Unit-03
Globalization: concept, feature, effects and its impact on sovereignty of states. Alternative perspective on globalization, Ascendency of China, Multipolar World
वैश्वीकरण : अवधारणा, विशेषताएँ, प्रभाव तथा राज्यों की संप्रभुता पर इसका प्रभाव; वैश्वीकरण का वैकल्पिक दृष्टिकोण; चीन का उदय; बहुध्रुवीय विश्व।
वैश्वीकरण : अवधारणा
वैश्वीकरण आधुनिक विश्व व्यवस्था की एक ऐसी व्यापक प्रक्रिया है जिसने विभिन्न देशों, समाजों और अर्थव्यवस्थाओं को पहले की तुलना में अधिक निकटता से जोड़ दिया है। सरल शब्दों में कहा जाए तो वैश्वीकरण वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से वस्तुओं, सेवाओं, पूँजी, तकनीक, सूचनाओं, विचारों और लोगों का एक देश से दूसरे देश तक आवागमन तेजी से बढ़ता है तथा विभिन्न समाजों के बीच परस्पर निर्भरता गहरी होती जाती है। इसके कारण दुनिया के अलग-अलग हिस्से राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से एक-दूसरे से अधिक जुड़ते जा रहे हैं।
वैश्वीकरण कोई अचानक उत्पन्न हुई घटना नहीं है। विभिन्न सभ्यताओं के बीच प्राचीन काल से ही व्यापार, यात्राओं और सांस्कृतिक संपर्क के माध्यम से संबंध रहे हैं। समुद्री व्यापार मार्गों, स्थल मार्गों और बाद में औद्योगिक क्रांति ने विभिन्न क्षेत्रों के बीच संपर्क को और विस्तृत किया। लेकिन आधुनिक अर्थ में वैश्वीकरण का वास्तविक विस्तार बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ, जब संचार, परिवहन, सूचना-प्रौद्योगिकी और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अभूतपूर्व विकास हुआ। विशेष रूप से इंटरनेट और डिजिटल संचार ने वैश्विक संपर्क को अत्यंत तीव्र बना दिया।
वैश्वीकरण की अवधारणा का मूल आधार यह विचार है कि आज की दुनिया में कोई भी देश पूरी तरह अलग-थलग रहकर अपनी आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकता। एक देश के उद्योग दूसरे देश से कच्चा माल प्राप्त कर सकते हैं, तीसरे देश से तकनीक ले सकते हैं और चौथे देश के बाजार में अपना उत्पाद बेच सकते हैं। इस प्रकार उत्पादन, व्यापार, निवेश और उपभोग की प्रक्रियाएँ राष्ट्रीय सीमाओं से आगे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण कर लेती हैं।
आर्थिक दृष्टि से वैश्वीकरण का अर्थ विभिन्न राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं के बीच बढ़ते हुए संपर्क और एकीकरण से है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, विदेशी निवेश, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और वैश्विक वित्तीय बाजार इसके प्रमुख माध्यम हैं। किसी वस्तु के निर्माण में अलग-अलग देशों की भूमिका हो सकती है। इस प्रकार उत्पादन की प्रक्रिया भी वैश्विक स्तर पर विभाजित हो सकती है।
राजनीतिक दृष्टि से वैश्वीकरण ने राज्यों के बीच सहयोग और परस्पर निर्भरता को बढ़ाया है। आज जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, महामारी, साइबर सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय अपराध और आर्थिक संकट जैसी समस्याएँ किसी एक देश की सीमाओं तक सीमित नहीं हैं। इनका समाधान करने के लिए विभिन्न देशों को आपसी सहयोग और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से मिलकर कार्य करना पड़ता है। इससे अंतरराष्ट्रीय संगठनों और वैश्विक संस्थाओं का महत्व बढ़ा है।
सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी वैश्वीकरण ने समाजों को एक-दूसरे के निकट लाया है। इंटरनेट, टेलीविजन, सिनेमा, सोशल मीडिया, पर्यटन और शिक्षा के माध्यम से लोग दूसरे देशों की भाषा, संस्कृति, खान-पान, जीवनशैली और विचारों से परिचित हो रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप सांस्कृतिक आदान-प्रदान में वृद्धि हुई है। हालांकि इसके साथ स्थानीय संस्कृति और परंपराओं के सामने अपनी पहचान बनाए रखने की चुनौती भी उत्पन्न हुई है।
वैश्वीकरण की अवधारणा में परस्पर निर्भरता का विशेष महत्व है। आज किसी एक देश में होने वाली घटना का प्रभाव दूसरे देशों पर भी पड़ सकता है। उदाहरण के लिए किसी प्रमुख अर्थव्यवस्था में आर्थिक संकट उत्पन्न होने पर अंतरराष्ट्रीय बाजार, निवेश और व्यापार प्रभावित हो सकते हैं। इसी प्रकार किसी क्षेत्र में युद्ध या प्राकृतिक आपदा होने पर वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर प्रभाव पड़ सकता है। इससे स्पष्ट होता है कि आधुनिक विश्व में देश एक-दूसरे से कितने गहरे रूप से जुड़े हुए हैं।
वैश्वीकरण ने समय और दूरी की पारंपरिक सीमाओं को भी काफी हद तक कम किया है। पहले किसी दूसरे देश तक सूचना पहुँचने में लंबा समय लगता था, जबकि आज डिजिटल तकनीक के माध्यम से कुछ ही क्षणों में सूचना विश्व के किसी भी हिस्से तक पहुँच सकती है। इसी प्रकार आधुनिक परिवहन ने लोगों और वस्तुओं की आवाजाही को तेज और अपेक्षाकृत आसान बना दिया है। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार, पर्यटन, शिक्षा और रोजगार के अवसरों का विस्तार हुआ है।
वैश्वीकरण की अवधारणा में उदारीकरण और बाजार का विस्तार भी महत्वपूर्ण है। अनेक देशों ने व्यापार और निवेश से संबंधित अपने नियमों को उदार बनाया तथा विदेशी पूँजी और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रोत्साहित किया। इससे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं का वैश्विक बाजार से जुड़ाव बढ़ा। परिणामस्वरूप प्रतिस्पर्धा में वृद्धि हुई और उपभोक्ताओं के सामने वस्तुओं एवं सेवाओं के अधिक विकल्प उपलब्ध हुए।
हालाँकि वैश्वीकरण को केवल आर्थिक विस्तार के रूप में समझना उचित नहीं है। यह ज्ञान, तकनीक, विचार और संस्थागत अनुभवों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया भी है। एक देश में विकसित तकनीक दूसरे देश तक पहुँच सकती है और किसी समाज में विकसित प्रशासनिक या सामाजिक नीति दूसरे समाज के लिए प्रेरणा बन सकती है। इस प्रकार वैश्वीकरण ज्ञान और अनुभवों के अंतरराष्ट्रीय प्रसार को भी बढ़ावा देता है।
वैश्वीकरण की अवधारणा को लेकर विद्वानों में पूर्ण सहमति नहीं है। कुछ विद्वान इसे आधुनिक विकास, आर्थिक अवसर और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ाने वाली प्रक्रिया मानते हैं। उनके अनुसार वैश्वीकरण देशों के बीच संपर्क बढ़ाकर आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति और ज्ञान के विस्तार में सहायता करता है। दूसरी ओर आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखने वाले विद्वानों का मानना है कि वैश्वीकरण से सभी देशों और वर्गों को समान लाभ नहीं मिलता। शक्तिशाली अर्थव्यवस्थाएँ वैश्विक व्यवस्था में अधिक प्रभावशाली स्थिति प्राप्त कर सकती हैं, जबकि कमजोर अर्थव्यवस्थाएँ आर्थिक निर्भरता का सामना कर सकती हैं।
इस प्रकार वैश्वीकरण एक बहुआयामी और निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया है। इसका प्रभाव केवल बाजार या व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य, समाज, संस्कृति, राजनीति, तकनीक और व्यक्ति के जीवन तक दिखाई देता है। वैश्वीकरण ने विश्व को अधिक परस्पर निर्भर बनाया है और राष्ट्रीय सीमाओं के महत्व को कुछ क्षेत्रों में कम किया है, लेकिन राज्य की भूमिका समाप्त नहीं हुई है। आज भी राज्य अपनी आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा नीतियों के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अंततः कहा जा सकता है कि वैश्वीकरण वह व्यापक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से विश्व के विभिन्न देश और समाज आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा तकनीकी रूप से एक-दूसरे के साथ अधिक गहराई से जुड़ते जाते हैं। यह आधुनिक विश्व को परस्पर निर्भर बनाने वाली प्रमुख प्रक्रिया है। इसके माध्यम से अवसरों का विस्तार हुआ है, लेकिन इसके साथ असमानता, निर्भरता, सांस्कृतिक परिवर्तन और राष्ट्रीय नीति की स्वतंत्रता जैसी चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। इसलिए वैश्वीकरण को न तो पूर्णतः लाभकारी और न ही पूर्णतः हानिकारक प्रक्रिया माना जा सकता है; इसे आधुनिक विश्व व्यवस्था में अवसरों और चुनौतियों दोनों को उत्पन्न करने वाली जटिल प्रक्रिया के रूप में समझना अधिक उचित है।
वैश्वीकरण की विशेषताएँ
वैश्वीकरण की अवधारणा को समझने के बाद उसकी प्रमुख विशेषताओं को समझना आवश्यक हो जाता है। वैश्वीकरण केवल देशों के बीच व्यापार बढ़ने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और तकनीकी संबंधों में व्यापक परिवर्तन लाने वाली प्रक्रिया है। इसकी विशेषताओं को देखकर यह स्पष्ट होता है कि आधुनिक विश्व किस प्रकार एक-दूसरे से जुड़ता जा रहा है।
वैश्वीकरण की पहली और सबसे महत्वपूर्ण विशेषता विश्व की बढ़ती परस्पर निर्भरता है। आज कोई भी देश पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है। एक देश अपनी आवश्यकताओं के लिए दूसरे देश से कच्चा माल, ऊर्जा, तकनीक, पूँजी या तैयार वस्तुएँ प्राप्त करता है। इसी कारण किसी एक देश में होने वाली आर्थिक या राजनीतिक घटना का प्रभाव दूसरे देशों पर भी पड़ सकता है। इस बढ़ती निर्भरता ने राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक व्यवस्था से जोड़ दिया है।
वैश्वीकरण की दूसरी प्रमुख विशेषता अंतरराष्ट्रीय व्यापार का विस्तार है। आधुनिक परिवहन और संचार सुविधाओं ने विभिन्न देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं के आदान-प्रदान को आसान बनाया है। अब किसी देश में निर्मित वस्तु कुछ ही समय में दूसरे देश के बाजार में पहुँच सकती है। इससे बाजार का क्षेत्र राष्ट्रीय सीमाओं से आगे बढ़कर वैश्विक हो गया है।
तीसरी विशेषता पूँजी और निवेश का अंतरराष्ट्रीय प्रवाह है। आज पूँजी एक देश से दूसरे देश में अपेक्षाकृत तेजी से जा सकती है। कंपनियाँ उन देशों में निवेश करती हैं जहाँ उन्हें उत्पादन, बाजार या संसाधनों की बेहतर संभावनाएँ दिखाई देती हैं। विदेशी निवेश ने अनेक विकासशील देशों में उद्योग और रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं, हालांकि इसके साथ आर्थिक निर्भरता और पूँजी के असमान वितरण जैसी समस्याएँ भी जुड़ी हुई हैं।
वैश्वीकरण की एक महत्वपूर्ण विशेषता बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विस्तार है। ऐसी कंपनियाँ एक से अधिक देशों में उत्पादन, व्यापार और सेवाओं का संचालन करती हैं। उनका उत्पादन और बाजार किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं रहता। इनके माध्यम से तकनीक, पूँजी, प्रबंधन और उत्पादन के तरीके विभिन्न देशों तक पहुँचते हैं।
सूचना और संचार तकनीक का तीव्र विकास वैश्वीकरण की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता है। इंटरनेट, मोबाइल संचार, डिजिटल प्लेटफॉर्म और उपग्रह संचार ने दुनिया के विभिन्न हिस्सों के बीच दूरी को बहुत कम कर दिया है। आज सूचना कुछ ही क्षणों में एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक पहुँच सकती है। इससे व्यापार, शिक्षा, प्रशासन, शोध और सामाजिक संपर्क में व्यापक परिवर्तन आया है।
वैश्वीकरण की अगली विशेषता तकनीकी ज्ञान का अंतरराष्ट्रीय प्रसार है। किसी देश में विकसित नई तकनीक दूसरे देशों तक तेजी से पहुँच सकती है। इससे उत्पादन की क्षमता बढ़ती है और नए उद्योगों के विकास की संभावना पैदा होती है। सूचना-प्रौद्योगिकी, जैव-प्रौद्योगिकी, चिकित्सा और संचार के क्षेत्र में इसका प्रभाव विशेष रूप से दिखाई देता है।
वैश्वीकरण ने राष्ट्रीय सीमाओं के पार मानव संपर्क को भी बढ़ाया है। शिक्षा, रोजगार, पर्यटन, व्यापार और प्रवास के कारण लोग एक देश से दूसरे देश में अधिक संख्या में जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप विभिन्न समाजों के बीच सामाजिक और सांस्कृतिक संपर्क बढ़ता है।
इसकी एक महत्वपूर्ण विशेषता सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी है। विभिन्न देशों की भाषा, भोजन, पहनावा, संगीत, सिनेमा और जीवनशैली एक-दूसरे तक पहुँच रही है। इससे लोगों को अन्य संस्कृतियों को समझने का अवसर मिलता है। साथ ही स्थानीय संस्कृति और परंपराओं की पहचान को बनाए रखने की चुनौती भी सामने आती है।
वैश्वीकरण की एक अन्य विशेषता अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का बढ़ता महत्व है। विश्व व्यापार, वित्त, स्वास्थ्य, पर्यावरण और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनके माध्यम से देश सामूहिक रूप से वैश्विक समस्याओं पर विचार करते हैं और नियम बनाने का प्रयास करते हैं।
वैश्वीकरण ने आर्थिक उदारीकरण और बाजार आधारित व्यवस्था को भी प्रोत्साहित किया है। अनेक देशों ने व्यापार और निवेश से संबंधित प्रतिबंधों को कम किया तथा निजी क्षेत्र और विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया। इससे राष्ट्रीय बाजारों का वैश्विक बाजारों के साथ संबंध मजबूत हुआ।
प्रतिस्पर्धा में वृद्धि भी वैश्वीकरण की महत्वपूर्ण विशेषता है। जब देश और कंपनियाँ वैश्विक बाजार में प्रवेश करती हैं, तो उन्हें अन्य देशों की कंपनियों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। इससे वस्तुओं की गुणवत्ता सुधारने और उत्पादन लागत कम करने का दबाव बढ़ता है। इसका लाभ उपभोक्ताओं को अधिक विकल्पों और कई बार बेहतर कीमतों के रूप में मिल सकता है।
वैश्वीकरण की एक विशेषता वैश्विक समस्याओं का विस्तार भी है। जलवायु परिवर्तन, महामारी, आतंकवाद, साइबर अपराध, आर्थिक संकट और पर्यावरणीय संकट जैसी समस्याएँ किसी एक देश तक सीमित नहीं रहतीं। इनका प्रभाव अनेक देशों पर पड़ सकता है। इसलिए इनके समाधान के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता बढ़ गई है।
वैश्वीकरण ने राज्य की भूमिका और संप्रभुता के स्वरूप को भी प्रभावित किया है। राज्य आज भी अपनी राजनीतिक सत्ता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वैश्विक बाजार, अंतरराष्ट्रीय समझौते, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ कई नीतिगत निर्णयों को प्रभावित करती हैं। इसलिए राज्य की संप्रभुता समाप्त नहीं हुई है, बल्कि उसके प्रयोग का स्वरूप अधिक जटिल हुआ है।
एक और महत्वपूर्ण विशेषता वैश्विक बाजार का विस्तार है। उत्पादन और उपभोग की गतिविधियाँ अब केवल स्थानीय या राष्ट्रीय बाजार तक सीमित नहीं हैं। कंपनियाँ वैश्विक स्तर पर अपने उत्पाद बेचती हैं और उपभोक्ता दुनिया के अलग-अलग देशों में निर्मित वस्तुओं का उपयोग करते हैं। इससे उपभोग की आदतों और बाजार की संरचना में परिवर्तन आया है।
वैश्वीकरण की विशेषता समय और दूरी के महत्व में कमी के रूप में भी दिखाई देती है। आधुनिक संचार और परिवहन तकनीक ने लोगों, वस्तुओं और सूचनाओं की गति को अत्यधिक बढ़ा दिया है। आज दुनिया के किसी भी हिस्से में घटित घटना की जानकारी थोड़े समय में पूरी दुनिया तक पहुँच सकती है।
इस प्रकार वैश्वीकरण की विशेषताएँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। व्यापार का विस्तार पूँजी के प्रवाह को बढ़ाता है, पूँजी का प्रवाह बहुराष्ट्रीय कंपनियों को प्रोत्साहित करता है, तकनीक संचार और परिवहन को तेज करती है और इन सभी के परिणामस्वरूप देशों के बीच परस्पर निर्भरता बढ़ती जाती है।
अंततः कहा जा सकता है कि वैश्वीकरण की प्रमुख विशेषताएँ आर्थिक परस्पर निर्भरता, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, पूँजी का प्रवाह, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विस्तार, तकनीकी विकास, सूचना क्रांति, मानव संपर्क, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, वैश्विक बाजार, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका और वैश्विक समस्याओं पर सहयोग हैं। इन विशेषताओं ने आधुनिक विश्व को पहले की तुलना में अधिक जुड़ा हुआ बनाया है। हालांकि इस जुड़ाव से विकास और सहयोग के अवसर बढ़े हैं, लेकिन इसके साथ असमानता, निर्भरता और सांस्कृतिक दबाव जैसी चुनौतियाँ भी उत्पन्न हुई हैं। इसलिए वैश्वीकरण की विशेषताओं को उसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्षों के साथ समझना आवश्यक है।
प्रभाव तथा राज्यों की संप्रभुता पर वैश्वीकरण का प्रभाव; वैश्वीकरण का वैकल्पिक दृष्टिकोण; चीन का उदय; बहुध्रुवीय विश्व
वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने आधुनिक विश्व के आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को व्यापक रूप से प्रभावित किया है। इसके कारण विभिन्न देशों के बीच संपर्क और परस्पर निर्भरता बढ़ी है। आज किसी देश की अर्थव्यवस्था, राजनीति या सामाजिक परिस्थितियाँ केवल उसकी अपनी सीमाओं तक सीमित नहीं रहतीं। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, विदेशी निवेश, तकनीकी विकास, संचार क्रांति और वैश्विक संस्थाओं के विस्तार ने देशों को एक ऐसी व्यवस्था में जोड़ दिया है जिसमें एक देश की गतिविधियों का प्रभाव दूसरे देशों तक पहुँच सकता है। इसलिए वैश्वीकरण को केवल आर्थिक प्रक्रिया मानना पर्याप्त नहीं है; यह विश्व राजनीति की संरचना और राज्य की भूमिका को भी प्रभावित करने वाली व्यापक प्रक्रिया है।
वैश्वीकरण का सबसे स्पष्ट प्रभाव आर्थिक क्षेत्र में दिखाई देता है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार का विस्तार हुआ है और देशों के बीच वस्तुओं तथा सेवाओं का आदान-प्रदान बढ़ा है। विदेशी पूँजी और निवेश के प्रवाह ने विकासशील देशों में उद्योग और रोजगार के अवसर पैदा किए हैं। आधुनिक तकनीक के कारण उत्पादन की प्रक्रिया भी अंतरराष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण कर चुकी है। किसी वस्तु के निर्माण में अलग-अलग देशों से कच्चा माल, तकनीक, श्रम और पूँजी का उपयोग हो सकता है। इस प्रकार वैश्विक अर्थव्यवस्था में देशों की परस्पर निर्भरता बढ़ी है।
वैश्वीकरण ने उपभोक्ताओं के सामने वस्तुओं और सेवाओं के विकल्पों का विस्तार किया है। विभिन्न देशों की वस्तुएँ दूसरे देशों के बाजारों में उपलब्ध होने लगी हैं। प्रतिस्पर्धा बढ़ने से कंपनियों पर गुणवत्ता सुधारने और लागत कम करने का दबाव पड़ा है। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धा के सामने छोटे और स्थानीय उद्योगों को कई बार कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसी प्रकार वैश्विक अर्थव्यवस्था में होने वाले उतार-चढ़ाव का प्रभाव विकासशील देशों पर भी पड़ सकता है।
सामाजिक क्षेत्र में वैश्वीकरण ने लोगों के बीच संपर्क को बढ़ाया है। शिक्षा, रोजगार, पर्यटन और प्रवास के कारण विभिन्न देशों के लोगों का एक-दूसरे से संपर्क बढ़ा है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इस संपर्क को और अधिक तीव्र बना दिया है। लोग दूसरे देशों की घटनाओं, विचारों और जीवनशैली के बारे में तुरंत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इससे वैश्विक जागरूकता का विस्तार हुआ है।
सांस्कृतिक क्षेत्र में वैश्वीकरण ने विभिन्न संस्कृतियों के बीच आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया है। भोजन, संगीत, सिनेमा, फैशन और भाषा के स्तर पर एक देश की संस्कृति दूसरे देशों तक पहुँच रही है। इससे सांस्कृतिक विविधता को समझने के अवसर बढ़े हैं, लेकिन कुछ आलोचक यह भी मानते हैं कि अत्यधिक सांस्कृतिक प्रभाव के कारण स्थानीय परंपराओं और भाषाओं के सामने अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखने की चुनौती उत्पन्न हो सकती है।
राजनीतिक क्षेत्र में वैश्वीकरण ने राज्यों को अधिक सहयोग के लिए प्रेरित किया है। जलवायु परिवर्तन, महामारी, आतंकवाद, साइबर अपराध, अंतरराष्ट्रीय अपराध और आर्थिक संकट जैसी समस्याएँ किसी एक राज्य की सीमाओं में सीमित नहीं रहतीं। इसलिए इन समस्याओं से निपटने के लिए राज्यों को अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और अन्य देशों के साथ मिलकर कार्य करना पड़ता है। इससे अंतरराष्ट्रीय सहयोग और बहुपक्षीय संस्थाओं का महत्व बढ़ा है।
वैश्वीकरण का एक महत्वपूर्ण प्रश्न राज्यों की संप्रभुता पर इसके प्रभाव से संबंधित है। संप्रभुता का सामान्य अर्थ है कि राज्य को अपने क्षेत्र और नागरिकों के संबंध में सर्वोच्च राजनीतिक अधिकार प्राप्त हो। पारंपरिक दृष्टिकोण में राज्य को अपनी नीतियों और निर्णयों के निर्धारण में बाहरी हस्तक्षेप से स्वतंत्र माना जाता है। लेकिन वैश्वीकरण के कारण राज्य की नीतियाँ अब अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था, वैश्विक बाजार, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय समझौतों से प्रभावित हो सकती हैं।
उदाहरण के लिए, कोई देश जब अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों का हिस्सा बनता है, तो उसे कुछ निश्चित नियमों और दायित्वों का पालन करना पड़ता है। इसी प्रकार विदेशी निवेश और वैश्विक वित्तीय बाजार किसी देश की आर्थिक नीतियों को प्रभावित कर सकते हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भी कई बार इतनी आर्थिक शक्ति रखती हैं कि वे सरकारों की नीतियों पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डाल सकती हैं। इन कारणों से कुछ विद्वान मानते हैं कि वैश्वीकरण ने राज्य की पारंपरिक संप्रभुता को सीमित किया है।
लेकिन यह कहना उचित नहीं होगा कि वैश्वीकरण ने राज्य की संप्रभुता समाप्त कर दी है। राज्य आज भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण अभिनेता है। वह कानून बनाता है, कर वसूलता है, नागरिकों की सुरक्षा करता है, प्रशासन चलाता है और अपनी विदेश नीति निर्धारित करता है। वास्तव में राज्य स्वयं वैश्वीकरण के नियमों और संस्थाओं के निर्माण में भाग लेते हैं। इसलिए वैश्वीकरण को संप्रभुता की समाप्ति के बजाय संप्रभुता के स्वरूप में परिवर्तन के रूप में समझना अधिक उचित है।
वैश्वीकरण के संबंध में एक वैकल्पिक दृष्टिकोण भी विकसित हुआ है। इस दृष्टिकोण के अनुसार वैश्वीकरण को केवल मुक्त बाजार, पूँजी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विस्तार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वैश्वीकरण का उद्देश्य ऐसा होना चाहिए जिससे आर्थिक विकास के साथ सामाजिक न्याय, श्रमिक अधिकार, पर्यावरण संरक्षण और विकासशील देशों के हितों की भी रक्षा हो।
आलोचनात्मक विचारधारा से जुड़े विद्वान यह प्रश्न उठाते हैं कि वैश्वीकरण का लाभ सभी देशों और वर्गों को समान रूप से प्राप्त नहीं हुआ है। विकसित देशों और बड़ी कंपनियों के पास अधिक पूँजी और तकनीकी क्षमता होने के कारण वे वैश्विक बाजार में अधिक प्रभावशाली स्थिति प्राप्त कर सकती हैं। दूसरी ओर गरीब देशों और कमजोर वर्गों को आर्थिक प्रतिस्पर्धा और निर्भरता की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए वैकल्पिक वैश्वीकरण का उद्देश्य अधिक न्यायपूर्ण, समावेशी और संतुलित वैश्विक व्यवस्था की स्थापना करना है।
इसी वैश्विक परिवर्तन के संदर्भ में चीन का उदय विशेष महत्व रखता है। पिछले कुछ दशकों में चीन ने औद्योगिक उत्पादन, व्यापार, तकनीक और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय विकास किया है। चीन की आर्थिक शक्ति में वृद्धि ने उसे विश्व राजनीति में एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में स्थापित किया है। उसका प्रभाव केवल आर्थिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि कूटनीति, तकनीक, सैन्य क्षमता और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में उसकी सक्रियता के क्षेत्र में भी दिखाई देता है।
चीन के उदय ने वैश्विक शक्ति-संतुलन को प्रभावित किया है। चीन विश्व व्यापार और उत्पादन व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया है तथा अनेक देशों के साथ उसके आर्थिक संबंध मजबूत हुए हैं। बुनियादी ढाँचे और निवेश से जुड़ी उसकी अंतरराष्ट्रीय पहल ने भी विभिन्न क्षेत्रों में उसकी उपस्थिति बढ़ाई है। इसके कारण अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण विषय बन गई है।
चीन के उदय के साथ-साथ भारत, यूरोपीय संघ, जापान और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण बनी हुई है। इन परिवर्तनों ने विश्व राजनीति में बहुध्रुवीय विश्व की चर्चा को बढ़ावा दिया है। बहुध्रुवीय विश्व से आशय ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से है जिसमें शक्ति केवल एक देश के पास केंद्रित न होकर अनेक प्रमुख शक्तियों के बीच वितरित होती है।
शीत युद्ध के दौरान विश्व व्यवस्था मुख्यतः दो प्रमुख शक्ति-केंद्रों के आसपास संगठित थी। सोवियत संघ के विघटन के बाद कुछ समय के लिए अमेरिका को अत्यधिक प्रभावशाली स्थिति प्राप्त हुई। लेकिन बाद के दशकों में चीन की बढ़ती शक्ति, भारत की उभरती भूमिका, यूरोपीय संघ की आर्थिक क्षमता तथा अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के प्रभाव ने वैश्विक शक्ति-वितरण को अधिक जटिल बना दिया है।
बहुध्रुवीय विश्व की एक प्रमुख विशेषता यह है कि अंतरराष्ट्रीय निर्णयों में अनेक शक्ति-केंद्रों की भूमिका होती है। इससे किसी एक देश के पूर्ण प्रभुत्व को सीमित किया जा सकता है और छोटे तथा मध्यम देशों को अपनी विदेश नीति में विभिन्न शक्ति-केंद्रों के साथ संबंध बनाने के अधिक अवसर मिल सकते हैं। दूसरी ओर, विभिन्न शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ने पर तनाव और रणनीतिक संघर्ष की संभावना भी उत्पन्न हो सकती है।
वैश्वीकरण और बहुध्रुवीयता के बीच गहरा संबंध है। वैश्वीकरण ने पूँजी, तकनीक और व्यापार के प्रसार के माध्यम से कई देशों की आर्थिक क्षमता बढ़ाई है। आर्थिक क्षमता बढ़ने के साथ कुछ देशों की राजनीतिक और रणनीतिक शक्ति भी बढ़ी है। इस प्रकार वैश्वीकरण ने अप्रत्यक्ष रूप से वैश्विक शक्ति के वितरण को प्रभावित किया है।
वर्तमान विश्व में बहुध्रुवीयता का अर्थ यह नहीं है कि सभी शक्तियाँ समान रूप से प्रभावशाली हैं। विश्व राजनीति में शक्ति का वितरण असमान है और अलग-अलग देशों की आर्थिक, सैन्य, तकनीकी और कूटनीतिक क्षमताओं में अंतर है। फिर भी अनेक शक्ति-केंद्रों का उभरना अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को पहले की तुलना में अधिक जटिल और बहुस्तरीय बनाता है।
अंततः कहा जा सकता है कि वैश्वीकरण ने विश्व को आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से अधिक परस्पर निर्भर बनाया है। इसने विकास, व्यापार, तकनीक और सहयोग के नए अवसर पैदा किए हैं, लेकिन असमानता, निर्भरता और स्थानीय उद्योगों तथा संस्कृतियों पर दबाव जैसी चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। वैश्वीकरण ने राज्य की संप्रभुता को समाप्त नहीं किया, बल्कि उसके स्वरूप और प्रयोग में परिवर्तन किया है। इसी प्रक्रिया के साथ चीन का उदय और अन्य शक्तियों की बढ़ती भूमिका विश्व राजनीति को अधिक बहुध्रुवीय दिशा में ले जा रही है। इसलिए आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति को समझने के लिए वैश्वीकरण को केवल आर्थिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि शक्ति, संप्रभुता, राज्य और विश्व व्यवस्था में परिवर्तन लाने वाली व्यापक ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में समझना आवश्यक है।
दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न
वैश्वीकरण के प्रमुख प्रभावों की विस्तारपूर्वक विवेचना कीजिए।
वैश्वीकरण का आर्थिक क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ा है? स्पष्ट कीजिए।
वैश्वीकरण के राजनीतिक प्रभावों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
वैश्वीकरण ने सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को किस प्रकार प्रभावित किया है?
वैश्वीकरण के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभावों की विवेचना कीजिए।
वैश्वीकरण और अंतरराष्ट्रीय परस्पर निर्भरता के संबंध को स्पष्ट कीजिए।
वैश्वीकरण का विकासशील देशों पर क्या प्रभाव पड़ा है?
वैश्वीकरण ने विश्व अर्थव्यवस्था को किस प्रकार प्रभावित किया है?
वैश्वीकरण के कारण उत्पन्न प्रमुख चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए।
वैश्वीकरण और तकनीकी विकास के बीच संबंध स्पष्ट कीजिए।
वैश्वीकरण और राज्य की संप्रभुता
राज्य की संप्रभुता से क्या अभिप्राय है?
वैश्वीकरण का राज्य की संप्रभुता पर क्या प्रभाव पड़ा है?
क्या वैश्वीकरण ने राज्य की संप्रभुता को कमजोर किया है? विवेचना कीजिए।
वैश्वीकरण के युग में राज्य की बदलती भूमिका का परीक्षण कीजिए।
वैश्वीकरण और राष्ट्रीय संप्रभुता के बीच संबंध स्पष्ट कीजिए।
बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ राज्य की संप्रभुता को किस प्रकार प्रभावित करती हैं?
अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ राज्य की नीति-निर्माण क्षमता को किस प्रकार प्रभावित करती हैं?
वैश्वीकरण के कारण राज्य की आर्थिक संप्रभुता में किस प्रकार परिवर्तन आया है?
“वैश्वीकरण ने संप्रभुता को समाप्त नहीं किया, बल्कि उसके स्वरूप को बदल दिया है।” स्पष्ट कीजिए।
क्या आधुनिक विश्व में राज्य अभी भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख अभिनेता है? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
वैश्वीकरण का वैकल्पिक दृष्टिकोण
वैश्वीकरण के वैकल्पिक दृष्टिकोण से क्या अभिप्राय है?
वैश्वीकरण के आलोचनात्मक दृष्टिकोण की विवेचना कीजिए।
वैश्वीकरण के समर्थक और आलोचक दृष्टिकोणों की तुलना कीजिए।
वैश्वीकरण से होने वाली आर्थिक असमानता का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
वैकल्पिक वैश्वीकरण की आवश्यकता क्यों महसूस की गई?
वैश्वीकरण और सामाजिक न्याय के संबंध को स्पष्ट कीजिए।
वैश्वीकरण का श्रमिक वर्ग पर क्या प्रभाव पड़ा है?
वैश्वीकरण और स्थानीय संस्कृति के संबंध की विवेचना कीजिए।
क्या वैश्वीकरण का लाभ सभी देशों को समान रूप से प्राप्त हुआ है? चर्चा कीजिए।
वैश्वीकरण के संदर्भ में विकासशील देशों की प्रमुख समस्याओं का विश्लेषण कीजिए।
चीन का उदय
विश्व राजनीति में चीन के उदय के प्रमुख कारणों की विवेचना कीजिए।
चीन के आर्थिक उदय का अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ा है?
चीन के उदय ने वैश्विक शक्ति-संतुलन को किस प्रकार प्रभावित किया है?
चीन को उभरती हुई वैश्विक शक्ति क्यों माना जाता है?
चीन के आर्थिक और तकनीकी विकास का वैश्विक राजनीति पर प्रभाव स्पष्ट कीजिए।
चीन और अमेरिका के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा का विश्लेषण कीजिए।
चीन के उदय और वैश्वीकरण के बीच संबंध स्पष्ट कीजिए।
चीन की बढ़ती शक्ति का एशियाई राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ा है?
चीन के उदय से विश्व व्यवस्था में किस प्रकार परिवर्तन आया है?
चीन के उदय को बहुध्रुवीय विश्व के संदर्भ में समझाइए।
बहुध्रुवीय विश्व
बहुध्रुवीय विश्व से क्या अभिप्राय है?
बहुध्रुवीय विश्व की प्रमुख विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
शीत युद्ध की द्विध्रुवीय व्यवस्था और वर्तमान बहुध्रुवीय व्यवस्था में अंतर स्पष्ट कीजिए।
बहुध्रुवीय विश्व के उदय के प्रमुख कारणों का विश्लेषण कीजिए।
चीन के उदय ने बहुध्रुवीय विश्व की संभावना को किस प्रकार बढ़ाया है?
भारत की बढ़ती भूमिका और बहुध्रुवीय विश्व के संबंध को स्पष्ट कीजिए।
बहुध्रुवीय विश्व के लाभ एवं सीमाओं की विवेचना कीजिए।
क्या बहुध्रुवीय विश्व अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए उपयोगी है? आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
बहुध्रुवीयता और शक्ति-संतुलन के बीच संबंध स्पष्ट कीजिए।
वर्तमान विश्व को बहुध्रुवीय विश्व क्यों कहा जाता है? विवेचना कीजिए।
लघु-उत्तरीय प्रश्न
वैश्वीकरण क्या है?
वैश्वीकरण का एक प्रमुख आर्थिक प्रभाव बताइए।
वैश्वीकरण का एक राजनीतिक प्रभाव बताइए।
वैश्वीकरण का सामाजिक प्रभाव क्या है?
वैश्वीकरण का सांस्कृतिक प्रभाव क्या है?
वैश्वीकरण से परस्पर निर्भरता कैसे बढ़ती है?
बहुराष्ट्रीय कंपनी से क्या अभिप्राय है?
वैश्वीकरण और तकनीक में क्या संबंध है?
राज्य की संप्रभुता क्या है?
वैश्वीकरण संप्रभुता को किस प्रकार प्रभावित करता है?
आर्थिक संप्रभुता से क्या अभिप्राय है?
क्या वैश्वीकरण ने राज्य की शक्ति समाप्त कर दी है?
अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ राज्य की नीतियों को कैसे प्रभावित करती हैं?
वैश्वीकरण का स्थानीय उद्योगों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
वैश्वीकरण का रोजगार पर क्या प्रभाव पड़ा है?
वैश्वीकरण का एक सकारात्मक प्रभाव बताइए।
वैश्वीकरण की एक नकारात्मक विशेषता बताइए।
वैकल्पिक वैश्वीकरण क्या है?
वैश्वीकरण के आलोचनात्मक दृष्टिकोण से क्या अभिप्राय है?
वैश्वीकरण और सामाजिक न्याय में क्या संबंध है?
चीन के उदय से क्या अभिप्राय है?
चीन के आर्थिक उदय का एक कारण बताइए।
चीन के उदय का विश्व राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ा?
चीन और अमेरिका की प्रतिस्पर्धा क्यों महत्वपूर्ण है?
बहुध्रुवीय विश्व क्या है?
द्विध्रुवीय विश्व से क्या अभिप्राय है?
बहुध्रुवीय विश्व की एक विशेषता बताइए।
बहुध्रुवीय विश्व के दो प्रमुख शक्ति-केंद्रों के नाम बताइए।
बहुध्रुवीयता और शक्ति-संतुलन में क्या संबंध है?
वैश्वीकरण और बहुध्रुवीयता में क्या संबंध है?
वस्तुनिष्ठ प्रश्न
बहुविकल्पीय प्रश्न
1. वैश्वीकरण का मुख्य आधार क्या है?
(क) अलगाव
(ख) परस्पर संपर्क और निर्भरता
(ग) युद्ध
(घ) साम्राज्यवाद
उत्तर — (ख)
2. वैश्वीकरण का सबसे स्पष्ट प्रभाव किस क्षेत्र में दिखाई देता है?
(क) आर्थिक क्षेत्र
(ख) केवल धार्मिक क्षेत्र
(ग) केवल सैन्य क्षेत्र
(घ) केवल प्रशासनिक क्षेत्र
उत्तर — (क)
3. वैश्वीकरण ने किसे बढ़ावा दिया है?
(क) अंतरराष्ट्रीय व्यापार
(ख) पूर्ण आर्थिक अलगाव
(ग) सीमाओं का पूर्ण बंद होना
(घ) व्यापार में कमी
उत्तर — (क)
4. वैश्वीकरण के कारण देशों के बीच क्या बढ़ा है?
(क) परस्पर निर्भरता
(ख) अलगाव
(ग) युद्ध
(घ) दूरी
उत्तर — (क)
5. बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ किस प्रक्रिया से अधिक जुड़ी हैं?
(क) वैश्वीकरण
(ख) सामंतवाद
(ग) अलगाववाद
(घ) निरंकुशता
उत्तर — (क)
6. वैश्वीकरण में सूचना क्रांति का क्या महत्व है?
(क) संपर्क को तेज करना
(ख) संपर्क समाप्त करना
(ग) व्यापार रोकना
(घ) संचार सीमित करना
उत्तर — (क)
7. संप्रभुता का अर्थ है—
(क) राज्य की सर्वोच्च राजनीतिक सत्ता
(ख) आर्थिक गरीबी
(ग) सैन्य गठबंधन
(घ) अंतरराष्ट्रीय व्यापार
उत्तर — (क)
8. वैश्वीकरण ने राज्य की संप्रभुता को—
(क) कुछ क्षेत्रों में प्रभावित किया है
(ख) पूरी तरह समाप्त कर दिया है
(ग) बिल्कुल प्रभावित नहीं किया
(घ) हमेशा बढ़ाया है
उत्तर — (क)
9. वैश्वीकरण के कारण राज्य की आर्थिक नीतियाँ किससे प्रभावित हो सकती हैं?
(क) वैश्विक बाजार
(ख) केवल स्थानीय संस्थाएँ
(ग) केवल परिवार
(घ) केवल ग्राम पंचायत
उत्तर — (क)
10. वैश्वीकरण का आलोचनात्मक दृष्टिकोण किस बात पर जोर देता है?
(क) असमानता और निर्भरता
(ख) केवल आर्थिक लाभ
(ग) केवल सैन्य शक्ति
(घ) अलगाव
उत्तर — (क)
11. वैकल्पिक वैश्वीकरण का मुख्य उद्देश्य क्या है?
(क) अधिक न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था
(ख) विश्व को अलग करना
(ग) व्यापार समाप्त करना
(घ) तकनीक समाप्त करना
उत्तर — (क)
12. चीन का उदय मुख्यतः किस क्षेत्र में विशेष रूप से दिखाई देता है?
(क) आर्थिक और तकनीकी शक्ति
(ख) केवल कृषि
(ग) केवल संस्कृति
(घ) केवल पर्यटन
उत्तर — (क)
13. चीन के उदय ने किसे प्रभावित किया है?
(क) वैश्विक शक्ति-संतुलन
(ख) केवल स्थानीय राजनीति
(ग) केवल शिक्षा
(घ) केवल संस्कृति
उत्तर — (क)
14. चीन और अमेरिका के बीच प्रतिस्पर्धा मुख्यतः किससे संबंधित है?
(क) आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक शक्ति
(ख) केवल खेल
(ग) केवल पर्यटन
(घ) केवल शिक्षा
उत्तर — (क)
15. बहुध्रुवीय विश्व का अर्थ है—
(क) अनेक शक्ति-केंद्रों वाली विश्व व्यवस्था
(ख) केवल एक शक्ति वाला विश्व
(ग) केवल दो शक्ति-केंद्रों वाला विश्व
(घ) बिना किसी शक्ति के विश्व
उत्तर — (क)
16. शीत युद्ध के दौरान विश्व व्यवस्था मुख्यतः कैसी थी?
(क) द्विध्रुवीय
(ख) बहुध्रुवीय
(ग) एकध्रुवीय
(घ) अराजक
उत्तर — (क)
17. सोवियत संघ के विघटन के बाद किस देश की शक्ति को विशेष बढ़त मिली?
(क) अमेरिका
(ख) भारत
(ग) जापान
(घ) ब्राजील
उत्तर — (क)
18. बहुध्रुवीय विश्व में शक्ति—
(क) अनेक देशों या शक्ति-केंद्रों में वितरित होती है
(ख) केवल एक देश में रहती है
(ग) समाप्त हो जाती है
(घ) केवल छोटे देशों के पास होती है
उत्तर — (क)
19. चीन का उदय किस व्यवस्था के विकास में योगदान दे सकता है?
(क) बहुध्रुवीय व्यवस्था
(ख) औपनिवेशिक व्यवस्था
(ग) सामंती व्यवस्था
(घ) अलगाववादी व्यवस्था
उत्तर — (क)
20. वैश्वीकरण का एक नकारात्मक प्रभाव कौन-सा हो सकता है?
(क) आर्थिक असमानता
(ख) तकनीकी विकास
(ग) व्यापार विस्तार
(घ) सूचना का प्रसार
उत्तर — (क)
21. वैश्वीकरण का एक सकारात्मक प्रभाव कौन-सा है?
(क) तकनीक और ज्ञान का प्रसार
(ख) आर्थिक अलगाव
(ग) व्यापार में कमी
(घ) संचार का अंत
उत्तर — (क)
22. वैश्वीकरण के कारण स्थानीय उद्योगों को किस चुनौती का सामना करना पड़ सकता है?
(क) वैश्विक प्रतिस्पर्धा
(ख) पूर्ण संरक्षण
(ग) प्रतिस्पर्धा का अभाव
(घ) बाजार का अंत
उत्तर — (क)
23. बहुध्रुवीयता का संबंध मुख्यतः किससे है?
(क) शक्ति के अनेक केंद्रों से
(ख) केवल सांस्कृतिक विविधता से
(ग) केवल आर्थिक विकास से
(घ) केवल जनसंख्या से
उत्तर — (क)
24. वैश्वीकरण के कारण संस्कृति के क्षेत्र में क्या बढ़ा है?
(क) सांस्कृतिक आदान-प्रदान
(ख) पूर्ण अलगाव
(ग) संपर्क में कमी
(घ) भाषाओं का अंत
उत्तर — (क)
25. वैश्वीकरण ने समय और दूरी के महत्व को किस प्रकार प्रभावित किया है?
(क) कम किया है
(ख) बढ़ाया है
(ग) समाप्त कर दिया है
(घ) कोई प्रभाव नहीं पड़ा
उत्तर — (क)
रिक्त स्थान भरिए
वैश्वीकरण से देशों के बीच ______ निर्भरता बढ़ती है।
उत्तर — परस्परवैश्वीकरण ने अंतरराष्ट्रीय ______ को बढ़ावा दिया है।
उत्तर — व्यापारराज्य की सर्वोच्च राजनीतिक सत्ता को ______ कहा जाता है।
उत्तर — संप्रभुतावैश्वीकरण ने राज्य की संप्रभुता के ______ को प्रभावित किया है।
उत्तर — स्वरूपवैश्वीकरण का आलोचनात्मक दृष्टिकोण ______ और असमानता पर जोर देता है।
उत्तर — निर्भरताचीन का आर्थिक उदय विश्व के ______ संतुलन को प्रभावित करता है।
उत्तर — शक्तिअनेक शक्ति-केंद्रों वाली विश्व व्यवस्था को ______ विश्व कहा जाता है।
उत्तर — बहुध्रुवीयशीत युद्ध की विश्व व्यवस्था मुख्यतः ______ ध्रुवीय थी।
उत्तर — द्विवैश्वीकरण में ______ कंपनियों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
उत्तर — बहुराष्ट्रीयआधुनिक वैश्वीकरण में ______ तकनीक का विशेष महत्व है।
उत्तर — सूचना एवं संचार
सही या गलत
वैश्वीकरण से देशों के बीच परस्पर निर्भरता बढ़ती है। — सही
वैश्वीकरण का प्रभाव केवल अर्थव्यवस्था तक सीमित है। — गलत
वैश्वीकरण ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा दिया है। — सही
वैश्वीकरण ने राज्य की संप्रभुता को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। — गलत
बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ वैश्वीकरण की महत्वपूर्ण वाहक हैं। — सही
वैश्वीकरण से सांस्कृतिक आदान-प्रदान बढ़ा है। — सही
वैश्वीकरण का आलोचनात्मक दृष्टिकोण असमानता की समस्या पर ध्यान देता है। — सही
चीन का उदय विश्व शक्ति-संतुलन को प्रभावित नहीं करता। — गलत
बहुध्रुवीय विश्व में अनेक शक्ति-केंद्र होते हैं। — सही
शीत युद्ध के समय विश्व मुख्यतः द्विध्रुवीय था। — सही
वैश्वीकरण ने तकनीकी और सूचना के प्रसार को तेज किया है। — सही
बहुध्रुवीयता का अर्थ केवल एक शक्ति-केंद्र होना है। — गलत
चीन का उदय बहुध्रुवीय विश्व की चर्चा से जुड़ा है। — सही
वैश्वीकरण से सभी देशों को समान लाभ मिलना निश्चित है। — गलत
वैश्वीकरण के कारण राज्य की भूमिका पूरी तरह समाप्त हो गई है। — गलत
परीक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण 15 प्रश्न
वैश्वीकरण की प्रमुख विशेषताओं एवं प्रभावों की विवेचना कीजिए।
वैश्वीकरण का राज्यों की संप्रभुता पर क्या प्रभाव पड़ा है?
क्या वैश्वीकरण ने राज्य की संप्रभुता को कमजोर किया है? आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
वैश्वीकरण के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभावों की तुलना कीजिए।
वैश्वीकरण के वैकल्पिक दृष्टिकोण की व्याख्या कीजिए।
वैश्वीकरण के आलोचनात्मक दृष्टिकोण का परीक्षण कीजिए।
वैश्वीकरण और सामाजिक-आर्थिक असमानता के संबंध को स्पष्ट कीजिए।
चीन के उदय के प्रमुख कारणों की विवेचना कीजिए।
चीन के उदय का विश्व राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ा है?
चीन और अमेरिका की बढ़ती प्रतिस्पर्धा का विश्लेषण कीजिए।
बहुध्रुवीय विश्व से क्या अभिप्राय है?
बहुध्रुवीय विश्व के उदय के प्रमुख कारणों की विवेचना कीजिए।
चीन के उदय और बहुध्रुवीय विश्व के बीच संबंध स्पष्ट कीजिए।
शीत युद्ध की द्विध्रुवीय व्यवस्था और वर्तमान बहुध्रुवीय व्यवस्था की तुलना कीजिए।
वैश्वीकरण ने विश्व को अधिक परस्पर निर्भर बनाया है, जबकि चीन के उदय ने वैश्विक शक्ति-संतुलन को प्रभावित किया है। इस कथन की व्याख्या कीजिए।
