Unit – 2

Issues: Disarmament L N.P.T., New International Economic Order, North South Dialogue, South-South Cooperation.

अंतरराष्ट्रीय मुद्दे: निरस्त्रीकरण, परमाणु अप्रसार संधि (एन.पी.टी.), नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था, उत्तर–दक्षिण संवाद तथा दक्षिण–दक्षिण सहयोग।

समकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति का स्वरूप केवल राज्यों के बीच शक्ति-संघर्ष या सैन्य प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रह गया है। वैश्वीकरण, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के तीव्र विकास, आर्थिक परस्पर निर्भरता, पर्यावरणीय संकट, परमाणु हथियारों के प्रसार, वैश्विक व्यापार, विकास संबंधी असमानताओं तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की बढ़ती भूमिका ने विश्व राजनीति को अत्यंत जटिल और बहुआयामी बना दिया है। वर्तमान युग में अनेक ऐसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दे उभरकर सामने आए हैं जिनका प्रभाव किसी एक देश तक सीमित नहीं रहता, बल्कि संपूर्ण विश्व समुदाय को प्रभावित करता है। निरस्त्रीकरण, परमाणु अप्रसार संधि, नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था, उत्तर–दक्षिण संवाद तथा दक्षिण–दक्षिण सहयोग ऐसे ही महत्वपूर्ण विषय हैं। ये सभी मुद्दे अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा, आर्थिक न्याय, वैश्विक सहयोग तथा सतत विकास से गहराई से जुड़े हुए हैं। इनका अध्ययन केवल राजनीतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक, कानूनी तथा नैतिक दृष्टि से भी अत्यंत आवश्यक माना जाता है।

निरस्त्रीकरण का अर्थ है राज्यों द्वारा अपने सैन्य शस्त्रों, विशेषकर विनाशकारी हथियारों, में कमी लाना या उन्हें पूर्णतः समाप्त करना ताकि युद्ध की संभावना कम हो और विश्व शांति को सुदृढ़ बनाया जा सके। आधुनिक युग में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास ने ऐसे हथियारों का निर्माण संभव बना दिया है जो कुछ ही क्षणों में लाखों लोगों के जीवन और विशाल क्षेत्रों को नष्ट कर सकते हैं। विशेष रूप से परमाणु, रासायनिक और जैविक हथियार मानव सभ्यता के लिए गंभीर खतरा माने जाते हैं। इसी कारण द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद निरस्त्रीकरण का प्रश्न अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया।

निरस्त्रीकरण का उद्देश्य केवल हथियारों की संख्या घटाना नहीं है, बल्कि युद्ध की मानसिकता को समाप्त करना, राष्ट्रों के बीच विश्वास स्थापित करना, सैन्य व्यय को विकास कार्यों की ओर मोड़ना तथा अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा को अधिक स्थायी आधार प्रदान करना भी है। हथियारों पर अत्यधिक व्यय विकासशील देशों के आर्थिक संसाधनों को प्रभावित करता है तथा शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक विकास जैसे क्षेत्रों में निवेश की संभावनाओं को कम कर देता है। इसलिए निरस्त्रीकरण को मानव विकास और वैश्विक कल्याण से भी जोड़ा जाता है।

निरस्त्रीकरण की प्रक्रिया में अनेक प्रकार की चुनौतियाँ सामने आती हैं। प्रत्येक राष्ट्र अपनी सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है और उसे आशंका रहती है कि यदि वह अपने हथियारों में कमी करेगा तो उसके प्रतिद्वंद्वी राष्ट्र इसका लाभ उठा सकते हैं। इसी कारण पूर्ण निरस्त्रीकरण व्यवहार में अत्यंत कठिन सिद्ध हुआ है। इसके अतिरिक्त आधुनिक हथियारों का निर्माण राष्ट्रीय प्रतिष्ठा, वैज्ञानिक क्षमता और सामरिक प्रभाव से भी जुड़ गया है, जिससे यह प्रक्रिया और अधिक जटिल बन जाती है। फिर भी विभिन्न अंतरराष्ट्रीय समझौतों, विश्वास निर्माण उपायों तथा बहुपक्षीय वार्ताओं के माध्यम से हथियारों के नियंत्रण और कमी के प्रयास निरंतर जारी हैं।

परमाणु अप्रसार संधि, जिसे सामान्यतः एन.पी.टी. कहा जाता है, परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने की दिशा में एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था है। इसका मूल उद्देश्य परमाणु हथियारों के प्रसार को सीमित करना, परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को प्रोत्साहित करना तथा दीर्घकालीन परमाणु निरस्त्रीकरण की दिशा में प्रयास करना है। इस व्यवस्था के अंतर्गत यह अपेक्षा की जाती है कि जिन देशों के पास परमाणु हथियार नहीं हैं वे उनका निर्माण नहीं करेंगे तथा जिन देशों के पास ऐसे हथियार हैं वे भविष्य में निरस्त्रीकरण की दिशा में कार्य करेंगे।

एन.पी.टी. ने वैश्विक स्तर पर परमाणु प्रसार को सीमित करने में कुछ हद तक सफलता प्राप्त की है, किंतु इसके संबंध में अनेक विवाद भी विद्यमान हैं। अनेक विकासशील देशों का मत है कि यह व्यवस्था परमाणु शक्तियों और अन्य देशों के बीच असमानता को बनाए रखती है, क्योंकि कुछ देशों को परमाणु हथियार रखने की अनुमति प्राप्त है जबकि अन्य देशों पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं। कुछ देशों का यह भी तर्क है कि जब तक सभी राष्ट्र समान रूप से निरस्त्रीकरण की दिशा में आगे नहीं बढ़ते, तब तक वैश्विक परमाणु न्याय स्थापित नहीं हो सकता। इस प्रकार एन.पी.टी. अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और समानता के बीच संतुलन स्थापित करने की निरंतर चुनौती का प्रतिनिधित्व करती है।

नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की अवधारणा विकासशील देशों की उस ऐतिहासिक मांग का परिणाम है जिसके अनुसार वैश्विक आर्थिक व्यवस्था अधिक न्यायपूर्ण, संतुलित और समतामूलक होनी चाहिए। औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद अनेक नए स्वतंत्र राष्ट्र आर्थिक दृष्टि से अत्यंत कमजोर स्थिति में थे। विश्व व्यापार, निवेश, प्रौद्योगिकी, वित्तीय संस्थाओं तथा प्राकृतिक संसाधनों पर विकसित देशों का प्रभुत्व बना हुआ था। इसके परिणामस्वरूप विकासशील देशों को यह अनुभव हुआ कि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था उनके विकास के लिए अनुकूल नहीं है।

नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था का उद्देश्य वैश्विक आर्थिक संबंधों में समानता स्थापित करना, विकासशील देशों को व्यापार में उचित अवसर प्रदान करना, प्राकृतिक संसाधनों पर उनके अधिकार को सुदृढ़ करना, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा देना तथा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में उनकी भागीदारी को अधिक प्रभावी बनाना है। इस अवधारणा का मूल आधार आर्थिक न्याय, समान विकास और वैश्विक सहयोग है। इसका यह भी उद्देश्य है कि वैश्विक आर्थिक नीतियाँ केवल विकसित देशों के हितों तक सीमित न रहें, बल्कि विकासशील देशों की आवश्यकताओं और चुनौतियों को भी समान महत्व दिया जाए।

इस अवधारणा के समर्थकों का मत है कि जब तक वैश्विक आर्थिक असमानताएँ कम नहीं होंगी, तब तक विश्व में स्थायी शांति और समृद्धि स्थापित नहीं की जा सकती। गरीबी, बेरोज़गारी, ऋण संकट, तकनीकी पिछड़ापन तथा व्यापारिक असमानताएँ अनेक देशों के विकास में बाधा उत्पन्न करती हैं। इसलिए वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को अधिक समावेशी और न्यायपूर्ण बनाना आवश्यक है। यद्यपि इस दिशा में अनेक सुधार हुए हैं, फिर भी आर्थिक असमानताओं की समस्या आज भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख विषय बनी हुई है।

उत्तर–दक्षिण संवाद आधुनिक अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंधों की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। यहाँ उत्तर शब्द का प्रयोग मुख्यतः विकसित औद्योगिक देशों के लिए तथा दक्षिण शब्द का प्रयोग विकासशील और अल्पविकसित देशों के लिए किया जाता है। दोनों समूहों के बीच आर्थिक विकास, प्रौद्योगिकी, व्यापार, निवेश, पर्यावरण, ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा तथा वित्तीय सहायता जैसे विषयों पर निरंतर संवाद की आवश्यकता अनुभव की गई। इसी आवश्यकता के परिणामस्वरूप उत्तर–दक्षिण संवाद की अवधारणा विकसित हुई।

उत्तर–दक्षिण संवाद का मुख्य उद्देश्य विकसित और विकासशील देशों के बीच सहयोग को बढ़ाना तथा वैश्विक आर्थिक असमानताओं को कम करना है। विकासशील देशों की प्रमुख मांग रही है कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय व्यापार में न्यायपूर्ण अवसर प्राप्त हों, उनके उत्पादों को विकसित देशों के बाज़ारों में प्रवेश मिले, ऋण संबंधी समस्याओं का समाधान किया जाए तथा आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी तक उनकी पहुँच सुनिश्चित की जाए। दूसरी ओर विकसित देशों का ध्यान मुक्त व्यापार, निवेश सुरक्षा, बौद्धिक संपदा अधिकार तथा वैश्विक आर्थिक स्थिरता पर अधिक केंद्रित रहा है। इन विभिन्न हितों के कारण उत्तर–दक्षिण संवाद अनेक बार जटिल हो जाता है, फिर भी यह वैश्विक आर्थिक सहयोग का एक आवश्यक माध्यम बना हुआ है।

उत्तर–दक्षिण संवाद का महत्व जलवायु परिवर्तन, सतत विकास, ऊर्जा सुरक्षा तथा वैश्विक स्वास्थ्य जैसे विषयों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। विकासशील देशों का मत है कि विकसित देशों ने ऐतिहासिक रूप से अधिक संसाधनों का उपयोग किया है, इसलिए पर्यावरण संरक्षण तथा जलवायु परिवर्तन से निपटने में उन्हें अधिक उत्तरदायित्व निभाना चाहिए। इसी प्रकार वैश्विक महामारी, खाद्य संकट तथा आर्थिक अस्थिरता जैसी समस्याओं के समाधान के लिए भी दोनों पक्षों के बीच सहयोग अनिवार्य माना जाता है।

दक्षिण–दक्षिण सहयोग विकासशील देशों के बीच पारस्परिक सहयोग की अवधारणा है। इसका उद्देश्य यह है कि विकासशील राष्ट्र अपनी समान समस्याओं, अनुभवों और संसाधनों के आधार पर एक-दूसरे के साथ आर्थिक, तकनीकी, वैज्ञानिक, शैक्षिक तथा राजनीतिक सहयोग विकसित करें। यह सहयोग केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि ज्ञान, प्रौद्योगिकी, कौशल, कृषि, स्वास्थ्य, ऊर्जा, आधारभूत संरचना तथा मानव संसाधन विकास जैसे क्षेत्रों को भी सम्मिलित करता है।

दक्षिण–दक्षिण सहयोग का आधार यह विचार है कि विकासशील देशों की अनेक चुनौतियाँ समान प्रकृति की हैं और वे अपने अनुभवों के आदान-प्रदान से एक-दूसरे की अधिक प्रभावी सहायता कर सकते हैं। इस प्रकार का सहयोग वैश्विक शक्ति-संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है क्योंकि इससे विकासशील देशों की सामूहिक आवाज़ अधिक प्रभावशाली बनती है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों के बीच व्यापार, निवेश, तकनीकी सहयोग तथा विकास साझेदारी के अनेक उदाहरण इस प्रक्रिया को सुदृढ़ करते हैं।

दक्षिण–दक्षिण सहयोग का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना भी है। विकासशील देशों ने यह अनुभव किया कि केवल विकसित देशों पर निर्भर रहकर दीर्घकालीन विकास संभव नहीं है। इसलिए उन्होंने आपसी व्यापार, क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग, वैज्ञानिक अनुसंधान, कृषि विकास तथा औद्योगिक साझेदारी को प्रोत्साहित किया। इससे विकासशील देशों के बीच विश्वास बढ़ा तथा वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में उनकी सामूहिक भूमिका मजबूत हुई।

इन सभी समकालीन अंतरराष्ट्रीय मुद्दों का पारस्परिक संबंध अत्यंत गहरा है। निरस्त्रीकरण विश्व शांति को सुदृढ़ करता है, जिससे विकास के लिए संसाधन उपलब्ध होते हैं। परमाणु अप्रसार वैश्विक सुरक्षा को मजबूत करता है। नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था आर्थिक न्याय और संतुलित विकास की दिशा में प्रयास करती है। उत्तर–दक्षिण संवाद विकसित और विकासशील देशों के बीच सहयोग का मार्ग प्रशस्त करता है, जबकि दक्षिण–दक्षिण सहयोग विकासशील देशों की सामूहिक शक्ति और आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ बनाता है। इन सभी प्रक्रियाओं का अंतिम उद्देश्य अधिक न्यायपूर्ण, सुरक्षित, सहयोगपूर्ण और संतुलित विश्व व्यवस्था की स्थापना है।

समकालीन विश्व में इन विषयों की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ गई है। परमाणु हथियारों के आधुनिकीकरण, क्षेत्रीय संघर्षों, आर्थिक असमानताओं, व्यापारिक विवादों, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा संकट, महामारी, साइबर सुरक्षा तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी नई चुनौतियों ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता को पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। यदि राष्ट्र केवल संकीर्ण राष्ट्रीय हितों तक सीमित रहेंगे तो इन वैश्विक समस्याओं का समाधान संभव नहीं होगा। इसके लिए बहुपक्षीय संस्थाओं, अंतरराष्ट्रीय कानून, साझा उत्तरदायित्व तथा पारस्परिक विश्वास पर आधारित सहयोग की आवश्यकता है।

भारत के दृष्टिकोण से भी ये सभी विषय अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। भारत निरस्त्रीकरण का समर्थक रहा है, किंतु वह वैश्विक परमाणु व्यवस्था में समानता और न्याय की आवश्यकता पर भी बल देता है। भारत नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था, विकासशील देशों के अधिकारों, उत्तर–दक्षिण संवाद की प्रभावशीलता तथा दक्षिण–दक्षिण सहयोग को निरंतर प्रोत्साहित करता रहा है। विकास साझेदारी, क्षमता निर्माण, तकनीकी सहयोग, मानवीय सहायता तथा वैश्विक दक्षिण की आवाज़ को सशक्त बनाने के लिए भारत की भूमिका निरंतर विस्तृत होती जा रही है।

समग्र रूप से कहा जा सकता है कि निरस्त्रीकरण, परमाणु अप्रसार संधि, नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था, उत्तर–दक्षिण संवाद तथा दक्षिण–दक्षिण सहयोग समकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति के ऐसे आधारभूत विषय हैं जो विश्व शांति, आर्थिक न्याय, वैश्विक सुरक्षा, सतत विकास तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग के भविष्य को निर्धारित करते हैं। इनका अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि आधुनिक विश्व की समस्याओं का समाधान केवल शक्ति-संतुलन या सैन्य प्रतिस्पर्धा से संभव नहीं है, बल्कि न्यायपूर्ण आर्थिक व्यवस्था, समान अवसर, वैज्ञानिक सहयोग, राजनीतिक संवाद, पारस्परिक सम्मान तथा साझा उत्तरदायित्व पर आधारित वैश्विक व्यवस्था के निर्माण से ही स्थायी शांति और समृद्धि प्राप्त की जा सकती है। यही दृष्टिकोण आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति को अधिक मानवीय, संतुलित और सहयोगात्मक दिशा प्रदान करता है तथा विश्व समुदाय के सामूहिक भविष्य के लिए एक सुदृढ़ वैचारिक आधार प्रस्तुत करता है।

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