Paper 1 – – Theoretical Aspect of International Politics
अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सैद्धान्तिक पक्ष
अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सैद्धान्तिक पक्ष वह अध्ययन क्षेत्र है जिसके माध्यम से यह समझने का प्रयास किया जाता है कि विश्व की राजनीतिक व्यवस्था किस प्रकार कार्य करती है, विभिन्न राष्ट्र एक-दूसरे के साथ किस आधार पर संबंध स्थापित करते हैं, उनके व्यवहार को कौन-से कारक प्रभावित करते हैं तथा युद्ध, शांति, सहयोग, संघर्ष, शक्ति, सुरक्षा, कूटनीति, आर्थिक संबंध और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका को किन सिद्धांतों के आधार पर समझा जा सकता है। यह केवल घटनाओं का वर्णन नहीं करता, बल्कि उनके पीछे कार्यरत कारणों, नियमों, प्रवृत्तियों और सिद्धांतों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसीलिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सैद्धान्तिक पक्ष राजनीति विज्ञान की एक अत्यंत महत्वपूर्ण शाखा माना जाता है, क्योंकि यह विश्व राजनीति को समझने के लिए वैचारिक आधार प्रदान करता है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति का विकास मानव सभ्यता के साथ-साथ हुआ है। प्राचीन काल में राज्यों के बीच संबंध सीमित थे, परंतु आधुनिक युग में संचार, परिवहन, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, वैश्वीकरण और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के विस्तार ने विश्व को परस्पर निर्भर बना दिया है। आज कोई भी राष्ट्र पूर्णतः आत्मनिर्भर नहीं रह सकता। प्रत्येक देश अपनी सुरक्षा, आर्थिक विकास, ऊर्जा, व्यापार, पर्यावरण संरक्षण, तकनीकी प्रगति तथा वैश्विक प्रतिष्ठा के लिए अन्य देशों के साथ सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों करता है। इन जटिल संबंधों को व्यवस्थित रूप से समझने के लिए सैद्धान्तिक दृष्टिकोण आवश्यक हो जाता है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सैद्धान्तिक पक्ष का प्रमुख उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि राज्य किस प्रकार निर्णय लेते हैं, वे किन परिस्थितियों में युद्ध करते हैं और किन परिस्थितियों में शांति स्थापित करते हैं, अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भूमिका कितनी प्रभावी होती है, शक्ति संतुलन कैसे कार्य करता है तथा विश्व व्यवस्था किन सिद्धांतों के आधार पर संचालित होती है। सिद्धांत घटनाओं की केवल व्याख्या ही नहीं करते, बल्कि भविष्य की संभावित प्रवृत्तियों का अनुमान लगाने में भी सहायता प्रदान करते हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सिद्धांतों का वही महत्व है जो किसी विज्ञान में नियमों और अवधारणाओं का होता है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सैद्धान्तिक अध्ययन का सबसे प्रमुख आधार राज्य को माना जाता है। राज्य को संप्रभु राजनीतिक इकाई के रूप में स्वीकार किया जाता है, जो अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए विदेश नीति बनाता है। प्रत्येक राष्ट्र का प्राथमिक उद्देश्य अपनी संप्रभुता, सुरक्षा, क्षेत्रीय अखंडता और आर्थिक विकास की रक्षा करना होता है। इसी कारण राष्ट्रीय हित को अंतरराष्ट्रीय राजनीति का केंद्रीय तत्व माना जाता है। जब विभिन्न देशों के राष्ट्रीय हित एक-दूसरे के अनुकूल होते हैं, तब सहयोग की संभावना बढ़ती है, और जब वे परस्पर टकराते हैं, तब संघर्ष उत्पन्न होता है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सैद्धान्तिक पक्ष में शक्ति की अवधारणा का विशेष महत्व है। शक्ति केवल सैन्य बल तक सीमित नहीं है, बल्कि आर्थिक क्षमता, वैज्ञानिक प्रगति, तकनीकी विकास, प्राकृतिक संसाधन, जनसंख्या, सांस्कृतिक प्रभाव, कूटनीतिक दक्षता तथा राजनीतिक स्थिरता भी किसी राष्ट्र की शक्ति के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। आधुनिक युग में सॉफ्ट पावर, आर्थिक कूटनीति, तकनीकी श्रेष्ठता और ज्ञान आधारित शक्ति का महत्व निरंतर बढ़ रहा है। इसलिए किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति का मूल्यांकन केवल उसके सैन्य संसाधनों से नहीं किया जा सकता।
सुरक्षा भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक मूलभूत सैद्धान्तिक विषय है। प्रत्येक राष्ट्र अपनी सीमाओं, नागरिकों और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए सुरक्षा व्यवस्था विकसित करता है। परंपरागत रूप से सुरक्षा का अर्थ बाहरी सैन्य आक्रमण से रक्षा करना माना जाता था, किंतु समकालीन समय में इसका दायरा विस्तृत हो गया है। आज आतंकवाद, साइबर हमले, जैविक खतरे, जलवायु परिवर्तन, महामारी, ऊर्जा संकट, खाद्य सुरक्षा तथा जल संकट भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के महत्वपूर्ण आयाम बन चुके हैं। इसलिए आधुनिक सैद्धान्तिक दृष्टिकोण सुरक्षा को बहुआयामी अवधारणा के रूप में देखता है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सैद्धान्तिक पक्ष में युद्ध और शांति दोनों का समान महत्व है। युद्ध को केवल सैन्य संघर्ष के रूप में नहीं, बल्कि राजनीतिक, आर्थिक और वैचारिक प्रतिस्पर्धा के परिणाम के रूप में भी समझा जाता है। दूसरी ओर शांति केवल युद्ध की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण संबंधों, विश्वास, सहयोग, विकास और स्थायी सुरक्षा की स्थापना का नाम है। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शांति अध्ययन, संघर्ष समाधान, मध्यस्थता, वार्ता और कूटनीति के सिद्धांतों का निरंतर विकास हुआ है।
कूटनीति अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अत्यंत महत्वपूर्ण सैद्धान्तिक तत्व है। विभिन्न राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति के लिए संवाद, समझौते, संधियों, सम्मेलनों और वार्ताओं का सहारा लेते हैं। आधुनिक कूटनीति केवल राजदूतों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसमें आर्थिक कूटनीति, सांस्कृतिक कूटनीति, सार्वजनिक कूटनीति, डिजिटल कूटनीति तथा बहुपक्षीय कूटनीति जैसे नए आयाम जुड़ चुके हैं। इस प्रकार कूटनीति संघर्ष को कम करने और सहयोग को बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन गई है।
अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भूमिका भी सैद्धान्तिक अध्ययन का महत्वपूर्ण विषय है। विभिन्न वैश्विक और क्षेत्रीय संगठन विश्व में शांति, सुरक्षा, आर्थिक विकास, मानवाधिकार, पर्यावरण संरक्षण और मानवीय सहयोग को प्रोत्साहित करते हैं। यद्यपि इन संगठनों की प्रभावशीलता पर समय-समय पर प्रश्न उठते रहे हैं, फिर भी अंतरराष्ट्रीय सहयोग को संस्थागत स्वरूप प्रदान करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। इसी प्रकार अंतरराष्ट्रीय कानून भी राष्ट्रों के व्यवहार को नियंत्रित करने और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सैद्धान्तिक पक्ष में अनेक विचारधाराओं और सिद्धांतों का विकास हुआ है। यथार्थवाद (Realism) यह मानता है कि विश्व राजनीति का मूल आधार शक्ति और राष्ट्रीय हित है। उदारवाद (Liberalism) सहयोग, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, लोकतंत्र और आर्थिक परस्पर निर्भरता को शांति का आधार मानता है। मार्क्सवादी दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय संबंधों को आर्थिक संरचना, पूंजीवाद और वर्गीय हितों के संदर्भ में समझता है। संरचनावाद (Constructivism) यह तर्क देता है कि विचार, पहचान, संस्कृति और सामाजिक मान्यताएँ भी राष्ट्रों के व्यवहार को प्रभावित करती हैं। नारीवादी, उत्तर-औपनिवेशिक तथा समालोचनात्मक दृष्टिकोण पारंपरिक सिद्धांतों की सीमाओं को रेखांकित करते हुए अंतरराष्ट्रीय राजनीति को अधिक समावेशी और मानवीय दृष्टि से समझने का प्रयास करते हैं।
समकालीन युग में वैश्वीकरण ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सैद्धान्तिक पक्ष को नई दिशा प्रदान की है। आज विश्व की अर्थव्यवस्थाएँ, संचार प्रणालियाँ, पर्यावरणीय चुनौतियाँ और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। जलवायु परिवर्तन, महामारी, साइबर अपराध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ऊर्जा सुरक्षा तथा अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद जैसी समस्याओं का समाधान कोई एक राष्ट्र अकेले नहीं कर सकता। इसलिए सहयोग, सामूहिक सुरक्षा और वैश्विक शासन की अवधारणाएँ पहले की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो गई हैं।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सैद्धान्तिक पक्ष विशेष महत्व रखता है। भारत की विदेश नीति शांति, सह-अस्तित्व, सामरिक स्वायत्तता, लोकतांत्रिक मूल्यों, विकासशील देशों के सहयोग, क्षेत्रीय स्थिरता तथा बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के सिद्धांतों पर आधारित रही है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत सुरक्षा, आर्थिक विकास, समुद्री हितों, ऊर्जा आवश्यकताओं, तकनीकी सहयोग तथा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी सक्रिय भूमिका के माध्यम से विश्व राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर रहा है।
इस प्रकार अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सैद्धान्तिक पक्ष केवल सिद्धांतों का संग्रह नहीं है, बल्कि विश्व राजनीति को समझने की एक वैज्ञानिक, विश्लेषणात्मक और व्यवस्थित पद्धति है। यह हमें बताता है कि राष्ट्रों का व्यवहार किन कारणों से निर्धारित होता है, शक्ति और सहयोग के बीच संतुलन कैसे बनता है, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ किस प्रकार कार्य करती हैं तथा बदलती वैश्विक परिस्थितियों में शांति, सुरक्षा और विकास की संभावनाओं को किस प्रकार सुदृढ़ किया जा सकता है। इसलिए राजनीति विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए इसका अध्ययन अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि इसके माध्यम से वे समकालीन विश्व व्यवस्था की प्रकृति, चुनौतियों और संभावनाओं का गहन तथा संतुलित विश्लेषण करने में सक्षम बनते हैं।
Unit – 1
Meaning, Nature and Scope, Concept of Post- International Politics, State and Non- State
Actors.
अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अर्थ, प्रकृति एवं क्षेत्र, उत्तर-अंतरराष्ट्रीय राजनीति की अवधारणा तथा राज्य एवं गैर-राज्य अभिकर्ता।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति आधुनिक राजनीतिक विज्ञान का एक अत्यंत व्यापक, गतिशील और बहुआयामी अध्ययन क्षेत्र है, जिसका संबंध विभिन्न संप्रभु राज्यों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, गैर-सरकारी संगठनों, क्षेत्रीय समूहों, वैश्विक वित्तीय संस्थाओं, आतंकवादी संगठनों, धार्मिक एवं वैचारिक आंदोलनों, डिजिटल मंचों तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय अभिकर्ताओं के बीच स्थापित राजनीतिक, आर्थिक, सामरिक, सांस्कृतिक और कूटनीतिक संबंधों से है। प्रारंभिक काल में अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अध्ययन मुख्यतः राज्यों के बीच युद्ध, शांति, शक्ति-संतुलन और कूटनीति तक सीमित था, किंतु वैश्वीकरण, सूचना एवं संचार क्रांति, आर्थिक परस्पर निर्भरता, जलवायु परिवर्तन, साइबर सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, मानवाधिकार, वैश्विक स्वास्थ्य, प्रवासन तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी नई चुनौतियों के उदय के साथ इसका स्वरूप अत्यंत व्यापक हो गया है। आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल राज्यों के पारस्परिक संबंधों का अध्ययन नहीं है, बल्कि वह संपूर्ण वैश्विक व्यवस्था के संचालन, सहयोग, संघर्ष और परिवर्तन की प्रक्रियाओं का समग्र अध्ययन है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अर्थ सामान्य रूप से उन राजनीतिक प्रक्रियाओं, निर्णयों और संबंधों से है जो राष्ट्रीय सीमाओं से परे संचालित होते हैं और जिनका प्रभाव एक से अधिक राज्यों अथवा समस्त विश्व समुदाय पर पड़ता है। इसमें शक्ति, राष्ट्रीय हित, सुरक्षा, विदेश नीति, कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय कानून, वैश्विक शासन, आर्थिक सहयोग, सामरिक प्रतिस्पर्धा तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका का अध्ययन किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख उद्देश्य यह समझना है कि विभिन्न राज्य और अन्य वैश्विक अभिकर्ता अपने-अपने हितों की रक्षा, प्रभाव के विस्तार, सुरक्षा की प्राप्ति तथा सहयोग या प्रतिस्पर्धा के माध्यम से किस प्रकार वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित करते हैं। इस अध्ययन में केवल युद्ध और संघर्ष ही नहीं, बल्कि सहयोग, विकास, मानवीय सहायता, पर्यावरण संरक्षण, व्यापार, तकनीकी साझेदारी तथा वैश्विक संस्थागत व्यवस्था को भी समान महत्व दिया जाता है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति की प्रकृति बहुआयामी है। इसका पहला महत्वपूर्ण गुण इसकी गतिशीलता है। विश्व व्यवस्था निरंतर परिवर्तनशील है और राजनीतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक तथा तकनीकी परिवर्तनों के साथ अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रकृति भी बदलती रहती है। शीत युद्ध की द्विध्रुवीय व्यवस्था, उसके पश्चात एकध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था और वर्तमान बहुध्रुवीय शक्ति-संतुलन इस परिवर्तनशीलता के प्रमुख उदाहरण हैं। आज नई आर्थिक शक्तियों, क्षेत्रीय संगठनों तथा तकनीकी कंपनियों के उदय ने वैश्विक राजनीति को पहले की तुलना में अधिक जटिल बना दिया है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दूसरी विशेषता शक्ति और राष्ट्रीय हित का महत्व है। प्रत्येक राज्य अपनी सुरक्षा, संप्रभुता, आर्थिक समृद्धि तथा अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को सुरक्षित रखने का प्रयास करता है। इसी कारण विदेश नीति का निर्माण राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर किया जाता है। शक्ति केवल सैन्य क्षमता तक सीमित नहीं है, बल्कि आर्थिक संसाधन, तकनीकी प्रगति, वैज्ञानिक अनुसंधान, जनसंख्या, प्राकृतिक संसाधन, सांस्कृतिक प्रभाव, कूटनीतिक दक्षता तथा सूचना प्रौद्योगिकी भी आधुनिक शक्ति के महत्वपूर्ण आधार बन चुके हैं। इस प्रकार शक्ति का स्वरूप निरंतर विस्तृत होता जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति की तीसरी विशेषता सहयोग और संघर्ष का सह-अस्तित्व है। विभिन्न राज्यों के बीच अनेक विषयों पर प्रतिस्पर्धा होती है, जैसे सीमा विवाद, संसाधनों पर नियंत्रण, व्यापारिक हित तथा सामरिक प्रभाव। दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन, महामारी नियंत्रण, समुद्री सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय अपराध, परमाणु अप्रसार तथा वैश्विक व्यापार जैसे विषय ऐसे हैं जिन पर व्यापक सहयोग की आवश्यकता होती है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति को केवल संघर्ष का अध्ययन मानना उचित नहीं है; यह सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों की समानांतर प्रक्रिया है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति की चौथी विशेषता इसकी बहुविषयक प्रकृति है। इसका अध्ययन केवल राजनीतिक विज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि अर्थशास्त्र, इतिहास, समाजशास्त्र, विधिशास्त्र, मनोविज्ञान, भूगोल, रक्षा अध्ययन, पर्यावरण विज्ञान तथा संचार अध्ययन से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। उदाहरण के लिए वैश्विक व्यापार का विश्लेषण आर्थिक सिद्धांतों के बिना संभव नहीं है, जबकि जलवायु परिवर्तन के राजनीतिक प्रभावों को समझने के लिए पर्यावरण विज्ञान का ज्ञान आवश्यक है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति का क्षेत्र समय के साथ अत्यंत विस्तृत हो चुका है। प्रारंभिक अध्ययन मुख्यतः युद्ध, शांति, शक्ति-संतुलन, संधियों और कूटनीति तक सीमित था। वर्तमान में इसका अध्ययन क्षेत्र विदेश नीति, अंतरराष्ट्रीय संगठन, अंतरराष्ट्रीय कानून, वैश्विक शासन, मानवाधिकार, वैश्विक अर्थव्यवस्था, विकास सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, जल सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष राजनीति, समुद्री कानून, पर्यावरणीय कूटनीति, प्रवासन, शरणार्थी समस्या, वैश्विक स्वास्थ्य, डिजिटल शासन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता की अंतरराष्ट्रीय राजनीति तथा अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद जैसे विषयों तक विस्तृत हो चुका है। इस विस्तार के कारण अंतरराष्ट्रीय राजनीति आज समकालीन वैश्विक व्यवस्था को समझने का सबसे महत्वपूर्ण अध्ययन क्षेत्र बन गई है।
उत्तर-अंतरराष्ट्रीय राजनीति की अवधारणा आधुनिक वैश्विक परिवर्तनों के संदर्भ में विकसित हुई है। पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में राज्य को सबसे महत्वपूर्ण और लगभग एकमात्र अभिकर्ता माना जाता था। यह मान्यता थी कि विश्व राजनीति का संचालन मुख्यतः संप्रभु राज्यों के बीच शक्ति-संघर्ष और कूटनीतिक संबंधों द्वारा होता है। किंतु बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और इक्कीसवीं शताब्दी में वैश्वीकरण, सूचना क्रांति, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के विस्तार, वैश्विक बाजारों की परस्पर निर्भरता तथा गैर-राज्य अभिकर्ताओं की बढ़ती भूमिका ने इस पारंपरिक दृष्टिकोण को चुनौती दी। इसी नई परिस्थिति को समझाने के लिए उत्तर-अंतरराष्ट्रीय राजनीति की अवधारणा विकसित हुई।
उत्तर-अंतरराष्ट्रीय राजनीति का मूल विचार यह है कि आज की विश्व व्यवस्था केवल राज्यों द्वारा संचालित नहीं होती। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, अंतरराष्ट्रीय संगठन, गैर-सरकारी संगठन, वैश्विक वित्तीय संस्थाएँ, मीडिया नेटवर्क, डिजिटल मंच, अंतरराष्ट्रीय सामाजिक आंदोलन, धार्मिक संगठन, आतंकवादी समूह, साइबर नेटवर्क तथा वैश्विक नागरिक समाज भी अंतरराष्ट्रीय निर्णयों को प्रभावित करते हैं। इस प्रकार शक्ति का वितरण पहले की अपेक्षा अधिक व्यापक और बहुस्तरीय हो गया है। राज्य अभी भी महत्वपूर्ण हैं, किंतु वे अकेले वैश्विक राजनीति के निर्धारक नहीं रह गए हैं।
उत्तर-अंतरराष्ट्रीय राजनीति वैश्वीकरण की प्रक्रिया पर विशेष बल देती है। आज पूँजी, वस्तुओं, सेवाओं, सूचनाओं, विचारों और मानव संसाधनों का प्रवाह राष्ट्रीय सीमाओं से परे अत्यंत तीव्र गति से हो रहा है। किसी एक देश में उत्पन्न आर्थिक संकट, महामारी, पर्यावरणीय आपदा अथवा तकनीकी परिवर्तन का प्रभाव शीघ्र ही अन्य देशों पर भी पड़ता है। इस प्रकार वैश्विक समस्याएँ साझा चुनौतियों का स्वरूप ग्रहण कर चुकी हैं और उनके समाधान के लिए बहुपक्षीय सहयोग आवश्यक हो गया है।
उत्तर-अंतरराष्ट्रीय राजनीति में संप्रभुता की पारंपरिक अवधारणा का भी पुनर्मूल्यांकन किया गया है। पारंपरिक दृष्टिकोण के अनुसार प्रत्येक राज्य अपने क्षेत्र में सर्वोच्च सत्ता रखता है, किंतु आधुनिक विश्व में अंतरराष्ट्रीय कानून, वैश्विक व्यापारिक समझौते, मानवाधिकार संबंधी संधियाँ, पर्यावरणीय दायित्व तथा क्षेत्रीय संगठनों की सदस्यता के कारण राज्यों की नीतियाँ व्यापक अंतरराष्ट्रीय ढाँचे से प्रभावित होती हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि राज्य की संप्रभुता समाप्त हो गई है, बल्कि उसका स्वरूप अधिक परस्पर-निर्भर और सहयोगात्मक बन गया है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में राज्य आज भी सबसे महत्वपूर्ण अभिकर्ता है। राज्य वह राजनीतिक संगठन है जिसके पास निश्चित भू-भाग, स्थायी जनसंख्या, प्रभावी सरकार तथा संप्रभु सत्ता होती है। राज्य की प्रमुख जिम्मेदारियों में राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना, विदेश नीति का निर्माण करना, अंतरराष्ट्रीय संधियों पर हस्ताक्षर करना, युद्ध और शांति से संबंधित निर्णय लेना, अंतरराष्ट्रीय संगठनों में प्रतिनिधित्व करना तथा राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना शामिल है। संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर राज्यों की औपचारिक भूमिका आज भी केंद्रीय बनी हुई है।
राज्य की विदेश नीति उसके राष्ट्रीय हितों का व्यावहारिक रूप होती है। विदेश नीति के माध्यम से राज्य अपने आर्थिक, राजनीतिक, सामरिक और सांस्कृतिक उद्देश्यों की प्राप्ति का प्रयास करता है। कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय वार्ता, द्विपक्षीय और बहुपक्षीय समझौते, व्यापारिक सहयोग तथा रक्षा साझेदारी राज्य के प्रमुख उपकरण हैं। आधुनिक समय में सार्वजनिक कूटनीति, डिजिटल कूटनीति तथा सांस्कृतिक कूटनीति का महत्व भी निरंतर बढ़ रहा है।
गैर-राज्य अभिकर्ता वे संगठन, संस्थाएँ अथवा समूह हैं जो राज्य न होते हुए भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करते हैं। इनकी भूमिका बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से अत्यधिक बढ़ी है। सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय संगठनों का उल्लेख किया जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र, क्षेत्रीय संगठन तथा अन्य बहुपक्षीय संस्थाएँ अंतरराष्ट्रीय सहयोग, शांति स्थापना, विकास, मानवाधिकार संरक्षण तथा वैश्विक समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये संगठन राज्यों के बीच संवाद, मध्यस्थता और सहयोग को प्रोत्साहित करते हैं।
बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भी आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति की अत्यंत प्रभावशाली गैर-राज्य अभिकर्ता बन चुकी हैं। अनेक कंपनियों की आर्थिक क्षमता कई छोटे राज्यों के सकल घरेलू उत्पाद से भी अधिक होती है। वे निवेश, प्रौद्योगिकी, रोजगार, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं तथा डिजिटल अर्थव्यवस्था के माध्यम से विभिन्न देशों की नीतियों को प्रभावित करती हैं। ऊर्जा, संचार, औषधि, कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में इनका प्रभाव विशेष रूप से दिखाई देता है।
गैर-सरकारी संगठन भी वैश्विक राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। ये संगठन मानवाधिकार, पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा, स्वास्थ्य, लैंगिक समानता, बाल अधिकार, मानवीय सहायता तथा आपदा राहत जैसे क्षेत्रों में कार्य करते हैं। अनेक बार ये संगठन सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर नैतिक दबाव बनाकर नीतिगत परिवर्तन भी सुनिश्चित करते हैं। इनके माध्यम से वैश्विक नागरिक समाज की अवधारणा को बल मिला है।
वैश्विक वित्तीय संस्थाएँ भी आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये संस्थाएँ आर्थिक विकास, वित्तीय स्थिरता, ऋण सहायता तथा संरचनात्मक सुधारों से संबंधित नीतियों को प्रभावित करती हैं। अनेक विकासशील देशों की आर्थिक नीतियाँ इनके सुझावों और वित्तीय सहायता से प्रभावित होती हैं।
मीडिया और डिजिटल संचार मंचों का प्रभाव भी अत्यधिक बढ़ गया है। समाचार संस्थाएँ, सामाजिक मीडिया मंच, डिजिटल नेटवर्क तथा सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियाँ जनमत निर्माण, राजनीतिक अभियानों, कूटनीतिक संबंधों तथा अंतरराष्ट्रीय संकटों की धारणा को प्रभावित करती हैं। सूचना का तीव्र वैश्विक प्रवाह अंतरराष्ट्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण आयाम बन चुका है।
कुछ गैर-राज्य अभिकर्ता सकारात्मक भूमिका निभाते हैं, जबकि कुछ अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए चुनौती भी प्रस्तुत करते हैं। आतंकवादी संगठन, संगठित अपराध नेटवर्क, समुद्री डाकू समूह, साइबर अपराधी तथा अवैध हथियार एवं मादक पदार्थों के अंतरराष्ट्रीय तस्करी नेटवर्क वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरे हैं। इनके कारण अंतरराष्ट्रीय सहयोग, खुफिया साझेदारी तथा सामूहिक सुरक्षा व्यवस्थाओं का महत्व बढ़ गया है।
राज्य और गैर-राज्य अभिकर्ताओं के बीच संबंध जटिल और बहुआयामी हैं। अनेक क्षेत्रों में दोनों सहयोग करते हैं, जैसे मानवीय सहायता, पर्यावरण संरक्षण, महामारी नियंत्रण तथा विकास परियोजनाएँ। दूसरी ओर कुछ परिस्थितियों में इनके बीच प्रतिस्पर्धा अथवा संघर्ष भी उत्पन्न होता है, विशेषकर तब जब गैर-राज्य अभिकर्ता राज्य की संप्रभुता, सुरक्षा अथवा नीतिगत स्वायत्तता को चुनौती देते हैं। आधुनिक वैश्विक शासन का स्वरूप इन्हीं विभिन्न अभिकर्ताओं के बीच समन्वय और संतुलन पर आधारित होता जा रहा है।
समकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में जलवायु परिवर्तन, वैश्विक महामारी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, ऊर्जा संकट, समुद्री मार्गों की सुरक्षा, अंतरिक्ष का शांतिपूर्ण उपयोग, वैश्विक व्यापारिक प्रतिस्पर्धा तथा सतत विकास जैसे विषयों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कोई भी राज्य अकेले इन चुनौतियों का समाधान नहीं कर सकता। इसलिए बहुपक्षीय सहयोग, क्षेत्रीय साझेदारी, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की प्रभावशीलता तथा गैर-राज्य अभिकर्ताओं की रचनात्मक भूमिका पहले की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
समग्र रूप से अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अध्ययन आज केवल राज्यों के पारस्परिक संबंधों तक सीमित नहीं रहा है। यह एक ऐसे वैश्विक परिवेश का अध्ययन है जिसमें शक्ति, सहयोग, संघर्ष, आर्थिक परस्पर निर्भरता, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, तकनीकी परिवर्तन और वैश्विक शासन की प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। उत्तर-अंतरराष्ट्रीय राजनीति की अवधारणा ने यह स्पष्ट किया है कि आधुनिक विश्व व्यवस्था बहुस्तरीय, बहु-अभिकर्ता और बहुआयामी हो चुकी है, जहाँ राज्य अपनी केंद्रीय भूमिका बनाए रखते हुए भी अंतरराष्ट्रीय संगठनों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, गैर-सरकारी संगठनों, वैश्विक वित्तीय संस्थाओं, डिजिटल मंचों तथा अन्य गैर-राज्य अभिकर्ताओं के साथ निरंतर अंतःक्रिया करते हैं। यही कारण है कि समकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अध्ययन केवल शक्ति-संघर्ष का अध्ययन नहीं, बल्कि वैश्विक सहयोग, साझा उत्तरदायित्व, मानव सुरक्षा, सतत विकास और विश्व व्यवस्था के निरंतर परिवर्तित होते स्वरूप को समझने का एक समग्र एवं बहुआयामी प्रयास है।
