Unit – 4
Nehru’s Role in India’s Foreign Policy
भारत की विदेश नीति के निर्माण एवं विकास में जवाहरलाल नेहरू की भूमिका।
स्वतंत्र भारत की विदेश नीति के निर्माण एवं विकास में जवाहरलाल नेहरू की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण, व्यापक और ऐतिहासिक रही है। आधुनिक भारत की विदेश नीति का प्रारंभिक स्वरूप, उसके वैचारिक आधार, उसके दीर्घकालीन उद्देश्य तथा उसकी कार्यप्रणाली पर नेहरू की गहरी छाप स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत अनेक जटिल चुनौतियों का सामना कर रहा था। देश का विभाजन, शरणार्थी समस्या, सीमाई असुरक्षा, आर्थिक पिछड़ापन, प्रशासनिक पुनर्गठन तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शीत युद्ध की शुरुआत जैसी परिस्थितियाँ भारत के सामने उपस्थित थीं। इन परिस्थितियों में भारत को ऐसी विदेश नीति की आवश्यकता थी जो एक ओर उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा करे तथा दूसरी ओर उसे विश्व समुदाय में एक सम्मानजनक, स्वतंत्र और रचनात्मक स्थान दिलाए। जवाहरलाल नेहरू ने इस चुनौती को दूरदर्शिता, व्यावहारिक बुद्धिमत्ता और व्यापक अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण के साथ स्वीकार किया तथा स्वतंत्र भारत की विदेश नीति की ऐसी आधारशिला रखी जिसने आने वाले दशकों तक भारत की वैश्विक पहचान को प्रभावित किया।
जवाहरलाल नेहरू का अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण उनके राजनीतिक अनुभव, वैचारिक अध्ययन तथा स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी से विकसित हुआ था। वे यूरोप, एशिया और विश्व राजनीति के गहन अध्येता थे। उन्होंने औपनिवेशिक व्यवस्था, साम्राज्यवाद, समाजवाद, लोकतंत्र, राष्ट्रवाद तथा अंतरराष्ट्रीय संबंधों का गंभीर अध्ययन किया था। उनके विचारों पर उदारवाद, मानवतावाद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा लोकतांत्रिक समाजवाद का प्रभाव था। साथ ही महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा और नैतिक राजनीति के सिद्धांतों ने भी उनके चिंतन को प्रभावित किया। परिणामस्वरूप उन्होंने ऐसी विदेश नीति की कल्पना की जिसमें राष्ट्रीय हितों के साथ-साथ विश्व शांति, न्याय, समानता तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग को भी महत्व प्राप्त हो।
नेहरू का विश्वास था कि भारत की स्वतंत्रता केवल एक राष्ट्रीय उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह विश्व में उपनिवेशवाद के अंत और मानव स्वतंत्रता के व्यापक आंदोलन का महत्वपूर्ण भाग है। इसलिए उन्होंने भारत की विदेश नीति को केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे वैश्विक न्याय, उपनिवेशवाद-विरोध, नस्लीय समानता तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग के व्यापक उद्देश्यों से जोड़ा। उनका मत था कि भारत को विश्व राजनीति में नैतिक नेतृत्व प्रदान करना चाहिए और ऐसे अंतरराष्ट्रीय वातावरण के निर्माण में योगदान देना चाहिए जिसमें सभी राष्ट्र समान सम्मान और स्वतंत्रता के साथ विकास कर सकें।
नेहरू की सबसे महत्वपूर्ण देन स्वतंत्र विदेश नीति की अवधारणा थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत किसी भी बाहरी शक्ति के दबाव में अपनी विदेश नीति निर्धारित नहीं करेगा। प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय प्रश्न पर भारत अपने राष्ट्रीय हितों, नैतिक मूल्यों तथा परिस्थितियों के अनुसार स्वतंत्र निर्णय करेगा। उस समय विश्व शीत युद्ध के कारण दो प्रमुख शक्ति गुटों में विभाजित था। एक ओर संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व वाला पश्चिमी गुट था और दूसरी ओर सोवियत संघ के नेतृत्व वाला समाजवादी गुट। ऐसी परिस्थितियों में अनेक नवस्वतंत्र देशों पर किसी न किसी गुट के साथ जुड़ने का दबाव था, किंतु नेहरू ने भारत के लिए स्वतंत्र नीति का मार्ग चुना। उनका विश्वास था कि किसी भी गुट का स्थायी सदस्य बनने से भारत की नीति-निर्माण की स्वतंत्रता प्रभावित होगी और उसके राष्ट्रीय हित सीमित हो सकते हैं।
इसी स्वतंत्र दृष्टिकोण से गुटनिरपेक्षता की नीति का विकास हुआ। नेहरू गुटनिरपेक्षता के प्रमुख प्रवर्तकों में थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि गुटनिरपेक्षता का अर्थ तटस्थ रहना या विश्व की समस्याओं से अलग हो जाना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ था प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय प्रश्न पर स्वतंत्र, निष्पक्ष और राष्ट्रीय हितों के अनुरूप निर्णय लेना। गुटनिरपेक्षता ने भारत को किसी भी महाशक्ति के अधीन हुए बिना विश्व राजनीति में सम्मानजनक स्थान दिलाया। इस नीति ने अनेक नवस्वतंत्र देशों को भी प्रेरित किया और आगे चलकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन एक प्रभावशाली अंतरराष्ट्रीय मंच के रूप में विकसित हुआ।
विश्व शांति के प्रति नेहरू की प्रतिबद्धता उनकी विदेश नीति का प्रमुख आधार थी। उनका विश्वास था कि युद्ध मानव सभ्यता के लिए विनाशकारी है और परमाणु हथियारों के युग में युद्ध का कोई स्थायी समाधान नहीं हो सकता। इसलिए उन्होंने विवादों के शांतिपूर्ण समाधान, संवाद, मध्यस्थता तथा अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान पर बल दिया। उन्होंने निरस्त्रीकरण, परमाणु हथियारों के नियंत्रण तथा विश्व में तनाव कम करने के प्रयासों का समर्थन किया। उनका मानना था कि स्थायी शांति केवल शक्ति संतुलन से नहीं, बल्कि पारस्परिक विश्वास, न्याय तथा सहयोग से स्थापित की जा सकती है।
नेहरू ने पंचशील के सिद्धांतों को भारत की विदेश नीति का महत्वपूर्ण आधार बनाया। इन सिद्धांतों में एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान, परस्पर आक्रमण न करना, एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना, समानता और पारस्परिक लाभ तथा शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व सम्मिलित थे। पंचशील का उद्देश्य विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं वाले देशों के बीच भी विश्वास और सहयोग स्थापित करना था। यद्यपि बाद की घटनाओं ने इन सिद्धांतों की व्यवहारिक सीमाओं को उजागर किया, फिर भी पंचशील आज भी भारत की विदेश नीति के मूल वैचारिक आधारों में सम्मिलित है।
नेहरू उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के कट्टर विरोधी थे। उनका मानना था कि किसी भी राष्ट्र पर विदेशी शासन मानव स्वतंत्रता और न्याय के विरुद्ध है। इसलिए उन्होंने एशिया और अफ्रीका के स्वतंत्रता आंदोलनों का निरंतर समर्थन किया। भारत ने इंडोनेशिया, वियतनाम, घाना, केन्या, अल्जीरिया तथा अन्य अनेक देशों के स्वतंत्रता संघर्षों को नैतिक और कूटनीतिक समर्थन प्रदान किया। इस नीति ने भारत को नवस्वतंत्र देशों के स्वाभाविक सहयोगी के रूप में स्थापित किया और उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को बढ़ाया।
दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की नीति के विरुद्ध भी नेहरू ने स्पष्ट और दृढ़ रुख अपनाया। उनका मत था कि नस्लीय भेदभाव मानव गरिमा और समानता के सिद्धांतों का गंभीर उल्लंघन है। भारत उन प्रारंभिक देशों में था जिसने रंगभेद के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवाज उठाई। संयुक्त राष्ट्र सहित विभिन्न मंचों पर भारत ने दक्षिण अफ्रीका की नस्लभेदी नीतियों की आलोचना की और रंगभेद समाप्त करने के लिए वैश्विक जनमत तैयार करने में सक्रिय भूमिका निभाई।
नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र संगठन के महत्व को भी विशेष रूप से स्वीकार किया। उनका विश्वास था कि अंतरराष्ट्रीय विवादों का समाधान बहुपक्षीय संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय कानून के माध्यम से होना चाहिए। भारत ने संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों और सिद्धांतों का समर्थन किया तथा शांति स्थापना अभियानों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग में सक्रिय भूमिका निभाई। नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र को विश्व शांति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का महत्वपूर्ण मंच माना, यद्यपि उन्होंने इसकी सीमाओं और सुधार की आवश्यकता को भी स्वीकार किया।
भारत की विदेश नीति में एशियाई और अफ्रीकी देशों के साथ सहयोग की भावना विकसित करने में भी नेहरू का महत्वपूर्ण योगदान था। उनका विश्वास था कि उपनिवेशवाद से मुक्त हो रहे देशों के बीच राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सहयोग स्थापित होना चाहिए ताकि वे विकास और आत्मनिर्भरता की दिशा में संयुक्त रूप से आगे बढ़ सकें। उन्होंने एशियाई एकता, दक्षिण-दक्षिण सहयोग तथा विकासशील देशों की सामूहिक आवाज को सशक्त बनाने के प्रयास किए। इस दृष्टिकोण ने आगे चलकर एशिया-अफ्रीका सहयोग और गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव को मजबूत किया।
नेहरू ने भारत की विदेश नीति में आर्थिक विकास को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया। उनका मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक सार्थक नहीं हो सकती जब तक आर्थिक विकास, औद्योगीकरण, वैज्ञानिक प्रगति तथा तकनीकी आत्मनिर्भरता सुनिश्चित न हो। इसलिए उन्होंने विभिन्न देशों के साथ तकनीकी सहयोग, वैज्ञानिक अनुसंधान, औद्योगिक विकास तथा आर्थिक सहायता के संतुलित संबंध विकसित किए। उन्होंने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि भारत किसी एक शक्ति पर अत्यधिक निर्भर न होकर विविध स्रोतों से सहयोग प्राप्त करे।
नेहरू की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आधुनिकता था। उन्होंने विज्ञान, प्रौद्योगिकी, शिक्षा तथा अनुसंधान को राष्ट्रीय शक्ति का आधार माना। इसी कारण उन्होंने अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग, तकनीकी आदान-प्रदान तथा शैक्षिक संबंधों को विदेश नीति का महत्वपूर्ण अंग बनाया। उनका विश्वास था कि आधुनिक विश्व में ज्ञान और विज्ञान भी कूटनीतिक शक्ति के महत्वपूर्ण साधन हैं।
पड़ोसी देशों के साथ संबंधों के संदर्भ में नेहरू ने मैत्री, सहयोग और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति अपनाई। उनका प्रयास था कि दक्षिण एशिया में स्थिरता और सहयोग का वातावरण विकसित हो। नेपाल, भूटान, श्रीलंका, म्यांमार तथा अन्य पड़ोसी देशों के साथ उन्होंने मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने का प्रयास किया। यद्यपि कुछ सीमाई विवाद और राजनीतिक चुनौतियाँ समय-समय पर सामने आईं, फिर भी उनकी मूल नीति संवाद और सहयोग पर आधारित रही।
चीन के साथ संबंधों में भी नेहरू ने प्रारंभिक वर्षों में सहयोग और मैत्री की नीति अपनाई। उन्होंने एशियाई एकता तथा शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को बढ़ावा देने का प्रयास किया। किंतु सीमा विवाद तथा 1962 के भारत-चीन युद्ध ने उनकी इस नीति को गंभीर चुनौती दी। इस युद्ध के कारण भारत की सुरक्षा नीति तथा विदेश नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन आए। आलोचकों का मत है कि चीन के प्रति नेहरू का विश्वास अपेक्षाकृत अधिक था और उन्होंने सुरक्षा संबंधी कुछ संभावित खतरों का पर्याप्त आकलन नहीं किया। दूसरी ओर अनेक विद्वानों का मत है कि उस समय उपलब्ध परिस्थितियों में उन्होंने युद्ध के बजाय सहयोग और शांति को प्राथमिकता देने का प्रयास किया, जो तत्कालीन वैश्विक संदर्भ में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक दृष्टिकोण था।
कश्मीर प्रश्न तथा अन्य क्षेत्रीय विवादों के समाधान में भी नेहरू ने अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को महत्व दिया। इस नीति की भी समय-समय पर प्रशंसा और आलोचना दोनों हुईं। समर्थकों का मत है कि इससे भारत की लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण छवि मजबूत हुई, जबकि आलोचकों का कहना है कि कुछ मामलों में अत्यधिक आदर्शवादी दृष्टिकोण ने व्यावहारिक कठिनाइयाँ उत्पन्न कीं। फिर भी यह निर्विवाद है कि नेहरू ने अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान में सैन्य शक्ति के बजाय कूटनीति और वार्ता को प्राथमिकता दी।
नेहरू की विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने नैतिक मूल्यों और राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया। उन्होंने विदेश नीति को केवल शक्ति राजनीति का साधन नहीं माना, बल्कि उसे मानवता, न्याय और सहयोग के व्यापक आदर्शों से जोड़ा। साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास और राजनीतिक स्वतंत्रता की रक्षा प्रत्येक राष्ट्र का प्रथम दायित्व है। यही कारण है कि उनकी विदेश नीति में आदर्शवाद और यथार्थवाद दोनों का समन्वय दिखाई देता है।
समकालीन दृष्टि से नेहरू की विदेश नीति का मूल्यांकन करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि उन्होंने अत्यंत कठिन अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में एक नवस्वतंत्र, संसाधन-सीमित और विकासशील राष्ट्र के लिए विदेश नीति का ढाँचा तैयार किया। उनकी अनेक नीतियाँ आज भी भारत की विदेश नीति के मूल आधार बनी हुई हैं। रणनीतिक स्वायत्तता, बहुपक्षवाद, संयुक्त राष्ट्र के प्रति आस्था, विकासशील देशों के साथ सहयोग, उपनिवेशवाद-विरोध, विश्व शांति तथा स्वतंत्र निर्णय क्षमता जैसे सिद्धांत आज भी भारतीय विदेश नीति में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। यद्यपि बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार भारत की विदेश नीति में अनेक व्यावहारिक परिवर्तन हुए हैं, फिर भी उसके वैचारिक आधार पर नेहरू की छाप स्पष्ट रूप से विद्यमान है।
समग्र रूप से कहा जा सकता है कि जवाहरलाल नेहरू केवल स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री ही नहीं थे, बल्कि वे उसकी विदेश नीति के प्रमुख वास्तुकार भी थे। उन्होंने भारत को ऐसी विदेश नीति प्रदान की जिसने उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्र, सम्मानजनक और उत्तरदायी राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। उनकी दूरदर्शिता, अंतरराष्ट्रीय दृष्टि, शांति के प्रति प्रतिबद्धता, उपनिवेशवाद-विरोधी विचार, गुटनिरपेक्षता की अवधारणा तथा बहुपक्षीय सहयोग की नीति ने भारत की वैश्विक भूमिका को दीर्घकालीन दिशा प्रदान की। उनकी विदेश नीति की उपलब्धियों और सीमाओं पर विद्वानों के बीच मतभेद हो सकते हैं, किंतु इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि आधुनिक भारत की विदेश नीति के निर्माण और विकास में उनका योगदान आधारभूत, व्यापक और ऐतिहासिक महत्व का है।
Nehru’s Role in India’s Foreign Policy
भारत की विदेश नीति के निर्माण एवं विकास में जवाहरलाल नेहरू की भूमिका।
(A) अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer)
स्वतंत्र भारत की विदेश नीति के प्रमुख वास्तुकार कौन थे?
नेहरू की विदेश नीति का प्रमुख उद्देश्य क्या था?
स्वतंत्र विदेश नीति से क्या अभिप्राय है?
गुटनिरपेक्षता का वास्तविक अर्थ क्या है?
शीत युद्ध के समय विश्व कितने गुटों में विभाजित था?
पंचशील के कितने सिद्धांत हैं?
पंचशील का प्रथम सिद्धांत क्या है?
नेहरू किस अंतरराष्ट्रीय संगठन में विशेष विश्वास रखते थे?
उपनिवेशवाद के प्रति नेहरू का क्या दृष्टिकोण था?
रंगभेद की नीति किस देश में लागू थी?
नेहरू किस प्रकार के अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान के पक्षधर थे?
दक्षिण-दक्षिण सहयोग से क्या अभिप्राय है?
भारत-चीन युद्ध किस वर्ष हुआ?
नेहरू ने विदेश नीति में किसे राष्ट्रीय शक्ति का आधार माना?
नेहरू की विदेश नीति में आदर्शवाद और किसका समन्वय था?
रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ क्या है?
नेहरू ने विदेश नीति में किस महाद्वीप के नवस्वतंत्र देशों को विशेष महत्व दिया?
भारत की विदेश नीति में बहुपक्षवाद का क्या महत्व है?
नेहरू की विदेश नीति का नैतिक आधार क्या था?
नेहरू की विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता क्या मानी जाती है?
(B) लघु उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)
नेहरू के अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
स्वतंत्र विदेश नीति की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
गुटनिरपेक्षता की नीति की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
विश्व शांति के प्रति नेहरू के विचारों की विवेचना कीजिए।
पंचशील के सिद्धांतों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उपनिवेशवाद-विरोधी नीति में नेहरू की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद के विरोध में भारत की भूमिका बताइए।
संयुक्त राष्ट्र के प्रति नेहरू का दृष्टिकोण स्पष्ट कीजिए।
एशिया और अफ्रीका के देशों के साथ सहयोग में नेहरू का योगदान लिखिए।
भारत की विदेश नीति में आर्थिक विकास के महत्व की व्याख्या कीजिए।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण ने नेहरू की विदेश नीति को किस प्रकार प्रभावित किया?
पड़ोसी देशों के प्रति नेहरू की नीति का वर्णन कीजिए।
चीन के प्रति नेहरू की नीति की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
कश्मीर प्रश्न पर नेहरू के दृष्टिकोण की व्याख्या कीजिए।
नेहरू की विदेश नीति में राष्ट्रीय हित और नैतिकता के संबंध को स्पष्ट कीजिए।
(C) दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (10–15 अंक)
स्वतंत्र भारत की विदेश नीति के निर्माण एवं विकास में जवाहरलाल नेहरू की भूमिका का विस्तारपूर्वक विवेचन कीजिए।
नेहरू की विदेश नीति के प्रमुख सिद्धांतों का समालोचनात्मक अध्ययन कीजिए।
गुटनिरपेक्षता की अवधारणा का विश्लेषण करते हुए उसके अंतरराष्ट्रीय महत्व का मूल्यांकन कीजिए।
विश्व शांति और पंचशील के सिद्धांतों के विकास में नेहरू के योगदान का विवेचन कीजिए।
उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के विरोध में नेहरू की विदेश नीति का विश्लेषण कीजिए।
संयुक्त राष्ट्र के प्रति नेहरू की नीति का आलोचनात्मक अध्ययन कीजिए।
एशिया-अफ्रीका सहयोग के विकास में नेहरू की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।
नेहरू की विदेश नीति में आर्थिक कूटनीति और वैज्ञानिक सहयोग का महत्व स्पष्ट कीजिए।
पड़ोसी देशों के साथ संबंधों में नेहरू की नीति का समालोचनात्मक अध्ययन कीजिए।
भारत-चीन संबंधों तथा 1962 के युद्ध के संदर्भ में नेहरू की विदेश नीति का मूल्यांकन कीजिए।
कश्मीर प्रश्न के संदर्भ में नेहरू की विदेश नीति का विश्लेषण कीजिए।
नेहरू की विदेश नीति में आदर्शवाद और यथार्थवाद के समन्वय की समीक्षा कीजिए।
(D) आलोचनात्मक / विश्लेषणात्मक प्रश्न
"जवाहरलाल नेहरू आधुनिक भारत की विदेश नीति के वास्तविक वास्तुकार थे।" इस कथन की समीक्षा कीजिए।
"गुटनिरपेक्षता तटस्थता नहीं, बल्कि स्वतंत्र निर्णय क्षमता का प्रतीक थी।" स्पष्ट कीजिए।
क्या पंचशील आज भी भारतीय विदेश नीति का प्रभावी आधार है? विवेचना कीजिए।
नेहरू की चीन नीति की सफलताओं एवं सीमाओं का विश्लेषण कीजिए।
क्या नेहरू की विदेश नीति अत्यधिक आदर्शवादी थी? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
नेहरू की विदेश नीति में राष्ट्रीय हित और नैतिक मूल्यों के संतुलन का मूल्यांकन कीजिए।
समकालीन भारतीय विदेश नीति में नेहरू की रणनीतिक स्वायत्तता की अवधारणा की प्रासंगिकता स्पष्ट कीजिए।
नेहरू की विदेश नीति की उपलब्धियों एवं सीमाओं का समालोचनात्मक अध्ययन कीजिए।
(E) विश्वविद्यालय परीक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न
स्वतंत्र भारत की विदेश नीति के निर्माण एवं विकास में जवाहरलाल नेहरू की भूमिका का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
जवाहरलाल नेहरू की विदेश नीति के प्रमुख सिद्धांतों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
गुटनिरपेक्षता की अवधारणा, उद्देश्य एवं महत्व का विश्लेषण कीजिए।
पंचशील के सिद्धांतों तथा विश्व शांति की स्थापना में नेहरू के योगदान की विवेचना कीजिए।
नेहरू की विदेश नीति में आदर्शवाद एवं यथार्थवाद के समन्वय का समालोचनात्मक अध्ययन कीजिए।
भारत-चीन संबंध एवं 1962 के युद्ध के संदर्भ में नेहरू की विदेश नीति का मूल्यांकन कीजिए।
समकालीन भारतीय विदेश नीति पर नेहरू की विदेश नीति के प्रभाव का विश्लेषण कीजिए।
ये प्रश्न आपके पूरे नोट्स के सभी प्रमुख बिंदुओं—स्वतंत्र विदेश नीति, गुटनिरपेक्षता, पंचशील, विश्व शांति, संयुक्त राष्ट्र, उपनिवेशवाद-विरोध, रंगभेद-विरोध, एशिया-अफ्रीका सहयोग, आर्थिक कूटनीति, वैज्ञानिक सहयोग, पड़ोसी नीति, चीन नीति, कश्मीर प्रश्न, आदर्शवाद-यथार्थवाद तथा समकालीन प्रासंगिकता—को समाहित करते हैं और एम.ए. राजनीति विज्ञान की परीक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत उपयोगी हैं।
