Unit – 2
Free india’s Assistance to Movements for Independence in Asia and Africa
स्वतंत्र भारत द्वारा एशिया और अफ्रीका के स्वतंत्रता आंदोलनों को प्रदान की गई सहायता।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत ने अपनी विदेश नीति को केवल राष्ट्रीय हितों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे विश्व शांति, उपनिवेशवाद के अंत, नस्लीय भेदभाव के विरोध, मानवाधिकारों की रक्षा तथा सभी राष्ट्रों की समान संप्रभुता जैसे व्यापक आदर्शों से जोड़ा। भारत स्वयं लगभग दो शताब्दियों तक औपनिवेशिक शासन के अधीन रहा था, इसलिए उसे राजनीतिक दासता, आर्थिक शोषण तथा सांस्कृतिक दमन के दुष्परिणामों का प्रत्यक्ष अनुभव था। इसी ऐतिहासिक अनुभव के कारण स्वतंत्र भारत ने एशिया और अफ्रीका के उन देशों के संघर्षों को अपना नैतिक दायित्व माना जो अभी भी विदेशी शासन के अधीन थे। भारत का विश्वास था कि किसी भी राष्ट्र की स्वतंत्रता केवल उसका आंतरिक विषय नहीं है, बल्कि वह समूचे विश्व में न्याय, समानता और मानव गरिमा की स्थापना से जुड़ा हुआ प्रश्न है। इस दृष्टिकोण ने स्वतंत्र भारत को उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलनों का सक्रिय समर्थक बना दिया और वह एशिया तथा अफ्रीका के नवोदित राष्ट्रों के लिए प्रेरणा, सहयोग और कूटनीतिक समर्थन का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
भारत की इस नीति के पीछे अनेक वैचारिक, ऐतिहासिक और व्यावहारिक कारण थे। महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा और आत्मनिर्णय के सिद्धांत, जवाहरलाल नेहरू का अंतरराष्ट्रीयतावाद, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का उपनिवेशवाद-विरोधी चरित्र तथा भारतीय संविधान में निहित विश्व शांति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भावना ने इस नीति को वैचारिक आधार प्रदान किया। भारतीय नेतृत्व का मत था कि जब तक विश्व के सभी राष्ट्र स्वतंत्र नहीं होंगे, तब तक स्थायी शांति और न्यायपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था स्थापित नहीं हो सकती। इसलिए भारत ने अपनी विदेश नीति में नवस्वतंत्र देशों के साथ एकजुटता, सहयोग और पारस्परिक सम्मान को विशेष स्थान दिया।
स्वतंत्रता के तुरंत बाद भारत ने एशियाई देशों के बीच सहयोग और एकता को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया। भारत ने यह महसूस किया कि उपनिवेशवाद से मुक्त हो रहे देशों के सामने राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक पुनर्निर्माण, प्रशासनिक विकास तथा अंतरराष्ट्रीय पहचान जैसी अनेक समान चुनौतियाँ हैं। यदि ये देश एक-दूसरे के अनुभवों से सीखें और सहयोग करें, तो वे अपने विकास को अधिक प्रभावी ढंग से आगे बढ़ा सकते हैं। इसी उद्देश्य से भारत ने एशियाई देशों के बीच संवाद, सम्मेलन और सहयोग की परंपरा को प्रोत्साहित किया।
भारत ने इंडोनेशिया के स्वतंत्रता संघर्ष को सबसे पहले और सबसे प्रभावशाली समर्थन प्रदान किया। जब डच शासन ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पुनः इंडोनेशिया पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया, तब भारत ने इसका स्पष्ट विरोध किया। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इंडोनेशिया की स्वतंत्रता का समर्थन किया, डच नीतियों की आलोचना की और एशियाई देशों को इंडोनेशियाई जनता के पक्ष में संगठित करने का प्रयास किया। भारत ने कूटनीतिक स्तर पर भी सक्रिय भूमिका निभाई और अंतरराष्ट्रीय जनमत को उपनिवेशवाद के विरुद्ध प्रभावित करने का प्रयास किया। इस समर्थन ने भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को बढ़ाया और इंडोनेशिया के साथ दीर्घकालीन मैत्रीपूर्ण संबंधों की आधारशिला रखी।
वियतनाम के स्वतंत्रता संघर्ष के प्रति भी भारत का दृष्टिकोण सहानुभूतिपूर्ण रहा। भारत ने यह स्वीकार किया कि किसी भी राष्ट्र को अपनी राजनीतिक व्यवस्था निर्धारित करने का अधिकार है। यद्यपि शीत युद्ध की परिस्थितियों के कारण वियतनाम का प्रश्न अत्यंत जटिल था, फिर भी भारत ने शांतिपूर्ण समाधान, संवाद तथा विदेशी हस्तक्षेप में कमी की आवश्यकता पर बल दिया। भारत ने संघर्ष के बजाय वार्ता और राजनीतिक समाधान का समर्थन किया तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संतुलित भूमिका निभाने का प्रयास किया।
बर्मा, जिसे आज म्यांमार के नाम से जाना जाता है, के साथ भारत के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक संबंध अत्यंत प्राचीन रहे हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने बर्मा की संप्रभुता, स्वतंत्रता तथा विकास का समर्थन किया। दोनों देशों के बीच आर्थिक, सांस्कृतिक तथा प्रशासनिक सहयोग को प्रोत्साहित किया गया और भारत ने बर्मा के साथ समानता तथा पारस्परिक सम्मान पर आधारित संबंध विकसित किए।
श्रीलंका के साथ भी भारत ने औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के पश्चात सहयोगपूर्ण संबंध स्थापित किए। भारत ने इस बात पर बल दिया कि दक्षिण एशिया के देशों को परस्पर सहयोग, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व तथा विकास के आधार पर अपने संबंधों का निर्माण करना चाहिए। यद्यपि समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक प्रश्न उत्पन्न हुए, फिर भी भारत की मूल नीति क्षेत्रीय सहयोग और संप्रभु समानता पर आधारित रही।
अफ्रीका के स्वतंत्रता आंदोलनों के प्रति भारत का समर्थन और भी अधिक व्यापक तथा सक्रिय था। अफ्रीकी देशों की अधिकांश जनता लंबे समय तक यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों के अधीन रही। भारत ने इन देशों की स्वतंत्रता को विश्व न्याय का महत्वपूर्ण प्रश्न माना। भारत का मत था कि किसी भी राष्ट्र पर विदेशी शासन मानव स्वतंत्रता तथा समानता के सिद्धांतों के विरुद्ध है। इसलिए भारत ने अफ्रीकी देशों के स्वतंत्रता संघर्षों का नैतिक, राजनीतिक तथा कूटनीतिक समर्थन किया।
दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की नीति के विरुद्ध भारत ने विश्व में सबसे पहले और सबसे सशक्त विरोध व्यक्त किया। दक्षिण अफ्रीका में भारतीय मूल के लोगों तथा अश्वेत समुदाय के साथ होने वाले नस्लीय भेदभाव के विरुद्ध भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार आवाज उठाई। भारत ने नस्लीय भेदभाव को मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताया और इसके विरुद्ध वैश्विक जनमत तैयार करने का प्रयास किया। भारत ने दक्षिण अफ्रीका के साथ अनेक प्रकार के आधिकारिक संबंधों को सीमित किया और रंगभेद विरोधी आंदोलन को नैतिक तथा कूटनीतिक समर्थन प्रदान किया। आगे चलकर यह नीति संयुक्त राष्ट्र तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों में व्यापक समर्थन प्राप्त करने में सफल हुई।
घाना, केन्या, नाइजीरिया, तंज़ानिया, ज़ाम्बिया, अल्जीरिया तथा अन्य अफ्रीकी देशों के स्वतंत्रता आंदोलनों के प्रति भी भारत ने सकारात्मक भूमिका निभाई। भारत ने इन देशों के नेताओं के साथ निकट संपर्क स्थापित किया, उनके स्वतंत्रता संघर्षों का समर्थन किया तथा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनके आत्मनिर्णय के अधिकार की वकालत की। भारत का विश्वास था कि अफ्रीका की राजनीतिक स्वतंत्रता विश्व शांति तथा अंतरराष्ट्रीय समानता के लिए आवश्यक है।
अल्जीरिया के स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान भारत ने फ्रांसीसी औपनिवेशिक नीति की आलोचना की और अल्जीरियाई जनता के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन किया। भारत ने यह स्पष्ट किया कि किसी भी राष्ट्र की स्वतंत्रता को बलपूर्वक दबाया नहीं जा सकता और राजनीतिक समस्याओं का समाधान संवाद तथा न्यायपूर्ण समझौते से होना चाहिए।
भारत ने उपनिवेशवाद के विरोध में केवल द्विपक्षीय संबंधों तक ही अपनी भूमिका सीमित नहीं रखी, बल्कि संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय मंचों पर भी सक्रिय नेतृत्व प्रदान किया। भारत ने महासभा में उपनिवेशवाद समाप्त करने संबंधी प्रस्तावों का समर्थन किया और यह आग्रह किया कि सभी उपनिवेशित राष्ट्रों को शीघ्र स्वतंत्रता प्रदान की जाए। भारत ने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून का मूल सिद्धांत सभी राष्ट्रों की समान संप्रभुता तथा आत्मनिर्णय का अधिकार होना चाहिए।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के विकास में भारत की भूमिका ने भी एशिया और अफ्रीका के स्वतंत्रता आंदोलनों को अप्रत्यक्ष रूप से महत्वपूर्ण समर्थन प्रदान किया। गुटनिरपेक्षता ने नवस्वतंत्र देशों को यह अवसर दिया कि वे किसी महाशक्ति के प्रभाव में आए बिना अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का निर्माण कर सकें। भारत ने इस आंदोलन के माध्यम से विकासशील देशों के बीच सहयोग, आर्थिक विकास, राजनीतिक स्वतंत्रता तथा अंतरराष्ट्रीय समानता को प्रोत्साहित किया। इससे एशिया और अफ्रीका के अनेक देशों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी स्वतंत्र पहचान स्थापित करने में सहायता मिली।
भारत ने नवस्वतंत्र देशों को केवल नैतिक समर्थन ही नहीं दिया, बल्कि प्रशासनिक, तकनीकी तथा शैक्षिक सहयोग भी प्रदान किया। स्वतंत्रता प्राप्त करने वाले अनेक देशों के प्रशासनिक अधिकारियों, राजनयिकों, अभियंताओं तथा अन्य विशेषज्ञों को भारत में प्रशिक्षण दिया गया। तकनीकी सहयोग, शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य, विज्ञान तथा प्रशासनिक अनुभवों का आदान-प्रदान भारत की विदेश नीति का महत्वपूर्ण अंग बन गया। इससे नवस्वतंत्र देशों की संस्थागत क्षमता के विकास में सहायता मिली।
भारत ने आर्थिक सहयोग को भी स्वतंत्रता आंदोलनों के बाद राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया का आवश्यक तत्व माना। अनेक एशियाई और अफ्रीकी देशों को विकास परियोजनाओं, तकनीकी विशेषज्ञता, छात्रवृत्तियों तथा क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के माध्यम से सहयोग प्रदान किया गया। भारत का उद्देश्य इन देशों को आत्मनिर्भर विकास की दिशा में आगे बढ़ाना था, न कि उन्हें किसी प्रकार की राजनीतिक या आर्थिक निर्भरता में बाँधना।
भारत की सांस्कृतिक कूटनीति ने भी एशिया और अफ्रीका के साथ संबंधों को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। बौद्ध धर्म, भारतीय दर्शन, योग, आयुर्वेद, शिक्षा तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से भारत ने इन देशों के साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को पुनर्जीवित किया। इससे राजनीतिक सहयोग के साथ-साथ सांस्कृतिक विश्वास और जन-से-जन संबंध भी मजबूत हुए।
भारत की इस नीति का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य विश्व में नस्लीय समानता और मानवाधिकारों की स्थापना भी था। भारत का मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी जब सभी व्यक्तियों और समुदायों को समान सम्मान, समान अवसर तथा मानवाधिकार प्राप्त हों। इसलिए भारत ने नस्लवाद, रंगभेद तथा किसी भी प्रकार के जातीय भेदभाव का निरंतर विरोध किया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर समानता तथा न्याय की वकालत की।
हालाँकि भारत की इस नीति के सामने अनेक चुनौतियाँ भी थीं। सीमित आर्थिक संसाधन, अपनी विकास संबंधी आवश्यकताएँ, शीत युद्ध की जटिल राजनीति तथा क्षेत्रीय सुरक्षा संबंधी समस्याओं के कारण भारत हर आंदोलन को प्रत्यक्ष सहायता प्रदान करने की स्थिति में नहीं था। इसलिए भारत ने मुख्यतः नैतिक समर्थन, कूटनीतिक प्रयास, अंतरराष्ट्रीय जनमत निर्माण, तकनीकी सहयोग तथा बहुपक्षीय मंचों के माध्यम से अपनी भूमिका निभाई। यह नीति आदर्शवाद और यथार्थवाद के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास थी।
समय के साथ एशिया और अफ्रीका के अधिकांश देशों ने स्वतंत्रता प्राप्त कर ली, किंतु भारत के साथ उनके संबंध केवल स्वतंत्रता आंदोलन तक सीमित नहीं रहे। स्वतंत्रता के बाद भी भारत ने विकास सहयोग, व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, कृषि तथा क्षमता निर्माण के क्षेत्रों में निरंतर सहयोग जारी रखा। इस प्रकार भारत और एशिया-अफ्रीका के देशों के संबंध समानता, सम्मान, साझा ऐतिहासिक अनुभव तथा दक्षिण-दक्षिण सहयोग के आधार पर विकसित हुए।
समकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी भारत की यह विरासत महत्वपूर्ण बनी हुई है। आज भारत विकासशील देशों की आवाज़ को वैश्विक मंचों पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने, वैश्विक दक्षिण के हितों की रक्षा करने, सतत विकास, जलवायु न्याय, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सहयोग तथा तकनीकी साझेदारी को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहा है। यह भूमिका उसी ऐतिहासिक परंपरा का विस्तार है जिसमें स्वतंत्र भारत ने एशिया और अफ्रीका के स्वतंत्रता आंदोलनों के साथ स्वयं को जोड़ा था।
समग्र रूप से देखा जाए तो स्वतंत्र भारत द्वारा एशिया और अफ्रीका के स्वतंत्रता आंदोलनों को प्रदान की गई सहायता केवल कूटनीतिक समर्थन तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह न्याय, आत्मनिर्णय, समानता, उपनिवेशवाद-विरोध, नस्लवाद के प्रतिरोध और विश्व शांति जैसे व्यापक मानवीय मूल्यों पर आधारित थी। भारत ने अपने स्वतंत्रता संग्राम के अनुभवों को अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व में परिवर्तित करते हुए नवस्वतंत्र राष्ट्रों को नैतिक प्रेरणा, राजनीतिक समर्थन, कूटनीतिक सहयोग, तकनीकी सहायता तथा विकास संबंधी साझेदारी प्रदान की। इस नीति ने न केवल भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को सुदृढ़ किया, बल्कि एशिया और अफ्रीका में स्वतंत्रता, सहयोग और समानता पर आधारित नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
