Unit – 4
The World in the Twenty First Century : Post Cold War development in
International Politics, Emerging Power Structure.
इक्कीसवीं शताब्दी का विश्व: शीत युद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय राजनीति का विकास तथा उभरती हुई वैश्विक शक्ति संरचना।
इक्कीसवीं शताब्दी का विश्व अंतरराष्ट्रीय राजनीति के इतिहास में एक ऐसे संक्रमणकाल का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें पारंपरिक शक्ति-संघर्ष, वैचारिक प्रतिस्पर्धा और सैन्य गठबंधनों के साथ-साथ आर्थिक वैश्वीकरण, तकनीकी क्रांति, डिजिटल परिवर्तन, जलवायु परिवर्तन, मानव सुरक्षा, आतंकवाद, साइबर युद्ध, ऊर्जा सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा बहुध्रुवीय शक्ति-संतुलन जैसे नए आयाम समान रूप से महत्वपूर्ण हो गए हैं। बीसवीं शताब्दी के अधिकांश समय तक विश्व राजनीति शीत युद्ध की वैचारिक प्रतिस्पर्धा से प्रभावित रही, जिसमें दो महाशक्तियाँ—संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ—विश्व व्यवस्था के प्रमुख केंद्र थे। किंतु शीत युद्ध की समाप्ति के साथ अंतरराष्ट्रीय राजनीति की प्रकृति में व्यापक परिवर्तन प्रारम्भ हुआ। सोवियत संघ के विघटन ने केवल द्विध्रुवीय शक्ति-संतुलन का अंत नहीं किया, बल्कि वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका को भी नई दिशा प्रदान की। परिणामस्वरूप इक्कीसवीं शताब्दी का विश्व अधिक जटिल, परस्पर निर्भर, बहुआयामी तथा परिवर्तनशील अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के रूप में विकसित हुआ।
शीत युद्ध की समाप्ति के बाद प्रारंभिक वर्षों में ऐसा प्रतीत हुआ कि विश्व एकध्रुवीय व्यवस्था की ओर अग्रसर हो गया है। संयुक्त राज्य अमेरिका आर्थिक, सैन्य, तकनीकी तथा राजनीतिक दृष्टि से सबसे शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभरा। उसकी वैश्विक सैन्य उपस्थिति, वैज्ञानिक प्रगति, वित्तीय संस्थाओं पर प्रभाव तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों में नेतृत्वकारी भूमिका ने उसे विश्व राजनीति का प्रमुख केंद्र बना दिया। अनेक विद्वानों ने इस समय को एकध्रुवीय क्षण की संज्ञा दी, क्योंकि ऐसा प्रतीत होता था कि निकट भविष्य में कोई अन्य शक्ति अमेरिका की समकक्ष स्थिति प्राप्त नहीं कर सकेगी। इस काल में उदार लोकतंत्र, मुक्त व्यापार, वैश्वीकरण और बाजार अर्थव्यवस्था को व्यापक समर्थन मिला तथा अनेक देशों ने आर्थिक उदारीकरण और राजनीतिक सुधारों को अपनाया।
किन्तु समय के साथ यह स्पष्ट होने लगा कि एकध्रुवीय व्यवस्था स्थायी नहीं रहेगी। एशिया के अनेक देशों का तीव्र आर्थिक विकास, नई प्रौद्योगिकियों का विस्तार, क्षेत्रीय संगठनों का सुदृढ़ीकरण तथा उभरती शक्तियों का प्रभाव बढ़ने लगा। परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय राजनीति धीरे-धीरे बहुध्रुवीय संरचना की ओर अग्रसर हुई। आज विश्व में शक्ति केवल एक या दो देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि अनेक क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियाँ विभिन्न क्षेत्रों में प्रभाव स्थापित कर रही हैं। इस परिवर्तन ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को अधिक प्रतिस्पर्धी होने के साथ-साथ अधिक सहयोगात्मक भी बनाया है।
इक्कीसवीं शताब्दी की अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण आधार वैश्वीकरण है। वैश्वीकरण ने वस्तुओं, सेवाओं, पूँजी, प्रौद्योगिकी, विचारों तथा मानव संसाधनों के वैश्विक आदान-प्रदान को अभूतपूर्व गति प्रदान की है। देशों की अर्थव्यवस्थाएँ पहले की अपेक्षा अधिक परस्पर निर्भर हो गई हैं। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, वैश्विक निवेश, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, डिजिटल संचार तथा वैश्विक वित्तीय बाजारों ने राष्ट्रीय सीमाओं के महत्व को आंशिक रूप से कम कर दिया है। आर्थिक विकास के नए अवसर उत्पन्न हुए, किंतु इसके साथ आर्थिक असमानता, वित्तीय संकट, बेरोज़गारी, सांस्कृतिक परिवर्तन तथा वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं पर निर्भरता जैसी नई चुनौतियाँ भी सामने आईं।
प्रौद्योगिकी और सूचना क्रांति ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति की प्रकृति को मूल रूप से बदल दिया है। इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर प्रौद्योगिकी, उपग्रह संचार, क्वांटम कंप्यूटिंग, जैव प्रौद्योगिकी तथा डिजिटल अर्थव्यवस्था ने राज्यों की शक्ति और सुरक्षा की पारंपरिक अवधारणाओं का विस्तार किया है। अब किसी राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी सैन्य क्षमता से नहीं मापी जाती, बल्कि उसकी तकनीकी दक्षता, नवाचार क्षमता, डेटा संसाधनों, वैज्ञानिक अनुसंधान तथा डिजिटल अवसंरचना से भी निर्धारित होती है। साइबर हमले, सूचना युद्ध, डिजिटल जासूसी तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर नियंत्रण आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति के महत्वपूर्ण विषय बन चुके हैं।
शीत युद्धोत्तर विश्व में सुरक्षा की अवधारणा भी व्यापक हुई है। पारंपरिक सुरक्षा का संबंध मुख्यतः सीमाओं की रक्षा और सैन्य शक्ति से था, किंतु आधुनिक समय में मानव सुरक्षा को भी समान महत्व दिया जाने लगा है। मानव सुरक्षा के अंतर्गत खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा, पर्यावरणीय सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा तथा सामाजिक स्थिरता को सम्मिलित किया जाता है। महामारी, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाएँ, जैविक खतरे तथा वैश्विक आर्थिक संकटों ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा केवल उसकी सेना से सुनिश्चित नहीं हो सकती। इसके लिए व्यापक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग आवश्यक है।
आतंकवाद इक्कीसवीं शताब्दी की सबसे गंभीर वैश्विक चुनौतियों में से एक है। अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठनों ने यह सिद्ध किया कि गैर-राज्य अभिकर्ता भी विश्व राजनीति को गहराई से प्रभावित कर सकते हैं। आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक सहयोग, वित्तीय निगरानी, खुफिया जानकारी का आदान-प्रदान, सीमा सुरक्षा तथा वैचारिक उग्रवाद की रोकथाम अंतरराष्ट्रीय राजनीति के प्रमुख विषय बन गए हैं। इसके अतिरिक्त समुद्री डकैती, मादक पदार्थों की तस्करी, मानव तस्करी, संगठित अपराध तथा साइबर अपराध जैसी समस्याएँ भी राज्यों के लिए नई सुरक्षा चुनौतियाँ प्रस्तुत कर रही हैं।
जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों में सम्मिलित हो चुके हैं। वैश्विक तापवृद्धि, समुद्र-स्तर में वृद्धि, जैव विविधता का ह्रास, जल संकट, प्रदूषण तथा चरम मौसम की घटनाएँ किसी एक देश तक सीमित नहीं रहतीं। इनके समाधान के लिए सभी देशों के बीच सहयोग, वैज्ञानिक अनुसंधान, वित्तीय सहायता तथा साझा उत्तरदायित्व आवश्यक हैं। सतत विकास की अवधारणा इसी व्यापक दृष्टिकोण को व्यक्त करती है जिसमें आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया जाता है।
इक्कीसवीं शताब्दी की विश्व राजनीति में अंतरराष्ट्रीय संगठनों और बहुपक्षीय संस्थाओं की भूमिका भी अत्यधिक महत्वपूर्ण हो गई है। वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए केवल राष्ट्रीय प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। स्वास्थ्य, व्यापार, पर्यावरण, वित्त, शिक्षा, मानवाधिकार, शरणार्थी संरक्षण तथा शांति स्थापना जैसे क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ समन्वयकारी भूमिका निभाती हैं। यद्यपि इन संस्थाओं की प्रभावशीलता अनेक बार सदस्य देशों की राजनीतिक इच्छा पर निर्भर करती है, फिर भी वैश्विक शासन की प्रक्रिया में उनका महत्व निरंतर बढ़ रहा है।
उभरती हुई वैश्विक शक्ति संरचना इक्कीसवीं शताब्दी की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है। आज विश्व धीरे-धीरे बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर अग्रसर है। संयुक्त राज्य अमेरिका अभी भी महत्वपूर्ण वैश्विक शक्ति बना हुआ है, किंतु उसके साथ अनेक अन्य राष्ट्र भी आर्थिक, तकनीकी, सैन्य तथा कूटनीतिक दृष्टि से प्रभावशाली बनकर उभरे हैं। एशिया का बढ़ता आर्थिक महत्व, यूरोप की सामूहिक आर्थिक क्षमता, विभिन्न क्षेत्रीय शक्तियों का उदय तथा वैश्विक दक्षिण की बढ़ती भूमिका ने शक्ति-संतुलन को अधिक विविधतापूर्ण बना दिया है। अब शक्ति का वितरण पहले की अपेक्षा अधिक व्यापक और बहुस्तरीय हो गया है।
उभरती शक्ति संरचना में आर्थिक शक्ति का महत्व सैन्य शक्ति के समान ही बढ़ गया है। किसी राष्ट्र की उत्पादन क्षमता, प्रौद्योगिकी, नवाचार, ऊर्जा संसाधन, वैश्विक व्यापार में भागीदारी, वित्तीय संस्थाओं में प्रभाव तथा मानव संसाधनों की गुणवत्ता उसकी अंतरराष्ट्रीय स्थिति को निर्धारित करते हैं। इसी कारण आर्थिक प्रतिस्पर्धा, व्यापारिक समझौते, निवेश, आपूर्ति शृंखलाएँ तथा तकनीकी सहयोग आधुनिक शक्ति राजनीति के महत्वपूर्ण साधन बन चुके हैं।
क्षेत्रीय संगठनों का महत्व भी निरंतर बढ़ रहा है। विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के राष्ट्र आर्थिक, राजनीतिक तथा सुरक्षा संबंधी सहयोग को सुदृढ़ बनाने के लिए क्षेत्रीय संस्थाओं का निर्माण कर रहे हैं। इन संगठनों के माध्यम से सदस्य देश व्यापार, निवेश, आधारभूत संरचना, ऊर्जा, परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा सुरक्षा के क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देते हैं। इससे वैश्विक शासन की प्रक्रिया अधिक विकेंद्रीकृत और बहुस्तरीय बन रही है।
वैश्विक दक्षिण की अवधारणा भी शीत युद्धोत्तर राजनीति में विशेष रूप से महत्वपूर्ण हुई है। एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका के अनेक विकासशील देशों ने अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था, जलवायु न्याय, विकास वित्त, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा वैश्विक शासन में समान प्रतिनिधित्व की मांग को अधिक संगठित रूप से प्रस्तुत किया है। इन देशों का उद्देश्य केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय निर्णय-निर्माण प्रक्रिया में अधिक न्यायपूर्ण और संतुलित भागीदारी सुनिश्चित करना भी है। इससे वैश्विक राजनीति में नई आवाज़ों और नए दृष्टिकोणों का उदय हुआ है।
भारत इक्कीसवीं शताब्दी की उभरती शक्ति संरचना में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था, तीव्र आर्थिक विकास, वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता, अंतरिक्ष कार्यक्रम, डिजिटल प्रगति, विशाल जनसंख्या, सामरिक स्थिति तथा सक्रिय विदेश नीति ने भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका को अत्यधिक सुदृढ़ बनाया है। भारत बहुपक्षीय सहयोग, रणनीतिक स्वायत्तता, समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद-विरोधी प्रयासों, जलवायु न्याय, सतत विकास तथा वैश्विक दक्षिण के हितों के समर्थन में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। विकास साझेदारी, मानवीय सहायता, क्षमता निर्माण तथा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रचनात्मक भागीदारी के माध्यम से भारत अपनी वैश्विक उपस्थिति को निरंतर विस्तारित कर रहा है।
शीत युद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति की प्रकृति भी परिवर्तित हुई है। कठोर शक्ति के साथ-साथ कोमल शक्ति और स्मार्ट शक्ति का महत्व बढ़ा है। किसी देश की संस्कृति, शिक्षा, विज्ञान, लोकतांत्रिक मूल्य, विकास मॉडल, मानवीय सहायता, कूटनीतिक विश्वसनीयता तथा तकनीकी नवाचार उसकी वैश्विक प्रतिष्ठा को प्रभावित करते हैं। इसलिए आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में केवल सैन्य शक्ति पर्याप्त नहीं मानी जाती, बल्कि सांस्कृतिक प्रभाव, आर्थिक सहयोग और नैतिक नेतृत्व भी शक्ति के महत्वपूर्ण स्रोत बन चुके हैं।
समकालीन विश्व व्यवस्था अनेक चुनौतियों और अवसरों से परिपूर्ण है। एक ओर आर्थिक विकास, वैज्ञानिक प्रगति, डिजिटल नवाचार और वैश्विक सहयोग की संभावनाएँ बढ़ी हैं, वहीं दूसरी ओर भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, क्षेत्रीय संघर्ष, ऊर्जा संकट, जलवायु परिवर्तन, साइबर युद्ध, महामारी, आर्थिक असमानता तथा संसाधनों पर नियंत्रण की प्रतिस्पर्धा जैसी समस्याएँ भी गहन होती जा रही हैं। इन परिस्थितियों में किसी भी राष्ट्र के लिए केवल सैन्य शक्ति पर्याप्त नहीं है; उसे आर्थिक सुदृढ़ता, तकनीकी आत्मनिर्भरता, प्रभावी कूटनीति, मानव संसाधन विकास तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग को समान महत्व देना होगा।
समग्र रूप से कहा जा सकता है कि इक्कीसवीं शताब्दी का विश्व शीत युद्धोत्तर परिवर्तन, वैश्वीकरण, तकनीकी क्रांति, मानव सुरक्षा, बहुध्रुवीय शक्ति संरचना तथा वैश्विक सहयोग की नई संभावनाओं का युग है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति अब केवल राज्यों के बीच शक्ति-संघर्ष का अध्ययन नहीं रह गई है, बल्कि यह वैश्विक शासन, आर्थिक न्याय, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व, मानव कल्याण, डिजिटल सुरक्षा तथा सतत विकास जैसे व्यापक विषयों को भी समाहित करती है। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद विकसित हुई नई विश्व व्यवस्था ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों में प्रतिस्पर्धा और सहयोग दोनों साथ-साथ चलते हैं। भविष्य की विश्व राजनीति उसी दिशा में आगे बढ़ेगी जहाँ शक्ति और उत्तरदायित्व, राष्ट्रीय हित और वैश्विक हित, विकास और पर्यावरण, स्वतंत्रता और सुरक्षा तथा प्रतिस्पर्धा और सहयोग के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके। यही संतुलन इक्कीसवीं शताब्दी की अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता और उसकी स्थायी चुनौती है।
