Unit – 3

Revivalist : Leo Strauss, Hannah Arendt, Mechael Oakeshott.

पुनरुत्थानवादी: लियो स्ट्रॉस, हन्ना आरेंट तथा माइकल ओकशॉट।

पुनरुत्थानवादी राजनीतिक चिंतन बीसवीं शताब्दी की उन महत्वपूर्ण वैचारिक प्रवृत्तियों में से एक है जिसने आधुनिक राजनीतिक दर्शन को उसकी शास्त्रीय जड़ों से पुनः जोड़ने का प्रयास किया। इस विचारधारा का उदय उस समय हुआ जब व्यवहारवाद, प्रत्यक्षवाद, तकनीकी प्रशासन, वैचारिक संघर्षों तथा विश्वयुद्धों के अनुभवों ने राजनीति को मुख्यतः शक्ति, संगठन, प्रशासन और व्यवहारिक प्रक्रियाओं तक सीमित कर दिया था। अनेक राजनीतिक दार्शनिकों ने अनुभव किया कि यदि राजनीति से नैतिकता, न्याय, विवेक, नागरिक उत्तरदायित्व तथा मानव जीवन के उच्च आदर्शों को अलग कर दिया जाएगा तो राजनीति केवल सत्ता-संघर्ष और प्रशासनिक तकनीक का विषय बनकर रह जाएगी। इसी पृष्ठभूमि में पुनरुत्थानवादी चिंतन का विकास हुआ। इसका उद्देश्य अतीत की ओर लौटना मात्र नहीं था, बल्कि प्राचीन और आधुनिक राजनीतिक परंपराओं के श्रेष्ठ विचारों का पुनर्पाठ करके समकालीन समाज की समस्याओं का समाधान खोजने का प्रयास करना था। इस परंपरा के प्रमुख विचारकों में लियो स्ट्रॉस, हन्ना आरेंट और माइकल ओकशॉट का विशेष स्थान है। तीनों विचारकों की दृष्टि भिन्न होने के बावजूद वे इस बात पर सहमत थे कि राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति की कला नहीं, बल्कि नैतिक, बौद्धिक और नागरिक जीवन का महत्वपूर्ण आयाम है।

लियो स्ट्रॉस का राजनीतिक चिंतन शास्त्रीय राजनीतिक दर्शन के पुनरुद्धार का सबसे प्रभावशाली प्रयास माना जाता है। उनका मत था कि आधुनिक राजनीतिक दर्शन ने नैतिक सत्य, प्राकृतिक न्याय और शाश्वत मूल्यों की उपेक्षा कर दी है। आधुनिक युग में ऐतिहासिकतावाद और मूल्य-सापेक्षता के प्रभाव के कारण यह मान लिया गया कि सत्य, न्याय और नैतिकता समय तथा परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं। स्ट्रॉस ने इस दृष्टिकोण का विरोध करते हुए कहा कि कुछ ऐसे सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत हैं जो मानव जीवन के लिए सदैव प्रासंगिक रहते हैं। उनके अनुसार यदि राजनीति को इन शाश्वत मूल्यों से अलग कर दिया जाए तो लोकतंत्र भी नैतिक आधार खो देता है और समाज केवल शक्ति तथा स्वार्थ के आधार पर संचालित होने लगता है।

स्ट्रॉस ने विशेष रूप से प्राचीन यूनानी राजनीतिक दर्शन का पुनर्मूल्यांकन किया। उनका विश्वास था कि सुकरात, प्लेटो और अरस्तू जैसे दार्शनिकों ने राजनीति को केवल शासन प्रणाली के रूप में नहीं, बल्कि उत्तम जीवन की खोज के रूप में देखा था। उनके अनुसार राजनीति का उद्देश्य केवल व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि ऐसे सामाजिक वातावरण का निर्माण करना है जिसमें मनुष्य अपने नैतिक और बौद्धिक गुणों का विकास कर सके। स्ट्रॉस ने इस बात पर बल दिया कि राजनीतिक दर्शन का कार्य केवल तथ्यों का अध्ययन करना नहीं है, बल्कि न्याय, सत्य, सदाचार और आदर्श शासन के प्रश्नों पर भी विचार करना है।

लियो स्ट्रॉस आधुनिक प्रत्यक्षवाद की भी आलोचना करते हैं। उनके अनुसार यदि राजनीतिक विज्ञान केवल आँकड़ों, व्यवहार और सांख्यिकीय विश्लेषण तक सीमित हो जाए तो वह राजनीति की वास्तविक आत्मा को नहीं समझ सकता। राजनीति में मूल्य, नैतिकता, विवेक और सार्वजनिक हित की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए राजनीतिक अध्ययन में दर्शन, इतिहास और नैतिक चिंतन को समान महत्व मिलना चाहिए। उन्होंने राजनीतिक दर्शन को पुनः एक जीवंत और प्रासंगिक बौद्धिक अनुशासन बनाने का प्रयास किया।

हन्ना आरेंट का राजनीतिक चिंतन आधुनिक युग के सर्वसत्तावाद, युद्ध, हिंसा और मानवीय स्वतंत्रता के अनुभवों से गहराई से प्रभावित था। उन्होंने विशेष रूप से नाज़ीवाद और फासीवाद जैसी व्यवस्थाओं का विश्लेषण करते हुए यह स्पष्ट किया कि जब राज्य समाज के सभी क्षेत्रों पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लेता है और नागरिक स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है, तब मानव गरिमा और लोकतंत्र दोनों संकट में पड़ जाते हैं। आरेंट के अनुसार राजनीति का वास्तविक उद्देश्य शक्ति का केंद्रीकरण नहीं, बल्कि नागरिकों के बीच स्वतंत्र संवाद, सहभागिता और सार्वजनिक जीवन का विकास है।

आरेंट ने स्वतंत्रता को राजनीतिक जीवन का सर्वोच्च मूल्य माना। उनके अनुसार स्वतंत्रता केवल व्यक्तिगत अधिकार नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भागीदारी की क्षमता है। जब नागरिक सार्वजनिक विषयों पर विचार-विमर्श करते हैं, निर्णय लेते हैं और सामूहिक उत्तरदायित्व निभाते हैं, तभी वास्तविक राजनीतिक स्वतंत्रता का अनुभव होता है। उन्होंने इस विचार का विरोध किया कि राजनीति केवल पेशेवर नेताओं या प्रशासनिक संस्थाओं का कार्य है। उनके अनुसार प्रत्येक नागरिक राजनीतिक समुदाय का सक्रिय सदस्य है और लोकतंत्र तभी सफल हो सकता है जब नागरिक सार्वजनिक जीवन में निरंतर भाग लें।

हन्ना आरेंट ने शक्ति और हिंसा के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित किया। उनके अनुसार शक्ति का स्रोत जनता की सहमति, विश्वास और सामूहिक सहभागिता है, जबकि हिंसा बल प्रयोग पर आधारित होती है। जहाँ वास्तविक शक्ति होती है वहाँ हिंसा की आवश्यकता कम पड़ती है, जबकि हिंसा प्रायः उस स्थिति में बढ़ती है जब सत्ता अपनी वैधता खोने लगती है। यह विश्लेषण आधुनिक लोकतांत्रिक सिद्धांत में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि लोकतंत्र की स्थिरता नागरिकों के विश्वास और सहभागिता पर निर्भर करती है, न कि केवल दमनकारी साधनों पर।

आरेंट ने सार्वजनिक क्षेत्र की अवधारणा को भी विशेष महत्व दिया। उनके अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र वह स्थान है जहाँ नागरिक समानता के आधार पर विचारों का आदान-प्रदान करते हैं, मतभेद व्यक्त करते हैं और सामूहिक निर्णयों में भाग लेते हैं। यदि यह सार्वजनिक क्षेत्र कमजोर हो जाए या केवल राज्य तथा बाजार के नियंत्रण में आ जाए, तो लोकतांत्रिक जीवन भी कमजोर हो जाता है। इसलिए उन्होंने सक्रिय नागरिकता, सार्वजनिक विमर्श और राजनीतिक सहभागिता को लोकतंत्र की आधारशिला माना।

माइकल ओकशॉट का राजनीतिक दर्शन उदार परंपरा, परंपरागत संस्थाओं तथा व्यावहारिक विवेक का समर्थक है। उनका मत था कि समाज और राज्य को केवल किसी आदर्श योजना के अनुसार पुनर्गठित नहीं किया जा सकता। मानव समाज अत्यंत जटिल, ऐतिहासिक और अनुभवजन्य संस्था है जिसका विकास लंबे समय में होता है। इसलिए किसी भी व्यापक सामाजिक परिवर्तन को सावधानी, अनुभव और परंपरा के आधार पर समझना चाहिए। उन्होंने अत्यधिक वैचारिक राजनीति और यूटोपियाई योजनाओं की आलोचना की क्योंकि उनके अनुसार ऐसी योजनाएँ अनेक बार स्वतंत्रता और सामाजिक स्थिरता के लिए खतरा बन जाती हैं।

ओकशॉट ने राजनीति को व्यावहारिक गतिविधि माना। उनका विश्वास था कि शासन का उद्देश्य समाज को किसी पूर्वनिर्धारित आदर्श की ओर बलपूर्वक ले जाना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाए रखना है जिसमें नागरिक अपनी-अपनी जीवन-योजनाओं का स्वतंत्र रूप से अनुसरण कर सकें। उन्होंने कानून के शासन, नागरिक स्वतंत्रता तथा सीमित सरकार का समर्थन किया। उनके अनुसार राज्य को नागरिकों पर किसी विशेष नैतिक, धार्मिक या वैचारिक दृष्टिकोण को थोपना नहीं चाहिए।

माइकल ओकशॉट ने परंपरा के महत्व पर विशेष बल दिया। उनका मत था कि समाज की संस्थाएँ, रीति-रिवाज और संवैधानिक व्यवस्थाएँ लंबे ऐतिहासिक अनुभवों का परिणाम होती हैं। इसलिए उन्हें अचानक समाप्त करना या पूरी तरह बदल देना उचित नहीं है। परिवर्तन आवश्यक है, किंतु वह क्रमिक, विवेकपूर्ण और समाज की ऐतिहासिक परिस्थितियों के अनुरूप होना चाहिए। इस दृष्टिकोण ने आधुनिक रूढ़िवादी उदारवाद को दार्शनिक आधार प्रदान किया।

यद्यपि लियो स्ट्रॉस, हन्ना आरेंट और माइकल ओकशॉट के विचारों में पर्याप्त अंतर है, फिर भी उनके चिंतन में कुछ समान तत्व स्पष्ट दिखाई देते हैं। तीनों विचारकों ने राजनीति को केवल सत्ता या प्रशासन की तकनीक नहीं माना। उन्होंने नैतिकता, नागरिकता, सार्वजनिक उत्तरदायित्व, स्वतंत्रता तथा राजनीतिक दर्शन की महत्ता को पुनः स्थापित करने का प्रयास किया। तीनों ने व्यवहारवाद तथा अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण की सीमाओं की ओर संकेत करते हुए यह स्पष्ट किया कि राजनीति का अध्ययन केवल अनुभवजन्य तथ्यों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसमें मानवीय मूल्यों और दार्शनिक प्रश्नों को भी उचित स्थान मिलना चाहिए।

इन विचारकों ने लोकतंत्र की गुणवत्ता पर भी महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए। स्ट्रॉस ने लोकतंत्र के नैतिक आधार पर बल दिया, आरेंट ने सक्रिय नागरिक सहभागिता को लोकतंत्र का प्राण माना और ओकशॉट ने संवैधानिक परंपराओं तथा कानून के शासन को लोकतंत्र की स्थिरता के लिए आवश्यक बताया। इस प्रकार तीनों ने लोकतंत्र को केवल चुनावी व्यवस्था न मानकर एक व्यापक राजनीतिक और नैतिक जीवन-पद्धति के रूप में समझा।

समकालीन राजनीतिक विज्ञान में पुनरुत्थानवादी चिंतन का महत्व निरंतर बढ़ा है। आज जब राजनीति अनेक बार तकनीकी प्रबंधन, चुनावी रणनीति, मीडिया अभियान और तात्कालिक हितों तक सीमित होती दिखाई देती है, तब इन विचारकों की यह चेतावनी अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होती है कि यदि राजनीति से नैतिकता, सार्वजनिक विवेक और नागरिक उत्तरदायित्व समाप्त हो जाएँ, तो लोकतंत्र का वास्तविक स्वरूप कमजोर पड़ सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल निगरानी, जनमत निर्माण में सोशल मीडिया की भूमिका, लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता तथा नागरिक स्वतंत्रताओं से जुड़े समकालीन प्रश्नों को समझने में भी इनके विचार उपयोगी सिद्ध होते हैं।

इन विचारकों की आलोचना भी की गई है। कुछ विद्वानों का मत है कि लियो स्ट्रॉस ने शास्त्रीय दर्शन को अत्यधिक आदर्शीकृत रूप में प्रस्तुत किया और आधुनिक लोकतांत्रिक समाज की जटिलताओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। हन्ना आरेंट के संबंध में यह कहा गया कि उन्होंने आर्थिक असमानताओं की अपेक्षा राजनीतिक स्वतंत्रता पर अधिक बल दिया। माइकल ओकशॉट की आलोचना इस आधार पर की गई कि उनका परंपरा पर अत्यधिक जोर कभी-कभी आवश्यक सामाजिक सुधारों की गति को धीमा कर सकता है। फिर भी इन आलोचनाओं के बावजूद यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि इन तीनों विचारकों ने आधुनिक राजनीतिक दर्शन को नई गहराई, नैतिक आधार और बौद्धिक दिशा प्रदान की।

समग्र रूप से कहा जा सकता है कि पुनरुत्थानवादी राजनीतिक चिंतन आधुनिक युग में राजनीतिक दर्शन की पुनर्स्थापना का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। लियो स्ट्रॉस ने शाश्वत नैतिक मूल्यों और शास्त्रीय राजनीतिक दर्शन की प्रासंगिकता को पुनर्जीवित किया, हन्ना आरेंट ने स्वतंत्रता, सक्रिय नागरिकता, सार्वजनिक जीवन और सर्वसत्तावाद की आलोचना के माध्यम से लोकतांत्रिक राजनीति को नई वैचारिक दिशा प्रदान की, जबकि माइकल ओकशॉट ने परंपरा, व्यावहारिक विवेक, सीमित शासन और संवैधानिक व्यवस्था के महत्व को स्पष्ट किया। तीनों विचारकों ने यह सिद्ध किया कि राजनीति केवल सत्ता का विज्ञान नहीं, बल्कि मानव जीवन, नैतिकता, स्वतंत्रता और सार्वजनिक उत्तरदायित्व का दर्शन भी है। उनके विचार आज भी लोकतंत्र, नागरिक समाज, संवैधानिक शासन, नैतिक राजनीति और समकालीन राजनीतिक सिद्धांत के अध्ययन में अत्यंत प्रासंगिक माने जाते हैं और आधुनिक राजनीतिक चिंतन की समृद्ध परंपरा का अभिन्न अंग हैं।

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