Unit – 3
Chief Executive : President, Cabinet, Prime Minister, Parliament, Lok Sabha,
Rajya Sabha, and Speaker of Lok Sabha.
मुख्य कार्यपालिका: राष्ट्रपति, मंत्रिमंडल, प्रधानमंत्री, संसद, लोकसभा, राज्यसभा तथा लोकसभा के अध्यक्ष।
भारतीय शासन व्यवस्था संसदीय लोकतंत्र पर आधारित है, जिसमें जनता सर्वोच्च राजनीतिक शक्ति का स्रोत मानी जाती है और शासन जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से संचालित होता है। इस व्यवस्था में कार्यपालिका और विधायिका के बीच घनिष्ठ संबंध स्थापित किया गया है, जिससे सरकार उत्तरदायी, पारदर्शी तथा लोकतांत्रिक बनी रहती है। भारतीय संविधान ने शासन की ऐसी संरचना विकसित की है जिसमें राष्ट्रपति संवैधानिक राष्ट्राध्यक्ष हैं, जबकि प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल वास्तविक कार्यपालिका के रूप में शासन का संचालन करते हैं। संसद विधायी संस्था के रूप में न केवल कानून निर्माण का कार्य करती है, बल्कि कार्यपालिका को उत्तरदायी बनाए रखने, वित्तीय नियंत्रण स्थापित करने तथा राष्ट्रीय नीतियों की दिशा निर्धारित करने का दायित्व भी निभाती है। संसद के दो सदन—लोकसभा और राज्यसभा—भारतीय लोकतंत्र की द्विसदनीय संरचना का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि लोकसभा के अध्यक्ष संसदीय कार्यवाही की निष्पक्षता, अनुशासन और गरिमा के संरक्षक माने जाते हैं। इस संपूर्ण व्यवस्था का उद्देश्य शासन में शक्ति के संतुलन, उत्तरदायित्व, जनप्रतिनिधित्व और संवैधानिक मर्यादाओं की रक्षा करना है।
भारतीय संविधान के अनुसार संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित है। राष्ट्रपति भारत के प्रथम नागरिक तथा राज्य के संवैधानिक प्रमुख होते हैं। वे राष्ट्र की एकता, अखंडता और संवैधानिक निरंतरता के प्रतीक माने जाते हैं। यद्यपि संविधान राष्ट्रपति को व्यापक कार्यपालिका शक्तियाँ प्रदान करता है, किंतु संसदीय शासन प्रणाली के कारण वे सामान्यतः प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार अपने अधिकारों का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार भारतीय राष्ट्रपति का पद गरिमा, संवैधानिक संतुलन और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है।
राष्ट्रपति का निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा नहीं किया जाता, बल्कि एक निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है जिसमें संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य तथा राज्यों एवं कुछ संघ राज्य क्षेत्रों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य सम्मिलित होते हैं। यह व्यवस्था भारतीय संघवाद तथा लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांतों को संतुलित रूप में अभिव्यक्त करती है। राष्ट्रपति का कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है, किंतु वे पुनः निर्वाचित भी हो सकते हैं। संविधान ने राष्ट्रपति के पद की गरिमा बनाए रखने के लिए महाभियोग की व्यवस्था भी प्रदान की है, जिसके माध्यम से संविधान के उल्लंघन की स्थिति में उन्हें पद से हटाया जा सकता है।
राष्ट्रपति की शक्तियाँ बहुआयामी हैं। कार्यपालिका संबंधी शक्तियों के अंतर्गत वे प्रधानमंत्री की नियुक्ति करते हैं तथा प्रधानमंत्री की सलाह पर मंत्रियों की नियुक्ति करते हैं। विभिन्न संवैधानिक पदों—जैसे राज्यों के राज्यपाल, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, निर्वाचन आयुक्त, संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों तथा अन्य उच्च अधिकारियों—की नियुक्ति भी राष्ट्रपति के नाम से की जाती है। यद्यपि इन नियुक्तियों की प्रक्रिया संविधान और विधि द्वारा निर्धारित होती है, परंतु औपचारिक नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
विधायी क्षेत्र में राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग हैं। संसद का अधिवेशन बुलाना, स्थगित करना तथा लोकसभा को भंग करना राष्ट्रपति के संवैधानिक अधिकारों में सम्मिलित है, यद्यपि ये कार्य मंत्रिपरिषद की सलाह पर किए जाते हैं। संसद द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त होने के बाद ही कानून बनता है। कुछ परिस्थितियों में राष्ट्रपति पुनर्विचार हेतु विधेयक वापस भेज सकते हैं, यद्यपि यदि संसद पुनः उसे पारित कर देती है तो सामान्यतः राष्ट्रपति को अपनी स्वीकृति प्रदान करनी होती है। संसद का अधिवेशन न होने पर आवश्यकता पड़ने पर अध्यादेश जारी करने की शक्ति भी राष्ट्रपति को प्राप्त है। यह शक्ति असाधारण परिस्थितियों के लिए है और अध्यादेश को निर्धारित अवधि के भीतर संसद की स्वीकृति प्राप्त करनी होती है।
वित्तीय क्षेत्र में राष्ट्रपति की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। वार्षिक बजट राष्ट्रपति की अनुशंसा पर संसद में प्रस्तुत किया जाता है। धन विधेयक केवल राष्ट्रपति की पूर्व अनुशंसा से लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है। राष्ट्रीय वित्तीय प्रबंधन तथा संघीय वित्तीय प्रणाली के संचालन में राष्ट्रपति की संवैधानिक भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।
राष्ट्रपति को आपातकालीन शक्तियाँ भी प्रदान की गई हैं। राष्ट्रीय आपातकाल, राज्यों में संवैधानिक तंत्र के विफल होने की स्थिति तथा वित्तीय आपातकाल जैसी व्यवस्थाएँ संविधान में विशेष परिस्थितियों के लिए निर्धारित की गई हैं। इन प्रावधानों का उद्देश्य राष्ट्र की एकता, सुरक्षा तथा संवैधानिक व्यवस्था की रक्षा करना है। हालांकि इन शक्तियों का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह के आधार पर तथा संवैधानिक सीमाओं के भीतर किया जाता है।
भारतीय संसदीय व्यवस्था में वास्तविक कार्यपालिका प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल होते हैं। प्रधानमंत्री शासन के वास्तविक प्रमुख तथा मंत्रिपरिषद के नेता होते हैं। वे राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद के बीच, कार्यपालिका और संसद के बीच तथा केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय स्थापित करने में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। प्रधानमंत्री का पद भारतीय लोकतांत्रिक शासन का सबसे प्रभावशाली राजनीतिक पद माना जाता है क्योंकि राष्ट्रीय नीतियों के निर्माण, प्रशासनिक नेतृत्व तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने का दायित्व मुख्यतः उन्हीं के हाथों में होता है।
प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। सामान्यतः लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल या गठबंधन के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाता है। यदि किसी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हो, तो राष्ट्रपति उस व्यक्ति को प्रधानमंत्री नियुक्त करते हैं जिसके पास लोकसभा का विश्वास प्राप्त करने की संभावना अधिक हो। नियुक्ति के पश्चात प्रधानमंत्री को लोकसभा का विश्वास प्राप्त करना आवश्यक होता है क्योंकि मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
प्रधानमंत्री की भूमिका अत्यंत व्यापक है। वे मंत्रिपरिषद का गठन करते हैं, मंत्रियों के विभागों का निर्धारण करते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर मंत्रियों से इस्तीफा भी मांग सकते हैं। वे मंत्रिपरिषद की बैठकों की अध्यक्षता करते हैं और राष्ट्रीय नीतियों का समन्वय करते हैं। प्रशासनिक दृष्टि से प्रधानमंत्री समस्त केंद्रीय प्रशासन के प्रमुख समन्वयक होते हैं। विभिन्न मंत्रालयों के बीच तालमेल स्थापित करना, राष्ट्रीय विकास कार्यक्रमों का मार्गदर्शन करना तथा शासन की प्राथमिकताओं का निर्धारण करना उनकी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ हैं।
प्रधानमंत्री संसद में सरकार के प्रमुख प्रवक्ता भी होते हैं। वे लोकसभा में सरकार की नीतियों का समर्थन करते हैं, विपक्ष के प्रश्नों का उत्तर देते हैं तथा महत्वपूर्ण विधेयकों और नीतिगत निर्णयों का औचित्य प्रस्तुत करते हैं। विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक सुधार तथा अंतरराष्ट्रीय समझौतों के संबंध में भी प्रधानमंत्री की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वे भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं और अन्य देशों के साथ कूटनीतिक संबंधों को दिशा प्रदान करते हैं।
प्रधानमंत्री के नेतृत्व में कार्य करने वाली मंत्रिपरिषद भारतीय संसदीय शासन की वास्तविक कार्यपालिका है। मंत्रिपरिषद का गठन राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह पर किया जाता है। संविधान के अनुसार सभी मंत्री सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होते हैं। इसका अर्थ है कि यदि लोकसभा सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित कर देती है, तो संपूर्ण मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना पड़ता है। यह सिद्धांत संसदीय उत्तरदायित्व का मूल आधार है।
मंत्रिपरिषद और मंत्रिमंडल में व्यावहारिक अंतर भी समझना आवश्यक है। मंत्रिपरिषद में सभी स्तर के मंत्री सम्मिलित होते हैं, जबकि मंत्रिमंडल अपेक्षाकृत छोटा और प्रभावशाली समूह होता है जिसमें प्रमुख मंत्रालयों के कैबिनेट मंत्री शामिल रहते हैं। वास्तविक नीति-निर्माण, राष्ट्रीय महत्व के निर्णय, सुरक्षा संबंधी विषय, आर्थिक नीतियाँ तथा प्रमुख प्रशासनिक निर्णय मुख्यतः मंत्रिमंडल द्वारा लिए जाते हैं। मंत्रिमंडल सरकार की नीति निर्माण प्रक्रिया का केंद्रीय संस्थान है।
भारतीय संसद संघ की सर्वोच्च विधायी संस्था है। यह राष्ट्रपति तथा दो सदनों—लोकसभा और राज्यसभा—से मिलकर बनती है। संसद का प्रमुख कार्य कानून बनाना है, किंतु इसके अतिरिक्त यह कार्यपालिका को उत्तरदायी बनाए रखने, वित्तीय नियंत्रण स्थापित करने, राष्ट्रीय नीतियों पर विचार करने, संविधान संशोधन करने तथा जनहित से संबंधित विषयों पर व्यापक चर्चा करने का भी कार्य करती है। संसद लोकतांत्रिक शासन की आधारशिला है क्योंकि इसके माध्यम से जनता की इच्छाएँ और अपेक्षाएँ शासन की नीतियों में अभिव्यक्त होती हैं।
संसद का विधायी कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण है। संसद संघ सूची तथा समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बनाती है। सामान्य विधेयक, धन विधेयक, वित्त विधेयक तथा संविधान संशोधन विधेयक विभिन्न संवैधानिक प्रक्रियाओं के अनुसार संसद में प्रस्तुत और पारित किए जाते हैं। कानून निर्माण की प्रक्रिया में व्यापक विचार-विमर्श, समिति प्रणाली, बहस तथा संशोधन की व्यवस्था लोकतांत्रिक निर्णय-निर्माण को सुनिश्चित करती है।
संसद का दूसरा महत्वपूर्ण कार्य कार्यपालिका पर नियंत्रण स्थापित करना है। प्रश्नकाल, शून्यकाल, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, स्थगन प्रस्ताव, विशेष उल्लेख, अविश्वास प्रस्ताव तथा संसदीय समितियों के माध्यम से सरकार की नीतियों और प्रशासनिक कार्यों की समीक्षा की जाती है। इस प्रक्रिया से सरकार की पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता सुनिश्चित होती है।
वित्तीय नियंत्रण संसद की एक अन्य महत्वपूर्ण भूमिका है। सरकार संसद की स्वीकृति के बिना कोई कर नहीं लगा सकती और न ही सार्वजनिक धन का व्यय कर सकती है। वार्षिक बजट, विनियोग विधेयक, वित्त विधेयक तथा लोक लेखा समिति जैसी व्यवस्थाएँ संसद के वित्तीय नियंत्रण को प्रभावी बनाती हैं। यह लोकतांत्रिक शासन में वित्तीय उत्तरदायित्व का महत्वपूर्ण आधार है।
लोकसभा संसद का निम्न सदन होते हुए भी भारतीय संसदीय प्रणाली का सबसे प्रभावशाली सदन है। इसके सदस्य प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा निर्वाचित किए जाते हैं। इसलिए लोकसभा को जनता की इच्छा का वास्तविक प्रतिनिधि माना जाता है। इसका सामान्य कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है, यद्यपि विशेष परिस्थितियों में इसे पहले भी भंग किया जा सकता है।
लोकसभा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से इसी के प्रति उत्तरदायी होती है। यदि लोकसभा सरकार में विश्वास व्यक्त करना बंद कर दे, तो सरकार को त्यागपत्र देना पड़ता है। धन विधेयक केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है तथा वित्तीय मामलों में इसकी प्रधानता स्थापित है। राष्ट्रीय महत्व के अधिकांश राजनीतिक प्रश्नों का अंतिम निर्णय भी व्यवहार में लोकसभा के माध्यम से ही होता है।
राज्यसभा संसद का उच्च सदन है। यह राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करती है तथा भारतीय संघवाद को संस्थागत आधार प्रदान करती है। राज्यसभा एक स्थायी सदन है जिसे कभी भंग नहीं किया जाता। इसके एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दो वर्ष बाद सेवानिवृत्त होते हैं, जिससे इसकी निरंतरता बनी रहती है। इसके सदस्य राज्यों की विधानसभाओं द्वारा निर्वाचित होते हैं, जबकि कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान देने वाले व्यक्तियों को राष्ट्रपति द्वारा नामित किया जाता है।
राज्यसभा की भूमिका केवल विधायी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। यह संघीय संतुलन बनाए रखने, विधेयकों की गहन समीक्षा करने तथा राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर विशेषज्ञतापूर्ण विचार प्रस्तुत करने का कार्य करती है। यद्यपि धन विधेयक के संबंध में इसकी शक्तियाँ सीमित हैं, फिर भी सामान्य विधेयकों तथा संविधान संशोधन विधेयकों में इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। कुछ विशेष परिस्थितियों में राज्यसभा संसद को राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार भी प्रदान कर सकती है।
लोकसभा के अध्यक्ष भारतीय संसदीय लोकतंत्र के अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक पदाधिकारी हैं। उनका निर्वाचन लोकसभा के सदस्यों द्वारा किया जाता है। अध्यक्ष का प्रमुख दायित्व सदन की कार्यवाही को निष्पक्ष, व्यवस्थित और गरिमापूर्ण ढंग से संचालित करना है। पद ग्रहण करने के बाद उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर पूर्ण निष्पक्षता के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन करें।
लोकसभा के अध्यक्ष सदन की बैठकों की अध्यक्षता करते हैं, सदस्यों को बोलने की अनुमति देते हैं, कार्यसूची के संचालन का मार्गदर्शन करते हैं तथा संसदीय नियमों की व्याख्या करते हैं। उनके निर्णय सामान्यतः अंतिम माने जाते हैं। सदन में अनुशासन बनाए रखना, अव्यवस्था की स्थिति में आवश्यक कार्रवाई करना तथा संसदीय मर्यादाओं की रक्षा करना भी उनके प्रमुख दायित्वों में सम्मिलित है।
अध्यक्ष की भूमिका विधायी प्रक्रिया में भी महत्वपूर्ण है। वे धन विधेयक के संबंध में अंतिम निर्णय देते हैं कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं। संसदीय समितियों के गठन, विभिन्न समितियों के अध्यक्षों की नियुक्ति तथा संसदीय कार्यों के समन्वय में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। दलबदल विरोधी कानून के अंतर्गत सदस्यों की अयोग्यता संबंधी मामलों पर निर्णय देने का अधिकार भी अध्यक्ष को प्राप्त है। इस कारण उनका पद संवैधानिक निष्पक्षता और लोकतांत्रिक स्थिरता का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।
भारतीय संसदीय शासन प्रणाली की विशेषता यह है कि इसमें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रिमंडल, संसद, लोकसभा, राज्यसभा तथा लोकसभा के अध्यक्ष परस्पर समन्वित रूप से कार्य करते हैं। राष्ट्रपति संवैधानिक निरंतरता और राज्य की एकता के प्रतीक हैं, प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल शासन की वास्तविक कार्यपालिका हैं, संसद लोकतांत्रिक जनप्रतिनिधित्व तथा विधायी सर्वोच्चता की संस्था है, लोकसभा जनता की प्रत्यक्ष इच्छा का प्रतिनिधित्व करती है, राज्यसभा संघीय संतुलन और राज्यों के हितों की रक्षा करती है तथा लोकसभा के अध्यक्ष संसदीय परंपराओं, निष्पक्षता और विधायी गरिमा के संरक्षक हैं। इन सभी संस्थाओं के बीच शक्तियों का संतुलन, उत्तरदायित्व, संवैधानिक मर्यादा तथा लोकतांत्रिक सहयोग भारतीय शासन व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।
समकालीन भारत में इन संस्थाओं की भूमिका और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि लोकतंत्र का स्वरूप केवल चुनाव तक सीमित नहीं रह गया है। आज सुशासन, पारदर्शिता, उत्तरदायित्व, सहभागी लोकतंत्र, डिजिटल प्रशासन, राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय तथा संवैधानिक मूल्यों की रक्षा जैसे अनेक नए आयाम सामने आए हैं। इन चुनौतियों का प्रभावी समाधान तभी संभव है जब राष्ट्रपति अपनी संवैधानिक भूमिका का संतुलित निर्वहन करें, प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल उत्तरदायी एवं दूरदर्शी नेतृत्व प्रदान करें, संसद प्रभावी विधायी और निगरानीकारी भूमिका निभाए, लोकसभा और राज्यसभा लोकतांत्रिक विमर्श को समृद्ध करें तथा लोकसभा के अध्यक्ष निष्पक्षता, अनुशासन और संसदीय गरिमा को बनाए रखें। इस प्रकार भारतीय संसदीय शासन व्यवस्था लोकतंत्र, संवैधानिकता, उत्तरदायित्व और जनकल्याण के सिद्धांतों पर आधारित एक संतुलित एवं परिपक्व राजनीतिक व्यवस्था के रूप में निरंतर विकसित होती रही है और भविष्य में भी भारतीय लोकतंत्र की स्थिरता एवं प्रगति का प्रमुख आधार बनी रहेगी।
