Paper 3 – Advanced Indian Administration
उन्नत भारतीय प्रशासन
उन्नत भारतीय प्रशासन आधुनिक भारतीय राज्य की वह जटिल एवं विकसित प्रशासनिक व्यवस्था है जो संविधानिक ढांचे, लोकतांत्रिक मूल्यों, संघीय संरचना तथा सामाजिक-आर्थिक विकास की आवश्यकताओं के अनुरूप कार्य करती है। स्वतंत्रता के बाद भारत ने एक ऐसी प्रशासनिक प्रणाली विकसित की जिसमें ब्रिटिश काल की नौकरशाही परंपराओं के साथ-साथ लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व, कल्याणकारी राज्य की अवधारणा और विकासोन्मुख प्रशासन का समावेश किया गया। भारतीय प्रशासन का मूल उद्देश्य केवल कानून एवं व्यवस्था बनाए रखना नहीं रहा, बल्कि सामाजिक न्याय, आर्थिक विकास, गरीबी उन्मूलन, समानता तथा समावेशी विकास को सुनिश्चित करना भी बन गया। इस प्रक्रिया में प्रशासन की भूमिका एक नियंत्रक व्यवस्था से बदलकर एक सक्रिय विकास एजेंसी के रूप में विकसित हुई है। भारतीय प्रशासन की संरचना में केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर पर विभिन्न संस्थाएँ कार्य करती हैं, जिनमें अखिल भारतीय सेवाएँ जैसे भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा और भारतीय वन सेवा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, क्योंकि ये सेवाएँ पूरे देश में प्रशासनिक एकता और समन्वय को बनाए रखने का कार्य करती हैं। केंद्रीय सेवाएँ केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों में नीति निर्माण और क्रियान्वयन का कार्य संभालती हैं, जबकि राज्य सेवाएँ राज्य स्तर पर शासन और विकास कार्यक्रमों को लागू करती हैं। स्थानीय प्रशासन, जिसमें पंचायतें और नगर निकाय शामिल हैं, लोकतंत्र को जमीनी स्तर तक पहुँचाने का कार्य करता है और नागरिकों की प्रत्यक्ष भागीदारी को सुनिश्चित करता है। भारतीय प्रशासन की एक प्रमुख विशेषता इसका संघीय स्वरूप है, जिसमें केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन संविधान द्वारा निर्धारित किया गया है, लेकिन व्यवहार में केंद्र की भूमिका अपेक्षाकृत अधिक प्रभावशाली रही है, जिसे सहकारी संघवाद की अवधारणा के माध्यम से संतुलित करने का प्रयास किया गया है। प्रशासनिक व्यवस्था में नीति निर्माण और उसके क्रियान्वयन के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिमंडल तथा विभिन्न कैबिनेट समितियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, जो निर्णय प्रक्रिया को प्रभावी और तेज बनाती हैं। नियोजन व्यवस्था भी भारतीय प्रशासन का एक महत्वपूर्ण पक्ष रही है, जिसमें पहले योजना आयोग और वर्तमान में नीति आयोग के माध्यम से राष्ट्रीय विकास की रणनीतियाँ तैयार की जाती हैं तथा केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय स्थापित किया जाता है। नीति आयोग अधिक सहभागी और लचीली योजना प्रणाली को बढ़ावा देता है जिसमें राज्यों की भूमिका को अधिक महत्व दिया गया है। भारतीय प्रशासन में सार्वजनिक सेवा आयोगों का विशेष महत्व है, जो निष्पक्ष और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से योग्य अधिकारियों का चयन सुनिश्चित करते हैं, जिससे प्रशासन की गुणवत्ता और दक्षता बनी रहती है। प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थान जैसे लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी और अन्य प्रशिक्षण केंद्र अधिकारियों को आधुनिक प्रशासनिक चुनौतियों के लिए तैयार करते हैं, जिसमें प्रौद्योगिकी, सुशासन, नैतिकता और जनहित की समझ को विकसित किया जाता है। उन्नत भारतीय प्रशासन में सुशासन की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है, जिसमें पारदर्शिता, जवाबदेही, नागरिक केंद्रित सेवाएँ, भ्रष्टाचार नियंत्रण और ई-गवर्नेंस जैसे तत्व शामिल हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग ने प्रशासन को अधिक तेज, पारदर्शी और प्रभावी बनाया है, जिससे नागरिक सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। साथ ही प्रशासन में सुधारों की आवश्यकता लगातार महसूस की जाती रही है, जिसके अंतर्गत प्रशासनिक पुनर्गठन, प्रक्रियाओं का सरलीकरण, विकेंद्रीकरण, डिजिटल प्रशासन और जनभागीदारी को बढ़ावा देने जैसे प्रयास किए जा रहे हैं। भारतीय प्रशासन की सबसे बड़ी चुनौती इसकी विशालता, विविधता और सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ हैं, जिनके कारण नीति निर्माण और क्रियान्वयन में अनेक बाधाएँ उत्पन्न होती हैं। इसके अतिरिक्त राजनीतिक हस्तक्षेप, नौकरशाही की जड़ता, भ्रष्टाचार और संसाधनों की सीमाएँ भी प्रशासनिक दक्षता को प्रभावित करती हैं। फिर भी भारतीय प्रशासन ने लोकतांत्रिक स्थिरता बनाए रखने, विकास योजनाओं को लागू करने और सामाजिक परिवर्तन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज के समय में उन्नत भारतीय प्रशासन का उद्देश्य केवल शासन करना नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन स्तर को सुधारना, सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना और भारत को एक समावेशी, विकसित तथा डिजिटल रूप से सशक्त राष्ट्र के रूप में स्थापित करना है।
Unit – 1
Public Undertakings-Forms, Management, Control and Problems
सार्वजनिक उपक्रम: स्वरूप, प्रबंधन, नियंत्रण तथा समस्याएँ।
सार्वजनिक उपक्रम आधुनिक राज्य की आर्थिक और विकासात्मक भूमिका का एक महत्वपूर्ण अंग हैं, जिनका उद्देश्य केवल लाभ अर्जित करना नहीं बल्कि राष्ट्रीय विकास, सामाजिक कल्याण, रणनीतिक नियंत्रण तथा आर्थिक संतुलन स्थापित करना होता है। स्वतंत्रता के बाद भारत जैसे विकासशील देशों में मिश्रित अर्थव्यवस्था की अवधारणा को अपनाया गया, जिसमें निजी क्षेत्र के साथ-साथ सार्वजनिक क्षेत्र को भी समान रूप से विकास प्रक्रिया में शामिल किया गया। इसी पृष्ठभूमि में सार्वजनिक उपक्रमों का विकास हुआ, जिनका उद्देश्य उन क्षेत्रों में कार्य करना था जहाँ निजी क्षेत्र की रुचि कम थी या जहाँ बड़े पूंजी निवेश, दीर्घकालिक योजना और राष्ट्रीय हित की आवश्यकता थी। सार्वजनिक उपक्रमों का मूल विचार यह था कि महत्वपूर्ण उद्योग, आधारभूत संरचना और रणनीतिक क्षेत्र राज्य के नियंत्रण में रहें ताकि आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण सीमित हो और सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया जा सके।
सार्वजनिक उपक्रमों के स्वरूप में विविधता पाई जाती है। सामान्यतः इन्हें तीन प्रमुख रूपों में विभाजित किया जाता है—विभागीय उपक्रम, सार्वजनिक निगम तथा सरकारी कंपनियाँ। विभागीय उपक्रम सीधे सरकार के मंत्रालयों के अधीन कार्य करते हैं और इनका प्रबंधन पूर्णतः सरकारी नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार होता है। ये उपक्रम सामान्यतः उन क्षेत्रों में होते हैं जहाँ राज्य का प्रत्यक्ष नियंत्रण आवश्यक माना जाता है, जैसे रेलवे, डाक सेवाएँ आदि। सार्वजनिक निगम एक स्वतंत्र कानूनी इकाई होती है जिसका निर्माण विशेष अधिनियम के माध्यम से किया जाता है। यह उपक्रम अधिक स्वायत्तता के साथ कार्य करता है और इसके प्रबंधन में व्यावसायिक दृष्टिकोण को अधिक महत्व दिया जाता है। सरकारी कंपनियाँ कंपनी अधिनियम के अंतर्गत स्थापित होती हैं और इनमें सरकार की प्रमुख हिस्सेदारी होती है। ये उपक्रम निजी क्षेत्र की तरह कार्य करने का प्रयास करते हैं, लेकिन उनका अंतिम उद्देश्य सार्वजनिक हित होता है।
सार्वजनिक उपक्रमों का प्रबंधन एक जटिल प्रक्रिया है क्योंकि इसमें आर्थिक दक्षता और सामाजिक उत्तरदायित्व दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना होता है। इन उपक्रमों के प्रबंधन में सरकार की भूमिका नीति निर्धारण, निगरानी और समन्वय तक सीमित होती है, जबकि दैनिक संचालन प्रबंधन बोर्ड और पेशेवर प्रबंधकों द्वारा किया जाता है। आधुनिक समय में सार्वजनिक उपक्रमों में कॉर्पोरेट प्रशासन के सिद्धांतों को अपनाने पर बल दिया जा रहा है ताकि निर्णय प्रक्रिया अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और प्रभावी बन सके। प्रबंधन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि संसाधनों का उपयोग कितनी कुशलता से किया जा रहा है और संगठन कितनी तेजी से बदलती आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल पा रहा है।
सार्वजनिक उपक्रमों के नियंत्रण की व्यवस्था भी बहुस्तरीय होती है। इन पर संसदीय नियंत्रण, मंत्रालयीय नियंत्रण, लेखा परीक्षण और आंतरिक प्रबंधन नियंत्रण लागू होते हैं। संसद इन उपक्रमों की नीतियों और प्रदर्शन की समीक्षा करती है, जबकि संबंधित मंत्रालय इनके कार्यों की निगरानी करता है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) इनके वित्तीय प्रबंधन की स्वतंत्र जांच करता है ताकि वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित किया जा सके। इसके अतिरिक्त आंतरिक नियंत्रण प्रणाली के माध्यम से संगठन के भीतर ही दक्षता और पारदर्शिता बनाए रखने का प्रयास किया जाता है। नियंत्रण का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक धन का उपयोग उचित और प्रभावी ढंग से हो तथा उपक्रम अपने निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करें।
सार्वजनिक उपक्रमों की भूमिका राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। इन्होंने औद्योगीकरण को गति देने, रोजगार सृजन करने, आधारभूत संरचना विकसित करने तथा रणनीतिक क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। ऊर्जा, इस्पात, परिवहन, संचार, रक्षा उत्पादन और बैंकिंग जैसे क्षेत्रों में सार्वजनिक उपक्रमों ने देश के आर्थिक विकास की नींव मजबूत की है। इसके अतिरिक्त इन उपक्रमों ने क्षेत्रीय असंतुलन को कम करने और पिछड़े क्षेत्रों में विकास को बढ़ावा देने में भी भूमिका निभाई है।
इसके बावजूद सार्वजनिक उपक्रमों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इनमें सबसे प्रमुख समस्या दक्षता की कमी और प्रशासनिक जड़ता है, जिसके कारण कई उपक्रम अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाते। राजनीतिक हस्तक्षेप भी एक बड़ी समस्या है, जो निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करता है और व्यावसायिक स्वतंत्रता को सीमित करता है। इसके अतिरिक्त संसाधनों का अनुकूल उपयोग न होना, अत्यधिक कर्मचारियों की संख्या, तकनीकी पिछड़ापन, प्रतिस्पर्धा का अभाव तथा वित्तीय घाटा जैसी समस्याएँ भी सामान्य रूप से देखी जाती हैं। कई सार्वजनिक उपक्रम बाजार की बदलती परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को तेजी से अनुकूलित नहीं कर पाते, जिसके कारण उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कमजोर हो जाती है।
वैश्वीकरण और उदारीकरण के युग में सार्वजनिक उपक्रमों के सामने नई चुनौतियाँ भी उत्पन्न हुई हैं। निजीकरण और निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका ने इन उपक्रमों को अधिक प्रतिस्पर्धी बनने के लिए बाध्य किया है। अब इनसे अपेक्षा की जाती है कि वे केवल सामाजिक उद्देश्यों पर नहीं बल्कि दक्षता, लाभप्रदता और नवाचार पर भी ध्यान दें। इस कारण कई देशों में सार्वजनिक उपक्रमों के पुनर्गठन, विनिवेश और सुधार की प्रक्रिया अपनाई जा रही है ताकि उन्हें अधिक प्रभावी बनाया जा सके।
सार्वजनिक उपक्रमों के सुधार के लिए विभिन्न उपाय सुझाए गए हैं, जिनमें प्रबंधन में पेशेवरता बढ़ाना, स्वायत्तता को सुदृढ़ करना, प्रदर्शन आधारित मूल्यांकन प्रणाली लागू करना, तकनीकी आधुनिकीकरण करना तथा भ्रष्टाचार पर नियंत्रण शामिल हैं। इसके साथ ही पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देना भी अत्यंत आवश्यक माना जाता है ताकि जनता का विश्वास इन संस्थानों पर बना रहे।
समग्र रूप से कहा जा सकता है कि सार्वजनिक उपक्रम किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं, क्योंकि वे केवल आर्थिक गतिविधियों का संचालन नहीं करते बल्कि सामाजिक न्याय, क्षेत्रीय संतुलन और राष्ट्रीय विकास में भी योगदान देते हैं। यद्यपि इन्हें अनेक संरचनात्मक और प्रबंधन संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, फिर भी उचित सुधार और कुशल प्रबंधन के माध्यम से इन्हें अधिक प्रभावी और परिणामोन्मुख बनाया जा सकता है। आधुनिक आर्थिक व्यवस्था में इनकी भूमिका अभी भी अत्यंत महत्वपूर्ण बनी हुई है और आने वाले समय में भी ये राष्ट्रीय विकास की प्रक्रिया में एक आवश्यक साधन बने रहेंगे।
