Unit – 5

Indian and the Super Powers.

भारत और महाशक्तियाँ

भारत और महाशक्तियों के संबंध आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अत्यंत महत्वपूर्ण विषय हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने स्वयं को ऐसी वैश्विक परिस्थितियों में पाया जब विश्व दो प्रमुख महाशक्तियों के नेतृत्व वाले गुटों में विभाजित था। एक ओर संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में पूँजीवादी एवं पश्चिमी गुट था, जबकि दूसरी ओर सोवियत संघ के नेतृत्व में समाजवादी गुट था। इन दोनों महाशक्तियों के बीच राजनीतिक, वैचारिक, आर्थिक, सामरिक तथा तकनीकी प्रतिस्पर्धा ने विश्व राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। इस प्रतिस्पर्धा को शीत युद्ध के नाम से जाना गया। भारत ने इस चुनौतीपूर्ण वातावरण में ऐसी विदेश नीति विकसित की जिसका उद्देश्य किसी भी महाशक्ति का अनुयायी बनने के बजाय अपनी स्वतंत्र नीति बनाए रखना, राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना तथा विश्व शांति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना था। यही कारण है कि भारत और महाशक्तियों के संबंधों का अध्ययन केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास तथा वैश्विक भूमिका को समझने का महत्वपूर्ण आधार भी है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत आर्थिक रूप से कमजोर, औद्योगिक दृष्टि से अविकसित तथा सुरक्षा संबंधी अनेक चुनौतियों से घिरा हुआ था। विभाजन, शरणार्थी समस्या, सीमाई विवाद तथा विकास की आवश्यकताओं के कारण भारत को बाहरी सहयोग की आवश्यकता थी। दूसरी ओर शीत युद्ध के कारण दोनों महाशक्तियाँ नवस्वतंत्र देशों को अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में सम्मिलित करना चाहती थीं। भारत के समक्ष यह चुनौती थी कि वह अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखते हुए दोनों महाशक्तियों के साथ संतुलित संबंध स्थापित करे। इस संदर्भ में जवाहरलाल नेहरू ने रणनीतिक स्वायत्तता तथा गुटनिरपेक्षता का मार्ग अपनाया, जिसके अनुसार भारत किसी सैन्य गुट का सदस्य नहीं बनेगा और प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय प्रश्न पर अपने राष्ट्रीय हितों तथा परिस्थितियों के अनुसार स्वतंत्र निर्णय करेगा।

संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ भारत के संबंध प्रारंभ से ही बहुआयामी रहे। दोनों देश लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था, संवैधानिक मूल्यों तथा नागरिक स्वतंत्रताओं में विश्वास रखते थे, किंतु विदेश नीति के अनेक प्रश्नों पर दोनों के दृष्टिकोण भिन्न थे। अमेरिका की प्राथमिकता साम्यवाद को रोकना और सैन्य गठबंधनों के माध्यम से अपने प्रभाव का विस्तार करना था, जबकि भारत गुटनिरपेक्षता, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व तथा स्वतंत्र विदेश नीति का समर्थक था। इस कारण प्रारंभिक दशकों में दोनों देशों के बीच कई विषयों पर मतभेद दिखाई दिए। फिर भी कृषि विकास, शिक्षा, विज्ञान, सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा तकनीकी सहयोग जैसे क्षेत्रों में अमेरिका ने भारत को महत्वपूर्ण सहायता प्रदान की। हरित क्रांति के दौरान कृषि अनुसंधान, उन्नत बीज, सिंचाई तकनीक तथा खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग ने भारत के कृषि विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया।

भारत और अमेरिका के संबंधों में समय-समय पर तनाव भी उत्पन्न हुए। शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने दक्षिण एशिया में पाकिस्तान को सामरिक सहयोग तथा सैन्य सहायता प्रदान की, जिससे भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताएँ बढ़ीं। परमाणु नीति, रक्षा सहयोग तथा कुछ अंतरराष्ट्रीय संकटों के संबंध में भी दोनों देशों के बीच मतभेद रहे। इसके बावजूद लोकतांत्रिक मूल्यों, आर्थिक सहयोग तथा वैज्ञानिक विकास के आधार पर दोनों देशों के संबंध निरंतर विकसित होते रहे। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद इन संबंधों में नया परिवर्तन आया। आर्थिक उदारीकरण, सूचना प्रौद्योगिकी, व्यापार, रक्षा सहयोग, आतंकवाद-रोधी प्रयास, समुद्री सुरक्षा तथा रणनीतिक साझेदारी के कारण भारत और अमेरिका के संबंध अधिक व्यापक और सुदृढ़ हुए। इक्कीसवीं शताब्दी में दोनों देशों के बीच उच्च प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष अनुसंधान, ऊर्जा, डिजिटल नवाचार तथा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग के नए आयाम विकसित हुए।

सोवियत संघ के साथ भारत के संबंध भी स्वतंत्र भारत की विदेश नीति का महत्वपूर्ण अध्याय रहे हैं। भारत और सोवियत संघ के बीच संबंधों का आधार राजनीतिक विश्वास, आर्थिक सहयोग तथा औद्योगिक विकास था। सोवियत संघ ने भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के औद्योगीकरण, भारी उद्योगों, इस्पात संयंत्रों, ऊर्जा परियोजनाओं, मशीन निर्माण तथा वैज्ञानिक अनुसंधान के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। स्वतंत्रता के प्रारंभिक दशकों में भारत की योजनाबद्ध आर्थिक विकास नीति को सोवियत अनुभव से प्रेरणा मिली। दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, शैक्षिक तथा वैज्ञानिक संबंध भी निरंतर सुदृढ़ होते गए।

रक्षा क्षेत्र में भारत और सोवियत संघ का सहयोग विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। भारतीय सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण, रक्षा उपकरणों की आपूर्ति, तकनीकी सहयोग तथा संयुक्त उत्पादन के क्षेत्र में सोवियत संघ भारत का प्रमुख सहयोगी बना। इस सहयोग ने भारत की सामरिक क्षमता को सुदृढ़ किया और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत आधार प्रदान किया। अनेक अवसरों पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी सोवियत संघ ने भारत के महत्वपूर्ण हितों का समर्थन किया, जिससे दोनों देशों के बीच विश्वास और गहरा हुआ।

यद्यपि भारत और सोवियत संघ के संबंध अत्यंत निकट थे, फिर भी भारत ने औपचारिक रूप से किसी सैन्य गुट की सदस्यता स्वीकार नहीं की। भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को बनाए रखा और जहाँ आवश्यक समझा, वहाँ सोवियत नीतियों से अलग दृष्टिकोण भी अपनाया। इससे स्पष्ट होता है कि भारत का उद्देश्य किसी महाशक्ति पर निर्भर होना नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय हितों के अनुरूप संतुलित सहयोग विकसित करना था।

1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद वैश्विक राजनीति में व्यापक परिवर्तन हुए। इसके पश्चात रूस ने सोवियत संघ का उत्तराधिकारी राज्य बनकर भारत के साथ संबंधों को आगे बढ़ाया। भारत और रूस के बीच रक्षा, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष अनुसंधान, ऊर्जा सुरक्षा, विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में सहयोग निरंतर जारी रहा। आज भी रूस भारत का एक महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी है और दोनों देशों के संबंध बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, ऊर्जा सहयोग तथा सामरिक साझेदारी पर आधारित हैं।

महाशक्तियों के साथ भारत के संबंधों में चीन का प्रश्न भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यद्यपि चीन को प्रारंभिक दशकों में उसी प्रकार की महाशक्ति का दर्जा प्राप्त नहीं था जैसा अमेरिका और सोवियत संघ को था, किंतु समय के साथ उसका वैश्विक प्रभाव निरंतर बढ़ा और आज वह विश्व की प्रमुख शक्तियों में सम्मिलित है। स्वतंत्रता के बाद भारत और चीन ने एशियाई एकता तथा पंचशील के सिद्धांतों के आधार पर मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने का प्रयास किया। किंतु सीमाई विवादों तथा 1962 के युद्ध ने दोनों देशों के संबंधों को गंभीर रूप से प्रभावित किया। इसके पश्चात भारत ने अपनी सुरक्षा नीति को अधिक सुदृढ़ बनाया तथा चीन के साथ संवाद और सुरक्षा दोनों को समान महत्व देने की नीति अपनाई। वर्तमान समय में दोनों देशों के बीच व्यापार, आर्थिक संबंध, सीमा प्रबंधन तथा क्षेत्रीय संतुलन जैसे अनेक विषय विदेश नीति के महत्वपूर्ण आयाम हैं।

भारत और महाशक्तियों के संबंधों का सबसे महत्वपूर्ण आधार रणनीतिक स्वायत्तता रहा है। भारत ने कभी भी अपनी विदेश नीति को किसी एक शक्ति के प्रभाव तक सीमित नहीं रखा। उसने विभिन्न देशों के साथ सहयोग विकसित किया, किंतु निर्णय सदैव राष्ट्रीय हितों के आधार पर लेने का प्रयास किया। यही कारण है कि भारत ने एक ओर रूस के साथ रक्षा सहयोग बनाए रखा, वहीं दूसरी ओर अमेरिका, यूरोप, जापान तथा अन्य देशों के साथ भी आर्थिक, तकनीकी तथा सामरिक संबंधों का विस्तार किया। इस संतुलित दृष्टिकोण ने भारत को बदलती वैश्विक परिस्थितियों में लचीलापन और विश्वसनीयता प्रदान की।

महाशक्तियों के साथ संबंधों में भारत ने सदैव विश्व शांति, अंतरराष्ट्रीय कानून तथा बहुपक्षवाद का समर्थन किया। भारत का मत रहा है कि किसी भी वैश्विक समस्या का समाधान केवल शक्ति-प्रदर्शन से नहीं, बल्कि संवाद, सहयोग तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से किया जाना चाहिए। इसलिए भारत ने संयुक्त राष्ट्र, बहुपक्षीय मंचों तथा वैश्विक सहयोग की संस्थाओं में सक्रिय भूमिका निभाई है। भारत का यह भी मत रहा है कि वैश्विक शासन व्यवस्था अधिक लोकतांत्रिक और प्रतिनिधिक होनी चाहिए ताकि विकासशील देशों की आवाज़ को उचित स्थान मिल सके।

भारत की परमाणु नीति भी महाशक्तियों के साथ उसके संबंधों का महत्वपूर्ण पक्ष रही है। भारत ने परमाणु हथियारों के पूर्ण उन्मूलन तथा सार्वभौमिक निरस्त्रीकरण का समर्थन किया, किंतु साथ ही अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए स्वतंत्र परमाणु नीति अपनाई। भारत का मत रहा कि वैश्विक परमाणु व्यवस्था न्यायपूर्ण, समान और भेदभावरहित होनी चाहिए। इस नीति के कारण भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखी।

आर्थिक वैश्वीकरण के दौर में महाशक्तियों के साथ भारत के संबंधों का स्वरूप और अधिक व्यापक हो गया है। आज व्यापार, निवेश, सूचना प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन, समुद्री सुरक्षा, अंतरिक्ष अनुसंधान तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएँ विदेश नीति के प्रमुख विषय बन चुके हैं। भारत ने इन सभी क्षेत्रों में विभिन्न महाशक्तियों के साथ सहयोग स्थापित करते हुए अपने राष्ट्रीय विकास को गति देने का प्रयास किया है।

समकालीन विश्व में शक्ति संतुलन का स्वरूप भी परिवर्तित हुआ है। शीत युद्ध के दौरान विश्व द्विध्रुवीय था, जबकि वर्तमान समय में बहुध्रुवीय व्यवस्था का विकास हो रहा है। अमेरिका अभी भी एक प्रमुख वैश्विक शक्ति है, चीन का प्रभाव निरंतर बढ़ रहा है, रूस सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है तथा यूरोपीय देशों, जापान और अन्य उभरती शक्तियों का महत्व भी बढ़ा है। ऐसी परिस्थितियों में भारत की विदेश नीति का उद्देश्य सभी प्रमुख शक्तियों के साथ संतुलित, व्यावहारिक तथा परस्पर लाभकारी संबंध बनाए रखना है।

भारत और महाशक्तियों के संबंधों में राष्ट्रीय हित सर्वोच्च मार्गदर्शक सिद्धांत रहा है। भारत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय साझेदारी का उद्देश्य उसकी संप्रभुता, सुरक्षा, आर्थिक विकास, वैज्ञानिक प्रगति तथा वैश्विक प्रतिष्ठा को सुदृढ़ करना होना चाहिए। इसी कारण भारत किसी भी महाशक्ति के साथ सहयोग करते समय अपनी स्वतंत्र निर्णय क्षमता और रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने का प्रयास करता है।

महाशक्तियों के साथ भारत के संबंधों का एक महत्वपूर्ण आयाम वैश्विक दक्षिण के देशों के हितों का प्रतिनिधित्व भी है। भारत स्वयं एक विकासशील देश होने के कारण एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों की विकास संबंधी आवश्यकताओं, जलवायु न्याय, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सहयोग तथा आर्थिक समानता जैसे विषयों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रमुखता से उठाता है। इस प्रकार भारत महाशक्तियों के साथ सहयोग करते हुए भी विकासशील देशों की सामूहिक आवाज़ को सशक्त बनाने का प्रयास करता है।

समग्र रूप से देखा जाए तो भारत और महाशक्तियों के संबंध समय, परिस्थितियों और वैश्विक शक्ति-संतुलन के अनुसार निरंतर विकसित होते रहे हैं। स्वतंत्रता के प्रारंभिक वर्षों में गुटनिरपेक्षता और स्वतंत्र विदेश नीति इन संबंधों का आधार थीं, जबकि वर्तमान समय में रणनीतिक स्वायत्तता, बहुपक्षीय सहयोग, आर्थिक कूटनीति, तकनीकी साझेदारी तथा राष्ट्रीय सुरक्षा प्रमुख आयाम बन चुके हैं। भारत ने आदर्शवाद और यथार्थवाद के संतुलन के साथ ऐसी विदेश नीति विकसित की है जो एक ओर विश्व शांति, सहयोग और न्याय का समर्थन करती है तथा दूसरी ओर राष्ट्रीय हितों, संप्रभुता, आर्थिक प्रगति और सामरिक सुरक्षा की प्रभावी रक्षा भी सुनिश्चित करती है। यही संतुलित दृष्टिकोण भारत को समकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक उत्तरदायी, प्रभावशाली और विश्वसनीय शक्ति के रूप में स्थापित करता है।

Indian and the Super Powers.
भारत और महाशक्तियाँ
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (15–20 अंक)
  1. भारत और महाशक्तियों के संबंधों का विस्तृत विश्लेषण कीजिए।
  2. शीत युद्ध के संदर्भ में भारत की महाशक्तियों के प्रति विदेश नीति की समीक्षा कीजिए।
  3. भारत-अमेरिका संबंधों के विकास का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
  4. भारत और सोवियत संघ (रूस) के संबंधों का ऐतिहासिक एवं समकालीन विश्लेषण कीजिए।
  5. भारत की रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) की अवधारणा का महाशक्तियों के संदर्भ में विवेचन कीजिए।
  6. भारत की गुटनिरपेक्ष नीति ने महाशक्तियों के साथ उसके संबंधों को किस प्रकार प्रभावित किया?
  7. भारत और चीन के संबंधों का विदेश नीति के संदर्भ में समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
  8. भारत की विदेश नीति में राष्ट्रीय हित और महाशक्तियों के साथ संबंधों का मूल्यांकन कीजिए।
  9. वैश्वीकरण के बाद भारत और महाशक्तियों के संबंधों में आए परिवर्तनों का विश्लेषण कीजिए।
  10. समकालीन बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका एवं महाशक्तियों के साथ उसके संबंधों की समीक्षा कीजिए।

मध्यम उत्तरीय प्रश्न (8–10 अंक)
  1. भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति क्यों अपनाई?
  2. भारत-अमेरिका संबंधों के प्रमुख आयामों का वर्णन कीजिए।
  3. भारत-रूस संबंधों की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
  4. भारत और सोवियत संघ के बीच रक्षा सहयोग का महत्व स्पष्ट कीजिए।
  5. भारत की विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता का क्या महत्व है?
  6. भारत और चीन के संबंधों में 1962 के युद्ध का प्रभाव स्पष्ट कीजिए।
  7. भारत की परमाणु नीति का महाशक्तियों के साथ संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ा?
  8. भारत की विदेश नीति में बहुपक्षवाद का महत्व स्पष्ट कीजिए।
  9. भारत और महाशक्तियों के संबंधों में आर्थिक कूटनीति की भूमिका का वर्णन कीजिए।
  10. वैश्विक दक्षिण (Global South) के संदर्भ में भारत की भूमिका स्पष्ट कीजिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न (3–5 अंक)
  1. महाशक्ति से क्या अभिप्राय है?
  2. शीत युद्ध क्या था?
  3. रणनीतिक स्वायत्तता क्या है?
  4. गुटनिरपेक्षता का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
  5. भारत-अमेरिका संबंधों का एक प्रमुख आधार लिखिए।
  6. भारत-रूस संबंधों की दो विशेषताएँ लिखिए।
  7. हरित क्रांति में अमेरिका का योगदान बताइए।
  8. भारत के औद्योगिक विकास में सोवियत संघ का योगदान लिखिए।
  9. 1991 का भारत-रूस संबंधों में क्या महत्व है?
  10. भारत-चीन संबंधों में 1962 के युद्ध का महत्व बताइए।
  11. भारत की परमाणु नीति का मूल उद्देश्य क्या है?
  12. बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था से क्या अभिप्राय है?
  13. बहुपक्षवाद क्या है?
  14. भारत के लिए राष्ट्रीय हित का क्या महत्व है?
  15. वैश्विक दक्षिण से क्या तात्पर्य है?

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Questions)

एक शब्द / एक वाक्य में उत्तर दीजिए
  1. शीत युद्ध में विश्व कितने प्रमुख गुटों में विभाजित था?
  2. संयुक्त राज्य अमेरिका किस गुट का नेतृत्व करता था?
  3. समाजवादी गुट का नेतृत्व किस देश ने किया?
  4. भारत ने किस विदेश नीति को अपनाया?
  5. गुटनिरपेक्षता के प्रमुख प्रवर्तक कौन थे?
  6. हरित क्रांति में भारत को किस देश से महत्वपूर्ण सहयोग मिला?
  7. भारत के भारी उद्योगों के विकास में किस देश का महत्वपूर्ण योगदान था?
  8. सोवियत संघ का विघटन किस वर्ष हुआ?
  9. सोवियत संघ का उत्तराधिकारी राष्ट्र कौन बना?
  10. भारत की विदेश नीति का प्रमुख मार्गदर्शक सिद्धांत क्या है?
  11. भारत किस प्रकार की विश्व व्यवस्था का समर्थन करता है?
  12. भारत किस अंतरराष्ट्रीय संगठन में विशेष आस्था रखता है?
  13. 1962 में भारत का युद्ध किस देश से हुआ?
  14. भारत किस प्रकार के परमाणु निरस्त्रीकरण का समर्थन करता है?
  15. भारत वैश्विक दक्षिण के देशों के किन हितों का समर्थन करता है?

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
  1. भारत ने स्वतंत्रता के बाद कौन-सी विदेश नीति अपनाई?
    • (A) सैन्य गठबंधन
    • (B) उपनिवेशवाद
    • (C) गुटनिरपेक्षता
    • (D) विस्तारवाद

      उत्तर – (C)
  2. हरित क्रांति में भारत को प्रमुख सहयोग किस देश से मिला?
    • (A) रूस
    • (B) अमेरिका
    • (C) चीन
    • (D) फ्रांस

      उत्तर – (B)
  3. भारत के भारी उद्योगों के विकास में सबसे अधिक सहयोग किसने दिया?
    • (A) जापान
    • (B) अमेरिका
    • (C) सोवियत संघ
    • (D) जर्मनी

      उत्तर – (C)
  4. सोवियत संघ का विघटन कब हुआ?
    • (A) 1985
    • (B) 1991
    • (C) 1995
    • (D) 2000

      उत्तर – (B)
  5. भारत की विदेश नीति का सबसे महत्वपूर्ण आधार क्या माना जाता है?
    • (A) सैन्यवाद
    • (B) राष्ट्रीय हित
    • (C) साम्राज्यवाद
    • (D) उपनिवेशवाद

      उत्तर – (B)
  6. वर्तमान समय में भारत किस प्रकार की विश्व व्यवस्था का समर्थन करता है?
    • (A) एकध्रुवीय
    • (B) द्विध्रुवीय
    • (C) बहुध्रुवीय
    • (D) उपनिवेशवादी

      उत्तर – (C)
  7. 1962 का युद्ध भारत और किस देश के बीच हुआ?
    • (A) पाकिस्तान
    • (B) रूस
    • (C) चीन
    • (D) अमेरिका

      उत्तर – (C)
  8. भारत की विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ है—
    • (A) किसी एक महाशक्ति पर निर्भर रहना
    • (B) स्वतंत्र निर्णय लेना
    • (C) सैन्य गठबंधन बनाना
    • (D) युद्ध करना

      उत्तर – (B)

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