजिक न्याय को भी विश्व राजनीति के महत्वपूर्ण आयाम के रूप में स्वीकार किया।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भूमिका को भी महत्व दिया। उसका विश्वास था कि राष्ट्रों के बीच विवादों का समाधान वार्ता, मध्यस्थता तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से होना चाहिए। यद्यपि तत्कालीन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की सीमाओं को भी कांग्रेस ने स्वीकार किया, फिर भी उसने बहुपक्षीय सहयोग और अंतरराष्ट्रीय कानून के महत्व पर निरंतर बल दिया। यही दृष्टिकोण आगे चलकर संयुक्त राष्ट्र के प्रति भारत के सकारात्मक दृष्टिकोण में परिलक्षित हुआ।

स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व कांग्रेस ने विदेश नीति संबंधी अनेक प्रस्ताव पारित किए जिनमें स्पष्ट किया गया कि स्वतंत्र भारत किसी भी प्रकार के साम्राज्यवाद, नस्लवाद और औपनिवेशिक शासन का समर्थन नहीं करेगा। उसने यह भी घोषित किया कि भारत विश्व शांति, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, समान संप्रभुता तथा सभी राष्ट्रों के सम्मान के सिद्धांतों का पालन करेगा। ये प्रस्ताव बाद में स्वतंत्र भारत की विदेश नीति के मूल आधार बने।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अंतरराष्ट्रीय सोच ने गुटनिरपेक्षता की अवधारणा के विकास में भी अप्रत्यक्ष रूप से योगदान दिया। कांग्रेस के नेताओं का मानना था कि भारत को किसी भी महाशक्ति के प्रभाव में आए बिना स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता बनाए रखनी चाहिए। राष्ट्रीय हितों तथा नैतिक मूल्यों के आधार पर विदेश नीति का निर्धारण करने की यह सोच आगे चलकर स्वतंत्र भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और गुटनिरपेक्ष नीति का आधार बनी।

कांग्रेस के अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण में लोकतंत्र और मानवाधिकारों का भी महत्वपूर्ण स्थान था। उसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, नागरिक अधिकारों, राजनीतिक भागीदारी तथा समानता को सार्वभौमिक मूल्य माना। कांग्रेस का विश्वास था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था केवल राष्ट्रीय शासन की पद्धति नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भी समानता, सम्मान तथा सहयोग की भावना को प्रोत्साहित करती है।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण का प्रभाव स्वतंत्र भारत की विदेश नीति पर अत्यंत व्यापक रूप से दिखाई देता है। पंचशील के सिद्धांत, गुटनिरपेक्षता, उपनिवेशवाद का विरोध, नस्लवाद के विरुद्ध संघर्ष, विश्व शांति का समर्थन, संयुक्त राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता, विकासशील देशों के साथ सहयोग, आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन तथा अंतरराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान जैसे लगभग सभी प्रमुख तत्व कांग्रेस की स्वतंत्रता-पूर्व वैचारिक परंपरा से विकसित हुए। इस प्रकार स्वतंत्र भारत की विदेश नीति किसी आकस्मिक निर्णय का परिणाम नहीं थी, बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान विकसित दीर्घकालीन राजनीतिक और वैचारिक चिंतन का स्वाभाविक विस्तार थी।

समकालीन परिप्रेक्ष्य में भी कांग्रेस द्वारा प्रतिपादित अनेक अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत प्रासंगिक बने हुए हैं। आज वैश्विक राजनीति में जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, आर्थिक असमानता, मानवाधिकार, साइबर सुरक्षा, महामारी, ऊर्जा संकट तथा बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था जैसी नई चुनौतियाँ सामने हैं। इन परिस्थितियों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग, संवाद, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, संप्रभु समानता, विकासशील देशों के हितों की रक्षा तथा वैश्विक न्याय जैसे सिद्धांत पहले की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा विकसित अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण इन विषयों पर भी नैतिक और व्यावहारिक दोनों प्रकार का मार्गदर्शन प्रदान करता है।

यद्यपि समय के साथ अंतरराष्ट्रीय राजनीति का स्वरूप बदल गया है और भारत की विदेश नीति में राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक कूटनीति, प्रौद्योगिकी, समुद्री सुरक्षा तथा रणनीतिक साझेदारियों का महत्व बढ़ा है, फिर भी स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान विकसित मूलभूत सिद्धांत आज भी भारतीय विदेश नीति के वैचारिक आधार का महत्वपूर्ण भाग बने हुए हैं। राष्ट्रीय हित और वैश्विक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित करने की जो परंपरा कांग्रेस ने विकसित की थी, वह आज भी भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका को समझने में अत्यंत उपयोगी मानी जाती है।

समग्र रूप से देखा जाए तो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अंतरराष्ट्रीय मुद्दों के प्रति जिस व्यापक, दूरदर्शी और मूल्य-आधारित दृष्टिकोण का विकास किया, उसने न केवल भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को वैश्विक संदर्भ प्रदान किया, बल्कि स्वतंत्र भारत की विदेश नीति के वैचारिक ढाँचे का भी निर्माण किया। कांग्रेस ने यह सिद्ध किया कि किसी राष्ट्र की स्वतंत्रता केवल उसकी आंतरिक राजनीति का विषय नहीं होती, बल्कि वह विश्व न्याय, मानव गरिमा, समानता, शांति तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग से गहराई से जुड़ी होती है। यही कारण है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों का अध्ययन भारतीय विदेश नीति, आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतन तथा अंतरराष्ट्रीय संबंधों की समझ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

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