Unit – 2
Principles of Organization : Hierarchy, Unity of Command, Authority and Responsibility, Coordination, Span of Control, Supervision, Centralization and Decentralization, Delegation.
तुलनात्मक राजनीति के प्रमुख उपागम : औपचारिक-वैधानिक उपागम, व्यवस्था उपागम तथा संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम।
तुलनात्मक राजनीति राजनीति विज्ञान की वह शाखा है जो विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं का अध्ययन और तुलना करती है। लेकिन केवल राजनीतिक व्यवस्थाओं का अध्ययन करना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि यह भी आवश्यक होता है कि उनका अध्ययन किस दृष्टिकोण या पद्धति से किया जाए। राजनीति विज्ञान में अध्ययन करने के विभिन्न तरीके होते हैं, जिन्हें उपागम (Approach) कहा जाता है। उपागम किसी विषय को समझने और उसका विश्लेषण करने की एक विशेष पद्धति या दृष्टिकोण होता है।
तुलनात्मक राजनीति के विकास के साथ-साथ इसके अध्ययन की अनेक पद्धतियाँ विकसित हुईं। प्रारंभिक विद्वान राजनीतिक संस्थाओं और संविधानों पर अधिक ध्यान देते थे, जबकि आधुनिक विद्वानों ने राजनीतिक व्यवहार, सामाजिक संरचना और राजनीतिक प्रक्रियाओं को भी अध्ययन का विषय बनाया। इसी क्रम में औपचारिक-वैधानिक उपागम, व्यवस्था उपागम तथा संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम विशेष रूप से महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
औपचारिक-वैधानिक उपागम (Formal-Legal Approach)
तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन का सबसे प्राचीन और पारंपरिक तरीका औपचारिक-वैधानिक उपागम है। इस उपागम का विकास उस समय हुआ जब राजनीति विज्ञान मुख्य रूप से संविधान, कानून और सरकारी संस्थाओं के अध्ययन तक सीमित था।
इस उपागम में राजनीतिक व्यवस्था को उसके संवैधानिक और कानूनी स्वरूप के आधार पर समझने का प्रयास किया जाता है। इसमें यह देखा जाता है कि संविधान में कौन-कौन सी संस्थाएँ हैं, उनके अधिकार क्या हैं, उनके कार्य क्या हैं और उनके बीच संबंध किस प्रकार निर्धारित किए गए हैं।
सरल शब्दों में कहा जाए तो यह उपागम राजनीति को “कानून की पुस्तक” के माध्यम से समझने का प्रयास करता है।
उदाहरण के लिए यदि भारत का अध्ययन इस दृष्टिकोण से किया जाए तो संविधान में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, संसद, न्यायपालिका तथा राज्यों के अधिकारों का अध्ययन किया जाएगा। इसी प्रकार अमेरिका का अध्ययन करते समय राष्ट्रपति, कांग्रेस तथा सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक शक्तियों पर ध्यान दिया जाएगा।
इस उपागम के अनुसार राजनीतिक संस्थाएँ ही राजनीति का केंद्र होती हैं। इसलिए इसका मुख्य ध्यान संविधान, कानून, शासन व्यवस्था और संस्थागत ढाँचे पर रहता है।
इस उपागम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह राजनीतिक संस्थाओं का स्पष्ट और व्यवस्थित अध्ययन प्रस्तुत करता है। इसके माध्यम से किसी देश की संवैधानिक व्यवस्था को समझना आसान हो जाता है। यह अध्ययन को निश्चित आधार प्रदान करता है तथा राजनीतिक संस्थाओं की संरचना को स्पष्ट करता है।
किन्तु इस उपागम की कुछ सीमाएँ भी हैं। यह केवल संविधान में लिखी गई बातों पर अधिक ध्यान देता है और व्यवहार में क्या हो रहा है, इसे पर्याप्त महत्व नहीं देता। उदाहरण के लिए किसी देश के संविधान में लोकतंत्र लिखा हो सकता है, लेकिन व्यवहार में वहाँ तानाशाही जैसी स्थिति हो सकती है। ऐसी परिस्थितियों को यह उपागम पूरी तरह स्पष्ट नहीं कर पाता।
यही कारण है कि आधुनिक राजनीति विज्ञान में केवल औपचारिक-वैधानिक उपागम को पर्याप्त नहीं माना जाता।
व्यवस्था उपागम (System Approach)
बीसवीं शताब्दी के मध्य में राजनीति विज्ञान में एक नया दृष्टिकोण विकसित हुआ जिसे व्यवस्था उपागम कहा जाता है। इस उपागम को विकसित करने का श्रेय मुख्य रूप से David Easton को दिया जाता है।
व्यवस्था उपागम राजनीति को केवल संस्थाओं का समूह नहीं मानता, बल्कि उसे एक जीवित व्यवस्था के रूप में देखता है। जिस प्रकार मानव शरीर के विभिन्न अंग मिलकर पूरे शरीर को चलाते हैं, उसी प्रकार राजनीतिक व्यवस्था के विभिन्न भाग मिलकर पूरे राजनीतिक तंत्र को संचालित करते हैं।
डेविड ईस्टन के अनुसार राजनीतिक व्यवस्था समाज से मांगें और समर्थन प्राप्त करती है। ये मांगें और समर्थन राजनीतिक व्यवस्था में प्रवेश करते हैं, जिन्हें “इनपुट” कहा जाता है। इसके बाद राजनीतिक व्यवस्था इन मांगों पर विचार करके निर्णय और नीतियाँ बनाती है, जिन्हें “आउटपुट” कहा जाता है।
उदाहरण के लिए यदि जनता रोजगार, शिक्षा या स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग करती है, तो ये मांगें राजनीतिक व्यवस्था के लिए इनपुट बन जाती हैं। सरकार इन मांगों के आधार पर योजनाएँ और कानून बनाती है। ये योजनाएँ और कानून आउटपुट कहलाते हैं।
इसके बाद जनता इन नीतियों पर अपनी प्रतिक्रिया देती है। इस प्रतिक्रिया को फीडबैक कहा जाता है। इसी फीडबैक के आधार पर सरकार अपनी नीतियों में सुधार करती है।
व्यवस्था उपागम राजनीति को एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया के रूप में देखता है। इसमें समाज और सरकार के बीच लगातार संपर्क बना रहता है।
इस उपागम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह राजनीति को व्यापक दृष्टि से समझने का प्रयास करता है। यह केवल संस्थाओं पर नहीं बल्कि राजनीतिक प्रक्रियाओं और सामाजिक वातावरण पर भी ध्यान देता है।
हालाँकि इसकी आलोचना भी की जाती है। कुछ विद्वानों का मानना है कि यह उपागम अत्यधिक सैद्धांतिक है और वास्तविक राजनीतिक संघर्षों तथा सत्ता संबंधों को पर्याप्त महत्व नहीं देता।
संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम (Structural-Functional Approach)
तुलनात्मक राजनीति में आधुनिक युग का एक अत्यंत महत्वपूर्ण उपागम संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम है। इसका विकास मुख्य रूप से Gabriel Almond और अन्य आधुनिक विद्वानों द्वारा किया गया।
यह उपागम इस विचार पर आधारित है कि प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में कुछ संरचनाएँ (Structures) होती हैं और प्रत्येक संरचना कुछ विशेष कार्य (Functions) करती है।
संरचना का अर्थ है— राजनीतिक संस्था या संगठन।
कार्य का अर्थ है— वह भूमिका जो संस्था निभाती है।
उदाहरण के लिए संसद एक संरचना है और कानून बनाना उसका कार्य है। न्यायपालिका एक संरचना है और न्याय प्रदान करना उसका कार्य है। राजनीतिक दल एक संरचना हैं और जनता तथा सरकार के बीच संबंध स्थापित करना उनका कार्य है।
इस उपागम के अनुसार किसी भी देश की राजनीतिक व्यवस्था को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि वहाँ कौन-कौन सी संरचनाएँ मौजूद हैं और वे कौन-कौन से कार्य कर रही हैं।
इस दृष्टिकोण की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह केवल विकसित देशों तक सीमित नहीं है। इसके माध्यम से विकसित और विकासशील दोनों प्रकार के देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं का अध्ययन किया जा सकता है।
उदाहरण के लिए भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और नाइजीरिया जैसे देशों की राजनीतिक व्यवस्थाएँ एक-दूसरे से भिन्न हैं, लेकिन सभी देशों में कुछ आवश्यक राजनीतिक कार्य किए जाते हैं। कानून बनाना, न्याय देना, प्रशासन चलाना और जनता का प्रतिनिधित्व करना हर राजनीतिक व्यवस्था के आवश्यक कार्य हैं। संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम इन कार्यों को समझने का प्रयास करता है।
इस उपागम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह राजनीतिक व्यवस्थाओं के तुलनात्मक अध्ययन को सरल और वैज्ञानिक बनाता है। यह विभिन्न देशों की राजनीतिक संस्थाओं की तुलना केवल उनके नाम के आधार पर नहीं बल्कि उनके कार्यों के आधार पर करता है।
हालाँकि इसकी आलोचना भी की जाती है क्योंकि यह कभी-कभी राजनीतिक संघर्षों, असमानताओं और सत्ता की राजनीति को पर्याप्त महत्व नहीं देता।
तीनों उपागमों की तुलनात्मक समझ
यदि किसी देश की संसद का अध्ययन किया जाए तो—
औपचारिक-वैधानिक उपागम यह देखेगा कि संविधान संसद को कौन-कौन से अधिकार देता है।
व्यवस्था उपागम यह देखेगा कि संसद जनता की मांगों को किस प्रकार सरकार तक पहुँचाती है।
संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम यह देखेगा कि संसद राजनीतिक व्यवस्था में कौन-कौन से कार्य कर रही है।
इस प्रकार तीनों उपागम एक ही संस्था का अध्ययन अलग-अलग दृष्टिकोण से करते हैं।
महत्व
तुलनात्मक राजनीति के इन उपागमों ने राजनीति विज्ञान को अधिक वैज्ञानिक, व्यापक और व्यावहारिक बनाया है। औपचारिक-वैधानिक उपागम ने संवैधानिक संस्थाओं को समझने का आधार प्रदान किया। व्यवस्था उपागम ने राजनीति को एक जीवित प्रक्रिया के रूप में समझाया। संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम ने विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं की तुलना को अधिक व्यवस्थित और वैज्ञानिक बनाया।
इन उपागमों के माध्यम से राजनीतिक संस्थाओं, प्रक्रियाओं और व्यवहारों को गहराई से समझा जा सकता है। आधुनिक तुलनात्मक राजनीति का अधिकांश अध्ययन इन्हीं उपागमों पर आधारित है।
तुलनात्मक राजनीति के उपागम
(Approaches to Comparative Politics)
(A) वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Questions)
एक शब्द / एक वाक्य में उत्तर दीजिए
उपागम (Approach) से क्या आशय है?
तुलनात्मक राजनीति का सबसे प्राचीन उपागम कौन-सा है?
औपचारिक-वैधानिक उपागम का मुख्य आधार क्या है?
व्यवस्था उपागम का प्रतिपादन किसने किया?
संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम का प्रमुख प्रवर्तक कौन है?
डेविड ईस्टन ने राजनीति को किस रूप में देखा?
व्यवस्था उपागम में "इनपुट" का क्या अर्थ है?
व्यवस्था उपागम में "आउटपुट" क्या कहलाता है?
फीडबैक (Feedback) क्या है?
संरचना (Structure) का क्या अर्थ है?
कार्य (Function) से क्या आशय है?
संसद संरचना है या कार्य?
कानून निर्माण संसद का कौन-सा कार्य है?
न्यायपालिका का मुख्य कार्य क्या है?
औपचारिक-वैधानिक उपागम किस पर अधिक बल देता है?
व्यवस्था उपागम समाज और सरकार के बीच किस पर बल देता है?
संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम किन दो आधारों पर अध्ययन करता है?
आधुनिक तुलनात्मक राजनीति में कौन-सा उपागम अधिक वैज्ञानिक माना जाता है?
औपचारिक-वैधानिक उपागम की एक प्रमुख सीमा लिखिए।
तुलनात्मक राजनीति के आधुनिक अध्ययन में किन तीन प्रमुख उपागमों का प्रयोग किया जाता है?
(B) बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
1. तुलनात्मक राजनीति का सबसे प्राचीन उपागम है—
(A) व्यवस्था उपागम
(B) व्यवहारवादी उपागम
(C) औपचारिक-वैधानिक उपागम ✅
(D) संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम
2. व्यवस्था उपागम का प्रतिपादन किसने किया?
(A) गैब्रियल आलमंड
(B) डेविड ईस्टन ✅
(C) कार्ल ड्यूश
(D) रॉबर्ट डाल
3. संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम के प्रमुख प्रवर्तक हैं—
(A) डेविड ईस्टन
(B) गैब्रियल आलमंड ✅
(C) अरस्तू
(D) मैक्स वेबर
4. व्यवस्था उपागम में जनता की माँगें कहलाती हैं—
(A) आउटपुट
(B) संरचना
(C) इनपुट ✅
(D) कार्य
5. सरकार द्वारा बनाई गई नीतियाँ कहलाती हैं—
(A) इनपुट
(B) आउटपुट ✅
(C) फीडबैक
(D) संरचना
6. संसद एक—
(A) कार्य
(B) संरचना ✅
(C) प्रक्रिया
(D) व्यवहार
7. कानून बनाना संसद का—
(A) अधिकार
(B) कार्य ✅
(C) व्यवहार
(D) संगठन
8. औपचारिक-वैधानिक उपागम मुख्य रूप से अध्ययन करता है—
(A) राजनीतिक व्यवहार
(B) संविधान एवं कानून ✅
(C) जनमत
(D) राजनीतिक संस्कृति
9. संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम का आधार है—
(A) संविधान
(B) संरचना एवं कार्य ✅
(C) राजनीतिक दल
(D) चुनाव
10. निम्नलिखित में कौन-सा आधुनिक उपागम है?
(A) औपचारिक-वैधानिक
(B) व्यवस्था उपागम
(C) संरचनात्मक-कार्यात्मक
(D) B एवं C दोनों ✅
(C) अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer)
उपागम से क्या अभिप्राय है?
औपचारिक-वैधानिक उपागम क्या है?
व्यवस्था उपागम की संकल्पना स्पष्ट कीजिए।
संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम क्या है?
इनपुट क्या है?
आउटपुट क्या है?
फीडबैक क्या है?
संरचना और कार्य में अंतर लिखिए।
गैब्रियल आलमंड का योगदान लिखिए।
डेविड ईस्टन का योगदान लिखिए।
(D) लघु उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)
तुलनात्मक राजनीति में उपागम का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
औपचारिक-वैधानिक उपागम की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
औपचारिक-वैधानिक उपागम की सीमाएँ लिखिए।
व्यवस्था उपागम की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
व्यवस्था उपागम में इनपुट, आउटपुट एवं फीडबैक को उदाहरण सहित समझाइए।
संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम का परिचय दीजिए।
संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम की विशेषताएँ लिखिए।
संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम की आलोचना कीजिए।
औपचारिक-वैधानिक एवं व्यवस्था उपागम में अंतर स्पष्ट कीजिए।
व्यवस्था एवं संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम में अंतर बताइए।
(E) दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (10/15 अंक)
तुलनात्मक राजनीति के विभिन्न उपागमों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
औपचारिक-वैधानिक उपागम की विशेषताओं एवं सीमाओं का आलोचनात्मक विवेचन कीजिए।
डेविड ईस्टन के व्यवस्था उपागम की व्याख्या कीजिए तथा उसकी उपयोगिता बताइए।
संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम का विस्तृत विवेचन कीजिए।
गैब्रियल आलमंड के संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
तुलनात्मक राजनीति में आधुनिक उपागमों के महत्व की व्याख्या कीजिए।
औपचारिक-वैधानिक, व्यवस्था तथा संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागमों का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।
तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन में उपागमों की आवश्यकता एवं महत्व पर प्रकाश डालिए।
आधुनिक तुलनात्मक राजनीति के विकास में व्यवस्था उपागम एवं संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
"आधुनिक तुलनात्मक राजनीति का अध्ययन केवल संस्थाओं तक सीमित नहीं है।" इस कथन की उपागमों के संदर्भ में व्याख्या कीजिए।
(F) तुलनात्मक/विश्लेषणात्मक प्रश्न (M.A. स्तर)
औपचारिक-वैधानिक उपागम और व्यवस्था उपागम में अंतर स्पष्ट कीजिए।
व्यवस्था उपागम एवं संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।
आधुनिक तुलनात्मक राजनीति में औपचारिक-वैधानिक उपागम की प्रासंगिकता का मूल्यांकन कीजिए।
क्या व्यवस्था उपागम राजनीतिक वास्तविकताओं को पूरी तरह स्पष्ट करता है? विवेचना कीजिए।
संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम राजनीतिक व्यवस्थाओं की तुलना को किस प्रकार वैज्ञानिक बनाता है?
"प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में संरचनाएँ अलग हो सकती हैं, लेकिन उनके कार्य समान होते हैं।" स्पष्ट कीजिए।
आधुनिक तुलनात्मक राजनीति में डेविड ईस्टन एवं गैब्रियल आलमंड के योगदान का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
संसद का अध्ययन औपचारिक-वैधानिक, व्यवस्था तथा संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागमों के आधार पर कीजिए।
तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन में व्यवहारवादी परिवर्तन (Behavioural Revolution) का उपागमों पर क्या प्रभाव पड़ा?
आधुनिक तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन में उपागमों की उपयोगिता एवं सीमाओं का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
